Sunday, October 11, 2026

उम्र से बगावत को बेताब सितारे

     सिनेमा की चमकदार दुनिया बाहर से जितनी लुभावनी, हसीन और आकर्षक दिखाई देती है, भीतर से वह उतनी ही असुरक्षित और दबावों से भरी है। रूपहले परदे का सबसे कड़वा सच यही है कि यहां कलाकार की प्रतिभा के साथ उसकी मौजूदगी, उसका आकर्षण और उसकी युवा दिखने की क़ाबलियत को उसकी सफलता का पैमाना माना जाता है। दर्शक अपने पसंदीदा अभिनेताओं को जिस जिस रूप में देखना शुरू करते हैं, वे चाहते हैं कि वे जिंदगी भर उसी रूप में कायम रहें। दर्शक उम्र के साथ बूढ़े होते हैं, लेकिन वे अपने नायक या नायिका को बूढ़ा होते नहीं देखना चाहते। दर्शकों की यही अपेक्षा और परदे पर छाए रहने की भूख फिल्मी सितारों के मन में एक गहरा खौफ पैदा करती है। उम्र बढ़ने का खौफ और खुद को अप्रासंगिक हो जाने का डर। इसी डर के कारण कलाकार हर संभव कोशिश करते हैं कि वे उम्र को गच्चा दे सकें और ढलती उम्र में भी खुद को जवान, सुगठित और सुंदर बनाए रखें।
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-  हेमंत पाल

     हाल ही में सलमान खान से जुड़ी एक ऐसी ही घटना इस मनोवैज्ञानिक और शारीरिक दबाव की एक बानगी है। रियलिटी शो ‘बिग बॉस’ के मंच पर जब दर्शकों और सोशल मीडिया ट्रोलर्स ने उनके थोड़े ढले हुए रूप या तथाकथित ‘कमजोर लुक’ पर टिप्पणी की, तो सलमान का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने मंच पर ही अपनी टी-शर्ट उतारकर फेंक दी, अपनी सुगठित सिक्स-पैक बॉडी दिखाई और सफाई दी कि क्लीन शेव और छोटे बालों वाली हेयरस्टाइल उनकी कमजोरी या उम्र का असर नहीं, बल्कि उनकी आने वाली फिल्म के किरदार की मांग है। यह सिर्फ सलमान का बॉडी-बिल्डिंग प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक सुपरस्टार का वह बचाव था, जो यह साबित करने के लिए बेचैन था कि वह आज भी उतना ही फिट, हैंडसम और शक्तिशाली है जितना दो दशक पहले था। 
    यह घटना उस मानसिक दबाव को उजागर करती है जिसके तहत आज के सितारे अपनी छरहरी और युवा छवि बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह कहानी आज के दौर या केवल सलमान खान तक सीमित नहीं है। स्टारडम की यह रक्षात्मक जंग हिंदी सिनेमा के इतिहास जितनी ही पुरानी है। अगर हम पुराने जमाने के कलाकारों और सिनेमा के सुनहरे दौर में झांककर देखें, तो हमें ऐसे कई किस्से और उदाहरण मिलेंगे, जहां अभिनेताओं ने अपनी ढलती उम्र, झड़ते बालों और चेहरे की झुर्रियों को दुनिया की नजरों से छिपाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी एक नकाब के पीछे जी ली। आज शाहरुख़ खान और आमिर खान भी उम्र छुपाने के जतन में कोई कमी नहीं रखते, पर इस भीड़ में तमिल और हिंदी अभिनेता रजनीकांत अपवाद है, जो कैमरे से हटते ही अपने असल रूप में आने में देर नहीं करता।  
    उम्र भर जवान बने रहने और खुद को सदाबहार साबित करने की इस होड़ में सबसे बड़ा और दिलचस्प नाम आता है दिग्गज अभिनेता देव आनंद का। देव साहब सिर्फ परदे पर ही नहीं, बल्कि अपनी असल जिंदगी में भी ढलती उम्र को स्वीकार करने के सख्त खिलाफ थे। 80 का आंकड़ा पार कर जाने के बाद भी वे उसी ऊर्जा, गले में स्कार्फ, सिर पर खास अंदाज की टोपी और अपनी विशिष्ट चाल के साथ जनता के सामने आते थे। उनके भीतर खुद को हमेशा जवान और रोमांटिक हीरो बनाए रखने का ऐसा जुनून था कि उन्होंने उम्र के आखिरी पड़ाव तक मुख्य अभिनेता के रूप में फिल्में बनाना जारी रखा, भले ही दर्शक और समीक्षक उनके उस ढलते रूप को देखकर असहज होते रहे। देव आनंद की यह चाहत सिर्फ उनके पहनावे या फिल्मों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनकी मौत के बाद की छवि से भी जुड़ी थी। वे नहीं चाहते थे कि दुनिया कभी भी उनके कमजोर, ढले हुए या बेजान शरीर को देखे। उन्होंने अपने परिवार से कह दिया था कि उनकी मृत्यु के बाद उनका मृत चेहरा किसी को न दिखाया जाए, न फोटो सामने आए। जहां भी उनका निधन हो, बिना किसी को सूचना दिए वहीं चुपचाप उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाए। यही वजह थी कि जब लंदन में उनका निधन हुआ, तो उनका अंतिम संस्कार वहीं किया गया। वे दुनिया के जेहन में हमेशा उसी मुस्कुराते, रोमांटिक और जिंदादिल ‘सदाबहार देव आनंद’ की छवि छोड़ जाना चाहते थे, किसी बूढ़े या बेजान इंसान की तस्वीर नहीं। यह प्रसंग दिखाता है कि उम्र और मौत के आगे न झुकने की जिद किस हद तक किसी कलाकार के वजूद पर हावी हो सकती है।
इन्होंने जिंदगीभर गंजेपन को छुपाया 
      ब्लैक एंड व्हाइट और शुरुआती रंगीन सिनेमा के दौर में तकनीक इतनी उन्नत नहीं थी कि डिजिटल एडिटिंग या वीएफएक्स के जरिए किसी के चेहरे से झुर्रियां मिटाई जा सकें। इसलिए उस दौर के सितारे शारीरिक रूप से अपनी कमियों को छिपाने के लिए तरह-तरह के जतन करते थे। बीते दौर के मशहूर और रोबीले अभिनेता राजकुमार और जाने-माने अभिनेता व निर्देशक राकेश रोशन की मिसाल ली जा सकती है। ये दोनों ही दिग्गज अपने दौर में गंजेपन की समस्या से जूझ रहे थे। लेकिन, अपने स्टारडम और अपनी हीरो वाली छवि को बचाए रखने के लिए उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से बिना विग के आना स्वीकार नहीं किया। राजकुमार ने जीवन भर अपने सिर पर ऐसी विग पहनी कि आम जनता को कभी आभास ही नहीं हुआ कि उनके प्राकृतिक बाल नहीं हैं। राकेश रोशन ने भी अपनी पूरी जवानी और अभिनय के करियर के दौरान सिर पर घने बालों वाली विग लगाए रखी। उनके लिए विग केवल एक मेकअप का सामान नहीं थी, बल्कि उनकी उस पहचान का हिस्सा थी जिसके सहारे वे परदे पर हीरो बने रह सकते थे।
अमिताभ छुपते हैं फैंस के सामने  
    इसी तरह, महानायक अमिताभ बच्चन का अपने प्रशंसकों के प्रति समर्पण और अपनी सार्वजनिक छवि को लेकर सजगता सर्वविदित है। उम्र के इस पड़ाव पर भी जब वे हर रविवार को अपने बंगले ‘जलसा’ के बाहर प्रशंसकों का अभिवादन स्वीकार करने आते हैं। उस वक़्त वे अपनी वेशभूषा और ग्रूमिंग का पूरा ध्यान रखते हैं। वे सिर पर कपड़ा या स्कार्फ बांधकर बाहर निकलते हैं, ताकि उनके ढले हुए रूप या असल बालों की छवि किसी कैमरे में कैद न हो जाए। यह सतर्कता इस बात का प्रमाण है कि 80 वर्ष की उम्र पार कर जाने के बाद भी सुपरस्टार का ताज सिर पर बनाए रखने का दबाव कितना भारी होता है। स्टारडम और यूथफुल लुक को बनाए रखने का ऐसा ही एक रोचक और थोड़ा दुखद वाकया सदाबहार अभिनेता अनिल कपूर के साथ भी देखने को मिला। अनिल कपूर को दशकों से उनकी कभी न ढलने वाली उम्र और ‘एवरग्रीन’ लुक के लिए जाना जाता है। लेकिन, हाल ही में जब सोशल मीडिया पर उनके खिचड़ी (सफेद और काले) बालों वाली एक अनदेखी तस्वीर बिना उनकी मर्जी के किसी ने खींचकर पोस्ट कर दी, तो वे काफी असहज हो गए। वजह साफ थी दशकों से जिस ‘रिवर्स एजिंग’ वाली जादुई छवि को उन्होंने सहेजकर रखा था, उस पर अचानक वास्तविकता का कड़ा प्रहार हुआ था।
नायिकाएं भी इस दौड़ में पीछे नहीं 
    ग्लैमर की इस दौड़ में पुरुष कलाकारों के साथ-साथ महिला कलाकारों पर भी खूबसूरत और हमेशा जवां दिखने का दबाव और भी ज्यादा क्रूर रहा है। इसकी सबसे बड़ी मिसाल बॉलीवुड की एवरग्रीन ब्यूटी रेखा हैं। 70 वर्ष का आंकड़ा पार करने के बाद भी रेखा जब किसी अवॉर्ड शो, शादी या सार्वजनिक कार्यक्रम में कदम रखती हैं, तो वे बिल्कुल किसी नवविवाहिता या ढलती उम्र से बेखबर हसीन मलिका की तरह सजी-धजी नजर आती हैं। उनके बारे में तो फिल्म इंडस्ट्री में यहाँ तक कहा जाता है कि वे बिना भारी-भरकम मेकअप, रेशमी साड़ियों और जेवरों के अपने बेडरूम या घर के कमरे से बाहर भी कदम नहीं रखतीं। उनका पूरा जीवन एक ऐसे तिलिस्म को बनाए रखने की कोशिश बन गया है, जहां उम्र ठहर सी गई है। वे अपनी असली उम्र को स्वीकार करने के बजाय हमेशा उस काल्पनिक सुंदरता के खोल में कैद रहना पसंद करती हैं जो दर्शकों ने दशकों पहले परदे पर देखी थी। हालांकि, इसी ग्लैमरस दुनिया में कुछ ऐसे विरले और साहसी अपवाद भी रहे हैं जिन्होंने उम्र के प्राकृतिक नियम को सहर्ष स्वीकार किया और ढलती उम्र के साथ मिलने वाले बड़प्पन व गरिमा को अपनी असली पहचान बनाया। 
आशा और जया जैसे उदाहरण अपवाद 
     अभिनेत्री आशा पारेख और जया भादुड़ी (बच्चन) इसके बेहद सुंदर उदाहरण हैं। आशा पारेख ने अपने जमाने में अपार सफलता देखी, लेकिन जब उम्र ढलने लगी, तो उन्होंने नकली बालों, झुर्रियां छिपाने वाले कॉस्मेटिक सर्जरी या कृत्रिम रंगों का सहारा लेने से मना कर दिया। वे आज अपने पूरी तरह सफेद हो चुके बालों और चेहरे की स्वाभाविक झुर्रियों के साथ पूरी गरिमा और गर्व से दुनिया के सामने आती हैं। इसी तरह जया बच्चन ने भी कभी अपने सफेद बालों को छिपाने या खुद को जबरन जवान दिखाने की बचकानी कोशिश नहीं की। उन्होंने उम्र के हर पड़ाव को उसी रूप में अपनाया जैसा कुदरत ने उन्हें दिया। आशा पारेख या जया बच्चन जैसे उदाहरण अपवाद ही हैं। ज्यादातर कलाकारों के लिए उम्र को धोखा देना एक मजबूरी बन जाता है। सिनेमा का व्यापार और दर्शकों का मनोविज्ञान ही कुछ ऐसा है कि जो दिखता है, वही बिकता है। आज के आधुनिक दौर में तो यह होड़ और भी ज्यादा भयावह हो चुकी है। अब केवल विग या मेकअप तक बात सीमित नहीं रही है; आज के सितारे बोटॉक्स, फेशियल लिफ्टिंग, हेयर ट्रांसप्लांट, लिपोसक्शन और न जाने कितनी तरह की दर्दनाक सर्जरी का सहारा लेकर अपनी ढलती त्वचा को कसने और खुद को जवान दिखाने में लगे हैं।
आकर्षक दिखने की चाहत या मज़बूरी 
      इस पूरी मानसिक स्थिति के पीछे कलाकारों की एक बहुत बड़ी मानवीय कमजोरी छिपी होती है असुरक्षा की भावना। जिस इंसान ने अपनी जवानी में लाखों-करोड़ों लोगों की तालियां, सीटी और अंधा प्यार देखा हो, उसके लिए अचानक एक दिन आईने में अपनी झुर्रियां देखना और यह अहसास करना कि उसका दौर अब ढल रहा है, बेहद दर्दनाक होता है। वे भूल जाते हैं कि उम्र का बढ़ना एक प्राकृतिक और अटल सत्य है जिसे कोई भी बोटॉक्स या सिक्स-पैक एब्स हमेशा के लिए रोक नहीं सकते। जब दर्शक किसी अभिनेता को उसकी अभिनय क्षमता के बजाय केवल उसके लुक के लिए पूजने लगते हैं, तो अभिनेता भी खुद को एक वस्तु या केवल एक आकर्षक चेहरे के रूप में देखने लगता है। 
     उम्र को धोखा देकर खुद को हमेशा यंग दिखाने की यह जिद फिल्म कलाकारों की सबसे बड़ी त्रासदी भी है और उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी। वे पूरी जिंदगी परदे पर दूसरों का किरदार निभाते हैं, लेकिन अफसोस की बात यह है कि अपनी असल जिंदगी में भी वे अपने वास्तविक रूप यानी अपनी ढलती उम्र और स्वाभाविक शरीर को स्वीकार नहीं कर पाते। वे उम्रभर एक ऐसे भ्रम और नकाब को ओढ़े रहते हैं जो कभी न कभी टूट ही जाता है। अगर कलाकार और दर्शक दोनों यह समझ लें कि ढलती उम्र के साथ आने वाली झुर्रियां अनुभव, परिपक्वता और अभिनय की गहराई का प्रतीक होती हैं, न कि किसी कमजोरी का, तो शायद हमारे सितारों को अपनी टी-शर्ट उतारकर अपनी जवानी का सबूत नहीं देना पड़ेगा और न ही पूरी जिंदगी किसी विग या भारी मेकअप के पीछे छुपकर गुजारनी पड़ेगी।
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Saturday, October 10, 2026

