Friday, August 14, 2026

बिहार की राजनीति : हार से हासिल सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी

     
राजनीति में चुनाव सिर्फ हार और जीत का खेल नहीं होता, बल्कि यह नेतृत्व की क्षमता, संगठन की मजबूती और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को बदलने की योग्यता की भी परीक्षा होती है। कई बार चुनावी पराजय किसी नेता के राजनीतिक जीवन का अंत साबित होती है, तो कई बार वही हार आगे की बड़ी सफलता की आधारशिला बन जाती है। बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर की हाल की जीत इसी उदाहरण के रूप में देखी जा सकती है। विधानसभा चुनाव में लगभग पूरी तरह असफल रहने के बाद जिस नेता को राजनीतिक विश्लेषकों ने समय से पहले खारिज कर दिया था, उसी नेता ने कुछ महीनों बाद बांकीपुर जैसे कठिन निर्वाचन क्षेत्र में जीत दर्ज कर यह संकेत दिया कि राजनीति में अंतिम निर्णय मतदाता देता है, राजनीतिक टिप्पणीकार नहीं।
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● हेमंत पाल

     बिहार विधानसभा चुनाव के बाद 'जन सुराज' की स्थिति अत्यंत निराशाजनक थी। बड़ी संख्या में उम्मीदवार मैदान में उतरे, लेकिन अधिकांश अपनी जमानत तक नहीं बचा सके। परिणाम आने के तुरंत बाद यह धारणा बनने लगी कि प्रशांत किशोर का राजनीतिक प्रयोग विफल हो चुका है। यह भी कहा गया कि चुनावी रणनीतिकार के रूप में सफल रहे व्यक्ति की राजनीति में प्रत्यक्ष भूमिका निभाने की क्षमता सीमित है। लेकिन, प्रशांत किशोर ने इस आलोचना का जवाब बयानबाजी से नहीं, बल्कि संगठन और रणनीति में बदलाव के जरिए देने का रास्ता चुना। भारतीय राजनीति में हार के बाद नेताओं को चुनाव आयोग, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन, संगठन या सहयोगियों को दोष देना आम बात रही है। इसके विपरीत प्रशांत किशोर ने सार्वजनिक रूप से पराजय स्वीकार की और आत्ममंथन का रास्ता अपनाया। यही उनकी राजनीति का पहला महत्वपूर्ण मोड़ माना जा सकता है। किसी भी राजनीतिक दल के लिए हार के बाद सबसे बड़ा सवाल यह होता है, कि वह अपनी कमियों को स्वीकार करता है या नहीं। जन सुराज ने इस मामले में अपेक्षाकृत अलग रवैया अपनाया।
     चुनाव के बाद प्रशांत किशोर ने जिस प्रकार सार्वजनिक गतिविधियों से कुछ समय की दूरी बनाकर आत्मचिंतन का संदेश दिया, उसका राजनीतिक महत्व भी था। यह केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, बल्कि कार्यकर्ताओं और समर्थकों को यह संकेत भी था कि पार्टी हार के कारणों को समझे बिना आगे नहीं बढ़ेगी। इसके बाद संगठनात्मक ढांचे में जो परिवर्तन हुए, उन्होंने 'जन सुराज' की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सबसे बड़ा परिवर्तन पार्टी की कार्यशैली में दिखाई दिया। विधानसभा चुनाव के दौरान 'जन सुराज' में बड़ी संख्या में ऐसे लोग सक्रिय थे, जिनकी पहचान पेशेवर चुनाव प्रबंधन से जुड़ी थी। सोशल मीडिया, डिजिटल प्रचार और चुनावी ब्रांडिंग पर विशेष जोर दिया गया था। लेकिन, बिहार जैसे राज्य में केवल डिजिटल मौजूदगी चुनावी सफलता की गारंटी नहीं बन सकती। यहां बूथ स्तर का संगठन, जातीय समीकरण, स्थानीय नेतृत्व और लगातार जनसंपर्क कहीं अधिक प्रभावी साबित होते हैं। चुनाव परिणामों ने इस वास्तविकता को स्पष्ट कर दिया।
    इस अनुभव से सीखते हुए प्रशांत किशोर ने संगठन की प्राथमिकताओं को बदला। पेशेवर चुनावी मॉडल की जगह समर्पित कार्यकर्ताओं पर भरोसा बढ़ाया। बूथ स्तर पर संगठन तैयार करने, स्थानीय इकाइयों को सक्रिय करने और अलग-अलग सामाजिक समूहों तक नियमित पहुंच बनाने की रणनीति अपनाई गई। बड़ी जनसभाओं और सोशल मीडिया अभियानों की तुलना में छोटे समूहों के संवाद, मोहल्ला बैठकों और घर-घर संपर्क पर अधिक ध्यान दिया गया। यह बदलाव केवल रणनीति का नहीं, बल्कि राजनीतिक सोच का परिवर्तन था। राजनीति में आर्थिक पारदर्शिता और व्यक्तिगत प्रतिबद्धता भी कार्यकर्ताओं के मनोबल को प्रभावित करती है। प्रशांत किशोर ने अपनी आय और संपत्ति का बड़ा हिस्सा पार्टी को समर्पित करने की घोषणा कर यह संदेश देने का प्रयास किया कि 'जन सुराज' केवल चुनावी मंच नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक परियोजना है। साथ ही उन्होंने पार्टी से जुड़े लोगों से आर्थिक सहयोग की अपेक्षा रखकर यह संकेत भी दिया कि संगठन बाहरी संसाधनों पर निर्भर रहने के बजाय अपने समर्थकों की भागीदारी से आगे बढ़ेगा। इस मॉडल का उद्देश्य कार्यकर्ताओं में स्वामित्व की भावना पैदा करना था।
    बांकीपुर उपचुनाव इसी बदली हुई रणनीति की पहली बड़ी परीक्षा बना। यह सीट लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ रही है। ऐसे क्षेत्र में चुनाव लड़ना स्वयं में जोखिम भरा निर्णय था। यदि यहां भी पराजय होती, तो 'जन सुराज' की राजनीतिक विश्वसनीयता पर और गंभीर प्रश्न उठते। लेकिन, प्रशांत किशोर ने इसी चुनौती को अवसर में बदलने का प्रयास किया। इस चुनाव में उन्होंने राज्यस्तरीय बड़े राजनीतिक विमर्श की बजाय स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता दी। जलभराव, यातायात, रोजगार और शहरी अव्यवस्था जैसे विषय लगातार जनता के बीच उठाए गए। इससे चुनाव राष्ट्रीय राजनीतिक बहस से हटकर स्थानीय असंतोष के इर्द-गिर्द केंद्रित होने लगा। यह रणनीति इसलिए भी प्रभावी रही, क्योंकि स्थानीय चुनावों में मतदाता अक्सर अपने दैनिक जीवन से जुड़े मुद्दों पर अधिक प्रतिक्रिया देते हैं।  प्रशांत किशोर की एक और महत्वपूर्ण रणनीति यह रही कि उन्होंने स्वयं को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और महागठबंधन दोनों के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। बिहार में लंबे समय से राजनीति दो प्रमुख ध्रुवों के बीच घूमती रही है। ऐसे में उन मतदाताओं को आकर्षित करना, जो दोनों पक्षों से असंतुष्ट थे, 'जन सुराज' के लिए स्वाभाविक राजनीतिक अवसर था। यदि कोई तीसरा दल केवल विरोध की राजनीति करता तो उसकी स्वीकार्यता सीमित रहती है, लेकिन यदि वह व्यवहारिक विकल्प प्रस्तुत करता है. तो उसके लिए राजनीतिक जमीन बन सकती है।
     इस पूरे अभियान में एक और राजनीतिक पहलू महत्वपूर्ण रहा। भरत तिवारी एनकाउंटर का मुद्दा लगातार चर्चा में बना रहा। इस विषय को प्रशांत किशोर ने निरंतर राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाए रखा। माना गया कि इस मुद्दे ने विशेष रूप से उन मतदाताओं के बीच प्रभाव डाला, जो परंपरागत रूप से भाजपा के समर्थक माने जाते रहे हैं। दूसरी ओर मुख्य विपक्षी दल इस मुद्दे को उतनी प्रभावशीलता से राजनीतिक समर्थन में परिवर्तित नहीं कर सके। इससे 'जन सुराज' को उन वर्गों तक पहुंच बनाने का अवसर मिला, जहां पहले उसकी मौजूदगी सीमित थी। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा नेताओं के कुछ आत्मविश्वास से भरे बयानों ने भी राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया। जब किसी दल को अपनी जीत पूरी तरह सुनिश्चित मानने का संदेश जाता है, तो कई बार मतदाता इसके विपरीत प्रतिक्रिया भी देते हैं। बांकीपुर के परिणामों ने यह संकेत दिया कि किसी भी निर्वाचन क्षेत्र को केवल परंपरागत राजनीतिक गढ़ मानकर नहीं चला जा सकता। मतदाता समय-समय पर अपने फैसलों से स्थापित धारणाओं को बदलने की क्षमता रखते हैं।
     हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि बांकीपुर की जीत को पूरे बिहार की राजनीतिक तस्वीर का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। उपचुनाव और विधानसभा चुनाव की प्रकृति अलग होती है। उपचुनाव स्थानीय परिस्थितियों, उम्मीदवार की छवि और तत्कालीन राजनीतिक वातावरण से अधिक प्रभावित होते हैं, जबकि विधानसभा चुनाव में व्यापक संगठन, संसाधन, गठबंधन और राज्यव्यापी समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसलिए जन सुराज के सामने अभी भी अपनी नई रणनीति को पूरे राज्य में प्रभावी ढंग से लागू करने की चुनौती बनी हुई है। फिर भी यह स्वीकारना होगा कि प्रशांत किशोर ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश दिया है। उन्होंने यह दिखाया कि हार के बाद केवल बयान बदलने से नहीं, बल्कि संगठन, रणनीति और कार्यशैली बदलने से राजनीतिक वापसी संभव होती है। बिहार की राजनीति में उनकी यह वापसी केवल एक सीट की जीत नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि लगातार सीखने और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने वाला नेतृत्व लंबे समय तक प्रासंगिक बना रह सकता है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बांकीपुर की सफलता एक अपवाद साबित होती है या बिहार की राजनीति में किसी नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत।
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दतिया का जनादेश : असंतोष दोनों तरफ, भाजपा को भारी पड़ा सेबोटेज

