Saturday, March 21, 2026

रिश्तों में नोकझोंक के दिलचस्प कथानक

   हिंदी सिनेमा को भारतीय समाज का दर्पण माना जाता रहा है। फिल्मों में दिखाई जाने वाली पारिवारिक कहानियां केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने समाज के रिश्तों, मूल्यों और संघर्षों को भी चित्रित किया। विशेष रूप से पति-पत्नी के रिश्तों में आने वाला तनाव और नोकझोंक फिल्मों का एक प्रमुख विषय रहा। भारतीय सिनेमा ने हमेशा समाज के रिश्तों को परदे पर उतारने की कोशिश की है। पति-पत्नी के रिश्ते को लेकर हिंदी फिल्मों में लंबे समय से कहानियां रची जाती रही। ब्लैक एंड व्हाइट दौर से लेकर आज के रंगीन और आधुनिक दौर तक कई फिल्मों के कथानक वैवाहिक जीवन के तनाव, गलतफहमियों, आपसी अहं और भावनात्मक टकराव के इर्द-गिर्द बुने गए हैं। लेकिन, रब ने बना दी जोड़ी, मर्दानी और 'तुम्हारी सुलू' जैसी फ़िल्में भी हैं जो रिश्तों में आपसी समझ दर्शाती हैं। 
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- हेमंत पाल

     ब्लैक एंड व्हाइट दौर से लेकर रंगीन सिनेमा और आधुनिक फिल्मों तक, कई फिल्मकारों ने पति-पत्नी के बीच के मतभेदों, गलतफहमियों, आर्थिक संकट, सामाजिक दबाव, तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण पैदा होने वाले तनाव को परदे पर उतारा है। इन फिल्मों में रिश्तों की कड़वाहट को दिखाया गया। लेकिन, दिलचस्प बात यह रही कि इनका अंत अक्सर सुखद और मेल-मिलाप से भरा हुआ होता था। समय के साथ समाज में वैवाहिक संबंधों की जटिलताएं बढ़ीं, लेकिन विडंबना यह है कि हिंदी सिनेमा से पति-पत्नी के तनावपूर्ण रिश्तों की पारंपरिक पारिवारिक कहानियां धीरे-धीरे कम होती चली गईं। आज की फिल्मों में प्रेम, ब्रेकअप या लिव-इन जैसे विषयों पर अधिक ध्यान है, जबकि विवाह के भीतर के संघर्षों पर आधारित पारिवारिक कथानक अपेक्षाकृत कम देखने को मिलते हैं।
    1950 और 1960 का दशक हिंदी सिनेमा का स्वर्णिम दौर माना जाता है। इस समय की फिल्मों में पारिवारिक रिश्तों की गहराई और सामाजिक मूल्यों को प्रमुखता से दिखाया गया। इस दौर में पति-पत्नी के बीच तनाव अक्सर सामाजिक परिस्थितियों, आर्थिक तंगी या पति के गलत निर्णयों के कारण पैदा होता था। फिल्मों में पत्नी को अक्सर धैर्य, त्याग और सहनशीलता का प्रतीक बनाया गया। उदाहरण के लिए फिल्म 'साहिब बीबी और गुलाम' (1962) में एक ऐसे जमींदार परिवार की कहानी दिखाई गई, जहां पति की शराब और अय्याशी की आदत पत्नी के जीवन को दुखों से भर देती हैं। पत्नी अपने पति का प्रेम पाने के लिए संघर्ष करती है, लेकिन उसका जीवन त्रासदी में बदल जाता है। इसी तरह 'घराना' (1961) और 'गृहस्थी' (1963) जैसी फिल्मों में संयुक्त परिवार और वैवाहिक जीवन के संघर्षों को संवेदनशील तरीके से दिखाया गया। इन फिल्मों की खास बात यह थी कि भले ही पति-पत्नी के बीच मतभेद दिखाए जाते थे, लेकिन परिवार और समाज के दबाव के कारण अंततः रिश्ते को बचाने की कोशिश होती थी।
   हिंदी फिल्मों में कई बार आर्थिक संकट को पति-पत्नी के रिश्तों में तनाव की बड़ी वजह के रूप में दिखाया गया। 1970 और 1980 के दशक की कई फिल्मों में मध्यमवर्गीय परिवारों के संघर्ष को दिखाया गया। बेरोजगारी, कम आय, बढ़ती जिम्मेदारियां और सामाजिक दबाव पति-पत्नी के बीच तनाव पैदा करते थे। लेकिन, 'अभिमान' (1973) में अलग तरह की कहानी रची गई। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी के अहं का टकराव दोनों में अलग होने की वजह बन जाता है। फिल्म में पति-पत्नी दोनों ही गायक हैं, लेकिन पत्नी की सफलता पति के अहंकार को चोट पहुंचाती है और रिश्ते में दरार पैदा हो जाती है। यह कहानी बताती है कि पेशेवर प्रतिस्पर्धा भी वैवाहिक जीवन को प्रभावित कर सकती है। इसी तरह 'आंधी' (1975) में राजनीतिक महत्वाकांक्षा और व्यक्तिगत जीवन के बीच टकराव को दिखाया गया। पति-पत्नी अलग हो जाते हैं, लेकिन सालों बाद उनके रिश्ते की भावनात्मक गहराई सामने आती है।
    हिंदी फिल्मों में पति-पत्नी के बीच तनाव का एक प्रमुख कारण तीसरे व्यक्ति का आ जाना भी रहा है फिल्म 'अर्थ' (1982) में विवाहेतर संबंधों के कारण टूटते रिश्तों की कहानी दिखाई गई। इसमें पत्नी अपने आत्मसम्मान के लिए पति से अलग होने का निर्णय लेती है। यह उस दौर की फिल्मों से अलग था जहां  अंत में मेल-मिलाप दिखाया जाता था। इसी तरह अमिताभ, रेखा और जया की फिल्म 'सिलसिला' (1981) में प्रेम, विवाह और समाज के बीच उलझे रिश्तों को दिखाया गया। इस फिल्म में भी पति-पत्नी के बीच तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी रिश्तों में तनाव पैदा करती है। इन फिल्मों ने यह दिखाया कि विवाह केवल सामाजिक संस्था नहीं बल्कि भावनात्मक और व्यक्तिगत संघर्षों से भी भरा होता है।
   1950 और 1960 के दशक के ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा में भी पति-पत्नी के रिश्तों की जटिलता को संवेदनशील तरीके से दिखाया गया। उदाहरण के तौर पर में एक उपेक्षित पत्नी की पीड़ा और पति की उदासीनता को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया था। इसी तरह में विवाह के बाद भी पुराने प्रेम संबंधों की वजह से पैदा हुए तनाव को भी कथानक बनाया गया। इन फिल्मों में रिश्तों के भीतर की खामोश दरारों को सामाजिक मर्यादाओं के साथ चित्रित किया गया। 1970 और 1980 के दशक में वैवाहिक रिश्तों की उलझनों को और खुलकर दिखाया। इन फिल्मों में पति के विवाहेतर संबंध के कारण टूटते रिश्ते और पत्नी के आत्मसम्मान की कहानी सामने आई। वहीं में प्रेम, विवाह और सामाजिक जिम्मेदारियों के बीच संघर्ष को दर्शाया गया। इन फिल्मों में तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी अक्सर पति-पत्नी के बीच तनाव का मुख्य कारण बनती है।
