Monday, September 21, 2026

भक्ति, आस्था और बॉक्स ऑफिस पर करिश्मा

   हिंदी सिनेमा में एक दिलचस्प परंपरा रही है। जब किसी खास विषय की फिल्म दर्शकों के बीच असाधारण लोकप्रिय होती है, तो उसी भावभूमि पर आगे कई फिल्में बनती हैं। सिनेमा के जन्म काल से लेकर आधुनिक मल्टीप्लेक्स और डिजिटल युग तक, जब भी किसी फिल्म निर्माता ने जनमानस की धार्मिक आस्था और भक्ति भावना को सही ढंग से पर्दे पर उकेरा, तब-तब बॉक्स ऑफिस पर कमाई के सारे गणित और पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त हुए। लेकिन, धार्मिक और पौराणिक फिल्मों का मामला थोड़ा अलग है। यहां सफलता सिर्फ मनोरंजन से नहीं, दर्शकों की आस्था से भी जुड़ जाती है। यही वजह है कि सिनेमा के शुरुआती दौर से लेकर आज तक राम, कृष्ण, शिव, हनुमान और संतों की कहानियां परदे पर बार-बार लौटती रही हैं। कभी दर्शक फिल्म देखते हुए जूते-चप्पल बाहर उतार देते थे, कभी परदे पर भगवान के प्रकट होते ही फूल और सिक्के चढ़ाते थे। आज वही आस्था करोड़ों रुपये के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन में दिखाई दे रही है। 2026 की फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने इसी परंपरा को नए दौर में पहुंचाया है।
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- हेमंत पाल

     नीम करोली बाबा के जीवन और महिमा पर आधारित फिल्म 'हनुमान अंश' ने सिनेमा जगत में कमाई का एक ऐसा नया इतिहास रच दिया, जिसने ट्रेड विश्लेषकों को भी अचंभित कर दिया है। ट्रेड रिपोर्ट्स के अनुसार करीब 2 करोड़ रुपए में बनी ‘हनुमान अंश’ ने 43वें दिन तक दुनियाभर में लगभग 308 करोड़ रुपए कमाए। इसका संकेत साफ है कि धार्मिक विषय के साथ कम बजट और मजबूत कहानी भी बड़ा असर पैदा कर सकती है। अप्रत्याशित मुनाफा कमाकर इस फिल्म ने न केवल आधुनिक दौर की सुपरहिट फिल्मों को पीछे छोड़ा, बल्कि 51 साल पुराने ऐतिहासिक रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब किसी भक्ति आधारित फिल्म ने सिनेमाघरों को मंदिरों जैसा माहौल प्रदान कर बॉक्स ऑफिस पर सफलता का परचम लहराया हो। सिनेमा के इतिहास में ब्लैक एंड व्हाइट दौर से लेकर रंगीन और अत्याधुनिक वीएफएक्स के युग तक, ऐसी कई मील का पत्थर साबित होने वाली फिल्में आई हैं, जिन्होंने अभूतपूर्व कमाई करते हुए इतिहास रचा है। 
धार्मिक फिल्मों को लेकर इंडस्ट्री में सनसनी 
    ‘हनुमान अंश’ की रिलीज के करीब एक महीने बाद हिंदी सिनेमा में धार्मिक और आध्यात्मिक फिल्मों को लेकर नई हलचल दिखाई देने लगी है। 7 अगस्त को रिलीज हुई इस फिल्म के बाद करीब पांच हफ्तों में तेरा सांई, राम बोला, खाटू श्याम और 'राधा-कृष्ण' की कहानी पर फिल्म जैसे कई प्रोजेक्ट घोषित हुए। इन फिल्मों से जुड़े बड़े नाम भी सामने आए हैं। साजन राज कुरूप और शोभा संत ‘कृष्णावतार’ का अगला पार्ट भी ला रहे हैं। उनका लक्ष्य धार्मिक फिल्मों के जरिए भारत की ओर से दुनिया को ‘अवेंजर्स’ जैसा मल्टीवर्स देने का है। उन्होंने पहले पार्ट को अभी ओटीटी पर नहीं बेचा है और इसे दोबारा सिनेमाघरों में लाने की तैयारी है। इस बदलाव की खासियत केवल फिल्मों की संख्या नहीं, बल्कि विषयों का विस्तार भी है। 
      ‘तेरा सांई’ साईं बाबा के जीवन और शिक्षाओं पर आधारित है, जिसमें संजय मिश्रा मुख्य भूमिका में हैं। फिल्म 2027 को हिंदी, मराठी, तेलुगू और तमिल में रिलीज होगी। वहीं खाटू श्याम और राधा-कृष्ण जैसे विषय भी बड़े पर्दे पर आने वाले हैं। 'राधा-कृष्ण' की कहानी पर फिल्म करण जौहर के बैनर के तहत बनने की खबर है। हालांकि, सफलता का आधार सिर्फ धर्म नहीं है। दर्शक कहानी से भावनात्मक रूप से जुड़ें, यह जरूरी है। किसी एक सफल फिल्म के फॉर्मूले को जल्दबाजी में दोहराना इस दौर का सबसे बड़ा जोखिम हो सकता है। ‘इरुमुडी’ में रवि तेजा जैसे बड़े स्टार हैं, जबकि ‘हनुमान अंश’ ने बिना बड़े स्टार के दर्शक जुटाए। इसलिए दोनों फिल्मों से मिलने वाले संकेत अलग हैं।
जब सिनेमाघर ही बन गए थे मंदिर
     सिनेमा की नींव ही पौराणिक और धार्मिक कथाओं पर रखी गई थी। दादा साहेब फाल्के द्वारा बनाई गई भारत की पहली मूक फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' (1913) और पहली बोलती पौराणिक फिल्मों के दौर से ही दर्शकों ने भक्ति सिनेमा को सहर्ष अपनाया। 1940 और 1960 के दशकों में जब तकनीक सीमित थी और फिल्में ब्लैक एंड व्हाइट हुआ करती थीं, तब भी पौराणिक फिल्मों ने दर्शकों के दिलों पर गहरा प्रभाव छोड़ा। विजय भट्ट के निर्देशन में बनी फिल्म 'राम राज्य' (1943) ब्लैक एंड व्हाइट युग की सबसे महान और सफल पौराणिक फिल्मों में से एक मानी जाती है। इस फिल्म की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, जो आमतौर पर सिनेमा देखने से दूर रहते थे, उन्होंने अपने जीवन में केवल यही एक फिल्म देखी थी।
     'राम राज्य' ने उस दौर में बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़ कारोबार किया था और यह उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों की सूची में शीर्ष पर रही। इस फिल्म ने भारतीय जनमानस में प्रभु श्री राम और माता सीता के प्रति अपार श्रद्धा को सिल्वर स्क्रीन पर बहुत ही सादगी और भक्ति भाव से प्रस्तुत किया था। बाबूभाई मिस्त्री द्वारा निर्देशित फिल्म 'संपूर्ण रामायण' (1961) ने ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा के अंतिम दौर में सफलता का नया इतिहास रचा। महिपाल और अनीता गुहा अभिनीत इस फिल्म में स्पेशल इफेक्ट्स का उस दौर के हिसाब से बेहतरीन इस्तेमाल किया गया था। इस फिल्म ने देश भर के थिएटर में सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली मनाई। लोग दूर-दराज के गांवों से बैलगाड़ियों में भरकर थिएटर तक फिल्म देखने आते थे। इस फिल्म ने न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारी व्यावसायिक सफलता हासिल की और यह उस दौर की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर सिद्ध हुई।
सफलता की ऊंचाई छूने वाली फ़िल्में 
     दक्षिण भारतीय सिनेमा के इतिहास में निर्मित फिल्म 'लव कुश' (1963) जिसे हिंदी में भी डब किया गया था, पहली ऐसी पौराणिक फिल्म बनी जिसने बॉक्स ऑफिस पर 1 करोड़ रुपये से अधिक की कुल कमाई का रिकॉर्ड बनाया था। इस फिल्म ने सिनेमाघरों में लगातार 75 हफ्तों तक चलने का अद्भुत कीर्तिमान स्थापित किया था। एनटी रामाराव और अंजलि देवी अभिनीत इस फिल्म के गानों और भक्तिमय प्रस्तुति ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया था। जब भारतीय सिनेमा ब्लैक एंड व्हाइट से निकलकर रंगीन हो चुका था, तब 1975 में एक ऐसी ऐतिहासिक घटना घटी जिसने पूरे फिल्म व्यापार के सिद्धांतों को बदलकर रख दिया। 1975 का साल भारतीय सिनेमा में अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र की महा-ब्लॉकबस्टर एक्शन फिल्म 'शोले' के लिए जाना जाता है। लेकिन, उसी साल बेहद कम बजट में बनी एक छोटी सी भक्ति फिल्म 'जय मां संतोषी' (1975) रिलीज हुई। विजय शर्मा निर्देशित इस फिल्म का कुल बजट मात्र 25 से 30 लाख रुपए था। शुरुआत में इस फिल्म को वितरक तक नहीं मिल रहे थे और पहले दिन इसका कलेक्शन मात्र 56 रुपये के आसपास था।
    लेकिन, जैसे ही माताओं-बहनों और आम जनता के बीच फिल्म के भक्तिमय संगीत और संतोषी मां की महिमा की बात फैली, सिनेमाघरों के बाहर मील लंबी लाइनें लग गईं। लोग नंगे पैर सिनेमाघर जाते थे, चप्पल बाहर खोलते थे, स्क्रीन पर आरती के समय सिक्के उछालते थे और पूजा की थाली व प्रसाद लेकर थिएटर में बैठते थे। 'जय मां संतोषी' ने उस दौर में लगभग 5 करोड़ रुपये का अभूतपूर्व बॉक्स ऑफिस कलेक्शन किया था। अपने बजट के मुकाबले 2,000% से अधिक का प्रॉफिट कमाकर इसने उस समय तक का सबसे बड़ा ऑल-टाइम रिकॉर्ड बनाया था, जो पिछले 51 वर्षों से अटूट था। 'जय मां संतोषी' की ऐतिहासिक सफलता के बाद भारतीय सिनेमा में धार्मिक फिल्मों का एक नया दौर शुरू हुआ। इसी लहर में 1979 में आई फिल्म 'हर हर गंगे' ने भी बॉक्स ऑफिस पर कमाई के नए कीर्तिमान स्थापित किए। पौराणिक गाथाओं और गंगा अवतरण की कथा पर आधारित इस रंगीन फिल्म को दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया और यह उस साल की व्यावसायिक रूप से अत्यधिक सफल फिल्मों में शामिल हुई।
'कांतारा' से 'हनुमान अंश' तक का दौर
    आज के दौर में जब मल्टीप्लेक्स संस्कृति और करोड़ों के बजट वाली एक्शन-थ्रिलर फिल्मों का बोलबाला है, तब भी भक्ति और पौराणिक विषयों पर आधारित फिल्मों ने यह साबित कर दिया है कि भारतीय दर्शकों के दिल में आस्था का स्थान आज भी सबसे ऊपर है। ऋषभ शेट्टी की 'कांतारा' (2022) फिल्म ने लोक-मान्यता, दैव-भक्ति और पौराणिक पृष्ठभूमि को जिस नए और आधुनिक अंदाज में प्रस्तुत किया, उसने बॉक्स ऑफिस के पूरे समीकरण बदल दिए। महज 16 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने दुनियाभर में 407 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार कर लगभग 2,448% का अप्रत्याशित मुनाफा दर्ज किया। निखिल सिद्धार्थ स्टारर फिल्म 'कार्तिकेय-2' (2022) भगवान श्री कृष्ण के पौराणिक रहस्य और ऐतिहासिक साक्ष्यों की खोज पर आधारित थी।
      15 करोड़ के सीमित बजट में तैयार हुई इस फिल्म ने दुनिया भर में 117 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई कर 685% से ज्यादा का लाभ अर्जित किया। इसके बाद तेजा सज्जा स्टारर और प्रशांत वर्मा निर्देशित फिल्म 'हनुमान' (2024) ने सुपरहीरो कॉन्सेप्ट को भगवान हनुमान की शक्तियों और भक्ति से जोड़कर परदे पर पेश किया। 60 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने दुनिया भर में लगभग 295 करोड़ का बिजनेस किया और 392% का रिटर्न दिया। इसके बाद 'महावतार नरसिम्हा' ने भारतीय एनिमेशन के क्षेत्र में इतिहास रचते हुए इस धार्मिक एनिमेटेड फिल्म ने 40 करोड़ के बजट के मुकाबले वैश्विक स्तर पर 326 करोड़ से अधिक का शानदार कारोबार किया और 717% का मुनाफा कमाया।
धार्मिक फिल्मों का समृद्ध इतिहास 
      हनुमान अंश: नीम करोली बाबा के जीवन और हनुमान जी के प्रति उनकी असीम भक्ति पर केंद्रित इस फिल्म ने महज 1.8 करोड़ के बजट से 153 करोड़ रुपये से ज्यादा की रिकॉर्डतोड़ कमाई की। 8,400% से अधिक का ऐतिहासिक मुनाफा कमाकर इसने 1975 के 'जय मां संतोषी' के 51 साल पुराने प्रॉफिट रिकॉर्ड को ध्वस्त करते हुए भक्ति सिनेमा के इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करा लिया।भारतीय सिनेमा का 100 से अधिक वर्षों का इतिहास इस बात का साक्षी है कि तकनीकों और दर्शकों की पसंद में कितने भी बदलाव क्यों न आए हों, लेकिन जब भी पर्दे पर भक्ति, सर्वशक्तिमान पर विश्वास और जन-आस्था का प्रामाणिक संगम होता है, तो दर्शक सिनेमाघरों को उत्सव का केंद्र बना देते हैं। ब्लैक एंड व्हाइट दौर की 'राम राज्य' और 'संपूर्ण रामायण' से लेकर रंगीन दौर की 'जय मां संतोषी' और आज के दौर की 'हनुमान अंश' जैसी फिल्मों की अभूतपूर्व सफलता यह सिद्ध करती है कि भक्ति सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना और बॉक्स ऑफिस की सफलता की मजबूत रीढ़ है।
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संगीत को पीछे छोड़ दिल में उतरे गीत

