भारतीय गणतंत्र के 75 सालों के दौर में हिंदी फिल्मों ने दर्शकों के मनोरंजन के साथ लोकतांत्रिक अधिकारों के संरक्षण को भी कथानक का केंद्र बनाया। ब्लैक एंड व्हाइट से डिजिटल दौर तक ये फिल्में न्याय, मताधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी पर जोर देती रहीं। 'रंग दे बसंती' (2006) जैसी फिल्म ने युवाओं को लोकतंत्र के प्रति उदासीनता से झकझोरा। यह फिल्म बैलेट की जगह बुलेट का विकल्प दिखाती है। लेकिन, अंततः जागरूकता पर समाप्त होती है। 'सत्याग्रह' (2013) ने अन्ना आंदोलन से प्रेरित होकर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन दिखाया। 'राजनीति' (2010) ने राजनीति का कच्चा चिट्ठा खोला, जहां सत्ता की भूख लोकतंत्र को निगल जाती है। 'वेलकम टू सज्जनपुर' (2008) ने ग्रामीण पंचायतों के व्यंग्य से महिलाओं के अधिकार उठाए। यही सिलसिला आज भी जारी है।
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- हेमंत पाल
सिनेमा ने जनता को जागरूक करने के कई काम किए। जनता के अधिकारों को खतरे से बचाने वाली कहानियों से भी सिनेमा ने हमेशा जागरूक किया। भ्रष्टाचार, जातिवाद और दमन के खिलाफ ये फ़िल्में संवैधानिक मूल्यों को मजबूत बनाती रही। इस कालखंड में सिनेमा ने लोकतांत्रिक अधिकारों जैसे वोट का अधिकार, अभिव्यक्ति की आजादी, समानता और न्याय को न केवल चित्रित किया, बल्कि दर्शकों को जागृत भी किया। ब्लैक एंड व्हाइट दौर की देशभक्ति फिल्मों से लेकर आधुनिक कोर्टरूम ड्रामे तक की ये कृतियां संविधान की मूल भावना को जीवंत बनाती रही। सिनेमा ही वो माध्यम है जिसने मनोरंजन के बहाने साढ़े सात दशकों के लोकतंत्र में बार-बार अधिकारों को चुनौती दी। भ्रष्टाचार, न्याय और नागरिक जागरूकता जैसे मुद्दों पर कथानक रचकर दर्शकों को सोचने पर मजबूर किया। आजादी के बाद ऐसी फिल्में न केवल बनीं, बल्कि पसंद भी की गई। ऐसे कथानक समाज का आईना बनकर लोकतंत्र की कमजोरियों को उजागर करती रहे। ऐसी कई फ़िल्में हैं, जिनके कथानक आजादी के बाद से अब तक लोकतांत्रिक मूल्यों को कुरेदते नजर आए हैं।
आजादी के ठीक बाद फिल्मों ने लोकतांत्रिक अधिकारों को स्वतंत्रता संग्राम की विरासत से जोड़ा। 1950-60 के दशक में चेतन आनंद की 'हल्दीघाटी' (1968) ने राजपूत शौर्य के माध्यम से राष्ट्रीय एकता पर जोर दिया। लेकिन, असल में यह लोकतंत्र की एकता में विविधता को दर्शाती फिल्म थी। 'शहीद' (1965) जैसी पुरानी फिल्मों का प्रभाव भी यहां दिखा, जहां लोकतंत्र को बलिदान से जोड़ा गया। इसी काल की 'आम्रपाली' (1966) ने व्यक्तिगत अधिकारों और राज्य की नैतिकता पर सवाल उठाए। मनोज कुमार की 'उपकार' (1967) का कथानक ग्रामीण लोकतंत्र को किसान के अधिकारों से जोड़ता नजर आया, जहां हीरो गांव की पंचायत प्रणाली को मजबूत बनाता है। 