भारतीय फिल्म संगीत का इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि जहां विशाल आर्केस्ट्रा, भारी-भरकम वाद्य यंत्र और तीव्र बीट्स सुनने वालों को क्षणिक आनंद या थिरकने का अनुभव कराते हैं। वहीं कुछ गीत ऐसे भी रचे जाते हैं, जो अपनी सादगी से कालजयी बन जाते हैं। पीयू बोले, मोह मोह के धागे या 'आओगे जब तुम' जैसे गीतों में देखने को मिलता है कि इन रचनाओं की मूल आत्मा इनके शब्दों में बसती है। यहां संगीतकार अपनी उपस्थिति को हावी करने के बजाय पृष्ठभूमि में ख़ामोशी से खड़ा महसूस होता है। वाद्य यंत्र इतने धीमे और सधे हुए बजाए जाते हैं कि गायक का स्वर और गीतकार की संवेदना सीधे सुनने वाले की चेतना से संवाद कर सके। ऐसे गीतों की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि वे सुनने वाले पर किसी तरह का भावनात्मक दबाव नहीं डालते। ये गीत किसी शांत बहती नदी की तरह कान में प्रवेश करते हैं और दिल के उस कोने को छू लेते हैं, जहां मनुष्य अपने अकेलेपन, अपनी स्मृतियों और अपनी गहरी संवेदनाओं के साथ निवास करता है।
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- हेमंत पाल
फ़िल्मी गीत दो तरह के होते हैं। एक में आर्केस्ट्रा का जबरदस्त धूम-धड़ाका होता है, जबकि दूसरी तरह के गीतों में शब्द ज्यादा स्पष्ट सुनाई देते हैं। ऐसे गीतों पर संगीत हावी नहीं होता और मासूमियत से शब्द कानों से दिल तक पहुंच जाते हैं। इसलिए कि जब संगीत का शोर कम होता है, तो शब्दों का अर्थ और उनके पीछे छिपी भावना अधिक स्पष्ट, अधिक पारदर्शी और अधिक प्रभावशाली होकर उभरती है। जब कम संगीत और शब्दों के प्रभुत्व की बात आती है, तो गुलज़ार के योगदान के बिना यह चर्चा अधूरी रह जाती है। गुलज़ार ने भारतीय सिनेमा को वह काव्यशास्त्र दिया जहां बिंब और अमूर्त भावनाएं सीधे श्रोता के अवचेतन में उतरती हैं। इस शैली का एक सर्वोत्कृष्ट उदाहरण फ़िल्म 'लेकिन' का संगीत है। पंडित हृदयनाथ मंगेशकर के संगीतात्मक संयोजन और लता मंगेशकर के गायन के साथ गुलज़ार के लिखे इन गीतों ने सादगी और गहराई की नई परिभाषा गढ़ी। 'यारा सिली सिली' में विरह की पीड़ा को व्यक्त करने के लिए किसी प्रचंड वाद्यवृंद की आवश्यकता नहीं पड़ी, एक हल्की सी तान, रेगिस्तानी हवा जैसा फैला शांत वातावरण और वाद्य यंत्रों की बहुत बारीक मौजूदगी ने इस गीत को सीधे रूह से जोड़ दिया।
गुलजार ने ऐसे कई गीतों को शब्द दिए
इसी फिल्म का गीत 'सुरमई शाम इस तरह आए' या 'मैं एक सदी से बैठी हूँ' इस बात का प्रमाण हैं, कि जब शास्त्रीयता का आधार हो और गुलज़ार के शब्द हों, तो वाद्य यंत्रों की न्यूनतम उपस्थिति ही गीत का सबसे बड़ा आभूषण बन जाती है। 'इजाज़त' फ़िल्म में उनका लिखा गीत 'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है' भी इसी श्रेणी में आता है, जहां आरडी बर्मन ने संगीत को पूरी तरह पृष्ठभूमि में ढकेल दिया, ताकि गुलजार के अनूठे, बेतरतीब और सीधे संवाद जैसे बोल अपनी पूरी ईमानदारी के साथ श्रोता के कानों में पहुंच सकें। इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए यदि अन्य युगों के उदाहरणों को देखें, तो फ़िल्म 'अमर प्रेम' का गीत 'चिंगारी कोई भड़के' भी अपनी सादगी में अद्भुत है। आनंद बक्शी के लिखे इस गीत को आरडी बर्मन ने एक शांत, गूंजती हुई गिटार की धुन और हल्की ताल के साथ सजाया। किशोर कुमार की भारी और संयमित आवाज ने जीवन के दर्शन और सामाजिक तड़प को जिस सादगी से पिरोया, वह सुनने वाले के भीतर एक गहरा सन्नाटा पैदा कर देता है।