    भारतीय फिल्म संगीत का इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि जहां विशाल आर्केस्ट्रा, भारी-भरकम वाद्य यंत्र और तीव्र बीट्स सुनने वालों को क्षणिक आनंद या थिरकने का अनुभव कराते हैं। वहीं कुछ गीत ऐसे भी रचे जाते हैं, जो अपनी सादगी से कालजयी बन जाते हैं। पीयू बोले, मोह मोह के धागे या 'आओगे जब तुम' जैसे गीतों में देखने को मिलता है कि इन रचनाओं की मूल आत्मा इनके शब्दों में बसती है। यहां संगीतकार अपनी उपस्थिति को हावी करने के बजाय पृष्ठभूमि में ख़ामोशी से खड़ा महसूस होता है। वाद्य यंत्र इतने धीमे और सधे हुए बजाए जाते हैं कि गायक का स्वर और गीतकार की संवेदना सीधे सुनने वाले की चेतना से संवाद कर सके। ऐसे गीतों की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वे सुनने वाले पर किसी तरह का भावनात्मक दबाव नहीं डालते। ये गीत किसी शांत बहती नदी की तरह कान में प्रवेश करते हैं और दिल के उस कोने को छू लेते हैं, जहां मनुष्य अपने अकेलेपन, अपनी स्मृतियों और अपनी गहरी संवेदनाओं के साथ निवास करता है। 
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- हेमंत पाल

    फ़िल्मी गीत दो तरह के होते हैं। एक में आर्केस्ट्रा का जबरदस्त धूम-धड़ाका होता है, जबकि दूसरी तरह के गीतों में शब्द ज्यादा स्पष्ट सुनाई देते हैं। ऐसे गीतों पर संगीत हावी नहीं होता और मासूमियत से शब्द कानों से दिल तक पहुंच जाते हैं। इसलिए कि जब संगीत का शोर कम होता है, तो शब्दों का अर्थ और उनके पीछे छिपी भावना अधिक स्पष्ट, अधिक पारदर्शी और अधिक प्रभावशाली होकर उभरती है। जब कम संगीत और शब्दों के प्रभुत्व की बात आती है, तो गुलज़ार के योगदान के बिना यह चर्चा अधूरी रह जाती है। गुलज़ार ने भारतीय सिनेमा को वह काव्यशास्त्र दिया जहां बिंब और अमूर्त भावनाएं सीधे श्रोता के अवचेतन में उतरती हैं। इस शैली का एक सर्वोत्कृष्ट उदाहरण फ़िल्म 'लेकिन' का संगीत है। पंडित हृदयनाथ मंगेशकर के संगीतात्मक संयोजन और लता मंगेशकर के गायन के साथ गुलज़ार के लिखे इन गीतों ने सादगी और गहराई की नई परिभाषा गढ़ी। 'यारा सिली सिली' में विरह की पीड़ा को व्यक्त करने के लिए किसी प्रचंड वाद्यवृंद की आवश्यकता नहीं पड़ी, एक हल्की सी तान, रेगिस्तानी हवा जैसा फैला शांत वातावरण और वाद्य यंत्रों की बहुत बारीक मौजूदगी ने इस गीत को सीधे रूह से जोड़ दिया।
गुलजार ने ऐसे कई गीतों को शब्द दिए 
    इसी फिल्म का गीत 'सुरमई शाम इस तरह आए' या 'मैं एक सदी से बैठी हूँ' इस बात का प्रमाण हैं, कि जब शास्त्रीयता का आधार हो और गुलज़ार के शब्द हों, तो वाद्य यंत्रों की न्यूनतम उपस्थिति ही गीत का सबसे बड़ा आभूषण बन जाती है। 'इजाज़त' फ़िल्म में उनका लिखा गीत 'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है' भी इसी श्रेणी में आता है, जहां आरडी बर्मन ने संगीत को पूरी तरह पृष्ठभूमि में ढकेल दिया, ताकि गुलजार के अनूठे, बेतरतीब और सीधे संवाद जैसे बोल अपनी पूरी ईमानदारी के साथ श्रोता के कानों में पहुंच सकें। इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए यदि अन्य युगों के उदाहरणों को देखें, तो फ़िल्म 'अमर प्रेम' का गीत 'चिंगारी कोई भड़के' भी अपनी सादगी में अद्भुत है। आनंद बक्शी के लिखे इस गीत को आरडी बर्मन ने एक शांत, गूंजती हुई गिटार की धुन और हल्की ताल के साथ सजाया। किशोर कुमार की भारी और संयमित आवाज ने जीवन के दर्शन और सामाजिक तड़प को जिस सादगी से पिरोया, वह सुनने वाले के भीतर एक गहरा सन्नाटा पैदा कर देता है।
इन गीतों में संगीत का कोलाहल नहीं 
    इसी श्रेणी में फिल्म 'मसान' का गीत 'तू किसी रेल सी गुजरती है' एक आधुनिक मील का पत्थर है। दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल के शेरों को जब वरुण ग्रोवर ने पटकथा के अनुकूल ढाला और इंडियन ओशन बैंड ने इसे संगीतबद्ध किया, तब कोई भारी ताना-बाना नहीं बुना गया। स्वानंद किरकिरे की बिना किसी अत्यधिक सजावट वाली देसी आवाज़, हल्के एकॉस्टिक गिटार और सारंगी की हल्की सी तान के साथ बहती है। यहां संगीत शब्दों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं करता, बल्कि दुष्यंत कुमार के शब्दों के भारीपन को बहने के लिए एक बेहद शांत और निर्मल रास्ता देता है। 
     फिल्म 'आनंद' का 'कहीं दूर जब दिन ढल जाए' भी इसी परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। योगेश के लिखे बोलों को सलिल चौधरी ने इतनी सादगी से धुन में ढाला कि मुकेश की उदास आवाज़ हर सुनने वाले की निजी तन्हाई बन गई। ढलते सूरज, ढलती उम्र और अनकही उम्मीदों की इस व्यथा में वाद्य यंत्र इतने सीमित हैं कि लगता है जैसे गायक कमरे में बैठकर आपके ठीक सामने गा रहा हो। इसी तरह फ़िल्म 'सिलसिला' का गीत 'ये कहाँ आ गए हम' इस बात का प्रमाण है कि जब जावेद अख्तर की नज़्मों को खय्याम ने अत्यंत धीमे और मुलायम संगीतमय परिवेश में रखा, तो वह संगीत का नहीं बल्कि सांसों और शब्दों का समागम बन गया।
ऐसे कालजयी गीतों की रचना प्रक्रिया अलग 
    इन गीतों का इतिहास उठाकर देखें तो यह स्पष्ट होता है कि इनकी रचना प्रक्रिया अक्सर पारंपरिक फिल्मी गानों से अलग रही है। आमतौर पर फिल्मों में पहले धुन बनाई जाती है और फिर उस धुन में शब्दों को कसा जाता है। परंतु यारा सिली सिली, चिंगारी कोई भड़के या 'तू किसी रेल सी गुजरती है' जैसी रचनाओं में भाव और कविता प्राथमिक रहे। जब संगीतकार किसी पूर्व-लिखित कविता या गहरी भावना के सम्मान में धुन तैयार करता है, तो वह वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल सिर्फ पृष्ठभूमि को रंगने के लिए करता है, उसे ढकने के लिए नहीं। हृदयनाथ मंगेशकर, खय्याम, आरडी बर्मन और नए दौर में अमित त्रिवेदी या इंडियन ओशन जैसे संगीतकारों ने इस बात को समझा कि जहां शब्द खुद इतने वज़नदार हों, वहां वाद्य यंत्रों का शोर उस कविता का प्रभाव कम कर सकता है। सुनने वालों पर ऐसे गीतों का मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक असर बेहद गहरा और स्थायी होता है। तीव्र और भारी संगीत वाले गाने तात्कालिक उत्साह या ऊर्जा तो दे सकते हैं, लेकिन वे इंसान के अवचेतन मन में बहुत गहरे नहीं उतरते। इसके विपरीत, जिन गीतों में शब्द प्रधान और संगीत न्यूनतम होता है, वे मनुष्य के अकेलेपन के साथी बनते हैं। 
फ़िल्म इतिहास में ऐसे गीत बहुत कम
      भारतीय सिनेमा में उत्कृष्ट एवं काव्यात्मक बोलों के कारण लोकप्रिय हुए गीतों की एक समृद्ध परंपरा रही है। 1957 की फ़िल्म 'प्यासा' का 'यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है', 1959 की 'अनाड़ी' का 'किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार', 'काग़ज़ के फूल' का 'वक़्त ने किया क्या हसीं सितम', 1963 की 'गुमराह' का 'चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों' और 1964 की 'हक़ीक़त' का देशभक्ति गीत 'कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों' अपने गहरे और सामाजिक अर्थों के लिए जाने जाते हैं। वहीं 1976 की फ़िल्म 'कभी कभी' का 'मैं पल दो पल का शायर हूँ', 1979 की 'गोलमाल' का 'आने वाला पल जाने वाला है', 1983 की 'मासूम' का 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी हैरान हूँ मैं' और 1995 की बॉम्बे का 'तू ही रे' भावनाओं की अमर अभिव्यक्ति प्रस्तुत करते हैं। इसी संगीत यात्रा को आगे बढ़ाते हुए 2005 की 'परिणीता' का 'पीयू बोले', 2007 की 'अनवर' का 'मौला मेरे मौला', जब वी मेट का 'आओगे जब तुम', 2009 की 'वेक अप सिड' का 'इकतारा', 2014 की 'टू स्टेट्स' का 'मस्त मगन', 2015 की 'दम लगा के हईशा' का ' ये मोह मोह के धागे' दिल को छू जाते हैं। 2016 की 'एमएस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी' का 'कौन तुझे', 2017 की 'बरेली की बर्फी' का 'नज़्म नज़्म', 2018 की 'धड़क' का 'पहली बार', 2019 की 'मैं वापस आऊंगा' का 'तेरे पास में' और 2024 की 'दो पत्ती' का 'रांझा' आधुनिक युग में भी शब्दों और भावों की सुंदरता से श्रोताओं के दिलों को छूते आ रहे हैं।
दिलों में इसलिए उतरते रहे ये गीत 
    भारतीय सिनेमा की अलग-अलग समय अवधियों में ऐसे कई अनुपम गीत रचे गए, जिन्होंने भारी व्यवस्था को दरकिनार कर केवल अपनी सशक्त शब्दावली और न्यूनतम संगीतमयता से जनमानस पर गहरा प्रभाव छोड़ा है। जब कोई व्यक्ति जीवन में तनाव, विरह, प्रेम, या आत्म-मंथन के दौर से गुज़र रहा होता है, तब भारी संगीत उसे विचलित कर सकता है। ऐसे समय में यह अल्प-संगीत एक शांत मरहम की तरह काम करता है। श्रोता को ऐसा महसूस होता है कि गीतकार ने उसके ही मन के किसी अनकहे कोने को शब्द दे दिए हैं। सुनने वालों पर ऐसे गीतों का मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक असर बेहद गहरा और स्थायी होता है। तीव्र और भारी संगीत वाले गाने तात्कालिक उत्साह या ऊर्जा तो दे सकते हैं, लेकिन वे इंसान के अवचेतन मन में बहुत गहरे नहीं उतरते। जिन गीतों में शब्द प्रधान और संगीत न्यूनतम होता है, वे मनुष्य के अकेलेपन के साथी बनते हैं। यही कारण है कि इकतारा, नज़्म नज़्म और 'लेकिन' फिल्म के नगमे या 'तू किसी रेल सी गुजरती है' जैसे गाने रिलीज होने के दशकों बाद भी पुराने नहीं लगते। वे कालजयी इसलिए बनते हैं, क्योंकि इंसान की मूल भावनाएं कभी नहीं बदलतीं, और ये गीत सीधे उन्हीं मूल भावनाओं से संवाद करते हैं। संक्षेप में कहा जाए तो, संगीत का काम केवल कान को भाता नहीं है, बल्कि आत्मा को छूना है, और जब संगीत संयमित होता है तथा शब्द सशक्त, तो गीत महज़ मनोरंजन न रहकर एक व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है।
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फिल्मों की रोशनी में बदलता समाज

