Saturday, August 29, 2026

बेमानी बोल, रूहानी धुन और 'अर्थहीन' तुकबंदी

    फिल्म संगीत की दुनिया में गानों को अक्सर उनकी गहरी शायरी, दिल को छू लेने वाली गजलों और संवेदना से भरे अल्फाजों के लिए जाना जाता है। लेकिन, सिनेमा के इस समंदर में एक ऐसा किनारा ऐसा भी है, जहां शब्दों के अर्थ मायने नहीं रखते, बल्कि उनकी लय और रिदम श्रोताओं के सिर चढ़कर बोलती है। लोग सोचते हैं कि गानों के बोल अगर बेतुके या अर्थहीन हों, तो वे जल्दी भूला दिए जाएंगे। लेकिन, फिल्म इंडस्ट्री का इतिहास इस बात का गवाह है, कि जब भी किसी संगीतकार ने गीतों की भाषा के नियमों को किनारे कर केवल 'धुन की चुटकी' ली, तब वे गीत सिर चढ़कर बोले हैं। 'तम्मा तम्मा लोगे' से लेकर 'तूतक तूतक तूतिया' तक और 'ईना मीना डीका' से लेकर आधुनिक दौर के 'ताऊबा ताऊबा' तक, यह सिलसिला संयोग नहीं, बल्कि सिनेमा की एक नियोजित और समृद्ध परंपरा है। जाने-माने गीतकार प्रसून जोशी ने एक कार्यक्रम में 'दिल्ली-6' में अपने लिखे एक गीत 'मसक्कली' की रचना की कहानी सुनाते हुए यह राज भी खोला है।
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- हेमंत पाल

    हिंदी फिल्मों में निरर्थक शब्दों जिन्हें पाश्चात्य संगीत में 'स्केटिंग' या 'नॉन-लेक्सिकल वोकेबल्स' कहा जाता है, इनका प्रयोग कोई 80 या 90 के दशक की देन नहीं है। इस ट्रेंड की शुरुआत आजादी के ठीक बाद 1940 और 1950 के दशक में हुई। जब पश्चिमी रॉक एन रोल, जैज़ और लैटिन संगीत भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ घुलने-मिलने लगा, तब संगीतकारों को महसूस हुआ कि हर बार भारी-भरकम उर्दू या हिंदी शब्दों से थिरकने वाली धुनें नहीं बनाई जा सकतीं। इस चलन को स्थापित करने का पहला बड़ा श्रेय महान संगीतकार सी रामचंद्र (चितलकर) को जाता है। 1947 की फिल्म 'शहनाई' में उन्होंने 'छुक छुक छैयां' जैसे शब्दों का प्रयोग किया। लेकिन, 1957 की फिल्म 'आशा' में जब किशोर कुमार और आशा भोसले की आवाज में 'ईना मीना डीका, दे दाई दमनिका, माका नाका' गूंजा, तो मानो हिंदी सिनेमा को एक नया संगीतमय झुनझुना मिल गया। बच्चों के खेल 'ईनी मिनी माइनी मो' से प्रेरित होकर बने इस गीत में कोंकणी शब्द 'माका नाका' और 'रम पम पोस' जैसी तुकबंदी को जोड़ा गया था। इस एक प्रयोग ने साबित कर दिया कि दर्शक केवल शब्द सुनने नहीं, बल्कि उस ऊर्जा को महसूस करने के लिए भी थिरकते हैं। इस दौर में 'लारा लप्पा लारा लप्पा लाई रखदा' (एक थी लड़की, 1949) जैसे गानों ने साबित कर दिया कि अगर मुखड़ा जुबां पर चढ़ जाए, तो फिर उसका कोई शब्दकोशीय अर्थ ढूंढने की जरूरत नहीं पड़ती।
    एक बार जब ऐसे गीतों का दरवाजा खुला, तो फिल्म इंडस्ट्री के हर बड़े संगीतकार ने इसमें अपनी तरफ से रंग भरने का मौका नहीं छोड़ा। यह ऐसा दायरा बन गया, जहां प्रयोग करने की कोई पाबंदी नहीं थी। 1960 के दशक में 'जंगली' का 'याहू .., चाहे कोई मुझे जंगली कहे' आया था। यहां 'याहू' कोई शब्द नहीं, बल्कि एक उल्लासपूर्ण चीख थी, जिसने शम्मी कपूर को स्टारडम के शिखर पर पहुंचा दिया। इस फिल्म में 'अई अईया करूँ मैं क्या, सुक्कू सुक्कू' जैसा गाना भी आया, जो अर्जेंटीना की धुन से प्रेरित था और जिसका हिंदी में कोई शाब्दिक अर्थ नहीं होता। इसके बाद 'जब जब फूल खिले' का 'अफ्फू खुदा' और 'लव इन टोक्यो' का 'सायोनारा' जैसे बोल गूंजे, जिन्होंने विदेशों की भाषा और बेतुके ध्वनि वाले शब्दों को भारतीय दिलों की धड़कन बना दिया। 1970 और 1980 के दशक में आरडी. बर्मन और बप्पी लहरी ने इस विधा को नया मुकाम दिया। आरडी बर्मन ने 'जवानी दीवानी' में 'गिली गिली अक्खा, बिली बिली बिली' जैसे निरर्थक शब्दों से कमाल का समां बांधा।
    बप्पी लहरी इससे कहीं आगे निकल गए, उन्होंने 'मवाली' (1983) के 'उई अम्मा उई अम्मा' की धुन को सालों बाद 2011 में 'द डर्टी पिक्चर' के 'ऊह ला ला' में तब्दील कर दिया। फ्रेंच भाषा का एक विस्मयसूचक शब्द 'ऊह ला ला' भारतीय घरों में बच्चा-बच्चा गाने लगा। अगर हम गानों की गिनती करने बैठें, तो ऐसे सैकड़ों गीत मिल जाएंगे। 1989 की फिल्म 'थानेदार' का 'तम्मा तम्मा लोगे' हो या 'गैंगस्टर' का 'या अली' या फिर सिंधी लोकगीत 'हो जमालो' से प्रेरित होकर पंजाबी भांगड़ा शैली में ढला 'तूतक तूतक तूतिया' इन सभी गानों में मुखड़े या अंतरे के बोल केवल लय (रिदम) को सहारा देने के लिए बनाए गए थे। 90 के दशक में तो यह चलन चरम पर पहुंच गया, जब 'हाय हुकु हाय हुकु', 'गेला गेला', 'चिन्नम्मा चिलकामा' और 'हुक्का मारो' जैसे गानों ने ऑडियो कैसेट और सीडी के बाजार में धूम मचा दी थी। फ़िल्म 'दिल्ली 6' का एक गीत 'मसक्कली मसक्कली' भी इसी श्रेणी का है। इस गीत के बारे में गीतकार प्रसून जोशी ने एक कार्यक्रम में बताया था कि हिंदी में 'मसक्कली' कोई शब्द नहीं है। लेकिन, फिल्म के संगीतकार एआर रहमान ने एक ऐसी धुन बनाई, जिसे सुनकर मेरे दिमाग में यह शब्द आया और मैंने वह गीत लिख दिया। बाद में सवाल उठा कि इस 'मसक्कली' शब्द को जस्टिफाई कैसे करेंगे, तो फिल्म में कबूतर का नाम मसक्कली रखकर इस मसले को हल किया गया।
     संगीत के जानकारों और मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, ऐसे गानों की सफलता के पीछे एक गहरा वैज्ञानिक और संगीतमय कारण होता है। जब कोई इंसान संगीत सुनता है, तो उसका मस्तिष्क सबसे पहले धुन की लय से जुड़ता है। यदि बोल बेहद जटिल और कठिन शब्दावली वाले होंगे, तो मस्तिष्क का ध्यान उनका अर्थ समझने में लग जाता है। लेकिन, जब बोल ऊह ला ला, सुक्कू सुक्कू या 'तूतक तूतक' जैसे सरल और निरर्थक होते हैं, तो इंसान का ध्यान अर्थ से हटकर पूरी तरह से धुन के तालमेल और ऊर्जा पर केंद्रित हो जाता है। यह एक प्रकार का 'कैथार्सिस' (मानसिक तनाव मुक्ति) पैदा करता है, जिससे लोग झूमने और नाचने पर मजबूर हो जाते हैं।
     समय बदला, संगीत की तकनीक बदली, लेकिन 'चुटकी लेने वाले' इन गानों का मिजाज नहीं बदला। आज के डिजिटल और रील्स वाले दौर में भी यह चलन पूरी ताकत के साथ जारी है। अगर हम इस तरह के अर्थहीन या केवल लय आधारित बोल वाले सबसे नए और चर्चित उदाहरणों की बात करें, तो हाल ही में विक्की कौशल पर फिल्माया गया गाना 'तौबा तौबा' (बैड न्यूज़) या 'नाच पुंजबन' और 'काला चश्मा' जैसे गानों का रीमिक्स कल्चर इसी परंपरा की अगली कड़ी हैं। विशेषकर 'तौबा तौबा' या पंजाबी-बॉलीवुड फ्यूज़न वाले हालिया ट्रैक्स में ऐसे शब्दों को बार-बार दोहराया जाता है (जैसे 'तौबा तौबा', 'कुड़ी ताऊबा ताऊबा'), जिनका उद्देश्य कोई दार्शनिक बात कहना नहीं, बल्कि एक ऐसा हुक-स्टेप और कैंची लूप तैयार करना है जो सोशल मीडिया पर वायरल हो सके। इसी तरह 'ब्रह्मास्त्र' का 'डांस का भूत' हो या 'स्त्री 2' के डांस नंबर, इनमें प्रयोग की गई पंक्तियाँ केवल एक हुक-लाइन बनाने के लिए चुनी जाती हैं।
    फिल्मी गानों की यह चुटकी इस बात का जीता-जागता सबूत है कि फिल्म संगीत में पिरोए हुए ये गीत किसी भाषा या व्याकरण के मोहताज नहीं होते। शब्द चाहे 'ईना मीना डीका' हों, 'तम्मा तम्मा' हों या 'तूतक तूतक तूतिया' इनकी असली ताकत उनके अर्थ में नहीं, बल्कि उस खुशी और उमंग में छिपी है, जो ये श्रोताओं के चेहरे पर लाते हैं। जब तक दुनिया में इंसान को तनाव मिटाने और जश्न मनाने के लिए एक धुन की जरूरत रहेगी, तब तक फिल्म इंडस्ट्री के संगीतकार ऐसी ही मीठी, चटपटी और बेतुकी 'चुटकी' लेते रहेंगे, और हम-आप बिना मतलब समझे भी इन गानों पर यूं ही थिरकते रहेंगे।
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परदे पर राखी : सिनेमा के बदलते कैनवास पर रिश्ते

     सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं रहा, यह समाज का जीता-जागता दर्पण भी है। जब से समाज ने नए दौर में कदम रखा, हमारी फिल्मों ने भारतीय पारिवारिक मूल्यों, लोक-संस्कृति और तीज-त्योहारों को अपने कलेवर में गहराई से समेटा। यही वजह है कि त्योहार केवल कहानी को आगे बढ़ाने का जरिया नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं, रिश्तों की प्रगाढ़ता और सामाजिक समरसता को व्यक्त करने के सशक्त माध्यम भी बने। कुछ दशक पहले तक स्थिति यह थी कि शायद ही कोई ऐसी फिल्म बनती हो, जिसमें होली, दिवाली, ईद या राखी का कोई खूबसूरत प्रसंग न जोड़ा गया हो। त्यौहारों के ये रंग दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच लाते और उन्हें परदे पर अपना ही परिवार नजर आता था। परंतु, बीते कुछ सालों में हिंदी सिनेमा का रंग-ढंग पूरी तरह बदल गया। 
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- हेमंत पाल

    फिल्मों के कथानक के कई रंग होते हैं, उनमें एक त्योहारों का रंग भी है, जिसकी रौनक धीरे-धीरे कम हो गई। अब बहुत कम फिल्मों में तीज--त्यौहार और रस्मों-रिवाज दिखाई देते हैं। चिंता की बात यह कि आधुनिक सिनेमा से वे गहरे पारिवारिक रिश्ते ही गायब होने लगे, जो कभी हमारी फिल्मों की रीढ़ और त्योहारों के प्रसंग का आधार हुआ करते थे। आज की फिल्मों में रिश्तों की उस भावुकता की जगह हीरो-हीरोइन के लव अफेयर्स, बोल्ड सीन्स, सस्पेंस और अंधाधुंध मारपीट ने ले ली। इस बदलते दौर में रक्षाबंधन जैसे पावन त्योहार का फिल्मी उल्लेख भी बहुत कम हो गया। अब भाई-बहन के रिश्ते की प्रगाढ़ता वाला यह त्यौहार परदे से हाशिये पर आ गया। 
    बीते कुछ दशकों के सिनेमा के सफर पर नजर डालें, तो कथानक में एक बहुत बड़ा वैचारिक बदलाव दिखाई देने लगा। एक जमाना था जब फिल्मों की कहानियां संयुक्त परिवारों के इर्द-गिर्द बुनी जाती थीं। चाचा-चाची, दादा-दादी, भाई-बहन और मां-बाप के प्रति जिम्मेदारी ही नायक के जीवन का मकसद होते थे। आज के दौर में सिनेमा ने 'लार्जर दैन लाइफ' एक्शन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अपना मुख्य एजेंडा बना लिया। फिल्मों से रिश्तों के इस तरह तिरोहित यानी गायब होने के पीछे आधुनिक जीवनशैली और बाजारवाद का बहुत बड़ा हाथ है। आज की फिल्मों का नायक अब अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाने वाला सीधा-साधा युवक नहीं, बल्कि वह अपनी ही दुनिया में मग्न, आक्रामक और व्यवस्था से लड़ने वाला एक 'एंग्री यंग मैन' या फिर एक कॉर्पोरेट विलेन जैसा दिखने लगा है।
    अब स्क्रीन पर भाई और बहन के बीच का वह निश्छल, भोला और आदर से भरा प्रेम बहुत कम दिखाई देता है। पहले जहां भाई अपनी बहन की एक राखी के लिए पूरी दुनिया से लड़ जाता था, वहीं आज के सिनेमा में बहन का किरदार या तो सिर्फ नायक की शादी की तैयारियों में नाचने-गाने तक सीमित रह गया या फिर उसे पूरी तरह से कहानी से बाहर कर दिया गया। मारकाट और हिंसक दृश्यों की भरमार ने फिल्मों के उस कोमल पक्ष को पूरी तरह कुचल दिया, जो दर्शकों के दिलों को छूता था। फिल्मों में अब खून-खराबा, बंदूकें, गैंगवार और गालियां इतनी आम हो चुकी हैं कि उनमें राखी के धागे की पवित्रता और भाई-बहन के आंसुओं के लिए कोई जगह ही नहीं बची। जब रिश्तों की बुनियाद ही कमजोर हो गई, तो भला त्योहारों की खुशियां परदे पर कैसे नजर आएंगी!
    सिनेमा के इतिहास में वैसे तो कई त्योहारों को बहुत शिद्दत से फिल्माया गया, लेकिन होली के बाद राखी ही एक ऐसा त्योहार रहा जिसे निर्देशकों ने सबसे ज्यादा तवज्जो दी। ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों के जमाने से ही भाई-बहन के इस रिश्ते को परदे पर अमर करने की कोशिशें शुरू हो गई थीं। रक्षाबंधन के त्यौहार और भाई-बहन के रिश्ते को पूरी तरह समर्पित पहली मूक फिल्म साल 1928 में बनी, जिसका नाम था 'राखी।' इसके बाद बोलती फिल्मों के दौर में साल 1947 में आई फिल्म 'रक्षाबंधन' को इस विषय पर बनी शुरुआती बेहद महत्वपूर्ण फिल्मों में गिना जाता है। अश्विनी कुमार के निर्देशन में बनी साल 1947 की इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर भाई-बहन के प्रेम की एक नई इबारत लिखी थी। इसके बाद तो जैसे हिंदी सिनेमा में राखी केंद्रित फिल्मों की बाढ़ सी आ गई। पचास, साठ और सत्तर के दशक को यदि राखी फिल्मों का स्वर्णिम काल कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इस दौर में केवल त्योहार का एक दृश्य ही नहीं रखा जाता था, बल्कि पूरी की पूरी फिल्म का ताना-बाना ही राखी के एक कच्चे धागे के इर्द-गिर्द बुना जाता था। इन फिल्मों का मुख्य उद्देश्य समाज को यह बताना होता था कि एक भाई के लिए उसकी बहन का मान-सम्मान और उसकी सुरक्षा कितनी ज्यादा मायने रखती है।
    जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, फिल्मकारों ने इस रिश्ते की अहमियत को समझते हुए फिल्मों के नाम भी सीधे त्योहार और भाई-बहन के रिश्ते पर रखने शुरू कर दिए। इन फिल्मों के नाम सुनते ही आज भी पुरानी पीढ़ी के दर्शकों की आंखें नम हो जाती हैं। इस कड़ी में साल 1959 में आई फिल्म 'छोटी बहन' का नाम सबसे ऊपर आता है। इस फिल्म में बलराज साहनी और नंदा ने भाई-बहन का जो कालजयी किरदार निभाया, उसने पूरे देश को रुला दिया था। इसके बाद साल 1962 में आई फिल्म 'राखी' ने इस रिश्ते की जटिलताओं और गहराई को बखूबी परदे पर उतारा, जिसमें अशोक कुमार और वहीदा रहमान मुख्य भूमिकाओं में थे। 
    इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए साल 1969 में आई फिल्म 'भाई बहन' ने भी दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी। सत्तर के दशक में आई देव आनंद और जीनत अमान की फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' (1971) भले ही एक अलग पृष्ठभूमि पर आधारित थी, लेकिन इस फिल्म की मूल आत्मा एक भाई की अपनी भटकी हुई बहन को वापस पाने की तड़प ही थी। इसके अलावा धर्मेंद्र और साधना की फिल्म 'अनीता' हो या फिर बाद के सालों में आई 'प्यारी बहना' (1985) जिसमें मिथुन चक्रवर्ती ने एक अपाहिज बहन के भाई का बेहद भावुक किरदार निभाया था। इन सभी फिल्मों ने यह साबित किया कि राखी का त्योहार भारतीय सिनेमा के लिए कितना अनमोल रहा है। यहां तक कि नब्बे के दशक में भी 'तिरंगा' और 'क्रांतिवीर' जैसी एक्शन फिल्मों में भी राखी के त्योहार को देशप्रेम और न्याय की लड़ाई से जोड़कर एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में इस्तेमाल किया गया था।
    राखी केंद्रित फिल्मों की चर्चा तब तक अधूरी है, जब तक कि उन गानों का जिक्र न किया जाए जो आज भी हर साल रक्षाबंधन के दिन देश के कोने-कोने में गूंजते हैं। इन गीतों के बोल और संगीत इतने जादुई थे कि वे सीधे रूह में उतर जाते थे। आज भी जब रेडियो या टेलीविजन पर फिल्म 'छोटी बहन' का गाना 'भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना, भैया मेरे छोटी बहन को न भुलाना' बजता है, तो हर भाई-बहन का दिल भावुकता से भर जाता है। इस गाने को लता मंगेशकर ने अपनी मखमली आवाज दी थी और शैलेन्द्र ने इसके बेहद मार्मिक बोल लिखे थे। इसी तरह फिल्म 'राखी' (1962) का मोहम्मद रफी की आवाज में गाया हुआ गीत 'राखी धागों का त्योहार, बंधा एक-एक धागे में भाई-बहन का प्यार' आज भी इस त्योहार की परिभाषा माना जाता है। 
     एक और बेहद लोकप्रिय और खिलखिलाता हुआ गीत जो हर बहन अपने भाई के लिए गाती है, वह है फिल्म 'सच्चा झूठा' (1970) का गाना 'मेरी प्यारी बहनिया बनेगी दुल्हनिया, सजके आएंगे दूल्हे राजा।' किशोर कुमार की आवाज में गाए गए इस गीत ने भाई की खुशी और उसकी आत्मीयता को एक नया मुकाम दिया। इसके अलावा फिल्म 'चंबल की कसम' (1980) का गाना 'चंदा रे मेरे भैया से कहना, बहना याद करे' और फिल्म 'अंधा कानून' (1983) का गाना 'ये राखी बंधन है ऐसा, जैसे चंदा और चकोरी' जैसे अनगिनत गीत हैं जिन्होंने इस रिश्ते की पवित्रता को सुरों के संसार में हमेशा के लिए सहेज दिया। इन गानों की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि ये केवल फिल्म के सीन को पूरा करने के लिए नहीं गाए जाते, बल्कि ये उस दौर के समाज की वास्तविक संवेदनाओं को सुरों में पिरोते थे।
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Friday, August 14, 2026