      
कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,056 वोटों से हराकर लगातार दूसरी बार भाजपा को उपचुनाव में शिकस्त दी। इससे पहले विजयपुर में भी भाजपा को शिकस्त खाना पड़ी थी। दतिया की जीत इसलिए अहम है, क्योंकि दतिया लंबे समय तक पूर्व गृह मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा का अभेद्य राजनीतिक गढ़ रहा है। भाजपा ने यहां अपनी पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन कांग्रेस ने सीमित संसाधनों के बावजूद बेहतर स्थानीय रणनीति, उम्मीदवार की स्वीकार्यता और संगठन की एकजुटता के दम पर बाजी अपने नाम कर ली।
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● हेमंत पाल

   कांग्रेस ने दतिया का प्रतिष्ठापूर्ण उपचुनाव जीत लिया। यह चुनाव नतीजा अप्रत्याशित जरूर है, पर आश्चर्यजनक नहीं। क्योंकि, दतिया उपचुनाव की घोषणा के साथ ही यहां भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों में असंतोष खदबदाने लगा था। खासियत यह भी रही कि कांग्रेस ने चुनाव को केवल भाजपा विरोध तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे स्थानीय नेतृत्व और जनविश्वास के चुनाव में बदला। कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह की पहचान  सहज, सुलभ और साफ-सुथरी छवि वाले नेता की रही है। राजपरिवार से जुड़े होने के कारण उनकी सामाजिक स्वीकार्यता पहले से थी और ग्रामीण क्षेत्रों में उनका व्यक्तिगत संपर्क भी मजबूत था। कांग्रेस ने इसी छवि को चुनाव का केंद्र बनाया। बड़े राजनीतिक नारों के बजाय स्थानीय मुद्दों, व्यक्तिगत संपर्क और बूथ स्तर की सक्रियता पर अधिक जोर दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि मतदान के दिन कांग्रेस का समर्थक वर्ग अपेक्षाकृत अधिक संगठित दिखाई दिया।
   यह भी सच है कि कांग्रेस भी निर्विवाद स्थिति में नहीं थी। पूर्व विधायक राजेंद्र भारती की विधायकी ख़त्म होने के कारण यह उपचुनाव हुआ और चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस के भीतर मतभेद भी सार्वजनिक हुए। घनश्याम सिंह ने राजेंद्र भारती पर भितरघात के आरोप लगाए और बाद में पार्टी ने उन्हें निलंबित भी किया। लेकिन, कांग्रेस नेतृत्व की सफलता इस बात में रही कि उसने इन विवादों को चुनाव का मुख्य मुद्दा नहीं बनने दिया। संगठन ने उम्मीदवार के पक्ष में माहौल बनाए रखा और स्थानीय स्तर पर मतदाताओं को यह संदेश देने में सफलता हासिल की कि चुनाव व्यक्ति नहीं, पार्टी की राजनीतिक दिशा का है।
    दूसरी ओर भाजपा की रणनीति का केंद्र संगठनात्मक शक्ति और शीर्ष नेतृत्व का व्यापक प्रचार रहा। मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद और विधायक लगातार दतिया में सक्रिय रहे। जातीय समीकरणों को साधने के लिए अलग-अलग वर्गों के बीच विशेष अभियान चलाए। लेकिन, चुनाव ने यह साबित कर दिया कि सिर्फ शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी पर्याप्त नहीं होती। यदि स्थानीय संगठन पूरी तरह भावनात्मक रूप से जुड़ा न हो तो चुनावी मशीनरी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाती।
   भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती टिकट वितरण के बाद उभरा असंतोष था। पूर्व गृह मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया गया। इसके बाद उनके समर्थकों का खुला विरोध, सड़क पर प्रदर्शन और नाराजगी चुनाव की शुरुआत से ही चर्चा का विषय बन गई। बाद में डॉ मिश्रा ने पार्टी उम्मीदवार के समर्थन में प्रचार भी किया, लेकिन कार्यकर्ताओं का मन पूरी तरह नहीं बदल सका। इसका असर मतदान और मतगणना दोनों में दिखाई दिया। सबसे बड़ा प्रतीकात्मक संदेश तब मिला, जब डॉ नरोत्तम मिश्रा के खुद के मतदान केंद्र पर भी कांग्रेस भाजपा से आगे निकल गई। यह केवल बूथ का परिणाम नहीं था, बल्कि स्थानीय राजनीतिक संदेश था कि भाजपा अपने परंपरागत वोट को पूरी तरह एकजुट नहीं रख सकी।
   हालांकि, भाजपा की हार का कारण केवल भितरघात मान लेना भी अधूरी बात होगी। कांग्रेस ने इस चुनाव में अपनी चुनावी रणनीति को अधिक व्यवस्थित ढंग से लागू किया। उसने बूथ प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया, स्थानीय नेताओं के बीच समन्वय बनाए रखा और ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार जनसंपर्क अभियान चलाया। मतदान प्रतिशत लगभग 71.44% रहा, लेकिन अपेक्षाकृत कम मतदान और महिलाओं की घटती भागीदारी का लाभ कांग्रेस को मिला। कांग्रेस अपने परंपरागत मतदाताओं को मतदान केंद्र तक लाने में भाजपा की तुलना में अधिक सफल रही।
    मतगणना के दौरान भी कांग्रेस की बढ़त ने स्पष्ट कर दिया कि उसका समर्थन केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं था। शुरुआती राउंड से ही कांग्रेस आगे रही और कई चरणों में उसकी बढ़त 10 हजार से अधिक मतों तक पहुंच गई। अंतिम चरण में भाजपा ने कुछ अंतर जरूर कम किया, लेकिन चुनाव का रुख बदल नहीं सकी। इसका अर्थ यह है कि कांग्रेस का समर्थन व्यापक और संतुलित था, जबकि भाजपा को कई क्षेत्रों में अपेक्षित मतदान नहीं मिला। इस जीत का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है। लगातार दूसरी उपचुनाव जीत से कांग्रेस संगठन का मनोबल बढ़ेगा। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और चुनावी रणनीति संभालने वाले नेताओं के लिए यह परिणाम संगठनात्मक सफलता माना जाएगा। कांग्रेस अब यह दावा करने की स्थिति में होगी कि वह केवल सत्ता विरोध के भरोसे नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक तैयारी और स्थानीय नेतृत्व के दम पर भी भाजपा को चुनौती दे सकती है।
   दतिया का जनादेश भाजपा के लिए आत्ममंथन का विषय अवश्य है, लेकिन उससे भी अधिक यह कांग्रेस की रणनीतिक सफलता की कहानी है। इस चुनाव ने साबित किया कि मजबूत उम्मीदवार, स्थानीय विश्वसनीयता, प्रभावी बूथ प्रबंधन और कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी आज भी किसी भी चुनाव की सबसे बड़ी ताकत हैं। संसाधनों, बड़े प्रचार अभियानों और शीर्ष नेताओं की सभाओं से अधिक महत्व उस संगठन का होता है, जो मतदान के दिन मतदाता को अपने पक्ष में खड़ा कर सके। दतिया में कांग्रेस यही करने में सफल रही और यही उसकी जीत का सबसे बड़ा कारण बना।
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सिनेमा का दर्द, विभाजन की कसक


     देश के इतिहास में 15 अगस्त 1947 का दिन जहां एक तरफ आजादी का महान उल्लास लेकर आया, वहीं दूसरी तरफ देश के दो टुकड़ों में बंट जाने का एक ऐसा नासूर छोड़ गया, जिसकी कसक और टीस आज दशकों बाद भी भारतीय जनमानस के दिलों में जिंदा है। फिल्मकारों ने भी इस मानवीय त्रासदी को हमेशा अपनी संवेदना के केंद्र में रखा। बीते आठ दशकों में बंटवारे के इस असीम दर्द, मानसिक द्वंद्व और नफरत के बीच सुलगती इंसानियत को बेहद संजीदगी से अलग-अलग कथानकों के जरिए परदे पर उतारा गया है। 
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- हेमंत पाल
 