    सिनेमा को केवल मनोरंजन की खिड़की मानना उसके प्रभाव को सीमित करना है। वह समाज की सामूहिक चेतना का आईना भी है और कभी-कभी हथौड़ा भी, जो जमी हुई धारणाओं पर चोट करता है। ‘अछूत कन्या’ से मदर इंडिया, दो आंखें बारह हाथ से दामिनी, तारे जमीन पर से ‘पिंक’ और ‘आर्टिकल 15’ से ‘अस्सी’ तक हिंदी सिनेमा की एक समानांतर धारा ऐसी रही, जो दर्शक को केवल कहानी सुनाकर नहीं छोड़ती, बल्कि उससे सवाल पूछती है। असली समाज सुधार शायद वहीं से शुरू होता है, जब दर्शक सिनेमाघर से बाहर निकलने के बाद भी फिल्म के सवालों से बाहर नहीं निकल पाता।
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- हेमंत पाल

    फिल्मों पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि वे अपराध को बढ़ावा देती हैं। यह आरोप पूरी तरह निराधार भी नहीं है। कई अपराधियों ने पुलिस पूछताछ के दौरान फिल्मों से अपराध करने की तरकीब या प्रेरणा मिलने की बात कही है। लेकिन सिनेमा को केवल उसके नकारात्मक प्रभावों के आधार पर देखना उसके सामाजिक महत्व को बहुत छोटा कर देना होगा। जिस परदे से अपराध की नकल की जा सकती है, उसी परदे से संवेदना, समानता, न्याय और बदलाव की आकांक्षा भी पैदा हो सकती है। वास्तव में सिनेमा समाज का केवल प्रतिबिंब नहीं है, वह कई बार समाज के भीतर चल रही हलचल को दिशा देने वाला माध्यम भी बन जाता है। दर्शक जब किसी पात्र के दुख, संघर्ष या जीत से जुड़ता है तो वह कुछ देर के लिए केवल दर्शक नहीं रहता, उस कहानी का सहभागी बन जाता है। यही सिनेमा की सबसे बड़ी सामाजिक शक्ति है। महात्मा गांधी ने अपने जीवन पर ‘सत्यवादी हरिश्चंद्र’ के प्रभाव का उल्लेख किया था। राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा ने बाल गांधी के मन पर ऐसी छाप छोड़ी कि सत्य उनके जीवन का मूल मूल्य बन गया। यह उदाहरण बताता है कि सिनेमा या दृश्य माध्यमों की शक्ति केवल मनोरंजन में नहीं, संस्कार निर्माण में भी छिपी है। 
     बाद के वर्षों में ‘दो आंखें बारह हाथ’ ने अपराधी को केवल दंड देने के बजाय उसे सुधारने की संभावना सामने रखी। ‘जिस देश में गंगा बहती है’ ने डाकुओं के आत्मसमर्पण और पुनर्वास की कल्पना को लोकप्रिय विमर्श का हिस्सा बनाया। ‘आवारा’ ने जन्मजात अपराधी की धारणा पर सवाल खड़ा किया और यह विचार सामने रखा कि व्यक्ति के चरित्र को उसके सामाजिक और आर्थिक परिवेश से अलग करके नहीं समझा जा सकता। सिनेमा का यह समाज सुधारक रूप यहीं नहीं रुका। ‘अछूत कन्या’ ने जातिगत ऊंच-नीच के बीच प्रेम की कहानी के माध्यम से उस सामाजिक दीवार को चुनौती दी, जिसे सामान्य जीवन में छूना भी कठिन था। ‘दो बीघा जमीन’ ने किसान और गरीबी के प्रश्न को भावुकता से आगे ले जाकर सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के सवाल से जोड़ा। ‘मदर इंडिया’ ने भारतीय किसान, साहूकारी शोषण, स्त्री के संघर्ष और परिवार की नैतिकता को एक साथ परदे पर रखा। ‘सुजाता’ ने जातिगत भेदभाव के विरुद्ध संवेदना जगाई तो ‘बंदिनी’ ने स्त्री के जीवन और उसकी स्वतंत्रता को लेकर समाज की कठोरता पर सवाल उठाए। ‘प्रेम रोग’ ने विधवा विवाह जैसे विषय को मुख्यधारा के मनोरंजन का हिस्सा बनाया। ‘दामिनी’ ने यौन हिंसा के विरुद्ध एक स्त्री के संघर्ष को अदालत और परिवार के बीच स्थापित किया।
     बाद के दौर में सिनेमा ने सामाजिक सवालों को और अधिक प्रत्यक्ष रूप से उठाया। ‘तारे जमीन पर’ ने बच्चों की सीखने की अलग-अलग क्षमताओं को समझने की जरूरत बताई। ‘थ्री इडियट्स’ ने शिक्षा को केवल अंक, प्रतियोगिता और नौकरी की मशीन बनाने वाली व्यवस्था पर सवाल उठाया। ‘चक दे! इंडिया’ ने महिला खिलाड़ियों के संघर्ष के साथ क्षेत्रीय और धार्मिक पूर्वाग्रहों को चुनौती दी। ‘पिंक’ ने सहमति को स्त्री की गरिमा और स्वतंत्रता से जोड़ते हुए समाज की उस मानसिकता को कठघरे में खड़ा किया, जिसमें लड़की के कपड़े, दोस्ती, शराब या देर रात बाहर रहने को उसके चरित्र का प्रमाण मान लिया जाता है। ‘आर्टिकल 15’ ने जातिगत भेदभाव को पुलिस व्यवस्था और कानून के संदर्भ में देखने का आग्रह किया। ‘थप्पड़’ ने घरेलू हिंसा के उस सामान्यीकरण पर प्रहार किया जिसमें एक थप्पड़ को परिवार बचाने के नाम पर मामूली घटना मान लिया जाता है।
     इस परंपरा को 2026 की फिल्म ‘अस्सी’ एक अधिक असहज और कठोर धरातल पर आगे बढ़ाती है। अनुभव सिन्हा की यह फिल्म बलात्कार, पितृसत्ता, सामाजिक उदासीनता और न्याय व्यवस्था की कमजोरियों को एक साथ सामने रखती है। केंद्रीय पात्र परिमा एक शिक्षिका है, जो यौन हिंसा की शिकार होने के बाद केवल अपराधियों से नहीं लड़ती, बल्कि उस पूरी व्यवस्था से जूझती है जो बार-बार पीड़िता के व्यवहार, चरित्र और फैसलों पर सवाल उठाती है। फिल्म का प्रमाणन रिकॉर्ड भी इसकी मूल कथा को स्पष्ट करता है एक महिला अपराध से बचने के बाद ऐसी सामाजिक और कानूनी व्यवस्था का सामना करती है, जहां उसके साथ हुई हिंसा से अधिक उसके बारे में बने पूर्वाग्रह महत्व पाने लगते हैं। ‘अस्सी’ की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपराध को किसी अकेले खलनायक की मानसिक विकृति बनाकर समाप्त नहीं कर देती। वह पूछती है कि अपराधी पैदा कैसे होता है और उसे सामाजिक स्वीकृति कहां से मिलती है? परिवार की सोच, महिलाओं के प्रति नजरिया, पुलिस की कार्यप्रणाली, अदालत की प्रक्रिया, सबूतों की विश्वसनीयता और समाज की चुप्पी, इन सबको फिल्म एक ही प्रश्न से जोड़ती है। समीक्षकों ने भी इस बात को रेखांकित किया है कि फिल्म का निशाना केवल अपराधी नहीं, बल्कि वह सामाजिक और संस्थागत ढांचा है जो यौन हिंसा को संभव बनाता है और पीड़िता को ही कटघरे में खड़ा करता है। 
     यही वह बिंदु है जहां सिनेमा की समाज सुधारक भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। कानून किसी अपराध के बाद सजा दे सकता है, लेकिन वह मानसिकता को सीधे नहीं बदल सकता जो अपराध को जन्म देती है। कानून बलात्कार को अपराध घोषित कर सकता है, लेकिन यह नहीं सिखा सकता कि किसी लड़की के देर रात घर लौटने को उसके चरित्र से न जोड़ा जाए। अदालत फैसला दे सकती है, लेकिन समाज को यह समझना होगा कि न्याय पाने के लिए किसी पीड़िता को अपने चरित्र की परीक्षा नहीं देनी चाहिए। सिनेमा इन दोनों के बीच की खाली जगह भर सकता है। वह कानून की भाषा को मानवीय अनुभव में बदल देता है। ‘अस्सी’ का महत्व इसलिए भी है कि वह दर्शक को आसान सांत्वना नहीं देती। सामान्य व्यावसायिक सिनेमा में अंततः नायक आता है, अपराधी पराजित होता है और दर्शक राहत के साथ घर लौटता है। लेकिन सामाजिक सरोकार वाला सिनेमा कई बार इस सुविधा को छीन लेता है। ‘अस्सी’ यह सवाल छोड़ती है कि किसी एक मामले में न्याय मिल जाने से क्या उस मानसिकता का अंत हो जाएगा जिसने अपराध को जन्म दिया? फिल्म की यही बेचैनी उसे महज अदालत की कहानी से आगे ले जाती है। 
     हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है। किसी फिल्म को समाज सुधारक मान लेने का अर्थ यह नहीं कि उसके प्रभाव को स्वतः सकारात्मक मान लिया जाए। अच्छी मंशा और अच्छी फिल्म दो अलग बातें हैं। ‘फुले’ इसका उदाहरण है। ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले के जीवन और स्त्री शिक्षा तथा जातिगत भेदभाव के विरुद्ध उनके संघर्ष को परदे पर लाने का विषय अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण था, लेकिन समीक्षकों ने फिल्म की प्रस्तुति और कथानक की गति को लेकर अलग-अलग मत व्यक्त किए। इसका अर्थ यही है कि समाज सुधार का संदेश तभी दूर तक जाता है, जब वह उपदेश के बजाय प्रभावशाली कहानी और जीवंत पात्रों के माध्यम से दर्शक तक पहुंचे। 
     आज के दौर में दर्शक भी बदल चुका है। वह केवल यह नहीं पूछता कि फिल्म मनोरंजक है या नहीं; वह यह भी देखता है कि फिल्म उसके समय की कौन-सी बेचैनी को आवाज दे रही है। यही कारण है कि जाति, लैंगिक समानता, शिक्षा, दिव्यांगता, धार्मिक कट्टरता, किसान, बेरोजगारी और न्याय व्यवस्था जैसे विषय लगातार फिल्मों का हिस्सा बन रहे हैं। ‘सितारे जमीन पर’ ने बौद्धिक दिव्यांगता और समावेशन को केंद्र में रखकर यह सवाल उठाया कि सामान्य होने की हमारी परिभाषा आखिर किसने तय की है। सिनेमा समाज को बदलता है या समाज में पहले से चल रहे बदलाव को गति देता है, इस पर बहस जारी रह सकती है। संभवतः दोनों बातें सही हैं। कोई फिल्म अकेले कानून नहीं बदल सकती, अपराध समाप्त नहीं कर सकती और सामाजिक भेदभाव मिटा नहीं सकती। लेकिन वह उस बहस को जन्म दे सकती है जिसे समाज लंबे समय से टालता आया है। वह किसी बच्चे के मन में गांधी के सत्य की तरह कोई मूल्य बैठा सकती है, किसी अपराधी के सामने सुधार की संभावना रख सकती है, किसी किसान के दर्द को शहर के दर्शक तक पहुंचा सकती है और किसी महिला को यह एहसास दिला सकती है कि उसकी चुप्पी ही उसकी नियति नहीं है।
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एक सुर में सात रंग : इन गीतों में गूंजती है पूरी जिंदगी