बिहार की राजनीति : हार से हासिल सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी

     
राजनीति में चुनाव सिर्फ हार और जीत का खेल नहीं होता, बल्कि यह नेतृत्व की क्षमता, संगठन की मजबूती और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को बदलने की योग्यता की भी परीक्षा होती है। कई बार चुनावी पराजय किसी नेता के राजनीतिक जीवन का अंत साबित होती है, तो कई बार वही हार आगे की बड़ी सफलता की आधारशिला बन जाती है। बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर की हाल की जीत इसी उदाहरण के रूप में देखी जा सकती है। विधानसभा चुनाव में लगभग पूरी तरह असफल रहने के बाद जिस नेता को राजनीतिक विश्लेषकों ने समय से पहले खारिज कर दिया था, उसी नेता ने कुछ महीनों बाद बांकीपुर जैसे कठिन निर्वाचन क्षेत्र में जीत दर्ज कर यह संकेत दिया कि राजनीति में अंतिम निर्णय मतदाता देता है, राजनीतिक टिप्पणीकार नहीं।
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● हेमंत पाल

     बिहार विधानसभा चुनाव के बाद 'जन सुराज' की स्थिति अत्यंत निराशाजनक थी। बड़ी संख्या में उम्मीदवार मैदान में उतरे, लेकिन अधिकांश अपनी जमानत तक नहीं बचा सके। परिणाम आने के तुरंत बाद यह धारणा बनने लगी कि प्रशांत किशोर का राजनीतिक प्रयोग विफल हो चुका है। यह भी कहा गया कि चुनावी रणनीतिकार के रूप में सफल रहे व्यक्ति की राजनीति में प्रत्यक्ष भूमिका निभाने की क्षमता सीमित है। लेकिन, प्रशांत किशोर ने इस आलोचना का जवाब बयानबाजी से नहीं, बल्कि संगठन और रणनीति में बदलाव के जरिए देने का रास्ता चुना। भारतीय राजनीति में हार के बाद नेताओं को चुनाव आयोग, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन, संगठन या सहयोगियों को दोष देना आम बात रही है। इसके विपरीत प्रशांत किशोर ने सार्वजनिक रूप से पराजय स्वीकार की और आत्ममंथन का रास्ता अपनाया। यही उनकी राजनीति का पहला महत्वपूर्ण मोड़ माना जा सकता है। किसी भी राजनीतिक दल के लिए हार के बाद सबसे बड़ा सवाल यह होता है, कि वह अपनी कमियों को स्वीकार करता है या नहीं। जन सुराज ने इस मामले में अपेक्षाकृत अलग रवैया अपनाया।
     चुनाव के बाद प्रशांत किशोर ने जिस प्रकार सार्वजनिक गतिविधियों से कुछ समय की दूरी बनाकर आत्मचिंतन का संदेश दिया, उसका राजनीतिक महत्व भी था। यह केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, बल्कि कार्यकर्ताओं और समर्थकों को यह संकेत भी था कि पार्टी हार के कारणों को समझे बिना आगे नहीं बढ़ेगी। इसके बाद संगठनात्मक ढांचे में जो परिवर्तन हुए, उन्होंने 'जन सुराज' की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सबसे बड़ा परिवर्तन पार्टी की कार्यशैली में दिखाई दिया। विधानसभा चुनाव के दौरान 'जन सुराज' में बड़ी संख्या में ऐसे लोग सक्रिय थे, जिनकी पहचान पेशेवर चुनाव प्रबंधन से जुड़ी थी। सोशल मीडिया, डिजिटल प्रचार और चुनावी ब्रांडिंग पर विशेष जोर दिया गया था। लेकिन, बिहार जैसे राज्य में केवल डिजिटल मौजूदगी चुनावी सफलता की गारंटी नहीं बन सकती। यहां बूथ स्तर का संगठन, जातीय समीकरण, स्थानीय नेतृत्व और लगातार जनसंपर्क कहीं अधिक प्रभावी साबित होते हैं। चुनाव परिणामों ने इस वास्तविकता को स्पष्ट कर दिया।
    इस अनुभव से सीखते हुए प्रशांत किशोर ने संगठन की प्राथमिकताओं को बदला। पेशेवर चुनावी मॉडल की जगह समर्पित कार्यकर्ताओं पर भरोसा बढ़ाया। बूथ स्तर पर संगठन तैयार करने, स्थानीय इकाइयों को सक्रिय करने और अलग-अलग सामाजिक समूहों तक नियमित पहुंच बनाने की रणनीति अपनाई गई। बड़ी जनसभाओं और सोशल मीडिया अभियानों की तुलना में छोटे समूहों के संवाद, मोहल्ला बैठकों और घर-घर संपर्क पर अधिक ध्यान दिया गया। यह बदलाव केवल रणनीति का नहीं, बल्कि राजनीतिक सोच का परिवर्तन था। राजनीति में आर्थिक पारदर्शिता और व्यक्तिगत प्रतिबद्धता भी कार्यकर्ताओं के मनोबल को प्रभावित करती है। प्रशांत किशोर ने अपनी आय और संपत्ति का बड़ा हिस्सा पार्टी को समर्पित करने की घोषणा कर यह संदेश देने का प्रयास किया कि 'जन सुराज' केवल चुनावी मंच नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक परियोजना है। साथ ही उन्होंने पार्टी से जुड़े लोगों से आर्थिक सहयोग की अपेक्षा रखकर यह संकेत भी दिया कि संगठन बाहरी संसाधनों पर निर्भर रहने के बजाय अपने समर्थकों की भागीदारी से आगे बढ़ेगा। इस मॉडल का उद्देश्य कार्यकर्ताओं में स्वामित्व की भावना पैदा करना था।
    बांकीपुर उपचुनाव इसी बदली हुई रणनीति की पहली बड़ी परीक्षा बना। यह सीट लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ रही है। ऐसे क्षेत्र में चुनाव लड़ना स्वयं में जोखिम भरा निर्णय था। यदि यहां भी पराजय होती, तो 'जन सुराज' की राजनीतिक विश्वसनीयता पर और गंभीर प्रश्न उठते। लेकिन, प्रशांत किशोर ने इसी चुनौती को अवसर में बदलने का प्रयास किया। इस चुनाव में उन्होंने राज्यस्तरीय बड़े राजनीतिक विमर्श की बजाय स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता दी। जलभराव, यातायात, रोजगार और शहरी अव्यवस्था जैसे विषय लगातार जनता के बीच उठाए गए। इससे चुनाव राष्ट्रीय राजनीतिक बहस से हटकर स्थानीय असंतोष के इर्द-गिर्द केंद्रित होने लगा। यह रणनीति इसलिए भी प्रभावी रही, क्योंकि स्थानीय चुनावों में मतदाता अक्सर अपने दैनिक जीवन से जुड़े मुद्दों पर अधिक प्रतिक्रिया देते हैं।  प्रशांत किशोर की एक और महत्वपूर्ण रणनीति यह रही कि उन्होंने स्वयं को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और महागठबंधन दोनों के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। बिहार में लंबे समय से राजनीति दो प्रमुख ध्रुवों के बीच घूमती रही है। ऐसे में उन मतदाताओं को आकर्षित करना, जो दोनों पक्षों से असंतुष्ट थे, 'जन सुराज' के लिए स्वाभाविक राजनीतिक अवसर था। यदि कोई तीसरा दल केवल विरोध की राजनीति करता तो उसकी स्वीकार्यता सीमित रहती है, लेकिन यदि वह व्यवहारिक विकल्प प्रस्तुत करता है. तो उसके लिए राजनीतिक जमीन बन सकती है।
     इस पूरे अभियान में एक और राजनीतिक पहलू महत्वपूर्ण रहा। भरत तिवारी एनकाउंटर का मुद्दा लगातार चर्चा में बना रहा। इस विषय को प्रशांत किशोर ने निरंतर राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाए रखा। माना गया कि इस मुद्दे ने विशेष रूप से उन मतदाताओं के बीच प्रभाव डाला, जो परंपरागत रूप से भाजपा के समर्थक माने जाते रहे हैं। दूसरी ओर मुख्य विपक्षी दल इस मुद्दे को उतनी प्रभावशीलता से राजनीतिक समर्थन में परिवर्तित नहीं कर सके। इससे 'जन सुराज' को उन वर्गों तक पहुंच बनाने का अवसर मिला, जहां पहले उसकी मौजूदगी सीमित थी। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा नेताओं के कुछ आत्मविश्वास से भरे बयानों ने भी राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया। जब किसी दल को अपनी जीत पूरी तरह सुनिश्चित मानने का संदेश जाता है, तो कई बार मतदाता इसके विपरीत प्रतिक्रिया भी देते हैं। बांकीपुर के परिणामों ने यह संकेत दिया कि किसी भी निर्वाचन क्षेत्र को केवल परंपरागत राजनीतिक गढ़ मानकर नहीं चला जा सकता। मतदाता समय-समय पर अपने फैसलों से स्थापित धारणाओं को बदलने की क्षमता रखते हैं।
     हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि बांकीपुर की जीत को पूरे बिहार की राजनीतिक तस्वीर का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। उपचुनाव और विधानसभा चुनाव की प्रकृति अलग होती है। उपचुनाव स्थानीय परिस्थितियों, उम्मीदवार की छवि और तत्कालीन राजनीतिक वातावरण से अधिक प्रभावित होते हैं, जबकि विधानसभा चुनाव में व्यापक संगठन, संसाधन, गठबंधन और राज्यव्यापी समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसलिए जन सुराज के सामने अभी भी अपनी नई रणनीति को पूरे राज्य में प्रभावी ढंग से लागू करने की चुनौती बनी हुई है। फिर भी यह स्वीकारना होगा कि प्रशांत किशोर ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश दिया है। उन्होंने यह दिखाया कि हार के बाद केवल बयान बदलने से नहीं, बल्कि संगठन, रणनीति और कार्यशैली बदलने से राजनीतिक वापसी संभव होती है। बिहार की राजनीति में उनकी यह वापसी केवल एक सीट की जीत नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि लगातार सीखने और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने वाला नेतृत्व लंबे समय तक प्रासंगिक बना रह सकता है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बांकीपुर की सफलता एक अपवाद साबित होती है या बिहार की राजनीति में किसी नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत।
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दतिया का जनादेश : असंतोष दोनों तरफ, भाजपा को भारी पड़ा सेबोटेज

