मानव सभ्यता का पूरा इतिहास 'जिजीविषा' यानी जीने की उत्कट इच्छा पर टिका है। उपनिषदों के 'अमृतत्व' से लेकर आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की संजीवनी तक, हर प्रयास मृत्यु को परे धकेलने और जीवन को विस्तार देने का रहा है। ऐसे में 'इच्छा मृत्यु' जैसा शब्द गढ़ना न केवल भाषाई विसंगति लगता है, बल्कि एक गहरा दार्शनिक विरोधाभास भी। क्या 'इच्छा' जो सदैव सृजन, सुख और भविष्य की ओर देखती है कभी अपने ही अस्तित्व के पूर्ण विसर्जन यानी 'मृत्यु' का वरण कर सकती है! हाल ही में हरीश राणा के मामले ने इस विमर्श को एक मर्मभेदी मोड़ दे दिया है। 13 वर्षों तक चेतना के शून्य गलियारों में भटके एक शरीर के लिए जब 'इच्छा मृत्यु' की मांग की जाती है, तो सवाल उठता है कि यह इच्छा वास्तव में किसकी है! क्या यह उस निस्तेज पड़े व्यक्ति का चुनाव है या उसे तिल-तिल मरते देख हार चुके परिजनों की करुण पुकार!
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- हेमंत पाल
- हेमंत पाल
भाषा की कोख से जब शब्दों का जन्म होता है, तो उनके पीछे एक सुस्पष्ट सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और तार्किक आधार होता है, लेकिन 'इच्छा मृत्यु' एक ऐसा शब्द-युग्म है जो व्याकरण और दर्शन दोनों के धरातल पर एक गहरी फांस की तरह चुभता है। पहली नजर में यह शब्द एक सुंदर विरोधाभास लग सकता है, लेकिन जब हम इसकी गहराई में उतरते हैं, तो यह मानवीय अस्तित्व के सबसे क्रूर और लाचार पक्ष को उजागर करता है। जीवन का मूल स्वभाव 'इच्छा' है। जीने की इच्छा, विस्तार की इच्छा, भोग की इच्छा और आरोग्यता की इच्छा। वहीं 'मृत्यु' जीवन के उस समस्त व्यापार का पूर्णविराम है, जहां इच्छाओं का विसर्जन हो जाता है। ऐसे में इन दो ध्रुवों को जोड़कर एक नया शब्द 'इच्छा मृत्यु' गढ़ना स्वयं में एक पहेली है। क्या वास्तव में मृत्यु कभी किसी की मौलिक 'इच्छा' हो सकती है या फिर यह शब्द उन परिस्थितियों को ढकने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक रेशमी आवरण है, जहाँ मनुष्य का संघर्ष उसके साहस से बड़ा हो जाता है! हरीश राणा का हाल का संदर्भ इस विमर्श को किताबी पन्नों से निकालकर अस्पताल के उन ठंडे कमरों और अदालत के गलियारों में ले आता है, जहाँ जीवन और मौत के बीच का अंतर केवल एक मशीन की घूंघट भर रह जाता है।
सृष्टि का हर जीव अपनी अंतिम सांस तक मृत्यु को टालने का प्रयास करता है। एक नन्हा सा कीड़ा भी पैर की आहट पाकर अपनी दिशा बदल लेता है, क्योंकि उसके भीतर का जीवन 'मृत्यु' से भयभीत है। ऐसे में मनुष्य, जो चेतना के उच्चतम शिखर पर है, मृत्यु की मांग कैसे कर सकता है! यहां 'इच्छा' शब्द की सार्थकता डगमगाने लगती है। दार्शनिक दृष्टिकोण से देखें तो इच्छा हमेशा 'प्राप्ति' के लिए होती है, 'समाप्ति' के लिए नहीं। जब हम कहते हैं कि कोई व्यक्ति इच्छा मृत्यु चाहता है, तो असल में वह मृत्यु नहीं चाहता, बल्कि वह उस 'असहनीय पीड़ा' या 'अस्तित्वहीन जीवन' का अंत चाहता है, जिसे ढोते हुए उसकी देह थक चुकी है। यहां 'इच्छा' शब्द एक भ्रम है; यह चुनाव की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि विकल्पों का अभाव है। जब चिकित्सा विज्ञान की मशीनें किसी को केवल इसलिए जीवित रखती हैं क्योंकि उनके पास मृत्यु का बटन