Sunday, May 10, 2026

शहरीकरण की छांव में बदलते गांव

  

    समय के साथ गांव और गाँव के लोग बदल रहे हैं। आधुनिकता का रंग गांववालों पर चढ़ रहा है, तो उसका असर गांव पर भी दिखाई देने लगा। लेकिन, उन गांव की पीड़ा बिल्कुल अलग है, जो शहरों की सीमाओं से लगे हैं। बरसों से इन गांव में रहने वाली पीढ़ियों की मानसिकता तो ग्रामीण परिवेश की है, पर नए बदलाव ने नई पीढ़ी को शहरों से जोड़ दिया। बीते कुछ दशकों में आए इस बदलाव ने शहरों से प्रभावित इन गांव में अलग ही तरह का अंतर्द्वंद्व छेड़ दिया जो सिर्फ दो पीढ़ियों के बीच ही नहीं, दो परंपराओं के बीच भी है। ऐसे में कहा जा सकता है कि ये गांव न तो शहरों जैसे बन सके और न गांव ही बचे। रहन-सहन और सोच का ये फर्क खानपान के साथ हर जगह नजर आता है। गांव के इन घरों में रोटियां भले ही चूल्हे पर बनती हो, पर यहां के युवा जींस पहनते हैं।
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- हेमंत पाल

