Wednesday, June 3, 2026

कंटेंट क्रिएटर और इंफ्लुएंसर : शौक ही नहीं, सलाह का कारोबार भी!

    एक समय था जब लोकप्रियता हासिल करने के लिए फिल्म उद्योग, टीवी चैनलों या बड़े मीडिया संस्थानों तक पहुंच जरूरी मानी जाती थी। ऐसे में कलाकार, गायक, लेखक या कॉमेडियन बनने का सपना अक्सर संसाधनों और अवसरों की कमी में दब जाता था। लेकिन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इस पूरी व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया। आज स्मार्टफोन, इंटरनेट कनेक्शन और रचनात्मक सोच रखने वाला व्यक्ति इंफ्लुएंसर या कंटेंट क्रिएटर बनकर लाखों लोगों तक अपनी बात पहुंचा सकता है। यही कारण है कि ये लोग अब केवल मनोरंजन नहीं करते, बल्कि आधुनिक अर्थव्यवस्था और समाज का प्रभावशाली हिस्सा बन गए हैं। उनकी बात को गंभीरता से सुना भी जाता है। आज स्क्रीन से बाजार तक इन्फ्लुएंसर और क्रिएटर की अलग ही दुनिया सज गई। 
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- हेमंत पाल

    यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक, एक्स, स्नैपचैट और पॉडकास्ट जैसे प्लेटफॉर्म ने रचनात्मकता का लोकतंत्रीकरण कर दिया। अब गांव का लोकगायक, छोटे शहर का शिक्षक, घरेलू व्यंजन बनाने वाली महिला या यात्रा प्रेमी युवा भी दुनियाभर के दर्शकों तक पहुंच बनाने लगे। पहले जहां प्रतिभा को मंच की तलाश करनी पड़ती थी, वहीं अब मंच लोगों की जेब में मौजूद मोबाइल फोन में है। ये चमत्कार है डिजिटल प्लेटफॉर्म का, जिसने सफलता की परिभाषा और उसकी राह दोनों को बदल दिया। सोशल मीडिया ने प्रसिद्धि और सफलता के पारंपरिक मॉडल को एक तरह से चुनौती दे दी। पहले लोगों को पहचान पाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ता था। ऑडिशन और मीडिया नेटवर्क की जरूरत होती थी। लेकिन, अब कोई भी व्यक्ति लगातार अच्छा कंटेंट बनाकर अपनी अलग पहचान बना सकता है। यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल क्रिएटर एक नए सामाजिक वर्ग के रूप में उभर गए। लोग इंफ्लुएंसर की सलाहों को गंभीरता से लेने लगे।  
    आज लोग टीवी सितारों से अधिक उन चेहरों को पहचानते हैं, जो रोज उनकी मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई देते हैं। फिटनेस ट्रेनर, फूड ब्लॉगर, टेक रिव्यूअर, ट्रैवल ब्लॉगर, एजुकेशन क्रिएटर और नए कॉमेडियन लाखों लोगों के जीवन का हिस्सा बन चुके। वे केवल मनोरंजन नहीं कर रहे, बल्कि लोगों की पसंद, खरीदारी और सोच को भी प्रभावित करने लगे। देश में भुवन बाम, प्राजक्ता कोली, कैरी मिनाटी, गौरव तनेजा, रणवीर अल्लाहबादिया, राज शमानी और तकनीकी गुरुजी जैसे कई नाम इस बदलाव की मिसाल हैं। इन लोगों ने पारंपरिक मीडिया से बाहर रहकर अपनी डिजिटल पहचान बनाई और बाद में वही पहचान उनके लिए बड़ा व्यवसाय बन गई। इनकी लोकप्रियता अब केवल इंटरनेट तक सीमित नहीं है। ये ब्रांड एंबेसडर, उद्यमी, लेखक और सार्वजनिक व्यक्तित्व बन गए। 