डिजिटल युग : अखबारों के सामने नई चुनौती

   अखबार का इतिहास केवल कागज पर छपी खबरों का इतिहास नहीं है। यह समाज की स्मृति, सार्वजनिक बहस, सत्ता की निगरानी और लोकतांत्रिक संवाद के विकास का इतिहास भी है। भारत में अखबारों ने लंबे समय तक सुबह की सूचना-व्यवस्था को नियंत्रित किया। पाठक के हाथ में आने वाला अखबार सिर्फ खबरों का संग्रह नहीं होता था, बल्कि वह दिन की शुरुआत का एक भरोसेमंद जरिया भी था। लेकिन इंटरनेट, स्मार्टफोन, समाचार वेबसाइटों और सोशल मीडिया के विस्तार ने इस पूरी व्यवस्था को बदल दिया। आज खबर के लिए अगली सुबह तक इंतजार करने की जरूरत नहीं होती। घटना के चंद सेकंड बाद उसकी सूचना मोबाइल स्क्रीन पर झलक जाती है। यही बदलाव पारंपरिक अखबार के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर आया।
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- हेमंत पाल

     हमारे देश में अखबार की लत सुबह की चाय की तरह है। आज भी उम्रदराज लोग सुबह उठते ही अखबार ढूंढते हैं और नहीं मिलने पर विचलित भी होते हैं। पर, यह दृश्य धीरे-धीरे कम  लगे। जैसे-जैसे पीढ़ियाँ बदल रही हैं, अखबार पढ़ने की आदत कम भी हो रही है। लेकिन, प्रिंट मीडिया कभी ख़त्म होगा, ऐसा नहीं लगता। अमेरिका और अन्य देशों की स्थिति भारत से अलग है। यहां डिजिटल माध्यम तेजी से बढ़े, लेकिन अखबार पूरी तरह समाप्त नहीं हुए। खासकर हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के अखबारों की सामाजिक और भौगोलिक पहुंच अब भी मजबूत है। फिर भी प्रसार और पाठकीय आदतों पर डिजिटल संक्रमण का असर साफ दिखाई देता है। समस्या यह नहीं कि कितने लोग अखबार खरीद रहे हैं, बल्कि यह भी है कि नई पीढ़ी खबर को किस माध्यम से देखती है, किस पर भरोसा करती है और कितनी देर तक किसी खबर के साथ रहती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि डिजिटल मीडिया ने अखबार से उसकी पुरानी सूचना पर लगभग पूरी तरह नियंत्रण कर लिया। अब अखबार के सामने केवल डिजिटल समाचार संस्थान नहीं, बल्कि यूट्यूब चैनल, सोशल मीडिया, न्यूज़ ग्रुप, इंडिपेंडेंट जर्नलिस्ट खबर की दुनिया से जुड़े प्रभावशाली लोग भी खबर के वितरक बन गए। इस बदलाव ने अखबारों के कारोबार, प्रसार, विज्ञापन और पत्रकारिता की विश्वसनीयता, इन सभी को प्रभावित किया।
   अखबारों के सामने चुनौती को समझने के लिए प्रसार और पाठक संख्या के आंकड़ों को अलग-अलग देखना होगा। भारत में अंतिम व्यापक भारतीय पाठक सर्वेक्षण 2019 में हुआ था। कोरोना महामारी के कारण 2020 में भारतीय पाठक सर्वेक्षण रुक गया और 2025 तक उसके दोबारा नियमित रूप से शुरू नहीं होने की स्थिति बनी रही। इसलिए वर्तमान पाठक संख्या के बारे में 2019 के बाद का कोई समान स्तर का राष्ट्रीय आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। यह स्वयं प्रिंट मीडिया के लिए एक महत्वपूर्ण समस्या है। क्योंकि, उद्योग और विज्ञापनदाताओं के पास बदलती पाठकीय आदतों का लगातार तुलनीय राष्ट्रीय आधार नहीं है। 2019 के भारतीय पाठक सर्वेक्षण में देश में प्रिंट पाठकों की संख्या लगभग 42.5 करोड़ बताई थी, जो 2017 के लगभग 40.7 करोड़ से अधिक थी। उस समय यह आंकड़ा एक दिलचस्प तस्वीर प्रस्तुत करता था। वैश्विक स्तर पर प्रिंट मीडिया संकट में था, लेकिन भारत में हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के कारण अखबारों का पाठक आधार बढ़ रहा था। हिंदी के करीब 18.6 करोड़ और क्षेत्रीय भाषाओं के करीब 21.1 करोड़ पाठक बताए गए थे।
    इसी दौर में डिजिटल समाचार की खपत तेजी से बढ़ रही थी। 2019 के एक सर्वेक्षण में ऑनलाइन समाचार की मासिक खपत में लगातार वृद्धि दर्ज की गई और किसी भी दैनिक अखबार का कुल पाठक प्रतिशत 36.8% से घटकर 35.8% हुआ। यानी प्रिंट का संकट अचानक पैदा नहीं हुआ; डिजिटल बदलाव महामारी से पहले ही पाठकीय व्यवहार बदलना शुरू कर चुका था। कोरोना महामारी ने इस बदलाव को कई साल आगे धकेल दिया। 2020 में अखबारों की भौतिक वितरण व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई। घरों और सोसायटियों में अखबार पहुंचना बंद हुए, विज्ञापन बाजार गिरा और पाठकों का एक हिस्सा पहली बार नियमित रूप से डिजिटल माध्यम पर चला गया। फेडरेशन ऑफ़ इंडियन चैम्बर्स ऑफ़ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज (एफआईसीसीआई) के आंकड़ों के अनुसार 2020 में प्रिंट क्षेत्र की प्रसार आय 2019 के मुकाबले 24% घट गई, जबकि विज्ञापन आय में 41% की गिरावट आई। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के अखबारों की प्रसार आय में गिरावट अंग्रेजी अखबारों की तुलना में कम रही।
     2022 में भी महामारी से पहले की स्थिति पूरी तरह वापस नहीं आई थी। एफआईसीसीआई  के अनुसार जिन प्रकाशकों ने दोनों अवधियों में लेखा-परीक्षण कराया, उनकी औसत दैनिक प्रसार संख्या जनवरी-जून 2022 में जुलाई-दिसंबर 2019 की तुलना में 23% कम थी। अंग्रेजी अखबारों पर असर अधिक था, जबकि हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के अखबारों ने अपेक्षाकृत बेहतर वापसी की। यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य सामने आता है। भारत में प्रिंट मीडिया को लेकर अक्सर यह धारणा बनाई जाती है, कि डिजिटल मीडिया के कारण अखबार लगातार और समान गति से खत्म हो रहे हैं। आंकड़े इससे अधिक जटिल तस्वीर दिखाते हैं। 2020 में बड़ा झटका लगा, उसके बाद कुछ सुधार हुआ, लेकिन कोरोना महामारी से पहले का प्रसार पूरी तरह वापस नहीं आया। 2023 में प्रिंट की प्रसार आय बढ़कर लगभग 82 अरब रुपए हुई, फिर भी यह 2019 के स्तर की करीब 92% ही थी। अंग्रेजी प्रकाशनों की प्रसार आय अब भी महामारी-पूर्व स्तर से 20% से अधिक नीचे थी, जबकि अन्य भाषाओं में यह अंतर करीब 6% था।  इसका अर्थ यह है कि भारतीय अखबारों का संकट केवल 'पाठक अखबार छोड़ रहे हैं' जैसी सीधी कहानी नहीं है। वास्तविकता यह है कि अखबारों के पाठक आधार में पीढ़ीगत बदलाव, शहर और छोटे शहरों के बीच अंतर, भाषा के आधार पर अलग-अलग व्यवहार और डिजिटल तथा प्रिंट के मिश्रित उपयोग की प्रवृत्ति एक साथ काम कर रही है।
विज्ञापन का पैसा डिजिटल की ओर
    अखबार के अस्तित्व का सवाल केवल पाठक संख्या का सवाल नहीं है। उसका आर्थिक मॉडल विज्ञापन से गहराई से जुड़ा रहा। जब पाठक का ध्यान डिजिटल स्क्रीन पर जाता है, तो विज्ञापनदाता भी उसी दिशा में जाता है। यही बदलाव पिछले कुछ सालों में सबसे तेज हुआ। एफआईसीसीआई की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार भारत का मीडिया और मनोरंजन उद्योग 2.5 लाख करोड़ तक पहुंच गया। इस पूरे क्षेत्र में डिजिटल मीडिया सबसे बड़ा खंड बन गया और उसकी हिस्सेदारी 32% रही। डिजिटल विज्ञापन 17% बढ़कर 70,000 करोड़ रुपए तक पहुंच गया और कुल विज्ञापन खर्च में उसकी हिस्सेदारी 55% हो गई। इसके विपरीत प्रिंट के विज्ञापन राजस्व में केवल 1% वृद्धि हुई और उसकी सदस्यता आय 1% घटी। प्रिंट की डिजिटल आय अभी भी उसके कुल राजस्व के 5% से कम थी। यह बदलाव सिर्फ प्रतिशतों का मामला नहीं है। डिजिटल विज्ञापनदाता को पाठक की उम्र, स्थान, रुचि, व्यवहार और ऑनलाइन गतिविधियों के आधार पर लक्षित करने की क्षमता देता है।
    प्रिंट अखबार में एक पूरे पृष्ठ का विज्ञापन हजारों या लाखों लोगों तक पहुंचता है, लेकिन विज्ञापनदाता यह हमेशा तय नहीं कर सकता कि उनमें से कितने संभावित ग्राहक हैं। डिजिटल माध्यम में विज्ञापन की पहुंच और प्रतिक्रिया को लगभग तुरंत मापा जा सकता है। यही वजह है कि विज्ञापन का पैसा उस माध्यम की ओर जाता है जहां पाठक का ध्यान अधिक समय तक और अधिक सटीक तरीके से खरीदा जा सकता है। सोशल मीडिया और लघु वीडियो ने इस प्रतिस्पर्धा को और तेज कर दिया। फिर भी प्रिंट पूरी तरह आर्थिक रूप से अप्रासंगिक नहीं हुआ। एफआईसीसीआई  के अनुसार 2024 में प्रिंट विज्ञापन राजस्व में मामूली वृद्धि हुई और विशेष रूप से प्रीमियम विज्ञापन प्रारूपों ने इसे सहारा दिया। इसका अर्थ है कि अखबार अब भी भरोसेमंद ब्रांड, स्थानीय पहुंच और विशेष वर्ग के पाठकों के कारण विज्ञापनदाताओं के लिए उपयोगी हैं।
खबर की गति ने अखबार की भूमिका बदली 
    अखबार की सबसे बड़ी ताकत कभी यह थी कि वह दिन की घटनाओं को एक जगह उपलब्ध कराता था। अब वही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गई। सोशल मीडिया और समाचार वेबसाइटों ने खबर को 24 घंटे के चक्र से निकालकर लगातार चलने वाली प्रक्रिया बना दिया है। किसी शहर में दुर्घटना हो, राजनीतिक घोषणा हो, क्रिकेट मैच का परिणाम हो या किसी अभिनेता की मृत्यु की खबर सूचना कुछ ही मिनटों में मोबाइल तक पहुंच जाती है। पाठक अगले दिन अखबार खोलकर यह जानने की प्रतीक्षा नहीं करता कि क्या हुआ। इसलिए अखबार का मूल्य अब 'सबसे पहले खबर देने' में नहीं रह गया। यह परिवर्तन अखबारों के लिए चुनौती के साथ अवसर भी है। यदि डिजिटल माध्यम घटना बताता है तो अखबार को घटना समझानी होगी। डिजिटल मंच पर 'क्या हुआ' तेजी से उपलब्ध है, लेकिन क्यों हुआ, इसका असर क्या होगा, किसकी जिम्मेदारी है और पृष्ठभूमि क्या है जैसे सवालों के लिए अभी भी अखबार की जरूरत है। इसी कारण आने वाले समय में अखबार की असली प्रतिस्पर्धा वेबसाइट से कम और उसकी अपनी पत्रकारिता की गुणवत्ता से अधिक होगी। यदि अखबार केवल सोशल मीडिया पर चल चुकी खबर को अगले दिन दोहराता है, तो उसकी उपयोगिता लगातार घटेगी। लेकिन यदि वह दस्तावेज, तथ्य, स्थानीय स्रोत, आंकड़े, जांच और विश्लेषण के साथ खबर को व्यापक संदर्भ देता है, तो उसका महत्व बना रहेगा। 
डिजिटल मीडिया से विश्वसनीयता का संकट 