इन गीतों में संगीत का कोलाहल नहीं
इसी श्रेणी में फिल्म 'मसान' का गीत 'तू किसी रेल सी गुजरती है' एक आधुनिक मील का पत्थर है। दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल के शेरों को जब वरुण ग्रोवर ने पटकथा के अनुकूल ढाला और इंडियन ओशन बैंड ने इसे संगीतबद्ध किया, तब कोई भारी ताना-बाना नहीं बुना गया। स्वानंद किरकिरे की बिना किसी अत्यधिक सजावट वाली देसी आवाज़, हल्के एकॉस्टिक गिटार और सारंगी की हल्की सी तान के साथ बहती है। यहां संगीत शब्दों के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं करता, बल्कि दुष्यंत कुमार के शब्दों के भारीपन को बहने के लिए एक बेहद शांत और निर्मल रास्ता देता है।
फिल्म 'आनंद' का 'कहीं दूर जब दिन ढल जाए' भी इसी परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। योगेश के लिखे बोलों को सलिल चौधरी ने इतनी सादगी से धुन में ढाला कि मुकेश की उदास आवाज़ हर सुनने वाले की निजी तन्हाई बन गई। ढलते सूरज, ढलती उम्र और अनकही उम्मीदों की इस व्यथा में वाद्य यंत्र इतने सीमित हैं कि लगता है जैसे गायक कमरे में बैठकर आपके ठीक सामने गा रहा हो। इसी तरह फ़िल्म 'सिलसिला' का गीत 'ये कहाँ आ गए हम' इस बात का प्रमाण है कि जब जावेद अख्तर की नज़्मों को खय्याम ने अत्यंत धीमे और मुलायम संगीतमय परिवेश में रखा, तो वह संगीत का नहीं बल्कि सांसों और शब्दों का समागम बन गया।
ऐसे कालजयी गीतों की रचना प्रक्रिया अलग
इन गीतों का इतिहास उठाकर देखें तो यह स्पष्ट होता है कि इनकी रचना प्रक्रिया अक्सर पारंपरिक फिल्मी गानों से अलग रही है। आमतौर पर फिल्मों में पहले धुन बनाई जाती है और फिर उस धुन में शब्दों को कसा जाता है। परंतु यारा सिली सिली, चिंगारी कोई भड़के या 'तू किसी रेल सी गुजरती है' जैसी रचनाओं में भाव और कविता प्राथमिक रहे। जब संगीतकार किसी पूर्व-लिखित कविता या गहरी भावना के सम्मान में धुन तैयार करता है, तो वह वाद्य यंत्रों का इस्तेमाल सिर्फ पृष्ठभूमि को रंगने के लिए करता है, उसे ढकने के लिए नहीं। हृदयनाथ मंगेशकर, खय्याम, आरडी बर्मन और नए दौर में अमित त्रिवेदी या इंडियन ओशन जैसे संगीतकारों ने इस बात को समझा कि जहां शब्द खुद इतने वज़नदार हों, वहां वाद्य यंत्रों का शोर उस कविता का प्रभाव कम कर सकता है। सुनने वालों पर ऐसे गीतों का मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक असर बेहद गहरा और स्थायी होता है। तीव्र और भारी संगीत वाले गाने तात्कालिक उत्साह या ऊर्जा तो दे सकते हैं, लेकिन वे इंसान के अवचेतन मन में बहुत गहरे नहीं उतरते। इसके विपरीत, जिन गीतों में शब्द प्रधान और संगीत न्यूनतम होता है, वे मनुष्य के अकेलेपन के साथी बनते हैं।
फ़िल्म इतिहास में ऐसे गीत बहुत कम