   डिजिटल युग में लोगों का भरोसा पारंपरिक विज्ञापनों से हटकर 'व्यक्तिगत अनुभव' पर बढ़ा है। यही वजह है कि इन्फ्लुएंसर का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। जब कोई व्यक्ति अपने पसंदीदा क्रिएटर को किसी उत्पाद, पुस्तक, कपड़े, मोबाइल या यात्रा स्थल की सिफारिश करते देखता है, तो उसे वह सुझाव अधिक वास्तविक और भरोसेमंद लगता है। दरअसल, सोशल मीडिया पर संबंध अधिक व्यक्तिगत दिखाई देते हैं। लोग अपने पसंदीदा क्रिएटर की रोजमर्रा की जिंदगी, संघर्ष, विचार और आदतों से परिचित हो जाते हैं। इससे दर्शकों को एक भावनात्मक जुड़ाव महसूस होता है। यही जुड़ाव इन्फ्लुएंसर को प्रभावशाली बनाता है। युवा पीढ़ी विशेष रूप से इस संस्कृति से प्रभावित है। वे फैशन, फिटनेस, करियर, रिश्तों और यहां तक कि राजनीतिक मुद्दों पर भी सोशल मीडिया क्रिएटर्स की राय को गंभीरता से सुनते हैं। कई बार किसी इन्फ्लुएंसर की एक वीडियो या पोस्ट लाखों लोगों की सोच और खरीदारी की दिशा बदल देती है।
   कुछ साल पहले तक लोग यूट्यूब वीडियो या इंस्टाग्राम पोस्ट को केवल शौक समझते थे। लेकिन, आज यह एक संगठित उद्योग बन चुका। कंटेंट क्रिएटर अब कैमरे के सामने अकेले काम करने वाले लोग नहीं रहे। उनके पास टीम, मैनेजर, एडिटर, स्क्रिप्ट राइटर, ब्रांड पार्टनर और बिजनेस रणनीतियां होती हैं। इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग आज अरबों डॉलर का वैश्विक उद्योग बन गई। बड़ी कंपनियां भी अब टीवी विज्ञापनों की तुलना में सोशल मीडिया प्रमोशन पर ज्यादा खर्च करने लगी। क्योंकि, डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सीधा और व्यक्तिगत संवाद संभव है। यहां विज्ञापन केवल प्रचार नहीं लगता, बल्कि किसी परिचित व्यक्ति की सलाह जैसा दिखाई देता है।
   आज फैशन, ब्यूटी, टेक्नोलॉजी, शिक्षा, फिटनेस, पर्यटन और फूड इंडस्ट्री में इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग एक तरह से रणनीति बन गई है। छोटे कारोबारी भी स्थानीय क्रिएटर्स की मदद से अपने उत्पादों को लोकप्रिय बना रहे। इससे कम लागत में बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंच बनाना आसान हुआ। कई कंटेंट क्रिएटर्स अब अपनी खुद की कंपनियां और ब्रांड चला रहे हैं। कोई स्किनकेयर ब्रांड शुरू कर रहा है, कोई ऑनलाइन कोर्स बेच रहा है, तो कोई पॉडकास्ट नेटवर्क और डिजिटल एजेंसी चला रहा है। इस तरह 'पर्सनल ब्रांडिंग' आधुनिक उद्यमिता का नया आधार बन गई।
     डिजिटल क्रांति का सबसे बड़ा प्रभाव यह है कि अब अवसर केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहे। छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के युवाओं को भी वैश्विक मंच मिलने लगा है। आज मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पूर्वोत्तर भारत जैसे क्षेत्रों से हजारों क्रिएटर्स सोशल मीडिया पर लोकप्रिय हो रहे। लोक संगीत, क्षेत्रीय भाषा, पारंपरिक भोजन और स्थानीय संस्कृति अब इंटरनेट के जरिए दुनिया तक पहुंच रही है। भोजपुरी गीतों, राजस्थानी लोक नृत्य और मध्यप्रदेश की जनजातीय कला को डिजिटल प्लेटफॉर्म ने ही नई पहचान दी है। इससे न केवल कलाकारों को अवसर मिले, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक विविधता को भी मजबूती मिली है। कई ग्रामीण क्रिएटर्स ने अपने स्थानीय जीवन को ही कंटेंट का विषय बनाया और उसी के जरिए लोकप्रियता हासिल की। लोग अब रियल और स्थानीय कंटेंट को पसंद करने लगे हैं। यही वजह है कि छोटे शहरों के क्रिएटर्स भी बड़े ब्रांड्स के साथ काम कर रहे हैं।