दबाने का कानूनी अधिकार नहीं है। तब वह व्यक्ति जीवित नहीं होता, बल्कि वह तकनीक और नैतिकता के बीच फंसा एक बंधक होता है। हरीश राणा के मामले में, जो 13 वर्षों से चेतना के शून्य में पड़े थे, 'इच्छा' शब्द का प्रयोग करना भाषाई तौर पर भी एक विडंबना है। जो व्यक्ति स्वयं को व्यक्त नहीं कर सकता, जिसकी अपनी कोई वर्तमान इच्छा निर्मित ही नहीं हो सकती, उसके लिए 'इच्छा मृत्यु' शब्द का प्रयोग करना असल में समाज और कानून का अपना बोझ हल्का करने जैसा है।
यहां यह सवाल उठना लाजमी है, कि क्या इच्छा मृत्यु का विकल्प चुनने वाला व्यक्ति वास्तव में अपनी स्वतंत्र इच्छा का उपयोग कर रहा है या वह किसी अदृश्य मजबूरी के दबाव में है! मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसकी इच्छाएं उसके परिवेश, अपनों के प्यार और उसके आत्मसम्मान से प्रभावित होती हैं। कई बार गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति इसलिए मृत्यु की मांग करता है, क्योंकि उसे लगता है कि वह अपने परिवार पर आर्थिक और मानसिक बोझ बन गया है। वह अपने प्रियजनों की आंखों में अपने प्रति करुणा के बजाय थकान और मजबूरी देखने लगता है। क्या इस स्थिति में ली गई मृत्यु को 'इच्छा मृत्यु' कहना सही होगा! यह तो एक प्रकार का 'त्याग' है या फिर परिस्थितियों द्वारा किया गया 'भावनात्मक निष्कासन।' यदि समाज और परिवार के पास पर्याप्त संसाधन और असीम धैर्य हो, तो शायद वही व्यक्ति कुछ और समय जीने की इच्छा रख सकता है। इसके साथ ही, अवसाद या डिप्रेशन की स्थिति में लिया गया, ऐसा निर्णय 'इच्छा' नहीं बल्कि मन की एक बीमारी का लक्षण होता है। डिप्रेशन में व्यक्ति को भविष्य केवल अंधकारमय दिखाई देता है और उसे लगता है कि मौत ही एकमात्र समाधान है। यदि कानून ऐसी स्थिति को 'इच्छा मृत्यु' का नाम देकर वैधता प्रदान करता है, तो हम एक ऐसी सभ्यता की ओर बढ़ रहे होंगे जो समाधान के बजाय पलायन को मान्यता देती है।
यहां यह सवाल उठना लाजमी है, कि क्या इच्छा मृत्यु का विकल्प चुनने वाला व्यक्ति वास्तव में अपनी स्वतंत्र इच्छा का उपयोग कर रहा है या वह किसी अदृश्य मजबूरी के दबाव में है! मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसकी इच्छाएं उसके परिवेश, अपनों के प्यार और उसके आत्मसम्मान से प्रभावित होती हैं। कई बार गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति इसलिए मृत्यु की मांग करता है, क्योंकि उसे लगता है कि वह अपने परिवार पर आर्थिक और मानसिक बोझ बन गया है। वह अपने प्रियजनों की आंखों में अपने प्रति करुणा के बजाय थकान और मजबूरी देखने लगता है। क्या इस स्थिति में ली गई मृत्यु को 'इच्छा मृत्यु' कहना सही होगा! यह तो एक प्रकार का 'त्याग' है या फिर परिस्थितियों द्वारा किया गया 'भावनात्मक निष्कासन।' यदि समाज और परिवार के पास पर्याप्त संसाधन और असीम धैर्य हो, तो शायद वही व्यक्ति कुछ और समय जीने की इच्छा रख सकता है। इसके साथ ही, अवसाद या डिप्रेशन की स्थिति में लिया गया, ऐसा निर्णय 'इच्छा' नहीं बल्कि मन की एक बीमारी का लक्षण होता है। डिप्रेशन में व्यक्ति को भविष्य केवल अंधकारमय दिखाई देता है और उसे लगता है कि मौत ही एकमात्र समाधान है। यदि कानून ऐसी स्थिति को 'इच्छा मृत्यु' का नाम देकर वैधता प्रदान करता है, तो हम एक ऐसी सभ्यता की ओर बढ़ रहे होंगे जो समाधान के बजाय पलायन को मान्यता देती है।