    डिजिटल क्रांति का सबसे विरोधाभासी पहलू यह है कि सूचना की उपलब्धता बढ़ी, लेकिन सूचना पर भरोसा करना भी कठिन हुआ। सोशल मीडिया पर खबर और राय के बीच की रेखा अक्सर मिट जाती है। किसी वीडियो को खबर की तरह प्रस्तुत किया जा सकता है, पुरानी तस्वीर को नई घटना से जोड़कर प्रसारित किया जा सकता है और अधूरी सूचना को सनसनीखेज शीर्षक के साथ लाखों लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। राइटर इंस्टीट्यूट की 2026 डिजिटल न्यूज़ रिपोर्ट में भारत के लिए कुल समाचार-विश्वास 39% दर्ज किया गया, जो पिछले वर्ष से 4% अंक कम था। भारत 48 बाजारों में 18वें स्थान पर रहा। रिपोर्ट यह भी बताती है कि प्रिंट के पुराने और स्थापित समाचार ब्रांड अब भी ब्रांड-स्तर पर अपेक्षाकृत ऊंचा भरोसा रखते हैं। यानी डिजिटल संक्रमण ने अखबार की विश्वसनीयता खत्म नहीं की है; बल्कि उसने अखबारों के लिए भरोसे को एक नई प्रतिस्पर्धात्मक ताकत बना दिया है।
    यह भरोसा स्वतः सुरक्षित नहीं रहेगा। 2025 की रिपोर्ट में भारत में 53% उत्तरदाताओं ने व्हाट्सएप को झूठी और भ्रामक सूचना के सबसे बड़े खतरे वाले माध्यम के रूप में बताया था। भारत में यूट्यूब, व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम और फेसबुक न्यूज़ तक पहुंचने के प्रमुख डिजिटल रास्तों में शामिल हैं। यह स्थिति अखबारों के लिए महत्वपूर्ण संदेश देती है। पाठक फर्जी खबरों से परेशान है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह केवल अखबार पर वापस लौट जाएगा। वह कई स्रोतों से जानकारी लेता है और फिर तय करता है कि किस पर भरोसा करना है। इसलिए अखबार को 'हम प्रिंट हैं इसलिए विश्वसनीय हैं' वाली धारणा से आगे बढ़ना होगा। विश्वसनीयता अब हर खबर में कमानी पड़ेगी।
खबर की होड़ से पत्रकारिता प्रभावित 
    डिजिटल माध्यम की प्रतिस्पर्धा ने पारंपरिक पत्रकारिता पर भी दबाव डाला। पहले रिपोर्टर के पास खबर जुटाने, पुष्टि करने और संपादक के पास भेजने का समय होता था। अब हर संस्थान को पहले प्रकाशित करने का दबाव है। इससे कई बार शीर्षक पहले बन जाता है और तथ्य बाद में तलाशे जाते हैं।सोशल मीडिया की लोकप्रियता ने पत्रकारिता में एक और बदलाव किया है। पत्रकार स्वयं भी अब एक ब्रांड बन गया। उसके अनुयायी उसकी व्यक्तिगत राय, वीडियो और सोशल मीडिया गतिविधियों को समाचार संस्था से अलग पहचानने लगते हैं। इससे स्वतंत्र पत्रकारिता के नए अवसर पैदा हुए हैं, लेकिन संपादकीय नियंत्रण की पारंपरिक व्यवस्था कमजोर भी हुई है। 2025 के राइटर इंस्टीट्यूट अध्ययन में यह भी सामने आया कि जब लोग किसी सूचना के गलत होने की जांच करना चाहते हैं, तो सबसे बड़ा हिस्सा विश्वसनीय समाचार संस्थानों और आधिकारिक स्रोतों की ओर जाता है। यानी फेक न्यूज के दौर में भी सत्यापन के लिए संस्थागत पत्रकारिता की जरूरत समाप्त नहीं हुई। यही वह क्षेत्र है जहां अखबार अपनी सबसे बड़ी ताकत फिर से स्थापित कर सकते हैं। तथ्य-जांच, दस्तावेज आधारित रिपोर्टिंग, स्थानीय संवाददाता नेटवर्क और संपादकीय जवाबदेही डिजिटल शोर के बीच अखबार को अलग पहचान दे सकती है।
नई पीढ़ी और अखबार का बदलता रिश्ता
   जेन-जी और युवा पाठकों के लिए समाचार पढ़ना एक अलग अनुभव है। वे खबर को किसी एक निश्चित समय पर नहीं पढ़ते। मोबाइल उनके लिए समाचार पत्र, रेडियो, टेलीविजन और सामाजिक संवाद का एक साथ माध्यम है। 2026 की डिजिटल न्यूज़ रिपोर्ट के अनुसार भारत में इंटरनेट पहुंच 70% तक पहुंच चुकी है और आधे से अधिक उत्तरदाता सोशल मीडिया का इस्तेमाल समाचार के लिए करते हैं। वीडियो आधारित मंचों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। इस पीढ़ी को अखबार से जोड़ने के लिए केवल अखबार की वेबसाइट बना देना पर्याप्त नहीं है। डिजिटल पाठक के लिए सामग्री की प्रस्तुति, भाषा, वीडियो, दृश्य सामग्री, मोबाइल अनुभव और संवाद का तरीका भी महत्वपूर्ण है। लेकिन, इसका अर्थ यह नहीं कि अखबार को अपनी पहचान छोड़कर पूरी तरह सोशल मीडिया जैसा बन जाना चाहिए। यदि अखबार भी वही छोटी, उत्तेजक और जल्दबाजी वाली सामग्री देने लगे जो सोशल मीडिया पर पहले से मौजूद है, तो उसके अस्तित्व का औचित्य ही कमजोर हो जाएगा। अखबार की नई भूमिका 'सबसे पहले' से 'सबसे भरोसेमंद और सबसे उपयोगी' की ओर बदलनी होगी।
डिजिटलीकरण से बचेगा अस्तित्व 
    लगभग सभी बड़े अखबारों ने वेबसाइट, मोबाइल ऐप और सोशल मीडिया मंचों पर अपनी उपस्थिति बनाई है। लेकिन, डिजिटल उपस्थिति और डिजिटल पत्रकारिता में अंतर है। वेबसाइट पर अखबार का पीडीएफ डाल देना डिजिटलीकरण नहीं है। डिजिटल पत्रकारिता का अर्थ है कि समाचार उत्पादन, प्रस्तुति, वितरण और पाठक संवाद की पूरी प्रक्रिया डिजिटल व्यवहार के अनुरूप बदले। इसके साथ एक आर्थिक प्रश्न भी जुड़ा है। डिजिटल पाठक के लिए मुफ्त सामग्री उपलब्ध होने की आदत इतनी मजबूत है कि डिजिटल सदस्यता विकसित करना आसान नहीं है। एफआईसीसीआई के अनुसार 2024 में देश में ख़बरों की भुगतान वाली डिजिटल सदस्यता लगभग 3.1 करोड़ नहीं, बल्कि 3.1 मिलियन, यानी 31 लाख के आसपास थी। यह बताता है कि डिजिटल पाठक बड़ी संख्या में मौजूद होने के बावजूद उसके लिए भुगतान करने की आदत अभी सीमित है। इसलिए भविष्य में अखबारों को केवल विज्ञापन पर निर्भर रहने के बजाय सदस्यता, विशेष सामग्री, आयोजन, स्थानीय सेवाओं, प्रीमियम संस्करण और डिजिटल उत्पादों जैसे विविध आय स्रोत भी विकसित करने होंगे।
स्थानीय पत्रकारिता अखबार की पूंजी
    डिजिटल मीडिया वैश्विक और राष्ट्रीय खबरें बहुत तेजी से देता है, लेकिन स्थानीय स्तर पर उसकी पकड़ असमान है। किसी शहर की नगर निगम व्यवस्था, स्थानीय सड़क, वार्ड, गांव, जिला अस्पताल, स्थानीय व्यापार, शिक्षा, अदालत, प्रशासन और नागरिक समस्याओं की नियमित निगरानी अभी भी स्थानीय अखबारों की बड़ी ताकत है। भारत में हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं के अखबारों ने इसी स्थानीय जुड़ाव के कारण महामारी के बाद अपेक्षाकृत बेहतर वापसी की। एफआईसीसीआई-ईवाई के आंकड़ों में भी क्षेत्रीय भाषाओं के प्रकाशनों पर महामारी का असर अंग्रेजी प्रकाशनों की तुलना में कम दिखाई देता है। इसलिए छोटे शहरों और कस्बों की पत्रकारिता अखबारों के भविष्य का कमजोर हिस्सा नहीं, बल्कि मजबूत आधार हो सकती है। जिस खबर के लिए किसी डिजिटल मंच के पास स्थानीय संवाददाता नहीं है, वह खबर स्थानीय अखबार के पास हो सकती है। यही स्थानीयता उसे डिजिटल भीड़ में अलग पहचान देती है।
अखबारों की विश्वसनीयता बड़ी संपत्ति
    डिजिटल युग में अखबार का भविष्य अंततः तकनीक से अधिक विश्वसनीयता पर निर्भर करेगा। सोशल मीडिया सूचना को तेज बना सकता है, लेकिन वह अपने आप सूचना को सत्य नहीं बनाता। वीडियो वायरल हो सकता है, लेकिन वायरल होना प्रमाण नहीं है। हजारों लोग किसी दावे को साझा कर सकते हैं, लेकिन इससे वह तथ्य नहीं बन जाता। इसी जगह संपादकीय संस्था का महत्व सामने आता है। खबर प्रकाशित करने से पहले तथ्य की पुष्टि, संबंधित पक्ष का पक्ष लेना, स्रोतों की जांच, भाषा में संयम और गलती होने पर उसे स्वीकार करना ये पत्रकारिता की वे बुनियादी प्रक्रियाएं हैं जिनका मूल्य डिजिटल शोर बढ़ने के साथ कम नहीं, बल्कि अधिक हुआ है। राइटर इंस्टीट्यूट के आंकड़े भी इसी विरोधाभास को दिखाते हैं। भारत में कुल समाचार-विश्वास 2026 में 39% तक गिरा, लेकिन पुराने प्रिंट ब्रांड अब भी ब्रांड-विश्वास के स्तर पर मजबूत बने हुए हैं। यह अखबारों के लिए चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि कुल पत्रकारिता पर भरोसा कमजोर हो रहा है और अवसर इसलिए कि विश्वसनीय संस्थागत पत्रकारिता के लिए पाठक अब भी जगह बनाए है।
अखबार खत्म नहीं होगा, रूप बदलेगा
   डिजिटल मीडिया ने अखबार के सामने गंभीर चुनौती खड़ी की, लेकिन यह कहना जल्दबाजी होगी कि छपी ख़बरों का अंत निकट है। भारत की भाषाई विविधता, ग्रामीण और छोटे शहरों की आबादी, स्थानीय पत्रकारिता की जरूरत और स्थापित समाचार ब्रांडों के प्रति बचा हुआ भरोसा प्रिंट को अभी भी महत्वपूर्ण बनाते हैं। लेकिन, यह भी उतना ही सच है कि अखबार पहले जैसा नहीं रह सकता। 2019 में भारत का प्रिंट पाठक आधार 42.5 करोड़ तक पहुंचने के बावजूद डिजिटल समाचार तेजी से बढ़ रहा था। महामारी ने प्रसार और विज्ञापन को जोरदार झटका दिया। 2022 में कई प्रकाशनों का प्रसार अब भी महामारी-पूर्व स्तर से 23% नीचे था। 2023 में प्रसार आय में सुधार के बावजूद वह 2019 के स्तर से पीछे रही। 2024 में डिजिटल विज्ञापन 70 हजार करोड़ तक पहुंच गया और कुल विज्ञापन खर्च में उसकी हिस्सेदारी 55% हो गई, जबकि प्रिंट विज्ञापन में केवल 1% वृद्धि हुई।
    इन आंकड़ों को मिलाकर देखें तो तस्वीर साफ है। अखबार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल कागज की लागत या प्रसार की नहीं है। असली चुनौती पाठक के समय और ध्यान की है। पाठक के पास अब पहले से कहीं अधिक विकल्प हैं। वह तय कर सकता है कि खबर अखबार से पढ़े, मोबाइल से देखे, वीडियो में सुने या किसी सोशल मीडिया से जाने। ऐसे माहौल में अखबार को खबरों की संख्या से नहीं, अपनी उपयोगिता से अपनी जगह बनानी होगी। उसे तेज डिजिटल माध्यम के सामने तथ्य, संदर्भ और विश्लेषण की ताकत खड़ी करनी होगी। उसे स्थानीय पत्रकारिता को मजबूत करना होगा। उसे युवा पाठक की भाषा और डिजिटल व्यवहार समझना होगा। उसे अपनी वेबसाइट और सामाजिक मंचों को केवल प्रचार का माध्यम नहीं, पत्रकारिता के नए संस्करण के रूप में विकसित करना होगा।
    सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि अखबार को अपनी सबसे पुरानी पूंजी यानी विश्वसनीयता को बचाना होगा। क्योंकि, जिस समय हर व्यक्ति खबर का प्रसारक बन सकता है, उस समय पेशेवर पत्रकारिता का सबसे बड़ा मूल्य यही है कि वह कह सके यह खबर हमने केवल सबसे पहले नहीं दी, हमने इसे जांच कर दिया है। इस अर्थ में डिजिटल युग अखबार के अंत की कहानी नहीं, उसके पुनर्निर्माण की कहानी है। कागज का आकार छोटा हो सकता है, प्रसार की गति बदल सकती है, पाठक मोबाइल पर जा सकता है और विज्ञापन का पैसा दूसरी जगह जा सकता है। लेकिन, समाज को प्रमाणित सूचना, संदर्भ और विश्वसनीय पत्रकारिता की जरूरत बनी रहेगी। भविष्य का सफल अखबार वही होगा जो इस जरूरत को पहचानकर कागज और स्क्रीन के बीच नहीं, बल्कि विश्वसनीयता और पाठक के बीच अपना नया रिश्ता कायम करेगा।
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नाना पाटेकर : सिनेमा के पर्दे का कठोर चेहरा, असल जिंदगी का मसीहा!