      
कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,056 वोटों से हराकर लगातार दूसरी बार भाजपा को उपचुनाव में शिकस्त दी। इससे पहले विजयपुर में भी भाजपा को शिकस्त खाना पड़ी थी। दतिया की जीत इसलिए अहम है, क्योंकि दतिया लंबे समय तक पूर्व गृह मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा का अभेद्य राजनीतिक गढ़ रहा है। भाजपा ने यहां अपनी पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन कांग्रेस ने सीमित संसाधनों के बावजूद बेहतर स्थानीय रणनीति, उम्मीदवार की स्वीकार्यता और संगठन की एकजुटता के दम पर बाजी अपने नाम कर ली।
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● हेमंत पाल

   कांग्रेस ने दतिया का प्रतिष्ठापूर्ण उपचुनाव जीत लिया। यह चुनाव नतीजा अप्रत्याशित जरूर है, पर आश्चर्यजनक नहीं। क्योंकि, दतिया उपचुनाव की घोषणा के साथ ही यहां भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों में असंतोष खदबदाने लगा था। खासियत यह भी रही कि कांग्रेस ने चुनाव को केवल भाजपा विरोध तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे स्थानीय नेतृत्व और जनविश्वास के चुनाव में बदला। कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह की पहचान  सहज, सुलभ और साफ-सुथरी छवि वाले नेता की रही है। राजपरिवार से जुड़े होने के कारण उनकी सामाजिक स्वीकार्यता पहले से थी और ग्रामीण क्षेत्रों में उनका व्यक्तिगत संपर्क भी मजबूत था। कांग्रेस ने इसी छवि को चुनाव का केंद्र बनाया। बड़े राजनीतिक नारों के बजाय स्थानीय मुद्दों, व्यक्तिगत संपर्क और बूथ स्तर की सक्रियता पर अधिक जोर दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि मतदान के दिन कांग्रेस का समर्थक वर्ग अपेक्षाकृत अधिक संगठित दिखाई दिया।
   यह भी सच है कि कांग्रेस भी निर्विवाद स्थिति में नहीं थी। पूर्व विधायक राजेंद्र भारती की विधायकी ख़त्म होने के कारण यह उपचुनाव हुआ और चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस के भीतर मतभेद भी सार्वजनिक हुए। घनश्याम सिंह ने राजेंद्र भारती पर भितरघात के आरोप लगाए और बाद में पार्टी ने उन्हें निलंबित भी किया। लेकिन, कांग्रेस नेतृत्व की सफलता इस बात में रही कि उसने इन विवादों को चुनाव का मुख्य मुद्दा नहीं बनने दिया। संगठन ने उम्मीदवार के पक्ष में माहौल बनाए रखा और स्थानीय स्तर पर मतदाताओं को यह संदेश देने में सफलता हासिल की कि चुनाव व्यक्ति नहीं, पार्टी की राजनीतिक दिशा का है।
    दूसरी ओर भाजपा की रणनीति का केंद्र संगठनात्मक शक्ति और शीर्ष नेतृत्व का व्यापक प्रचार रहा। मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद और विधायक लगातार दतिया में सक्रिय रहे। जातीय समीकरणों को साधने के लिए अलग-अलग वर्गों के बीच विशेष अभियान चलाए। लेकिन, चुनाव ने यह साबित कर दिया कि सिर्फ शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी पर्याप्त नहीं होती। यदि स्थानीय संगठन पूरी तरह भावनात्मक रूप से जुड़ा न हो तो चुनावी मशीनरी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाती।
   भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती टिकट वितरण के बाद उभरा असंतोष था। पूर्व गृह मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया गया। इसके बाद उनके समर्थकों का खुला विरोध, सड़क पर प्रदर्शन और नाराजगी चुनाव की शुरुआत से ही चर्चा का विषय बन गई। बाद में डॉ मिश्रा ने पार्टी उम्मीदवार के समर्थन में प्रचार भी किया, लेकिन कार्यकर्ताओं का मन पूरी तरह नहीं बदल सका। इसका असर मतदान और मतगणना दोनों में दिखाई दिया। सबसे बड़ा प्रतीकात्मक संदेश तब मिला, जब डॉ नरोत्तम मिश्रा के खुद के मतदान केंद्र पर भी कांग्रेस भाजपा से आगे निकल गई। यह केवल बूथ का परिणाम नहीं था, बल्कि स्थानीय राजनीतिक संदेश था कि भाजपा अपने परंपरागत वोट को पूरी तरह एकजुट नहीं रख सकी।
   हालांकि, भाजपा की हार का कारण केवल भितरघात मान लेना भी अधूरी बात होगी। कांग्रेस ने इस चुनाव में अपनी चुनावी रणनीति को अधिक व्यवस्थित ढंग से लागू किया। उसने बूथ प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया, स्थानीय नेताओं के बीच समन्वय बनाए रखा और ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार जनसंपर्क अभियान चलाया। मतदान प्रतिशत लगभग 71.44% रहा, लेकिन अपेक्षाकृत कम मतदान और महिलाओं की घटती भागीदारी का लाभ कांग्रेस को मिला। कांग्रेस अपने परंपरागत मतदाताओं को मतदान केंद्र तक लाने में भाजपा की तुलना में अधिक सफल रही।
    मतगणना के दौरान भी कांग्रेस की बढ़त ने स्पष्ट कर दिया कि उसका समर्थन केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं था। शुरुआती राउंड से ही कांग्रेस आगे रही और कई चरणों में उसकी बढ़त 10 हजार से अधिक मतों तक पहुंच गई। अंतिम चरण में भाजपा ने कुछ अंतर जरूर कम किया, लेकिन चुनाव का रुख बदल नहीं सकी। इसका अर्थ यह है कि कांग्रेस का समर्थन व्यापक और संतुलित था, जबकि भाजपा को कई क्षेत्रों में अपेक्षित मतदान नहीं मिला। इस जीत का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है। लगातार दूसरी उपचुनाव जीत से कांग्रेस संगठन का मनोबल बढ़ेगा। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और चुनावी रणनीति संभालने वाले नेताओं के लिए यह परिणाम संगठनात्मक सफलता माना जाएगा। कांग्रेस अब यह दावा करने की स्थिति में होगी कि वह केवल सत्ता विरोध के भरोसे नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक तैयारी और स्थानीय नेतृत्व के दम पर भी भाजपा को चुनौती दे सकती है।
   दतिया का जनादेश भाजपा के लिए आत्ममंथन का विषय अवश्य है, लेकिन उससे भी अधिक यह कांग्रेस की रणनीतिक सफलता की कहानी है। इस चुनाव ने साबित किया कि मजबूत उम्मीदवार, स्थानीय विश्वसनीयता, प्रभावी बूथ प्रबंधन और कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी आज भी किसी भी चुनाव की सबसे बड़ी ताकत हैं। संसाधनों, बड़े प्रचार अभियानों और शीर्ष नेताओं की सभाओं से अधिक महत्व उस संगठन का होता है, जो मतदान के दिन मतदाता को अपने पक्ष में खड़ा कर सके। दतिया में कांग्रेस यही करने में सफल रही और यही उसकी जीत का सबसे बड़ा कारण बना।
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सिनेमा का दर्द, विभाजन की कसक