    दिलचस्प बात यह है कि अधिकांश हिंदी फिल्मों में भले ही कहानी का बड़ा हिस्सा पति-पत्नी के कटु रिश्तों, गलतफहमियों या किसी तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी से पैदा हुए तनाव पर आधारित रहा हो, लेकिन उनका अंत अक्सर सुखद ही रहा। फिल्मकारों ने अंत में रिश्तों के पुनर्मिलन, समझदारी या आत्मबोध के जरिए एक सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की। दरअसल, हिंदी सिनेमा का यह रुझान भारतीय समाज की उस सोच को भी दर्शाता है जिसमें विवाह को केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि एक सामाजिक संस्था माना जाता है। इसलिए फिल्में रिश्तों के संकट को दिखाती जरूर हैं, लेकिन अंत में उन्हें संभालने की उम्मीद भी छोड़ती हैं। यही कारण है कि ब्लैक एंड व्हाइट दौर से लेकर आज तक पति-पत्नी के तनावपूर्ण रिश्ते हिंदी फिल्मों की कहानियों का अहम हिस्सा बने हुए हैं।
    कुछ फिल्मों में मुस्लिम सामाजिक कथानक के भीतर तलाक या अलगाव की स्थिति को भी दिखाया गया। इसका प्रमुख उदाहरण है, जिसमें रिश्तों में संवेदनशीलता और गलतफहमी के कारण तलाक की स्थिति पैदा होती है। हालांकि कहानी अंततः रिश्तों और जिम्मेदारियों पर गंभीर सवाल भी खड़े करती है। नई सदी में भी यह विषय खत्म नहीं हुआ। और जैसी फिल्मों ने आधुनिक वैवाहिक जीवन में सम्मान, अपेक्षाओं और भावनात्मक दूरी को केंद्र में रखा। हिंदी सिनेमा में मुस्लिम सामाजिक फिल्मों की भी एक अलग परंपरा रही है। इन फिल्मों में विवाह, तलाक और सामाजिक मान्यताओं से जुड़े मुद्दों को दिखाया गया। फिल्म 'निकाह' (1982) इस संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें तलाक और वैवाहिक रिश्तों की जटिलताओं को संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया गया। फिल्म ने यह सवाल उठाया कि क्या तलाक केवल एक कानूनी प्रक्रिया है या इसके पीछे भावनात्मक और सामाजिक दर्द भी छिपा होता है। 
    हिंदी फिल्मों की एक प्रमुख विशेषता यह रही कि अधिकांश पारिवारिक फिल्मों का अंत सुखद होता था भले ही कहानी में पति-पत्नी के बीच कितने भी संघर्ष दिखाए जाएं, अंत में गलतफहमियां दूर हो जाती थीं और परिवार फिर से एक हो जाता था। इस प्रवृत्ति के पीछे भारतीय समाज की पारिवारिक संरचना और विवाह संस्था के प्रति सम्मान की भावना थी। दर्शक भी ऐसी कहानियां पसंद करते थे जिनमें अंत में रिश्ते बच जाते थे। यही कारण है कि 1960 से 1990 तक की कई फिल्मों में संघर्ष के बावजूद अंत में मेल-मिलाप दिखाई देता था। 1990 के बाद हिंदी सिनेमा में बड़े बदलाव आए। ग्लोबलाइजेशन, शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण फिल्मों के विषय भी बदलने लगे। इस दौर में रोमांटिक प्रेम कहानियां और युवा दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई गई फिल्में अधिक लोकप्रिय हुईं। हालांकि, 'अस्तित्व' (2000) जैसी कुछ फिल्मों ने विवाह के भीतर की जटिलताओं को गंभीरता से उठाया, लेकिन ऐसी फिल्में मुख्यधारा में कम ही बनीं। धीरे-धीरे पारिवारिक संघर्षों पर आधारित पारंपरिक कथानक सिनेमा से गायब होने लगे।
    आज समाज में तलाक, वैवाहिक विवाद और पारिवारिक तनाव पहले से अधिक दिखाई देते हैं। शहरी जीवन, करियर का दबाव, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के कारण पति-पत्नी के रिश्ते अधिक जटिल हो गए हैं। लेकिन, आश्चर्य की बात यह है कि हिंदी सिनेमा इन विषयों को इतनी गहराई से नहीं दिखा रहा जितना पहले दिखाया जाता था। अब फिल्मों में विवाह के बाद के संघर्षों की जगह प्रेम-कहानियों, ब्रेकअप या व्यक्तिगत स्वतंत्रता की कहानियों को अधिक महत्व दिया जा रहा है। हिंदी सिनेमा का इतिहास बताता है कि फिल्में हमेशा समाज के बदलावों के साथ बदलती रही हैं। संभव है कि आने वाले समय में फिल्मकार फिर से वैवाहिक रिश्तों की जटिलताओं को गंभीरता से पर्दे पर लाएँ। क्योंकि पति-पत्नी का रिश्ता भारतीय समाज की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है और इसमें आने वाले संघर्ष हमेशा कहानी कहने के लिए मजबूत आधार प्रदान करते हैं। यदि इन विषयों को संवेदनशीलता और यथार्थ के साथ प्रस्तुत किया जाए, तो वे दर्शकों को न केवल मनोरंजन बल्कि समाज को समझने का अवसर भी दे सकते हैं।
    ऐसी फिल्मों ने पति-पत्नी के रिश्तों को केवल पारिवारिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक विमर्श का विषय भी बनाया। कई फिल्मों में पति-पत्नी के बीच तनाव का कारण बच्चों की जिम्मेदारियां और परिवार की अपेक्षाएं भी रही हैं। फिल्म 'मासूम' (1983) में पति के अतीत से पैदा हुआ एक बच्चा परिवार में तनाव का कारण बनता है। पत्नी के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि क्या वह उस बच्चे को स्वीकार कर पाएगी। हिंदी सिनेमा ने ब्लैक-एंड-व्हाइट दौर से लेकर आधुनिक समय तक पति-पत्नी के रिश्तों की कई परतों को परदे पर उकेरा है। कभी आर्थिक संघर्ष, कभी अहंकार, कभी तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी और कभी पारिवारिक जिम्मेदारियों ने इन रिश्तों में तनाव पैदा किया। इन कहानियों की सबसे खास बात यह रही कि वे केवल संघर्ष नहीं दिखाती थीं, बल्कि रिश्तों को बचाने की कोशिश भी करती थीं। आज जबकि समाज में वैवाहिक रिश्तों की चुनौतियां बढ़ रही हैं, हिंदी सिनेमा के सामने यह अवसर है कि वह फिर से ऐसे विषयों को गंभीरता से उठाए और रिश्तों की जटिलताओं को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करे। क्योंकि, अंततः सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज के भावनात्मक इतिहास को दर्ज करने का भी माध्यम है।
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जब गीत की धुनों ने रची इतिहास की धुन!


