भारतीय सिनेमा ने अपने सौ वर्ष से अधिक के सफर में अनेक शब्दों और वस्तुओं को भावनाओं का प्रतीक बनाया है। इनमें ‘आंचल’ सबसे आत्मीय, कोमल और बहुअर्थी प्रतीक है। साड़ी का एक सिरा भर होने के बावजूद हिंदी फिल्मों में आंचल कभी मां की ममता बन गया, कभी प्रेमिका की लाज, कभी पत्नी के समर्पण का संकेत और कभी घर-परिवार की प्रतिष्ठा का रूपक। वह कभी बच्चे के सिर पर छाया बनकर फैला तो कभी हवा में लहराकर प्रेम के आने की आहट देता दिखाई दिया। यही वजह है कि फिल्मी गीतों और दृश्यों में आंचल महज परिधान का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि भारतीय समाज के भावनात्मक संसार का एक दृश्य प्रतीक बन गया। आंचल प्रेम, लाज, ममता, समर्पण और स्मृति का ऐसा प्रतीक, जो हिंदी सिनेमा के सौ साल से अधिक लंबे सफर में बार-बार नए अर्थों के साथ लौटता रहा है।
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- हेमंत पाल
भारतीय संस्कृति में आंचल का रिश्ता स्त्री के व्यक्तित्व से गहरे जुड़ा रहा है। सिर पर रखा आंचल सम्मान और संस्कार का संकेत है, बच्चे को ढकता आंचल ममता और सुरक्षा का प्रतीक है और प्रिय के हाथ में आकर ठहरता आंचल प्रेम और संकोच की भाषा बोलता है। सिनेमा ने इन अलग-अलग अर्थों को गीत, संगीत, अभिनय और कैमरे की गति के माध्यम से इस तरह इस्तेमाल किया कि कई बार बिना संवाद के भी दर्शक समझ जाता था कि आंचल इस दृश्य में क्या कह रहा है। हिंदी फिल्मों में आंचल को प्रेम और छेड़छाड़ के प्रतीक के रूप में सबसे लोकप्रिय बनाने वाले गीतों में 1957 की 'पेइंग गेस्ट' का 'छोड़ दो आंचल, जमाना क्या कहेगा' प्रमुख है। देव आनंद और नूतन पर फिल्माया गया यह गीत आंचल को प्रेमियों के बीच संवाद का माध्यम बना देता है। गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी ने इसमें प्रेम की शरारत के साथ सामाजिक संकोच को भी जगह दी। किशोर कुमार और आशा भोसले की आवाजों ने इस चंचलता को और जीवंत कर दिया।
इस गीत की खूबसूरती यह है कि इसमें आंचल को खींचना केवल छेड़छाड़ नहीं है। वह उस समय के सामाजिक वातावरण में प्रेम के अनकहे स्वीकार और सार्वजनिक संकोच के बीच की दूरी का प्रतीक भी है। नायक आंचल के बहाने निकट आना चाहता है और नायिका ‘जमाना क्या कहेगा’ कहकर उस निकटता पर सामाजिक मर्यादा की सीमा खींचती है। यानी आंचल यहां प्रेम और समाज के बीच झूलती स्त्री की मन स्थिति का हिस्सा बन जाता है। इसी दौर में नायिका के आंचल का हवा में लहराना, उसका चेहरे पर आ जाना या किसी पेड़, दरवाजे अथवा नायक के हाथ में उलझ जाना हिंदी फिल्मों की दृश्य भाषा का हिस्सा बना। राज कपूर, देव आनंद और दिलीप कुमार के दौर में आंचल की गति स्वयं एक तरह का संवाद बन गई थी। कैमरा जब उड़ते हुए आंचल का पीछा करता था, तो वह केवल सौंदर्य नहीं दिखाता था; उसके साथ नायिका की झिझक, आकर्षण और मन की हलचल भी पर्दे पर आती थी।
हिंदी सिनेमा में आंचल का सबसे गहरा और स्थायी अर्थ प्रेमिका से अधिक मां के साथ जुड़ा है। मां का आंचल भारतीय मानस में उस जगह का नाम है जहां बच्चा दुनिया की हर चिंता से मुक्त हो सकता है। इसी भाव को सिनेमा ने बार-बार दोहराया। बच्चा चाहे कितना बड़ा हो जाए, असफलता, बीमारी, भय या अकेलेपन की स्थिति में उसकी स्मृति अक्सर मां के आंचल की छांव तक लौटती है। 1970 में बनी 'मां का आंचल' तो अपने शीर्षक में ही इस प्रतीक को केंद्र में ले आती है। फिल्म के संगीतकार मदन मोहन और गीतकार कैफी आजमी ने मां के आंचल को सीधे ईश्वर की करुणा और सुरक्षा से जोड़ा। 