Saturday, September 19, 2026

फिल्मों में आंचल : छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा

    भारतीय सिनेमा ने अपने सौ वर्ष से अधिक के सफर में अनेक शब्दों और वस्तुओं को भावनाओं का प्रतीक बनाया है। इनमें ‘आंचल’ सबसे आत्मीय, कोमल और बहुअर्थी प्रतीक है। साड़ी का एक सिरा भर होने के बावजूद हिंदी फिल्मों में आंचल कभी मां की ममता बन गया, कभी प्रेमिका की लाज, कभी पत्नी के समर्पण का संकेत और कभी घर-परिवार की प्रतिष्ठा का रूपक। वह कभी बच्चे के सिर पर छाया बनकर फैला तो कभी हवा में लहराकर प्रेम के आने की आहट देता दिखाई दिया। यही वजह है कि फिल्मी गीतों और दृश्यों में आंचल महज परिधान का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि भारतीय समाज के भावनात्मक संसार का एक दृश्य प्रतीक बन गया। आंचल प्रेम, लाज, ममता, समर्पण और स्मृति का ऐसा प्रतीक, जो हिंदी सिनेमा के सौ साल से अधिक लंबे सफर में बार-बार नए अर्थों के साथ लौटता रहा है। 
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- हेमंत पाल 

    भारतीय संस्कृति में आंचल का रिश्ता स्त्री के व्यक्तित्व से गहरे जुड़ा रहा है। सिर पर रखा आंचल सम्मान और संस्कार का संकेत है, बच्चे को ढकता आंचल ममता और सुरक्षा का प्रतीक है और प्रिय के हाथ में आकर ठहरता आंचल प्रेम और संकोच की भाषा बोलता है। सिनेमा ने इन अलग-अलग अर्थों को गीत, संगीत, अभिनय और कैमरे की गति के माध्यम से इस तरह इस्तेमाल किया कि कई बार बिना संवाद के भी दर्शक समझ जाता था कि आंचल इस दृश्य में क्या कह रहा है। हिंदी फिल्मों में आंचल को प्रेम और छेड़छाड़ के प्रतीक के रूप में सबसे लोकप्रिय बनाने वाले गीतों में 1957 की 'पेइंग गेस्ट' का 'छोड़ दो आंचल, जमाना क्या कहेगा' प्रमुख है। देव आनंद और नूतन पर फिल्माया गया यह गीत आंचल को प्रेमियों के बीच संवाद का माध्यम बना देता है। गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने इसमें प्रेम की शरारत के साथ सामाजिक संकोच को भी जगह दी। किशोर कुमार और आशा भोसले की आवाजों ने इस चंचलता को और जीवंत कर दिया।
     इस गीत की खूबसूरती यह है कि इसमें आंचल को खींचना केवल छेड़छाड़ नहीं है। वह उस समय के सामाजिक वातावरण में प्रेम के अनकहे स्वीकार और सार्वजनिक संकोच के बीच की दूरी का प्रतीक भी है। नायक आंचल के बहाने निकट आना चाहता है और नायिका ‘जमाना क्या कहेगा’ कहकर उस निकटता पर सामाजिक मर्यादा की सीमा खींचती है। यानी आंचल यहां प्रेम और समाज के बीच झूलती स्त्री की मन स्थिति का हिस्सा बन जाता है। इसी दौर में नायिका के आंचल का हवा में लहराना, उसका चेहरे पर आ जाना या किसी पेड़, दरवाजे अथवा नायक के हाथ में उलझ जाना हिंदी फिल्मों की दृश्य भाषा का हिस्सा बना। राज कपूर, देव आनंद और दिलीप कुमार के दौर में आंचल की गति स्वयं एक तरह का संवाद बन गई थी। कैमरा जब उड़ते हुए आंचल का पीछा करता था, तो वह केवल सौंदर्य नहीं दिखाता था; उसके साथ नायिका की झिझक, आकर्षण और मन की हलचल भी पर्दे पर आती थी।
     हिंदी सिनेमा में आंचल का सबसे गहरा और स्थायी अर्थ प्रेमिका से अधिक मां के साथ जुड़ा है। मां का आंचल भारतीय मानस में उस जगह का नाम है जहां बच्चा दुनिया की हर चिंता से मुक्त हो सकता है। इसी भाव को सिनेमा ने बार-बार दोहराया। बच्चा चाहे कितना बड़ा हो जाए, असफलता, बीमारी, भय या अकेलेपन की स्थिति में उसकी स्मृति अक्सर मां के आंचल की छांव तक लौटती है। 1970 में बनी 'मां का आंचल' तो अपने शीर्षक में ही इस प्रतीक को केंद्र में ले आती है। फिल्म के संगीतकार मदन मोहन और गीतकार कैफी आजमी ने मां के आंचल को सीधे ईश्वर की करुणा और सुरक्षा से जोड़ा। 'मां का आंचल लाडले, दामन है भगवान का’' जैसे गीत में आंचल केवल मां के वस्त्र का सिरा नहीं रह जाता, बल्कि वह ईश्वर के दामन का मानवीय रूप बन जाता है। इसी फिल्म का 'मां है मोहब्बत का नाम, मां को हजारों सलाम' मातृत्व को प्रेम की सर्वोच्च अभिव्यक्ति के रूप में स्थापित करता है। मां के आंचल की यही छवि मदर इंडिया, दीवार, अमर अकबर एंथनी, करण-अर्जुन और अनेक पारिवारिक फिल्मों में अलग-अलग रूपों में दिखाई देती रही। कभी मां बच्चे के आंसू अपने आंचल से पोंछती है, कभी उसे धूप से बचाती है और कभी उसके माथे पर हाथ रखकर उसे भरोसा देती है। इन दृश्यों में आंचल दिखाई दे या न दिखाई दे, उसका भाव उपस्थित रहता है।
    हिंदी सिनेमा में आंचल की शक्ति को समझने के लिए 'दीवार' का प्रसिद्ध संवाद ‘मेरे पास मां है’ पर्याप्त है। यहां आंचल शब्द नहीं आता, लेकिन उसका पूरा भाव मौजूद है। एक तरफ पैसा, बंगला और संपत्ति है, दूसरी तरफ मां। संवाद यह स्थापित करता है कि जीवन की कुछ संपदाएं ऐसी हैं जिन्हें धन से खरीदा नहीं जा सकता। मां का आंचल उन्हीं में से एक है। यही कारण है कि हिंदी फिल्मों की मां केवल भावुक चरित्र नहीं रही। वह परिवार की नैतिक धुरी भी बनी। जब नायक अपराध, लालच या भटकाव की ओर जाता है, तो मां का आंचल उसे उसके संस्कारों की याद दिलाता है। इस अर्थ में आंचल घर, क्षमा, त्याग और नैतिक सुरक्षा का प्रतीक बन जाता है। वह मां के हाथों का विस्तार है, वही हाथ जो बच्चे को थपकी देता है और जरूरत पड़ने पर उसके लिए ढाल बन जाता है।
    मां के आंचल के विपरीत नायिका का आंचल हिंदी सिनेमा में प्रेम, सौंदर्य, लाज और आकर्षण की भाषा रहा। पुराने दौर की फिल्मों में नायिका का चेहरा आंचल के पीछे छिप जाना उसके संकोच को व्यक्त करता था। वही आंचल हवा में उड़ता तो वह स्वतंत्रता और आकर्षण का संकेत बन जाता। कभी नायक उसे पकड़ता था, कभी वह नायक के कपड़ों में उलझ जाता था और कभी वह दूर जाती नायिका और पीछे खड़े नायक के बीच एक अदृश्य संबंध की तरह लहराता था। 'जिस पथ पे चला, उस पथ पे मुझे आंचल तो बिछाने दे' जैसे गीतों में आंचल प्रेम के समर्पण का प्रतीक बन जाता है। यहां स्त्री अपने प्रिय के जीवन-पथ पर स्वयं को समर्पित करने की पारंपरिक छवि के साथ सामने आती है। ऐसे गीत उस दौर की प्रेम-कल्पना को भी व्यक्त करते हैं, जिसमें प्रेम केवल आकर्षण नहीं बल्कि साथ निभाने, त्याग और समर्पण का वचन माना जाता था। फिल्मी गीतों में आंचल के साथ हवा का संबंध भी बेहद महत्वपूर्ण रहा है। हवा में लहराता आंचल मानो भीतर उठती भावनाओं को दृश्य रूप देता था। नायिका कुछ नहीं कहती, लेकिन उसका आंचल कह देता था कि उसके मन में कोई हलचल है। इसीलिए पुराने हिंदी सिनेमा में आंचल कैमरे की भाषा का भी हिस्सा था।
‘आंचल’ जब फिल्म का नाम बना
     दिलचस्प बात यह है कि आंचल केवल गीतों और दृश्यों में नहीं रहा, बल्कि फिल्मों के शीर्षक तक पहुंचा। 1960 में वसंत जोगलेकर के निर्देशन में बनी 'आंचल' में अशोक कुमार, निरूपा राय और नंदा प्रमुख भूमिकाओं में थे और संगीत सी. रामचंद्र का था। फिल्म के गीतों में पारिवारिक संबंधों और भावनाओं की छवियां दिखाई देती हैं। दो दशक बाद 1980 में अनिल गांगुली की 'आंचल' आई, जिसमें राजेश खन्ना, राखी, रेखा और अमोल पालेकर प्रमुख भूमिकाओं में थे। फिल्म का कथानक परिवार, रिश्तों, संदेह और सामाजिक दृष्टि के इर्द-गिर्द घूमता है। इस फिल्म में ‘आंचल’ स्त्री की मर्यादा और पारिवारिक संबंधों के रूपक के रूप में सामने आता है। यह संयोग नहीं है कि ‘आंचल’ जैसे शब्द को बार-बार पारिवारिक फिल्मों के शीर्षक में जगह मिली। भारतीय समाज में आंचल स्त्री के निजी जीवन और परिवार की सार्वजनिक प्रतिष्ठा के बीच एक पुल की तरह देखा जाता रहा है। इसलिए आंचल पर उठने वाला सवाल अक्सर पूरे परिवार की प्रतिष्ठा का सवाल बन जाता था।
     आंचल का अर्थ केवल स्त्री, मां या प्रेमिका तक सीमित नहीं है। साहित्य और सिनेमा में यह शब्द भूगोल और लोकजीवन का प्रतीक भी बन जाता है। ‘भारत माता के आंचल’ जैसे प्रयोगों में धरती मां है और उसका आंचल पूरा देश। इसी तरह ‘मैला आंचल’ में आंचल किसी स्त्री के परिधान से आगे बढ़कर पूरे ग्रामीण समाज, उसकी गरीबी, पीड़ा, लोक संस्कृति और संघर्ष का प्रतीक बन जाता है। यहां आंचल का अर्थ और व्यापक हो जाता है। वह मां की गोद से निकलकर खेत, गांव, नदी, मिट्टी और पूरे जनजीवन तक पहुंच जाता है। यही हिंदी सिनेमा और साहित्य की विशेषता है कि एक छोटा-सा शब्द धीरे-धीरे निजी भावना से सामाजिक रूपक में बदल जाता है।
     इक्कीसवीं सदी में सिनेमा की भाषा बदल गई। नायिका की पोशाक बदली, प्रेम व्यक्त करने के तरीके बदले और मां-बेटे के रिश्ते को दिखाने की शैली भी बदली। स्क्रीन पर साड़ी का आंचल पहले की तरह हर रोमांटिक दृश्य में दिखाई नहीं देता। फिर भी उसका भाव समाप्त नहीं हुआ। अब आंचल कई बार दिखाई देने वाली वस्तु के बजाय एक अदृश्य भाव है। मां के लिए वह सुरक्षा है, प्रेम में वह अपनापन है और स्मृति में वह बचपन का संसार। 'तारे जमीन पर' जैसे सिनेमा में मां से जुड़ा भाव हमें उसी अदृश्य आंचल की याद दिलाता है, जिसकी तलाश डर और अकेलेपन के क्षणों में बच्चा करता है। दरअसल, समय के साथ आंचल का दृश्य रूप कम हुआ है, लेकिन उसका प्रतीकात्मक अर्थ अधिक व्यापक हुआ है। अब वह केवल स्त्री की लाज या मां की ममता तक सीमित नहीं, बल्कि सुरक्षा, पहचान, स्मृति और भावनात्मक आश्रय का रूपक बन सकता है।
     हिंदी फिल्मों में आंचल की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उसने एक साधारण वस्त्र को असाधारण भावनात्मक अर्थ दे दिया। 'पेइंग गेस्ट' का ‘छोड़ दो आंचल’ प्रेम की शरारत और सामाजिक संकोच के बीच खड़ा है। 'मां का आंचल' में वही आंचल ईश्वर के दामन के समान पवित्र हो जाता है। 'दीवार' में वह बिना बोले मां की नैतिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है और 'आंचल' जैसी फिल्मों में परिवार और स्त्री की मर्यादा का रूपक बन जाता है। आंचल के दो सबसे मजबूत रूप माँ और नायिका दरअसल भारतीय भावलोक के दो अलग छोर हैं। मां का आंचल जीवन में वापस लौटने की जगह है, जबकि नायिका का आंचल जीवन में किसी नए व्यक्ति के प्रवेश की आहट। एक में सुरक्षा है, दूसरे में आकर्षण; एक में स्मृति है, दूसरे में संभावना; एक में बचपन है, दूसरे में प्रेम और भविष्य।
    यही कारण है कि हिंदी सिनेमा के सौ साल से अधिक के इतिहास में आंचल बार-बार लौटता रहा है। कभी वह मां की गोद में बच्चे को ढकता है, कभी प्रेमिका के चेहरे पर लाज बनकर उतरता है, कभी हवा में उड़कर प्रेम की घोषणा करता है और कभी पूरे गांव, समाज या देश की पहचान बन जाता है। सिनेमा ने आंचल को केवल देखा नहीं, उसे महसूस किया है। शायद इसीलिए पुराने गीतों में जब आंचल का जिक्र आता है तो दर्शक केवल एक कपड़े की कल्पना नहीं करता उसके सामने मां की छांव, प्रेमिका की झिझक, बचपन की स्मृति और रिश्तों की गर्माहट एक साथ उभर आती है। भारतीय सिनेमा में आंचल की यही सबसे बड़ी ताकत है वह दिखाई देने वाली चीज होकर भी दिखाई देने वाले संसार से बहुत आगे चला जाता है। उसमें प्रेम है, लाज है, ममता है, त्याग है, स्मृति है और आश्रय भी। यही वजह है कि बदलते फैशन और बदलती फिल्मी भाषा के बावजूद आंचल का भाव आज भी पुराना नहीं पड़ा। वह भारतीय सिनेमा के भावलोक में अब भी उतना ही मुलायम, आत्मीय और जीवित प्रतीक है, जितना परदे पर पहली बार लहराया था।
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विज्ञापन का विवाद : जब प्रचार का पैंतरा उल्टा पड़ा

