फिल्म संगीत की दुनिया में गानों को अक्सर उनकी गहरी शायरी, दिल को छू लेने वाली गजलों और संवेदना से भरे अल्फाजों के लिए जाना जाता है। लेकिन, सिनेमा के इस समंदर में एक ऐसा किनारा ऐसा भी है, जहां शब्दों के अर्थ मायने नहीं रखते, बल्कि उनकी लय और रिदम श्रोताओं के सिर चढ़कर बोलती है। लोग सोचते हैं कि गानों के बोल अगर बेतुके या अर्थहीन हों, तो वे जल्दी भूला दिए जाएंगे। लेकिन, फिल्म इंडस्ट्री का इतिहास इस बात का गवाह है, कि जब भी किसी संगीतकार ने गीतों की भाषा के नियमों को किनारे कर केवल 'धुन की चुटकी' ली, तब वे गीत सिर चढ़कर बोले हैं। 'तम्मा तम्मा लोगे' से लेकर 'तूतक तूतक तूतिया' तक और 'ईना मीना डीका' से लेकर आधुनिक दौर के 'ताऊबा ताऊबा' तक, यह सिलसिला संयोग नहीं, बल्कि सिनेमा की एक नियोजित और समृद्ध परंपरा है। जाने-माने गीतकार प्रसून जोशी ने एक कार्यक्रम में 'दिल्ली-6' में अपने लिखे एक गीत 'मसक्कली' की रचना की कहानी सुनाते हुए यह राज भी खोला है।
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- हेमंत पाल
हिंदी फिल्मों में निरर्थक शब्दों जिन्हें पाश्चात्य संगीत में 'स्केटिंग' या 'नॉन-लेक्सिकल वोकेबल्स' कहा जाता है, इनका प्रयोग कोई 80 या 90 के दशक की देन नहीं है। इस ट्रेंड की शुरुआत आजादी के ठीक बाद 1940 और 1950 के दशक में हुई। जब पश्चिमी रॉक एन रोल, जैज़ और लैटिन संगीत भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ घुलने-मिलने लगा, तब संगीतकारों को महसूस हुआ कि हर बार भारी-भरकम उर्दू या हिंदी शब्दों से थिरकने वाली धुनें नहीं बनाई जा सकतीं। इस चलन को स्थापित करने का पहला बड़ा श्रेय महान संगीतकार सी रामचंद्र (चितलकर) को जाता है। 1947 की फिल्म 'शहनाई' में उन्होंने 'छुक छुक छैयां' जैसे शब्दों का प्रयोग किया। लेकिन, 1957 की फिल्म 'आशा' में जब किशोर कुमार और आशा भोसले की आवाज में 'ईना मीना डीका, दे दाई दमनिका, माका नाका' गूंजा, तो मानो हिंदी सिनेमा को एक नया संगीतमय झुनझुना मिल गया। बच्चों के खेल 'ईनी मिनी माइनी मो' से प्रेरित होकर बने इस गीत में कोंकणी शब्द 'माका नाका' और 'रम पम पोस' जैसी तुकबंदी को जोड़ा गया था। इस एक प्रयोग ने साबित कर दिया कि दर्शक केवल शब्द सुनने नहीं, बल्कि उस ऊर्जा को महसूस करने के लिए भी थिरकते हैं। इस दौर में 'लारा लप्पा लारा लप्पा लाई रखदा' (एक थी लड़की, 1949) जैसे गानों ने साबित कर दिया कि अगर मुखड़ा जुबां पर चढ़ जाए, तो फिर उसका कोई शब्दकोशीय अर्थ ढूंढने की जरूरत नहीं पड़ती।
एक बार जब ऐसे गीतों का दरवाजा खुला, तो फिल्म इंडस्ट्री के हर बड़े संगीतकार ने इसमें अपनी तरफ से रंग भरने का मौका नहीं छोड़ा। यह ऐसा दायरा बन गया, जहां प्रयोग करने की कोई पाबंदी नहीं थी। 1960 के दशक में 'जंगली' का 'याहू .., चाहे कोई मुझे जंगली कहे' आया था। यहां 'याहू' कोई शब्द नहीं, बल्कि एक उल्लासपूर्ण चीख थी, जिसने शम्मी कपूर को स्टारडम के शिखर पर पहुंचा दिया। इस फिल्म में 'अई अईया करूँ मैं क्या, सुक्कू सुक्कू' जैसा गाना भी आया, जो अर्जेंटीना की धुन से प्रेरित था और जिसका हिंदी में कोई शाब्दिक अर्थ नहीं होता। इसके बाद 'जब जब फूल खिले' का 'अफ्फू खुदा' और 'लव इन टोक्यो' का 'सायोनारा' जैसे बोल गूंजे, जिन्होंने विदेशों की भाषा और बेतुके ध्वनि वाले शब्दों को भारतीय दिलों की धड़कन बना दिया। 1970 और 1980 के दशक में आरडी. बर्मन और बप्पी लहरी ने इस विधा को नया मुकाम दिया। आरडी बर्मन ने 'जवानी दीवानी' में 'गिली गिली अक्खा, बिली बिली बिली' जैसे निरर्थक शब्दों से कमाल का समां बांधा।