'मां का आंचल लाडले, दामन है भगवान का’' जैसे गीत में आंचल केवल मां के वस्त्र का सिरा नहीं रह जाता, बल्कि वह ईश्वर के दामन का मानवीय रूप बन जाता है। इसी फिल्म का 'मां है मोहब्बत का नाम, मां को हजारों सलाम' मातृत्व को प्रेम की सर्वोच्च अभिव्यक्ति के रूप में स्थापित करता है। मां के आंचल की यही छवि मदर इंडिया, दीवार, अमर अकबर एंथनी, करण-अर्जुन और अनेक पारिवारिक फिल्मों में अलग-अलग रूपों में दिखाई देती रही। कभी मां बच्चे के आंसू अपने आंचल से पोंछती है, कभी उसे धूप से बचाती है और कभी उसके माथे पर हाथ रखकर उसे भरोसा देती है। इन दृश्यों में आंचल दिखाई दे या न दिखाई दे, उसका भाव उपस्थित रहता है।
हिंदी सिनेमा में आंचल की शक्ति को समझने के लिए 'दीवार' का प्रसिद्ध संवाद ‘मेरे पास मां है’ पर्याप्त है। यहां आंचल शब्द नहीं आता, लेकिन उसका पूरा भाव मौजूद है। एक तरफ पैसा, बंगला और संपत्ति है, दूसरी तरफ मां। संवाद यह स्थापित करता है कि जीवन की कुछ संपदाएं ऐसी हैं जिन्हें धन से खरीदा नहीं जा सकता। मां का आंचल उन्हीं में से एक है। यही कारण है कि हिंदी फिल्मों की मां केवल भावुक चरित्र नहीं रही। वह परिवार की नैतिक धुरी भी बनी। जब नायक अपराध, लालच या भटकाव की ओर जाता है, तो मां का आंचल उसे उसके संस्कारों की याद दिलाता है। इस अर्थ में आंचल घर, क्षमा, त्याग और नैतिक सुरक्षा का प्रतीक बन जाता है। वह मां के हाथों का विस्तार है, वही हाथ जो बच्चे को थपकी देता है और जरूरत पड़ने पर उसके लिए ढाल बन जाता है।
मां के आंचल के विपरीत नायिका का आंचल हिंदी सिनेमा में प्रेम, सौंदर्य, लाज और आकर्षण की भाषा रहा। पुराने दौर की फिल्मों में नायिका का चेहरा आंचल के पीछे छिप जाना उसके संकोच को व्यक्त करता था। वही आंचल हवा में उड़ता तो वह स्वतंत्रता और आकर्षण का संकेत बन जाता। कभी नायक उसे पकड़ता था, कभी वह नायक के कपड़ों में उलझ जाता था और कभी वह दूर जाती नायिका और पीछे खड़े नायक के बीच एक अदृश्य संबंध की तरह लहराता था। 'जिस पथ पे चला, उस पथ पे मुझे आंचल तो बिछाने दे' जैसे गीतों में आंचल प्रेम के समर्पण का प्रतीक बन जाता है। यहां स्त्री अपने प्रिय के जीवन-पथ पर स्वयं को समर्पित करने की पारंपरिक छवि के साथ सामने आती है। ऐसे गीत उस दौर की प्रेम-कल्पना को भी व्यक्त करते हैं, जिसमें प्रेम केवल आकर्षण नहीं बल्कि साथ निभाने, त्याग और समर्पण का वचन माना जाता था। फिल्मी गीतों में आंचल के साथ हवा का संबंध भी बेहद महत्वपूर्ण रहा है। हवा में लहराता आंचल मानो भीतर उठती भावनाओं को दृश्य रूप देता था। नायिका कुछ नहीं कहती, लेकिन उसका आंचल कह देता था कि उसके मन में कोई हलचल है। इसीलिए पुराने हिंदी सिनेमा में आंचल कैमरे की भाषा का भी हिस्सा था।
‘आंचल’ जब फिल्म का नाम बना
दिलचस्प बात यह है कि आंचल केवल गीतों और दृश्यों में नहीं रहा, बल्कि फिल्मों के शीर्षक तक पहुंचा। 1960 में वसंत जोगलेकर के निर्देशन में बनी 'आंचल' में अशोक कुमार, निरूपा राय और नंदा प्रमुख भूमिकाओं में थे और संगीत सी. रामचंद्र का था। फिल्म के गीतों में पारिवारिक संबंधों और भावनाओं की छवियां दिखाई देती हैं। दो दशक बाद 1980 में अनिल गांगुली की 'आंचल' आई, जिसमें राजेश खन्ना, राखी, रेखा और अमोल पालेकर प्रमुख भूमिकाओं में थे। फिल्म का कथानक परिवार, रिश्तों, संदेह और सामाजिक दृष्टि के इर्द-गिर्द घूमता है। इस फिल्म में ‘आंचल’ स्त्री की मर्यादा और पारिवारिक संबंधों के रूपक के रूप में सामने आता है। यह संयोग नहीं है कि ‘आंचल’ जैसे शब्द को बार-बार पारिवारिक फिल्मों के शीर्षक में जगह मिली। भारतीय समाज में आंचल स्त्री के निजी जीवन और परिवार की सार्वजनिक प्रतिष्ठा के बीच एक पुल की तरह देखा जाता रहा है। इसलिए आंचल पर उठने वाला सवाल अक्सर पूरे परिवार की प्रतिष्ठा का सवाल बन जाता था।