     हिंदी फिल्मों के गीत केवल मनोरंजन नहीं होते, वे उस दौर की भावनाओं, रचनात्मकता और कलाकारों की जद्दोजहद की कहानी भी अपने भीतर समेटे होते हैं। कभी कोई गीत आखिरी वक्त में फिल्म में जुड़ता है और अमर हो जाता है, तो कभी बेहद लोकप्रिय गीत भी फिल्म से बाहर कर दिया जाता है। कई बार गीतों के मुखड़े और अंतरे पर महीनों बहस चलती है, तो कभी एक धुन अचानक पैदा होकर इतिहास बन जाती है। हिंदी सिनेमा के लंबे सफर में ऐसे अनगिनत किस्से बिखरे पड़े हैं, जो बताते हैं कि पर्दे पर दिखने वाला तीन-चार मिनट का गीत दरअसल कितनी दिलचस्प परिस्थितियों में जन्म लेता है।
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- हेमंत पाल 

    फिल्मी गीतों के इतिहास में ऐसे अनेक दिलचस्प प्रसंग मिलते हैं। एक मशहूर किस्सा फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ के गीत 'प्यार किया तो डरना क्या' से जुड़ा है। बताया जाता है कि इस गीत के भव्य दृश्यांकन के लिए शीश महल का विशाल सेट बनाया गया था और इसे फिल्माने में लंबे समय और भारी खर्च लगा। बाद में यही गीत फिल्म की पहचान बन गया। इसी तरह फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ का गीत 'जीना यहां मरना यहां' भी दिलचस्प कहानी समेटे हुए है। कहा जाता है कि यह गीत कहानी के भाव को समेटने के लिए बाद में जोड़ा गया और अंततः वही फिल्म की आत्मा बन गया। वहीं कुछ गीत ऐसे भी रहे जो रिकॉर्ड होने और फिल्माए जाने के बाद भी अंतिम संपादन में हटा दिए गए। कई बार फिल्म की लंबाई, कहानी की गति या बदलती परिस्थितियों के कारण ऐसे फैसले लेने पड़े। इन रोचक घटनाओं से स्पष्ट है कि फिल्मी गीत केवल धुन और शब्द नहीं होते, बल्कि उनके पीछे भी एक अनकही कहानी छिपी होती है, जो भारतीय सिनेमा के इतिहास को और भी रंगीन बनाती है।
    इन्हीं कहानियों में एक बेहद मशहूर किस्सा जुड़ा है 1960 में आई फिल्म 'काला बाजार' के गीत खोया खोया चांद से। कहा जाता है कि इस गीत के बोल एक माचिस की डिब्बी पर लिखे गए थे। उस दौर में फिल्म के निर्माता और अभिनेता देव आनंद थे और संगीतकार थे महान सचिन देव बर्मन। गीत लिखने की जिम्मेदारी मशहूर गीतकार शैलेन्द्र को दी गई थी। कहानी कुछ यूं है कि शैलेंद्र बेहद व्यस्त थे और गीत लिखने में देरी हो रही थी। तब एसडी बर्मन ने अपने बेटे राहुल देव बर्मन यानी पंचम दा को भेजा कि वे शैलेंद्र से गीत लिखवाकर ही लौटें। दोनों रात में मुंबई के जुहू बीच पर टहलते हुए धुन और शब्द तलाश रहे थे। समुद्र की लहरें, आसमान में पूरा चांद और सन्नाटा माहौल बेहद काव्यात्मक था, लेकिन शब्द अभी भी गायब थे। इस बीच शैलेंद्र की माचिस खत्म हो गई और उन्होंने पंचम दा से माचिस मांगी। पंचम दा ने उसी डिब्बी पर ताल देते हुए धुन गुनगुनाई। बस, वही क्षण गीत के जन्म का क्षण बन गया। शैलेंद्र ने आसमान की ओर देखा और अचानक बोल निकले 'खोया-खोया चांद, खुला आसमान …!' पास में कागज-कलम नहीं था, तो पंचम दा ने तुरंत माचिस की डिब्बी पर ही शब्द लिख लिए। बाद में इस गीत को मोहम्मद रफ़ी की आवाज मिली और यह गीत हिंदी फिल्म संगीत का अमर हिस्सा बन गया। यह कहानी बताती है कि महान गीत कभी-कभी बेहद साधारण परिस्थितियों में भी जन्म ले लेते हैं।
    हिंदी फिल्म इतिहास में ऐसा पहला किस्सा नहीं था। कई गीतों के पीछे ऐसी घटनाएं हैं जो आज भी संगीत प्रेमियों को रोमांचित करती हैं। उदाहरण के लिए 1964 की फिल्म 'संगम' का प्रसिद्ध गीत 'दोस्त दोस्त ना रहा' को गाने के लिए पहले किसी और गायक पर विचार किया गया था, लेकिन अंततः अभिनेता-निर्माता राज कपूर ने फैसला किया कि यह गीत मुकेश ही गाएंगे। मुकेश की दर्द भरी आवाज ने इस गीत को इतना असरदार बना दिया कि यह दोस्ती और विश्वासघात का प्रतीक बन गया। इसी तरह 1957 की फिल्म 'प्यासा' का गीत 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है' भी अपने बनने की कहानी के कारण खास माना जाता है। निर्देशक गुरु दत्त चाहते थे कि यह गीत फिल्म के चरम भावनात्मक क्षण को व्यक्त करे। संगीतकार सचिन देव बर्मन और गीतकार साहिर लुधियानवी के बीच इस गीत के मूड को लेकर लंबी चर्चा हुई। कई ड्राफ्ट के बाद जब अंतिम शब्द बने और मोहम्मद रफ़ी ने उसे गाया, तब जाकर वह गीत सिनेमा के इतिहास में दर्ज हो गया।
    कभी-कभी गीत बनने के बाद भी फिल्म का हिस्सा नहीं बन पाते। 1965 की फिल्म 'गाइड' के निर्माण के दौरान भी ऐसा हुआ था। निर्देशक विजय आनंद और अभिनेता देव आनंद की इस फिल्म में कई गीत रिकॉर्ड किए गए, लेकिन संपादन के दौरान कुछ गीतों को हटा दिया गया ताकि कहानी की गति बनी रहे। हालांकि जो गीत फिल्म में रहे, जैसे 'आज फिर जीने की तमन्ना है' और 'तेरे मेरे सपने' भारतीय फिल्म संगीत के क्लासिक बन गए। इसके विपरीत कई बार ऐसा भी हुआ कि गीत आखिरी समय में फिल्म में जोड़ा गया और वह सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुआ। 1971 की फिल्म 'आनंद' का गीत 'जिंदगी कैसी है पहेली' इसका अच्छा उदाहरण है। निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी चाहते थे कि फिल्म के अंत में जीवन के रहस्य को दर्शाने वाला एक गीत हो। संगीतकार सलिल चौधरी और गीतकार योगेश ने मिलकर यह गीत तैयार किया, जिसे मन्ना डे ने गाया। यह गीत फिल्म के दर्शन को बेहद खूबसूरती से व्यक्त करता है। 
     हिंदी सिनेमा में ऐसे भी दौर आए जब बिना गीत वाली फिल्मों का प्रयोग किया गया। उदाहरण के तौर पर 'इत्तेफ़ाक़' को बिना किसी पारंपरिक गीत के बनाया गया था। निर्देशक यश चोपड़ा की इस फिल्म में केवल बैकग्राउंड म्यूजिक था। उस समय यह एक साहसिक प्रयोग माना गया, क्योंकि दर्शक फिल्मों में गीतों के आदी थे। दूसरी ओर कुछ फिल्में ऐसी भी बनीं जिनमें गीतों की भरमार थी। 1952 की फिल्म 'बैजू बावरा' इसका शानदार उदाहरण है। संगीतकार नौशाद ने इस फिल्म में शास्त्रीय संगीत पर आधारित कई गीत तैयार किए, जिनमें ;मन तड़फत हरी दर्शन को आज' और 'ओ दुनिया के रखवाले' आज भी संगीत प्रेमियों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। इन गीतों ने यह साबित किया कि शास्त्रीय संगीत भी मुख्यधारा सिनेमा में दर्शकों का दिल जीत सकता है। गीतों के मुखड़े और अंतरे को लेकर भी कई दिलचस्प घटनाएं हुई हैं। कभी-कभी एक छोटा सा शब्द पूरे गीत की पहचान बन जाता है। 1969 की फिल्म 'आराधना' के गीत 'मेरे सपनों की रानी' को ही लें। संगीतकार सचिन देव बर्मन उस समय बीमार थे, इसलिए उनके बेटे आरडी बर्मन ने रिकॉर्डिंग की जिम्मेदारी संभाली। गीतकार आनंद बक्षी के सरल शब्द और किशोर कुमार की मस्ती भरी आवाज ने इस गीत को युवाओं का एंथम बना दिया। 
    इन तमाम कहानियों से यह साफ होता है कि फिल्मी गीत केवल स्टूडियो में बैठकर नहीं बनते। कभी समुद्र किनारे टहलते हुए धुन जन्म लेती है, कभी किसी कवि को अचानक कोई पंक्ति सूझ जाती है, तो कभी निर्देशक और संगीतकार के बीच लंबी बहस के बाद कोई गीत आकार लेता है। आज के डिजिटल दौर में जब कंप्यूटर और आधुनिक तकनीक से संगीत बनता है, तब इन पुराने किस्सों को सुनना और भी रोमांचक लगता है। उस समय कलाकारों के पास सीमित साधन थे, लेकिन कल्पना शक्ति असीमित थी। शायद यही वजह है कि उस दौर के गीत आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। दरअसल, हिंदी सिनेमा के गीतों की यही खूबसूरती है, वे केवल फिल्म का हिस्सा नहीं होते, बल्कि समय के साथ संस्कृति का हिस्सा बन जाते हैं। चाहे वह माचिस की डिब्बी पर लिखा गया कोई मुखड़ा हो या अचानक रिकॉर्ड हुआ कोई गीत, हर धुन के पीछे एक कहानी छिपी होती है। और यही कहानियां फिल्म संगीत के इतिहास को इतना जीवंत और दिलचस्प बनाती हैं।
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दुबई का खंडित सपना, टैक्स का लालच ख़त्म!

दुबई में बसना हर भारतीय का सपना रहता है। कुछ सालों में तो यह आकर्षण ज्यादा ही बढ़ता दिखाई दिया। लेकिन, ईरान-इजरायल युद्ध में दुबई जिस तरह निशाने पर आया, उसने यहां बसने वालों के आकर्षण पर सवाल उठने लगा है। दुबई में जीवन के असुरक्षित होने से लोगों ने फिर भारत वापसी पर विचार शुरू कर दिया। टैक्स के बोझ से बचने का लालच भी ख़त्म होता लग रहा। यह भी सोचा जाने लगा कि भारत कहीं ज्यादा सुरक्षित और बेहतर देश है।    