     देश के इतिहास में 15 अगस्त 1947 का दिन जहां एक तरफ आजादी का महान उल्लास लेकर आया, वहीं दूसरी तरफ देश के दो टुकड़ों में बंट जाने का एक ऐसा नासूर छोड़ गया, जिसकी कसक और टीस आज दशकों बाद भी भारतीय जनमानस के दिलों में जिंदा है। फिल्मकारों ने भी इस मानवीय त्रासदी को हमेशा अपनी संवेदना के केंद्र में रखा। बीते आठ दशकों में बंटवारे के इस असीम दर्द, मानसिक द्वंद्व और नफरत के बीच सुलगती इंसानियत को बेहद संजीदगी से अलग-अलग कथानकों के जरिए परदे पर उतारा गया है। 
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- हेमंत पाल
 
    देश के बंटवारे का दर्द हर भारतीय के दिल में टीस बनकर कचोटता है। इस विषय को फिल्मकारों ने बीते दशकों में कई तरह से फिल्माया और दर्शकों को उस दर्द को याद दिलाया है। हाल ही में इस संवेदनशील और ऐतिहासिक विषय को लेकर एक बार फिर सिनेमा जगत में बड़ी हलचल हुई। आमिर खान की प्रोडक्शन कंपनी ने अभिनेता सनी देओल को लेकर 'बंटवारा 1947' नाम से फिल्म का निर्माण किया है। यह फिल्म इस बात का सीधा प्रमाण है कि विभाजन का वह दौर, उसका दर्द और संघर्ष आज भी एक ऐसा विषय है, जो हर दौर के दर्शकों और फिल्मकारों को गहरे स्तर पर झकझोरता और आकर्षित करता है। 'बंटवारा 1947' के माध्यम से एक बार फिर बड़े परदे पर उस दौर की भयावहता, विस्थापन की पीड़ा और मानवीय रिश्तों के टूटने-जुड़ने की दास्तान को नए दृष्टिकोण और भव्य पैमाने के साथ पेश किया गया है, जो पुरानी यादों को ताज़ा करते हुए नई पीढ़ी को इतिहास के इस दुखद अध्याय से रूबरू कराती है।
    आजादी के बाद से अब तक अगर विभाजन के विषय पर बनी फिल्मों के सफरनामे को काल के क्रम के अनुसार देखें, तो भारतीय सिनेमा ने हर दशक में इस त्रासदी को अलग-अलग कोणों से समझने और बयां करने का प्रयास किया है। इस कड़ी में पहली शुरुआत प्रभावशाली तरीके से यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी फिल्म 'धर्मपुत्र' से हुई, जो वर्ष 1961 में रिलीज़ हुई थी। आचार्य चतुरसेन के प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित इस फिल्म में शशि कपूर और माला सिन्हा ने मुख्य भूमिकाएं निभाई। यह फिल्म बंटवारे के दौर में पनपे धार्मिक कट्टरपंथ और अपनी ही पहचान को लेकर मन में उठते द्वंद्व पर करारा प्रहार करती है। फिल्म उस दौर में हिंदू-मुस्लिम एकता का एक बेहद मजबूत और जरूरी संदेश देती है, जो यह दर्शाता है कि राजनीति और धर्म के नाम पर इंसानी रिश्तों को कैसे बलि चढ़ाया गया था।
    इसके बाद वर्ष 1973 में आई फिल्म 'गर्म हवा' को विभाजन पर बनी भारतीय सिनेमा की सबसे प्रामाणिक, संवेदनशील और यथार्थवादी फिल्मों में गिना जाता है। महान निर्देशक एमएस सथ्यू के निर्देशन में बनी इस फिल्म में बलराज साहनी, फारूक शेख और गीता सिद्धार्थ ने अपनी अभिनय क्षमता की अमिट छाप छोड़ी थी। लेखिका इस्मत चुगताई की कहानी और कैफी आजमी की कालजयी पटकथा पर आधारित यह फिल्म आगरा के एक मुस्लिम व्यवसायी सलीम मिर्जा और उनके परिवार के संघर्ष की मर्मस्पर्शी दास्तान है। फिल्म उन परिवारों की मानसिक, सामाजिक और आर्थिक पीड़ा को उकेरती है, जिन्होंने विभाजन के बाद अपने वतन में ही रहने का फैसला किया था। लेकिन, फिर भी उन्हें हर कदम पर शक, बेगानेपन और आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। बलराज साहनी का अभिनय सलीम मिर्जा के रूप में दर्शक के दिल को छूने वाला था। 
    अस्सी के दशक में दूरदर्शन के दौर में वर्ष 1987 में आया धारावाहिक 'तमस' न केवल एक टीवी के कार्यक्रम के रूप में बल्कि एक यादगार सिनेमेटिक अनुभव के रूप में इतिहास में दर्ज हुआ। गोविंद निहलानी द्वारा निर्देशित और भीष्म साहनी के चर्चित उपन्यास पर आधारित इस कृति में ओम पूरी, दीप्ति नवल, अमरीश पुरी और स्वयं भीष्म साहनी जैसे दिग्गज कलाकारों ने अभिनय किया था। 'तमस' धारावाहिक बंटवारे से ठीक पहले और उस दौरान भड़के सांप्रदायिक दंगों, राजनीतिक षड्यंत्रों और इन सबके बीच पिसते आम, बेकसूर लोगों की तबाही का सबसे नग्न और यथार्थवादी खाका खींचता है। यह दिखाता है कि कैसे चंद स्वार्थी ताकतों के उकसावे में आकर सदियों से साथ रहने वाले पड़ोसी एक-दूसरे के खून के प्यासे बन गए थे।
    नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में विभाजन के विषय पर कई महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों को परदे पर उतारा गया। इस क्रम में वर्ष 1998 में निर्देशक पमेला रूक्स की फिल्म 'ट्रेन टू पाकिस्तान' आई, जो खुशवंत सिंह के विश्व प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित थी। निर्मल पांडे, रजित कपूर, दिव्या दत्ता और स्मृति मिश्रा के सशक्त अभिनय से सजी यह फिल्म भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित 'मनोमाजरा' नामक एक शांत गांव की कहानी कहती है। फिल्म यह दर्शाती है कि कैसे सीमा पार से लाशों से भरकर आने वाली ट्रेनों के खौफनाक मंजर ने उस गांव के भाईचारे और शांति को नफरत की आग में झोंक दिया था।
    1998 में दीपा मेहता के निर्देशन में बनी फिल्म '1947 अर्थ' रिलीज हुई, जो बीपसी सिधवा के उपन्यास 'क्रैकिंग इंडिया' पर आधारित थी। इस फिल्म में आमिर खान, नंदिता दास और राहुल खन्ना ने मुख्य भूमिकाएं निभाई। लाहौर की पृष्ठभूमि पर आधारित यह फिल्म बहुत ही बारीकी से दिखाती है कि कैसे बंटवारे की सांप्रदायिक आग ने सदियों पुरानी दोस्तों की टोलियों, मासूम प्यार और इंसानी रिश्तों को पल भर में जलाकर राख कर दिया। फिल्म में आमिर खान द्वारा निभाया गया 'दिल नवाज' (आइस-कैंडी मैन) का किरदार नफरत और जुनून के उस बदलाव को दर्शाता है जो उस दौर में साधारण इंसानों के भीतर आ गया था।
    सदी के बदलाव के साथ वर्ष 2000 में कमल हासन की ऐतिहासिक फिल्म 'हे राम' आई। कमल हासन द्वारा ही निर्देशित इस फिल्म में स्वयं कमल हासन के साथ शाहरुख खान, रानी मुखर्जी और नसीरुद्दीन शाह जैसे दिग्गज सितारे थे। विभाजन के दौरान फैली भयंकर हिंसा, नफरत और उसके परिणामस्वरूप हुए घटनाक्रमों के साथ-साथ महात्मा गांधी की हत्या के दौर को केंद्र में रखकर बनाई गई यह फिल्म विभाजन से उपजे मानसिक और भावनात्मक आघात की गहराई को दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर तलाशती है।
    2001 में आई फिल्म 'गदर : एक प्रेम कथा' ने विभाजन के विषय को एक बिल्कुल नए कमर्शियल और भव्य पैमाने पर दर्शकों के सामने रखा। अनिल शर्मा निर्देशित और सनी देओल, अमीषा पटेल तथा अमरीश पुरी अभिनीत यह फिल्म भले ही एक प्रेम कहानी के ताने-बाने पर बुनी गई थी, लेकिन इसकी शुरुआत में विभाजन के दौरान हुए दंगों, ट्रेनों में कत्लेआम और अपनों से बिछड़ते परिवारों की चीख-पुकार का जो चित्रण किया गया, उसने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए कीर्तिमान रचे और साबित किया कि विभाजन का दौर मुख्यधारा के सिनेमा में भी बहुत गहराई से अपील करता है।
    इसके बाद वर्ष 2003 में डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी के निर्देशन में बनी फिल्म 'पिंजर' आई, जो अमृता प्रीतम के बेहद मशहूर उपन्यास पर आधारित थी। उर्मिला मातोंडकर, मनोज बाजपेयी और संजय सूरी के जीवंत अभिनय से सजी यह फिल्म विभाजन के दौरान महिलाओं पर हुए अमानवीय अत्याचारों, उनके अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और सामाजिक त्रासदियों को बेहद संजीदगी से उजागर करती है। फिल्म की मुख्य पात्र पूरो और रशीद की कहानी के माध्यम से फिल्म यह सवाल उठाती है कि युद्ध और बंटवारे में सबसे बड़ी कीमत हमेशा औरतों को ही क्यों चुकानी पड़ती है।
    आगे चलकर वर्ष 2013 में राकेश ओमप्रकाश मेहरा द्वारा निर्देशित फिल्म 'भाग मिल्खा भाग' रिलीज़ हुई, जिसमें फरहान अख्तर ने महान एथलीट मिल्खा सिंह की भूमिका निभाई। यद्यपि यह फिल्म एक महान खिलाड़ी की बायोपिक थी, लेकिन इसका मुख्य भावनात्मक आधार विभाजन की वही त्रासदी थी। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे बचपन में बंटवारे के दौरान मिल्खा सिंह के माता-पिता को उनकी आंखों के सामने कत्ल कर दिया गया था और विस्थापन के उस खौफनाक दर्द का जख्म ताउम्र उनके दिलो-दिमाग पर हावी रहा। यह फिल्म यह दर्शाती है कि बंटवारे का दर्द केवल उस दौर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने इंसानों की पूरी जिंदगी और आने वाली पीढ़ियों की मानसिकता को प्रभावित किया।
    1961 की 'धर्मपुत्र' से लेकर गर्म हवा, तमस, पिंजर, 1947 अर्थ और अब 'बंटवारा 1947' तक का सिनेमाई सफर यह साफ करता है कि भारत-पाकिस्तान का विभाजन केवल एक बीती हुई ऐतिहासिक घटना नहीं है। यह भारतीय सिनेमा के लिए एक कभी न खत्म होने वाली मानवीय संवेदना की प्रयोगशाला है। इन फिल्मों ने दर्शकों को केवल मनोरंजन नहीं दिया, बल्कि उन्हें इतिहास के उस काले पन्ने से रू-ब-रू कराया जहां इंसानियत हार गई और नफरत जीत गई थी। सिनेमा ने बार-बार इन कहानियों के जरिए दुनिया को यही याद दिलाने की कोशिश की है कि सीमाओं का बंटवारा भले ही ज़मीन पर लकीरें खींच दे, लेकिन दिलों में बिखरे दर्द, यादों और इंसानी रिश्तों के जुड़ाव को कोई लकीर मिटा नहीं सकती। यही कारण है कि भारतीय दर्शक आज भी जब बड़े पर्दे पर विभाजन की इन कहानियों को देखते हैं, तो उनकी आंखें नम हो जाती हैं और सिनेमा का यह संवेदनशील रूप हमेशा दर्शकों के दिलों में प्रासंगिक बना रहता है।
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'नायक' से 'जन नायकन' और जंतर मंतर की पटकथा