     त्योहार भारतीय समाज में सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भावनाओं, परंपराओं और सामूहिक स्मृतियों से जुड़े अवसर होते हैं। इसलिए कंपनियां भी दीपावली, होली, रक्षाबंधन, करवा चौथ, ईद और दूसरे त्योहारों को अपने उत्पादों के प्रचार का बड़ा माध्यम मानती हैं। त्योहारों के दौरान जारी विज्ञापन सामान्य दिनों की तुलना में कहीं ज्यादा लोगों तक पहुंचते हैं और यदि उनमें भावनात्मक जुड़ाव पैदा हो जाए तो ब्रांड की पहचान मजबूत हो सकती है। लेकिन, यही कोशिश कभी-कभी उल्टी भी पड़ जाती है। रचनात्मकता, आधुनिकता या सामाजिक संदेश देने की कोशिश में जब विज्ञापन दर्शकों की धार्मिक, सांस्कृतिक या सामाजिक संवेदनशीलता से टकराता है, तो उत्पाद चर्चा में आने के बजाय विवाद का केंद्र बन जाता है। हाल में अभिनेत्री कृति सेनन को लेकर रक्षाबंधन के विज्ञापन का विवाद इसका ताजा उदाहरण है। आभूषण ब्रांड के इस विज्ञापन में कृति के पहनावे को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी आपत्ति जताई गई और आखिरकार ब्रांड ने विज्ञापन वापस ले लिया। ब्रांड ने कहा कि भारतीय संस्कृति, परंपराओं और त्योहारों के प्रति सम्मान के कारण उसने इसे हटाने का फैसला किया।
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- हेमंत पाल