बप्पी लहरी इससे कहीं आगे निकल गए, उन्होंने 'मवाली' (1983) के 'उई अम्मा उई अम्मा' की धुन को सालों बाद 2011 में 'द डर्टी पिक्चर' के 'ऊह ला ला' में तब्दील कर दिया। फ्रेंच भाषा का एक विस्मयसूचक शब्द 'ऊह ला ला' भारतीय घरों में बच्चा-बच्चा गाने लगा। अगर हम गानों की गिनती करने बैठें, तो ऐसे सैकड़ों गीत मिल जाएंगे। 1989 की फिल्म 'थानेदार' का 'तम्मा तम्मा लोगे' हो या 'गैंगस्टर' का 'या अली' या फिर सिंधी लोकगीत 'हो जमालो' से प्रेरित होकर पंजाबी भांगड़ा शैली में ढला 'तूतक तूतक तूतिया' इन सभी गानों में मुखड़े या अंतरे के बोल केवल लय (रिदम) को सहारा देने के लिए बनाए गए थे। 90 के दशक में तो यह चलन चरम पर पहुंच गया, जब 'हाय हुकु हाय हुकु', 'गेला गेला', 'चिन्नम्मा चिलकामा' और 'हुक्का मारो' जैसे गानों ने ऑडियो कैसेट और सीडी के बाजार में धूम मचा दी थी। फ़िल्म 'दिल्ली 6' का एक गीत 'मसक्कली मसक्कली' भी इसी श्रेणी का है। इस गीत के बारे में गीतकार प्रसून जोशी ने एक कार्यक्रम में बताया था कि हिंदी में 'मसक्कली' कोई शब्द नहीं है। लेकिन, फिल्म के संगीतकार एआर रहमान ने एक ऐसी धुन बनाई, जिसे सुनकर मेरे दिमाग में यह शब्द आया और मैंने वह गीत लिख दिया। बाद में सवाल उठा कि इस 'मसक्कली' शब्द को जस्टिफाई कैसे करेंगे, तो फिल्म में कबूतर का नाम मसक्कली रखकर इस मसले को हल किया गया।
संगीत के जानकारों और मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, ऐसे गानों की सफलता के पीछे एक गहरा वैज्ञानिक और संगीतमय कारण होता है। जब कोई इंसान संगीत सुनता है, तो उसका मस्तिष्क सबसे पहले धुन की लय से जुड़ता है। यदि बोल बेहद जटिल और कठिन शब्दावली वाले होंगे, तो मस्तिष्क का ध्यान उनका अर्थ समझने में लग जाता है। लेकिन, जब बोल ऊह ला ला, सुक्कू सुक्कू या 'तूतक तूतक' जैसे सरल और निरर्थक होते हैं, तो इंसान का ध्यान अर्थ से हटकर पूरी तरह से धुन के तालमेल और ऊर्जा पर केंद्रित हो जाता है। यह एक प्रकार का 'कैथार्सिस' (मानसिक तनाव मुक्ति) पैदा करता है, जिससे लोग झूमने और नाचने पर मजबूर हो जाते हैं।
समय बदला, संगीत की तकनीक बदली, लेकिन 'चुटकी लेने वाले' इन गानों का मिजाज नहीं बदला। आज के डिजिटल और रील्स वाले दौर में भी यह चलन पूरी ताकत के साथ जारी है। अगर हम इस तरह के अर्थहीन या केवल लय आधारित बोल वाले सबसे नए और चर्चित उदाहरणों की बात करें, तो हाल ही में विक्की कौशल पर फिल्माया गया गाना 'तौबा तौबा' (बैड न्यूज़) या 'नाच पुंजबन' और 'काला चश्मा' जैसे गानों का रीमिक्स कल्चर इसी परंपरा की अगली कड़ी हैं। विशेषकर 'तौबा तौबा' या पंजाबी-बॉलीवुड फ्यूज़न वाले हालिया ट्रैक्स में ऐसे शब्दों को बार-बार दोहराया जाता है (जैसे 'तौबा तौबा', 'कुड़ी ताऊबा ताऊबा'), जिनका उद्देश्य कोई दार्शनिक बात कहना नहीं, बल्कि एक ऐसा हुक-स्टेप और कैंची लूप तैयार करना है जो सोशल मीडिया पर वायरल हो सके। इसी तरह 'ब्रह्मास्त्र' का 'डांस का भूत' हो या 'स्त्री 2' के डांस नंबर, इनमें प्रयोग की गई पंक्तियाँ केवल एक हुक-लाइन बनाने के लिए चुनी जाती हैं।
फिल्मी गानों की यह चुटकी इस बात का जीता-जागता सबूत है कि फिल्म संगीत में पिरोए हुए ये गीत किसी भाषा या व्याकरण के मोहताज नहीं होते। शब्द चाहे 'ईना मीना डीका' हों, 'तम्मा तम्मा' हों या 'तूतक तूतक तूतिया' इनकी असली ताकत उनके अर्थ में नहीं, बल्कि उस खुशी और उमंग में छिपी है, जो ये श्रोताओं के चेहरे पर लाते हैं। जब तक दुनिया में इंसान को तनाव मिटाने और जश्न मनाने के लिए एक धुन की जरूरत रहेगी, तब तक फिल्म इंडस्ट्री के संगीतकार ऐसी ही मीठी, चटपटी और बेतुकी 'चुटकी' लेते रहेंगे, और हम-आप बिना मतलब समझे भी इन गानों पर यूं ही थिरकते रहेंगे।
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