    देश के बंटवारे का दर्द हर भारतीय के दिल में टीस बनकर कचोटता है। इस विषय को फिल्मकारों ने बीते दशकों में कई तरह से फिल्माया और दर्शकों को उस दर्द को याद दिलाया है। हाल ही में इस संवेदनशील और ऐतिहासिक विषय को लेकर एक बार फिर सिनेमा जगत में बड़ी हलचल हुई। आमिर खान की प्रोडक्शन कंपनी ने अभिनेता सनी देओल को लेकर 'बंटवारा 1947' नाम से फिल्म का निर्माण किया है। यह फिल्म इस बात का सीधा प्रमाण है कि विभाजन का वह दौर, उसका दर्द और संघर्ष आज भी एक ऐसा विषय है, जो हर दौर के दर्शकों और फिल्मकारों को गहरे स्तर पर झकझोरता और आकर्षित करता है। 'बंटवारा 1947' के माध्यम से एक बार फिर बड़े परदे पर उस दौर की भयावहता, विस्थापन की पीड़ा और मानवीय रिश्तों के टूटने-जुड़ने की दास्तान को नए दृष्टिकोण और भव्य पैमाने के साथ पेश किया गया है, जो पुरानी यादों को ताज़ा करते हुए नई पीढ़ी को इतिहास के इस दुखद अध्याय से रूबरू कराती है।
    आजादी के बाद से अब तक अगर विभाजन के विषय पर बनी फिल्मों के सफरनामे को काल के क्रम के अनुसार देखें, तो भारतीय सिनेमा ने हर दशक में इस त्रासदी को अलग-अलग कोणों से समझने और बयां करने का प्रयास किया है। इस कड़ी में पहली शुरुआत प्रभावशाली तरीके से यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी फिल्म 'धर्मपुत्र' से हुई, जो वर्ष 1961 में रिलीज़ हुई थी। आचार्य चतुरसेन के प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित इस फिल्म में शशि कपूर और माला सिन्हा ने मुख्य भूमिकाएं निभाई। यह फिल्म बंटवारे के दौर में पनपे धार्मिक कट्टरपंथ और अपनी ही पहचान को लेकर मन में उठते द्वंद्व पर करारा प्रहार करती है। फिल्म उस दौर में हिंदू-मुस्लिम एकता का एक बेहद मजबूत और जरूरी संदेश देती है, जो यह दर्शाता है कि राजनीति और धर्म के नाम पर इंसानी रिश्तों को कैसे बलि चढ़ाया गया था।
    इसके बाद वर्ष 1973 में आई फिल्म 'गर्म हवा' को विभाजन पर बनी भारतीय सिनेमा की सबसे प्रामाणिक, संवेदनशील और यथार्थवादी फिल्मों में गिना जाता है। महान निर्देशक एमएस सथ्यू के निर्देशन में बनी इस फिल्म में बलराज साहनी, फारूक शेख और गीता सिद्धार्थ ने अपनी अभिनय क्षमता की अमिट छाप छोड़ी थी। लेखिका इस्मत चुगताई की कहानी और कैफी आजमी की कालजयी पटकथा पर आधारित यह फिल्म आगरा के एक मुस्लिम व्यवसायी सलीम मिर्जा और उनके परिवार के संघर्ष की मर्मस्पर्शी दास्तान है। फिल्म उन परिवारों की मानसिक, सामाजिक और आर्थिक पीड़ा को उकेरती है, जिन्होंने विभाजन के बाद अपने वतन में ही रहने का फैसला किया था। लेकिन, फिर भी उन्हें हर कदम पर शक, बेगानेपन और आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। बलराज साहनी का अभिनय सलीम मिर्जा के रूप में दर्शक के दिल को छूने वाला था। 
    अस्सी के दशक में दूरदर्शन के दौर में वर्ष 1987 में आया धारावाहिक 'तमस' न केवल एक टीवी के कार्यक्रम के रूप में बल्कि एक यादगार सिनेमेटिक अनुभव के रूप में इतिहास में दर्ज हुआ। गोविंद निहलानी द्वारा निर्देशित और भीष्म साहनी के चर्चित उपन्यास पर आधारित इस कृति में ओम पूरी, दीप्ति नवल, अमरीश पुरी और स्वयं भीष्म साहनी जैसे दिग्गज कलाकारों ने अभिनय किया था। 'तमस' धारावाहिक बंटवारे से ठीक पहले और उस दौरान भड़के सांप्रदायिक दंगों, राजनीतिक षड्यंत्रों और इन सबके बीच पिसते आम, बेकसूर लोगों की तबाही का सबसे नग्न और यथार्थवादी खाका खींचता है। यह दिखाता है कि कैसे चंद स्वार्थी ताकतों के उकसावे में आकर सदियों से साथ रहने वाले पड़ोसी एक-दूसरे के खून के प्यासे बन गए थे।
    नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में विभाजन के विषय पर कई महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों को परदे पर उतारा गया। इस क्रम में वर्ष 1998 में निर्देशक पमेला रूक्स की फिल्म 'ट्रेन टू पाकिस्तान' आई, जो खुशवंत सिंह के विश्व प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित थी। निर्मल पांडे, रजित कपूर, दिव्या दत्ता और स्मृति मिश्रा के सशक्त अभिनय से सजी यह फिल्म भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित 'मनोमाजरा' नामक एक शांत गांव की कहानी कहती है। फिल्म यह दर्शाती है कि कैसे सीमा पार से लाशों से भरकर आने वाली ट्रेनों के खौफनाक मंजर ने उस गांव के भाईचारे और शांति को नफरत की आग में झोंक दिया था।
    1998 में दीपा मेहता के निर्देशन में बनी फिल्म '1947 अर्थ' रिलीज हुई, जो बीपसी सिधवा के उपन्यास 'क्रैकिंग इंडिया' पर आधारित थी। इस फिल्म में आमिर खान, नंदिता दास और राहुल खन्ना ने मुख्य भूमिकाएं निभाई। लाहौर की पृष्ठभूमि पर आधारित यह फिल्म बहुत ही बारीकी से दिखाती है कि कैसे बंटवारे की सांप्रदायिक आग ने सदियों पुरानी दोस्तों की टोलियों, मासूम प्यार और इंसानी रिश्तों को पल भर में जलाकर राख कर दिया। फिल्म में आमिर खान द्वारा निभाया गया 'दिल नवाज' (आइस-कैंडी मैन) का किरदार नफरत और जुनून के उस बदलाव को दर्शाता है जो उस दौर में साधारण इंसानों के भीतर आ गया था।
    सदी के बदलाव के साथ वर्ष 2000 में कमल हासन की ऐतिहासिक फिल्म 'हे राम' आई। कमल हासन द्वारा ही निर्देशित इस फिल्म में स्वयं कमल हासन के साथ शाहरुख खान, रानी मुखर्जी और नसीरुद्दीन शाह जैसे दिग्गज सितारे थे। विभाजन के दौरान फैली भयंकर हिंसा, नफरत और उसके परिणामस्वरूप हुए घटनाक्रमों के साथ-साथ महात्मा गांधी की हत्या के दौर को केंद्र में रखकर बनाई गई यह फिल्म विभाजन से उपजे मानसिक और भावनात्मक आघात की गहराई को दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर तलाशती है।
    2001 में आई फिल्म 'गदर : एक प्रेम कथा' ने विभाजन के विषय को एक बिल्कुल नए कमर्शियल और भव्य पैमाने पर दर्शकों के सामने रखा। अनिल शर्मा निर्देशित और सनी देओल, अमीषा पटेल तथा अमरीश पुरी अभिनीत यह फिल्म भले ही एक प्रेम कहानी के ताने-बाने पर बुनी गई थी, लेकिन इसकी शुरुआत में विभाजन के दौरान हुए दंगों, ट्रेनों में कत्लेआम और अपनों से बिछड़ते परिवारों की चीख-पुकार का जो चित्रण किया गया, उसने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए कीर्तिमान रचे और साबित किया कि विभाजन का दौर मुख्यधारा के सिनेमा में भी बहुत गहराई से अपील करता है।
    इसके बाद वर्ष 2003 में डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी के निर्देशन में बनी फिल्म 'पिंजर' आई, जो अमृता प्रीतम के बेहद मशहूर उपन्यास पर आधारित थी। उर्मिला मातोंडकर, मनोज बाजपेयी और संजय सूरी के जीवंत अभिनय से सजी यह फिल्म विभाजन के दौरान महिलाओं पर हुए अमानवीय अत्याचारों, उनके अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और सामाजिक त्रासदियों को बेहद संजीदगी से उजागर करती है। फिल्म की मुख्य पात्र पूरो और रशीद की कहानी के माध्यम से फिल्म यह सवाल उठाती है कि युद्ध और बंटवारे में सबसे बड़ी कीमत हमेशा औरतों को ही क्यों चुकानी पड़ती है।
    आगे चलकर वर्ष 2013 में राकेश ओमप्रकाश मेहरा द्वारा निर्देशित फिल्म 'भाग मिल्खा भाग' रिलीज़ हुई, जिसमें फरहान अख्तर ने महान एथलीट मिल्खा सिंह की भूमिका निभाई। यद्यपि यह फिल्म एक महान खिलाड़ी की बायोपिक थी, लेकिन इसका मुख्य भावनात्मक आधार विभाजन की वही त्रासदी थी। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे बचपन में बंटवारे के दौरान मिल्खा सिंह के माता-पिता को उनकी आंखों के सामने कत्ल कर दिया गया था और विस्थापन के उस खौफनाक दर्द का जख्म ताउम्र उनके दिलो-दिमाग पर हावी रहा। यह फिल्म यह दर्शाती है कि बंटवारे का दर्द केवल उस दौर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने इंसानों की पूरी जिंदगी और आने वाली पीढ़ियों की मानसिकता को प्रभावित किया।
    1961 की 'धर्मपुत्र' से लेकर गर्म हवा, तमस, पिंजर, 1947 अर्थ और अब 'बंटवारा 1947' तक का सिनेमाई सफर यह साफ करता है कि भारत-पाकिस्तान का विभाजन केवल एक बीती हुई ऐतिहासिक घटना नहीं है। यह भारतीय सिनेमा के लिए एक कभी न खत्म होने वाली मानवीय संवेदना की प्रयोगशाला है। इन फिल्मों ने दर्शकों को केवल मनोरंजन नहीं दिया, बल्कि उन्हें इतिहास के उस काले पन्ने से रू-ब-रू कराया जहां इंसानियत हार गई और नफरत जीत गई थी। सिनेमा ने बार-बार इन कहानियों के जरिए दुनिया को यही याद दिलाने की कोशिश की है कि सीमाओं का बंटवारा भले ही ज़मीन पर लकीरें खींच दे, लेकिन दिलों में बिखरे दर्द, यादों और इंसानी रिश्तों के जुड़ाव को कोई लकीर मिटा नहीं सकती। यही कारण है कि भारतीय दर्शक आज भी जब बड़े पर्दे पर विभाजन की इन कहानियों को देखते हैं, तो उनकी आंखें नम हो जाती हैं और सिनेमा का यह संवेदनशील रूप हमेशा दर्शकों के दिलों में प्रासंगिक बना रहता है।
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'नायक' से 'जन नायकन' और जंतर मंतर की पटकथा