सोशल मीडिया पर कॉमेडी रील देखते हुए अचानक अंत में एक चेहरा सामने आता है। जोर-जोर से हंसता हुआ, आंखों में शरारत और चेहरे पर वही बेतकल्लुफी, जिसे देखते ही ‘वेलकम’ के उदय शेट्टी की याद आ जाती है। यह चेहरा नाना पाटेकर का है। कभी इस चेहरे पर दर्शक हंसे थे, कभी इसकी आंखों में गुस्सा देखकर सहमे थे और कभी इसकी आवाज में छिपी पीड़ा ने उन्हें भीतर तक छुआ था। पर, अब अफसोस यह है कि यह चेहरा असल दुनिया से विदा हो गया है। ‘वेलकम’ की हंसी से लेकर किसानों के आंसू पोंछने तक, नाना पाटेकर ने अपने पीछे अभिनय से कहीं बड़ी इंसानियत की विरासत छोड़ी। 
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- हेमंत पाल

    नाना पाटेकर दुनिया से चले गए, लेकिन उनका चेहरा शायद ही कभी हमारी स्मृतियों से विदा होगा। फिल्मों में वे जितनी बार दिखेंगे, उतनी ही बार उनकी आवाज कानों में गूंजेगी और उनके किरदार आंखों के सामने आकर खड़े होंगे। मगर नाना को सिर्फ अभिनेता के रूप में याद करना उनके व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा। उन्होंने पर्दे पर जितना अभिनय किया, उससे कहीं ज्यादा गहरी भूमिका उन्होंने जिंदगी में निभाई। पर्दे पर वे कठोर थे, आक्रामक थे, व्यवस्था को चुनौती देते थे, कभी अपराधी बने, कभी सैनिक और कभी विद्रोही नायक। लेकिन, कैमरा बंद होने के बाद वही आदमी उन लोगों के बीच खड़ा दिखाई देता था, जिनकी पीड़ा सुनने वाला भी कोई नहीं था। नाना पाटेकर को याद करते हुए सबसे पहले उनकी आवाज सुनाई देती है भारी, खुरदुरी और सीधे दिल में उतर जाने वाली। फिर उनका चेहरा सामने आता है। कभी गुस्से से तना हुआ, कभी व्यवस्था से लड़ता हुआ, कभी किसी को चुनौती देता हुआ और कभी अचानक खिलखिलाकर हंसता हुआ। 

       हिंदी और मराठी सिनेमा में उन्होंने ऐसे किरदारों को जन्म दिया, जिन्हें केवल अभिनय से नहीं, अपने पूरे व्यक्तित्व से जिया। ‘परिंदा’ का अन्ना हो, ‘प्रहार’ का कठोर सैनिक, ‘क्रांतिवीर’ का प्रताप हो या ‘तिरंगा’ का तेवर नाना ने हर किरदार को अपनी आवाज, आंखों और देहभाषा से ऐसा रूप दिया कि वह चरित्र अभिनेता से बड़ा होकर सिनेमा की स्मृति का हिस्सा बन गया। फिर वही नाना ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी बनकर सामने आए तो उनकी अभिनय क्षमता का दूसरा सिरा भी दिखाई दिया। जिस अभिनेता को देखकर दर्शक ‘परिंदा’ और ‘क्रांतिवीर’ में सहम सकते थे, वही ‘वेलकम’ में अपनी अजीबो-गरीब हंसी, अंदाज और संवादों से लोगों को हंसाता रहा। उनकी यही खासियत थी, वे किसी एक खांचे में टिकने वाले अभिनेता नहीं थे। उनके भीतर गुस्सा भी था, करुणा भी; कठोरता भी थी और हास्य भी। नाना पाटेकर का फिल्मी सफर 1978 की ‘गमन’ से शुरू हुआ। ‘अंकुश’ ने उन्हें पहचान दी और ‘परिंदा’ ने उनके अभिनय को नई ऊंचाई तक पहुंचाया। इसके बाद प्रहार, तिरंगा, क्रांतिवीर, खामोशी, अग्निसाक्षी, अब तक छप्पन, नटसम्राट और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय के अलग-अलग रंग सामने रखे। 
     उन्होंने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से लेकर पद्मश्री तक सम्मान हासिल किया। लेकिन, पुरस्कारों की लंबी सूची भी उस नाना को पूरी तरह परिभाषित नहीं कर सकती, जिसे उनके चाहने वाले एक बेहद सादा और संवेदनशील इंसान के रूप में याद करते हैं। उनके अभिनय के लिए उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले और 2013 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। नाना के व्यक्तित्व को समझने के लिए उनके बचपन और संघर्षों की ओर लौटना भी जरूरी है। उन्होंने कम उम्र में आर्थिक परेशानियों को करीब से देखा। परिवार की मदद के लिए काम किया और जीवन की कठिनाइयों को बहुत नजदीक से महसूस किया। शायद यही कारण था कि जब वे किसी गरीब, किसान या जरूरतमंद परिवार के सामने खड़े होते थे तो वहां उन्हें केवल एक समस्या नहीं दिखाई देती थी। उन्हें उस आदमी का संघर्ष दिखाई देता था, जो रोज जिंदगी से लड़ रहा।
     महाराष्ट्र के किसानों की त्रासदी ने नाना को भीतर तक झकझोरा। विदर्भ और मराठवाड़ा के सूखे इलाकों में जब किसानों की आत्महत्याओं की खबरें लगातार सामने आ रही थीं, तब उन्होंने केवल दुख जताने तक खुद को सीमित नहीं रखा। वे गांवों में गए, किसानों से मिले, उनके परिवारों के बीच बैठे और उनकी परेशानियों को समझने की कोशिश की। अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर उन्होंने किसान परिवारों की सहायता के लिए काम शुरू किया, जो आगे चलकर ‘नाम फाउंडेशन’ के रूप में सामने आया। यह नाना की जिंदगी का शायद सबसे बड़ा अध्याय था। जिस आदमी को सिनेमा ने करोड़ों लोगों की पहचान दी थी, उसने उस पहचान को अपने लिए नहीं, जरूरतमंदों तक पहुंचने के लिए इस्तेमाल किया। सूखे से प्रभावित इलाकों में पानी की समस्या, जल संरक्षण, ग्रामीण विकास और किसान परिवारों की सहायता जैसे काम इस प्रयास से जुड़े। किसान आत्महत्या से प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहारा देने से लेकर उनके जीवन को फिर से खड़ा करने की कोशिश तक, इस काम में नाना लगातार जुड़े रहे। 
     उनकी खासियत यह थी कि वे मंच पर खड़े होकर समाज सेवा की बातें करने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे लोगों के बीच जाने वाले इंसान थे। किसान परिवारों के घर बैठते, उनकी बातें सुनते और उनकी परेशानियों को समझते। जिन परिवारों ने अपने घर का कमाने वाला सदस्य खो दिया था, उनके लिए आर्थिक संकट के साथ भावनात्मक टूटन भी थी। नाना ने उस दर्द को केवल आंकड़ों की तरह नहीं देखा। उनके लिए हर परिवार की अपनी कहानी थी। यहीं नाना पाटेकर अपने फिल्मी किरदारों से कहीं बड़े दिखाई देते हैं। पर्दे पर उन्होंने ऐसे किरदार निभाए जो अपने गुस्से और तेवर से व्यवस्था को चुनौती देते थे। असल जिंदगी में उन्होंने उन लोगों का साथ देने की कोशिश की जो व्यवस्था की सबसे कमजोर सीढ़ी पर खड़े थे। 
      शायद इसीलिए उनकी सामाजिक भूमिका उनके अभिनय से अलग नहीं थी। दोनों के पीछे एक ही चीज काम करती थी अन्याय और पीड़ा को देखकर भीतर से बेचैन हो जाना। नाना को दिखावे से हमेशा दूरी रही। स्टारडम की चमक उन्हें अपनी ओर खींच नहीं पाई। उनका रहन-सहन सादा रहा और बातचीत में भी बनावटीपन नहीं था। यही वजह थी कि उन्हें देखकर लगता था कि यह व्यक्ति पर्दे पर जितना बड़ा अभिनेता है, निजी जिंदगी में उतना ही सहज इंसान है। वे जमीन पर बैठकर लोगों से बात कर सकते थे, किसी किसान की पीड़ा सुनते हुए भावुक हो सकते थे और अगले ही पल अपने सहज हास्य से माहौल हल्का कर सकते थे। उनकी संवाद अदायगी भी इसी व्यक्तित्व की तरह थी। नाना संवाद बोलते नहीं थे, उन्हें जीते थे। शब्द उनके मुंह से निकलकर सीधे दर्शक तक पहुंचते थे। उनकी आवाज में अभिनय की ताकत कम और जीवन का अनुभव ज्यादा महसूस होता था। यही कारण है कि उनके बोले हुए कई संवाद फिल्मों की सीमा से निकलकर लोगों की रोजमर्रा की भाषा का हिस्सा बन गए।
    उनका निधन इसलिए भी बड़ा खालीपन छोड़ता है कि वे उस पीढ़ी के अभिनेता थे, जिन्होंने अभिनय को केवल चेहरे और संवादों का खेल नहीं माना। वे किरदार के भीतर उतरते और उसे अपनी आत्मा से छूते थे। एक तरफ ‘क्रांतिवीर’ का आक्रोश था तो दूसरी ओर ‘वेलकम’ की बेफिक्र हंसी। एक और ‘नटसम्राट’ का टूटता हुआ कलाकार था तो दूसरी ओर किसानों के बीच बैठा वह सहज आदमी, जिसके लिए किसी पुरस्कार से ज्यादा जरूरी किसी जरूरतमंद के घर का चूल्हा जलना था। नाना पाटेकर का जाना सिनेमा के लिए निश्चित रूप से एक बड़ा नुकसान है, लेकिन शायद उससे भी बड़ी क्षति उस दुनिया की हुई है जहां नेकी को प्रचार की जरूरत नहीं होती। वे अपनी फिल्मों में जीवित रहेंगे, उनके संवाद फिर सुनाई देंगे, ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी देखकर लोग फिर हंसेंगे और ‘क्रांतिवीर’ या ‘परिंदा’ में वही पुराना गुस्सा फिर दिखाई देगा। 
      मगर अब इन दृश्यों के पीछे खड़ा असली नाना दिखाई नहीं देगा। वह आदमी जो पर्दे पर खूंखार हो सकता था, लेकिन जिंदगी में किसी किसान के आंसू देखकर पिघल जाता था। वह अभिनेता जिसने लाखों दर्शकों को डराया भी, हंसाया भी और रुलाया भी, लेकिन अपनी असल जिंदगी में दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करता रहा। शायद यही नाना पाटेकर की सबसे बड़ी विरासत है। उन्हें सिर्फ महान अभिनेता कहना कम होगा। वे ऐसे इंसान थे जिन्होंने लोकप्रियता को जिम्मेदारी माना और अपनी कला से मिली पहचान को जरूरतमंदों तक पहुंचने का माध्यम बनाया। सिनेमा का पर्दा उनके बिना जरूर सूना होगा, लेकिन उनकी नेकी की दुनिया में जो जगह उन्होंने बनाई, उसे भर पाना आसान नहीं होगा।
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Friday, September 25, 2026