   हिंदी फिल्म संगीत की सबसे बड़ी विशेषता है कि यहां गीत केवल शब्दों और सुरों का मेल नहीं होते, वे मनुष्य की भावनाओं का जीवंत दस्तावेज भी होते हैं। कुछ गीत भी हैं, जिनमें एक ही भाव प्रधान रहता है सिर्फ प्रेम, सिर्फ विरह या सिर्फ उत्सव। लेकिन, कुछ दुर्लभ रचनाएं ऐसी भी हैं, जिनमें भावनाओं की पूरी धारा बहती है। एक ही गीत में शिकायत है, अनुरोध है, समर्पण है, गुस्सा है, उम्मीद है, प्रतीक्षा है और साथ में प्रेम भी है। ऐसे गीत सुनते समय लगता है मानो किसी व्यक्ति के मन की पूरी यात्रा कुछ मिनटों में हमारे सामने खुल गई हो। हिंदी फिल्म संगीत के वे अमर गीत, जिनमें प्रेम के साथ शिकायत, प्रतीक्षा, आक्रोश और समर्पण भी बहता है। ऐसे गीत समय के साथ पुराने नहीं होते। वे हर पीढ़ी के श्रोताओं को अपने अनुभवों का आईना दिखाई देते हैं।
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- हेमंत पाल

    मनुष्य कभी एक भाव में नहीं जीता। उसके जेहन में प्रेम के साथ असुरक्षा का भाव होता है, विश्वास के साथ भय, प्रतीक्षा के साथ अधैर्य और समर्पण के साथ अधिकार-बोध भी। यही जीवन का स्वाभाविक मनोविज्ञान भी है। फिल्म के गीतकारों और संगीतकारों ने इसी जटिलता को पहचाना है। वे जानते हैं कि मनुष्य केवल हंसता या रोता नहीं, बल्कि एक ही क्षण में कई भावनाएं जीता है। इसलिए उनके गीत भी एक साथ कई रंगों से भर उठते हैं। यही बहुरंगी भाव हिंदी फिल्म संगीत की सबसे बड़ी शक्ति हैं। हिंदी सिनेमा में ऐसी अनेक गीत रचनाएं हैं, लेकिन इस परंपरा का सबसे सुंदर उदाहरण 1963 में प्रदर्शित फिल्म 'दिल एक मंदिर’ का गीत 'हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे' भी है। 1963 को रिलीज हुई इस फिल्म का यह गीत लता मंगेशकर की आवाज में अमर हो गया। गीतकार हसरत जयपुरी और संगीतकार शंकर-जयकिशन थे।
     पहली नजर में यह एक विरह गीत प्रतीत होता है, लेकिन ध्यान से सुनने पर महसूस होता है कि इसमें प्रेम के अनेक रंग एक-दूसरे में घुलते-बदलते रहते हैं। गीत की पंक्ति 'तुम कहते हो कि ऐसे प्यार को भूल जाओ' पूरे गीत का भाव-संसार रच देती है। जिसे जीवन का केंद्र बना लिया, वही उसे भुला देने की बात कह रहा है। इसलिए इसमें शिकायत है। लेकिन, शिकायत के भीतर भी प्रेम कम नहीं होता, बल्कि और गहरा हो जाता है। नायिका प्रतीक्षा करती है कि शायद प्रियतम अपने शब्द वापस ले ले। उसके भीतर आक्रोश भी है कि ऐसा कह कैसे दिया। लेकिन, उसी क्षण वह फिर प्रेम में पिघल जाती है। अंततः गीत समर्पण तक पहुंचता है, जहां प्रेम किसी अधिकार का नहीं, बल्कि त्याग का रूप ले लेता है। यही भाव-परिवर्तन इस गीत को साधारण प्रेमगीत से कहीं ऊपर उठा देता है। यह वास्तव में प्रेम की अनेक अवस्थाओं का संगीतबद्ध दस्तावेज है।
     हिंदी फिल्म संगीत में ऐसे गीतों की परंपरा बहुत समृद्ध रही है। 1957 में आयी गुरु दत्त की फिल्म ‘प्यासा’ का गीत 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है' इसका सशक्त उदाहरण है। पहली सुनवाई में यह व्यवस्था और समाज के विरुद्ध विद्रोह का गीत लगता है, लेकिन भीतर प्रेम की गहरी चोट छिपी है। नायक दुनिया से कम, अपने टूटे हुए सपनों से अधिक लड़ रहा है। उसमें क्रोध है कि समाज ने उसे नहीं समझा, निराशा है कि संवेदनाएं बाजार में बिक गईं, तिरस्कार है उस दुनिया के प्रति जिसने प्रेम को महत्व नहीं दिया और अंत में एक थका हुआ समर्पण भी है। यही कारण है कि यह गीत केवल सामाजिक विद्रोह नहीं, बल्कि टूटे हुए मनुष्य की आत्मकथा बन जाता है। इस फिल्म का दूसरा कालजयी गीत 'जाने वो कैसे लोग थे जिनके प्यार को प्यार मिला' भावनाओं की दूसरी दुनिया खोलता है। यहां नायक केवल अपनी असफल प्रेमकथा नहीं गा रहा, बल्कि अपने भाग्य पर भी व्यंग्य कर रहा है। वह समाज पर कटाक्ष करता है, स्वयं को भी दोष देता है और सच्चे प्रेम की उपेक्षा पर दुख व्यक्त करता है। आत्म ग्लानि और आत्मसम्मान का यह द्वंद्व गीत को असाधारण ऊंचाई देता है।
    1966 में आई फिल्म 'अनुपमा' का 'कुछ दिल ने कहा, कुछ भी नहीं' हिंदी सिनेमा में मौन की सबसे सुंदर अभिव्यक्तियों में गिना जाता है। इस गीत में शब्द कम हैं, लेकिन भावनाएं अत्यंत गहरी हैं। नायिका प्रेम करती है, पर उसे व्यक्त करने का साहस नहीं जुटा पाती। वह चाहती है कि सामने वाला बिना कहे सब समझ जाए। यहां संकोच, प्रेम, डर, उम्मीद और स्वीकार सभी एक साथ बहते हैं। यह गीत बताता है कि कई बार सबसे अधिक भावनाएं उन्हीं शब्दों में छिपी होती हैं जो कहे ही नहीं गए। यदि प्रेम और मृत्यु-बोध को एक साथ महसूस करना हो, तो 1964 की फिल्म 'वो कौन थी?' का 'लग जा गले कि फिर ये हसीं रात हो न हो' शायद हिंदी सिनेमा की सबसे अनुपम रचना है। इस गीत में प्रेम जितना गहरा है, उतना ही बिछड़ने का भय भी। नायिका वर्तमान को पूरी तरह जी लेना चाहती है, क्योंकि भविष्य अनिश्चित है। यहां प्रेम, विरह, क्षणभंगुरता, आशंका और उम्मीद एक साथ चलते हैं। यही भाव इसे कालातीत बनाते हैं।
      गुलज़ार की लेखनी में भी बहुरंगी भावों का अद्भुत संसार मिलता है। संजीव कुमार और शर्मिला टैगोर की 1975 की फिल्म 'मौसम' का 'दिल ढूँढता है फिर वही फुर्सत के रात दिन' केवल स्मृतियों का गीत नहीं है। इसमें बीते प्रेम की गरमी है, खोए हुए समय का पछतावा है, वर्तमान की उदासी है और उन दिनों को फिर से जी लेने की असंभव इच्छा भी। यही कारण है कि यह गीत सुनते हुए श्रोता कभी मुस्कुराता है तो कभी भीतर से भर आता है। 1983 में आई फिल्म 'मासूम' का 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी' भावनात्मक परिपक्वता का अद्भुत उदाहरण है। गुलजार का लिखा गीत कहता है कि शिकायत है लेकिन नाराजगी नहीं, पीड़ा है टूटन नहीं; सवाल हैं पर जीवन से रिश्ता भी बना हुआ है। शायद यही कारण है कि यह गीत हर उस व्यक्ति के मन में जगह बना लेता है जिसने जीवन से कभी कोई कठिन सवाल पूछा हो।
     राजेश खन्ना की 1972 में आई फिल्म 'अमर प्रेम' में भी ऐसे दो कालजयी गीत हैं। 'चिंगारी कोई भड़के' ऐसा गीत है, जो प्रेम की असफलता से शुरू होकर जीवन-दर्शन तक पहुंचता है। इसमें शिकायत भी है, पीड़ा भी, दर्शन भी और स्वीकार भी। वहीं 'कुछ तो लोग कहेंगे' केवल दिलासा नहीं देता, बल्कि समाज के दोहरे मानदंडों पर तीखा व्यंग्य भी करता है। नायक प्रेमिका को सांत्वना देता है, समाज का उपहास करता है और उसके साथ खड़े रहने का भरोसा भी दिलाता है। प्रेम, करुणा, व्यंग्य और विद्रोह का यह अनोखा मिश्रण ही इस गीत की पहचान है। 1982 की फिल्म 'निकाह' का 'दिल के अरमां  आंसुओं में बह गए' को केवल दर्द का गीत माना जाता है, जबकि उसके भीतर आत्मसम्मान भी उतनी ही मजबूती से मौजूद है। नायिका अपने टूटे सपनों पर रोती है, शिकायत करती है, लेकिन स्वयं को पूरी तरह बिखरने नहीं देती। यही संयम इस गीत को सामान्य विरहगीत से अलग बनाता है। 1982 में ही आई फिल्म 'अर्थ' का जगजीत सिंह की आवाज में अमर हुआ गीत 'तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो' आधुनिक संवेदनाओं का प्रतिनिधि है। यह केवल किसी के दुख पर सवाल नहीं उठाता, बल्कि मुस्कान के पीछे छुपे दर्द को पहचानने की कोशिश करता है। इसमें सहानुभूति है, करुणा है, सवाल है, हल्का-सा व्यंग्य भी है और गहरी मानवीय संवेदना भी। यही कारण है कि यह गीत आज भी उतना ही प्रासंगिक लगता है जितना चार दशक पहले था।
       भावनाओं के इस बहुरंगी ताने-बाने का एक और अद्भुत उदाहरण फिल्म गाइड (1965) का गीत 'मैया रे मैया रे, मोसे छल किए जाए' है। शैलेंद्र के लिखे इस गीत को लता मंगेशकर ने गाया और सचिन देव बर्मन ने संगीतबद्ध किया। परदे पर वहीदा रहमान ने इस गाने में भावनाओं का जो सैलाब दिखाया, वह संगीत में पहले से मौजूद था। इस गीत की शुरुआत एक चुलबुली शिकायत से होती है, जहाँ नायिका अपने प्रेमी की हरकतों पर मुस्कुरा रही है। लेकिन अंतरे तक आते-आते यह शिकायत एक गहरे डर और असुरक्षा में बदल जाती है। 'लाख मना करूँ, मानत नाहीं' में जहाँ एक तरफ प्यार की तड़प और समर्पण है, वहीं दूसरी तरफ समाज के बंधनों को तोड़ने की बेचैनी और एक अजीब सा गुस्सा भी है कि वह खुद को रोक क्यों नहीं पा रही। इस गाने में लोक संगीत की मिठास के पीछे छुपा हुआ आत्ममंथन, इंतजार और अनिश्चित भविष्य का खौफ साफ महसूस होता है।इस गाने में फुसफुसाहट का इस्तेमाल
      इस सिलसिले में फिल्म अनामिका (1973) के गीत 'बाँहों में चले आओ, हमसे सनम क्या परदा' को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे और आर. डी. बर्मन के संगीत से सजे इस गीत को लता मंगेशकर ने जिस अंदाज में गाया, वह गायकी का एक अलग ही स्कूल है। पहली नजर में यह एक बेहद रूमानी और चुलबुला गाना लगता है, लेकिन इसके पीछे छिपे शेड्स बहुत गहरे हैं। इसमें प्रेमिका का अपने प्रेमी के प्रति गहरा प्यार तो है ही, लेकिन साथ ही एक हल्की सी शिकायत भी है कि प्रेमी सब कुछ जानकर भी अनजान बना हुआ है। 'कभी-कभी कुछ तो कहो' वाली लाइन में एक तरफ तो शरारती गुस्सा है, तो दूसरी तरफ एक तड़प और इंतजार भी है कि कब सामने वाला अपनी चुप्पी तोड़ेगा। लता जी ने जिस तरह इस गाने में फुसफुसाहट का इस्तेमाल किया है, वह प्यार, मनुहार, शिकायत और अधिकार जताने के मिले-जुले शेड्स को एक साथ पटल पर रख देता है।
     सिलसिला (1981) का गीत 'ये कहाँ आ गए हम, यूँ ही साथ-साथ चलते' इस विधा का एक आधुनिक और बेहद जटिल उदाहरण पेश करता है। जावेद अख्तर की शायरी को शिव-हरि ने संगीत दिया और इसे लता मंगेशकर के साथ अमिताभ बच्चन की मखमली आवाज में रिकॉर्ड किया गया। यह गीत गद्य और पद्य का ऐसा अनूठा मिश्रण है जिसमें भावनाओं की कई परतें एक साथ खुलती हैं। अमिताभ बच्चन की नज्म में जहाँ एक तरफ पुरानी यादों का इंतजार और खोए हुए वक्त का दर्द है, वहीं लता जी की आवाज में 'तू बदरी छाई' कहते हुए प्यार की एक असीम शांति है। लेकिन, इस शांति के ठीक पीछे एक गहरा खौफ भी है कि यह साथ अस्थायी है। गीत में समाज के नियमों के प्रति एक मूक गुस्सा और अपनी किस्मत से गहरी शिकायत भी है कि वे साथ होकर भी एक नहीं हो सकते। प्यार, अपराधबोध, तड़प, शिकायत और समर्पण का ऐसा कोलाज हिंदी सिनेमा में विरला ही मिलता है।
    इन गीतों में जीवन के प्रति इतनी जीवंतता है कि छह-सात दशक पुराने गीत भी आज के श्रोता को उतने ही अपने लगते हैं। समय बदलता है, तकनीक बदलती है, संगीत की शैली बदलती है, लेकिन मनुष्य का मन नहीं बदलता। उसके भीतर प्रेम, शिकायत, उम्मीद, पीड़ा, आक्रोश और समर्पण आज भी उसी तरह जन्म लेते हैं, जैसे कभी लेते थे। इसलिए 'हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे' केवल एक लोकप्रिय गीत नहीं, बल्कि हिंदी फिल्म संगीत की उस महान परंपरा का स्वर्णिम प्रतिनिधि है, जिसमें एक गीत केवल धुन नहीं होता, बल्कि मनुष्य के पूरे भाव लोक का संगीत बन जाता है। यही वे रचनाएं हैं, जो सुनने के बाद ख़त्म नहीं होतीं, बल्कि लंबे समय तक हमारे अंतर्मन में गूंजती रहती हैं। अमर गीतों की यही तो सबसे बड़ी पहचान है।
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आस्था और तकनीक : खड़े हनुमान के सामने ठिठकी मशीनें