आंचल का अर्थ केवल स्त्री, मां या प्रेमिका तक सीमित नहीं है। साहित्य और सिनेमा में यह शब्द भूगोल और लोकजीवन का प्रतीक भी बन जाता है। ‘भारत माता के आंचल’ जैसे प्रयोगों में धरती मां है और उसका आंचल पूरा देश। इसी तरह ‘मैला आंचल’ में आंचल किसी स्त्री के परिधान से आगे बढ़कर पूरे ग्रामीण समाज, उसकी गरीबी, पीड़ा, लोक संस्कृति और संघर्ष का प्रतीक बन जाता है। यहां आंचल का अर्थ और व्यापक हो जाता है। वह मां की गोद से निकलकर खेत, गांव, नदी, मिट्टी और पूरे जनजीवन तक पहुंच जाता है। यही हिंदी सिनेमा और साहित्य की विशेषता है कि एक छोटा-सा शब्द धीरे-धीरे निजी भावना से सामाजिक रूपक में बदल जाता है।
इक्कीसवीं सदी में सिनेमा की भाषा बदल गई। नायिका की पोशाक बदली, प्रेम व्यक्त करने के तरीके बदले और मां-बेटे के रिश्ते को दिखाने की शैली भी बदली। स्क्रीन पर साड़ी का आंचल पहले की तरह हर रोमांटिक दृश्य में दिखाई नहीं देता। फिर भी उसका भाव समाप्त नहीं हुआ। अब आंचल कई बार दिखाई देने वाली वस्तु के बजाय एक अदृश्य भाव है। मां के लिए वह सुरक्षा है, प्रेम में वह अपनापन है और स्मृति में वह बचपन का संसार। 'तारे जमीन पर' जैसे सिनेमा में मां से जुड़ा भाव हमें उसी अदृश्य आंचल की याद दिलाता है, जिसकी तलाश डर और अकेलेपन के क्षणों में बच्चा करता है। दरअसल, समय के साथ आंचल का दृश्य रूप कम हुआ है, लेकिन उसका प्रतीकात्मक अर्थ अधिक व्यापक हुआ है। अब वह केवल स्त्री की लाज या मां की ममता तक सीमित नहीं, बल्कि सुरक्षा, पहचान, स्मृति और भावनात्मक आश्रय का रूपक बन सकता है।
हिंदी फिल्मों में आंचल की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि उसने एक साधारण वस्त्र को असाधारण भावनात्मक अर्थ दे दिया। 'पेइंग गेस्ट' का ‘छोड़ दो आंचल’ प्रेम की शरारत और सामाजिक संकोच के बीच खड़ा है। 'मां का आंचल' में वही आंचल ईश्वर के दामन के समान पवित्र हो जाता है। 'दीवार' में वह बिना बोले मां की नैतिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करता है और 'आंचल' जैसी फिल्मों में परिवार और स्त्री की मर्यादा का रूपक बन जाता है। आंचल के दो सबसे मजबूत रूप माँ और नायिका दरअसल भारतीय भावलोक के दो अलग छोर हैं। मां का आंचल जीवन में वापस लौटने की जगह है, जबकि नायिका का आंचल जीवन में किसी नए व्यक्ति के प्रवेश की आहट। एक में सुरक्षा है, दूसरे में आकर्षण; एक में स्मृति है, दूसरे में संभावना; एक में बचपन है, दूसरे में प्रेम और भविष्य।
यही कारण है कि हिंदी सिनेमा के सौ साल से अधिक के इतिहास में आंचल बार-बार लौटता रहा है। कभी वह मां की गोद में बच्चे को ढकता है, कभी प्रेमिका के चेहरे पर लाज बनकर उतरता है, कभी हवा में उड़कर प्रेम की घोषणा करता है और कभी पूरे गांव, समाज या देश की पहचान बन जाता है। सिनेमा ने आंचल को केवल देखा नहीं, उसे महसूस किया है। शायद इसीलिए पुराने गीतों में जब आंचल का जिक्र आता है तो दर्शक केवल एक कपड़े की कल्पना नहीं करता उसके सामने मां की छांव, प्रेमिका की झिझक, बचपन की स्मृति और रिश्तों की गर्माहट एक साथ उभर आती है। भारतीय सिनेमा में आंचल की यही सबसे बड़ी ताकत है वह दिखाई देने वाली चीज होकर भी दिखाई देने वाले संसार से बहुत आगे चला जाता है। उसमें प्रेम है, लाज है, ममता है, त्याग है, स्मृति है और आश्रय भी। यही वजह है कि बदलते फैशन और बदलती फिल्मी भाषा के बावजूद आंचल का भाव आज भी पुराना नहीं पड़ा। वह भारतीय सिनेमा के भावलोक में अब भी उतना ही मुलायम, आत्मीय और जीवित प्रतीक है, जितना परदे पर पहली बार लहराया था।
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