सिनेमा और समाज का रिश्ता हमेशा से गहरा रहा है। यही वजह है कि बड़ा परदा सिर्फ कहानियां नहीं फिल्माता, वक्त-बे-वक्त प्रशासनिक व्यवस्था और सामाजिक सरोकारों के खिलाफ उठती चेतना का प्रतिबिंब भी बनता है। जब भी समाज में भ्रष्टाचार, निरंकुशता या नफरत का दौर गहराया, तब एक काल्पनिक 'जन नायक' जन्मा, जिसने आम जनता के अधिकारों और लोकतंत्र के अस्तित्व को बचाने के लिए कड़े कदम उठाए। 'जना नायकन' जैसी फिल्मों ने नारी सशक्तिकरण को उजागर करती हैं, धार्मिक नफरत और कट्टरता के खिलाफ लोकतंत्र के रक्षक के रूप में खड़ी होती हैं। उसी सिनेमा विरासत का एक हिस्सा 'नायक' जैसी फिल्में हैं, जिनमें रातों-रात व्यवस्था बदलने और जनहित में ऐतिहासिक फैसले लेने के फंतासी कारनामे हैं। परदे पर अकेला नायक पूरी व्यवस्था को चुनौती देता दिखे, लेकिन असल जीवन में लोकतंत्र की रक्षा एक के कंधों पर नहीं है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर इंसाफ की आवाज बुलंद करने वाला आंदोलन इसी कड़वी सच्चाई का प्रमाण है। यह दर्शाता है, कि असली 'जन नायक' एक व्यक्ति नहीं, अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने वाली जनशक्ति है।
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- हेमंत पाल

     सिनेमा सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि समय-समय पर इसने समाज का आईना बनने के साथ राजनीतिक और सामाजिक चेतना के जगाने का काम भी किया। जब व्यवस्था में भ्रष्टाचार, निरंकुशता और धार्मिक विषैलेपन का बोलबाला हुआ, तब सिनेमा के परदे पर ऐसे 'जना नायकन' का जन्म हुआ, जिसने जनता की आवाज बनकर लोकतंत्र की रक्षा का बीड़ा उठाया। निर्माता एच विनोथ की हाल की यह फ़िल्म इसी परंपरा को आगे बढ़ाती हुई एक सशक्त रूप में सामने आई है। हालांकि, यह फिल्म नंदामुरी बालकृष्ण की 2023 की हिट फिल्म 'भगवंत केसरी' की रीमेक है। यह एक पूर्व पुलिस अफसर के एक लड़की को सशक्त बनाकर भारतीय सेना में भेजने की कहानी थी। लेकिन, विनोथ ने इसमें राजनीतिक तेवर और सामाजिक संदेशों की एक ऐसी नई परत जोड़ी, जिसने इसे रीमेक से अलग कर लोकतंत्र के रक्षक की कहानी बना दिया। विजय थलापति की 'जना नायकन' की कहानी पिता-पुत्री के भावनात्मक रिश्ते, नारी सशक्तिकरण और डर से संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमती है। 
     अपने मित्र इंस्पेक्टर श्रीकांत की असमय मृत्यु के बाद, थलपति वेट्री कोंडन (विजय) उनकी बेटी विजी (ममिता बैजू) के संरक्षक की भूमिका निभाता है। विजी मानसिक आघात के कारण एक गहरे डर से जूझ रही है, जो एक छोटी सी आवाज से सिहर उठती है। वेट्री का उद्देश्य केवल उसे सेना में शामिल कराना ही नहीं, बल्कि उसके भीतर के भय को समाप्त कर उसे आत्मनिर्भर बनाना है। कहानी तब एक बड़ा राजनीतिक मोड़ लेती है, जब इसमें जॉन हिमलर (बॉबी देओल) के रूप में एक खतरनाक खलनायक का प्रवेश होता है। जहां मूल फिल्म में खलनायक का उद्देश्य व्यावसायिक साम्राज्य स्थापित करना था, वहीं 'जना नायकन' में निर्देशक ने एक नई परत जोड़ते हुए उसे धार्मिक घृणा और कट्टरता के जरिए भारत के लोकतंत्र को नष्ट करने वाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। यहीं से वेट्री कोंडन का चरित्र केवल एक अभिभावक न रहकर एक ऐसे नायक के रूप में उभरता है, जो देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए ढाल बनकर खड़ा होता है।
     फिल्म 'जना नायकन' को अगर इस पूरे परिदृश्य में रखकर देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि यह फिल्म विजय थलापति की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और उनकी जन-नायक की छवि को मजबूत करने का एक सुनियोजित प्रयास है। एमजीआर के दौर से ही दक्षिण भारतीय सिनेमा में फिल्मों का इस्तेमाल राजनीतिक संदेश देने और नायक को जनता के तारणहार के रूप में स्थापित करने के लिए होता रहा है। 'जना नायकन' भी इसी परंपरा का निर्वहन करती है। फिल्म में जब वेट्री कोंडन धार्मिक नफरत फैलाने वाली ताकतों से मुकाबला करता है, तो वह केवल एक फिल्मी विलेन से नहीं लड़ रहा होता, बल्कि वह समकालीन समाज में मौजूद कट्टरता और भय के माहौल के खिलाफ एक मजबूत स्टैंड ले रहा होता है। यह मोड़ फिल्म को मनोरंजन के दायरे से निकालकर एक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना देता है।
      व्यावसायिक सिनेमा की इस शैली में लोकतंत्र की रक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था को रातों-रात या त्वरित फैसलों से बदलने का विचार कोई नया नहीं है। हिंदी फिल्म 'नायक' इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। एस शंकर के निर्देशन में बनी और अनिल कपूर द्वारा जीवंत की गई इस फिल्म में एक आम पत्रकार (शिवाजी राव) को एक दिन का मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिलता है। समय की अत्यधिक बाध्यता के कारण शिवाजी राव औपचारिकताओं के जाल में उलझने के बजाय रास्ते चलते कड़े और त्वरित आदेश जारी करता है। भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों को निलंबित करना, राशन की दुकानों में कालाबाजारी रोकना और आम जनता की समस्याओं का मौके पर ही निवारण करना जैसी उसकी शैली ने जनता को एक काल्पनिक लेकिन बेहद संतोषजनक राहत दी थी। 'नायक' ने दिखाया था कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो और नीतियां स्पष्ट हों, तो व्यवस्था में सुधार असंभव नहीं है।
      इसी तरह की लोकतांत्रिक चेतना और व्यवस्था से टकराव की भावना अमिताभ बच्चन की फिल्म 'इंकलाब' में भी देखने को मिली है। आठवें दशक के उस दौर में जब राजनीति और अपराध का गठजोड़ चरम पर था, 'इंकलाब' का नायक भ्रष्टाचार और राजनीतिक सड़न को मिटाने के लिए अतिवादी, लेकिन लोकतांत्रिक शुद्धिकरण का रास्ता चुनता है। इसी कड़ी में प्रकाश झा की फिल्म 'राजनीति' और 'सत्याग्रह' का नाम भी प्रमुखता से लिया जा सकता है। 'सत्याग्रह' में अमिताभ बच्चन और अजय देवगन का किरदार एक समानांतर व्यवस्था खड़ी करके सरकार को जनहित में कड़े फैसले लेने पर मजबूर करता है। वहीं दूसरी ओर, 'युवा' और 'रंग दे बसंती' जैसी फिल्मों ने यह दिखाया कि जब तक देश की युवा शक्ति राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनती या व्यवस्था के खिलाफ आवाज नहीं उठाती, तब तक सच्चा लोकतंत्र कायम नहीं हो सकता। इन सभी फिल्मों का मूल संदेश यही रहा है कि एक नायक अपनी निडरता और फैसलों से कैसे एक पूरी भ्रष्ट व्यवस्था को चुनौती देकर जनता के अधिकारों की रक्षा कर सकता है।
     वास्तविक जीवन में भी जब कभी लोकतंत्र पर संकट आया है या जनता के अधिकारों का हनन हुआ, तब ऐसी ही नाटकीय और ऐतिहासिक घटनाएं सड़कों पर घटित हुई हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुआ छात्र आंदोलन इसी तरह की जन-चेतना का एक उदाहरण है। सिनेमा कहानियों और इस तरह के जमीनी आंदोलनों में फर्क सिर्फ इतना होता है कि फिल्मों में नायक प्रायः अकेला होता है, जो पूरी व्यवस्था से टकरा जाता है। जबकि, वास्तविक आंदोलनों में नायक अकेला नहीं होता, उसके पीछे एक जागरूक जनसमूह और युवाओं की एक बड़ी फौज होती है। जंतर-मंतर पर जुटे छात्रों ने भी अपने उस मंतव्य को पूरा करने के लिए शांतिपूर्ण और संवैधानिक संघर्ष किया, जिसके लिए वह आंदोलन शुरू हुआ था। यह आंदोलन साबित करता है कि लोकतंत्र केवल मतपेटी तक सीमित नहीं है, बल्कि जब नागरिक अपने अधिकारों के लिए सजग होकर खड़े होते हैं, तभी लोकतंत्र वास्तव में जीवित और सुरक्षित रहता है।
      चाहे फिल्म का 'नायक' का एक दिन का मुख्यमंत्री हो, 'सत्याग्रह' का जन-आंदोलन हो या फिर 'जना नायकन' का लोकतंत्र रक्षक थलपति वेट्री कोंडन। सिनेमा हमेशा से जनता की इस गहरी इच्छा को व्यक्त करता आया है कि कोई आए और इस तंत्र की कमियों को दूर करे। 'जना नायकन' मसाला सिनेमा के तमाम तामझाम, एक्शन दृश्यों और पारिवारिक भावनाओं के बीच भी लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों समानता, भयमुक्त समाज और धार्मिक सौहार्द की वकालत करती है। यह फिल्म इस बात का प्रतीक है कि जब सिनेमा व्यावसायिकता के साथ-साथ एक राजनीतिक और लोकतांत्रिक दायित्व को अपने कंधों पर उठाता है, तो वह केवल एक मनोरंजन का साधन न रहकर समाज के लिए एक प्रेरणा बन जाता है।
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जब परदे पर बुलंद हुआ युवाओं का आक्रोश