अनंत नाग : बिना शोर के बहती अभिनय की यह धारा

   भारतीय सिनेमा का इतिहास केवल सितारों, सफल फिल्मों और लोकप्रिय चेहरों से नहीं बनता। उसकी असली समृद्धि उन कलाकारों से भी बनती है, जिन्होंने अभिनय को प्रदर्शन नहीं, बल्कि चरित्र के भीतर उतरने की कला माना। अनंत नाग इसी परंपरा के अभिनेता हैं। पांच दशक से अधिक की यात्रा में उन्होंने कन्नड़ के साथ हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के सिनेमा, रंगमंच और टेलीविजन हर माध्यम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 2024 के दादा साहेब फाल्के पुरस्कार के लिए चुना है। उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में यह सम्मान प्रदान किया गया।
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- हेमंत पाल

    अनंत नाग के बारे में बात करते हुए सबसे पहले जिस शब्द का ध्यान आता है, वह है सहजता। सिनेमा में सहज दिखना सबसे कठिन अभिनय है। अभिनेता को अपनी उपस्थिति भी बनाए रखनी होती है और चरित्र को अपने ऊपर हावी भी नहीं होने देना होता है। अनंत नाग ने यह संतुलन लंबे समय तक साधा। उनकी खासियत यह नहीं रही कि वे हर भूमिका में अपनी छाप छोड़ने की कोशिश करते हैं, बल्कि यह रही कि उनकी मौजूदगी में भूमिका अपनी पहचान बना लेती है। उनके अभिनय में संवादों से अधिक संवादों के बीच का ठहराव बोलता है। चेहरे पर भावों की अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि परिस्थिति के अनुरूप बदलती हुई बारीकियां दिखाई देती हैं। शायद यही वजह है कि उनके निभाए पात्रों को याद करते समय अक्सर अभिनेता से पहले चरित्र याद आता है। भारतीय सिनेमा में स्टार और अभिनेता के बीच जो अंतर है, अनंत नाग का करियर उस अंतर को समझने का एक अच्छा उदाहरण है। उन्होंने लोकप्रियता से दूरी नहीं बनाई, लेकिन लोकप्रियता को अपने अभिनय की शर्त भी नहीं बनने दिया।
रंगमंच से तैयार हुआ ऐसा अभिनेता
    अनंत नाग की अभिनय यात्रा का आरंभ फिल्मों से नहीं, रंगमंच से हुआ। 18 वर्ष की उम्र में चैतन्य महाप्रभु के जीवन पर आधारित नाटक में मुख्य भूमिका निभाने का अवसर उनके लिए निर्णायक साबित हुआ। इसके बाद बुद्ध के जीवन पर आधारित नाटक सहित अनेक प्रस्तुतियों में काम करते हुए उन्होंने लगभग पांच वर्षों में 50 से अधिक नाटकों में भूमिकाएं निभाईं। रंगमंच का यह अनुभव बाद के फिल्मी जीवन में लगातार दिखाई देता रहा। रंगमंच अभिनेता को केवल संवाद याद करना नहीं सिखाता, बल्कि शब्द के पीछे का भाव, शरीर की भाषा, आवाज का उतार-चढ़ाव और मौन की भूमिका समझाता है। अनंत नाग के अभिनय में यही प्रशिक्षण परिष्कृत रूप में दिखाई देता है। उनकी फिल्मी यात्रा इसलिए भी अलग दिखाई देती है क्योंकि उन्होंने अभिनय को किसी एक फार्मूले में कैद नहीं किया। एक भूमिका के सफल होते ही उसी तरह की दूसरी भूमिका तलाशने के बजाय उन्होंने अलग-अलग चरित्रों की ओर कदम बढ़ाया।
कन्नड़ सिनेमा से निकली पहचान
    कन्नड़ फिल्म ‘संकल्प’ से फीचर फिल्मों में प्रवेश करने वाले अनंत नाग को वाईएन कृष्णमूर्ति, गिरीश कर्नाड और जीवी अय्यर जैसे रंगकर्मियों और फिल्मकारों का मार्गदर्शन मिला। यह वह दौर था जब भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा अपनी अलग कलात्मक पहचान बना रहा था और फिल्मों में साहित्य, रंगमंच तथा सामाजिक यथार्थ का प्रभाव गहरा हो रहा था। अनंत नाग इसी वातावरण में विकसित हुए। इसलिए उनके लिए नायक होना अभिनय का अंतिम लक्ष्य नहीं था। चरित्र की प्रकृति और कहानी में उसकी भूमिका अधिक महत्वपूर्ण थी। संवेदनशील युवक से लेकर पारिवारिक व्यक्ति तक और गंभीर सामाजिक भूमिकाओं से लेकर मानवीय कमजोरियों वाले पात्रों तक उन्होंने अपने अभिनय की सीमा लगातार विस्तृत की। उनका मूल आधार कन्नड़ सिनेमा रहा, लेकिन उनकी रचनात्मक यात्रा भाषाओं की सीमाओं में नहीं रुकी। उन्होंने हिंदी के अलावा तेलुगु, तमिल, मलयालम और मराठी फिल्मों में भी काम किया और 300 से अधिक फिल्मों का हिस्सा रहे। उनकी उपलब्धि को केवल फिल्मों की संख्या से समझना इसलिए उचित नहीं होगा कि पांच दशक से अधिक समय तक किसी कलाकार का अलग-अलग पीढ़ियों के दर्शकों के बीच प्रासंगिक बने रहना अपने आप में एक महत्वपूर्ण तथ्य है।
‘अंकुर’ से हिंदी सिनेमा का रास्ता
    श्याम बेनेगल की ‘अंकुर’ अनंत नाग के हिंदी फिल्म करियर का महत्वपूर्ण पड़ाव रही। उस समय हिंदी सिनेमा में एक समानांतर धारा आकार ले रही थी, जिसमें स्टार की चमक से अधिक कहानी और चरित्र को महत्व दिया जा रहा था। अनंत नाग की अभिनय शैली इस सिनेमा की प्रकृति से सहज रूप से मेल खाती थी। ‘अंकुर’ के जरिए हिंदी दर्शकों ने एक ऐसे अभिनेता को देखा, जिसकी ताकत संवादों की ऊंची आवाज या नायकत्व के प्रदर्शन में नहीं थी। वह कहानी के भीतर मौजूद रहकर कहानी को आगे बढ़ाता था। यह उपस्थिति बाद में उनकी हिंदी फिल्मों की पहचान बनी। अनंत नाग का हिंदी सिनेमा में महत्व इस बात में भी है कि वे दूसरे भाषाई सिनेमा से आए कलाकार होकर भी हिंदी दर्शकों के लिए अपरिचित नहीं रहे। उन्होंने यह साबित किया कि अभिनय की कोई एक भाषाई सीमा नहीं होती। भाषा बदल सकती है, परिवेश बदल सकता है, लेकिन चरित्र की सच्चाई दर्शक तक पहुंचती है।
सीरियल से घर-घर में बनी पहचान
    फिल्मों के अलावा टेलीविजन ने भी अनंत नाग की पहचान को व्यापक बनाया। आर. के. नारायण की रचनाओं पर आधारित ‘मालगुडी डेज़’ ने उन्हें ऐसे दर्शकों तक पहुंचाया जो शायद उनकी फिल्मों से परिचित नहीं थे। टेलीविजन का प्रभाव सिनेमा से अलग होता है। साप्ताहिक रूप से घरों में पहुंचने वाला कलाकार दर्शक के लिए धीरे-धीरे परिवार के परिचित चेहरे जैसा बन जाता है। ‘मालगुडी डेज़’ ने अनंत नाग की इसी आत्मीयता को मजबूत किया। उनकी अभिनय शैली में कोई कृत्रिम चमक नहीं थी। वे दृश्य पर कब्जा करने की कोशिश नहीं करते थे। उनकी भूमिका कहानी का हिस्सा बनी रहती थी और अभिनेता उसके पीछे दिखाई देता था। आज जब अभिनय कई बार कैमरे की मौजूदगी का प्रदर्शन बन जाता है, अनंत नाग की शैली इस बात की याद दिलाती है कि कैमरे को भूलकर चरित्र के भीतर जाना भी अभिनय की एक बड़ी उपलब्धि है।
पुरस्कारों से बड़ी है निरंतरता
     अनंत नाग को कर्नाटक राज्य के सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार पांच बार और फिल्मफेयर पुरस्कार भी पांच बार मिल चुके हैं। उन्हें कर्नाटक राज्योत्सव पुरस्कार, कर्नाटक साहित्य अकादमी पुरस्कार और कर्नाटक राज्य जीवनगौरव सम्मान सहित कई सम्मान मिले हैं। 2025 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से भी सम्मानित किया। लेकिन, किसी कलाकार के जीवन का मूल्यांकन केवल पुरस्कारों की सूची से नहीं किया जा सकता। पुरस्कार किसी एक उपलब्धि को दर्ज कर सकते हैं, जबकि लंबा करियर कलाकार की निरंतरता को दर्ज करता है। अनंत नाग के मामले में यही निरंतरता सबसे महत्वपूर्ण दिखाई देती है। 2023 में उन्होंने फिल्मों में 50 वर्ष पूरे किए। पांच दशक किसी भी कलाकार के लिए लंबा समय है, लेकिन इससे भी उल्लेखनीय यह है कि इन वर्षों में भारतीय सिनेमा की भाषा, तकनीक, दर्शक और बाजार कई बार बदल चुके हैं। ब्लैक एंड व्हाइट से रंगीन पर्दे तक, सिंगल स्क्रीन से मल्टीप्लेक्स तक और फिर डिजिटल मंचों तक सिनेमा की यात्रा में अनंत नाग की उपस्थिति बनी रही।
दादा साहेब फाल्के सम्मान का अर्थ
    दादा साहेब फाल्के पुरस्कार किसी एक फिल्म या किसी एक भूमिका का सम्मान नहीं है। यह दीर्घकालीन सिनेमा योगदान की राष्ट्रीय स्वीकृति है। अनंत नाग के मामले में यह सम्मान उनके उस पूरे सफर को रेखांकित करता है, जो रंगमंच से शुरू होकर कन्नड़ सिनेमा, समानांतर हिंदी सिनेमा, लोकप्रिय फिल्मों और टेलीविजन तक फैला है। भारत सरकार ने भी पुरस्कार की घोषणा करते हुए उनकी पांच दशकों से अधिक लंबी सिनेमा यात्रा और भारतीय सिनेमा के सांस्कृतिक परिदृश्य में उनके योगदान को रेखांकित किया है। यह सम्मान उस दौर की भी याद दिलाता है जब अभिनेता की सफलता का अर्थ केवल बॉक्स ऑफिस नहीं था। किरदार की विश्वसनीयता, संवाद की स्वाभाविकता और कहानी के प्रति प्रतिबद्धता भी अभिनेता की पहचान तय करती थी। 

      अनंत नाग इसी परंपरा के प्रतिनिधि हैं। उन्होंने यह दिखाया कि अभिनेता को हर दृश्य में बड़ा दिखाई देना जरूरी नही। कई बार उसका काम इतना स्वाभाविक होना चाहिए कि दर्शक को अभिनेता दिखाई ही न दे और केवल पात्र दिखाई देता रहे। यही अनंत नाग की सबसे बड़ी सिनेमा विरासत है। उन्होंने भारतीय सिनेमा को किसी एक भाषा या किसी एक शैली में नहीं, बल्कि अभिनय की उस साझा भारतीय परंपरा में समृद्ध किया जिसमें रंगमंच की तैयारी, साहित्य की संवेदना, सिनेमा का यथार्थ और आम जीवन की सहजता एक साथ दिखाई देती है। दादा साहेब फाल्के पुरस्कार उनकी यात्रा का अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि उस यात्रा की राष्ट्रीय स्वीकृति है। पांच दशक से अधिक समय तक कैमरे के सामने बने रहने के बाद भी जिस कलाकार के अभिनय में बनावट नहीं आई, उसके लिए इससे अधिक सार्थक बात शायद यही है कि समय बदला, सिनेमा बदला, दर्शक बदले, लेकिन चरित्र को सच्चाई से निभाने की उनकी कला नहीं बदली।
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Monday, September 21, 2026