'पूरब और पश्चिम' (1970) ने लोकतांत्रिक भारत की वैश्विक छवि बनाई, वह भी पश्चिमी भौतिकवाद के विरुद्ध भारतीय मूल्यों को स्थापित करते हुए। ये फिल्में नेहरू युग के समाजवादी लोकतंत्र को मजबूत करने वाली थी और दर्शकों में मताधिकार के महत्व को जगाती थी। आजादी के बाद की फिल्मों ने नेहरू युग के आशावादी लोकतंत्र को दर्शाया। 'जागृति' (1954) बच्चों के माध्यम से नागरिक कर्तव्यों और अधिकारों को सिखाती है, जहां युवा पात्र संवैधानिक मूल्यों को आत्मसात करते दिखते हैं। 'अब दिल्ली दूर नहीं' (1957) में एक बच्चा प्रधानमंत्री के पास न्याय मांगने जाता है, जो राज्य की जवाबदेही और आम नागरिक के अधिकार को रेखांकित करता है। 'श्री 420' (1955) भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष दिखाकर आर्थिक समानता के लोकतांत्रिक आदर्श को उजागर करती है। जबकि 'दो बीघा ज़मीन' (1953) ग्रामीण भारत की उपेक्षा पर राज्य की उदासीनता पर प्रहार करती है।
सिनेमा के 1960-70 के दौर को संक्रमण का काल कहा जाता है। इस दौर में सिनेमा अधिक यथार्थवादी हो गया था। 'लीडर' (1964) में दिलीप कुमार ने ऐसे राजनेता की भूमिका निभाई, जो भ्रष्ट राजनीति के बीच ईमानदारी की लड़ाई लड़ते हैं। 'आज़ादी की ओर' जैसी फिल्में वोटिंग और चुनाव प्रक्रिया पर केंद्रित रही, वह भी दर्शकों को मताधिकार के महत्व का बोध कराती हुईं। मंथन (1976) सहकारी आंदोलन के ज़रिए सामूहिक अधिकारों और ग्रामीण सशक्तिकरण को चित्रित करती है, जो दुग्ध किसानों को दलालों से मुक्ति दिलाने पर आधारित है। इसके बाद 1980 से 90 का दौर सामाजिक न्याय की लहर रहा। रंगीन सिनेमा के आगमन के साथ मुद्दे गहराए। 'परिणीता' और 'सौतेला भाई' जैसी फ़िल्में सामाजिक असमानता पर आधारित थी। लेकिन, फूलन देवी की 'बैंडिट क्वीन' (1994) की कहानी ने जातिगत उत्पीड़न और दलित अधिकारों को बेबाकी से उजागर किया। यह फिल्म पुलिस अत्याचार और महिलाओं के न्यायिक अधिकारों पर भी केंद्रित रही, जो संविधान के अनुच्छेद 14-21 को प्रतिबिंबित करती है।
फिल्मों में भ्रष्टाचार और आरक्षण पर बहस का समयकाल 2000 के दशक में आया। आर्थिक उदारीकरण के बाद सिनेमा ने संस्थागत विफलताओं पर निशाना साधा। प्रकाश झा की फिल्म 'आरक्षण' (2011) अनुच्छेद 16 पर आधारित बहस छेड़ती है, जहां अमिताभ बच्चन शिक्षकों के आरक्षण अधिकारों की पैरवी करते नजर आए। 'सत्याग्रह' (2013) अन्ना हजारे आंदोलन से प्रेरित होकर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन दर्शाती है, जो शांतिपूर्ण तरीके से असेंबली के अधिकार (अनुच्छेद 19) को रेखांकित करती है। लेकिन, इसके बाद अधिकारों की बात को दर्शकों को ज्ञान देने वाले कथानकों से अलग किया गया। ऐसे में आई समकालीन युग की कोर्टरूम और चुनावी व्यंग्य वाली फ़िल्में। 'जॉली एलएलबी' (2013) जैसी फिल्मों की सीरीज न्यायपालिका की खामियों पर कटाक्ष करती है। जबकि, 'पिंक' (2016) ने महिलाओं के 'नो मीन्स नो' अधिकार को मजबूती दी। 2019 में आई फिल्म 'आर्टिकल 15' दलित अत्याचार पर अनुच्छेद 15 का उल्लंघन दिखाती है। 