     हालांकि, इन्फ्लुएंसर संस्कृति के सकारात्मक पहलुओं के साथ कई चुनौतियां भी सामने हैं। सोशल मीडिया पर लोकप्रियता पाने की होड़ में कई लोग गलत जानकारी, दिखावटी जीवनशैली और विवादित कंटेंट का सहारा लेते हैं। कई बार बिना जांचे-परखे स्वास्थ्य, निवेश या सामाजिक मुद्दों पर सलाह दी जाती है, जिसका असर लाखों लोगों पर पड़ता है। यही कारण है कि अब इन्फ्लुएंसर्स की सामाजिक जिम्मेदारी पर भी चर्चा बढ़ने लगी। जब लाखों लोग किसी व्यक्ति की बात सुनते हैं, तो उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़ जाती है। डिजिटल प्रभाव केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि जनमत निर्माण का माध्यम भी बन गया। सरकारें और डिजिटल प्लेटफॉर्म भी अब विज्ञापन पारदर्शिता, फेक न्यूज और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर नियम बनाने पर जोर देने लगे हैं। उम्मीद की जाने लगी कि भविष्य में यह उद्योग और अधिक संगठित तथा नियंत्रित हो सकता है।
     डिजिटल क्रिएटर और इन्फ्लुएंसर केवल एक ट्रेंड नहीं, बल्कि यह आधुनिक अर्थव्यवस्था का नया चेहरा भी बन चुके हैं। आने वाले सालों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, वर्चुअल रियलिटी और नए डिजिटल प्लेटफॉर्म इस उद्योग को और बड़ा बनाएंगे। कंपनियां अब केवल उत्पाद नहीं बेचेंगी, बल्कि व्यक्तिगत प्रभाव के जरिए ग्राहकों से जुड़ने की कोशिश करेंगी। आज का युवा नौकरी के पारंपरिक विकल्पों के साथ-साथ कंटेंट क्रिएशन को भी करियर के रूप में देख रहा है। कैमरे के सामने बोलने वाला व्यक्ति अब केवल कलाकार नहीं, बल्कि मीडिया हाउस, मार्केटिंग एजेंसी और व्यवसायी भी है। स्पष्ट है कि सोशल मीडिया ने रचनात्मकता को नया लोकतांत्रिक स्वरूप दिया है। इसने आम लोगों को आवाज, पहचान और अवसर दिए हैं। लेकिन, साथ ही यह भी सच है कि डिजिटल दुनिया में लोकप्रियता अब केवल शौक का परिणाम नहीं रही। यह एक गंभीर व्यवसाय, प्रभाव और आधुनिक शक्ति का रूप ले चुकी है।
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सिनेमा में जासूसी के बदलते तेवर



     रहस्य, रोमांच और खतरे की परतों में लिपटी जासूसी फिल्में हमेशा से दर्शकों को अपनी ओर खींचती रही हैं। अनिश्चित परिस्थितियों में साहसिक फैसले लेने वाले किरदार, देशभक्ति से जुड़ी भावनाएं और आधुनिक तकनीक से सजे भव्य दृश्य इन फिल्मों को खास बनाते हैं। खासकर भारत-पाकिस्तान संबंधों की पृष्ठभूमि इन कहानियों में संवेदनशीलता और गहराई जोड़ती है, जिससे दर्शकों का जुड़ाव और बढ़ जाता है। इसी परंपरा को मजबूत आधार देने में दिग्गज अभिनेता देव आनंद का योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा है, जिन्होंने शुरुआती दौर में इस शैली को लोकप्रिय बनाने में अहम भूमिका निभाई। आज 'राजी' और उसके बाद 'धुरंधर' सीरीज ने जासूसी के किरदार को फिर जीवंत कर दिया। 
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- हेमंत पाल