हिंदी फिल्मकारों ने तात्कालिक मुद्दों और विविध कथानकों पर भी फ़िल्में बनाकर अपनी सामाजिक जवाबदेही व्यक्त करने का मौका नहीं गंवाया। छात्र आंदोलन भी एक ऐसा ही विषय है, जिस पर अलग-अलग संदर्भो में फ़िल्में बनी। ये फिल्में इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि उन्होंने छात्र आंदोलनों को केवल भीड़, नारे और टकराव के रूप में नहीं दिखाया, बल्कि उन्हें लोकतंत्र की जीवंत धड़कन, युवा चेतना की अभिव्यक्ति और सामाजिक परिवर्तन की प्रेरक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। यही कारण है कि समय बदलने के बावजूद इन फिल्मों की प्रासंगिकता बनी हुई है। हर नया छात्र आंदोलन, हर नई बहस और हर नई पीढ़ी इन फिल्मों को नए अर्थों में पढ़ती और समझती है। यही किसी भी चर्चित फिल्म की पहचान होती है कि वह अपने समय से आगे निकलकर आने वाली पीढ़ियों के लिए भी विचार का विषय बनी रहे। इस तरह की फ़िल्में सिर्फ छात्रों के आंदोलनों, लोकतांत्रिक असहमति तक ही सीमित नहीं रही, ये युवा चेतना का सिनेमाई दस्तावेज भी है। 
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- हेमंत पाल

   लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता और असहमति को स्वीकार करने की क्षमता मानी जाती है। यही कारण है कि यहां विरोध-प्रदर्शन केवल राजनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक स्वाभाविक और संवैधानिक हिस्सा माना जाता है। देश के इतिहास पर नजर डालें तो आजादी के आंदोलन से लेकर जेपी आंदोलन, मंडल आयोग के विरोध और समर्थन, भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों, विश्वविद्यालयों के छात्र संघर्षों और शिक्षा से जुड़े आंदोलनों तक युवाओं ने हर दौर में अपनी निर्णायक भूमिका निभाई है। जब-जब युवाओं ने व्यवस्था से सवाल पूछे, तब-तब साहित्य, रंगमंच और सिनेमा ने भी उन सवालों को अपने-अपने ढंग से अभिव्यक्ति दी। हिंदी सिनेमा ने भी कई बार उन बेचैनियों, संघर्षों और सपनों को बड़े पर्दे पर उतारा है, जो किसी भी छात्र आंदोलन या जनप्रतिरोध की असली ऊर्जा होते हैं।
   दिलचस्प बात यह है कि हिंदी फिल्मों में छात्र आंदोलनों को केवल नारों, रैलियों और प्रदर्शन तक सीमित नहीं रखा गया। इन फिल्मों ने यह समझने की कोशिश की कि आखिर युवा विरोध क्यों करता है, व्यवस्था से उसका टकराव किन कारणों से पैदा होता है, छात्र राजनीति किस तरह लोकतंत्र को मजबूत भी करती है और कई बार उसकी कमजोरियों का शिकार भी बन जाती है। कहीं आदर्शवाद दिखाई देता है, कहीं सत्ता की महत्वाकांक्षा, कहीं सामाजिक न्याय की लड़ाई और कहीं व्यवस्था परिवर्तन का सपना। इसलिए छात्र आंदोलनों पर बनी फिल्में केवल अपने समय की कहानी नहीं कहतीं, बल्कि वे भारतीय लोकतंत्र की बदलती सामाजिक और राजनीतिक चेतना का भी दस्तावेज बन जाती हैं।
   जब भी हिंदी सिनेमा में छात्र आंदोलनों की चर्चा होती है तो सबसे पहले 'रंग दे बसंती' (2006) का नाम सामने आता है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा की यह फिल्म केवल एक सफल व्यावसायिक फिल्म नहीं, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक घटना साबित हुई। आमिर खान, सिद्धार्थ, कुणाल कपूर, शरमन जोशी, अतुल कुलकर्णी, आर माधवन और सोहा अली खान अभिनीत इस फिल्म ने युवाओं के भीतर छिपे असंतोष को अभूतपूर्व तरीके से अभिव्यक्ति दी। कहानी कुछ ऐसे युवाओं से शुरू होती है जिनके लिए जीवन मौज-मस्ती का दूसरा नाम है, लेकिन वायुसेना के एक पायलट मित्र की मौत और उससे जुड़े भ्रष्टाचार के खुलासे के बाद उनका नजरिया पूरी तरह बदल जाता है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह भगत सिंह और उनके साथियों के स्वतंत्रता संग्राम को वर्तमान पीढ़ी के संघर्ष से जोड़ती है। अतीत और वर्तमान का यह समानांतर कथानक दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि हर दौर का युवा अन्याय के खिलाफ अपनी भाषा और अपने तरीके से आवाज उठाता है। फिल्म ने यह भी स्थापित किया कि जब संस्थाएं जवाबदेह नहीं रहतीं तो नागरिक प्रतिरोध जन्म लेता है। यही कारण है कि पिछले दो दशकों में जब भी किसी बड़े छात्र या युवा आंदोलन की चर्चा हुई, 'रंग दे बसंती' का उल्लेख स्वतः होने लगा।
   ऐसी ही एक फिल्म 'युवा' (2004) लोकतांत्रिक भागीदारी का घोषणा पत्र कही जा सकती है। मणिरत्नम ने इस फिल्म में छात्र राजनीति को नकारात्मक दृष्टि से नहीं, बल्कि परिवर्तन के साधन के रूप में देखा। अजय देवगन का छात्र नेता माइकल मुखर्जी युवाओं को यह संदेश देता है कि राजनीति गंदी है कहकर उससे दूर भागना समस्या का समाधान नहीं है। यदि ईमानदार और शिक्षित युवा राजनीति से दूर रहेंगे तो व्यवस्था पर वही लोग हावी होंगे जिनकी आलोचना की जाती है। अभिषेक बच्चन और विवेक ओबेरॉय के किरदार भी इस विचार को मजबूत करते हैं कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज निर्माण का भी रास्ता हो सकती है। फिल्म की प्रासंगिकता आज इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि वर्तमान समय में भी युवाओं की राजनीतिक भागीदारी और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी पर लगातार बहस होती रहती है।
      सुधीर मिश्रा की 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' (2005) छात्र आंदोलनों के वैचारिक पक्ष को सबसे गहराई से समझने वाली फिल्मों में शामिल है। यह फिल्म 1970 के दशक की उथल-पुथल, आपातकाल, नक्सल आंदोलन और सामाजिक असमानता की पृष्ठभूमि में तीन युवाओं के जीवन को प्रस्तुत करती है। केके मेनन, शाइनी आहूजा और चित्रांगदा सिंह के पात्र केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से संचालित नहीं होते, बल्कि वे अपने समय के सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों से गहराई से प्रभावित हैं। फिल्म यह दिखाती है कि आदर्शवाद की कीमत अक्सर व्यक्तिगत सुख, करियर और पारिवारिक जीवन से चुकानी पड़ती है। यही कारण है कि यह फिल्म किसी आंदोलन का महिमामंडन नहीं करती, बल्कि उसके भीतर मौजूद अंतर्विरोधों, भ्रमों और मानवीय त्रासदियों को भी सामने लाती है।
   अनुराग कश्यप की 'गुलाल' (2009) छात्र राजनीति के उस पक्ष को उजागर करती है, जिसके बारे में आमतौर पर कम बात होती है। विश्वविद्यालय परिसर में विचारधाराओं की टकराहट, क्षेत्रीय अस्मिता, जातीय समीकरण, सत्ता की महत्वाकांक्षा और हिंसा ये सभी तत्व फिल्म में बेहद तीखे ढंग से सामने आते हैं। फिल्म बताती है कि छात्र राजनीति केवल आदर्शवाद का मंच नहीं होती, बल्कि कई बार वही राजनीति बाहरी शक्तियों, अपराध और सत्ता संघर्ष का अखाड़ा भी बन जाती है। अनुराग कश्यप ने विश्वविद्यालय को समाज का लघु रूप मानते हुए दिखाया कि जो संघर्ष देश की राजनीति में दिखाई देते हैं, उनकी झलक परिसर की राजनीति में भी मिलती है। इसी तरह 'हासिल' (2003) उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों, विशेषकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति का यथार्थवादी चित्र प्रस्तुत करती है। 
     तिग्मांशु धूलिया निर्देशित इस फिल्म में जिमी शेरगिल का आदर्शवादी छात्र और इरफान खान का महत्वाकांक्षी छात्र नेता दो अलग-अलग राजनीतिक संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। फिल्म का सबसे बड़ा योगदान यह है कि वह छात्र राजनीति के अपराधीकरण को बिना किसी लाग-लपेट के दिखाती है। चुनाव, बाहुबल, हिंसा और राजनीतिक संरक्षण किस तरह शिक्षा संस्थानों के वातावरण को प्रभावित करते हैं, यह फिल्म प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। इरफान खान का अभिनय इस फिल्म को एक स्थायी पहचान देता है।
   प्रकाश झा की 'आरक्षण' (2011) ने शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे अत्यंत संवेदनशील विषय को केंद्र में रखा। भारत में आरक्षण केवल एक नीति नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक विमर्श का विषय रहा है। अमिताभ बच्चन, सैफ अली खान, दीपिका पादुकोण, मनोज बाजपेयी और प्रतीक बब्बर अभिनीत यह फिल्म दिखाती है कि जब शिक्षा संबंधी नीतियां बदलती हैं तो उसका प्रभाव केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा समाज उससे प्रभावित होता है। फिल्म में विरोध-प्रदर्शन, बहस और वैचारिक संघर्ष के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया कि लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उनका समाधान संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया के भीतर ही तलाशा जाना चाहिए। प्रकाश झा की 'सत्याग्रह' (2013) भले ही सीधे छात्र आंदोलन पर आधारित नहीं है, लेकिन इसमें युवा शक्ति की सक्रिय भागीदारी महत्वपूर्ण है। यह फिल्म भ्रष्टाचार के खिलाफ जन आंदोलन की पृष्ठभूमि में बनी थी। अमिताभ बच्चन का किरदार उस नैतिक शक्ति का प्रतीक है, जिसके साथ बड़ी संख्या में युवा जुड़ते हैं। फिल्म यह बताती है कि आधुनिक दौर में मीडिया, सोशल मीडिया और युवाओं की भागीदारी किसी भी जन आंदोलन को राष्ट्रीय स्वरूप दे सकती है। हालांकि फिल्म पर कुछ लोगों ने समकालीन आंदोलनों से अत्यधिक प्रेरित होने का आरोप लगाया, फिर भी इसने लोकतांत्रिक विरोध की शक्ति को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।
   'हुड़दंग' (2022) मंडल आयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि पर बनी उन गिनी-चुनी फिल्मों में शामिल है, जिन्होंने 1990 के दशक के छात्र आंदोलनों को सिनेमाई रूप दिया। मंडल आयोग के फैसले ने भारतीय राजनीति और समाज दोनों को गहराई से प्रभावित किया था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों के माध्यम से फिल्म यह दिखाती है कि सरकारी नीतियों का असर केवल राजनीतिक विमर्श तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह युवाओं के सपनों, रिश्तों और भविष्य को भी प्रभावित करता है। फिल्म आंदोलन के मानवीय पक्ष को भी सामने लाती है। टीनू आनंद की 'मैं आज़ाद हूँ' (1989) विरोध की सामूहिक शक्ति को समझने के लिए आज भी प्रासंगिक फिल्म है। अमिताभ बच्चन द्वारा निभाया गया 'आजाद' का किरदार एक ऐसे आम नागरिक का प्रतीक बन जाता है, जिसकी ईमानदारी और साहस लाखों लोगों को अन्याय के खिलाफ खड़ा होने की प्रेरणा देता है। फिल्म का चरम दृश्य यह संदेश देता है कि किसी भी लोकतंत्र में जनता की सबसे बड़ी ताकत उसकी एकजुटता होती है।
    इन फिल्मों के अतिरिक्त कुछ अन्य फ़िल्में भी हैं, जिन्होंने प्रतिरोध और सामाजिक परिवर्तन की भावना को अलग-अलग रूपों में व्यक्त करती हैं। 'स्वदेस' व्यवस्था को बदलने के लिए सकारात्मक भागीदारी का रास्ता सुझाती है। 'रॉकेट सिंह: सेल्समैन ऑफ द ईयर' कॉरपोरेट जगत में नैतिक प्रतिरोध का उदाहरण पेश करती है। 'शंघाई' राजनीतिक साजिशों और जन आंदोलनों के बीच सत्ता की जटिलताओं को उजागर करती है। 'भीड़' सामाजिक संकट के दौरान नागरिक अधिकारों, प्रशासनिक संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल उठाती है। ये फिल्में भले ही छात्र राजनीति पर केंद्रित न हों, लेकिन व्यवस्था से संवाद और प्रतिरोध की संस्कृति को विस्तार देती हैं। हिंदी सिनेमा में छात्र आंदोलनों का चित्रण समय के साथ स्पष्ट रूप से बदला है। सत्तर और अस्सी के दशक में विरोध का स्वर मुख्यतः वैचारिक और सामाजिक असमानता के खिलाफ था। दो हजार के बाद की फिल्मों में भ्रष्टाचार, शिक्षा व्यवस्था, लोकतांत्रिक जवाबदेही, पहचान की राजनीति, आरक्षण, बेरोजगारी और संस्थागत संकट जैसे मुद्दे प्रमुख हो गए। नई पीढ़ी के फिल्मकारों ने आंदोलन को केवल भावनात्मक घटना नहीं माना, बल्कि उसके सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक आयामों को भी समझने का प्रयास किया।
   अधिकांश सफल फिल्में आंदोलन को किसी एक विचारधारा की विजय के रूप में प्रस्तुत नहीं करतीं। वे यह स्वीकार करती हैं कि हर आंदोलन के भीतर आदर्शवाद और अवसरवाद, दोनों मौजूद होते हैं। कहीं नेतृत्व ईमानदार होता है तो कहीं सत्ता की महत्वाकांक्षा उसे कमजोर कर देती है। यही संतुलित दृष्टि इन फिल्मों को विश्वसनीय बनाती है। वे दर्शकों को यह नहीं बतातीं कि किसका समर्थन किया जाए, बल्कि यह सोचने के लिए प्रेरित करती हैं कि लोकतंत्र में विरोध की मर्यादा, उद्देश्य और जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए। आज जब देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में समय-समय पर शिक्षा, रोजगार, फीस, आरक्षण, प्रशासनिक नीतियों और सामाजिक मुद्दों को लेकर छात्र आंदोलन सामने आते हैं, तब इन फिल्मों की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। वे याद दिलाती हैं कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि जागरूक नागरिकों, सक्रिय युवाओं और जिम्मेदार संस्थाओं से मजबूत होता है। विरोध की आवाज तभी सार्थक होती है जब उसके पीछे सामाजिक सरोकार, नैतिक स्पष्टता और परिवर्तन की सकारात्मक दृष्टि हो।
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Monday, July 13, 2026