भक्ति, आस्था और बॉक्स ऑफिस पर करिश्मा

   हिंदी सिनेमा में एक दिलचस्प परंपरा रही है। जब किसी खास विषय की फिल्म दर्शकों के बीच असाधारण लोकप्रिय होती है, तो उसी भावभूमि पर आगे कई फिल्में बनती हैं। सिनेमा के जन्म काल से लेकर आधुनिक मल्टीप्लेक्स और डिजिटल युग तक, जब भी किसी फिल्म निर्माता ने जनमानस की धार्मिक आस्था और भक्ति भावना को सही ढंग से पर्दे पर उकेरा, तब-तब बॉक्स ऑफिस पर कमाई के सारे गणित और पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त हुए। लेकिन, धार्मिक और पौराणिक फिल्मों का मामला थोड़ा अलग है। यहां सफलता सिर्फ मनोरंजन से नहीं, दर्शकों की आस्था से भी जुड़ जाती है। यही वजह है कि सिनेमा के शुरुआती दौर से लेकर आज तक राम, कृष्ण, शिव, हनुमान और संतों की कहानियां परदे पर बार-बार लौटती रही हैं। कभी दर्शक फिल्म देखते हुए जूते-चप्पल बाहर उतार देते थे, कभी परदे पर भगवान के प्रकट होते ही फूल और सिक्के चढ़ाते थे। आज वही आस्था करोड़ों रुपये के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन में दिखाई दे रही है। 2026 की फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने इसी परंपरा को नए दौर में पहुंचाया है।
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- हेमंत पाल

     नीम करोली बाबा के जीवन और महिमा पर आधारित फिल्म 'हनुमान अंश' ने सिनेमा जगत में कमाई का एक ऐसा नया इतिहास रच दिया, जिसने ट्रेड विश्लेषकों को भी अचंभित कर दिया है। ट्रेड रिपोर्ट्स के अनुसार करीब 2 करोड़ रुपए में बनी ‘हनुमान अंश’ ने 43वें दिन तक दुनियाभर में लगभग 308 करोड़ रुपए कमाए। इसका संकेत साफ है कि धार्मिक विषय के साथ कम बजट और मजबूत कहानी भी बड़ा असर पैदा कर सकती है। अप्रत्याशित मुनाफा कमाकर इस फिल्म ने न केवल आधुनिक दौर की सुपरहिट फिल्मों को पीछे छोड़ा, बल्कि 51 साल पुराने ऐतिहासिक रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब किसी भक्ति आधारित फिल्म ने सिनेमाघरों को मंदिरों जैसा माहौल प्रदान कर बॉक्स ऑफिस पर सफलता का परचम लहराया हो। सिनेमा के इतिहास में ब्लैक एंड व्हाइट दौर से लेकर रंगीन और अत्याधुनिक वीएफएक्स के युग तक, ऐसी कई मील का पत्थर साबित होने वाली फिल्में आई हैं, जिन्होंने अभूतपूर्व कमाई करते हुए इतिहास रचा है। 
धार्मिक फिल्मों को लेकर इंडस्ट्री में सनसनी 
    ‘हनुमान अंश’ की रिलीज के करीब एक महीने बाद हिंदी सिनेमा में धार्मिक और आध्यात्मिक फिल्मों को लेकर नई हलचल दिखाई देने लगी है। 7 अगस्त को रिलीज हुई इस फिल्म के बाद करीब पांच हफ्तों में तेरा सांई, राम बोला, खाटू श्याम और 'राधा-कृष्ण' की कहानी पर फिल्म जैसे कई प्रोजेक्ट घोषित हुए। इन फिल्मों से जुड़े बड़े नाम भी सामने आए हैं। साजन राज कुरूप और शोभा संत ‘कृष्णावतार’ का अगला पार्ट भी ला रहे हैं। उनका लक्ष्य धार्मिक फिल्मों के जरिए भारत की ओर से दुनिया को ‘अवेंजर्स’ जैसा मल्टीवर्स देने का है। उन्होंने पहले पार्ट को अभी ओटीटी पर नहीं बेचा है और इसे दोबारा सिनेमाघरों में लाने की तैयारी है। इस बदलाव की खासियत केवल फिल्मों की संख्या नहीं, बल्कि विषयों का विस्तार भी है। 
      ‘तेरा सांई’ साईं बाबा के जीवन और शिक्षाओं पर आधारित है, जिसमें संजय मिश्रा मुख्य भूमिका में हैं। फिल्म 2027 को हिंदी, मराठी, तेलुगू और तमिल में रिलीज होगी। वहीं खाटू श्याम और राधा-कृष्ण जैसे विषय भी बड़े पर्दे पर आने वाले हैं। 'राधा-कृष्ण' की कहानी पर फिल्म करण जौहर के बैनर के तहत बनने की खबर है। हालांकि, सफलता का आधार सिर्फ धर्म नहीं है। दर्शक कहानी से भावनात्मक रूप से जुड़ें, यह जरूरी है। किसी एक सफल फिल्म के फॉर्मूले को जल्दबाजी में दोहराना इस दौर का सबसे बड़ा जोखिम हो सकता है। ‘इरुमुडी’ में रवि तेजा जैसे बड़े स्टार हैं, जबकि ‘हनुमान अंश’ ने बिना बड़े स्टार के दर्शक जुटाए। इसलिए दोनों फिल्मों से मिलने वाले संकेत अलग हैं।
जब सिनेमाघर ही बन गए थे मंदिर
     सिनेमा की नींव ही पौराणिक और धार्मिक कथाओं पर रखी गई थी। दादा साहेब फाल्के द्वारा बनाई गई भारत की पहली मूक फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' (1913) और पहली बोलती पौराणिक फिल्मों के दौर से ही दर्शकों ने भक्ति सिनेमा को सहर्ष अपनाया। 1940 और 1960 के दशकों में जब तकनीक सीमित थी और फिल्में ब्लैक एंड व्हाइट हुआ करती थीं, तब भी पौराणिक फिल्मों ने दर्शकों के दिलों पर गहरा प्रभाव छोड़ा। विजय भट्ट के निर्देशन में बनी फिल्म 'राम राज्य' (1943) ब्लैक एंड व्हाइट युग की सबसे महान और सफल पौराणिक फिल्मों में से एक मानी जाती है। इस फिल्म की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, जो आमतौर पर सिनेमा देखने से दूर रहते थे, उन्होंने अपने जीवन में केवल यही एक फिल्म देखी थी।
     'राम राज्य' ने उस दौर में बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़ कारोबार किया था और यह उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों की सूची में शीर्ष पर रही। इस फिल्म ने भारतीय जनमानस में प्रभु श्री राम और माता सीता के प्रति अपार श्रद्धा को सिल्वर स्क्रीन पर बहुत ही सादगी और भक्ति भाव से प्रस्तुत किया था। बाबूभाई मिस्त्री द्वारा निर्देशित फिल्म 'संपूर्ण रामायण' (1961) ने ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा के अंतिम दौर में सफलता का नया इतिहास रचा। महिपाल और अनीता गुहा अभिनीत इस फिल्म में स्पेशल इफेक्ट्स का उस दौर के हिसाब से बेहतरीन इस्तेमाल किया गया था। इस फिल्म ने देश भर के थिएटर में सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली मनाई। लोग दूर-दराज के गांवों से बैलगाड़ियों में भरकर थिएटर तक फिल्म देखने आते थे। इस फिल्म ने न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारी व्यावसायिक सफलता हासिल की और यह उस दौर की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर सिद्ध हुई।
सफलता की ऊंचाई छूने वाली फ़िल्में 
     दक्षिण भारतीय सिनेमा के इतिहास में निर्मित फिल्म 'लव कुश' (1963) जिसे हिंदी में भी डब किया गया था, पहली ऐसी पौराणिक फिल्म बनी जिसने बॉक्स ऑफिस पर 1 करोड़ रुपये से अधिक की कुल कमाई का रिकॉर्ड बनाया था। इस फिल्म ने सिनेमाघरों में लगातार 75 हफ्तों तक चलने का अद्भुत कीर्तिमान स्थापित किया था। एनटी रामाराव और अंजलि देवी अभिनीत इस फिल्म के गानों और भक्तिमय प्रस्तुति ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया था। जब भारतीय सिनेमा ब्लैक एंड व्हाइट से निकलकर रंगीन हो चुका था, तब 1975 में एक ऐसी ऐतिहासिक घटना घटी जिसने पूरे फिल्म व्यापार के सिद्धांतों को बदलकर रख दिया। 1975 का साल भारतीय सिनेमा में अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र की महा-ब्लॉकबस्टर एक्शन फिल्म 'शोले' के लिए जाना जाता है। लेकिन, उसी साल बेहद कम बजट में बनी एक छोटी सी भक्ति फिल्म 'जय मां संतोषी' (1975) रिलीज हुई। विजय शर्मा निर्देशित इस फिल्म का कुल बजट मात्र 25 से 30 लाख रुपए था। शुरुआत में इस फिल्म को वितरक तक नहीं मिल रहे थे और पहले दिन इसका कलेक्शन मात्र 56 रुपये के आसपास था।
    लेकिन, जैसे ही माताओं-बहनों और आम जनता के बीच फिल्म के भक्तिमय संगीत और संतोषी मां की महिमा की बात फैली, सिनेमाघरों के बाहर मील लंबी लाइनें लग गईं। लोग नंगे पैर सिनेमाघर जाते थे, चप्पल बाहर खोलते थे, स्क्रीन पर आरती के समय सिक्के उछालते थे और पूजा की थाली व प्रसाद लेकर थिएटर में बैठते थे। 'जय मां संतोषी' ने उस दौर में लगभग 5 करोड़ रुपये का अभूतपूर्व बॉक्स ऑफिस कलेक्शन किया था। अपने बजट के मुकाबले 2,000% से अधिक का प्रॉफिट कमाकर इसने उस समय तक का सबसे बड़ा ऑल-टाइम रिकॉर्ड बनाया था, जो पिछले 51 वर्षों से अटूट था। 'जय मां संतोषी' की ऐतिहासिक सफलता के बाद भारतीय सिनेमा में धार्मिक फिल्मों का एक नया दौर शुरू हुआ। इसी लहर में 1979 में आई फिल्म 'हर हर गंगे' ने भी बॉक्स ऑफिस पर कमाई के नए कीर्तिमान स्थापित किए। पौराणिक गाथाओं और गंगा अवतरण की कथा पर आधारित इस रंगीन फिल्म को दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया और यह उस साल की व्यावसायिक रूप से अत्यधिक सफल फिल्मों में शामिल हुई।
'कांतारा' से 'हनुमान अंश' तक का दौर
    आज के दौर में जब मल्टीप्लेक्स संस्कृति और करोड़ों के बजट वाली एक्शन-थ्रिलर फिल्मों का बोलबाला है, तब भी भक्ति और पौराणिक विषयों पर आधारित फिल्मों ने यह साबित कर दिया है कि भारतीय दर्शकों के दिल में आस्था का स्थान आज भी सबसे ऊपर है। ऋषभ शेट्टी की 'कांतारा' (2022) फिल्म ने लोक-मान्यता, दैव-भक्ति और पौराणिक पृष्ठभूमि को जिस नए और आधुनिक अंदाज में प्रस्तुत किया, उसने बॉक्स ऑफिस के पूरे समीकरण बदल दिए। महज 16 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने दुनियाभर में 407 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार कर लगभग 2,448% का अप्रत्याशित मुनाफा दर्ज किया। निखिल सिद्धार्थ स्टारर फिल्म 'कार्तिकेय-2' (2022) भगवान श्री कृष्ण के पौराणिक रहस्य और ऐतिहासिक साक्ष्यों की खोज पर आधारित थी।
      15 करोड़ के सीमित बजट में तैयार हुई इस फिल्म ने दुनिया भर में 117 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई कर 685% से ज्यादा का लाभ अर्जित किया। इसके बाद तेजा सज्जा स्टारर और प्रशांत वर्मा निर्देशित फिल्म 'हनुमान' (2024) ने सुपरहीरो कॉन्सेप्ट को भगवान हनुमान की शक्तियों और भक्ति से जोड़कर परदे पर पेश किया। 60 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने दुनिया भर में लगभग 295 करोड़ का बिजनेस किया और 392% का रिटर्न दिया। इसके बाद 'महावतार नरसिम्हा' ने भारतीय एनिमेशन के क्षेत्र में इतिहास रचते हुए इस धार्मिक एनिमेटेड फिल्म ने 40 करोड़ के बजट के मुकाबले वैश्विक स्तर पर 326 करोड़ से अधिक का शानदार कारोबार किया और 717% का मुनाफा कमाया।
धार्मिक फिल्मों का समृद्ध इतिहास 
      हनुमान अंश: नीम करोली बाबा के जीवन और हनुमान जी के प्रति उनकी असीम भक्ति पर केंद्रित इस फिल्म ने महज 1.8 करोड़ के बजट से 153 करोड़ रुपये से ज्यादा की रिकॉर्डतोड़ कमाई की। 8,400% से अधिक का ऐतिहासिक मुनाफा कमाकर इसने 1975 के 'जय मां संतोषी' के 51 साल पुराने प्रॉफिट रिकॉर्ड को ध्वस्त करते हुए भक्ति सिनेमा के इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करा लिया।भारतीय सिनेमा का 100 से अधिक वर्षों का इतिहास इस बात का साक्षी है कि तकनीकों और दर्शकों की पसंद में कितने भी बदलाव क्यों न आए हों, लेकिन जब भी पर्दे पर भक्ति, सर्वशक्तिमान पर विश्वास और जन-आस्था का प्रामाणिक संगम होता है, तो दर्शक सिनेमाघरों को उत्सव का केंद्र बना देते हैं। ब्लैक एंड व्हाइट दौर की 'राम राज्य' और 'संपूर्ण रामायण' से लेकर रंगीन दौर की 'जय मां संतोषी' और आज के दौर की 'हनुमान अंश' जैसी फिल्मों की अभूतपूर्व सफलता यह सिद्ध करती है कि भक्ति सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना और बॉक्स ऑफिस की सफलता की मजबूत रीढ़ है।
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संगीत को पीछे छोड़ दिल में उतरे गीत