     कृति सेनन वाले विज्ञापन में आपत्ति का मुख्य आधार यह था कि रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक त्योहार के प्रसंग में उनका परिधान एक वर्ग को जरूरत से ज्यादा आधुनिक और अनुपयुक्त लगा। विज्ञापन में उन्होंने ब्रालेट शैली का ब्लाउज, केप और ड्रेप्ड स्कर्ट पहना था। आलोचकों का कहना था कि भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक अवसर को इस तरह के पहनावे के साथ प्रस्तुत करना भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ के अनुकूल नहीं है। कृति ने अपने पहनावे का बचाव करते हुए सवाल उठाया कि आखिर महिलाओं के कपड़ों पर टिप्पणी करना कब बंद होगा। इस विवाद ने एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा किया कि किसी विज्ञापन में अभिनेत्री की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्योहार की सांस्कृतिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
     हालांकि, यह पहला अवसर नहीं है जब किसी विज्ञापन को जनता की आपत्ति के बाद वापस लेना पड़ा हो। भारतीय विज्ञापन जगत में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं। वर्ष 2021 में 'फैब इंडिया' का दीपावली अभियान ‘जश्न-ए-रिवाज’ इसी तरह विवाद में आया था। विज्ञापन में पारंपरिक भारतीय परिधानों में मॉडल्स को दिखाया गया था और अभियान को भारतीय संस्कृति से जोड़कर प्रस्तुत किया गया था। लेकिन, कुछ राजनीतिक नेताओं और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने 'अभियान' के नाम और प्रस्तुति पर आपत्ति जताई। आलोचना यह थी कि दीपावली जैसे हिंदू त्योहार के प्रचार में ‘जश्न-ए-रिवाज’ जैसे उर्दू शब्द का इस्तेमाल क्यों किया गया और मॉडल्स को पारंपरिक हिंदू परिधान में क्यों नहीं दिखाया गया। विरोध बढ़ने के बाद फैब इंडिया ने विज्ञापन वापस ले लिया।
    इसी तरह 2020 में तनिष्क का ‘एकत्वम’ अभियान भी देशभर में बहस का विषय बना था। विज्ञापन में एक हिंदू महिला की गोद भराई की रस्म को उसके मुस्लिम ससुराल वाले आयोजित करते हुए दिखाए गए थे। कंपनी का उद्देश्य अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों के मेल को दिखाना था, लेकिन एक वर्ग ने इसे ‘लव जिहाद’ को बढ़ावा देने वाला विज्ञापन बताया। सोशल मीडिया पर बहिष्कार की मुहिम चली और कर्मचारियों तथा साझेदारों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए कंपनी ने विज्ञापन वापस ले लिया। यहां दिलचस्प बात यह है कि जिस विज्ञापन को एक वर्ग ने सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश माना, उसी विज्ञापन को दूसरे वर्ग ने धार्मिक-सामाजिक मुद्दे के रूप में देखा।
    विज्ञापन के जरिए सामाजिक संदेश देने की कोशिश का एक और विवाद डाबर के ‘फेम’ अभियान को लेकर हुआ। 2021 में करवा चौथ के अवसर पर जारी विज्ञापन में एक समलैंगिक महिला जोड़े को इस त्योहार की रस्म निभाते हुए दिखाया गया था। विज्ञापन में एक महिला दूसरी महिला के चेहरे पर उत्पाद लगा रही थी और दोनों करवा चौथ मनाने की तैयारी करती दिखाई गई थीं। इसका उद्देश्य समावेशिता और बदलते सामाजिक रिश्तों को सामने रखना था, लेकिन कुछ लोगों ने इसे हिंदू त्योहार की परंपरागत मान्यता के विपरीत बताया। तत्कालीन मध्य प्रदेश के गृह मंत्री ने विज्ञापन पर आपत्ति जताते हुए कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी। इसके बाद डाबर ने विज्ञापन वापस लिया और लोगों की भावनाएं आहत होने के लिए बिना शर्त माफी मांगी।
     'मंगल सूत्र' को लेकर सब्यसाची के विज्ञापन का मामला भी इसी श्रेणी में आता है। 2021 में मशहूर डिजाइनर सब्यसाची मुखर्जी के मंगलसूत्र अभियान में एक महिला को कम गले वाले परिधान में पुरुष मॉडल के साथ अंतरंग मुद्रा में दिखाया गया था। कुछ लोगों ने इसे मंगल सूत्र जैसे पारंपरिक और वैवाहिक प्रतीक का आपत्तिजनक चित्रण बताया। सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना हुई और कुछ राजनीतिक नेताओं ने भी इसे लेकर सवाल उठाए। एक प्रदेश के तत्कालीन गृह मंत्री ने इस विज्ञापन हटाने के लिए 24 घंटे का अल्टीमेटम तक दिया। इसके बाद सब्यसाची ने अभियान वापस लेते हुए कहा कि उन्हें समाज के एक वर्ग के आहत होने पर गहरा दुख है।
    विज्ञापनों में सिर्फ धर्म और संस्कृति ही विवाद का कारण नहीं बने। 2022 का लेयर’आर शॉट बॉडी स्प्रे विज्ञापन इसका सबसे चर्चित उदाहरण है। दो विज्ञापनों में ऐसे दृश्य और संवाद थे, जिनका अर्थ महिलाओं के प्रति यौन हिंसा और बलात्कार जैसी गंभीर सामाजिक समस्या से जोड़कर देखा गया। एक विज्ञापन में चार पुरुष एक महिला के पीछे खड़े दिखाई देते हैं और संवाद इस तरह बनाया गया था कि पहली नजर में वह यौन हिंसा की ओर संकेत करता हुआ लगता था। बाद में उत्पाद की बोतल को लेकर स्थिति स्पष्ट होती थी। लेकिन, तब तक विज्ञापन की भाषा और प्रस्तुति को लेकर भारी विरोध शुरू हो चुका था। विज्ञापन को बलात्कार की संस्कृति को सामान्य बनाने वाला बताया गया। विज्ञापन मानक परिषद, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और दिल्ली महिला आयोग की आपत्तियों के बाद इसे सभी प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। कंपनी ने माफी भी मांगी।
     2017 में जोमैटो का एक बाहरी विज्ञापन भी इसी तरह विवाद में आया था। कंपनी ने ‘एमसी’ और ‘बीसी’ जैसे संक्षिप्त शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उन्हें ‘मैकरोनी एंड चीज’ और ‘बटर चिकन’ के अर्थ में पेश किया। कंपनी के लिए यह शब्दों का मजाकिया खेल था, लेकिन भारतीय संदर्भ में वही संक्षिप्त अक्षर बेहद आपत्तिजनक और अश्लील गालियों के रूप में पहचाने जाते हैं। सोशल मीडिया पर इसे सस्ता, अश्लील और महिलाओं के प्रति अपमानजनक बताया गया। सार्वजनिक विरोध के बाद कंपनी ने उस विज्ञापन को वापस लेने का फैसला किया। 2015 में कल्याण ज्वेलर्स का ऐश्वर्या राय बच्चन वाला विज्ञापन भी विज्ञापन इतिहास के विवादित अभियानों में गिना जाता है। विज्ञापन में ऐश्वर्या को शाही अंदाज में आभूषण पहने दिखाया गया था और उनके ऊपर छाता पकड़े एक गहरे रंग के बच्चे को दिखाया गया था। नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे नस्लवादी और बाल मजदूरी या गुलामी की छवि को बढ़ावा देने वाला बताया। आलोचना इतनी तेज हुई कि कंपनी ने विज्ञापन वापस लेने का फैसला किया। ऐश्वर्या ने भी कहा था कि विज्ञापन की अंतिम तस्वीर में बदलाव उनकी जानकारी के बिना किया गया था।
    इन उदाहरणों को देखने से स्पष्ट होता है, कि विवादित विज्ञापन हमेशा एक जैसे नहीं होते। कभी समस्या धार्मिक प्रतीकों के चित्रण से पैदा होती है, कभी पहनावे से, कभी सामाजिक रिश्तों की प्रस्तुति से और कभी ऐसी भाषा से जिसे रचनात्मकता के नाम पर इस्तेमाल किया जाता है। कई बार विज्ञापन बनाने वाली एजेंसी का उद्देश्य विवाद पैदा करना नहीं होता। लेकिन, वह यह अनुमान लगाने में चूक जाती है कि अलग-अलग सामाजिक समूह किसी दृश्य या संवाद को किस तरह ग्रहण करेंगे। आज सोशल मीडिया ने इस जोखिम को कई गुना बढ़ा दिया है। पहले किसी विज्ञापन को लेकर प्रतिक्रिया स्थानीय स्तर पर सीमित रह सकती थी, लेकिन अब कुछ घंटों में कोई अभियान देशव्यापी बहस का विषय बन सकता है। 
     यह भी ध्यान देने योग्य है कि हर विवादित विज्ञापन वास्तव में आपत्तिजनक हो, ऐसा जरूरी नहीं। सर्फ एक्सेल के 2019 के होली विज्ञापन में एक हिंदू लड़की को मुस्लिम दोस्त को होली के रंगों से बचाकर मस्जिद तक पहुंचाते दिखाया गया था। विज्ञापन का उद्देश्य सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश देना था, लेकिन इसके खिलाफ बहिष्कार की मुहिम चली और इसे एक वर्ग ने हिंदू त्योहार और मुस्लिम धार्मिक अनुष्ठान के बीच असंतुलित प्रस्तुति के रूप में देखा। दूसरी ओर बहुत से लोगों ने इसे एकता और भाईचारे का खूबसूरत संदेश माना। यह विज्ञापन वापस नहीं लिया गया, लेकिन यह उदाहरण बताता है कि विज्ञापन में संदेश की मंशा और दर्शक की व्याख्या दो अलग-अलग चीजें हो सकती हैं।
    किसी भी विज्ञापन की सफलता सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि लोग उसे कितनी बार देख रहे हैं। असली सफलता तब है, जब उपभोक्ता विज्ञापन को सकारात्मक भाव से याद रखे और उसी भाव को उत्पाद से जोड़े। यदि विज्ञापन उत्पाद से ज्यादा विवाद को यादगार बना दे, तो प्रचार की पूरी रणनीति कमजोर पड़ सकती है। ब्रांड को कुछ समय के लिए जबरदस्त चर्चा तो मिल जाती है, लेकिन उसके साथ नकारात्मक छवि भी जुड़ सकती है। त्योहारों से जुड़े विज्ञापनों में यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। रचनात्मक स्वतंत्रता जरूरी है, आधुनिक समाज की बदलती तस्वीर को विज्ञापनों में जगह मिलनी चाहिए और महिलाओं, विभिन्न समुदायों तथा बदलते रिश्तों का प्रतिनिधित्व भी होना चाहिए। लेकिन, इसके साथ यह समझना भी जरूरी है कि भारत जैसे विविध समाज में धार्मिक प्रतीक, पारंपरिक परिधान और त्योहारों की अपनी गहरी भावनात्मक पृष्ठभूमि है। विज्ञापन बनाने वालों को इस संवेदनशीलता को कमजोरी नहीं, बल्कि रचनात्मक चुनौती के रूप में देखना चाहिए।
    कृति सेनन के विज्ञापन से लेकर तनिष्क, फैब इंडिया, डाबर, सब्यसाची, लेयर’आर शॉट, जोमैटो और कल्याण ज्वेलर्स तक के उदाहरण एक ही सबक देते हैं कि विज्ञापन में चौंकाना आसान है, लेकिन सम्मान बनाए रखते हुए यादगार बनना कठिन। आज के दौर में किसी ब्रांड के पास विज्ञापन जारी करने से पहले केवल रचनात्मक टीम की राय पर्याप्त नहीं है। उसे अलग-अलग सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से अपने अभियान को परखना भी जरूरी है। क्योंकि, जिस विज्ञापन को बनाने में महीनों की मेहनत लगती है, उसे जनता की नाराजगी के बाद हटाने में कभी-कभी केवल कुछ घंटे लगते हैं। तब उत्पाद की बिक्री से ज्यादा चर्चा इस बात की होती है कि आखिर विज्ञापन बनाने वालों ने यह सोचा क्यों नहीं कि उनकी रचनात्मकता किस सीमा तक स्वीकार की जाएगी।
चर्चा चाहिए थी, खड़ा हुआ विवाद!
    त्योहारों के मौके पर विज्ञापन बनाना ब्रांडों के लिए बड़ा अवसर होता है, लेकिन जरा-सी चूक पूरा अभियान भारी पड़ सकता है। तनिष्क के विज्ञापन में हिंदू परिवार में मुस्लिम बहू की गोद भराई दिखाना सांप्रदायिक बहस का कारण बना और विज्ञापन हटाना पड़ा। डाबर के करवा चौथ वाले विज्ञापन में समलैंगिक महिला जोड़े को त्योहार मनाते दिखाया गया, जिस पर धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप लगे। फैब इंडिया के ‘जश्न-ए-रिवाज’ अभियान पर दीपावली की सांस्कृतिक पहचान को लेकर सवाल उठे। सब्यसाची के मंगलसूत्र विज्ञापन में अंतरंग दृश्य को लेकर आपत्ति हुई। यानी विज्ञापन की दुनिया में विवाद कभी भाषा से, कभी पहनावे से और कभी सामाजिक संदेश से पैदा होता है। खास बात यह है कि आज सोशल मीडिया के दौर में विज्ञापन हटाने का फैसला भी उतनी ही तेजी से होता है, जितनी तेजी से विवाद फैलता है।
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Monday, September 14, 2026

सिनेमा में गणेश और कृष्ण का युगीन प्रभाव

    भारतीय सिनेमा का भक्ति परंपरा से नाता उसकी स्थापना के समय से ही अटूट रहा है। जब मूक फिल्मों के बाद परदे ने बोलना सीखा, तब पौराणिक आख्यानों और देव चरित्रों ने सिनेमा कैनवास को एक नई पहचान दी। ब्लैक एंड व्हाइट दौर की धार्मिक फिल्मों से लेकर आज के आधुनिक, तकनीक-संचालित और एक्शन-प्रधान सिनेमा तक, पटकथाओं में ईश्वर के प्रति आस्था को अलग-अलग तरीकों से बुना गया है। यद्यपि फिल्मों के कथानक में समय-समय पर अनेक देवी-देवताओं का स्मरण किया गया। लेकिन, ब्लैक एंड व्हाइट ज़माने से लेकर आज के दौर तक सबसे अधिक उपस्थिति, पूजा और वंदना जिस देव की दिखाई दी, वे विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश हैं। उनके ठीक बाद यदि किसी देव की लीला, भक्ति और जीवन दर्शन का प्रभाव भारतीय फिल्मों पर सबसे गहरा और व्यापक रहा, तो वे हैं भगवान श्रीकृष्ण। फिल्मों में गानों की रचना की दृष्टि से भी देखा जाए, तो गजानन के ही सबसे अधिक और ऊर्जावान गीत रचे गए, जो दशकों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते आ रहे हैं।
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- हेमंत पाल