- हेमंत पाल

     बीते कुछ सालों में भारत के कई बड़े उद्योगपति, निवेशक और उच्च आय वर्ग के लोग तेजी से दुबई और खाड़ी देशों की ओर रुख करते दिखाई दिए। कम टैक्स, वैश्विक जीवनशैली और आसान बिजनेस माहौल ने उन्हें आकर्षित किया। लेकिन, हाल के भू-राजनीतिक तनावों और क्षेत्रीय अस्थिरता ने इस प्रवृत्ति पर नए सवाल खड़े कर दिए। क्या वास्तव में दुबई जैसे देशों में बसना उतना सुरक्षित और स्थायी विकल्प है जितना माना जाता है, या फिर यह केवल टैक्स बचाने और विलासितापूर्ण जीवन की चाह का परिणाम है! यह सवाल अब गंभीर बहस का विषय बन चुका है। एक दशक में दुबई भारतीयों के लिए सबसे पसंदीदा विदेशी ठिकानों में से एक बनकर उभरा है। खासकर अमीर भारतीयों और उद्योगपतियों के बीच वहां बसने की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ी है। दुबई की रियल एस्टेट मार्केट में भारतीय निवेशकों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ती गई और कई बड़े कारोबारी परिवारों ने वहां महंगी प्रॉपर्टी खरीदकर स्थायी निवास बना लिया। 
    इस आकर्षण के पीछे सबसे बड़ा कारण वहां का टैक्स ढांचा है। दुबई में व्यक्तिगत आयकर नहीं है, जबकि भारत में उच्च आय वर्ग को 30 प्रतिशत तक टैक्स देना पड़ता है। यही कारण है कि कई लोग अपनी आय और संपत्ति को सुरक्षित रखने के लिए खाड़ी देशों में बसने का फैसला करते हैं। इसके अलावा दुबई का आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, अंतरराष्ट्रीय व्यापार केंद्र के रूप में पहचान और अपेक्षाकृत आसान कारोबारी नियम भी लोगों को आकर्षित करते रहे हैं। हालांकि, दुबई जाने का कारण केवल टैक्स बचाना ही नहीं है। कई उद्योगपति और कारोबारी दुबई को वैश्विक व्यापार का प्रवेश द्वार मानते हैं। मध्य पूर्व, यूरोप और अफ्रीका के बीच स्थित होने के कारण दुबई व्यापार और लॉजिस्टिक्स के लिए एक रणनीतिक केंद्र बन चुका है। इसके अलावा दुबई में लग्जरी जीवनशैली, आधुनिक शहर, बेहतर परिवहन व्यवस्था और अपेक्षाकृत तेज प्रशासनिक प्रक्रियाएं भी आकर्षण का कारण हैं। कई भारतीय पेशेवर और उद्यमी मानते हैं कि दुबई में कारोबार शुरू करना और विस्तार करना भारत की तुलना में आसान और तेज है। लेकिन, हाल के समय में पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों ने इस आकर्षण पर सवाल खड़े कर दिए हैं। 
    क्षेत्रीय संघर्षों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं ने यह याद दिलाया है कि खाड़ी क्षेत्र पूरी तरह स्थिर नहीं है। जब भी पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, तो वहां रहने वाले विदेशी नागरिकों की सुरक्षा और भविष्य को लेकर चिंता बढ़ जाती है। ऐसे समय में कई लोग यह महसूस करने लगते हैं कि आर्थिक लाभ के बावजूद किसी दूसरे देश में स्थायी रूप से बसना हमेशा सुरक्षित विकल्प नहीं होता। इसके विपरीत भारत एक बड़ा लोकतांत्रिक और अपेक्षाकृत स्थिर देश है। यहां मजबूत संस्थाएं, स्वतंत्र न्यायपालिका और लोकतांत्रिक व्यवस्था है, जो नागरिकों को दीर्घकालिक सुरक्षा और अधिकार प्रदान करती है। भारत की अर्थव्यवस्था भी तेजी से बढ़ रही है और निवेश तथा उद्यमिता के नए अवसर लगातार सामने आ रहे हैं। स्टार्टअप इकोसिस्टम, डिजिटल अर्थव्यवस्था और इंफ्रास्ट्रक्चर विकास ने देश को वैश्विक निवेश के लिए आकर्षक बना दिया है। ऐसे में कई विशेषज्ञ मानते हैं कि अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए विदेश बसना हमेशा दीर्घकालिक रूप से सही फैसला नहीं होता।
      एक और महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक और सांस्कृतिक जुड़ाव का है। भारत छोड़कर विदेश में बसने वाले कई लोगों को समय के साथ यह महसूस होता है कि अपने समाज, संस्कृति और परिवार से दूर रहना आसान नहीं होता। दुबई जैसे देशों में भले ही भारतीय समुदाय बड़ा हो, लेकिन वहां की नागरिकता व्यवस्था और सामाजिक ढांचा अलग है। अधिकांश विदेशी नागरिकों को वहां स्थायी नागरिकता नहीं मिलती, जिससे उनका भविष्य हमेशा अनिश्चित बना रहता है। हाल के वर्षों में यह भी देखने को मिला है कि कुछ लोग विदेश में रहने के बाद वापस भारत लौटने का निर्णय ले रहे हैं। भारत की बढ़ती आर्थिक संभावनाएं, तकनीकी विकास और बेहतर जीवन के अवसर इस बदलाव के पीछे प्रमुख कारण हैं। इसके अलावा सरकार द्वारा किए गए कई आर्थिक सुधारों और कारोबारी माहौल को बेहतर बनाने की कोशिशों ने भी निवेशकों का भरोसा बढ़ाया है।
    दरअसल, विदेश में बसना या निवेश करना कोई गलत निर्णय नहीं है। वैश्वीकरण के दौर में लोग बेहतर अवसरों की तलाश में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जाते हैं। लेकिन केवल टैक्स बचाने या अल्पकालिक लाभ के लिए स्थायी रूप से देश छोड़ देना एक बड़ा फैसला होता है, जिसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। जरूरी यह है कि लोग आर्थिक लाभ के साथ-साथ सुरक्षा, स्थिरता, सामाजिक जुड़ाव और भविष्य की संभावनाओं जैसे पहलुओं पर भी गंभीरता से विचार करें। दुबई और खाड़ी देशों का आकर्षण अपनी जगह है, लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि क्या केवल आर्थिक कारणों से विदेश बसना सही रणनीति है। भारत आज तेजी से उभरती हुई अर्थव्यवस्था है और यहां अवसरों की कोई कमी नहीं है। ऐसे में शायद यह समय है जब लोग केवल टैक्स के नजरिए से नहीं, बल्कि दीर्घकालिक स्थिरता और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए अपने फैसलों पर पुनर्विचार करें।
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Tuesday, March 17, 2026

जीवन, पीड़ा और गरिमा के बीच संतुलन

हरीश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट का इच्छा मृत्यु का फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था का एक संवेदनशील पहलू है। क्योंकि, जब जीवन केवल पीड़ा और दूसरे पर निर्भरता का रूप ले ले, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या व्यक्ति को जीवन के अलावा गरिमा के साथ मृत्यु चुनने का भी अधिकार होना चाहिए! सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसी संवैधानिक भावना को समझने और उसे लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। 
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● हेमंत पाल