भारतीय सिनेमा में उत्कृष्ट एवं काव्यात्मक बोलों के कारण लोकप्रिय हुए गीतों की एक समृद्ध परंपरा रही है। 1957 की फ़िल्म 'प्यासा' का 'यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है', 1959 की 'अनाड़ी' का 'किसी की मुस्कुराहटों पे हो निसार', 'काग़ज़ के फूल' का 'वक़्त ने किया क्या हसीं सितम', 1963 की 'गुमराह' का 'चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों' और 1964 की 'हक़ीक़त' का देशभक्ति गीत 'कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियों' अपने गहरे और सामाजिक अर्थों के लिए जाने जाते हैं। वहीं 1976 की फ़िल्म 'कभी कभी' का 'मैं पल दो पल का शायर हूँ', 1979 की 'गोलमाल' का 'आने वाला पल जाने वाला है', 1983 की 'मासूम' का 'तुझसे नाराज़ नहीं ज़िंदगी हैरान हूँ मैं' और 1995 की बॉम्बे का 'तू ही रे' भावनाओं की अमर अभिव्यक्ति प्रस्तुत करते हैं। इसी संगीत यात्रा को आगे बढ़ाते हुए 2005 की 'परिणीता' का 'पीयू बोले', 2007 की 'अनवर' का 'मौला मेरे मौला', जब वी मेट का 'आओगे जब तुम', 2009 की 'वेक अप सिड' का 'इकतारा', 2014 की 'टू स्टेट्स' का 'मस्त मगन', 2015 की 'दम लगा के हईशा' का ' ये मोह मोह के धागे' दिल को छू जाते हैं। 2016 की 'एमएस धोनी: द अनटोल्ड स्टोरी' का 'कौन तुझे', 2017 की 'बरेली की बर्फी' का 'नज़्म नज़्म', 2018 की 'धड़क' का 'पहली बार', 2019 की 'मैं वापस आऊंगा' का 'तेरे पास में' और 2024 की 'दो पत्ती' का 'रांझा' आधुनिक युग में भी शब्दों और भावों की सुंदरता से श्रोताओं के दिलों को छूते आ रहे हैं।
दिलों में इसलिए उतरते रहे ये गीत
भारतीय सिनेमा की अलग-अलग समय अवधियों में ऐसे कई अनुपम गीत रचे गए, जिन्होंने भारी व्यवस्था को दरकिनार कर केवल अपनी सशक्त शब्दावली और न्यूनतम संगीतमयता से जनमानस पर गहरा प्रभाव छोड़ा है। जब कोई व्यक्ति जीवन में तनाव, विरह, प्रेम, या आत्म-मंथन के दौर से गुज़र रहा होता है, तब भारी संगीत उसे विचलित कर सकता है। ऐसे समय में यह अल्प-संगीत एक शांत मरहम की तरह काम करता है। श्रोता को ऐसा महसूस होता है कि गीतकार ने उसके ही मन के किसी अनकहे कोने को शब्द दे दिए हैं। सुनने वालों पर ऐसे गीतों का मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक असर बेहद गहरा और स्थायी होता है। तीव्र और भारी संगीत वाले गाने तात्कालिक उत्साह या ऊर्जा तो दे सकते हैं, लेकिन वे इंसान के अवचेतन मन में बहुत गहरे नहीं उतरते। जिन गीतों में शब्द प्रधान और संगीत न्यूनतम होता है, वे मनुष्य के अकेलेपन के साथी बनते हैं। यही कारण है कि इकतारा, नज़्म नज़्म और 'लेकिन' फिल्म के नगमे या 'तू किसी रेल सी गुजरती है' जैसे गाने रिलीज होने के दशकों बाद भी पुराने नहीं लगते। वे कालजयी इसलिए बनते हैं, क्योंकि इंसान की मूल भावनाएं कभी नहीं बदलतीं, और ये गीत सीधे उन्हीं मूल भावनाओं से संवाद करते हैं। संक्षेप में कहा जाए तो, संगीत का काम केवल कान को भाता नहीं है, बल्कि आत्मा को छूना है, और जब संगीत संयमित होता है तथा शब्द सशक्त, तो गीत महज़ मनोरंजन न रहकर एक व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है।
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