सतलुज : वैचारिक आजादी और सिनेमा पर लटकी तलवार

     दशकों से देखा जा रहा है कि कला और समाज का संबंध हमेशा पूरक और द्वंद्वात्मक रहा। भारतीय सिनेमा ने अपनी स्थापना से ही समाज की धड़कनों को परदे पर उतारने का प्रयास किया, लेकिन जब भी इस माध्यम ने व्यवस्था, सत्ता या स्थापित सामाजिक विमर्शों के कड़वे सच को उजागर करने की हिम्मत दिखाई, तब-तब उसे राज्य और रूढ़िवादी ताकतों के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। हाल ही में अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' को लेकर उपजा विवाद इसी वैचारिक टकराव की एक नई और चिंताजनक कड़ी है। सिनेमाघरों में प्रतिबंधित होने के बाद जब इस फिल्म को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जगह मिली, तो वहां भी सरकारी हस्तक्षेप के कारण इसे हटा दिया गया। यह घटना स्पष्ट करती है, कि तकनीकी प्रगति और डिजिटल युग के दावों के बावजूद कलात्मक अभिव्यक्ति के दायरे निरंतर संकुचित हो रहे हैं। यह कोई अकेला मामला नहीं, बल्कि सिनेमा के इतिहास के उस लंबे सिलसिले का हिस्सा है, जहां राज्य की संप्रभुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच की रेखाएं धुंधली होती दिखती हैं।
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● हेमंत पाल