      भारत में जीवन को सबसे बड़ा मूल्य माना गया है। भारतीय संस्कृति, धर्म और कानून सभी जीवन की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। लेकिन, जब यही जीवन असहनीय पीड़ा, असहायता और निरर्थकता का पर्याय बन जाए, तब समाज और कानून के सामने एक कठिन प्रश्न खड़ा हो जाता है कि क्या किसी व्यक्ति को ऐसी स्थिति में गरिमापूर्ण ढंग से मृत्यु चुनने का अधिकार होना चाहिए! हाल ही में सुप्रीम कोर्ट का हरीश राणा को इच्छा मृत्यु की अनुमति देना, इसी जटिल और संवेदनशील सवाल के केंद्र में खड़ा एक ऐतिहासिक निर्णय है। तेरह सालों से बिस्तर पर निस्तेज पड़े हरीश राणा को जीवन से मुक्ति देने का आदेश केवल एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि यह मानवीय संवेदना, नैतिकता और न्याय के बीच संतुलन खोजने का प्रयास भी है। हरीश राणा का मामला उन हजारों लोगों की पीड़ा का प्रतिनिधित्व करता है, जो गंभीर बीमारी या दुर्घटना के बाद सालों तक ऐसे जीवन के लिए विवश होते हैं, जिसमें न तो कोई सक्रिय चेतना होती है और न जीवन की सामान्य गतिविधियों में भाग लेने की क्षमता। ऐसे लोग केवल मशीनों, दवाओं और दूसरों की देखभाल के सहारे जीवित रहते हैं। चिकित्सा विज्ञान भले ही जीवन को लंबा करने में सक्षम हो गया हो, लेकिन वह हमेशा जीवन की गुणवत्ता को सुनिश्चित नहीं कर पाता। यही वह स्थिति है जहां जीवन के अधिकार और गरिमा के साथ जीवन के अधिकार के बीच अंतर स्पष्ट हो जाता है।
      भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। समय के साथ न्यायपालिका ने इस अधिकार की व्याख्या व्यापक रूप से की है और इसमें गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार भी शामिल किया है। जब जीवन केवल पीड़ा और निर्भरता का रूप ले ले, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या व्यक्ति को गरिमा के साथ मृत्यु चुनने का भी अधिकार होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इसी संवैधानिक भावना को समझने और लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। इच्छा मृत्यु का विषय हमेशा से नैतिक, धार्मिक और सामाजिक बहस का केंद्र रहा है। कई लोग इसे जीवन के प्रति अनादर मानते हुए तर्क देते हैं कि मनुष्य को जीवन देने और लेने का अधिकार केवल प्रकृति या ईश्वर के पास है। दूसरी ओर, एक विचारधारा यह भी कहती है कि यदि कोई व्यक्ति असहनीय पीड़ा में है और उसके ठीक होने की कोई संभावना नहीं है, तो उसे अनावश्यक कष्ट झेलने के लिए मजबूर करना भी अमानवीय है। इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है।
      हरीश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए निर्णय दिया। यह फैसला केवल कानूनी तर्कों पर आधारित नहीं था, बल्कि इसमें मानवीय संवेदना की गहरी समझ भी दिखाई देती है। तेरह साल तक एक व्यक्ति का बिस्तर पर निश्चेष्ट पड़े रहना केवल उसकी व्यक्तिगत त्रासदी नहीं होती, बल्कि यह उसके परिवार, देखभाल करने वालों और पूरे सामाजिक तंत्र के लिए भी एक गहरी पीड़ा का कारण बन जाती है। ऐसे में अदालत ने यह माना कि केवल जैविक रूप से जीवित रहना ही जीवन का अंतिम उद्देश्य नहीं हो सकता। यह निर्णय भारतीय न्याय व्यवस्था के मानवीय पक्ष को भी सामने लाता है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इच्छा मृत्यु को सामान्य विकल्प के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह केवल अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में ही संभव है। इसके लिए कठोर चिकित्सकीय परीक्षण, विशेषज्ञों की राय और न्यायिक निगरानी जैसी कई प्रक्रियाएं आवश्यक होती हैं। इस प्रकार यह सुनिश्चित किया जाता है कि इस अधिकार का दुरुपयोग न हो और किसी व्यक्ति को जबरन मृत्यु की ओर न धकेला जाए।
      इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह समाज को जीवन की गुणवत्ता के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करता है। आधुनिक चिकित्सा ने जीवन को लंबा करने की क्षमता तो विकसित कर ली है। लेकिन, कई बार यह लंबा जीवन केवल पीड़ा और निर्भरता से भरा होता है। ऐसे में यह आवश्यक है कि चिकित्सा प्रणाली केवल जीवन बचाने पर ही नहीं, बल्कि रोगियों की गरिमा और मानसिक स्थिति पर भी ध्यान दे। इसके साथ ही यह निर्णय समाज में करुणा और संवेदना की भावना को भी मजबूत करता है। किसी व्यक्ति की पीड़ा को समझना और उसके प्रति सहानुभूति रखना मानवीय सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम इसी मानवीय मूल्य को स्वीकार करता है कि जीवन केवल सांसों का नाम नहीं है, बल्कि उसमें आत्मसम्मान, स्वतंत्रता और गरिमा का होना भी उतना ही आवश्यक है।
      हालांकि, यह निर्णय कई नई बहसों को भी जन्म देगा। कुछ लोग इसे मानवाधिकारों की दिशा में प्रगतिशील कदम मानेंगे, तो कुछ इसे नैतिकता और सामाजिक मूल्यों के लिए चुनौती के रूप में देखेंगे। लेकिन यह भी सच है कि बदलते समय में समाज को कठिन प्रश्नों का सामना करना ही पड़ता है और उनके समाधान के लिए संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक होता है। इच्छा मृत्यु पर यह फैसला हमें यह सोचने के लिए भी प्रेरित करता है कि जीवन का वास्तविक अर्थ क्या है। क्या केवल जीवित रहना ही जीवन है, या फिर गरिमा, स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीना ही जीवन का सच्चा स्वरूप है? जब कोई व्यक्ति इन सभी से वंचित हो जाए और केवल पीड़ा का प्रतीक बनकर रह जाए, तब समाज और कानून की जिम्मेदारी है कि वह उसके कष्ट को समझे और मानवीय समाधान खोजे।
      अंततः हरीश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय केवल एक व्यक्ति की मुक्ति का फैसला नहीं है, बल्कि यह भारतीय न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता और परिपक्वता का प्रतीक भी है। यह निर्णय हमें याद दिलाता है कि कानून का उद्देश्य केवल नियमों का पालन कराना नहीं है, बल्कि मानवीय गरिमा और करुणा की रक्षा करना भी है। इसी अर्थ में यह फैसला न्याय, संवेदना और मानव गरिमा के बीच एक संतुलित सेतु की तरह है, जो हमें यह सिखाता है कि जीवन का सम्मान तभी पूर्ण होता है जब उसमें पीड़ा से मुक्ति और गरिमा के साथ विदाई की संभावना भी शामिल हो।
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Tuesday, March 3, 2026

सितारों के कर्ज और दिवालियापन के किस्से

     फिल्मी दुनिया परदे पर जितनी चमकदार दिखती है, भीतर उतनी ही जोखिमों और उतार-चढ़ाव से भरी होती है। यहां स्टारडम रातों-रात आसमान छूता है, तो कभी एक फ्लॉप फिल्म या गलत निवेश कलाकारों को आर्थिक संकट में धकेलने से भी नहीं चूकता। कई नामी सितारे ऐसे रहे, जिन्होंने अपने करियर के चरम पर कर्ज, नुकसान और यहां तक कि दिवालियेपन की स्थिति देखी है। लेकिन, इन संघर्षों की खास बात यह है कि ज्यादातर कलाकारों ने हार नहीं मानी और मेहनत से वापसी कर अपनी पहचान फिर मजबूत की। पुराने दौर से लगाकर राजपाल यादव तक का उदाहरण सितारों के संघर्ष का असली चेहरा है। इस प्रसंग ने एक बार फिर यह सवाल उठाया कि आर्थिक संकट और फिल्म इंडस्ट्री का रिश्ता कितना पुराना है। फिल्म इतिहास के पन्नों पर उन सितारों की कहानियां दर्ज हैं, जिन्होंने गिरकर भी खुद को संभाला है।
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  ●  हेमंत पाल

      राजपाल यादव अपनी नैसर्गिक कॉमेडी के लिए पहचाने जाते हैं। ऐसी कई फ़िल्में याद की जा सकती है, जिसमें इस अभिनेता ने कालजयी किरदार किए। लेकिन, फिल्म 'अता पता लापता' के निर्माण के लिए उन्होंने करीब 5 करोड़ रुपए का लोन लिया था। फिल्म 2012 में रिलीज हुई, पर बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही। इसके बाद उनपर आर्थिक दबाव बढ़ता गया और कर्ज बढ़कर लगभग 9 करोड़ रुपए तक पहुंच गया। लंबे समय तक कानूनी विवाद चलता रहा और अंततः उन्हें तिहाड़ जेल में सरेंडर करना पड़ा। यह घटना दिखाती है, कि फिल्म निर्माण का जोखिम कितना बड़ा हो सकता है। एक गलत प्रोजेक्ट सालों की मेहनत और कमाई पर भारी पड़ सकता है। यह पहली घटना नहीं है, जब कोई फिल्म अभिनेता ऐसी मुसीबत में फंसा हो। 