    उज्जैन के सती गेट पर सड़क चौड़ीकरण के लिए खड़े हनुमान की प्रतिमा हटाने की कोशिश ने सिर्फ आस्था का सवाल नहीं खड़ा किया, बल्कि यह भी पूछ लिया कि हम अपनी पुरानी स्थापत्य विरासत को कितना समझते हैं! 170 साल पुरानी खड़े हनुमान मंदिर की प्रतिमा इन दिनों केवल एक धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है। वह विकास और विरासत के बीच खड़े उस सवाल का प्रतीक बन गई, जिसका आसान जवाब किसी के पास नहीं है। मंदिर का बाहरी हिस्सा हट गया, लेकिन करीब 8 फीट ऊंची प्रतिमा वहीं खड़ी है। उसे हटाना है, लेकिन कैसे हटाया जाए, यह तय करना मुश्किल हो गया। सोशल मीडिया पर यह कहानी तेजी से फैली कि क्रेन और जेसीबी भी प्रतिमा को एक इंच नहीं हिला सकीं। दूसरी ओर प्रशासन का कहना है कि प्रतिमा को नुकसान पहुंचाने वाला कोई जबरन प्रयास किया ही नहीं गया। अब आईआईटी इंदौर के विशेषज्ञ जमीन और प्रतिमा के आधार की वैज्ञानिक जांच कर रहे हैं।
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- हेमंत पाल