    सिनेमा और भक्ति का रिश्ता उतना ही पुराना है जितना भारतीय फिल्म उद्योग का इतिहास। जब मूक सिनेमा का दौर समाप्त हुआ और सवाक फिल्मों का आगमन हुआ, तब पौराणिक कथाओं और देवताओं की स्तुति को कहानियों का केंद्र बनाया गया। फिल्मों के कथानक में समय-समय पर अनेक देवी-देवताओं का स्मरण किया गया, लेकिन ब्लैक एंड व्हाइट दौर से लेकर आज के आधुनिक मल्टीप्लेक्स सिनेमा तक, जिस देव की सबसे अधिक वंदना और भक्ति परदे पर दिखाई दी, वे विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश हैं। उनके बाद यदि किसी देव का प्रभाव सिनेमाई कैनवास पर सबसे गहरा रहा, तो वे हैं लीलाधर भगवान श्रीकृष्ण। भारतीय संस्कृति में गणेश जी प्रथम पूज्य हैं। सिनेमा ने भी इस परंपरा का अक्षरशः पालन किया। किसी भी बड़े मिशन, पारिवारिक कहानी, एक्शन ड्रामा या गैंगस्टर थ्रिलर में संकट के निवारण अथवा नई शुरुआत के लिए प्रथम पूज्य गजानन की वंदना अनिवार्य अंग बनी। शुरुआती ब्लैक एंड व्हाइट दौर में 'श्री गणेश महिमा' और 'श्री गणेश विवाह' जैसी धार्मिक फिल्मों से शुरू हुआ यह सफर व्यावसायिक सिनेमा के ताने-बाने में इस तरह रचा-बसा कि 'देवता' केवल मंदिर के दृश्य तक सीमित न रहकर सीधे कथानक का हिस्सा बन गए।
     फिल्मों में गणेश जी के गानों की बहुलता और उनकी स्वीकार्यता का मुख्य कारण उनका विघ्नहर्ता रूप और मराठी संस्कृति में गणेशोत्सव का बृहद प्रभाव है। मुंबई, जो हिंदी सिनेमा की कर्मभूमि है, वहाँ गणेशोत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठान न होकर एक सामाजिक उत्सव है। फिल्मकारों ने इस स्थानीय ऊर्जा को पर्दे पर उतारने के लिए गणेश जी पर केंद्रित गीतों को कहानी के महत्वपूर्ण मोड़ (क्लाइमेक्स या टर्निंग पॉइंट) पर इस्तेमाल किया। ब्लैक एंड व्हाइट और क्लासिक दौर में गणेश वंदना का रूप पारंपरिक और शास्त्रीय रहा। 'श्री गणेश विवाह' का प्रसिद्ध गीत 'जय वंदन गिरिजा के नंदन' या 'हमसे बढ़कर कौन' का कालजयी गीत 'देवा हो देवा गणपति देवा, तुमसे बढ़कर कौन' इस बात का प्रमाण हैं कि किस प्रकार गणेश वंदना पूरे जनमानस को झूमने पर मजबूर कर देती थी। फिल्म 'दर्द का रिश्ता' में 'गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ' ने मानवीय संवेदनाओं और बीमारी से जूझती एक बच्ची के भावनात्मक मोड़ को गणेश उत्सव से जोड़ा।
     जैसे-जैसे सिनेमा बदला, गणेश गीतों का शिल्प भी बदला। 90 के दशक में फिल्म 'वास्तव' का गीत 'सिंदूर लाल चढ़ायो अच्छा गजमुख को' एक ओर तो गंभीर पूजा की अनुभूति कराता है, वहीं दूसरी ओर कहानी में नायक के जीवन में आने वाले बड़े तूफान का संकेत देता है। इसके बाद आधुनिक दौर की 'अग्निपथ' का 'देवा श्री गणेशा' गीत न केवल संगीत की दृष्टि से भव्य है, बल्कि यह नायक के प्रतिशोध और धर्म युद्ध की शुरुआत का प्रतीक बनता है। इसी तरह 'डॉन' फिल्म में 'मोर्या रे बाप्पा मोरिया रे', 'एबीसीडी' का 'हे गणराया' और 'बजरंगी भाईजान' में 'सेलफ़ी ले ले रे' के साथ गणेश वंदना का समावेश यह दर्शाता है कि गणेश जी का प्रभाव हर वर्ग के सिनेमा में शीर्ष पर रहा है। गणेश जी के बाद हिंदी सिनेमा के कथानक और संगीत पर सबसे गहरा प्रभाव भगवान श्रीकृष्ण का रहा है। श्रीकृष्ण का चरित्र बहुआयामी है। वे माखनचोर हैं, प्रेमी हैं, मित्र हैं, कूटनीतिज्ञ हैं और न्याय के रक्षक हैं। इसी कारण फिल्मकारों ने कृष्ण लीला को विभिन्न मानवीय भावनाओं को दर्शाने के लिए उपयोग किया। विशेष रूप से जन्माष्टमी के अवसर पर माखन मटकी फोड़ने के दृश्य हिंदी फिल्मों का एक बेहद लोकप्रिय फॉर्मेट बने।
      फिल्म 'ब्लफ मास्टर' का गीत 'गोविंदा आला रे आला जरा मटकी संभाल बृजबाला' ने सिनेमा में दही हांडी की परंपरा को अमर कर दिया। इसके बाद 'खुद्दार' का 'मच गया शोर सारी नगरी रे', 'हेलो ब्रदर' का 'चांदी की डाल पर सोने का मोर' और आधुनिक सिनेमा में 'ओ माय गॉड' का 'गो गो गोविंदा' यह स्पष्ट करता है कि श्रीकृष्ण का बाल-रूप और उनकी नटखट लीलाएं युवाओं के उल्लास को दिखाने का सबसे सशक्त माध्यम बनीं। जहाँ एक तरफ कृष्ण के गोकुल अवतार को उत्सव के रूप में दिखाया गया, वहीं दूसरी ओर उनके प्रेमावतार राधा-कृष्ण के संबंध को प्रेम गीतों के रूप में पेश किया गया। फिल्म 'लगाान' का 'राधा कैसे ना जले' गीत शास्त्रीयता और समकालीन सिनेमा का बेहतरीन उदाहरण है, जहां नायक-नायिका के बीच के मीठे प्रेम-कलह को राधा और कृष्ण के प्रसंग से जोड़ा गया। इसी तरह 'सत्यम शिवम सुंदरम' का 'यशोमति मईया से बोले नंदलाला' और 'गाइड' का 'पिया तोसे नैना लागे रे' में छिपी कृष्ण भक्ति का प्रभाव सिनेमा इतिहास की अमूल्य धरोहर है।
      यदि तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो गणेश जी और श्रीकृष्ण दोनों का ही उपयोग फिल्मों में अलग-अलग उद्देश्यों के लिए हुआ, लेकिन गानों की संख्या और उत्सवधर्मिता के मामले में गणेश जी हमेशा आगे रहे। गणेश जी के गीत अक्सर फिल्म के मुख्य नायक के बड़े संकल्प, समाज के एकत्रीकरण या फिर किसी विशाल आयोजन को स्थापित करने के लिए रचे गए। गणेश जी का रूप विघ्नहर्ता का है, इसलिए जब भी कहानी में कोई बड़ा संकट आया या किसी बड़े मिशन की शुरुआत हुई, तो पटकथा लेखकों ने गणेश वंदना का ही सहारा लिया। दूसरी ओर, श्रीकृष्ण के भजनों और गीतों का प्रयोग चरित्रों के व्यक्तिगत भावों, भक्ति, नटखटपन, प्रेम या जीवन दर्शन को उभारने के लिए किया गया।
     'शोले' में जब भी धार्मिक आस्था या न्याय की बात आती है तो पृष्ठभूमि में ईश्वर का स्मरण होता है, लेकिन जब त्यौहार और जनसमूह के बीच ऊर्जा भरने की बात आती है, तो गणेश उत्सव का दृश्य सबसे अधिक प्रभावशाली सिद्ध होता है। ब्लैक एंड व्हाइट दौर के सादे और भक्तिभाव से पूर्ण भजनों से लेकर आज के रॉक और फ़्यूज़न धुनों पर थिरकते गणेश वंदना के गानों तक, सिनेमा ने यह सिद्ध किया है कि विघ्नहर्ता भगवान गणेश भारतीय दर्शकों के दिल के सबसे करीब हैं। गणेश जी के गीतों की लय में जो सामूहिकता, ढोल-ताशों की गूँज और उत्साह होता है, वह किसी भी अन्य देव स्तुति की तुलना में सिनेमाई पर्दे पर अधिक भव्य और प्रभावशाली दिखता है। इसी कारण ब्लैक एंड व्हाइट ज़माने से लेकर आज तक, भारतीय फिल्मों के कथानक में भगवान गणेश की पूजा सबसे शीर्ष पर रही और उनके बाद श्रीकृष्ण की लीलाओं ने भारतीय सिनेमा के पर्दे को भक्ति और आनंद से सराबोर रखा।
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धार्मिक आस्था के सामने मंद पड़े सितारे


     सिनेमा कारोबार के बारे में आम धारणा रही है कि बड़े सितारे, भारी बजट और जोरदार प्रचार किसी फिल्म की सफलता की बड़ी गारंटी नहीं होते। हिंदी फिल्मों के इतिहास ने बार-बार इस धारणा को सही साबित किया। कभी किसी अनजान कलाकार की छोटी फिल्म दर्शकों के बीच अपनी जगह बना लेती है तो कभी बिना बड़े प्रचार के बनी धार्मिक फिल्म लंबे समय तक सिनेमाघरों में टिकी रहती है। अब ‘हनुमान अंश’ की सफलता इसी परंपरा की नई कड़ी बनकर सामने आई। 2 करोड़ से भी कम लागत से बनी नीम करोली बाबा के जीवन और उनकी आध्यात्मिक यात्रा से प्रेरित इस फिल्म ने बड़ी फिल्मों के बीच अपनी जगह बनाई। कमजोर शुरुआती प्रदर्शन के बाद फिल्म की कमाई जिस तरह बढ़ी, उसने 50 साल पहले प्रदर्शित हुई ‘जय संतोषी मां’ की याद ताजा कर दी, जिसने 'शोले' जैसी फिल्म के सामने अपनी जगह बनाई थी।
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- हेमंत पाल