सिनेमा और समाज का रिश्ता हमेशा से गहरा रहा है। यही वजह है कि बड़ा परदा सिर्फ कहानियां नहीं फिल्माता, वक्त-बे-वक्त प्रशासनिक व्यवस्था और सामाजिक सरोकारों के खिलाफ उठती चेतना का प्रतिबिंब भी बनता है। जब भी समाज में भ्रष्टाचार, निरंकुशता या नफरत का दौर गहराया, तब एक काल्पनिक 'जन नायक' जन्मा, जिसने आम जनता के अधिकारों और लोकतंत्र के अस्तित्व को बचाने के लिए कड़े कदम उठाए। 'जना नायकन' जैसी फिल्मों ने नारी सशक्तिकरण को उजागर करती हैं, धार्मिक नफरत और कट्टरता के खिलाफ लोकतंत्र के रक्षक के रूप में खड़ी होती हैं। उसी सिनेमा विरासत का एक हिस्सा 'नायक' जैसी फिल्में हैं, जिनमें रातों-रात व्यवस्था बदलने और जनहित में ऐतिहासिक फैसले लेने के फंतासी कारनामे हैं। परदे पर अकेला नायक पूरी व्यवस्था को चुनौती देता दिखे, लेकिन असल जीवन में लोकतंत्र की रक्षा एक के कंधों पर नहीं है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर इंसाफ की आवाज बुलंद करने वाला आंदोलन इसी कड़वी सच्चाई का प्रमाण है। यह दर्शाता है, कि असली 'जन नायक' एक व्यक्ति नहीं, अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने वाली जनशक्ति है।
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- हेमंत पाल

     सिनेमा सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि समय-समय पर इसने समाज का आईना बनने के साथ राजनीतिक और सामाजिक चेतना के जगाने का काम भी किया। जब व्यवस्था में भ्रष्टाचार, निरंकुशता और धार्मिक विषैलेपन का बोलबाला हुआ, तब सिनेमा के परदे पर ऐसे 'जना नायकन' का जन्म हुआ, जिसने जनता की आवाज बनकर लोकतंत्र की रक्षा का बीड़ा उठाया। निर्माता एच विनोथ की हाल की यह फ़िल्म इसी परंपरा को आगे बढ़ाती हुई एक सशक्त रूप में सामने आई है। हालांकि, यह फिल्म नंदामुरी बालकृष्ण की 2023 की हिट फिल्म 'भगवंत केसरी' की रीमेक है। यह एक पूर्व पुलिस अफसर के एक लड़की को सशक्त बनाकर भारतीय सेना में भेजने की कहानी थी। लेकिन, विनोथ ने इसमें राजनीतिक तेवर और सामाजिक संदेशों की एक ऐसी नई परत जोड़ी, जिसने इसे रीमेक से अलग कर लोकतंत्र के रक्षक की कहानी बना दिया। विजय थलापति की 'जना नायकन' की कहानी पिता-पुत्री के भावनात्मक रिश्ते, नारी सशक्तिकरण और डर से संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमती है। 
     अपने मित्र इंस्पेक्टर श्रीकांत की असमय मृत्यु के बाद, थलपति वेट्री कोंडन (विजय) उनकी बेटी विजी (ममिता बैजू) के संरक्षक की भूमिका निभाता है। विजी मानसिक आघात के कारण एक गहरे डर से जूझ रही है, जो एक छोटी सी आवाज से सिहर उठती है। वेट्री का उद्देश्य केवल उसे सेना में शामिल कराना ही नहीं, बल्कि उसके भीतर के भय को समाप्त कर उसे आत्मनिर्भर बनाना है। कहानी तब एक बड़ा राजनीतिक मोड़ लेती है, जब इसमें जॉन हिमलर (बॉबी देओल) के रूप में एक खतरनाक खलनायक का प्रवेश होता है। जहां मूल फिल्म में खलनायक का उद्देश्य व्यावसायिक साम्राज्य स्थापित करना था, वहीं 'जना नायकन' में निर्देशक ने एक नई परत जोड़ते हुए उसे धार्मिक घृणा और कट्टरता के जरिए भारत के लोकतंत्र को नष्ट करने वाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। यहीं से वेट्री कोंडन का चरित्र केवल एक अभिभावक न रहकर एक ऐसे नायक के रूप में उभरता है, जो देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए ढाल बनकर खड़ा होता है।
     फिल्म 'जना नायकन' को अगर इस पूरे परिदृश्य में रखकर देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि यह फिल्म विजय थलापति की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और उनकी जन-नायक की छवि को मजबूत करने का एक सुनियोजित प्रयास है। एमजीआर के दौर से ही दक्षिण भारतीय सिनेमा में फिल्मों का इस्तेमाल राजनीतिक संदेश देने और नायक को जनता के तारणहार के रूप में स्थापित करने के लिए होता रहा है। 'जना नायकन' भी इसी परंपरा का निर्वहन करती है। फिल्म में जब वेट्री कोंडन धार्मिक नफरत फैलाने वाली ताकतों से मुकाबला करता है, तो वह केवल एक फिल्मी विलेन से नहीं लड़ रहा होता, बल्कि वह समकालीन समाज में मौजूद कट्टरता और भय के माहौल के खिलाफ एक मजबूत स्टैंड ले रहा होता है। यह मोड़ फिल्म को मनोरंजन के दायरे से निकालकर एक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना देता है।
      व्यावसायिक सिनेमा की इस शैली में लोकतंत्र की रक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था को रातों-रात या त्वरित फैसलों से बदलने का विचार कोई नया नहीं है। हिंदी फिल्म 'नायक' इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। एस शंकर के निर्देशन में बनी और अनिल कपूर द्वारा जीवंत की गई इस फिल्म में एक आम पत्रकार (शिवाजी राव) को एक दिन का मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिलता है। समय की अत्यधिक बाध्यता के कारण शिवाजी राव औपचारिकताओं के जाल में उलझने के बजाय रास्ते चलते कड़े और त्वरित आदेश जारी करता है। भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों को निलंबित करना, राशन की दुकानों में कालाबाजारी रोकना और आम जनता की समस्याओं का मौके पर ही निवारण करना जैसी उसकी शैली ने जनता को एक काल्पनिक लेकिन बेहद संतोषजनक राहत दी थी। 'नायक' ने दिखाया था कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो और नीतियां स्पष्ट हों, तो व्यवस्था में सुधार असंभव नहीं है।
      इसी तरह की लोकतांत्रिक चेतना और व्यवस्था से टकराव की भावना अमिताभ बच्चन की फिल्म 'इंकलाब' में भी देखने को मिली है। आठवें दशक के उस दौर में जब राजनीति और अपराध का गठजोड़ चरम पर था, 'इंकलाब' का नायक भ्रष्टाचार और राजनीतिक सड़न को मिटाने के लिए अतिवादी, लेकिन लोकतांत्रिक शुद्धिकरण का रास्ता चुनता है। इसी कड़ी में प्रकाश झा की फिल्म 'राजनीति' और 'सत्याग्रह' का नाम भी प्रमुखता से लिया जा सकता है। 'सत्याग्रह' में अमिताभ बच्चन और अजय देवगन का किरदार एक समानांतर व्यवस्था खड़ी करके सरकार को जनहित में कड़े फैसले लेने पर मजबूर करता है। वहीं दूसरी ओर, 'युवा' और 'रंग दे बसंती' जैसी फिल्मों ने यह दिखाया कि जब तक देश की युवा शक्ति राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनती या व्यवस्था के खिलाफ आवाज नहीं उठाती, तब तक सच्चा लोकतंत्र कायम नहीं हो सकता। इन सभी फिल्मों का मूल संदेश यही रहा है कि एक नायक अपनी निडरता और फैसलों से कैसे एक पूरी भ्रष्ट व्यवस्था को चुनौती देकर जनता के अधिकारों की रक्षा कर सकता है।
     वास्तविक जीवन में भी जब कभी लोकतंत्र पर संकट आया है या जनता के अधिकारों का हनन हुआ, तब ऐसी ही नाटकीय और ऐतिहासिक घटनाएं सड़कों पर घटित हुई हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुआ छात्र आंदोलन इसी तरह की जन-चेतना का एक उदाहरण है। सिनेमा कहानियों और इस तरह के जमीनी आंदोलनों में फर्क सिर्फ इतना होता है कि फिल्मों में नायक प्रायः अकेला होता है, जो पूरी व्यवस्था से टकरा जाता है। जबकि, वास्तविक आंदोलनों में नायक अकेला नहीं होता, उसके पीछे एक जागरूक जनसमूह और युवाओं की एक बड़ी फौज होती है। जंतर-मंतर पर जुटे छात्रों ने भी अपने उस मंतव्य को पूरा करने के लिए शांतिपूर्ण और संवैधानिक संघर्ष किया, जिसके लिए वह आंदोलन शुरू हुआ था। यह आंदोलन साबित करता है कि लोकतंत्र केवल मतपेटी तक सीमित नहीं है, बल्कि जब नागरिक अपने अधिकारों के लिए सजग होकर खड़े होते हैं, तभी लोकतंत्र वास्तव में जीवित और सुरक्षित रहता है।
      चाहे फिल्म का 'नायक' का एक दिन का मुख्यमंत्री हो, 'सत्याग्रह' का जन-आंदोलन हो या फिर 'जना नायकन' का लोकतंत्र रक्षक थलपति वेट्री कोंडन। सिनेमा हमेशा से जनता की इस गहरी इच्छा को व्यक्त करता आया है कि कोई आए और इस तंत्र की कमियों को दूर करे। 'जना नायकन' मसाला सिनेमा के तमाम तामझाम, एक्शन दृश्यों और पारिवारिक भावनाओं के बीच भी लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों समानता, भयमुक्त समाज और धार्मिक सौहार्द की वकालत करती है। यह फिल्म इस बात का प्रतीक है कि जब सिनेमा व्यावसायिकता के साथ-साथ एक राजनीतिक और लोकतांत्रिक दायित्व को अपने कंधों पर उठाता है, तो वह केवल एक मनोरंजन का साधन न रहकर समाज के लिए एक प्रेरणा बन जाता है।
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जब परदे पर बुलंद हुआ युवाओं का आक्रोश