2021 की फिल्म 'जय भीम' आदिवासी न्याय पर केंद्रित कथानक रहा। इसके बीच 'अलीगढ़' (2015) निजता और यौनिकता के अधिकारों को रेखांकित करती फिल्म है। कहा जा सकता है कि हाल की फिल्में अधिक साहसी हैं। 'न्यूटन' (2017) छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाके में वोटिंग के संघर्ष को चित्रित करती है, जहां राजकुमार राव का पात्र लोकतंत्र की नाजुकता उजागर करता है।
ब्लैक एंड व्हाइट से डिजिटल तक, सिनेमा ने संविधान को जीवंत किया, भ्रष्टाचार से लेकर जातिवाद तक चुनौतियों पर बहस छेड़ी। आज ध्रुवीकरण के दौर में सिनेमा को सतर्क रहना होगा। ये कृतियाँ साबित करती हैं कि लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं, अधिकारों का संरक्षण है। सिनेमा ने 75 वर्षों में जागृति का उजाला बनकर लोकतंत्र को मजबूत किया। फिल्मों ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए दर्शकों को निष्क्रिय उपभोक्ता से सक्रिय नागरिक बनाया। 'स्वदेश' (2004) ग्रामीण विकास और नागरिक कर्तव्य पर जोर देती है। 'मुल्क' (2018) अल्पसंख्यक अधिकारों की पैरवी करती है। 'अलीगढ़' (2015) धारा 377 हटाने से निजता अधिकार बचाती है। 'न्यूटन' (2017) नक्सल क्षेत्र में मताधिकार (अनुच्छेद 326) की रक्षा पर आधारित है। 'आर्टिकल 15' (2019) जातिगत भेदभाव के विरुद्ध अनुच्छेद-15 लागू कराती है। 'मुल्क' (2018) अनुच्छेद 20(3) के तहत निर्दोषता का अधिकार उजागर करता है। 'सेक्शन 375' (2019) महिलाओं के यौन अपराध अधिकारों पर केंद्रित है। 'जय भीम' (2021) आदिवासी अधिकारों की पुलिस हिंसा से रक्षा करती है। 'जॉली एलएलबी 2' (2017) न्यायिक भ्रष्टाचार से आम जनता बचाती है। 2026 तक 'बस्तर' जैसी फिल्में नक्सलवाद में लोकतंत्र बचाने पर आती हैं।
देश की आजादी के बाद की फिल्मों ने राष्ट्र निर्माण के साथ ही अधिकारों के संरक्षण पर भी फोकस किया। 1951 में आई राज कपूर की फिल्म 'आवारा' में राज (राज कपूर) का मुकदमा सामाजिक न्याय की मांग करता है, जहां अदालत गरीबी के खिलाफ खड़ी होती है। 'दो आंखें बारह हाथ' (1957) सुधारगृह के माध्यम से पुनर्वास का अधिकार दिखाता है। 'कागज के फूल' (1959) कलाकार के अभिव्यक्ति अधिकार पर चिंतन करता है। 'साहिब बीवी और गुलाम' (1962) महिलाओं के अधिकारों की उपेक्षा पर प्रहार करता है। जबकि, 1970 में आई फिल्म 'मंथन' में सहकारिता ग्रामीण आर्थिक अधिकार बचाती है। इसके बाद के दशक में न्याय व्यवस्था की पड़ताल की गई। 'क्रांति' (1981) ब्रिटेन के लोकतंत्र की कमियों को उजागर करती है। 'अधिकार' (1986) में राजेश खन्ना अपनी भूमिका में संपत्ति व पारिवारिक अधिकारों का संरक्षण दर्शाते हैं। 'लाल बादशाह' (1990) में अमिताभ बच्चन भ्रष्टाचार से आम आदमी के अधिकार बचाते हैं। ये फिल्में न्यायपालिका को लोकतंत्र का रक्षक बताती हैं। इसके बाद में दशक में आई 'गंगाजल' (2003) पुलिस दमन से न्याय की लड़ाई दिखाती है। जबकि, 'आरक्षण' (2011) (अनुच्छेद 16) के बहाने वंचितों के अधिकार संरक्षण पर बहस छेड़ती है। 'सत्याग्रह' (2013) अनुच्छेद 19 के तहत आंदोलन से भ्रष्टाचार रोकने का संदेश देती है।