    फिल्म 'सतलुज' का विवाद डिजिटल स्वतंत्रता के भ्रम पर उंगली उठा रहा है। मूल रूप से 'पंजाब '95' नाम से निर्मित और हनी त्रेहान द्वारा निर्देशित यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन और पंजाब के एक बेहद संवेदनशील दौर पर आधारित है। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर ने इस फिल्म को लेकर कड़ा रुख अपनाया और निर्माताओं को लगभग 127 कट लगाने का निर्देश दिया। लंबे कानूनी और प्रशासनिक संघर्ष के बाद, फिल्म को 'सतलुज' नाम से एक ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज तो किया गया, लेकिन सुरक्षा कारणों और राष्ट्रीय संप्रभुता का हवाला देकर इसे डिजिटल स्पेस से भी हटा दिया गया। यह घटनाक्रम इस धारणा को खंडित करता है, कि ओटीटी प्लेटफॉर्म गंभीर और यथार्थवादी सिनेमा के लिए एक स्वतंत्र खिड़की साबित होंगे। अब तक डिजिटल माध्यमों को सिनेमाघरों की तुलना में अधिक उदार और सेंसरशिप से मुक्त माना जाता था, लेकिन सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में हाल के संशोधनों ने सरकार को यह असीमित शक्ति दे दी है कि वह 'सार्वजनिक व्यवस्था' या 'शांति भंग' की आशंका के आधार पर किसी भी डिजिटल सामग्री को प्रतिबंधित कर सके। यह स्थिति कला के क्षेत्र में एक प्रकार का 'चिलिंग इफेक्ट' पैदा करती है, जहां फिल्म निर्माता वित्तीय और कानूनी जोखिमों से बचने के लिए स्वयं ही अपनी रचनात्मकता को सीमित करने लगते हैं।
    भारतीय सिनेमा के इतिहास के पन्ने पलटने पर ऐसे कई प्रसंग मिलते हैं, जहां सेंसर बोर्ड से 'हरी झंडी' मिलने के बावजूद फिल्मों को थियेटर तक पहुंचने से रोका गया। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि सेंसरशिप केवल एक संस्थागत प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक दबावों से संचालित होती है। वर्ष 1993 के मुंबई बम धमाकों पर आधारित अनुराग कश्यप की फिल्म 'ब्लैक फ्राइडे' को सेंसर बोर्ड ने अनुमति दे दी थी, परंतु एक याचिका पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसके प्रदर्शन पर तब तक के लिए रोक लगा दी, जब तक कि अदालती कार्यवाही पूरी नहीं हो गई। तर्क था कि फिल्म वास्तविक गवाहों और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। इसी प्रकार, दीपा मेहता की फिल्म 'वाटर' जो वाराणसी की विधवाओं की दयनीय स्थिति का कथानक था, उसे देश में शूट नहीं करने दिया गया। भारी विरोध प्रदर्शनों, सेटों की तोड़फोड़ और संस्कृति विरोधी होने के आरोपों के कारण उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की दुहाई देकर इसकी शूटिंग रोक दी। इस वजह से फिल्म को श्रीलंका में फिल्माया गया। आनंद पटवर्धन की डॉक्यूमेंट्री फिल्मों, विशेषकर 'राम के नाम' और 'फादर, सन एंड होली वॉर' के साथ तो यह संघर्ष दशकों लंबा चला। सेंसर बोर्ड की बाधाओं को पार करने के बाद भी दूरदर्शन जैसे सार्वजनिक प्रसारकों पर इनके प्रदर्शन को रोकने की हर संभव कोशिश की गई। हालांकि, इन मामलों में न्यायपालिका ने हमेशा अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में निर्णय देकर कला का मार्ग प्रशस्त किया।
     राजनीतिक नफा-नुकसान के लिए फिल्मों को बलि का बकरा बनाने के प्रसंगों में प्रकाश झा की 'आरक्षण' और मधुर भंडारकर की 'इंदु सरकार' भी शामिल है। 'आरक्षण' को जातिगत तनाव की आशंका के चलते कुछ राज्यों में प्रतिबंधित किया गया, जबकि 'इंदु सरकार' को 1975 के आपातकाल की पृष्ठभूमि के कारण भारी राजनीतिक विरोध और प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा। संजय लीला भंसाली की 'पद्मावत' का विवाद राज्य सरकारों की लाचारी या राजनीतिक अवसरवादिता का सबसे उग्र उदाहरण रहा है। सेंसर बोर्ड के कहने पर फिल्म का नाम बदलने और कई संशोधनों के बाद 'यू/ए' सर्टिफिकेट दिया, इसके बावजूद, कुछ संगठनों के हिंसक विरोध के आगे झुकते हुए राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया था। अंततः सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करते हुए यह स्पष्ट करना पड़ा कि एक बार जब वैधानिक संस्था फिल्म को पास कर देती है, तो कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है, न कि फिल्म को प्रतिबंधित करना।
   बीते दशकों की तुलना में वर्तमान में सेंसरशिप का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। पहले जहां सेंसरशिप केवल 'केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड' (सेंसर) की कैंची तक सीमित थी, वहीं अब एक अधिक खतरनाक 'समानांतर सेंसरशिप' का उदय हो गया। यह समानांतर व्यवस्था राजनीतिक दलों, धार्मिक संगठनों, वैचारिक समूहों और सोशल मीडिया की ट्रोल आर्मी के गठजोड़ से संचालित होती है। जैसे ही कोई फिल्म किसी संवेदनशील या लीक से हटकर मुद्दे को छूती है, ये समूह सड़कों पर हिंसा और डिजिटल स्पेस में 'बॉयकॉट' का अभियान शुरू कर देते हैं।
   राज्य सरकारें अक्सर कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अपनी विफलता को छुपाने के लिए या बहुसंख्यक भावनाओं को तुष्ट करने के लिए शॉर्टकट रास्ता चुनती हैं और फिल्मों के प्रदर्शन पर रोक लगा देती हैं। इस अनिश्चितता के माहौल में सिनेमाघर और मल्टीप्लेक्स मालिक भारी वित्तीय नुकसान के डर से स्वयं ही कदम पीछे खींच लेते हैं। यह प्रवृत्ति सेंसर बोर्ड जैसी वैधानिक संस्था की प्रासंगिकता और स्वायत्तता पर गंभीर सवालिया निशान लगाती है। यदि बोर्ड द्वारा प्रमाणित फिल्म भी देश में सुरक्षित रूप से प्रदर्शित नहीं हो सकती, तो ऐसी नियामक संस्था के होने का तार्किक औचित्य समाप्त हो जाता है।
     सिनेमाई पाबंदियों के इस विमर्श में कुछ अन्य महत्वपूर्ण प्रसंगों को जोड़ना प्रासंगिक होगा, जो यह दर्शाते हैं कि सत्ता चाहे किसी भी दल की हो, वह अपनी आलोचना के प्रति असहिष्णु रही है। वर्ष 1975 के आपातकाल के दौरान अमृत नाहटा की व्यंग्यात्मक फिल्म 'किस्सा कुर्सी का' का पूरा प्रिंट ही नष्ट कर दिया गया था। क्योंकि, वह तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व पर सीधा प्रहार करती थी। इसी तरह गुलज़ार की 'आंधी' को भी इंदिरा गांधी के जीवन से समानताएं दिखाने के भ्रम के कारण प्रतिबंधित कर दिया गया था। सेंसरशिप की यह राजनीति केवल राष्ट्रीय स्तर तक सीमित नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर भी उतनी ही प्रभावी है। तमिल फिल्म 'दशावतारम' या कमल हासन की 'विश्वरूपम' को लेकर हुआ विवाद इसका सटीक उदाहरण है, जहां धार्मिक भावनाओं के आहत होने के आधार पर राज्य सरकार ने फिल्म के प्रदर्शन को अधर में लटका दिया था। विवेक अग्निहोत्री की 'द कश्मीर फाइल्स' और सुदीप्तो सेन की 'द केरला स्टोरी' जैसी फिल्मों को जहां कुछ राज्यों में कर-मुक्त किया गया, वहीं कुछ अन्य राज्यों में इन पर अघोषित प्रतिबंध लगाने की कोशिश की गई। यह विरोधाभास साबित करता है कि सिनेमा अब केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण का एक प्रमुख हथियार और शिकार दोनों बन गया।
    'सतलुज' जैसी फिल्मों का डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटाया जाना इस बात का संकेत है कि अब कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए कोई सुरक्षित गलियारा नहीं बचा। राज्य का यह तर्क कि देश की एकता, अखंडता और सार्वजनिक शांति किसी भी रचनात्मक आजादी से ऊपर है, सिद्धांत रूप में सही हो सकता है। परंतु, इस तर्क की आड़ में असहमति की आवाजों को दबाना या इतिहास के कड़वे और असुविधाजनक पन्नों को पूरी तरह से फाड़ देना किसी भी जीवंत लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। सिनेमा केवल मनोरंजन या व्यावसायिक लाभ का जरिया नहीं है, बल्कि यह समाज के दबे हुए दर्द, ऐतिहासिक भूलों और मानवीय त्रासदियों को दर्ज करने का एक जीवंत दस्तावेज है। यदि किसी लोकतांत्रिक समाज या सरकार को किसी फिल्म के दृष्टिकोण से गंभीर आपत्ति है, तो उसका प्रतिकार करने का सही तरीका वैचारिक बहस, समीक्षाएं और स्वस्थ विमर्श होना चाहिए, न कि राज्य की दमनकारी शक्ति का उपयोग करके उस पर ताला लगा देना।
     इतिहास इस बात का गवाह है कि कला पर थोपे गए प्रतिबंध कभी भी स्थायी नहीं रहे हैं। जो फिल्में अपने समय में प्रतिबंधित या प्रताड़ित की गई, वे कालांतर में सिनेमा की कालजयी कृतियां बनीं और दर्शकों तक पहुंचीं। आज के सूचना और संचार क्रांति के युग में, जहां तकनीक ने दुनिया को एक वैश्विक गांव में बदल दिया है, किसी भी विचार या कलाकृति को पूरी तरह से दबाना व्यावहारिक रूप से असंभव है। सरकारें फिल्मों पर तात्कालिक प्रतिबंध लगाकर राजनीतिक विवादों को कुछ समय के लिए भले ही टाल दें, लेकिन वे उस बुनियादी सवाल को नहीं टाल सकतीं जो कला की आजादी और लोकतंत्र की सेहत से जुड़ा है। एक परिपक्व और सुदृढ़ लोकतंत्र की वास्तविक पहचान इसमें है कि वह असुविधाजनक सच का सामना करने और उस पर खुले दिमाग से संवाद करने का साहस दिखाएं, न कि सच दिखाने वाले परदे को ही गिरा दे।
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प्राण से बॉबी देओल तक : परदे पर छवि बदलकर अमर हुए सितारे

   सिनेमा में किसी कलाकार की पहचान केवल उसके चेहरे या स्टारडम से नहीं, बल्कि उसकी अभिनय क्षमता से बनती है। कई अभिनेता ऐसे रहे हैं, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक खास छवि के साथ की, लेकिन समय आने पर उसी छवि को तोड़कर नया इतिहास रच दिया। कोई रोमांटिक हीरो से खलनायक बना तो किसी ने खलनायक की छवि छोड़कर नायक या चरित्र अभिनेता के रूप में नई पहचान बनाई। आज इस परंपरा का सबसे चर्चित उदाहरण बॉबी देओल हैं, जिन्होंने अपने करियर की दूसरी पारी में ऐसी दमदार खलनायकी पेश की कि उनकी नई पहचान पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली बन गई।
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- हेमंत पाल