   आर्थिक संकट में फंसने और उबरने की सबसे चर्चित कहानी अमिताभ बच्चन की है। 90 के दशक में उनकी कंपनी 'अमिताभ बच्चन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एबीसीएल) भारी घाटे में चली गई। उन पर करीब 90 करोड़ का कर्ज और दर्जनों कानूनी केस थे। उस दौर में उनकी फिल्में भी लगातार फ्लॉप हुई। ऐसे समय में यश चोपड़ा ने उन्हें फिल्म 'मोहब्बतें' में मौका दिया, जिसने उनकी दूसरी पारी की शुरुआत की। इसके बाद टीवी शो और नई फिल्मों ने उन्हें फिर सुपरस्टार बना दिया। धीरे-धीरे उनकी फ़िल्में हिट हुई और फिर 'कौन बनेगा करोड़पति' जैसे टीवी शो ने उन्हें सारे संकटों से उबार दिया। आज उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत मानी जाती है और यह उदाहरण बताता है कि सही मौके और मेहनत से संकट से निकला जा सकता है। हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े शोमैन कहे जाने वाले राज कपूर को भी अपने दौर में भारी नुकसान झेलना पड़ा। उनकी महत्वाकांक्षी फिल्म 'मेरा नाम जोकर' बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह फ्लॉप हुई और वे लगभग दिवालियेपन की कगार पर पहुंच गए। कहा तो यहां तक जाता है कि उनका बंगला तक गिरवी था। लेकिन, उन्होंने हार नहीं मानी धीरे-धीरे संभले। लेकिन, इस संकट से उन्हें बाहर निकाला बाद में बनाई एक फिल्म ने। कुछ साल बाद राज कपूर ने अपने बेटे ऋषि कपूर और डिंपल कापड़िया को लेकर प्रेम कहानी 'बॉबी' बनाई, जिसने न सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड कमाई की और उनके करियर को नई जिंदगी दी। यह कहानी एक फ़िल्मकार का जुझारूपन बताती है कि एक असफलता पूरी पहचान खत्म नहीं करती। कोशिश की जाए, असफलता को सफलता में बदला जा सकता है। 
    इसी तरह प्रतिभाशाली फिल्मकार गुरु दत्त ने भी कई महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट्स में भारी निवेश किया था। उनकी फिल्मों को बाद में क्लासिक माना गया, लेकिन रिलीज के समय अपेक्षित कमाई न होने से आर्थिक दबाव बना रहा।  50-60 के दशक के लोकप्रिय अभिनेता भारत भूषण भी आर्थिक संकट का शिकार हुए। शुरुआती सफलता के बाद उनकी फिल्में नहीं चलीं और गलत निवेश के कारण उन्हें अपना घर तक बेचना पड़ा। जीवन के अंतिम वर्षों में उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, जो बताता है कि फिल्मों में स्टारडम कभी स्थायी नहीं होता। फिल्म इंडस्ट्री में राजेश खन्ना से बड़ा कोई सितारा नहीं रहा। लगातार 16 हिट फ़िल्में देने वाले इस कलाकार के कुछ गलत फैसलों ने उन्हें असफलता की तरफ धकेल दिया। इसके बाद वे कभी उबर नहीं पाए। पुराने दौर की त्रासदियों में मीना कुमारी का नाम भी लिया जाता है। बेहतरीन अभिनय के बावजूद निजी जिंदगी की समस्याओं और गलत आर्थिक फैसलों ने उन्हें कर्ज में डुबो दिया। उनके आखिरी वर्षों में आर्थिक स्थिति काफी कमजोर रही। उनकी कहानी फिल्मी दुनिया की भावनात्मक और आर्थिक असुरक्षा दोनों को उजागर करती है।
    फिल्म कलाकारों की नई पीढ़ी में भी आर्थिक जोखिम के उदाहरण मिलते हैं। सुपरस्टार शाहरुख खान ने 'रा-वन' जैसी हाई-बजट फिल्म में भारी निवेश किया था। फिल्म ने औसत प्रदर्शन किया और शुरुआती दौर में आर्थिक दबाव बढ़ा, लेकिन बाद की फिल्मों और प्रोडक्शन हाउस की सफलता से उन्होंने स्थिति संभाल ली। उनकी 'पठान' और 'जवान' ने उन्हें फिर रेस में ला दिया। यह उदाहरण दिखाता है कि बड़े सितारे भी जोखिम लेते हैं और कभी-कभी नुकसान उठाते हैं। कभी स्टार रहे जैकी श्रॉफ ने भी लंबा आर्थिक संकट देखा। उन्होंने फिल्म 'बूम' में निवेश किया, जो बॉक्स ऑफिस पर बुरी तरह असफल रही। नुकसान इतना बड़ा था कि उन्हें अपना घर तक बेचना पड़ा। लेकिन उन्होंने काम जारी रखा, नए रोल स्वीकार किए और धीरे-धीरे अपनी स्थिति संभाली। आज वे फिल्म और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सक्रिय हैं। लंबे समय तक कॉमेडी के बादशाह रहे गोविंदा का करियर भी एक दौर में ठहर गया। कम और गलत फिल्में मिलने के बाद खराब आर्थिक फैसलों के कारण उन्हें परेशानी में डाल दिया। ऐसे में सलमान खान के साथ उनकी फिल्म 'पार्टनर' ने बॉक्स ऑफिस पर बड़ी सफलता हासिल की और गोविंदा को फिर से लोकप्रिय बना दिया। यह उदाहरण इंडस्ट्री में रिश्तों और सहयोग की अहमियत भी दिखाता है।
    दक्षिण भारतीय सुपरस्टार कमल हासन ने अपनी महत्वाकांक्षी फिल्म 'विश्वरूपम' के लिए निजी संपत्ति तक गिरवी रख दी थी। फिल्म रिलीज से पहले विवादों और बैन के कारण उन्हें भारी आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा। बाद में फिल्म रिलीज हुई और धीरे-धीरे स्थिति सुधरी। 2022 में 'विक्रम' की सफलता के बाद उन्होंने सार्वजनिक रूप से कहा कि अब वे अपने कर्ज से पूरी तरह उबर सकते हैं। डिस्को डांसर के नाम से मशहूर मिथुन चक्रवर्ती को भी आर्थिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उन्हें होटल व्यवसाय में नुकसान हुआ और फिल्मी करियर भी धीमा पड़ गया था। फिर, टीवी शो, रियलिटी कार्यक्रमों और नई फिल्मों के जरिए उन्होंने नए सिरे से लोकप्रियता हासिल की और आर्थिक स्थिति मजबूत की। कलाकारों और फिल्मकारों की इन कहानियों से एक बात साफ होती है कि फिल्म इंडस्ट्री में आर्थिक जोखिम हमेशा मौजूद रहता है। कई कलाकार अपने सपनों के प्रोजेक्ट में खुद निवेश करते हैं, जिससे नुकसान की संभावना भी बढ़ जाती है। 
     इसके अलावा, गलत मैनेजमेंट, खराब सलाह, टैक्स समस्याएं और बदलते ट्रेंड भी आर्थिक संकट की वजह बनते हैं। पुराने दौर में कलाकारों के पास फाइनेंशियल प्लानिंग की जानकारी कम होती थी। जबकि, आज कई सितारे प्रोफेशनल टीम की मदद लेते हैं। हालांकि, इन संघर्षों की सबसे प्रेरक बात उनकी वापसी है। अमिताभ बच्चन से लेकर कमल हासन तक, कई कलाकारों ने दिखाया कि गिरावट अंत नहीं होती। मेहनत, नए अवसर और दर्शकों का समर्थन कलाकारों को फिर खड़ा कर सकता है। साथ ही यह कहानियां नए कलाकारों के लिए सीख भी हैं, सिर्फ सफलता नहीं, बल्कि वित्तीय समझ और सही फैसले भी जरूरी हैं। फिल्मी सितारों की ये कहानियां याद दिलाती हैं कि ग्लैमर के पीछे संघर्ष और जोखिम कम नहीं होते। राजपाल यादव का मामला हो या पुराने दौर के सितारों की त्रासदी, हर कहानी में एक सबक है कि असफलता जीवन का हिस्सा है, लेकिन हिम्मत और मेहनत से वापसी हमेशा संभव है। यही वजह है कि ये सितारे सिर्फ अपनी फिल्मों के लिए नहीं, बल्कि अपने संघर्ष और पुनरुत्थान के लिए भी याद किए जाते हैं।
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प्यार के इजहार का सबसे रंगीन बहाना

    रंगों का त्योहार और भारतीय सिनेमा का रिश्ता वैसा ही है, जैसे किसी कोरे कागज़ पर रंग बिखेर देना। हिंदी फिल्मों में होली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि भावनाओं के उफान, दबे हुए जज़्बात और सबसे बढ़कर 'इज़हार-ए-मोहब्बत' की स्वीकार्यता है। यह वह दिन है, जब समाज की बंदिशें रंगों की फुहार में बह जाती हैं। ऐसे में होली की आड़ में नायक-नायिका अपने दिल की बात कह देते हैं। परदे पर होली हमेशा से प्रेम के व्याकरण को समझाने वाला एक मधुर प्रसंग रही है, जहां गुलाल का एक टीका किसी प्रेम पत्र से भी ज्यादा असरदार साबित होता है।
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 हेमंत पाल