    स घटना की कहानी दिलचस्प है। सवाल यह नहीं कि हनुमानजी की प्रतिमा हिली या नहीं। असल सवाल है कि सदियों पुरानी किसी संरचना को हम आज भी उतना ही जानते हैं, जितना उसके सामने खड़े होकर दावा करते हैं? आस्था कहती है, यह चमत्कार है। इंजीनियर कहता है पहले आधार देखिए। पुरातत्वविद कहता है इतिहास समझिए और प्रशासन के सामने सवाल है विकास भी हो और विरासत भी बचे, तो रास्ता क्या हो! मंदसौर के सम्राट यशोधर्मन पुरातत्व संग्रहालय के संस्थापक कैलाश चंद्र पांडे ने एक हजार से अधिक प्रतिमाओं के विस्थापन का अनुभव होने की बात कही है। उनका अनुभव इस मामले को एक अलग नजर से देखने के लिए मजबूर करता है। उनके अनुसार प्राचीन प्रतिमाओं को स्थापित करते समय केवल मूर्ति को जमीन पर नहीं रखा जाता था, बल्कि उसके आधार और भार को ध्यान में रखकर पूरी संरचना तैयार की जाती थी।
     उन्होंने मंदसौर के पशुपतिनाथ मंदिर के विकास के दौरान 12 फीट ऊंची सहस्रलिंग प्रतिमा को उसके आधार सहित दूसरी जगह स्थानांतरित करने का उदाहरण दिया है। ऐसी प्रक्रिया में पहले प्रतिमा के चारों तरफ खुदाई कर यह समझा जाता है कि उसका आधार कितना गहरा और किस तरह का है। उसके बाद भार को संभालने के लिए सहारा तैयार किया जाता है और प्रतिमा को धीरे-धीरे सरकाया जाता है। यह तरीका सुनने में पुराना लग सकता है, लेकिन इसमें एक बुनियादी इंजीनियरिंग सिद्धांत छिपा है कि पहले संरचना को समझो, फिर उसे हिलाओ। इसके उलट किसी भारी प्रतिमा पर सीधे मशीन का जोर लगाना हमेशा समाधान नहीं होता। प्रतिमा कितनी भारी है, उसका भार केंद्र कहां है, नीचे का आधार किस सामग्री का है, मिट्टी कितनी मजबूत है और प्रतिमा किस तरह जमीन से जुड़ी है इन सवालों के जवाब जाने बिना लगाया गया अतिरिक्त दबाव प्रतिमा को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए यदि आधुनिक मशीन के सामने कोई प्राचीन प्रतिमा नहीं हिलती तो पहला निष्कर्ष चमत्कार नहीं, बल्कि ये होना चाहिए कि संरचना हमारी अपेक्षा से अधिक जटिल है।
     विशेषज्ञ कैलाश चंद्र पांडे का यह कहना कि तमाम प्रयासों के बाद भी प्रतिमा के विस्थापन में परेशानी आए, तो इसे चमत्कार माना जा सकता है और कुछ बातें विज्ञान से परे होती हैं, आस्था की दुनिया में स्वाभाविक बात है। लेकिन, वैज्ञानिक दृष्टि से इसका दूसरा अर्थ भी है। विज्ञान किसी घटना को इसलिए अस्वीकार नहीं करता कि वह पहली नजर में असाधारण दिखाई देती है। वह उसका कारण खोजता है। अगर कारण अभी नहीं मिला, तो इसका अर्थ यह नहीं कि कारण है ही नहीं। इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि जांच अभी पूरी नहीं हुई। खड़े हनुमान की प्रतिमा के मामले में यही सबसे महत्वपूर्ण बात है। जब तक जमीन की जांच, आधार की संरचना, प्रतिमा की सामग्री, भार और उसके नीचे की स्थिति सामने नहीं आती, तब तक न इसे चमत्कार कहना उचित है और न किसी प्राचीन तकनीक का अंतिम प्रमाण। आईआईटी इंदौर के विशेषज्ञों की जांच इसलिए महत्वपूर्ण है। यह जांच केवल प्रतिमा को हटाने की तकनीक तय नहीं करेगी, बल्कि यह भी बता सकती है कि प्रतिमा को जिस तरह स्थापित किया गया, उसमें किस प्रकार की संरचनात्मक व्यवस्था रही होगी।
    इतिहास में इससे कहीं बड़े और कठिन विस्थापन हुए हैं। मिस्र में असवान बांध परियोजना के कारण अबू सिंबल के विशाल मंदिरों को 1960 के दशक में काटकर ऊंचे स्थान पर स्थानांतरित किया गया था। यह काम किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि विस्तृत अध्ययन, संरचना की समझ और अत्यंत सावधानी से किया गया। भारत में भी विकास परियोजनाओं के बीच धार्मिक और ऐतिहासिक संरचनाओं को स्थानांतरित करने के उदाहरण मिलते रहे हैं। वाराणसी में 2025 में बीएचयू के आसपास सड़क चौड़ीकरण के लिए एक पुराने मंदिर को स्थानीय सहमति के बाद दूसरी जगह स्थानांतरित किया गया। यानी प्रतिमाओं और मंदिरों का विस्थापन असंभव काम नहीं है। असल प्रश्न तरीका और सुरक्षा का है। उज्जैन में स्थिति इसलिए अलग है, क्योंकि यहां मामला केवल सड़क के बीच खड़े एक ढांचे का नहीं है। खड़े हनुमान से जुड़ी स्थानीय आस्था बहुत गहरी है और सिंहस्थ की तैयारियों के बीच विकास कार्यों की गति भी कम नहीं की जा सकती। ऐसे में प्रशासन के सामने जल्दबाजी का रास्ता सबसे खतरनाक रास्ता हो सकता है।
    हर शहर को सड़क चाहिए। हर बड़े धार्मिक आयोजन के लिए यातायात की बेहतर व्यवस्था चाहिए। उज्जैन को भी चाहिए। लेकिन, विकास का सबसे आसान तरीका हमेशा यह नहीं होता कि रास्ते में आने वाली पुरानी चीज को हटा दिया जाए। किसी शहर की पहचान केवल चौड़ी सड़कों, नए पुलों और चमकती इमारतों से नहीं बनती। उसकी पहचान उन स्मृतियों से भी बनती है जो पीढ़ियों से वहां मौजूद हैं। इसलिए खड़े हनुमान का प्रश्न केवल एक प्रतिमा का प्रश्न नहीं है। यह उस सोच की परीक्षा है जिसमें पुराना अक्सर विकास की पहली बाधा मान लिया जाता है। अगर वैज्ञानिक जांच बताती है कि प्रतिमा सुरक्षित रूप से स्थानांतरित की जा सकती है, तो विशेषज्ञों की निगरानी में ऐसा किया जा सकता है। लेकिन, यदि तकनीकी अध्ययन यह संकेत देता है कि प्रतिमा को हिलाने में उसकी संरचना को गंभीर खतरा है तो सड़क की योजना पर पुनर्विचार करना भी विकास विरोधी कदम नहीं होगा। यह जिम्मेदार विकास होगा।
     खड़े हनुमान की सबसे बड़ी खासियत शायद यही है कि उन्होंने फिलहाल सबको रोक दिया है। भक्तों को भी, प्रशासन को भी और मशीनों को भी। यह रुकना बुरा नहीं है। कभी-कभी विकास की रफ्तार में एक ठहराव वह देखने का मौका देता है, जिसे हम भागते हुए नहीं देख पाते। इस प्रतिमा को हटाना है या नहीं, यह फैसला भावनाओं के दबाव में नहीं होना चाहिए। इसे केवल सड़क की सुविधा के आधार पर भी नहीं किया जाना चाहिए। फैसला प्रमाण पर होना चाहिए प्रतिमा के आधार की जांच पर, जमीन की संरचना पर, उसके ऐतिहासिक महत्व पर और सुरक्षित विस्थापन की वास्तविक संभावना पर। आस्था को विज्ञान से लड़ाने की जरूरत नहीं है। दोनों की अपनी जगह है। आस्था श्रद्धा देती है, विज्ञान कारण खोजता है और इतिहास संदर्भ देता है। शायद खड़े हनुमान की प्रतिमा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि हर चीज जिसे हम चमत्कार कहते हैं, जरूरी नहीं कि वह विज्ञान के खिलाफ हो। और हर चीज जिसे विज्ञान समझा नहीं पाया, उसे तुरंत चमत्कार कह देना भी उचित नहीं। फिलहाल खड़े हनुमान वहीं खड़े हैं। सवाल यह नहीं कि उन्हें कौन हिलाएगा। सवाल यह है कि क्या हम उन्हें हिलाने से पहले उन्हें समझने की कोशिश करेंगे?
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Saturday, September 19, 2026

फिल्मों में आंचल : छोड़ दो आंचल जमाना क्या कहेगा

    भारतीय सिनेमा ने अपने सौ वर्ष से अधिक के सफर में अनेक शब्दों और वस्तुओं को भावनाओं का प्रतीक बनाया है। इनमें ‘आंचल’ सबसे आत्मीय, कोमल और बहुअर्थी प्रतीक है। साड़ी का एक सिरा भर होने के बावजूद हिंदी फिल्मों में आंचल कभी मां की ममता बन गया, कभी प्रेमिका की लाज, कभी पत्नी के समर्पण का संकेत और कभी घर-परिवार की प्रतिष्ठा का रूपक। वह कभी बच्चे के सिर पर छाया बनकर फैला तो कभी हवा में लहराकर प्रेम के आने की आहट देता दिखाई दिया। यही वजह है कि फिल्मी गीतों और दृश्यों में आंचल महज परिधान का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि भारतीय समाज के भावनात्मक संसार का एक दृश्य प्रतीक बन गया। आंचल प्रेम, लाज, ममता, समर्पण और स्मृति का ऐसा प्रतीक, जो हिंदी सिनेमा के सौ साल से अधिक लंबे सफर में बार-बार नए अर्थों के साथ लौटता रहा है। 
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- हेमंत पाल 

