राघव चड्ढा को राजयसभा में उपनेता पद से हटाना 'आम आदमी पार्टी' के आंतरिक संकट और नेतृत्व की असुरक्षा को उजागर करता है। अरविंद केजरीवाल ने जिस स्वराज और आंतरिक लोकतंत्र का सपना दिखाकर पार्टी खड़ी की थी, वह अब धीरे-धीरे एक ऐसी व्यवस्था में बदलती जा रही है, जहां एक ही धुरी के इर्द-गिर्द पूरी राजनीति घूमती है। पुराने साथियों का साथ छूटना और नए उभरते सितारों के पर कतरना पार्टी की लंबी अवधि की सेहत के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
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● हेमंत पाल
आम आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सदस्य राघव चड्ढा को पार्टी ने उपनेता के पद से हटा दिया गया। इसके पीछे पार्टी ने जो आधिकारिक कारण बताए हैं, वे न तो स्पष्ट है और न विश्वसनीय। कहा जा रहा है कि यह 'आंतरिक समन्वय' के लिए जरूरी था। लेकिन, राजनीतिक गलियारों में साफ है कि अरविंद केजरीवाल की नेतृत्व शैली एक बार फिर परीक्षा की घड़ी में आ गई। केजरीवाल, जो कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ क्रांति के प्रतीक थे, अब उन सहयोगियों को ही किनारे लगाने का खेल खेल रहे हैं जो पार्टी को मजबूत ऊंचाइयों तक ले जा सकते थे। राघव चड्ढा जैसे युवा, परिपक्व और वाकपटु नेता का यह अपमान 'आप' के भविष्य पर सवाल खड़े करता है। क्या यह केजरीवाल का नियंत्रण बनाए रखने का पुराना तरीका है!
'आप' का राजनीतिक सफर शुरू से ही केजरीवाल-केंद्रित रहा। 2012 में पार्टी के गठन के समय अन्ना हजारे जैसे सामाजिक आंदोलनकारियों ने इसे समर्थन दिया था। अन्ना ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को 'आप' का आधार बनाया, लेकिन जल्द ही केजरीवाल ने खुद को केंद्र में स्थापित कर लिया। अन्ना हजारे ने तो 2012 में ही पार्टी से दूरी बना ली, क्योंकि उन्हें लगा कि केजरीवाल राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण आंदोलन के मूल सिद्धांतों से भटक रहे हैं। इसके बाद योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे संस्थापक सदस्यों की विदाई हुई। 2015 में पार्टी के राष्ट्रीय परिषद बैठक में केजरीवाल समर्थकों ने इन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। योगेंद्र यादव ने खुलेआम कहा था कि 'आप' अब एक व्यक्ति-केंद्रित दल बन चुका है, जहां आंतरिक लोकतंत्र का कोई स्थान नहीं। कुमार विश्वास, जो केजरीवाल के करीबी कवि-साथी थे, वे भी 2017 तक पार्टी से अलग हो गए। उन्होंने आरोप लगाया कि केजरीवाल ने उन्हें जानबूझकर हाशिए पर धकेल दिया। इन सभी मामलों में पैटर्न एक ही था कोई भी नेता जो केजरीवाल की छाया से बाहर निकलने की कोशिश करता, उसे या तो पद से हटाया जाता या पार्टी से निष्कासित कर दिया जाता।
राघव चड्ढा का मामला इसी सिलसिले का नवीनतम अध्याय लगता है। चड्ढा 'आप' के सबसे चमकते सितारों में से एक हैं। पंजाब और दिल्ली में पार्टी की मजबूत पैरवी करने वाले, वे राज्यसभा में विपक्ष के प्रभावी प्रवक्ता बने। उनकी वाकपटुता ने विपक्षी दलों को भी प्रभावित किया। उन्होंने जनहित के जो मुद्दे उठाए, वे सोशल मीडिया और लोगों में चर्चा का विषय बने। उनकी लोकप्रियता का ग्राफ 'आप' के कद से ऊपर निकलने लगा था, जो शायद केजरीवाल को रास नहीं आया। पार्टी ने उन्हें उपनेता पद से हटाते हुए कोई ठोस कारण भी नहीं बताया। आधिकारिक बयान में केवल 'पार्टी के संगठनात्मक