     म भारतीयों के लिए रंगों का त्योहार होली सिर्फ रंग उड़ाने तक सीमित नहीं है। यह वह सामाजिक अवसर है, जहां मर्यादाओं की कठोर लकीरें थोड़ी धुंधली हो जाती हैं और भावनाओं को अभिव्यक्ति के लिए खुला आकाश मिलता है। हिंदी सिनेमा ने इस सांस्कृतिक तत्व को बखूबी समझा और परदे पर इसे 'मोहब्बत की शुरुआत' के प्रसंग के रूप में स्थापित किया। अगर फिल्म इतिहास के पन्नों को पलटा जाए, तो पाएंगे कि जो बातें बंद कमरों या संकोची मुलाकातों में नहीं हो सकीं, उन्हें फागुन की मस्ती और अबीर की परतों ने मुमकिन कर दिया। यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक गहरा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है कि कैसे समाज का यह स्वीकार्य 'हुड़दंग' नायक और नायिका के बीच की झिझक को खत्म करने का जरिया बनता है। फिल्मों में ब्लैक एंड व्हाइट दौर से ही होली को एक ऐसे 'मूड' की तरह इस्तेमाल किया गया, जहां नायक अपनी नायिका के प्रति अनुराग व्यक्त करने के लिए रंगों की आड़ लेता है। ऐसा कई फिल्मों में हुआ है। सिनेमा के शुरुआती काल में होली का चित्रण आज के मुकाबले काफी शालीन और अर्थपूर्ण था। 1957 की क्लासिक फिल्म 'मदर इंडिया' का गाना 'होली आई रे कन्हाई' याद कीजिए। यहां होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि एक जीवन में खुशियों के चंद लम्हों का प्रतीक थी। उस दौर में रोमांस सीधे न होकर प्रतीकों में होता था। 
     नायक का नायिका को सिर्फ दूर से रंग फेंकना या उसके पल्लू पर गुलाल के हाथ लगा देना भी गहरे प्यार का संकेत माना जाता था। वह ऐसा दौर था, जहां रंग मर्यादाओं की सीमा में रहकर भी भावनाओं को व्यक्त करते थे। इसका प्रसंग फिल्म 'कटी पतंग' में दिखाई देता है। इस होली दृश्य को हिंदी फिल्मों के सबसे भावनात्मक और अर्थपूर्ण दृश्यों में गिना जाता है। इस सीन में गीत 'आज न छोड़ेंगे बस हमजोली' के जरिए रंगों की आड़ में दबी भावनाएं सतह पर आ जाती हैं। नायक राजेश खन्ना और नायिका आशा पारेख के बीच लगाव उभरकर सामने आता है। लेकिन, नायिका अपने अतीत और झूठी पहचान के बोझ तले दबी है। होली का उल्लासपूर्ण वातावरण रंग, नृत्य और सामूहिक उत्सव नायिका के भीतर के द्वंद्व के विपरीत दिखता है। कैमरा क्लोज़-अप के जरिए उसके चेहरे की झिझक और असहजता को उभारता है, जिससे दर्शक उसके आंतरिक संघर्ष को महसूस कर पाते हैं। क्योंकि, यह दृश्य केवल रोमांस नहीं, बल्कि कथानक का मोड़ भी है। रंग यहां प्रेम के साथ-साथ सच के उजागर होने की आशंका का प्रतीक बनता है। इसलिए यह होली दृश्य मनोरंजन के साथ गहरी संवेदना भी रचता है। इसी तरह 'नदिया के पार' की होली बेहद सादगी भरी है। जबकि 'डर' में राहुल का जुनून रंग लगाने में दिखाई देता है। जिसमें उसकी सनक और प्यार दोनों उजागर होते हैं। होली ने हर बार कहानी को एक नया मोड़ दिया। जैसे-जैसे सिनेमा ने रंगों की दुनिया में कदम रखा, होली का रूप 'बोल्ड' और 'ब्यूटीफुल' होता चला गया। 70 और 80 का दशक वह मोड़ था, जहां होली 'इज़हार-ए-मोहब्बत' का सबसे बड़ा मंच बनी।
     राज कपूर की फिल्मों में तो होली का एक अलग ही दर्शन था। 'मदर इंडिया' और 'कोहिनूर' जैसी क्लासिक फिल्मों में होली के गीतों के माध्यम से प्रेम और सामाजिक सद्भाव का ताना-बाना बुना गया। उस दौर में जब प्रेम की अभिव्यक्ति बेहद निजी और संयमित होती थी, तब होली के बहाने नायक का नायिका को रंग लगाना साहस भरी और प्रेममयी घटना मानी जाती थी। यह वो समय था, जब स्पर्श की भाषा को रंगों के जरिए पवित्रता के साथ परदे पर उतारा गया। दिलीप कुमार और मीना कुमारी के किरदारों के बीच की वह तड़प होली के गीतों में अक्सर एक उल्लासपूर्ण स्वीकार्यता में बदल जाती थी। वक़्त के साथ जैसे-जैसे सिनेमा का परदा रंगीन हुआ, उसके साथ ही होली के रंगों के जरिए प्रेम की अभिव्यक्ति और भी मुखर होती गई। 70 और 80 के दशक तक आते फिल्मों में होली का त्योहार एक 'प्लाट डिवाइस' बन गई। फिल्म 'शोले' में होली का दृश्य केवल एक उत्सव नहीं था, बल्कि वह नायक और नायिका के बीच बढ़ते आकर्षण और साथ ही फिल्म के खलनायक खास अंदाज का भी संकेत था। 'होली के दिन दिल खिल जाते हैं' गीत केवल नाच-गाना नहीं था, बल्कि वह बसंती और वीरू के बीच के उस अनकहे रिश्ते पर मोहर लगाने वाला क्षण था। यहां होली को एक सामाजिक स्वीकृति की तरह देखा गया, वहां गांव की पंचायत और परिवार के बीच भी प्रेम को एक अलग अंदाज़ में स्वीकार कर लिया जाता है।
     फिल्मों में जब प्रेमी जोड़े के बीच संकोच की बर्फ पिघलानी होती है, कथानक में होली दृश्य रच दिया जाता है। फिर इसमें भांग का सेवन इस पूरे प्रसंग को एक 'कॉमिक रिलीफ' और 'ईमानदारी' का पुट देता है। भांग का नशा चढ़ते ही नायक का डर गायब हो जाता है और वह अपने दिल के राज खोल देता है। यह फिल्मों का वह पुराना और सफल फार्मूला है, जो आज भी प्रासंगिक है। चाहे वो 'बागबान' की मैच्योर होली हो या 'टू स्टेट्स' का मॉडर्न सेलिब्रेशन, रंगों की फुहार ने हमेशा प्रेम की नई इबारत लिखी है। दिलचस्प बात यह है कि फिल्मों में होली का इस्तेमाल अक्सर नायक द्वारा नायिका के करीब जाने के लिए एक 'सेफ पैसेज' के रूप में किया जाता है। 'बद्रीनाथ की दुल्हनिया' में बद्री का वैदेही के पीछे रंग लेकर भागना या 'गोलियों की रासलीला राम-लीला' में रंगों के बीच वह पहला स्पर्श, यह सब होली के उस 'लाइसेंस' का हिस्सा है, जहां छूना अभद्रता नहीं, बल्कि उत्सव का हिस्सा माना जाता है। संजय लीला भंसाली की फिल्मों में तो होली एक दृश्य कविता की तरह दिखाई देती है, वहां लाल रंग और गुलाल प्रेम की तीव्रता को दर्शाते हैं।
    हिंदी सिनेमा में होली और प्रेम के विश्लेषण में फिल्म 'सिलसिला' का जिक्र होना जरुरी है। यश चोपड़ा ने इस त्योहार को जिस गरिमा के साथ प्रेम की उलझनों से जोड़ा, वह अद्वितीय था। 'रंग बरसे भीगे' सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि वह उन दबे जज्बातों का सैलाब है, जो समाज के बंधनों को तोड़कर बाहर आने के लिए छटपटा रहे थे। इस फिल्म में होली फ्लर्ट करने की सामाजिक अनुमति के विचार को चरितार्थ करती है। भांग का नशा और रंगों की धुंधली दुनिया नायक को वह साहस देती है, कि वह दुनिया के सामने अपनी प्रेमिका के प्रति अपने झुकाव को व्यक्त कर सके। यहां होली केवल मिलन का त्योहार नहीं, बल्कि सत्य की स्वीकारोक्ति का मंच बन जाती है। 90 के दशक और उसके बाद के दौर में होली का स्वरूप और भी चंचल और आधुनिक हो गया। 'डर' जैसी फिल्मों में होली को एकतरफा जुनून और प्रेम के खतरे को दिखाने के लिए इस्तेमाल किया गया, जहां 'तू है मेरी किरण' का उद्घोष रंगों के पीछे छुपकर किया जाता है। वहीं, 'मोहब्बतें' में होली को परंपराओं की बेड़ियां तोड़ने के प्रतीक के रूप में पेश किया गया। शाहरुख खान का चरित्र जब गुरुकुल की कठोरता के खिलाफ जाकर रंगों का आह्वान करता है, तो वह युवाओं को अपने प्रेम को बिना किसी डर के स्वीकार करने का निमंत्रण देता है। ऐसे में यहां होली विद्रोह और अनुराग का अद्भुत संगम बन जाती है।
     आज के समकालीन सिनेमा में जैसे 'ये जवानी है दीवानी' या 'बद्रीनाथ की दुल्हनिया' के होली दृश्य नायक और नायिका की केमिस्ट्री को एक नया आयाम देते हैं। 'बलम पिचकारी' जैसे गीतों में नायिका के संकोच को पूरी तरह ख़त्म होते दिखाया गया, जहां वे आधुनिक परिवेश में अपने साथी के साथ बराबरी से मस्ती और प्रेम में सराबोर होती है। इन फिल्मों में होली वह केंद्र बिंदु है, जहां नायक और नायिका अपनी मर्यादा को छोड़कर एक-दूसरे के करीब आते हैं। यह प्रसंग दर्शकों को यह समझाता है कि प्रेम में डूबने के लिए किसी विशेष मुहूर्त की नहीं, बल्कि रंगों जैसे उल्लास की जरूरत होती है। होली का यह 'कैमरा एंगल' वास्तव में मानवीय मनोविज्ञान की उस परत को छूता है, जहां व्यक्ति रंग लग जाने के बाद अपनी पहचान और अपने अहंकार को भूलकर केवल एक प्रेमी रह जाता है।
    फिल्मों में होली का प्रसंग केवल दृश्य को सुंदर और रंगीला बनाने के लिए नहीं किया जाता, बल्कि यह भारतीय समाज की उस मानसिकता का प्रतिबिंब है, जहां त्योहारों के बहाने मर्यादा की सीमा को थोड़ा लचीला कर दिया जाता है। नायक और नायिका के लिए होली वह ढाल है, जिसके पीछे छुपकर वे अपने दिल की बात कह जाते हैं और दुनिया इसे बुरा भी नहीं मानती। ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों की सादगी से लेकर आज के दौर की चकाचौंध तक, होली हमेशा से फ़िल्मी मोहब्बत का सबसे विश्वसनीय और रंगीन गवाह रही है। भारतीय सिनेमा में होली महज एक कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि यह वह रंगमंच है जहां नायक अपनी नायिका को अपनी दुनिया में शामिल करने का न्योता देता है। यह प्यार का वह मौसम है, जो नफरत की धूल झाड़ देता है और रंजिशों को गुलाल से ढंक देता है। ब्लैक एंड व्हाइट दौर की वह शर्मीली होली अब आज के दौर की बिंदास और बेबाक होली में बदल चुकी है, लेकिन इसका मूल तत्व आज भी वही है अपने पसंदीदा इंसान के गालों पर रंग मलकर चुपके से कह देना 'तुम मेरे हो या मेरी हो।'
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रंग, राग और परदे की मस्तीभरी होली