हिंदी फिल्मकारों ने तात्कालिक मुद्दों और विविध कथानकों पर भी फ़िल्में बनाकर अपनी सामाजिक जवाबदेही व्यक्त करने का मौका नहीं गंवाया। छात्र आंदोलन भी एक ऐसा ही विषय है, जिस पर अलग-अलग संदर्भो में फ़िल्में बनी। ये फिल्में इसलिए महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि उन्होंने छात्र आंदोलनों को केवल भीड़, नारे और टकराव के रूप में नहीं दिखाया, बल्कि उन्हें लोकतंत्र की जीवंत धड़कन, युवा चेतना की अभिव्यक्ति और सामाजिक परिवर्तन की प्रेरक शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। यही कारण है कि समय बदलने के बावजूद इन फिल्मों की प्रासंगिकता बनी हुई है। हर नया छात्र आंदोलन, हर नई बहस और हर नई पीढ़ी इन फिल्मों को नए अर्थों में पढ़ती और समझती है। यही किसी भी चर्चित फिल्म की पहचान होती है कि वह अपने समय से आगे निकलकर आने वाली पीढ़ियों के लिए भी विचार का विषय बनी रहे। इस तरह की फ़िल्में सिर्फ छात्रों के आंदोलनों, लोकतांत्रिक असहमति तक ही सीमित नहीं रही, ये युवा चेतना का सिनेमाई दस्तावेज भी है। 
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- हेमंत पाल

   लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी विविधता और असहमति को स्वीकार करने की क्षमता मानी जाती है। यही कारण है कि यहां विरोध-प्रदर्शन केवल राजनीतिक गतिविधि नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का एक स्वाभाविक और संवैधानिक हिस्सा माना जाता है। देश के इतिहास पर नजर डालें तो आजादी के आंदोलन से लेकर जेपी आंदोलन, मंडल आयोग के विरोध और समर्थन, भ्रष्टाचार विरोधी अभियानों, विश्वविद्यालयों के छात्र संघर्षों और शिक्षा से जुड़े आंदोलनों तक युवाओं ने हर दौर में अपनी निर्णायक भूमिका निभाई है। जब-जब युवाओं ने व्यवस्था से सवाल पूछे, तब-तब साहित्य, रंगमंच और सिनेमा ने भी उन सवालों को अपने-अपने ढंग से अभिव्यक्ति दी। हिंदी सिनेमा ने भी कई बार उन बेचैनियों, संघर्षों और सपनों को बड़े पर्दे पर उतारा है, जो किसी भी छात्र आंदोलन या जनप्रतिरोध की असली ऊर्जा होते हैं।
   दिलचस्प बात यह है कि हिंदी फिल्मों में छात्र आंदोलनों को केवल नारों, रैलियों और प्रदर्शन तक सीमित नहीं रखा गया। इन फिल्मों ने यह समझने की कोशिश की कि आखिर युवा विरोध क्यों करता है, व्यवस्था से उसका टकराव किन कारणों से पैदा होता है, छात्र राजनीति किस तरह लोकतंत्र को मजबूत भी करती है और कई बार उसकी कमजोरियों का शिकार भी बन जाती है। कहीं आदर्शवाद दिखाई देता है, कहीं सत्ता की महत्वाकांक्षा, कहीं सामाजिक न्याय की लड़ाई और कहीं व्यवस्था परिवर्तन का सपना। इसलिए छात्र आंदोलनों पर बनी फिल्में केवल अपने समय की कहानी नहीं कहतीं, बल्कि वे भारतीय लोकतंत्र की बदलती सामाजिक और राजनीतिक चेतना का भी दस्तावेज बन जाती हैं।
   जब भी हिंदी सिनेमा में छात्र आंदोलनों की चर्चा होती है तो सबसे पहले 'रंग दे बसंती' (2006) का नाम सामने आता है। राकेश ओमप्रकाश मेहरा की यह फिल्म केवल एक सफल व्यावसायिक फिल्म नहीं, बल्कि एक सामाजिक और सांस्कृतिक घटना साबित हुई। आमिर खान, सिद्धार्थ, कुणाल कपूर, शरमन जोशी, अतुल कुलकर्णी, आर माधवन और सोहा अली खान अभिनीत इस फिल्म ने युवाओं के भीतर छिपे असंतोष को अभूतपूर्व तरीके से अभिव्यक्ति दी। कहानी कुछ ऐसे युवाओं से शुरू होती है जिनके लिए जीवन मौज-मस्ती का दूसरा नाम है, लेकिन वायुसेना के एक पायलट मित्र की मौत और उससे जुड़े भ्रष्टाचार के खुलासे के बाद उनका नजरिया पूरी तरह बदल जाता है। फिल्म की सबसे बड़ी ताकत यह है कि वह भगत सिंह और उनके साथियों के स्वतंत्रता संग्राम को वर्तमान पीढ़ी के संघर्ष से जोड़ती है। अतीत और वर्तमान का यह समानांतर कथानक दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि हर दौर का युवा अन्याय के खिलाफ अपनी भाषा और अपने तरीके से आवाज उठाता है। फिल्म ने यह भी स्थापित किया कि जब संस्थाएं जवाबदेह नहीं रहतीं तो नागरिक प्रतिरोध जन्म लेता है। यही कारण है कि पिछले दो दशकों में जब भी किसी बड़े छात्र या युवा आंदोलन की चर्चा हुई, 'रंग दे बसंती' का उल्लेख स्वतः होने लगा।
   ऐसी ही एक फिल्म 'युवा' (2004) लोकतांत्रिक भागीदारी का घोषणा पत्र कही जा सकती है। मणिरत्नम ने इस फिल्म में छात्र राजनीति को नकारात्मक दृष्टि से नहीं, बल्कि परिवर्तन के साधन के रूप में देखा। अजय देवगन का छात्र नेता माइकल मुखर्जी युवाओं को यह संदेश देता है कि राजनीति गंदी है कहकर उससे दूर भागना समस्या का समाधान नहीं है। यदि ईमानदार और शिक्षित युवा राजनीति से दूर रहेंगे तो व्यवस्था पर वही लोग हावी होंगे जिनकी आलोचना की जाती है। अभिषेक बच्चन और विवेक ओबेरॉय के किरदार भी इस विचार को मजबूत करते हैं कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं, बल्कि समाज निर्माण का भी रास्ता हो सकती है। फिल्म की प्रासंगिकता आज इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि वर्तमान समय में भी युवाओं की राजनीतिक भागीदारी और लोकतांत्रिक जिम्मेदारी पर लगातार बहस होती रहती है।
      सुधीर मिश्रा की 'हजारों ख्वाहिशें ऐसी' (2005) छात्र आंदोलनों के वैचारिक पक्ष को सबसे गहराई से समझने वाली फिल्मों में शामिल है। यह फिल्म 1970 के दशक की उथल-पुथल, आपातकाल, नक्सल आंदोलन और सामाजिक असमानता की पृष्ठभूमि में तीन युवाओं के जीवन को प्रस्तुत करती है। केके मेनन, शाइनी आहूजा और चित्रांगदा सिंह के पात्र केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से संचालित नहीं होते, बल्कि वे अपने समय के सामाजिक और राजनीतिक प्रश्नों से गहराई से प्रभावित हैं। फिल्म यह दिखाती है कि आदर्शवाद की कीमत अक्सर व्यक्तिगत सुख, करियर और पारिवारिक जीवन से चुकानी पड़ती है। यही कारण है कि यह फिल्म किसी आंदोलन का महिमामंडन नहीं करती, बल्कि उसके भीतर मौजूद अंतर्विरोधों, भ्रमों और मानवीय त्रासदियों को भी सामने लाती है।
   अनुराग कश्यप की 'गुलाल' (2009) छात्र राजनीति के उस पक्ष को उजागर करती है, जिसके बारे में आमतौर पर कम बात होती है। विश्वविद्यालय परिसर में विचारधाराओं की टकराहट, क्षेत्रीय अस्मिता, जातीय समीकरण, सत्ता की महत्वाकांक्षा और हिंसा ये सभी तत्व फिल्म में बेहद तीखे ढंग से सामने आते हैं। फिल्म बताती है कि छात्र राजनीति केवल आदर्शवाद का मंच नहीं होती, बल्कि कई बार वही राजनीति बाहरी शक्तियों, अपराध और सत्ता संघर्ष का अखाड़ा भी बन जाती है। अनुराग कश्यप ने विश्वविद्यालय को समाज का लघु रूप मानते हुए दिखाया कि जो संघर्ष देश की राजनीति में दिखाई देते हैं, उनकी झलक परिसर की राजनीति में भी मिलती है। इसी तरह 'हासिल' (2003) उत्तर भारत के विश्वविद्यालयों, विशेषकर इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति का यथार्थवादी चित्र प्रस्तुत करती है। 
     तिग्मांशु धूलिया निर्देशित इस फिल्म में जिमी शेरगिल का आदर्शवादी छात्र और इरफान खान का महत्वाकांक्षी छात्र नेता दो अलग-अलग राजनीतिक संस्कृतियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। फिल्म का सबसे बड़ा योगदान यह है कि वह छात्र राजनीति के अपराधीकरण को बिना किसी लाग-लपेट के दिखाती है। चुनाव, बाहुबल, हिंसा और राजनीतिक संरक्षण किस तरह शिक्षा संस्थानों के वातावरण को प्रभावित करते हैं, यह फिल्म प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। इरफान खान का अभिनय इस फिल्म को एक स्थायी पहचान देता है।
   प्रकाश झा की 'आरक्षण' (2011) ने शिक्षा और सामाजिक न्याय जैसे अत्यंत संवेदनशील विषय को केंद्र में रखा। भारत में आरक्षण केवल एक नीति नहीं, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक विमर्श का विषय रहा है। अमिताभ बच्चन, सैफ अली खान, दीपिका पादुकोण, मनोज बाजपेयी और प्रतीक बब्बर अभिनीत यह फिल्म दिखाती है कि जब शिक्षा संबंधी नीतियां बदलती हैं तो उसका प्रभाव केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा समाज उससे प्रभावित होता है। फिल्म में विरोध-प्रदर्शन, बहस और वैचारिक संघर्ष के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया कि लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उनका समाधान संवाद और संवैधानिक प्रक्रिया के भीतर ही तलाशा जाना चाहिए। प्रकाश झा की 'सत्याग्रह' (2013) भले ही सीधे छात्र आंदोलन पर आधारित नहीं है, लेकिन इसमें युवा शक्ति की सक्रिय भागीदारी महत्वपूर्ण है। यह फिल्म भ्रष्टाचार के खिलाफ जन आंदोलन की पृष्ठभूमि में बनी थी। अमिताभ बच्चन का किरदार उस नैतिक शक्ति का प्रतीक है, जिसके साथ बड़ी संख्या में युवा जुड़ते हैं। फिल्म यह बताती है कि आधुनिक दौर में मीडिया, सोशल मीडिया और युवाओं की भागीदारी किसी भी जन आंदोलन को राष्ट्रीय स्वरूप दे सकती है। हालांकि फिल्म पर कुछ लोगों ने समकालीन आंदोलनों से अत्यधिक प्रेरित होने का आरोप लगाया, फिर भी इसने लोकतांत्रिक विरोध की शक्ति को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।
   'हुड़दंग' (2022) मंडल आयोग आंदोलन की पृष्ठभूमि पर बनी उन गिनी-चुनी फिल्मों में शामिल है, जिन्होंने 1990 के दशक के छात्र आंदोलनों को सिनेमाई रूप दिया। मंडल आयोग के फैसले ने भारतीय राजनीति और समाज दोनों को गहराई से प्रभावित किया था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों के माध्यम से फिल्म यह दिखाती है कि सरकारी नीतियों का असर केवल राजनीतिक विमर्श तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह युवाओं के सपनों, रिश्तों और भविष्य को भी प्रभावित करता है। फिल्म आंदोलन के मानवीय पक्ष को भी सामने लाती है। टीनू आनंद की 'मैं आज़ाद हूँ' (1989) विरोध की सामूहिक शक्ति को समझने के लिए आज भी प्रासंगिक फिल्म है। अमिताभ बच्चन द्वारा निभाया गया 'आजाद' का किरदार एक ऐसे आम नागरिक का प्रतीक बन जाता है, जिसकी ईमानदारी और साहस लाखों लोगों को अन्याय के खिलाफ खड़ा होने की प्रेरणा देता है। फिल्म का चरम दृश्य यह संदेश देता है कि किसी भी लोकतंत्र में जनता की सबसे बड़ी ताकत उसकी एकजुटता होती है।
    इन फिल्मों के अतिरिक्त कुछ अन्य फ़िल्में भी हैं, जिन्होंने प्रतिरोध और सामाजिक परिवर्तन की भावना को अलग-अलग रूपों में व्यक्त करती हैं। 'स्वदेस' व्यवस्था को बदलने के लिए सकारात्मक भागीदारी का रास्ता सुझाती है। 'रॉकेट सिंह: सेल्समैन ऑफ द ईयर' कॉरपोरेट जगत में नैतिक प्रतिरोध का उदाहरण पेश करती है। 'शंघाई' राजनीतिक साजिशों और जन आंदोलनों के बीच सत्ता की जटिलताओं को उजागर करती है। 'भीड़' सामाजिक संकट के दौरान नागरिक अधिकारों, प्रशासनिक संवेदनशीलता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गंभीर सवाल उठाती है। ये फिल्में भले ही छात्र राजनीति पर केंद्रित न हों, लेकिन व्यवस्था से संवाद और प्रतिरोध की संस्कृति को विस्तार देती हैं। हिंदी सिनेमा में छात्र आंदोलनों का चित्रण समय के साथ स्पष्ट रूप से बदला है। सत्तर और अस्सी के दशक में विरोध का स्वर मुख्यतः वैचारिक और सामाजिक असमानता के खिलाफ था। दो हजार के बाद की फिल्मों में भ्रष्टाचार, शिक्षा व्यवस्था, लोकतांत्रिक जवाबदेही, पहचान की राजनीति, आरक्षण, बेरोजगारी और संस्थागत संकट जैसे मुद्दे प्रमुख हो गए। नई पीढ़ी के फिल्मकारों ने आंदोलन को केवल भावनात्मक घटना नहीं माना, बल्कि उसके सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक आयामों को भी समझने का प्रयास किया।
   अधिकांश सफल फिल्में आंदोलन को किसी एक विचारधारा की विजय के रूप में प्रस्तुत नहीं करतीं। वे यह स्वीकार करती हैं कि हर आंदोलन के भीतर आदर्शवाद और अवसरवाद, दोनों मौजूद होते हैं। कहीं नेतृत्व ईमानदार होता है तो कहीं सत्ता की महत्वाकांक्षा उसे कमजोर कर देती है। यही संतुलित दृष्टि इन फिल्मों को विश्वसनीय बनाती है। वे दर्शकों को यह नहीं बतातीं कि किसका समर्थन किया जाए, बल्कि यह सोचने के लिए प्रेरित करती हैं कि लोकतंत्र में विरोध की मर्यादा, उद्देश्य और जिम्मेदारी क्या होनी चाहिए। आज जब देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में समय-समय पर शिक्षा, रोजगार, फीस, आरक्षण, प्रशासनिक नीतियों और सामाजिक मुद्दों को लेकर छात्र आंदोलन सामने आते हैं, तब इन फिल्मों की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। वे याद दिलाती हैं कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि जागरूक नागरिकों, सक्रिय युवाओं और जिम्मेदार संस्थाओं से मजबूत होता है। विरोध की आवाज तभी सार्थक होती है जब उसके पीछे सामाजिक सरोकार, नैतिक स्पष्टता और परिवर्तन की सकारात्मक दृष्टि हो।
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