    भारतीय फिल्म संगीत का इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि जहां विशाल आर्केस्ट्रा, भारी-भरकम वाद्य यंत्र और तीव्र बीट्स सुनने वालों को क्षणिक आनंद या थिरकने का अनुभव कराते हैं। वहीं कुछ गीत ऐसे भी रचे जाते हैं, जो अपनी सादगी से कालजयी बन जाते हैं। पीयू बोले, मोह मोह के धागे या 'आओगे जब तुम' जैसे गीतों में देखने को मिलता है कि इन रचनाओं की मूल आत्मा इनके शब्दों में बसती है। यहां संगीतकार अपनी उपस्थिति को हावी करने के बजाय पृष्ठभूमि में ख़ामोशी से खड़ा महसूस होता है। वाद्य यंत्र इतने धीमे और सधे हुए बजाए जाते हैं कि गायक का स्वर और गीतकार की संवेदना सीधे सुनने वाले की चेतना से संवाद कर सके। ऐसे गीतों की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वे सुनने वाले पर किसी तरह का भावनात्मक दबाव नहीं डालते। ये गीत किसी शांत बहती नदी की तरह कान में प्रवेश करते हैं और दिल के उस कोने को छू लेते हैं, जहां मनुष्य अपने अकेलेपन, अपनी स्मृतियों और अपनी गहरी संवेदनाओं के साथ निवास करता है। 
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- हेमंत पाल

    फ़िल्मी गीत दो तरह के होते हैं। एक में आर्केस्ट्रा का जबरदस्त धूम-धड़ाका होता है, जबकि दूसरी तरह के गीतों में शब्द ज्यादा स्पष्ट सुनाई देते हैं। ऐसे गीतों पर संगीत हावी नहीं होता और मासूमियत से शब्द कानों से दिल तक पहुंच जाते हैं। इसलिए कि जब संगीत का शोर कम होता है, तो शब्दों का अर्थ और उनके पीछे छिपी भावना अधिक स्पष्ट, अधिक पारदर्शी और अधिक प्रभावशाली होकर उभरती है। जब कम संगीत और शब्दों के प्रभुत्व की बात आती है, तो गुलज़ार के योगदान के बिना यह चर्चा अधूरी रह जाती है। गुलज़ार ने भारतीय सिनेमा को वह काव्यशास्त्र दिया जहां बिंब और अमूर्त भावनाएं सीधे श्रोता के अवचेतन में उतरती हैं। इस शैली का एक सर्वोत्कृष्ट उदाहरण फ़िल्म 'लेकिन' का संगीत है। पंडित हृदयनाथ मंगेशकर के संगीतात्मक संयोजन और लता मंगेशकर के गायन के साथ गुलज़ार के लिखे इन गीतों ने सादगी और गहराई की नई परिभाषा गढ़ी। 'यारा सिली सिली' में विरह की पीड़ा को व्यक्त करने के लिए किसी प्रचंड वाद्यवृंद की आवश्यकता नहीं पड़ी, एक हल्की सी तान, रेगिस्तानी हवा जैसा फैला शांत वातावरण और वाद्य यंत्रों की बहुत बारीक मौजूदगी ने इस गीत को सीधे रूह से जोड़ दिया।
गुलजार ने ऐसे कई गीतों को शब्द दिए 
    इसी फिल्म का गीत 'सुरमई शाम इस तरह आए' या 'मैं एक सदी से बैठी हूँ' इस बात का प्रमाण हैं, कि जब शास्त्रीयता का आधार हो और गुलज़ार के शब्द हों, तो वाद्य यंत्रों की न्यूनतम उपस्थिति ही गीत का सबसे बड़ा आभूषण बन जाती है। 'इजाज़त' फ़िल्म में उनका लिखा गीत 'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है' भी इसी श्रेणी में आता है, जहां आरडी बर्मन ने संगीत को पूरी तरह पृष्ठभूमि में ढकेल दिया, ताकि गुलजार के अनूठे, बेतरतीब और सीधे संवाद जैसे बोल अपनी पूरी ईमानदारी के साथ श्रोता के कानों में पहुंच सकें। इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए यदि अन्य युगों के उदाहरणों को देखें, तो फ़िल्म 'अमर प्रेम' का गीत 'चिंगारी कोई भड़के' भी अपनी सादगी में अद्भुत है। आनंद बक्शी के लिखे इस गीत को आरडी बर्मन ने एक शांत, गूंजती हुई गिटार की धुन और हल्की ताल के साथ सजाया। किशोर कुमार की भारी और संयमित आवाज ने जीवन के दर्शन और सामाजिक तड़प को जिस सादगी से पिरोया, वह सुनने वाले के भीतर एक गहरा सन्नाटा पैदा कर देता है।
इन गीतों में संगीत का कोलाहल नहीं 
    इसी श्रेणी में फिल्म 'मसान' का गीत 'तू किसी रेल सी गुजरती है' एक आधुनिक मील का पत्थर है। दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल के शेरों को जब वरुण ग्रोवर ने पटकथा के अनुकूल ढाला और इंडियन ओशन बैंड ने इसे संगीतबद्ध किया, तब कोई भारी ताना-बाना नहीं बुना गया। स्वानंद किरकिरे की बिना किसी अत्यधिक सजावट वाली देसी आवाज़, हल्के एकॉस्टिक गिटार और सारंगी की हल्की सी तान के साथ बहती है। यहां संगीत शब्दों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं करता, बल्कि दुष्यंत कुमार के शब्दों के भारीपन को बहने के लिए एक बेहद शांत और निर्मल रास्ता देता है। 
     फिल्म 'आनंद' का 'कहीं दूर जब दिन ढल जाए' भी इसी परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। योगेश के लिखे बोलों को सलिल चौधरी ने इतनी सादगी से धुन में ढाला कि मुकेश की उदास आवाज़ हर सुनने वाले की निजी तन्हाई बन गई। ढलते सूरज, ढलती उम्र और अनकही उम्मीदों की इस व्यथा में वाद्य यंत्र इतने सीमित हैं कि लगता है जैसे गायक कमरे में बैठकर आपके ठीक सामने गा रहा हो। इसी तरह फ़िल्म 'सिलसिला' का गीत 'ये कहाँ आ गए हम' इस बात का प्रमाण है कि जब जावेद अख्तर की नज़्मों को खय्याम ने अत्यंत धीमे और मुलायम संगीतमय परिवेश में रखा, तो वह संगीत का नहीं बल्कि सांसों और शब्दों का समागम बन गया।
ऐसे कालजयी गीतों की रचना प्रक्रिया अलग 
    इन गीतों का इतिहास उठाकर देखें तो यह स्पष्ट होता है कि इनकी रचना प्रक्रिया अक्सर पारंपरिक फिल्मी गानों से अलग रही है। आमतौर पर फिल्मों में पहले धुन बनाई जाती है और फिर उस धुन में शब्दों को कसा जाता है। परंतु यारा सिली सिली, चिंगारी कोई भड़के या 'तू किसी रेल सी गुजरती है' जैसी रचनाओं में भाव और कविता प्राथमिक रहे। जब संगीतकार किसी पूर्व-लिखित कविता या गहरी भावना के सम्मान में धुन तैयार करता है, तो वह वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल सिर्फ पृष्ठभूमि को रंगने के लिए करता है, उसे ढकने के लिए नहीं। हृदयनाथ मंगेशकर, खय्याम, आरडी बर्मन और नए दौर में अमित त्रिवेदी या इंडियन ओशन जैसे संगीतकारों ने इस बात को समझा कि जहां शब्द खुद इतने वज़नदार हों, वहां वाद्य यंत्रों का शोर उस कविता का प्रभाव कम कर सकता है। सुनने वालों पर ऐसे गीतों का मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक असर बेहद गहरा और स्थायी होता है। तीव्र और भारी संगीत वाले गाने तात्कालिक उत्साह या ऊर्जा तो दे सकते हैं, लेकिन वे इंसान के अवचेतन मन में बहुत गहरे नहीं उतरते। इसके विपरीत, जिन गीतों में शब्द प्रधान और संगीत न्यूनतम होता है, वे मनुष्य के अकेलेपन के साथी बनते हैं। 
फ़िल्म इतिहास में ऐसे गीत बहुत कम
      भारतीय सिनेमा में उत्कृष्ट एवं काव्यात्मक बोलों के कारण लोकप्रिय हुए गीतों की एक समृद्ध परंपरा रही है। 1957 की फ़िल्म 'प्यासा' का 'यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है', 1959 की 'अनाड़ी' का 'किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार', 'काग़ज़ के फूल' का 'वक़्त ने किया क्या हसीं सितम', 1963 की 'गुमराह' का 'चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों' और 1964 की 'हक़ीक़त' का देशभक्ति गीत 'कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों' अपने गहरे और सामाजिक अर्थों के लिए जाने जाते हैं। वहीं 1976 की फ़िल्म 'कभी कभी' का 'मैं पल दो पल का शायर हूँ', 1979 की 'गोलमाल' का 'आने वाला पल जाने वाला है', 1983 की 'मासूम' का 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी हैरान हूँ मैं' और 1995 की बॉम्बे का 'तू ही रे' भावनाओं की अमर अभिव्यक्ति प्रस्तुत करते हैं। इसी संगीत यात्रा को आगे बढ़ाते हुए 2005 की 'परिणीता' का 'पीयू बोले', 2007 की 'अनवर' का 'मौला मेरे मौला', जब वी मेट का 'आओगे जब तुम', 2009 की 'वेक अप सिड' का 'इकतारा', 2014 की 'टू स्टेट्स' का 'मस्त मगन', 2015 की 'दम लगा के हईशा' का ' ये मोह मोह के धागे' दिल को छू जाते हैं। 2016 की 'एमएस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी' का 'कौन तुझे', 2017 की 'बरेली की बर्फी' का 'नज़्म नज़्म', 2018 की 'धड़क' का 'पहली बार', 2019 की 'मैं वापस आऊंगा' का 'तेरे पास में' और 2024 की 'दो पत्ती' का 'रांझा' आधुनिक युग में भी शब्दों और भावों की सुंदरता से श्रोताओं के दिलों को छूते आ रहे हैं।
दिलों में इसलिए उतरते रहे ये गीत 
    भारतीय सिनेमा की अलग-अलग समय अवधियों में ऐसे कई अनुपम गीत रचे गए, जिन्होंने भारी व्यवस्था को दरकिनार कर केवल अपनी सशक्त शब्दावली और न्यूनतम संगीतमयता से जनमानस पर गहरा प्रभाव छोड़ा है। जब कोई व्यक्ति जीवन में तनाव, विरह, प्रेम, या आत्म-मंथन के दौर से गुज़र रहा होता है, तब भारी संगीत उसे विचलित कर सकता है। ऐसे समय में यह अल्प-संगीत एक शांत मरहम की तरह काम करता है। श्रोता को ऐसा महसूस होता है कि गीतकार ने उसके ही मन के किसी अनकहे कोने को शब्द दे दिए हैं। सुनने वालों पर ऐसे गीतों का मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक असर बेहद गहरा और स्थायी होता है। तीव्र और भारी संगीत वाले गाने तात्कालिक उत्साह या ऊर्जा तो दे सकते हैं, लेकिन वे इंसान के अवचेतन मन में बहुत गहरे नहीं उतरते। जिन गीतों में शब्द प्रधान और संगीत न्यूनतम होता है, वे मनुष्य के अकेलेपन के साथी बनते हैं। यही कारण है कि इकतारा, नज़्म नज़्म और 'लेकिन' फिल्म के नगमे या 'तू किसी रेल सी गुजरती है' जैसे गाने रिलीज होने के दशकों बाद भी पुराने नहीं लगते। वे कालजयी इसलिए बनते हैं, क्योंकि इंसान की मूल भावनाएं कभी नहीं बदलतीं, और ये गीत सीधे उन्हीं मूल भावनाओं से संवाद करते हैं। संक्षेप में कहा जाए तो, संगीत का काम केवल कान को भाता नहीं है, बल्कि आत्मा को छूना है, और जब संगीत संयमित होता है तथा शब्द सशक्त, तो गीत महज़ मनोरंजन न रहकर एक व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है।
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फिल्मों की रोशनी में बदलता समाज