     भारतीय संस्कृति में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि रिश्तों, राग और रस का पर्व भी है। यही कारण है कि हिंदी सिनेमा ने भी इस पर्व को केवल एक दृश्य उत्सव की तरह नहीं, बल्कि भावनाओं के स्वरूप में प्रस्तुत किया। ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों के दौर में भी होली गीतों ने परदे पर रंगों का ऐसा भ्रम रचा था कि दर्शक सिनेमा हॉल में बैठे-बैठे भी अपने आपको रंगों में सराबोर महसूस करते थे। समय के साथ तकनीक बदली, रंगीन फिल्में आईं, संगीत की शैली बदली, लेकिन होली गीतों की मस्ती, छेड़छाड़, प्रेम और सामाजिक संकेतों की परंपरा कायम रही। 
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● हेमंत पाल

     हिंदी फिल्मों में होली गीत केवल उत्सव का दृश्य नहीं होते। वे अक्सर कहानी के महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत देते हैं। कई बार नायक-नायिका का प्रेम होली के बहाने खुलकर सामने आता है, तो कभी दुश्मनी या षड्यंत्र की भूमिका तैयार होती है। होली का रंग सामाजिक बंधनों को तोड़ने का प्रतीक है, इसलिए फिल्मों में यह पर्व फिल्म के किरदारों को खुलकर अपनी भावनाएं व्यक्त करने का अवसर देता है। 'बुरा न मानो होली है' की आड़ में छुपे संवाद और इशारे कहानी को आगे बढ़ाते हैं और कई बार कहानी में नया मोड़ भी देते हैं। ब्लैक एंड व्हाइट से लेकर डिजिटल सिनेमा तक की यात्रा में तकनीक ने होली गीतों को ज्यादा भव्य बना दिया। स्लो मोशन शॉट्स, एरियल कैमरा, रंगों की डिजिटल प्रस्तुति और बड़े सेट्स ने इन्हें दृश्यात्मक रूप से आकर्षक बनाया है। 
    संगीत की दृष्टि से भी परिवर्तन आया। जहां पहले शास्त्रीय और लोकधुन प्रधान गीत थे, वहीं आज फ्यूजन और इलेक्ट्रॉनिक संगीत का बोलबाला है। फिर भी ढोल की थाप और लोक लय की ऊर्जा आज भी इन गीतों की आत्मा बनी हुई है। हिंदी फिल्मों में होली गीतों की यात्रा भारतीय समाज की बदलती संवेदनाओं का दर्पण है। 1950 के ग्रामीण और पारंपरिक उत्सव से लेकर आज के ग्लैमरस और वैश्विक मंच तक, होली गीतों ने हर दौर में खुद को ढाला है। वे केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रेम, विद्रोह, सामाजिक संवाद और उत्सव की सामूहिक चेतना का माध्यम रहे हैं। यही कारण है कि हर पीढ़ी के पास अपना एक पसंदीदा होली गीत है। चाहे वह रंग बरसे हो, बलम पिचकारी हो या फिर 'अंग से अंग लगाना' जैसा रोमांटिक गीत हो। 1950 और 60 के दशक में जब फिल्में ब्लैक एंड व्हाइट थीं, तब भी होली गीतों का विशेष स्थान था। उस समय होली के गीत लोकधुनों और शास्त्रीय संगीत पर आधारित होते थे। 'मदर इंडिया' का गीत 'होली आई रे कन्हाई' होली के पारंपरिक उत्सव और ग्रामीण भारत की झलक प्रस्तुत करता है। इसी तरह 'कोहिनूर' का लोकप्रिय गीत 'तन रंग लो जी आज मन रंग लो' शास्त्रीयता और उत्सवधर्मिता का सुंदर संगम था। इन गीतों में ढोलक, मंजीरा, हारमोनियम जैसे वाद्य प्रमुख रहते थे। कैमरा तकनीक सीमित थी, लेकिन समूह नृत्य, लोक वेशभूषा और भावनात्मक अभिनय से होली का माहौल सजीव कर दिया जाता था।
     जब सिनेमा रंगीन हुआ तो होली गीतों ने सचमुच रंगों की बौछार कर दी। 1975 में आई 'शोले' का गीत 'होली के दिन दिल खिल जाते हैं' आज भी होली का पर्याय माना जाता है। यह गीत केवल उत्सव नहीं, बल्कि कहानी के भीतर रिश्तों की गर्माहट और आगामी संघर्ष की भूमिका भी तैयार करता है। इसी तरह 'अमिताभ बच्चन यादगार फिल्म 'सिलसिला' का अमर गीत 'रंग बरसे भीगे चुनर वाली' जिसे अमिताभ ने खुद अपनी आवाज दी, प्रेम, छेड़छाड़ और सामाजिक बंधनों के बीच पनपती भावनाओं को दर्शाता है। यह गीत आज भी हर होली पार्टियों के मस्त माहौल की जान माना जाता है। इस दौर में होली गीत कहानी के निर्णायक मोड़ पर रखे जाते थे, जहां छिपे प्रेम का इजहार होता था या सामाजिक टकराव का संकेत मिलता था। इसी तरह कटी पतंग का 'आज न छोड़ेंगे बस हमजोली' प्रेम और चुलबुलेपन का प्रतीक बन गया। इस दौर के गीतों में रंगों के बहाने नायक-नायिका के बीच छेड़छाड़ और रोमांस को खुलकर दिखाया गया। संगीत में भी ऑर्केस्ट्रा और लोकधुनों का मिश्रण देखने को मिला।
    1990 के बाद हिंदी सिनेमा में व्यावसायिकता और भव्यता बढ़ी। होली गीत अधिक चटकीले, नृत्यप्रधान और बड़े सेट्स पर फिल्माए जाने लगे। शाहरुख़ खान की फिल्म 'डर' का गीत 'अंग से अंग लगाना' रोमांस और जुनून का मिश्रण था। वहीं 'बागबान' में 'होली खेले रघुवीरा' के जरिए पारिवारिक और पारंपरिक होली की झलक दिखाई दी थी। इस दौर में संगीत में सिंथेसाइज़र और आधुनिक वाद्यों का प्रयोग बढ़ा, लेकिन लोकधुन की छाप बनी रही। लेकिन, 2000 के बाद होली गीतों ने एक नया रूप लिया। इस दौर में पारंपरिकता के साथ पॉप और रॉक का मिश्रण दिखा। इस दौर के होली गीतों में डीजे मिक्स, रैप और इलेक्ट्रॉनिक बीट्स का प्रभाव है। सोशल मीडिया और रील्स के कारण ये गीत तेजी से लोकप्रिय होते हैं और त्योहार की पहचान बन जाते हैं। 2019 में आई 'बद्रीनाथ की दुल्हनिया' का टाइटल ट्रैक और होली आधारित धुन 'कुर्ती पे तेरी मलूं गुलाल' ने यह दिखाया कि अब होली गीत सिर्फ ग्रामीण या पारंपरिक नहीं, बल्कि शहरी और ग्लैमरस रूप में भी प्रस्तुत किए जा रहे हैं। हाल के वर्षों में 'गो पागल' (फिल्म जॉली एलएलबी 2) जैसे गीतों ने पार्टी कल्चर और होली के मेल को दर्शाया। यहां रंगों से ज्यादा बीट्स और डांस स्टेप्स पर ध्यान दिया गया।
    इसी तरह 'राम लीला' का गीत 'लहू मुंह लग गया' होली के रंगों को प्रेम और नाटकीयता के साथ प्रस्तुत करता है। जबकि, 'बलम पिचकारी जो तूने मुझे मारी' भी युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ। यह गीत दोस्ती, प्रेम और मस्ती का प्रतीक बन गया। फ़िल्मी होली में रंग बदलते रहे, तकनीक बदलती रही, लेकिन सिनेमा के होली गीतों की मस्ती और जीवंतता आज भी उतनी ही ताजा है, जितनी कभी ब्लैक एंड व्हाइट परदे पर थी। यही इन गीतों की सबसे बड़ी सफलता है। वे समय के साथ रंग बदलते हैं, पर अपनी आत्मा को सहेजे रखते हैं। आज भी जब होली आती है, तो सिनेमाई गीतों की धुनों के बिना रंग अधूरे लगते हैं। यही हिंदी सिनेमा के होली गीतों की सबसे बड़ी सफलता है, वे पर्दे से निकलकर लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं।
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