   न दिनों ‘हनुमान अंश’ फिल्म खासी चर्चा में है। यह फिल्म नीम करौली बाबा की आध्यात्मिक यात्रा पर केंद्रित है। इस फिल्म ने अपने सामने बड़े सितारों से सजी फिल्मों के कारोबार पर खासा असर डाला। जबकि, इस फिल्म का कोई प्रचार नहीं हुआ और न निर्माण पर बड़ा खर्च किया गया। फिल्म ऐसे बालक की यात्रा दिखाती है, जो मां को खोने के बाद ईश्वर की तलाश में निकलता है और धीरे-धीरे सेवा, त्याग और भक्ति के रास्ते पर आगे बढ़ता हुआ नीम करोली बाबा के रूप में सामने आता है। फिल्म का जोर चमत्कारों से ज्यादा आस्था, करुणा और मानव सेवा पर है। यही शायद इसकी सबसे बड़ी विशेषता भी बन गई। दिलचस्प बात यह कि फिल्म की शुरुआत ऐसी नहीं थी, जिससे उसके लंबे समय तक चलने का अनुमान लगाया जाए। पहले सप्ताह में कारोबार कमजोर रहा, दूसरे सप्ताह में तो इसके सिनेमाघरों से उतरने की चर्चा शुरू हो गई थी। कारोबार करीब 40 लाख रुपए तक सिमट गया था। लेकिन, इसके बाद दर्शकों की प्रतिक्रिया ने पूरी तस्वीर बदल दी। तीसरे सप्ताह से दर्शकों की संख्या बढ़ने लगी और चौथे सप्ताह तक कई जगहों पर इसके शो भरने लगे। यही वह दौर था, जब फिल्म ने बड़े बजट वाली फिल्मों के बीच अपनी मजबूत जगह बनानी शुरू की। फिल्म की कमजोर शुरुआत के बाद तेजी से उभरने और सकारात्मक दर्शक प्रतिक्रिया को इसकी सफलता की बड़ी वजह बताया गया।
    करीब 2 करोड़ रुपए में बनी फिल्म का 50 करोड़ से ज्यादा के कारोबार तक पहुंचना इसलिए भी उल्लेखनीय है, क्योंकि इसके प्रदर्शन के समय बड़ी स्टारकास्ट और भारी बजट वाली फिल्में थीं। ‘टॉक्सिक’ में यश जैसे बड़े सितारे हैं, जबकि ‘आवारापन 2’ और ‘बंटवारा 1947’ भी दर्शकों के बीच चर्चा में थीं। ऐसे माहौल में ‘हनुमान अंश’ को अतिरिक्त स्क्रीन मिलना बताता है, कि सिनेमाघर वाले भी दर्शकों की मांग को नजरअंदाज नहीं कर सकते। ताजा रिपोर्ट के अनुसार फिल्म 50 करोड़ के कारोबार का आंकड़ा पार कर चुकी है। फिल्म की खासियत उसका सीमित प्रचार है। न तो इसके पीछे किसी बड़े सितारे का नाम था और न इसे करोड़ों रुपए के प्रचार अभियान का सहारा मिला। मुख्य भूमिका निभाने वाले शॉबिनव सत्य भी दर्शकों के लिए नया चेहरा हैं। खास बात यह कि वे फिल्म के निर्माण के दौरान सहायक निर्देशक के रूप में काम कर रहे थे, लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनी कि उन्हें ही मुख्य भूमिका निभाना पड़ी। निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने उनका लंबा स्क्रीन टेस्ट लिया और उन्हें भूमिका के लिए चुना। आज यही नया चेहरा फिल्म की सफलता की पहचान बन गया।
      ऐसी ही कहानी 50 साल पहले कुछ अलग रूप में सामने आई थी। 15 अगस्त 1975 को हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल ‘शोले’ प्रदर्शित हुई थी। अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, जया भादुड़ी और अमजद खान जैसे सितारों से सजी, रमेश सिप्पी के निर्देशन में बनी इस फिल्म को लेकर पहले से ही जबरदस्त उत्सुकता थी। उसी दिन एक बेहद कम बजट की धार्मिक फिल्म ‘जय संतोषी मां’ भी सिनेमाघरों में पहुंची। फिल्म में कोई बड़ा सितारा नहीं था, लेकिन दर्शकों ने उसे ऐसा अपनाया कि वह अपने समय की सबसे बड़ी सफल धार्मिक फिल्मों में शामिल हो गई। खास बात यह भी कि धार्मिक ग्रंथों में भी संतोषी माता का उल्लेख अन्य देवी-देवताओं के मुकाबले कम ही मिलता है। ‘जय संतोषी मां’ की सफलता का स्वरूप केवल टिकट खिड़की तक सीमित नहीं रहा। कई जगह दर्शक फिल्म देखने से पहले दर्शक चप्पल उतारते और परदे की आरती करते थे। इसके गीत भी घर-घर पहुंचे। ‘जय संतोषी मां’ और ‘मैं तो आरती उतारूं रे संतोषी माता की’ जैसे भजन आज भी उस दौर की याद दिलाते हैं। इस फिल्म का कारोबार करीब 5 करोड़ रुपए तक पहुंचा था, जो उस समय के लिहाज से असाधारण सफलता थी।
    1975 में न तो सामाजिक माध्यम थे, न इंटरनेट, न ऑनलाइन टिकट बुकिंग और न फिल्म का प्रचार कुछ ही घंटों में देशभर में पहुंचाने वाली व्यवस्था। ‘जय संतोषी मां’ को दर्शकों तक पहुंचाने का माध्यम मुख्य रूप से लोगों की बातचीत, गीत, धार्मिक वातावरण और सिनेमाघरों में बनी चर्चा थी। दूसरी ओर ‘हनुमान अंश’ ऐसे समय में आई है, जब एक दर्शक का अनुभव कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। इसके बावजूद दोनों फिल्मों की सफलता में एक समान सूत्र दिखाई देता है। दर्शकों ने पहले उन्हें स्वीकार किया और उसके बाद कारोबार बढ़ता चला गया। यही ‘वर्ड ऑफ माउथ’ यानी दर्शकों की जुबानी चर्चा की ताकत है। कोई फिल्म पहले दिन शानदार कारोबार कर सकती है, लेकिन अगर दर्शक उसे पसंद नहीं करते तो अगले कुछ दिनों में उसकी रफ्तार टूट सकती है। इसके उलट कमजोर शुरुआत वाली फिल्म अगर दर्शकों को पसंद आ जाए तो वह कई सप्ताह तक आगे बढ़ सकती है। ‘हनुमान अंश’ इसका ताजा उदाहरण है। फिल्म के निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने भी शुरुआती प्रदर्शन के आधार पर फिल्म को असफल मानने को जल्दबाजी बताया।
    यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि धार्मिक विषय अपने आप किसी फिल्म को सफल बना देता है। हिंदी सिनेमा में धार्मिक और पौराणिक विषयों पर बनी कई फिल्में दर्शकों की कसौटी पर खरी नहीं उतरीं। इसका सबसे ताजा उदाहरण ‘आदिपुरुष’ है। प्रभास, कृति सैनन और सैफ अली खान अभिनीत इस फिल्म पर भारी रकम खर्च की गई थी। शुरुआती दौर में शानदार कारोबार के बावजूद दर्शकों की नकारात्मक प्रतिक्रिया ने इसकी कमाई की रफ्तार रोक दी। संवाद, प्रस्तुति और दृश्य प्रभावों को लेकर भारी आलोचना हुई और फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर बड़ी असफल फिल्म माना गया। इससे साफ है कि धार्मिक फिल्म के लिए केवल धार्मिक विषय पर्याप्त नहीं है। दर्शक यह भी देखते हैं कि कहानी किस तरह कही गई है, पात्र कितने विश्वसनीय हैं और फिल्म उनकी भावनाओं से कितना जुड़ पाती है। ‘हनुमान अंश’ की सफलता इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है। फिल्म ने आस्था को बड़े दृश्य प्रभावों या भारी-भरकम प्रस्तुति के बजाय एक व्यक्ति की जीवन यात्रा और सेवा भावना से जोड़ने की कोशिश की है।
    सिनेमा का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, हर हर महादेव, संपूर्ण रामायण, जय संतोषी मां, गंगा जमुना सरस्वती जैसे अलग-अलग दौर की धार्मिक और आध्यात्मिक फिल्मों ने अपनी-अपनी तरह से दर्शकों पर प्रभाव छोड़ा। बाद के दौर में जय हनुमान, बाल गणेश और 'रामायण' तथा 'कृष्ण' से जुड़े टेलीविजन धारावाहिकों ने भी धार्मिक कथाओं के लिए दर्शकों की स्थायी रुचि को सामने रखा। दक्षिण भारतीय सिनेमा की ‘कांतारा’ जैसी फिल्म ने भी लोक आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक विश्वास को आधुनिक कहानी के साथ जोड़कर व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाया। दरअसल, धार्मिक फिल्मों की सफलता का इतिहास केवल भगवान की कहानियों का इतिहास नहीं है। यह भारतीय समाज की सामूहिक आस्था, लोक परंपराओं और भावनात्मक स्मृतियों का भी इतिहास है। ‘जय संतोषी मां’ ने 1975 में यह दिखाया था कि दर्शक बिना बड़े सितारों के भी किसी फिल्म को सिर-आंखों पर बैठा सकते हैं। 2026 की ‘हनुमान अंश’ ने लगभग आधी सदी बाद उसी बात को नए दौर की भाषा में दोहरा दिया।
   अंतर सिर्फ इतना आया कि तब फिल्म की सफलता के लिए दर्शकों की लंबी कतारें और आपसी चर्चा माध्यम थीं, आज उसी चर्चा को सामाजिक माध्यम और ऑनलाइन टिकट बुकिंग भी गति देते हैं। लेकिन, दर्शक का मूल निर्णय आज भी वही है कि फिल्म उसे भीतर से छूती है या नहीं। इसीलिए ‘हनुमान अंश’ की कहानी केवल 2 करोड़ रुपए की फिल्म के 50 करोड़ रुपए कमाने की कहानी नहीं है। यह उस पुराने फिल्मी सिद्धांत की वापसी है जिसमें प्रचार से ज्यादा दर्शक की पसंद मायने रखती है। ‘जय संतोषी मां’ और ‘हनुमान अंश’ के बीच 50 साल का फासला जरूर है, लेकिन दोनों की सफलता में एक समान धड़कन सुनाई देती है। पहले दर्शक ने फिल्म को खोजा, फिर फिल्म दर्शकों की जुबान पर चढ़ी और आखिरकार सिनेमाघरों तक भीड़ पहुंच गई। यही वह ताकत है, जो कभी-कभी बड़े सितारों और करोड़ों के बजट पर भी भारी पड़ जाती है।
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Saturday, August 29, 2026