शब्दों का प्रभाव हमारे चिंतन पर पड़ता है। 'इच्छा मृत्यु' जैसे शब्दों को गढ़कर हमने एक ऐसी व्यवस्था बना ली, जहां हम 'मजबूरी' को 'मर्जी' का नाम देने लगे हैं। अन्य भाषाओं में प्रयुक्त शब्द 'यूथेनेशिया' का मूल अर्थ 'सुखद मृत्यु' है, लेकिन मौत कभी सुखद नहीं होती, वह केवल शांत हो सकती है। जब हम किसी के लिए मौत की मांग करते हैं, चाहे वह हरीश राणा जैसा मरीज हो या कोई और, तो हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि यह हमारी सामूहिक विवशता है। 13 साल तक किसी को कोमा में देखना उसके परिवार के लिए एक ऐसा अंतहीन शोक है जिसकी कोई दवा नहीं है। वे लोग उसे नीम बेहोशी से जगाते-जगाते थक चुके थे। उनकी मांग हरीश की इच्छा नहीं थी, बल्कि उनकी अपनी उस पीड़ा का अंत थी, जो वे हरीश के निस्तेज शरीर को देखकर हर दिन भोग रहे थे। यह करुणा है, यह सहानुभूति है, लेकिन यह 'इच्छा' नहीं है। समाज ने 'इच्छा मृत्यु' शब्द शायद इसलिए भी स्वीकार कर लिया, क्योंकि यह हमें उस अपराध बोध से बचाता है, कि हमने किसी की जान ले ली। यह हमें यह भरोसा दिलाता है कि सामने वाले ने खुद ही तो यह मांगा था। लेकिन, यह एक गहरा छलावा है। मृत्यु कभी किसी की बुनियादी मांग नहीं हो सकती, यदि उसके पास सम्मानजनक और पीड़ा रहित जीवन का एक भी कतरा बचा हो।
निरपेक्ष भाव से विश्लेषण करें तो 'इच्छा मृत्यु' शब्द अपनी सार्थकता साबित करने में विफल रहता है। इच्छा का अर्थ होता है सृजन की ओर बढ़ना, जबकि मृत्यु पूर्ण विसर्जन है। इन दोनों का मेल केवल उसी स्थिति में संभव है जब मनुष्य इस संसार के समस्त बंधनों और कष्टों से ऊपर उठकर महाप्रस्थान की ओर कदम बढ़ाए, जिसे हमारी संस्कृति में 'संथारा' या 'समाधि' कहा गया। लेकिन, आधुनिक संदर्भों में, जहां मशीनों और रसायनों के सहारे मौत को टाला जाता है, वहां यह शब्द एक कानूनी सुविधा मात्र बनकर रह गया है। यह शब्द उस सच को छुपाता है कि चिकित्सा विज्ञान ने जीवन को बचाने की शक्ति तो प्राप्त कर ली, लेकिन वह जीवन की 'गुणवत्ता' को बहाल करने में हमेशा सफल नहीं होता। जब जीवन केवल सांसों की गिनती बनकर रह जाए, जहां कोई संवाद न हो, कोई स्मृति न हो और कोई भविष्य न हो, तो उसे जीवन कहना ही जीवन का अपमान है। ऐसी स्थिति में उस देह को मुक्त करना एक मानवीय कर्तव्य तो हो सकता है, लेकिन उसे उस देह की 'इच्छा' कहना शब्द की गरिमा के साथ खिलवाड़ है।
निरपेक्ष भाव से विश्लेषण करें तो 'इच्छा मृत्यु' शब्द अपनी सार्थकता साबित करने में विफल रहता है। इच्छा का अर्थ होता है सृजन की ओर बढ़ना, जबकि मृत्यु पूर्ण विसर्जन है। इन दोनों का मेल केवल उसी स्थिति में संभव है जब मनुष्य इस संसार के समस्त बंधनों और कष्टों से ऊपर उठकर महाप्रस्थान की ओर कदम बढ़ाए, जिसे हमारी संस्कृति में 'संथारा' या 'समाधि' कहा गया। लेकिन, आधुनिक संदर्भों में, जहां मशीनों और रसायनों के सहारे मौत को टाला जाता है, वहां यह शब्द एक कानूनी सुविधा मात्र बनकर रह गया है। यह शब्द उस सच को छुपाता है कि चिकित्सा विज्ञान ने जीवन को बचाने की शक्ति तो प्राप्त कर ली, लेकिन वह जीवन की 'गुणवत्ता' को बहाल करने में हमेशा सफल नहीं होता। जब जीवन केवल सांसों की गिनती बनकर रह जाए, जहां कोई संवाद न हो, कोई स्मृति न हो और कोई भविष्य न हो, तो उसे जीवन कहना ही जीवन का अपमान है। ऐसी स्थिति में उस देह को मुक्त करना एक मानवीय कर्तव्य तो हो सकता है, लेकिन उसे उस देह की 'इच्छा' कहना शब्द की गरिमा के साथ खिलवाड़ है।