     हिंदी सिनेमा का इतिहास बताता है कि लंबे समय तक वही कलाकार याद रखे जाते हैं जो अपनी स्थापित छवि से बाहर निकलने का साहस करते हैं। एक ही तरह की भूमिकाओं में बंधा कलाकार धीरे-धीरे टाइप्ड हो जाता है। जबकि, नए किरदार उसे नई ऊंचाइयों तक ले जाते हैं। बदलते समय के साथ दर्शकों की पसंद भी बदली है और अब वे केवल आदर्श नायक नहीं, बल्कि जटिल, ग्रे-शेड वाले किरदारों को भी उतनी ही गंभीरता से स्वीकार करते हैं। बॉबी देओल का सफर इसी बदलाव की सबसे ताजा मिसाल है। वर्ष 1995 में फिल्म 'बरसात' से बॉलीवुड में कदम रखने वाले बॉबी अपनी नीली आंखों, घुंघराले बालों और मासूम मुस्कान के कारण जल्द ही युवाओं के पसंदीदा रोमांटिक हीरो बन गए। गुप्त, सोल्जर, बादल और 'बिच्छू' जैसी फिल्मों ने उन्हें एक सफल एक्शन और रोमांटिक स्टार के रूप में स्थापित किया। उनके हेयर स्टाइल और स्टाइल स्टेटमेंट युवाओं के बीच ट्रेंड बन गए। लेकिन, समय के साथ फिल्मों का मिजाज बदला और बॉबी देओल का करियर धीमा पड़ने लगा। कई वर्षों तक उन्हें वैसी सफलता नहीं मिली, जिसकी उम्मीद की जाती थी।
    आमतौर पर फिल्म उद्योग में ऐसा दौर किसी भी अभिनेता के करियर का अंत मानता है। लेकिन, बॉबी देओल ने इसे नई शुरुआत बना दिया। उन्होंने अपनी पूरी स्क्रीन इमेज बदलने का जोखिम उठाया। साल 2018 में 'रेस-3' से उनकी वापसी हुई, जहां पहली बार उन्होंने नकारात्मक छवि की झलक दिखाई। इसके बाद ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई प्रकाश झा की वेब सीरीज 'आश्रम' में बाबा निराला का किरदार उनके करियर का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। लालच, सत्ता, छल और क्रूरता से भरे इस चरित्र को उन्होंने इतनी सहजता से निभाया कि दर्शकों ने पहली बार उनके अभिनय का बिल्कुल अलग रूप देखा। शांत चेहरा, संयमित संवाद और आंखों के भावों से भय पैदा करने की उनकी क्षमता ने उन्हें नई पहचान दिलाई। 
     इसके बाद फिल्म 'एनिमल' में अबरार हक का किरदार उनके अभिनय जीवन का सबसे बड़ा पड़ाव बन गया। इस भूमिका में उनके संवाद बेहद कम थे, लेकिन उनकी मौजूदगी ही दर्शकों के लिए रोमांच और खौफ का कारण बन गई। बिना बोले केवल हावभाव और शारीरिक भाषा के सहारे उन्होंने ऐसा खलनायक रचा जिसकी चर्चा फिल्म के नायक के बराबर हुई। यही किसी अभिनेता की सबसे बड़ी सफलता मानी जाती है कि उसका नकारात्मक किरदार पूरी फिल्म की सबसे यादगार पहचान बन जाए। 'अल्फा' में भी उनका खतरनाक अंदाज यह साबित करता है कि बॉबी देओल ने अपनी दूसरी पारी को पूरी तरह अपने नाम कर लिया। अब इंतजार है रितिक रोशन के साथ आने वाली उनकी फिल्म 'बंदर' और वेब सीरीज 'आश्रम-4' का जिसमें बॉबी का नया चेहरा नजर आएगा।     
    बॉबी देओल इस परंपरा के पहले कलाकार नहीं हैं। हिंदी सिनेमा में कई ऐसे सितारे हुए जिन्होंने अपनी छवि बदलकर नई लोकप्रियता हासिल की। छवि बदलने की बात हो तो सबसे पहला नाम प्राण का आता है। एक समय ऐसा था जब परदे पर उनके आते ही दर्शकों के मन में नफरत पैदा हो जाती थी। उनकी खलनायकी इतनी प्रभावशाली थी कि लोग अपने बच्चों का नाम तक प्राण रखने से कतराते थे। लेकिन 'उपकार' में मलंग चाचा के सकारात्मक किरदार ने उनकी पूरी छवि बदल दी। इसके बाद वे चरित्र अभिनेता के रूप में उतने ही लोकप्रिय हुए जितने पहले खलनायक के रूप में थे। शत्रुघ्न सिन्हा ने भी अपने करियर की शुरुआत नकारात्मक भूमिकाओं से की थी। उनकी दमदार आवाज और प्रभावशाली व्यक्तित्व ने उन्हें अलग पहचान दिलाई, लेकिन बाद में वे सफल नायक बने और दर्शकों ने उन्हें दोनों रूपों में भरपूर प्यार दिया। इसी तरह विनोद खन्ना ने शुरुआती दौर में कई फिल्मों में विलेन की भूमिका निभाई, लेकिन बाद में वे हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय नायकों में शामिल हो गए और अमिताभ बच्चन के समानांतर खड़े नजर आए।
    शाहरुख खान की सफलता की कहानी भी इसी बदलाव का उदाहरण है। आज वे रोमांस के बादशाह माने जाते हैं, लेकिन उनके करियर की शुरुआती पहचान बाजीगर, डर और 'अंजाम' जैसे नकारात्मक किरदारों से बनी थी। उस दौर में जब बड़े अभिनेता खलनायक बनने से बचते थे, शाहरुख ने यह जोखिम उठाया और दर्शकों ने उन्हें हाथों-हाथ लिया। बाद में वही अभिनेता रोमांटिक हीरो के रूप में इतिहास रच गया। सैफ अली खान ने भी अपने करियर के शुरुआती वर्षों में रोमांटिक और हल्के-फुल्के किरदार निभाए। लेकिन, विशाल भारद्वाज की 'ओमकारा' में लंगड़ा त्यागी का किरदार उनके अभिनय जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। चालाक, ईर्ष्यालु और क्रूर चरित्र को उन्होंने जिस गहराई से निभाया, उसने उन्हें गंभीर अभिनेता के रूप में स्थापित कर दिया। संजय दत्त भी लंबे समय तक रोमांटिक और एक्शन स्टार रहे, लेकिन 'अग्निपथ' में कांचा चीना के रूप में उनका भयावह अवतार दर्शकों के लिए बिल्कुल नया था। गंजा सिर, भारी शरीर और डर पैदा करने वाली मुस्कान ने इस किरदार को यादगार बना दिया। बाद में 'केजीएफ चैप्टर-2' में अधीरा के रूप में उन्होंने एक बार फिर साबित किया कि खलनायक की भूमिका भी किसी नायक जितनी प्रभावशाली हो सकती है। खास बात यह कि संजय दत्त की एक फिल्म का नाम ही 'खलनायक' था, जिसमें उनका किरदार नायक का था।  

    अमजद खान का उदाहरण थोड़ा अलग है। 'शोले' में गब्बर सिंह का किरदार उन्हें हमेशा के लिए अमर बना गया। बाद में उन्होंने कई सकारात्मक और हास्य भूमिकाएं निभाईं, लेकिन दर्शकों के मन में उनकी खलनायक वाली छवि इतनी मजबूत रही कि उससे पूरी तरह बाहर निकलना संभव नहीं हो पाया। यह इस बात का भी प्रमाण है कि कभी-कभी एक किरदार अभिनेता की पूरी पहचान बन जाता है। हाल के वर्षों में अजय देवगन, रणदीप हुड्डा, नवाजुद्दीन सिद्दीकी और विजय सेतुपति जैसे कलाकारों ने भी नायक और खलनायक की सीमाओं को लगभग समाप्त कर दिया है। आज दर्शक यह नहीं देखते कि कलाकार हीरो है या विलेन, बल्कि यह देखते हैं कि उसने अपने किरदार को कितनी ईमानदारी और प्रभावशाली ढंग से निभाया है। दरअसल, बदलते सिनेमा के साथ खलनायक की परिभाषा भी बदली है। पहले फिल्मों में नायक पूरी तरह आदर्श और खलनायक पूरी तरह दुष्ट होता था, लेकिन आज के दौर में अधिकांश किरदार ग्रे शेड लिए होते हैं। ऐसे किरदार कलाकारों को अभिनय की अधिक स्वतंत्रता देते हैं। खलनायक बनने पर किसी अभिनेता पर आदर्श दिखने या नैतिकता निभाने का दबाव नहीं होता। वह अपने अभिनय के हर रंग को खुलकर सामने ला सकता है।
    बॉबी देओल स्वयं स्वीकार कर चुके हैं कि नकारात्मक भूमिकाओं ने उन्हें वह रचनात्मक स्वतंत्रता दी जो उन्हें अपने तीन दशक लंबे करियर में पहले कभी नहीं मिली। शायद यही वजह है कि आज बड़े सितारे भी खलनायक बनने से नहीं हिचकते। अब दर्शक भी हीरो और विलेन के पारंपरिक खांचों से आगे बढ़ चुके हैं। बॉबी देओल का 'बरसात' के मासूम प्रेमी से लेकर 'एनिमल' और 'अल्फा' के खतरनाक खलनायक तक का सफर इस बात का प्रमाण है कि सच्चा कलाकार वही है जो समय के साथ खुद को बदल सके और हर नए किरदार में दर्शकों को चौंका दे। हिंदी सिनेमा की यही परंपरा उसे जीवंत और समृद्ध बनाती है। अंततः जीत नायक या खलनायक की नहीं, बल्कि बेहतरीन अभिनय और यादगार किरदारों की होती है।
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