    भारतीय संस्कृति में आंचल का रिश्ता स्त्री के व्यक्तित्व से गहरे जुड़ा रहा है। सिर पर रखा आंचल सम्मान और संस्कार का संकेत है, बच्चे को ढकता आंचल ममता और सुरक्षा का प्रतीक है और प्रिय के हाथ में आकर ठहरता आंचल प्रेम और संकोच की भाषा बोलता है। सिनेमा ने इन अलग-अलग अर्थों को गीत, संगीत, अभिनय और कैमरे की गति के माध्यम से इस तरह इस्तेमाल किया कि कई बार बिना संवाद के भी दर्शक समझ जाता था कि आंचल इस दृश्य में क्या कह रहा है। हिंदी फिल्मों में आंचल को प्रेम और छेड़छाड़ के प्रतीक के रूप में सबसे लोकप्रिय बनाने वाले गीतों में 1957 की 'पेइंग गेस्ट' का 'छोड़ दो आंचल, जमाना क्या कहेगा' प्रमुख है। देव आनंद और नूतन पर फिल्माया गया यह गीत आंचल को प्रेमियों के बीच संवाद का माध्यम बना देता है। गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने इसमें प्रेम की शरारत के साथ सामाजिक संकोच को भी जगह दी। किशोर कुमार और आशा भोसले की आवाजों ने इस चंचलता को और जीवंत कर दिया।
     इस गीत की खूबसूरती यह है कि इसमें आंचल को खींचना केवल छेड़छाड़ नहीं है। वह उस समय के सामाजिक वातावरण में प्रेम के अनकहे स्वीकार और सार्वजनिक संकोच के बीच की दूरी का प्रतीक भी है। नायक आंचल के बहाने निकट आना चाहता है और नायिका ‘जमाना क्या कहेगा’ कहकर उस निकटता पर सामाजिक मर्यादा की सीमा खींचती है। यानी आंचल यहां प्रेम और समाज के बीच झूलती स्त्री की मन स्थिति का हिस्सा बन जाता है। इसी दौर में नायिका के आंचल का हवा में लहराना, उसका चेहरे पर आ जाना या किसी पेड़, दरवाजे अथवा नायक के हाथ में उलझ जाना हिंदी फिल्मों की दृश्य भाषा का हिस्सा बना। राज कपूर, देव आनंद और दिलीप कुमार के दौर में आंचल की गति स्वयं एक तरह का संवाद बन गई थी। कैमरा जब उड़ते हुए आंचल का पीछा करता था, तो वह केवल सौंदर्य नहीं दिखाता था; उसके साथ नायिका की झिझक, आकर्षण और मन की हलचल भी पर्दे पर आती थी।
     हिंदी सिनेमा में आंचल का सबसे गहरा और स्थायी अर्थ प्रेमिका से अधिक मां के साथ जुड़ा है। मां का आंचल भारतीय मानस में उस जगह का नाम है जहां बच्चा दुनिया की हर चिंता से मुक्त हो सकता है। इसी भाव को सिनेमा ने बार-बार दोहराया। बच्चा चाहे कितना बड़ा हो जाए, असफलता, बीमारी, भय या अकेलेपन की स्थिति में उसकी स्मृति अक्सर मां के आंचल की छांव तक लौटती है। 1970 में बनी 'मां का आंचल' तो अपने शीर्षक में ही इस प्रतीक को केंद्र में ले आती है। फिल्म के संगीतकार मदन मोहन और गीतकार कैफी आजमी ने मां के आंचल को सीधे ईश्वर की करुणा और सुरक्षा से जोड़ा। 'मां का आंचल लाडले, दामन है भगवान का’' जैसे गीत में आंचल केवल मां के वस्त्र का सिरा नहीं रह जाता, बल्कि वह ईश्वर के दामन का मानवीय रूप बन जाता है। इसी फिल्म का 'मां है मोहब्बत का नाम, मां को हजारों सलाम' मातृत्व को प्रेम की सर्वोच्च अभिव्यक्ति के रूप में स्थापित करता है। मां के आंचल की यही छवि मदर इंडिया, दीवार, अमर अकबर एंथनी, करण-अर्जुन और अनेक पारिवारिक फिल्मों में अलग-अलग रूपों में दिखाई देती रही। कभी मां बच्चे के आंसू अपने आंचल से पोंछती है, कभी उसे धूप से बचाती है और कभी उसके माथे पर हाथ रखकर उसे भरोसा देती है। इन दृश्यों में आंचल दिखाई दे या न दिखाई दे, उसका भाव उपस्थित रहता है।
    हिंदी सिनेमा में आंचल की शक्ति को समझने के लिए 'दीवार' का प्रसिद्ध संवाद ‘मेरे पास मां है’ पर्याप्त है। यहां आंचल शब्द नहीं आता, लेकिन उसका पूरा भाव मौजूद है। एक तरफ पैसा, बंगला और संपत्ति है, दूसरी तरफ मां। संवाद यह स्थापित करता है कि जीवन की कुछ संपदाएं ऐसी हैं जिन्हें धन से खरीदा नहीं जा सकता। मां का आंचल उन्हीं में से एक है। यही कारण है कि हिंदी फिल्मों की मां केवल भावुक चरित्र नहीं रही। वह परिवार की नैतिक धुरी भी बनी। जब नायक अपराध, लालच या भटकाव की ओर जाता है, तो मां का आंचल उसे उसके संस्कारों की याद दिलाता है। इस अर्थ में आंचल घर, क्षमा, त्याग और नैतिक सुरक्षा का प्रतीक बन जाता है। वह मां के हाथों का विस्तार है, वही हाथ जो बच्चे को थपकी देता है और जरूरत पड़ने पर उसके लिए ढाल बन जाता है।
    मां के आंचल के विपरीत नायिका का आंचल हिंदी सिनेमा में प्रेम, सौंदर्य, लाज और आकर्षण की भाषा रहा। पुराने दौर की फिल्मों में नायिका का चेहरा आंचल के पीछे छिप जाना उसके संकोच को व्यक्त करता था। वही आंचल हवा में उड़ता तो वह स्वतंत्रता और आकर्षण का संकेत बन जाता। कभी नायक उसे पकड़ता था, कभी वह नायक के कपड़ों में उलझ जाता था और कभी वह दूर जाती नायिका और पीछे खड़े नायक के बीच एक अदृश्य संबंध की तरह लहराता था। 'जिस पथ पे चला, उस पथ पे मुझे आंचल तो बिछाने दे' जैसे गीतों में आंचल प्रेम के समर्पण का प्रतीक बन जाता है। यहां स्त्री अपने प्रिय के जीवन-पथ पर स्वयं को समर्पित करने की पारंपरिक छवि के साथ सामने आती है। ऐसे गीत उस दौर की प्रेम-कल्पना को भी व्यक्त करते हैं, जिसमें प्रेम केवल आकर्षण नहीं बल्कि साथ निभाने, त्याग और समर्पण का वचन माना जाता था। फिल्मी गीतों में आंचल के साथ हवा का संबंध भी बेहद महत्वपूर्ण रहा है। हवा में लहराता आंचल मानो भीतर उठती भावनाओं को दृश्य रूप देता था। नायिका कुछ नहीं कहती, लेकिन उसका आंचल कह देता था कि उसके मन में कोई हलचल है। इसीलिए पुराने हिंदी सिनेमा में आंचल कैमरे की भाषा का भी हिस्सा था।
‘आंचल’ जब फिल्म का नाम बना
     दिलचस्प बात यह है कि आंचल केवल गीतों और दृश्यों में नहीं रहा, बल्कि फिल्मों के शीर्षक तक पहुंचा। 1960 में वसंत जोगलेकर के निर्देशन में बनी 'आंचल' में अशोक कुमार, निरूपा राय और नंदा प्रमुख भूमिकाओं में थे और संगीत सी. रामचंद्र का था। फिल्म के गीतों में पारिवारिक संबंधों और भावनाओं की छवियां दिखाई देती हैं। दो दशक बाद 1980 में अनिल गांगुली की 'आंचल' आई, जिसमें राजेश खन्ना, राखी, रेखा और अमोल पालेकर प्रमुख भूमिकाओं में थे। फिल्म का कथानक परिवार, रिश्तों, संदेह और सामाजिक दृष्टि के इर्द-गिर्द घूमता है। इस फिल्म में ‘आंचल’ स्त्री की मर्यादा और पारिवारिक संबंधों के रूपक के रूप में सामने आता है। यह संयोग नहीं है कि ‘आंचल’ जैसे शब्द को बार-बार पारिवारिक फिल्मों के शीर्षक में जगह मिली। भारतीय समाज में आंचल स्त्री के निजी जीवन और परिवार की सार्वजनिक प्रतिष्ठा के बीच एक पुल की तरह देखा जाता रहा है। इसलिए आंचल पर उठने वाला सवाल अक्सर पूरे परिवार की प्रतिष्ठा का सवाल बन जाता था।
     आंचल का अर्थ केवल स्त्री, मां या प्रेमिका तक सीमित नहीं है। साहित्य और सिनेमा में यह शब्द भूगोल और लोकजीवन का प्रतीक भी बन जाता है। ‘भारत माता के आंचल’ जैसे प्रयोगों में धरती मां है और उसका आंचल पूरा देश। इसी तरह ‘मैला आंचल’ में आंचल किसी स्त्री के परिधान से आगे बढ़कर पूरे ग्रामीण समाज, उसकी गरीबी, पीड़ा, लोक संस्कृति और संघर्ष का प्रतीक बन जाता है। यहां आंचल का अर्थ और व्यापक हो जाता है। वह मां की गोद से निकलकर खेत, गांव, नदी, मिट्टी और पूरे जनजीवन तक पहुंच जाता है। यही हिंदी सिनेमा और साहित्य की विशेषता है कि एक छोटा-सा शब्द धीरे-धीरे निजी भावना से सामाजिक रूपक में बदल जाता है।
     इक्कीसवीं सदी में सिनेमा की भाषा बदल गई। नायिका की पोशाक बदली, प्रेम व्यक्त करने के तरीके बदले और मां-बेटे के रिश्ते को दिखाने की शैली भी बदली। स्क्रीन पर साड़ी का आंचल पहले की तरह हर रोमांटिक दृश्य में दिखाई नहीं देता। फिर भी उसका भाव समाप्त नहीं हुआ। अब आंचल कई बार दिखाई देने वाली वस्तु के बजाय एक अदृश्य भाव है। मां के लिए वह सुरक्षा है, प्रेम में वह अपनापन है और स्मृति में वह बचपन का संसार। 'तारे जमीन पर' जैसे सिनेमा में मां से जुड़ा भाव हमें उसी अदृश्य आंचल की याद दिलाता है, जिसकी तलाश डर और अकेलेपन के क्षणों में बच्चा करता है। दरअसल, समय के साथ आंचल का दृश्य रूप कम हुआ है, लेकिन उसका प्रतीकात्मक अर्थ अधिक व्यापक हुआ है। अब वह केवल स्त्री की लाज या मां की ममता तक सीमित नहीं, बल्कि सुरक्षा, पहचान, स्मृति और भावनात्मक आश्रय का रूपक बन सकता है।
     हिंदी फिल्मों में आंचल की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उसने एक साधारण वस्त्र को असाधारण भावनात्मक अर्थ दे दिया। 'पेइंग गेस्ट' का ‘छोड़ दो आंचल’ प्रेम की शरारत और सामाजिक संकोच के बीच खड़ा है। 'मां का आंचल' में वही आंचल ईश्वर के दामन के समान पवित्र हो जाता है। 'दीवार' में वह बिना बोले मां की नैतिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है और 'आंचल' जैसी फिल्मों में परिवार और स्त्री की मर्यादा का रूपक बन जाता है। आंचल के दो सबसे मजबूत रूप माँ और नायिका दरअसल भारतीय भावलोक के दो अलग छोर हैं। मां का आंचल जीवन में वापस लौटने की जगह है, जबकि नायिका का आंचल जीवन में किसी नए व्यक्ति के प्रवेश की आहट। एक में सुरक्षा है, दूसरे में आकर्षण; एक में स्मृति है, दूसरे में संभावना; एक में बचपन है, दूसरे में प्रेम और भविष्य।
    यही कारण है कि हिंदी सिनेमा के सौ साल से अधिक के इतिहास में आंचल बार-बार लौटता रहा है। कभी वह मां की गोद में बच्चे को ढकता है, कभी प्रेमिका के चेहरे पर लाज बनकर उतरता है, कभी हवा में उड़कर प्रेम की घोषणा करता है और कभी पूरे गांव, समाज या देश की पहचान बन जाता है। सिनेमा ने आंचल को केवल देखा नहीं, उसे महसूस किया है। शायद इसीलिए पुराने गीतों में जब आंचल का जिक्र आता है तो दर्शक केवल एक कपड़े की कल्पना नहीं करता उसके सामने मां की छांव, प्रेमिका की झिझक, बचपन की स्मृति और रिश्तों की गर्माहट एक साथ उभर आती है। भारतीय सिनेमा में आंचल की यही सबसे बड़ी ताकत है वह दिखाई देने वाली चीज होकर भी दिखाई देने वाले संसार से बहुत आगे चला जाता है। उसमें प्रेम है, लाज है, ममता है, त्याग है, स्मृति है और आश्रय भी। यही वजह है कि बदलते फैशन और बदलती फिल्मी भाषा के बावजूद आंचल का भाव आज भी पुराना नहीं पड़ा। वह भारतीय सिनेमा के भावलोक में अब भी उतना ही मुलायम, आत्मीय और जीवित प्रतीक है, जितना परदे पर पहली बार लहराया था।
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विज्ञापन का विवाद : जब प्रचार का पैंतरा उल्टा पड़ा

     त्योहार भारतीय समाज में सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भावनाओं, परंपराओं और सामूहिक स्मृतियों से जुड़े अवसर होते हैं। इसलिए कंपनियां भी दीपावली, होली, रक्षाबंधन, करवा चौथ, ईद और दूसरे त्योहारों को अपने उत्पादों के प्रचार का बड़ा माध्यम मानती हैं। त्योहारों के दौरान जारी विज्ञापन सामान्य दिनों की तुलना में कहीं ज्यादा लोगों तक पहुंचते हैं और यदि उनमें भावनात्मक जुड़ाव पैदा हो जाए तो ब्रांड की पहचान मजबूत हो सकती है। लेकिन, यही कोशिश कभी-कभी उल्टी भी पड़ जाती है। रचनात्मकता, आधुनिकता या सामाजिक संदेश देने की कोशिश में जब विज्ञापन दर्शकों की धार्मिक, सांस्कृतिक या सामाजिक संवेदनशीलता से टकराता है, तो उत्पाद चर्चा में आने के बजाय विवाद का केंद्र बन जाता है। हाल में अभिनेत्री कृति सेनन को लेकर रक्षाबंधन के विज्ञापन का विवाद इसका ताजा उदाहरण है। आभूषण ब्रांड के इस विज्ञापन में कृति के पहनावे को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी आपत्ति जताई गई और आखिरकार ब्रांड ने विज्ञापन वापस ले लिया। ब्रांड ने कहा कि भारतीय संस्कृति, परंपराओं और त्योहारों के प्रति सम्मान के कारण उसने इसे हटाने का फैसला किया।
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- हेमंत पाल