इच्छा मृत्यु के पीछे छिपी मजबूरी को नजरअंदाज करना सबसे बड़ा नैतिक संकट है। हमें यह विचार करना चाहिए कि क्या हमारी व्यवस्था इतनी अक्षम हो गई, कि वह एक तड़पते हुए इंसान को मृत्यु के अलावा और कोई गरिमापूर्ण विकल्प नहीं दे सकती! क्या हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं जहां किसी का अस्तित्व केवल उसकी उपयोगिता पर निर्भर है। यदि कोई व्यक्ति बीमारी के कारण 'अनुपयोगी' हो गया, तो क्या उसकी मृत्यु की मांग को हम तुरंत 'इच्छा' मान लेंगे! यह एक बहुत ही फिसलन भरी ढलान है। हरीश राणा के मामले में कोर्ट की इजाजत एक कानूनी समाधान तो हो सकती है, लेकिन वह उस दार्शनिक सवाल का जवाब नहीं है कि क्या वह व्यक्ति वास्तव में मरना चाहता था। इच्छा की पहली शर्त 'चेतना' है। बिना चेतना के इच्छा का जन्म संभव नहीं है। जहां चेतना ही विलुप्त हो गई हो, वहां मृत्यु को इच्छा का लिबास पहनाना केवल हमारी अपनी बेबसी को एक नाम देना है।
ऐसी स्थिति में 'इच्छा मृत्यु' शब्द को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है। यह शब्द सार्थक तभी हो सकता है जब इसमें 'इच्छा' का अर्थ केवल मरीज की पसंद न होकर, उसके अस्तित्व की गरिमा की रक्षा हो। यदि यह मजबूरी, बोझ, या आर्थिक तंगी से उपजा निर्णय है, तो इसे इच्छा मृत्यु नहीं बल्कि 'सामाजिक विफलता' कहा जाना चाहिए। भाषा को यथार्थ के करीब होना चाहिए, और यथार्थ यह है कि कोई भी मनुष्य मरना नहीं चाहता, वह बस उस असहनीय जीवन को और नहीं ढोना चाहता जो मौत से भी बदतर हो चुका है। हरीश राणा जैसों के लिए यह 'इच्छा मृत्यु' नहीं, बल्कि नियति और विज्ञान के क्रूर चक्रव्यूह से मिली एक 'अनिवार्य मुक्ति' है। हमें इस शब्द के पीछे छिपी सिसकी को पहचानना होगा, न कि केवल इसकी कानूनी सार्थकता पर मुहर लगानी होगी। मौत को 'इच्छा' का नाम देना हमारी सभ्यता का सबसे करुण विरोधाभास है, जिसे हमें निरपेक्ष भाव से स्वीकार करना ही होगा।
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ऐसी स्थिति में 'इच्छा मृत्यु' शब्द को फिर से परिभाषित करने की आवश्यकता है। यह शब्द सार्थक तभी हो सकता है जब इसमें 'इच्छा' का अर्थ केवल मरीज की पसंद न होकर, उसके अस्तित्व की गरिमा की रक्षा हो। यदि यह मजबूरी, बोझ, या आर्थिक तंगी से उपजा निर्णय है, तो इसे इच्छा मृत्यु नहीं बल्कि 'सामाजिक विफलता' कहा जाना चाहिए। भाषा को यथार्थ के करीब होना चाहिए, और यथार्थ यह है कि कोई भी मनुष्य मरना नहीं चाहता, वह बस उस असहनीय जीवन को और नहीं ढोना चाहता जो मौत से भी बदतर हो चुका है। हरीश राणा जैसों के लिए यह 'इच्छा मृत्यु' नहीं, बल्कि नियति और विज्ञान के क्रूर चक्रव्यूह से मिली एक 'अनिवार्य मुक्ति' है। हमें इस शब्द के पीछे छिपी सिसकी को पहचानना होगा, न कि केवल इसकी कानूनी सार्थकता पर मुहर लगानी होगी। मौत को 'इच्छा' का नाम देना हमारी सभ्यता का सबसे करुण विरोधाभास है, जिसे हमें निरपेक्ष भाव से स्वीकार करना ही होगा।
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