बेमानी बोल, रूहानी धुन और 'अर्थहीन' तुकबंदी

    फिल्म संगीत की दुनिया में गानों को अक्सर उनकी गहरी शायरी, दिल को छू लेने वाली गजलों और संवेदना से भरे अल्फाजों के लिए जाना जाता है। लेकिन, सिनेमा के इस समंदर में एक ऐसा किनारा ऐसा भी है, जहां शब्दों के अर्थ मायने नहीं रखते, बल्कि उनकी लय और रिदम श्रोताओं के सिर चढ़कर बोलती है। लोग सोचते हैं कि गानों के बोल अगर बेतुके या अर्थहीन हों, तो वे जल्दी भूला दिए जाएंगे। लेकिन, फिल्म इंडस्ट्री का इतिहास इस बात का गवाह है, कि जब भी किसी संगीतकार ने गीतों की भाषा के नियमों को किनारे कर केवल 'धुन की चुटकी' ली, तब वे गीत सिर चढ़कर बोले हैं। 'तम्मा तम्मा लोगे' से लेकर 'तूतक तूतक तूतिया' तक और 'ईना मीना डीका' से लेकर आधुनिक दौर के 'ताऊबा ताऊबा' तक, यह सिलसिला संयोग नहीं, बल्कि सिनेमा की एक नियोजित और समृद्ध परंपरा है। जाने-माने गीतकार प्रसून जोशी ने एक कार्यक्रम में 'दिल्ली-6' में अपने लिखे एक गीत 'मसक्कली' की रचना की कहानी सुनाते हुए यह राज भी खोला है।
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- हेमंत पाल

    हिंदी फिल्मों में निरर्थक शब्दों जिन्हें पाश्चात्य संगीत में 'स्केटिंग' या 'नॉन-लेक्सिकल वोकेबल्स' कहा जाता है, इनका प्रयोग कोई 80 या 90 के दशक की देन नहीं है। इस ट्रेंड की शुरुआत आजादी के ठीक बाद 1940 और 1950 के दशक में हुई। जब पश्चिमी रॉक एन रोल, जैज़ और लैटिन संगीत भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ घुलने-मिलने लगा, तब संगीतकारों को महसूस हुआ कि हर बार भारी-भरकम उर्दू या हिंदी शब्दों से थिरकने वाली धुनें नहीं बनाई जा सकतीं। इस चलन को स्थापित करने का पहला बड़ा श्रेय महान संगीतकार सी रामचंद्र (चितलकर) को जाता है। 1947 की फिल्म 'शहनाई' में उन्होंने 'छुक छुक छैयां' जैसे शब्दों का प्रयोग किया। लेकिन, 1957 की फिल्म 'आशा' में जब किशोर कुमार और आशा भोसले की आवाज में 'ईना मीना डीका, दे दाई दमनिका, माका नाका' गूंजा, तो मानो हिंदी सिनेमा को एक नया संगीतमय झुनझुना मिल गया। बच्चों के खेल 'ईनी मिनी माइनी मो' से प्रेरित होकर बने इस गीत में कोंकणी शब्द 'माका नाका' और 'रम पम पोस' जैसी तुकबंदी को जोड़ा गया था। इस एक प्रयोग ने साबित कर दिया कि दर्शक केवल शब्द सुनने नहीं, बल्कि उस ऊर्जा को महसूस करने के लिए भी थिरकते हैं। इस दौर में 'लारा लप्पा लारा लप्पा लाई रखदा' (एक थी लड़की, 1949) जैसे गानों ने साबित कर दिया कि अगर मुखड़ा जुबां पर चढ़ जाए, तो फिर उसका कोई शब्दकोशीय अर्थ ढूंढने की जरूरत नहीं पड़ती।
    एक बार जब ऐसे गीतों का दरवाजा खुला, तो फिल्म इंडस्ट्री के हर बड़े संगीतकार ने इसमें अपनी तरफ से रंग भरने का मौका नहीं छोड़ा। यह ऐसा दायरा बन गया, जहां प्रयोग करने की कोई पाबंदी नहीं थी। 1960 के दशक में 'जंगली' का 'याहू .., चाहे कोई मुझे जंगली कहे' आया था। यहां 'याहू' कोई शब्द नहीं, बल्कि एक उल्लासपूर्ण चीख थी, जिसने शम्मी कपूर को स्टारडम के शिखर पर पहुंचा दिया। इस फिल्म में 'अई अईया करूँ मैं क्या, सुक्कू सुक्कू' जैसा गाना भी आया, जो अर्जेंटीना की धुन से प्रेरित था और जिसका हिंदी में कोई शाब्दिक अर्थ नहीं होता। इसके बाद 'जब जब फूल खिले' का 'अफ्फू खुदा' और 'लव इन टोक्यो' का 'सायोनारा' जैसे बोल गूंजे, जिन्होंने विदेशों की भाषा और बेतुके ध्वनि वाले शब्दों को भारतीय दिलों की धड़कन बना दिया। 1970 और 1980 के दशक में आरडी. बर्मन और बप्पी लहरी ने इस विधा को नया मुकाम दिया। आरडी बर्मन ने 'जवानी दीवानी' में 'गिली गिली अक्खा, बिली बिली बिली' जैसे निरर्थक शब्दों से कमाल का समां बांधा।
    बप्पी लहरी इससे कहीं आगे निकल गए, उन्होंने 'मवाली' (1983) के 'उई अम्मा उई अम्मा' की धुन को सालों बाद 2011 में 'द डर्टी पिक्चर' के 'ऊह ला ला' में तब्दील कर दिया। फ्रेंच भाषा का एक विस्मयसूचक शब्द 'ऊह ला ला' भारतीय घरों में बच्चा-बच्चा गाने लगा। अगर हम गानों की गिनती करने बैठें, तो ऐसे सैकड़ों गीत मिल जाएंगे। 1989 की फिल्म 'थानेदार' का 'तम्मा तम्मा लोगे' हो या 'गैंगस्टर' का 'या अली' या फिर सिंधी लोकगीत 'हो जमालो' से प्रेरित होकर पंजाबी भांगड़ा शैली में ढला 'तूतक तूतक तूतिया' इन सभी गानों में मुखड़े या अंतरे के बोल केवल लय (रिदम) को सहारा देने के लिए बनाए गए थे। 90 के दशक में तो यह चलन चरम पर पहुंच गया, जब 'हाय हुकु हाय हुकु', 'गेला गेला', 'चिन्नम्मा चिलकामा' और 'हुक्का मारो' जैसे गानों ने ऑडियो कैसेट और सीडी के बाजार में धूम मचा दी थी। फ़िल्म 'दिल्ली 6' का एक गीत 'मसक्कली मसक्कली' भी इसी श्रेणी का है। इस गीत के बारे में गीतकार प्रसून जोशी ने एक कार्यक्रम में बताया था कि हिंदी में 'मसक्कली' कोई शब्द नहीं है। लेकिन, फिल्म के संगीतकार एआर रहमान ने एक ऐसी धुन बनाई, जिसे सुनकर मेरे दिमाग में यह शब्द आया और मैंने वह गीत लिख दिया। बाद में सवाल उठा कि इस 'मसक्कली' शब्द को जस्टिफाई कैसे करेंगे, तो फिल्म में कबूतर का नाम मसक्कली रखकर इस मसले को हल किया गया।
     संगीत के जानकारों और मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, ऐसे गानों की सफलता के पीछे एक गहरा वैज्ञानिक और संगीतमय कारण होता है। जब कोई इंसान संगीत सुनता है, तो उसका मस्तिष्क सबसे पहले धुन की लय से जुड़ता है। यदि बोल बेहद जटिल और कठिन शब्दावली वाले होंगे, तो मस्तिष्क का ध्यान उनका अर्थ समझने में लग जाता है। लेकिन, जब बोल ऊह ला ला, सुक्कू सुक्कू या 'तूतक तूतक' जैसे सरल और निरर्थक होते हैं, तो इंसान का ध्यान अर्थ से हटकर पूरी तरह से धुन के तालमेल और ऊर्जा पर केंद्रित हो जाता है। यह एक प्रकार का 'कैथार्सिस' (मानसिक तनाव मुक्ति) पैदा करता है, जिससे लोग झूमने और नाचने पर मजबूर हो जाते हैं।
     समय बदला, संगीत की तकनीक बदली, लेकिन 'चुटकी लेने वाले' इन गानों का मिजाज नहीं बदला। आज के डिजिटल और रील्स वाले दौर में भी यह चलन पूरी ताकत के साथ जारी है। अगर हम इस तरह के अर्थहीन या केवल लय आधारित बोल वाले सबसे नए और चर्चित उदाहरणों की बात करें, तो हाल ही में विक्की कौशल पर फिल्माया गया गाना 'तौबा तौबा' (बैड न्यूज़) या 'नाच पुंजबन' और 'काला चश्मा' जैसे गानों का रीमिक्स कल्चर इसी परंपरा की अगली कड़ी हैं। विशेषकर 'तौबा तौबा' या पंजाबी-बॉलीवुड फ्यूज़न वाले हालिया ट्रैक्स में ऐसे शब्दों को बार-बार दोहराया जाता है (जैसे 'तौबा तौबा', 'कुड़ी ताऊबा ताऊबा'), जिनका उद्देश्य कोई दार्शनिक बात कहना नहीं, बल्कि एक ऐसा हुक-स्टेप और कैंची लूप तैयार करना है जो सोशल मीडिया पर वायरल हो सके। इसी तरह 'ब्रह्मास्त्र' का 'डांस का भूत' हो या 'स्त्री 2' के डांस नंबर, इनमें प्रयोग की गई पंक्तियाँ केवल एक हुक-लाइन बनाने के लिए चुनी जाती हैं।
    फिल्मी गानों की यह चुटकी इस बात का जीता-जागता सबूत है कि फिल्म संगीत में पिरोए हुए ये गीत किसी भाषा या व्याकरण के मोहताज नहीं होते। शब्द चाहे 'ईना मीना डीका' हों, 'तम्मा तम्मा' हों या 'तूतक तूतक तूतिया' इनकी असली ताकत उनके अर्थ में नहीं, बल्कि उस खुशी और उमंग में छिपी है, जो ये श्रोताओं के चेहरे पर लाते हैं। जब तक दुनिया में इंसान को तनाव मिटाने और जश्न मनाने के लिए एक धुन की जरूरत रहेगी, तब तक फिल्म इंडस्ट्री के संगीतकार ऐसी ही मीठी, चटपटी और बेतुकी 'चुटकी' लेते रहेंगे, और हम-आप बिना मतलब समझे भी इन गानों पर यूं ही थिरकते रहेंगे।
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परदे पर राखी : सिनेमा के बदलते कैनवास पर रिश्ते

     सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं रहा, यह समाज का जीता-जागता दर्पण भी है। जब से समाज ने नए दौर में कदम रखा, हमारी फिल्मों ने भारतीय पारिवारिक मूल्यों, लोक-संस्कृति और तीज-त्योहारों को अपने कलेवर में गहराई से समेटा। यही वजह है कि त्योहार केवल कहानी को आगे बढ़ाने का जरिया नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं, रिश्तों की प्रगाढ़ता और सामाजिक समरसता को व्यक्त करने के सशक्त माध्यम भी बने। कुछ दशक पहले तक स्थिति यह थी कि शायद ही कोई ऐसी फिल्म बनती हो, जिसमें होली, दिवाली, ईद या राखी का कोई खूबसूरत प्रसंग न जोड़ा गया हो। त्यौहारों के ये रंग दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच लाते और उन्हें परदे पर अपना ही परिवार नजर आता था। परंतु, बीते कुछ सालों में हिंदी सिनेमा का रंग-ढंग पूरी तरह बदल गया। 
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- हेमंत पाल

    फिल्मों के कथानक के कई रंग होते हैं, उनमें एक त्योहारों का रंग भी है, जिसकी रौनक धीरे-धीरे कम हो गई। अब बहुत कम फिल्मों में तीज--त्यौहार और रस्मों-रिवाज दिखाई देते हैं। चिंता की बात यह कि आधुनिक सिनेमा से वे गहरे पारिवारिक रिश्ते ही गायब होने लगे, जो कभी हमारी फिल्मों की रीढ़ और त्योहारों के प्रसंग का आधार हुआ करते थे। आज की फिल्मों में रिश्तों की उस भावुकता की जगह हीरो-हीरोइन के लव अफेयर्स, बोल्ड सीन्स, सस्पेंस और अंधाधुंध मारपीट ने ले ली। इस बदलते दौर में रक्षाबंधन जैसे पावन त्योहार का फिल्मी उल्लेख भी बहुत कम हो गया। अब भाई-बहन के रिश्ते की प्रगाढ़ता वाला यह त्यौहार परदे से हाशिये पर आ गया। 
    बीते कुछ दशकों के सिनेमा के सफर पर नजर डालें, तो कथानक में एक बहुत बड़ा वैचारिक बदलाव दिखाई देने लगा। एक जमाना था जब फिल्मों की कहानियां संयुक्त परिवारों के इर्द-गिर्द बुनी जाती थीं। चाचा-चाची, दादा-दादी, भाई-बहन और मां-बाप के प्रति जिम्मेदारी ही नायक के जीवन का मकसद होते थे। आज के दौर में सिनेमा ने 'लार्जर दैन लाइफ' एक्शन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अपना मुख्य एजेंडा बना लिया। फिल्मों से रिश्तों के इस तरह तिरोहित यानी गायब होने के पीछे आधुनिक जीवनशैली और बाजारवाद का बहुत बड़ा हाथ है। आज की फिल्मों का नायक अब अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाने वाला सीधा-साधा युवक नहीं, बल्कि वह अपनी ही दुनिया में मग्न, आक्रामक और व्यवस्था से लड़ने वाला एक 'एंग्री यंग मैन' या फिर एक कॉर्पोरेट विलेन जैसा दिखने लगा है।
    अब स्क्रीन पर भाई और बहन के बीच का वह निश्छल, भोला और आदर से भरा प्रेम बहुत कम दिखाई देता है। पहले जहां भाई अपनी बहन की एक राखी के लिए पूरी दुनिया से लड़ जाता था, वहीं आज के सिनेमा में बहन का किरदार या तो सिर्फ नायक की शादी की तैयारियों में नाचने-गाने तक सीमित रह गया या फिर उसे पूरी तरह से कहानी से बाहर कर दिया गया। मारकाट और हिंसक दृश्यों की भरमार ने फिल्मों के उस कोमल पक्ष को पूरी तरह कुचल दिया, जो दर्शकों के दिलों को छूता था। फिल्मों में अब खून-खराबा, बंदूकें, गैंगवार और गालियां इतनी आम हो चुकी हैं कि उनमें राखी के धागे की पवित्रता और भाई-बहन के आंसुओं के लिए कोई जगह ही नहीं बची। जब रिश्तों की बुनियाद ही कमजोर हो गई, तो भला त्योहारों की खुशियां परदे पर कैसे नजर आएंगी!
    सिनेमा के इतिहास में वैसे तो कई त्योहारों को बहुत शिद्दत से फिल्माया गया, लेकिन होली के बाद राखी ही एक ऐसा त्योहार रहा जिसे निर्देशकों ने सबसे ज्यादा तवज्जो दी। ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों के जमाने से ही भाई-बहन के इस रिश्ते को परदे पर अमर करने की कोशिशें शुरू हो गई थीं। रक्षाबंधन के त्यौहार और भाई-बहन के रिश्ते को पूरी तरह समर्पित पहली मूक फिल्म साल 1928 में बनी, जिसका नाम था 'राखी।' इसके बाद बोलती फिल्मों के दौर में साल 1947 में आई फिल्म 'रक्षाबंधन' को इस विषय पर बनी शुरुआती बेहद महत्वपूर्ण फिल्मों में गिना जाता है। अश्विनी कुमार के निर्देशन में बनी साल 1947 की इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर भाई-बहन के प्रेम की एक नई इबारत लिखी थी। इसके बाद तो जैसे हिंदी सिनेमा में राखी केंद्रित फिल्मों की बाढ़ सी आ गई। पचास, साठ और सत्तर के दशक को यदि राखी फिल्मों का स्वर्णिम काल कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इस दौर में केवल त्योहार का एक दृश्य ही नहीं रखा जाता था, बल्कि पूरी की पूरी फिल्म का ताना-बाना ही राखी के एक कच्चे धागे के इर्द-गिर्द बुना जाता था। इन फिल्मों का मुख्य उद्देश्य समाज को यह बताना होता था कि एक भाई के लिए उसकी बहन का मान-सम्मान और उसकी सुरक्षा कितनी ज्यादा मायने रखती है।
    जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, फिल्मकारों ने इस रिश्ते की अहमियत को समझते हुए फिल्मों के नाम भी सीधे त्योहार और भाई-बहन के रिश्ते पर रखने शुरू कर दिए। इन फिल्मों के नाम सुनते ही आज भी पुरानी पीढ़ी के दर्शकों की आंखें नम हो जाती हैं। इस कड़ी में साल 1959 में आई फिल्म 'छोटी बहन' का नाम सबसे ऊपर आता है। इस फिल्म में बलराज साहनी और नंदा ने भाई-बहन का जो कालजयी किरदार निभाया, उसने पूरे देश को रुला दिया था। इसके बाद साल 1962 में आई फिल्म 'राखी' ने इस रिश्ते की जटिलताओं और गहराई को बखूबी परदे पर उतारा, जिसमें अशोक कुमार और वहीदा रहमान मुख्य भूमिकाओं में थे। 
    इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए साल 1969 में आई फिल्म 'भाई बहन' ने भी दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी। सत्तर के दशक में आई देव आनंद और जीनत अमान की फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' (1971) भले ही एक अलग पृष्ठभूमि पर आधारित थी, लेकिन इस फिल्म की मूल आत्मा एक भाई की अपनी भटकी हुई बहन को वापस पाने की तड़प ही थी। इसके अलावा धर्मेंद्र और साधना की फिल्म 'अनीता' हो या फिर बाद के सालों में आई 'प्यारी बहना' (1985) जिसमें मिथुन चक्रवर्ती ने एक अपाहिज बहन के भाई का बेहद भावुक किरदार निभाया था। इन सभी फिल्मों ने यह साबित किया कि राखी का त्योहार भारतीय सिनेमा के लिए कितना अनमोल रहा है। यहां तक कि नब्बे के दशक में भी 'तिरंगा' और 'क्रांतिवीर' जैसी एक्शन फिल्मों में भी राखी के त्योहार को देशप्रेम और न्याय की लड़ाई से जोड़कर एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में इस्तेमाल किया गया था।
    राखी केंद्रित फिल्मों की चर्चा तब तक अधूरी है, जब तक कि उन गानों का जिक्र न किया जाए जो आज भी हर साल रक्षाबंधन के दिन देश के कोने-कोने में गूंजते हैं। इन गीतों के बोल और संगीत इतने जादुई थे कि वे सीधे रूह में उतर जाते थे। आज भी जब रेडियो या टेलीविजन पर फिल्म 'छोटी बहन' का गाना 'भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना, भैया मेरे छोटी बहन को न भुलाना' बजता है, तो हर भाई-बहन का दिल भावुकता से भर जाता है। इस गाने को लता मंगेशकर ने अपनी मखमली आवाज दी थी और शैलेन्द्र ने इसके बेहद मार्मिक बोल लिखे थे। इसी तरह फिल्म 'राखी' (1962) का मोहम्मद रफी की आवाज में गाया हुआ गीत 'राखी धागों का त्योहार, बंधा एक-एक धागे में भाई-बहन का प्यार' आज भी इस त्योहार की परिभाषा माना जाता है। 
     एक और बेहद लोकप्रिय और खिलखिलाता हुआ गीत जो हर बहन अपने भाई के लिए गाती है, वह है फिल्म 'सच्चा झूठा' (1970) का गाना 'मेरी प्यारी बहनिया बनेगी दुल्हनिया, सजके आएंगे दूल्हे राजा।' किशोर कुमार की आवाज में गाए गए इस गीत ने भाई की खुशी और उसकी आत्मीयता को एक नया मुकाम दिया। इसके अलावा फिल्म 'चंबल की कसम' (1980) का गाना 'चंदा रे मेरे भैया से कहना, बहना याद करे' और फिल्म 'अंधा कानून' (1983) का गाना 'ये राखी बंधन है ऐसा, जैसे चंदा और चकोरी' जैसे अनगिनत गीत हैं जिन्होंने इस रिश्ते की पवित्रता को सुरों के संसार में हमेशा के लिए सहेज दिया। इन गानों की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि ये केवल फिल्म के सीन को पूरा करने के लिए नहीं गाए जाते, बल्कि ये उस दौर के समाज की वास्तविक संवेदनाओं को सुरों में पिरोते थे।
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Friday, August 14, 2026