     हरी और ग्रामीण परिवेश का यह अंतर्द्वंद्व केवल सतही बदलाव तक सीमित नहीं है। यह एक गहरी सांस्कृतिक टकराहट है, जहां परंपरा और आधुनिकता के बीच खींचतान मच रही है। शहरों की सीमाओं से सटे ये गांव, जिन्हें अक्सर 'पेरी-अर्बन' क्षेत्र कहा जाता है, विकास की दौड़ में फंस गए। एक और शहरीकरण का दबाव उन्हें निगल लेना चाहता है, दूसरी ओर ग्रामीण जड़ें उन्हें पीछे खींचती रहती हैं। इन गांवों में रहने वाले लोग न तो पूर्णतः ग्रामीण हैं, न शहरी। उनकी पहचान धुंधली पड़ गई है।
     शहरीकरण के दौर में ये बदलाव स्वाभाविक लगते हैं। लेकिन, इनके मूल कारण बहुआयामी हैं। सबसे बड़ा कारक है औद्योगीकरण और बुनियादी ढांचे का विस्तार। पिछले दो-तीन दशकों में भारत के मध्यम और बड़े शहरों के आसपास फैक्टरियां, आईटी पार्क, हाईवे और मेट्रो प्रोजेक्ट उमड़ आए हैं। बड़े शहरों की परिधि पर बसे गांव इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। यहां जमीनें सस्ती मिलती हैं, इसलिए उद्योगपति और रियल एस्टेट कारोबारी इन्हें हथियाने लगे। किसान अपनी खेती छोड़कर मजदूरी या प्लॉट बेचने लगे। नतीजा यह हुआ कि गांव की अर्थव्यवस्था खेती से हटकर मजदूरी, छोटे-मोटे कारोबार और सर्विस सेक्टर की ओर मुड़ गई। सरकारी नीतियां भी इसमें सहायक रहीं। सरकारी योजनाओं ने शहरों को फैलाया, लेकिन इन गांवों को बीच में लटका दिया। विकास के नाम पर बिजली, पानी, सड़कें तो पहुंच गईं, लेकिन ग्रामीण पहचान मिट गई।
     माइग्रेशन भी एक प्रमुख कारण है। रोजगार की तलाश में युवा शहरों की ओर रुख करते हैं। सुबह गांव से निकलकर शाम को लौटना आम हो गया। मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इस प्रक्रिया को तेज कर दिया। फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर शहरी जीवनशैली की चकाचौंध देखकर गांव के बच्चे वैसी ही जिंदगी की कल्पना करने लगे। पहले जहां खेती ही जीवन था, अब कोचिंग सेंटर, प्राइवेट स्कूल और ऑनलाइन कोर्स ने शिक्षा को शहरी रंग दे दिया। माता-पिता भले ही चूल्हे पर रोटी सेंकें, लेकिन बच्चे मैकडॉनल्ड्स की बर्गर की चाहत रखते हैं। यह बदलाव आर्थिक रूप से मजबूत हुआ। जीडीपी ग्रोथ के साथ मध्यम वर्ग का विस्तार हुआ, जिसने उपभोक्तावाद को गांवों तक पहुंचा दिया। मॉल, सुपरमार्केट और ई-कॉमर्स ने खरीदारी को बदल दिया। अब गांव में भी एसी, फ्रिज और वॉशिंग मशीन आम हो गई हैं। लेकिन, यह सब बाहरी दिखावा है; अंदर से गांव की आत्मा खोखली हो रही है।
     इन कारणों से गांव की सोच में जो परिवर्तन आया, वह मौलिक है। पहले ग्रामीण सोच सामूहिकता पर आधारित थी पंचायत, जाति और परिवार। अब व्यक्तिवाद हावी हो गया है। युवा 'आत्मनिर्भर भारत' के नारे को अपनाते हुए शहरों की नौकरियों की दौड़ में हैं। वे खेती को घाटे का धंधा मानते हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत में 40% से अधिक युवा कृषि से बाहर हो चुके हैं। इन गांवों में सोच का यह बदलाव खान-पान से लेकर विवाह तक दिखता है। चूल्हे की रोटी अब स्टेटस सिंबल नहीं, बल्कि मजबूरी है। लड़कियां जींस-टॉप पहनकर कॉलेज जाती हैं, लड़के बाइक पर सवार होकर जिम जाते हैं। त्योहार अब ड्रोन शो और सेल्फी से सजे हैं, न कि सामूहिक भोज से। पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ी है प्लास्टिक कम, सोलर पैनल ज्यादा लेकिन यह शहरी प्रभाव है। गांव की सोच अब 'सस्टेनेबल डेवलपमेंट' की बात करने लगी है, जो पहले 'खेत की मिट्टी' तक सीमित थी। महिलाओं की सोच में सबसे बड़ा बदलाव आया। पहले घर-परिवार तक सीमित, अब वे स्वरोजगार, ऑनलाइन बिजनेस और राजनीति में उतर आई हैं। लेकिन, यह बदलाव चुनौतीपूर्ण है। पुरुष प्रधान मानसिकता अभी भी बाकी है, जिससे घरेलू कलह बढ़ा है। कुल मिलाकर, गांव की सोच अब हाइब्रिड हो गई। ग्रामीण मूल्य शहरी महत्वाकांक्षा के साथ।
       इस बदलते परिदृश्य में सबसे गहरा अंतर्द्वंद्व पीढ़ियों के बीच है। बुजुर्गों की पीढ़ी जिसने खेतों में पसीना बहाकर जीवन बिताया, नई पीढ़ी को समझ नहीं पाती। उनके लिए जींस पहनना पाप है, मोबाइल लत है। वे कहते हैं 'गांव का पानी पीने वाले शहर की हवा में कैसे सांस लेंगे?' वहीं युवा बुजुर्गों को रूढ़िवादी मानते हैं। विवाह का उदाहरण लें, बुजुर्ग जाति और गोत्र देखते हैं, युवा लव मैरिज और करियर मैच। एक परिवार में दादा जी चूल्हे पर चाय बनाते हैं, पोता स्टारबक्स कॉफी ऑर्डर करता है। यह फर्क शिक्षा से उपजा है। सरकारी स्कूलों से प्राइवेट इंग्लिश मीडियम तक का सफर सोच बदल गया। नतीजा यह हुआ कि घर में बहसें। बुजुर्ग परंपराओं की रक्षा करना चाहते हैं जैसे संयुक्त परिवार, लोकगीत और मेला। लेकिन, युवा न्यूक्लियर फैमिली और वेस्टर्न म्यूजिक की ओर। यह अंतर्द्वंद्व मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। बुजुर्ग अकेलापन महसूस करते हैं, युवा पहचान के संकट से जूझते हैं।
    एक सर्वे के अनुसार, ऐसे गांवों में डिप्रेशन के केस 30% बढ़े हैं। दो परंपराओं का संघर्ष भी ग्रामीण सामूहिकता बनाम शहरी व्यक्तिवाद है। गांव के मंदिर में पूजा होती है, लेकिन घर में नेटफ्लिक्स चलता है। यह टकराहट संस्कृति को लील रही है। फिर भी, आशा की किरण है। कई गांव होमस्टे, ऑर्गेनिक फार्मिंग और इको-टूरिज्म से अपनी पहचान जोड़ रहे हैं। नीतियां जैसे ग्रामीण उद्यमिता योजना इनकी मदद कर सकती हैं। लेकिन जरूरी है संवाद। पीढ़ियों को एक-दूसरे की सुनना होगा। बुजुर्गों को आधुनिकता अपनानी होगी, युवाओं को जड़ें। वरना ये गांव न शहर बनेंगे, न गांव बचेंगे बस एक उदासीन सीमा रह जाएगी। समाज को इस अंतर्द्वंद्व को समझना होगा, ताकि विकास संतुलित हो।
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