इंदिरा गांधी के आपातकाल (1975-77) को भी सिनेमा ने नहीं छोड़ा और लोकतंत्र के संकट से रूबरू कराया। 'जंजीर' (1973) ने गुस्सैल हीरो के जरिए प्रशासनिक विफलता दिखाई, जो न्यायिक अधिकारों की मांग करता है। 'दीवार' (1975) ने दो भाइयों के माध्यम से वर्ग असमानता उजागर की, जहां गरीब का लोकतांत्रिक अधिकार कुचला जाता है। मनोज कुमार की 'क्रांति' (1974) ने आजादी की जंग को वर्तमान भ्रष्टाचार से जोड़ा। जबकि 'रोटी कपड़ा और मकान' (1974) ने आर्थिक अधिकारों पर ज्यादा जोर दिया। 1980 के दशक में 'अंदाज अपना अपना' जैसी फिल्मों ने व्यंग्य के जरिए राजनीतिक भ्रष्टाचार पर व्यंग्य कसा। उदारीकरण के दौर में भी सिनेमा ने आर्थिक लोकतंत्र पर फोकस किया। 'दामिनी' (1997) ने महिलाओं के न्यायिक अधिकारों को केंद्र में रखा, जहां एक साधारण महिला पूरे सिस्टम से टकराती है। 'सरफरोश' (1999) ने लोकतंत्र की सुरक्षा को रेखांकित करते हुए आतंकवाद के खिलाफ खुफिया तंत्र की भूमिका दिखाई। 'गुलाम' (1998) ने गुंडा राज के विरुद्ध व्यक्तिगत विद्रोह दिखाया, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी पर चोट करता है। 'मिशन कश्मीर' (2000) ने क्षेत्रीय अधिकारों और एकता पर बहस छेड़ी। ये कथानक दर्शकों को वोट की ताकत याद दिलाते रहे।
2010 के बाद समकालीन चुनौतियां
प्रकाश झा की फ़िल्में जैसे 'राजनीति' और 'चक्रव्यूह' (2012) ने नक्सलवाद और कॉर्पोरेट लॉबी को लोकतंत्र से जोड़ा। 'उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक' (2019) और 'आर्टिकल 370' (2024) ने राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर लोकतांत्रिक निर्णयों को सकारात्मक चित्रित किया। 'बस्तर: द नक्सल स्टोरी' (2024) ने नक्सली हिंसा के पीछे राजनीतिक संरक्षण दिखाया, जहां पुलिस अधिकारी सिस्टम से टकराती है। 'शूल' (1999) और 'इंकलाब' (1984) का प्रभाव यहां दिखता है, जहां हीरो पूरे कैबिनेट को चुनौती देता है। ये फिल्में दर्शकों को जागरूक करने में सफल रहीं, लेकिन कई बार हिंसा को वैगलोराइज कर लोकतंत्र पर अविश्वास पैदा किया। 'रंग दे बसंती' ने युवा वोटिंग बढ़ाया, जबकि 'न्यूटन' ने चुनावी प्रक्रिया की गरिमा दिखाई। फिर भी, भ्रष्ट नेता का स्टीरियोटाइप लोकतंत्र के प्रति निराशा फैलाता है। सिनेमा ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग कर अधिकारों को कुरेदा, लेकिन समाधान हमेशा संस्थागत रहा। हिंदी सिनेमा ने लोकतंत्र को आईना दिखाया, कथानकों से दर्शकों को मताधिकार, न्याय और समानता की याद दिलाई। भविष्य में ऐसी फिल्में और गहन होनी चाहिए।
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