बदलाव' का जिक्र है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चड्ढा की बढ़ती लोकप्रियता केजरीवाल को खल रही थी। खासकर दिल्ली विधानसभा चुनावों के बाद, जहां 'आप' को झटका लगा, चड्ढा जैसे युवा चेहरे पार्टी को फिर खड़ा कर सकते थे। लेकिन, केजरीवाल की शैली ऐसी नहीं। वे किसी को खुद से आगे नहीं बढ़ने देते। संजय सिंह को नेता पद पर रखना और चड्ढा को हटाना इसी का प्रमाण है। सोशल मीडिया पर चड्ढा के समर्थक इसे 'केजरीवाल का ईर्ष्या-प्रदर्शन' बता रहे हैं। क्या चड्ढा कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों की ओर रुख करेंगे? संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि 'आप' में रहकर उनका भविष्य सीमित हो चुका है।
इस घटना के अपने व्यापक राजनीतिक निहितार्थ हैं। 'आप' जो कभी 'आम आदमी' की आवाज थी, अब एक केंद्रीकृत, केजरीवाल-प्रधान मशीन बन चुकी है। दिल्ली और पंजाब में सत्ता बनाए रखने के बावजूद, पार्टी का राष्ट्रीय विस्तार रुक गया है। 2024 लोकसभा चुनावों में 'आप' का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। गुजरात, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में प्रयास विफल हो चुके हैं। आंतरिक कलह इसका प्रमुख कारण है। केजरीवाल की गिरफ्तारी के बाद भी पार्टी ने संगठन को मजबूत नहीं किया। उल्टे, आतिशी और मनीष सिसोदिया जैसे नेता भी केजरीवाल की छत्रछाया में ही दुबक कर रह गए। राघव चड्ढा को हटाया जाना, 'आप' के युवा नेतृत्व को कमजोर करता है। भाजपा और कांग्रेस इसे हथियार बना रही हैं। भाजपा प्रवक्ता ने ट्वीट किया कि 'आप में लोकतंत्र का अंत हो चुका है'। इससे पार्टी का विपक्षी गठबंधन पर असर पड़ सकता है। 'इंडिया' ब्लाक में 'आप' की भूमिका पहले से कमजोर थी, अब चड्ढा जैसे प्रभावी वक्ता के बिना यह और कमजोर हो जाएगी।
केजरीवाल की नेतृत्व शैली पर सवाल उठना स्वाभाविक है। राजनीति में करिश्माई नेता जरूरी हैं, लेकिन बिना आंतरिक लोकतंत्र के कोई दल लंबे समय तक नहीं टिकता। 'आप' भी उसी रास्ते पर हैं। केजरीवाल ने कभी संगठन निर्माण पर ध्यान नहीं दिया। वे चुनावी वादों और पीआर पर निर्भर रहे। राघव चड्ढा जैसे प्रतिभावान नेता को हटाकर उन्होंने पार्टी के भविष्य को ही खतरे में डाल दिया। मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां 'आप' विस्तार की कोशिश कर रही है, ऐसे कदम स्थानीय नेताओं को हतोत्साहित करेंगे। इंदौर-भोपाल क्षेत्र में इस पार्टी के कार्यकर्ता पहले से ही असंतुष्ट हैं। यदि चड्ढा बाहर चले जाते हैं, तो यह पलायन का संकेत बनेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि 'आप' एकल नेता पर टिकी है, बिना केजरीवाल के यह ढह जाएगी। लेकिन केजरीवाल के साथ भी यह टूट रही है।
इस संकट से उबरने के लिए 'आप' में आंतरिक सुधार जरूरी हैं। पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया, युवा नेताओं को जिम्मेदारी और केजरीवाल को अधिक विकेंद्रीकरण ये कदम आवश्यक हैं। अन्यथा, पार्टी का सफर योगेंद्र यादव, कुमार विश्वास और अब शायद राघव चड्ढा के साथ समाप्त हो जाएगा। भारतीय राजनीति में 'आप' जैसा प्रयोग दुर्लभ था, इसे बचाने की जिम्मेदारी केजरीवाल पर है। लेकिन, इतिहास गवाह है कि शक्ति के लालच ने कई आंदोलनों को निगल लिया। राघव चड्ढा का मामला 'आप' के पतन का शुभ लक्षण न साबित हो, यही कामना है।
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