     कृति सेनन वाले विज्ञापन में आपत्ति का मुख्य आधार यह था कि रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक त्योहार के प्रसंग में उनका परिधान एक वर्ग को जरूरत से ज्यादा आधुनिक और अनुपयुक्त लगा। विज्ञापन में उन्होंने ब्रालेट शैली का ब्लाउज, केप और ड्रेप्ड स्कर्ट पहना था। आलोचकों का कहना था कि भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक अवसर को इस तरह के पहनावे के साथ प्रस्तुत करना भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ के अनुकूल नहीं है। कृति ने अपने पहनावे का बचाव करते हुए सवाल उठाया कि आखिर महिलाओं के कपड़ों पर टिप्पणी करना कब बंद होगा। इस विवाद ने एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा किया कि किसी विज्ञापन में अभिनेत्री की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्योहार की सांस्कृतिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
     हालांकि, यह पहला अवसर नहीं है जब किसी विज्ञापन को जनता की आपत्ति के बाद वापस लेना पड़ा हो। भारतीय विज्ञापन जगत में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं। वर्ष 2021 में 'फैब इंडिया' का दीपावली अभियान ‘जश्न-ए-रिवाज’ इसी तरह विवाद में आया था। विज्ञापन में पारंपरिक भारतीय परिधानों में मॉडल्स को दिखाया गया था और अभियान को भारतीय संस्कृति से जोड़कर प्रस्तुत किया गया था। लेकिन, कुछ राजनीतिक नेताओं और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने 'अभियान' के नाम और प्रस्तुति पर आपत्ति जताई। आलोचना यह थी कि दीपावली जैसे हिंदू त्योहार के प्रचार में ‘जश्न-ए-रिवाज’ जैसे उर्दू शब्द का इस्तेमाल क्यों किया गया और मॉडल्स को पारंपरिक हिंदू परिधान में क्यों नहीं दिखाया गया। विरोध बढ़ने के बाद फैब इंडिया ने विज्ञापन वापस ले लिया।
    इसी तरह 2020 में तनिष्क का ‘एकत्वम’ अभियान भी देशभर में बहस का विषय बना था। विज्ञापन में एक हिंदू महिला की गोद भराई की रस्म को उसके मुस्लिम ससुराल वाले आयोजित करते हुए दिखाए गए थे। कंपनी का उद्देश्य अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों के मेल को दिखाना था, लेकिन एक वर्ग ने इसे ‘लव जिहाद’ को बढ़ावा देने वाला विज्ञापन बताया। सोशल मीडिया पर बहिष्कार की मुहिम चली और कर्मचारियों तथा साझेदारों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए कंपनी ने विज्ञापन वापस ले लिया। यहां दिलचस्प बात यह है कि जिस विज्ञापन को एक वर्ग ने सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश माना, उसी विज्ञापन को दूसरे वर्ग ने धार्मिक-सामाजिक मुद्दे के रूप में देखा।
    विज्ञापन के जरिए सामाजिक संदेश देने की कोशिश का एक और विवाद डाबर के ‘फेम’ अभियान को लेकर हुआ। 2021 में करवा चौथ के अवसर पर जारी विज्ञापन में एक समलैंगिक महिला जोड़े को इस त्योहार की रस्म निभाते हुए दिखाया गया था। विज्ञापन में एक महिला दूसरी महिला के चेहरे पर उत्पाद लगा रही थी और दोनों करवा चौथ मनाने की तैयारी करती दिखाई गई थीं। इसका उद्देश्य समावेशिता और बदलते सामाजिक रिश्तों को सामने रखना था, लेकिन कुछ लोगों ने इसे हिंदू त्योहार की परंपरागत मान्यता के विपरीत बताया। तत्कालीन मध्य प्रदेश के गृह मंत्री ने विज्ञापन पर आपत्ति जताते हुए कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी। इसके बाद डाबर ने विज्ञापन वापस लिया और लोगों की भावनाएं आहत होने के लिए बिना शर्त माफी मांगी।
     'मंगल सूत्र' को लेकर सब्यसाची के विज्ञापन का मामला भी इसी श्रेणी में आता है। 2021 में मशहूर डिजाइनर सब्यसाची मुखर्जी के मंगलसूत्र अभियान में एक महिला को कम गले वाले परिधान में पुरुष मॉडल के साथ अंतरंग मुद्रा में दिखाया गया था। कुछ लोगों ने इसे मंगल सूत्र जैसे पारंपरिक और वैवाहिक प्रतीक का आपत्तिजनक चित्रण बताया। सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना हुई और कुछ राजनीतिक नेताओं ने भी इसे लेकर सवाल उठाए। एक प्रदेश के तत्कालीन गृह मंत्री ने इस विज्ञापन हटाने के लिए 24 घंटे का अल्टीमेटम तक दिया। इसके बाद सब्यसाची ने अभियान वापस लेते हुए कहा कि उन्हें समाज के एक वर्ग के आहत होने पर गहरा दुख है।
    विज्ञापनों में सिर्फ धर्म और संस्कृति ही विवाद का कारण नहीं बने। 2022 का लेयर’आर शॉट बॉडी स्प्रे विज्ञापन इसका सबसे चर्चित उदाहरण है। दो विज्ञापनों में ऐसे दृश्य और संवाद थे, जिनका अर्थ महिलाओं के प्रति यौन हिंसा और बलात्कार जैसी गंभीर सामाजिक समस्या से जोड़कर देखा गया। एक विज्ञापन में चार पुरुष एक महिला के पीछे खड़े दिखाई देते हैं और संवाद इस तरह बनाया गया था कि पहली नजर में वह यौन हिंसा की ओर संकेत करता हुआ लगता था। बाद में उत्पाद की बोतल को लेकर स्थिति स्पष्ट होती थी। लेकिन, तब तक विज्ञापन की भाषा और प्रस्तुति को लेकर भारी विरोध शुरू हो चुका था। विज्ञापन को बलात्कार की संस्कृति को सामान्य बनाने वाला बताया गया। विज्ञापन मानक परिषद, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और दिल्ली महिला आयोग की आपत्तियों के बाद इसे सभी प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। कंपनी ने माफी भी मांगी।
     2017 में जोमैटो का एक बाहरी विज्ञापन भी इसी तरह विवाद में आया था। कंपनी ने ‘एमसी’ और ‘बीसी’ जैसे संक्षिप्त शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उन्हें ‘मैकरोनी एंड चीज’ और ‘बटर चिकन’ के अर्थ में पेश किया। कंपनी के लिए यह शब्दों का मजाकिया खेल था, लेकिन भारतीय संदर्भ में वही संक्षिप्त अक्षर बेहद आपत्तिजनक और अश्लील गालियों के रूप में पहचाने जाते हैं। सोशल मीडिया पर इसे सस्ता, अश्लील और महिलाओं के प्रति अपमानजनक बताया गया। सार्वजनिक विरोध के बाद कंपनी ने उस विज्ञापन को वापस लेने का फैसला किया। 2015 में कल्याण ज्वेलर्स का ऐश्वर्या राय बच्चन वाला विज्ञापन भी विज्ञापन इतिहास के विवादित अभियानों में गिना जाता है। विज्ञापन में ऐश्वर्या को शाही अंदाज में आभूषण पहने दिखाया गया था और उनके ऊपर छाता पकड़े एक गहरे रंग के बच्चे को दिखाया गया था। नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे नस्लवादी और बाल मजदूरी या गुलामी की छवि को बढ़ावा देने वाला बताया। आलोचना इतनी तेज हुई कि कंपनी ने विज्ञापन वापस लेने का फैसला किया। ऐश्वर्या ने भी कहा था कि विज्ञापन की अंतिम तस्वीर में बदलाव उनकी जानकारी के बिना किया गया था।
    इन उदाहरणों को देखने से स्पष्ट होता है, कि विवादित विज्ञापन हमेशा एक जैसे नहीं होते। कभी समस्या धार्मिक प्रतीकों के चित्रण से पैदा होती है, कभी पहनावे से, कभी सामाजिक रिश्तों की प्रस्तुति से और कभी ऐसी भाषा से जिसे रचनात्मकता के नाम पर इस्तेमाल किया जाता है। कई बार विज्ञापन बनाने वाली एजेंसी का उद्देश्य विवाद पैदा करना नहीं होता। लेकिन, वह यह अनुमान लगाने में चूक जाती है कि अलग-अलग सामाजिक समूह किसी दृश्य या संवाद को किस तरह ग्रहण करेंगे। आज सोशल मीडिया ने इस जोखिम को कई गुना बढ़ा दिया है। पहले किसी विज्ञापन को लेकर प्रतिक्रिया स्थानीय स्तर पर सीमित रह सकती थी, लेकिन अब कुछ घंटों में कोई अभियान देशव्यापी बहस का विषय बन सकता है। 
     यह भी ध्यान देने योग्य है कि हर विवादित विज्ञापन वास्तव में आपत्तिजनक हो, ऐसा जरूरी नहीं। सर्फ एक्सेल के 2019 के होली विज्ञापन में एक हिंदू लड़की को मुस्लिम दोस्त को होली के रंगों से बचाकर मस्जिद तक पहुंचाते दिखाया गया था। विज्ञापन का उद्देश्य सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश देना था, लेकिन इसके खिलाफ बहिष्कार की मुहिम चली और इसे एक वर्ग ने हिंदू त्योहार और मुस्लिम धार्मिक अनुष्ठान के बीच असंतुलित प्रस्तुति के रूप में देखा। दूसरी ओर बहुत से लोगों ने इसे एकता और भाईचारे का खूबसूरत संदेश माना। यह विज्ञापन वापस नहीं लिया गया, लेकिन यह उदाहरण बताता है कि विज्ञापन में संदेश की मंशा और दर्शक की व्याख्या दो अलग-अलग चीजें हो सकती हैं।
    किसी भी विज्ञापन की सफलता सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि लोग उसे कितनी बार देख रहे हैं। असली सफलता तब है, जब उपभोक्ता विज्ञापन को सकारात्मक भाव से याद रखे और उसी भाव को उत्पाद से जोड़े। यदि विज्ञापन उत्पाद से ज्यादा विवाद को यादगार बना दे, तो प्रचार की पूरी रणनीति कमजोर पड़ सकती है। ब्रांड को कुछ समय के लिए जबरदस्त चर्चा तो मिल जाती है, लेकिन उसके साथ नकारात्मक छवि भी जुड़ सकती है। त्योहारों से जुड़े विज्ञापनों में यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। रचनात्मक स्वतंत्रता जरूरी है, आधुनिक समाज की बदलती तस्वीर को विज्ञापनों में जगह मिलनी चाहिए और महिलाओं, विभिन्न समुदायों तथा बदलते रिश्तों का प्रतिनिधित्व भी होना चाहिए। लेकिन, इसके साथ यह समझना भी जरूरी है कि भारत जैसे विविध समाज में धार्मिक प्रतीक, पारंपरिक परिधान और त्योहारों की अपनी गहरी भावनात्मक पृष्ठभूमि है। विज्ञापन बनाने वालों को इस संवेदनशीलता को कमजोरी नहीं, बल्कि रचनात्मक चुनौती के रूप में देखना चाहिए।
    कृति सेनन के विज्ञापन से लेकर तनिष्क, फैब इंडिया, डाबर, सब्यसाची, लेयर’आर शॉट, जोमैटो और कल्याण ज्वेलर्स तक के उदाहरण एक ही सबक देते हैं कि विज्ञापन में चौंकाना आसान है, लेकिन सम्मान बनाए रखते हुए यादगार बनना कठिन। आज के दौर में किसी ब्रांड के पास विज्ञापन जारी करने से पहले केवल रचनात्मक टीम की राय पर्याप्त नहीं है। उसे अलग-अलग सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से अपने अभियान को परखना भी जरूरी है। क्योंकि, जिस विज्ञापन को बनाने में महीनों की मेहनत लगती है, उसे जनता की नाराजगी के बाद हटाने में कभी-कभी केवल कुछ घंटे लगते हैं। तब उत्पाद की बिक्री से ज्यादा चर्चा इस बात की होती है कि आखिर विज्ञापन बनाने वालों ने यह सोचा क्यों नहीं कि उनकी रचनात्मकता किस सीमा तक स्वीकार की जाएगी।
चर्चा चाहिए थी, खड़ा हुआ विवाद!
    त्योहारों के मौके पर विज्ञापन बनाना ब्रांडों के लिए बड़ा अवसर होता है, लेकिन जरा-सी चूक पूरा अभियान भारी पड़ सकता है। तनिष्क के विज्ञापन में हिंदू परिवार में मुस्लिम बहू की गोद भराई दिखाना सांप्रदायिक बहस का कारण बना और विज्ञापन हटाना पड़ा। डाबर के करवा चौथ वाले विज्ञापन में समलैंगिक महिला जोड़े को त्योहार मनाते दिखाया गया, जिस पर धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप लगे। फैब इंडिया के ‘जश्न-ए-रिवाज’ अभियान पर दीपावली की सांस्कृतिक पहचान को लेकर सवाल उठे। सब्यसाची के मंगलसूत्र विज्ञापन में अंतरंग दृश्य को लेकर आपत्ति हुई। यानी विज्ञापन की दुनिया में विवाद कभी भाषा से, कभी पहनावे से और कभी सामाजिक संदेश से पैदा होता है। खास बात यह है कि आज सोशल मीडिया के दौर में विज्ञापन हटाने का फैसला भी उतनी ही तेजी से होता है, जितनी तेजी से विवाद फैलता है।
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