    सिनेमा को केवल मनोरंजन की खिड़की मानना उसके प्रभाव को सीमित करना है। वह समाज की सामूहिक चेतना का आईना भी है और कभी-कभी हथौड़ा भी, जो जमी हुई धारणाओं पर चोट करता है। ‘अछूत कन्या’ से मदर इंडिया, दो आंखें बारह हाथ से दामिनी, तारे जमीन पर से ‘पिंक’ और ‘आर्टिकल 15’ से ‘अस्सी’ तक हिंदी सिनेमा की एक समानांतर धारा ऐसी रही, जो दर्शक को केवल कहानी सुनाकर नहीं छोड़ती, बल्कि उससे सवाल पूछती है। असली समाज सुधार शायद वहीं से शुरू होता है, जब दर्शक सिनेमाघर से बाहर निकलने के बाद भी फिल्म के सवालों से बाहर नहीं निकल पाता।
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- हेमंत पाल

    फिल्मों पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि वे अपराध को बढ़ावा देती हैं। यह आरोप पूरी तरह निराधार भी नहीं है। कई अपराधियों ने पुलिस पूछताछ के दौरान फिल्मों से अपराध करने की तरकीब या प्रेरणा मिलने की बात कही है। लेकिन सिनेमा को केवल उसके नकारात्मक प्रभावों के आधार पर देखना उसके सामाजिक महत्व को बहुत छोटा कर देना होगा। जिस परदे से अपराध की नकल की जा सकती है, उसी परदे से संवेदना, समानता, न्याय और बदलाव की आकांक्षा भी पैदा हो सकती है। वास्तव में सिनेमा समाज का केवल प्रतिबिंब नहीं है, वह कई बार समाज के भीतर चल रही हलचल को दिशा देने वाला माध्यम भी बन जाता है। दर्शक जब किसी पात्र के दुख, संघर्ष या जीत से जुड़ता है तो वह कुछ देर के लिए केवल दर्शक नहीं रहता, उस कहानी का सहभागी बन जाता है। यही सिनेमा की सबसे बड़ी सामाजिक शक्ति है। महात्मा गांधी ने अपने जीवन पर ‘सत्यवादी हरिश्चंद्र’ के प्रभाव का उल्लेख किया था। राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा ने बाल गांधी के मन पर ऐसी छाप छोड़ी कि सत्य उनके जीवन का मूल मूल्य बन गया। यह उदाहरण बताता है कि सिनेमा या दृश्य माध्यमों की शक्ति केवल मनोरंजन में नहीं, संस्कार निर्माण में भी छिपी है। 
     बाद के वर्षों में ‘दो आंखें बारह हाथ’ ने अपराधी को केवल दंड देने के बजाय उसे सुधारने की संभावना सामने रखी। ‘जिस देश में गंगा बहती है’ ने डाकुओं के आत्मसमर्पण और पुनर्वास की कल्पना को लोकप्रिय विमर्श का हिस्सा बनाया। ‘आवारा’ ने जन्मजात अपराधी की धारणा पर सवाल खड़ा किया और यह विचार सामने रखा कि व्यक्ति के चरित्र को उसके सामाजिक और आर्थिक परिवेश से अलग करके नहीं समझा जा सकता। सिनेमा का यह समाज सुधारक रूप यहीं नहीं रुका। ‘अछूत कन्या’ ने जातिगत ऊंच-नीच के बीच प्रेम की कहानी के माध्यम से उस सामाजिक दीवार को चुनौती दी, जिसे सामान्य जीवन में छूना भी कठिन था। ‘दो बीघा जमीन’ ने किसान और गरीबी के प्रश्न को भावुकता से आगे ले जाकर सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के सवाल से जोड़ा। ‘मदर इंडिया’ ने भारतीय किसान, साहूकारी शोषण, स्त्री के संघर्ष और परिवार की नैतिकता को एक साथ परदे पर रखा। ‘सुजाता’ ने जातिगत भेदभाव के विरुद्ध संवेदना जगाई तो ‘बंदिनी’ ने स्त्री के जीवन और उसकी स्वतंत्रता को लेकर समाज की कठोरता पर सवाल उठाए। ‘प्रेम रोग’ ने विधवा विवाह जैसे विषय को मुख्यधारा के मनोरंजन का हिस्सा बनाया। ‘दामिनी’ ने यौन हिंसा के विरुद्ध एक स्त्री के संघर्ष को अदालत और परिवार के बीच स्थापित किया।
     बाद के दौर में सिनेमा ने सामाजिक सवालों को और अधिक प्रत्यक्ष रूप से उठाया। ‘तारे जमीन पर’ ने बच्चों की सीखने की अलग-अलग क्षमताओं को समझने की जरूरत बताई। ‘थ्री इडियट्स’ ने शिक्षा को केवल अंक, प्रतियोगिता और नौकरी की मशीन बनाने वाली व्यवस्था पर सवाल उठाया। ‘चक दे! इंडिया’ ने महिला खिलाड़ियों के संघर्ष के साथ क्षेत्रीय और धार्मिक पूर्वाग्रहों को चुनौती दी। ‘पिंक’ ने सहमति को स्त्री की गरिमा और स्वतंत्रता से जोड़ते हुए समाज की उस मानसिकता को कठघरे में खड़ा किया, जिसमें लड़की के कपड़े, दोस्ती, शराब या देर रात बाहर रहने को उसके चरित्र का प्रमाण मान लिया जाता है। ‘आर्टिकल 15’ ने जातिगत भेदभाव को पुलिस व्यवस्था और कानून के संदर्भ में देखने का आग्रह किया। ‘थप्पड़’ ने घरेलू हिंसा के उस सामान्यीकरण पर प्रहार किया जिसमें एक थप्पड़ को परिवार बचाने के नाम पर मामूली घटना मान लिया जाता है।
     इस परंपरा को 2026 की फिल्म ‘अस्सी’ एक अधिक असहज और कठोर धरातल पर आगे बढ़ाती है। अनुभव सिन्हा की यह फिल्म बलात्कार, पितृसत्ता, सामाजिक उदासीनता और न्याय व्यवस्था की कमजोरियों को एक साथ सामने रखती है। केंद्रीय पात्र परिमा एक शिक्षिका है, जो यौन हिंसा की शिकार होने के बाद केवल अपराधियों से नहीं लड़ती, बल्कि उस पूरी व्यवस्था से जूझती है जो बार-बार पीड़िता के व्यवहार, चरित्र और फैसलों पर सवाल उठाती है। फिल्म का प्रमाणन रिकॉर्ड भी इसकी मूल कथा को स्पष्ट करता है एक महिला अपराध से बचने के बाद ऐसी सामाजिक और कानूनी व्यवस्था का सामना करती है, जहां उसके साथ हुई हिंसा से अधिक उसके बारे में बने पूर्वाग्रह महत्व पाने लगते हैं। ‘अस्सी’ की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपराध को किसी अकेले खलनायक की मानसिक विकृति बनाकर समाप्त नहीं कर देती। वह पूछती है कि अपराधी पैदा कैसे होता है और उसे सामाजिक स्वीकृति कहां से मिलती है? परिवार की सोच, महिलाओं के प्रति नजरिया, पुलिस की कार्यप्रणाली, अदालत की प्रक्रिया, सबूतों की विश्वसनीयता और समाज की चुप्पी, इन सबको फिल्म एक ही प्रश्न से जोड़ती है। समीक्षकों ने भी इस बात को रेखांकित किया है कि फिल्म का निशाना केवल अपराधी नहीं, बल्कि वह सामाजिक और संस्थागत ढांचा है जो यौन हिंसा को संभव बनाता है और पीड़िता को ही कटघरे में खड़ा करता है। 
     यही वह बिंदु है जहां सिनेमा की समाज सुधारक भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। कानून किसी अपराध के बाद सजा दे सकता है, लेकिन वह मानसिकता को सीधे नहीं बदल सकता जो अपराध को जन्म देती है। कानून बलात्कार को अपराध घोषित कर सकता है, लेकिन यह नहीं सिखा सकता कि किसी लड़की के देर रात घर लौटने को उसके चरित्र से न जोड़ा जाए। अदालत फैसला दे सकती है, लेकिन समाज को यह समझना होगा कि न्याय पाने के लिए किसी पीड़िता को अपने चरित्र की परीक्षा नहीं देनी चाहिए। सिनेमा इन दोनों के बीच की खाली जगह भर सकता है। वह कानून की भाषा को मानवीय अनुभव में बदल देता है। ‘अस्सी’ का महत्व इसलिए भी है कि वह दर्शक को आसान सांत्वना नहीं देती। सामान्य व्यावसायिक सिनेमा में अंततः नायक आता है, अपराधी पराजित होता है और दर्शक राहत के साथ घर लौटता है। लेकिन सामाजिक सरोकार वाला सिनेमा कई बार इस सुविधा को छीन लेता है। ‘अस्सी’ यह सवाल छोड़ती है कि किसी एक मामले में न्याय मिल जाने से क्या उस मानसिकता का अंत हो जाएगा जिसने अपराध को जन्म दिया? फिल्म की यही बेचैनी उसे महज अदालत की कहानी से आगे ले जाती है। 
     हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है। किसी फिल्म को समाज सुधारक मान लेने का अर्थ यह नहीं कि उसके प्रभाव को स्वतः सकारात्मक मान लिया जाए। अच्छी मंशा और अच्छी फिल्म दो अलग बातें हैं। ‘फुले’ इसका उदाहरण है। ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले के जीवन और स्त्री शिक्षा तथा जातिगत भेदभाव के विरुद्ध उनके संघर्ष को परदे पर लाने का विषय अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण था, लेकिन समीक्षकों ने फिल्म की प्रस्तुति और कथानक की गति को लेकर अलग-अलग मत व्यक्त किए। इसका अर्थ यही है कि समाज सुधार का संदेश तभी दूर तक जाता है, जब वह उपदेश के बजाय प्रभावशाली कहानी और जीवंत पात्रों के माध्यम से दर्शक तक पहुंचे। 
     आज के दौर में दर्शक भी बदल चुका है। वह केवल यह नहीं पूछता कि फिल्म मनोरंजक है या नहीं; वह यह भी देखता है कि फिल्म उसके समय की कौन-सी बेचैनी को आवाज दे रही है। यही कारण है कि जाति, लैंगिक समानता, शिक्षा, दिव्यांगता, धार्मिक कट्टरता, किसान, बेरोजगारी और न्याय व्यवस्था जैसे विषय लगातार फिल्मों का हिस्सा बन रहे हैं। ‘सितारे जमीन पर’ ने बौद्धिक दिव्यांगता और समावेशन को केंद्र में रखकर यह सवाल उठाया कि सामान्य होने की हमारी परिभाषा आखिर किसने तय की है। सिनेमा समाज को बदलता है या समाज में पहले से चल रहे बदलाव को गति देता है, इस पर बहस जारी रह सकती है। संभवतः दोनों बातें सही हैं। कोई फिल्म अकेले कानून नहीं बदल सकती, अपराध समाप्त नहीं कर सकती और सामाजिक भेदभाव मिटा नहीं सकती। लेकिन वह उस बहस को जन्म दे सकती है जिसे समाज लंबे समय से टालता आया है। वह किसी बच्चे के मन में गांधी के सत्य की तरह कोई मूल्य बैठा सकती है, किसी अपराधी के सामने सुधार की संभावना रख सकती है, किसी किसान के दर्द को शहर के दर्शक तक पहुंचा सकती है और किसी महिला को यह एहसास दिला सकती है कि उसकी चुप्पी ही उसकी नियति नहीं है।
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