बिहार की राजनीति : हार से हासिल सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी

     
राजनीति में चुनाव सिर्फ हार और जीत का खेल नहीं होता, बल्कि यह नेतृत्व की क्षमता, संगठन की मजबूती और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को बदलने की योग्यता की भी परीक्षा होती है। कई बार चुनावी पराजय किसी नेता के राजनीतिक जीवन का अंत साबित होती है, तो कई बार वही हार आगे की बड़ी सफलता की आधारशिला बन जाती है। बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर की हाल की जीत इसी उदाहरण के रूप में देखी जा सकती है। विधानसभा चुनाव में लगभग पूरी तरह असफल रहने के बाद जिस नेता को राजनीतिक विश्लेषकों ने समय से पहले खारिज कर दिया था, उसी नेता ने कुछ महीनों बाद बांकीपुर जैसे कठिन निर्वाचन क्षेत्र में जीत दर्ज कर यह संकेत दिया कि राजनीति में अंतिम निर्णय मतदाता देता है, राजनीतिक टिप्पणीकार नहीं।
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● हेमंत पाल

     बिहार विधानसभा चुनाव के बाद 'जन सुराज' की स्थिति अत्यंत निराशाजनक थी। बड़ी संख्या में उम्मीदवार मैदान में उतरे, लेकिन अधिकांश अपनी जमानत तक नहीं बचा सके। परिणाम आने के तुरंत बाद यह धारणा बनने लगी कि प्रशांत किशोर का राजनीतिक प्रयोग विफल हो चुका है। यह भी कहा गया कि चुनावी रणनीतिकार के रूप में सफल रहे व्यक्ति की राजनीति में प्रत्यक्ष भूमिका निभाने की क्षमता सीमित है। लेकिन, प्रशांत किशोर ने इस आलोचना का जवाब बयानबाजी से नहीं, बल्कि संगठन और रणनीति में बदलाव के जरिए देने का रास्ता चुना। भारतीय राजनीति में हार के बाद नेताओं को चुनाव आयोग, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन, संगठन या सहयोगियों को दोष देना आम बात रही है। इसके विपरीत प्रशांत किशोर ने सार्वजनिक रूप से पराजय स्वीकार की और आत्ममंथन का रास्ता अपनाया। यही उनकी राजनीति का पहला महत्वपूर्ण मोड़ माना जा सकता है। किसी भी राजनीतिक दल के लिए हार के बाद सबसे बड़ा सवाल यह होता है, कि वह अपनी कमियों को स्वीकार करता है या नहीं। जन सुराज ने इस मामले में अपेक्षाकृत अलग रवैया अपनाया।
     चुनाव के बाद प्रशांत किशोर ने जिस प्रकार सार्वजनिक गतिविधियों से कुछ समय की दूरी बनाकर आत्मचिंतन का संदेश दिया, उसका राजनीतिक महत्व भी था। यह केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, बल्कि कार्यकर्ताओं और समर्थकों को यह संकेत भी था कि पार्टी हार के कारणों को समझे बिना आगे नहीं बढ़ेगी। इसके बाद संगठनात्मक ढांचे में जो परिवर्तन हुए, उन्होंने 'जन सुराज' की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सबसे बड़ा परिवर्तन पार्टी की कार्यशैली में दिखाई दिया। विधानसभा चुनाव के दौरान 'जन सुराज' में बड़ी संख्या में ऐसे लोग सक्रिय थे, जिनकी पहचान पेशेवर चुनाव प्रबंधन से जुड़ी थी। सोशल मीडिया, डिजिटल प्रचार और चुनावी ब्रांडिंग पर विशेष जोर दिया गया था। लेकिन, बिहार जैसे राज्य में केवल डिजिटल मौजूदगी चुनावी सफलता की गारंटी नहीं बन सकती। यहां बूथ स्तर का संगठन, जातीय समीकरण, स्थानीय नेतृत्व और लगातार जनसंपर्क कहीं अधिक प्रभावी साबित होते हैं। चुनाव परिणामों ने इस वास्तविकता को स्पष्ट कर दिया।
    इस अनुभव से सीखते हुए प्रशांत किशोर ने संगठन की प्राथमिकताओं को बदला। पेशेवर चुनावी मॉडल की जगह समर्पित कार्यकर्ताओं पर भरोसा बढ़ाया। बूथ स्तर पर संगठन तैयार करने, स्थानीय इकाइयों को सक्रिय करने और अलग-अलग सामाजिक समूहों तक नियमित पहुंच बनाने की रणनीति अपनाई गई। बड़ी जनसभाओं और सोशल मीडिया अभियानों की तुलना में छोटे समूहों के संवाद, मोहल्ला बैठकों और घर-घर संपर्क पर अधिक ध्यान दिया गया। यह बदलाव केवल रणनीति का नहीं, बल्कि राजनीतिक सोच का परिवर्तन था। राजनीति में आर्थिक पारदर्शिता और व्यक्तिगत प्रतिबद्धता भी कार्यकर्ताओं के मनोबल को प्रभावित करती है। प्रशांत किशोर ने अपनी आय और संपत्ति का बड़ा हिस्सा पार्टी को समर्पित करने की घोषणा कर यह संदेश देने का प्रयास किया कि 'जन सुराज' केवल चुनावी मंच नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक परियोजना है। साथ ही उन्होंने पार्टी से जुड़े लोगों से आर्थिक सहयोग की अपेक्षा रखकर यह संकेत भी दिया कि संगठन बाहरी संसाधनों पर निर्भर रहने के बजाय अपने समर्थकों की भागीदारी से आगे बढ़ेगा। इस मॉडल का उद्देश्य कार्यकर्ताओं में स्वामित्व की भावना पैदा करना था।
    बांकीपुर उपचुनाव इसी बदली हुई रणनीति की पहली बड़ी परीक्षा बना। यह सीट लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ रही है। ऐसे क्षेत्र में चुनाव लड़ना स्वयं में जोखिम भरा निर्णय था। यदि यहां भी पराजय होती, तो 'जन सुराज' की राजनीतिक विश्वसनीयता पर और गंभीर प्रश्न उठते। लेकिन, प्रशांत किशोर ने इसी चुनौती को अवसर में बदलने का प्रयास किया। इस चुनाव में उन्होंने राज्यस्तरीय बड़े राजनीतिक विमर्श की बजाय स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता दी। जलभराव, यातायात, रोजगार और शहरी अव्यवस्था जैसे विषय लगातार जनता के बीच उठाए गए। इससे चुनाव राष्ट्रीय राजनीतिक बहस से हटकर स्थानीय असंतोष के इर्द-गिर्द केंद्रित होने लगा। यह रणनीति इसलिए भी प्रभावी रही, क्योंकि स्थानीय चुनावों में मतदाता अक्सर अपने दैनिक जीवन से जुड़े मुद्दों पर अधिक प्रतिक्रिया देते हैं।  प्रशांत किशोर की एक और महत्वपूर्ण रणनीति यह रही कि उन्होंने स्वयं को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और महागठबंधन दोनों के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। बिहार में लंबे समय से राजनीति दो प्रमुख ध्रुवों के बीच घूमती रही है। ऐसे में उन मतदाताओं को आकर्षित करना, जो दोनों पक्षों से असंतुष्ट थे, 'जन सुराज' के लिए स्वाभाविक राजनीतिक अवसर था। यदि कोई तीसरा दल केवल विरोध की राजनीति करता तो उसकी स्वीकार्यता सीमित रहती है, लेकिन यदि वह व्यवहारिक विकल्प प्रस्तुत करता है. तो उसके लिए राजनीतिक जमीन बन सकती है।
     इस पूरे अभियान में एक और राजनीतिक पहलू महत्वपूर्ण रहा। भरत तिवारी एनकाउंटर का मुद्दा लगातार चर्चा में बना रहा। इस विषय को प्रशांत किशोर ने निरंतर राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाए रखा। माना गया कि इस मुद्दे ने विशेष रूप से उन मतदाताओं के बीच प्रभाव डाला, जो परंपरागत रूप से भाजपा के समर्थक माने जाते रहे हैं। दूसरी ओर मुख्य विपक्षी दल इस मुद्दे को उतनी प्रभावशीलता से राजनीतिक समर्थन में परिवर्तित नहीं कर सके। इससे 'जन सुराज' को उन वर्गों तक पहुंच बनाने का अवसर मिला, जहां पहले उसकी मौजूदगी सीमित थी। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा नेताओं के कुछ आत्मविश्वास से भरे बयानों ने भी राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया। जब किसी दल को अपनी जीत पूरी तरह सुनिश्चित मानने का संदेश जाता है, तो कई बार मतदाता इसके विपरीत प्रतिक्रिया भी देते हैं। बांकीपुर के परिणामों ने यह संकेत दिया कि किसी भी निर्वाचन क्षेत्र को केवल परंपरागत राजनीतिक गढ़ मानकर नहीं चला जा सकता। मतदाता समय-समय पर अपने फैसलों से स्थापित धारणाओं को बदलने की क्षमता रखते हैं।
     हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि बांकीपुर की जीत को पूरे बिहार की राजनीतिक तस्वीर का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। उपचुनाव और विधानसभा चुनाव की प्रकृति अलग होती है। उपचुनाव स्थानीय परिस्थितियों, उम्मीदवार की छवि और तत्कालीन राजनीतिक वातावरण से अधिक प्रभावित होते हैं, जबकि विधानसभा चुनाव में व्यापक संगठन, संसाधन, गठबंधन और राज्यव्यापी समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसलिए जन सुराज के सामने अभी भी अपनी नई रणनीति को पूरे राज्य में प्रभावी ढंग से लागू करने की चुनौती बनी हुई है। फिर भी यह स्वीकारना होगा कि प्रशांत किशोर ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश दिया है। उन्होंने यह दिखाया कि हार के बाद केवल बयान बदलने से नहीं, बल्कि संगठन, रणनीति और कार्यशैली बदलने से राजनीतिक वापसी संभव होती है। बिहार की राजनीति में उनकी यह वापसी केवल एक सीट की जीत नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि लगातार सीखने और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने वाला नेतृत्व लंबे समय तक प्रासंगिक बना रह सकता है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बांकीपुर की सफलता एक अपवाद साबित होती है या बिहार की राजनीति में किसी नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत।
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