    भारतीय जनमानस और सिनेमा का संबंध हमेशा से ही कौतूहल और साहस की कहानियों से गहरा रहा है। मनोरंजन के विस्तृत फलक पर जब जासूसी और राष्ट्र प्रेम का मेल होता है, तो वह केवल एक फिल्म नहीं रह जाती, बल्कि एक सामूहिक राष्ट्रीय भावना का प्रतिनिधित्व करने लगती है। हिंदी सिनेमा के शैशव काल से लेकर आज की अत्याधुनिक तकनीक से लैस 'धुरंधर' जैसी फिल्मों तक, जासूसी का कथानक एक लंबी और रोचक यात्रा तय कर चुका है। यह विधा केवल अंधेरी गलियों और रहस्यमयी संकेतों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने बदलते दौर के साथ अपनी परिभाषा को विस्तार दिया है। ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा के दौर में जहां जासूसी का स्वरूप व्यक्तिगत रहस्यों और छिटपुट अपराधों को सुलझाने तक केंद्रित था, वहीं आधुनिक युग में यह भू-राजनीतिक संघर्षों, सीमा पार के तनावों और तकनीक आधारित युद्ध कौशल का मुख्य केंद्र बन गई है। दर्शकों के दिलों में इन जासूसी कहानियों के प्रति जो अटूट आकर्षण है, उसकी जड़ें हमारी संस्कृति में मौजूद अनिश्चितता के प्रति जिज्ञासा और नायक के प्रति अगाध विश्वास में निहित हैं।
     जैसे-जैसे समय बदला और देश ने विभिन्न युद्धों और बाहरी चुनौतियों का सामना किया, सिनेमाई जासूस का चेहरा भी बदलने लगा। जासूसी का केंद्र अब व्यक्तिगत अपराधों से हटकर राष्ट्र की सुरक्षा पर केंद्रित होने लगा। इस बदलाव ने जासूसी फिल्मों को एक नया मंच प्रदान किया, जहां पड़ोसी देशों, विशेषकर पाकिस्तान के साथ होने वाले तनावों को कहानियों का आधार बनाया गया। 'राजी' जैसी फिल्म इस विधा में एक मील का पत्थर साबित हुई, क्योंकि इसने जासूसी को केवल बंदूकों और धमाकों तक सीमित न रखकर एक जासूस के मानसिक द्वंद्व और उसके मानवीय बलिदानों को बहुत ही संजीदगी से पर्दे पर उतारा। 'राजी' में दिखाया गया कि एक जासूस के लिए देश के प्रति कर्तव्य और उसकी अपनी भावनाओं के बीच कितना गहरा संघर्ष होता है। यह फिल्म उस दौर की परिचायक है जहां जासूसी को एक गंभीर और जोखिम भरे पेशे के रूप में दिखाया गया, जिसमें ग्लैमर से ज्यादा त्याग की भावना सर्वोपरि थी।
     हाल के वर्षों में 'धुरंधर' जैसी सुपरहिट फिल्मों की श्रृंखला ने जासूसी के इस विधा को एक व्यापक और व्यावसायिक रूप दिया है। इन फिल्मों में जासूसी का कैनवास बहुत बड़ा हो गया। अब नायक केवल देश के भीतर ही नहीं, बल्कि सात समुंदर पार जाकर भी दुश्मनों के मंसूबों को नाकाम करता है। इन आधुनिक फिल्मों में पाकिस्तान और वहां की खुफिया एजेंसियों के इर्द-गिर्द बुनी गई कहानियां दर्शकों को एक अलग तरह का रोमांच प्रदान करती हैं। दर्शकों का एक बड़ा वर्ग ऐसी फिल्मों को इसलिए पसंद करता है क्योंकि इनमें वीरता, चतुराई और अंततः सत्य की जीत जैसे तत्व होते हैं जो मनोरंजन के साथ-साथ एक प्रकार का संतोष भी प्रदान करते हैं। इसके पीछे का मनोवैज्ञानिक कारण यह भी है कि दर्शक अपने नायकों को उन चुनौतियों से लड़ते हुए देखना चाहते हैं, जिन्हें वे वास्तविक जीवन में एक खतरे के रूप में देखते हैं।
      ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों के उस दौर की बात करें तो वहां जासूसी का एक अलग ही सौंदर्यबोध था। उस दौर में देव आनंद एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में उभरे जिन्होंने जासूसी और अपराध आधारित थ्रिलर फिल्मों को एक नई पहचान दी। देव आनंद के किरदारों में जो चपलता और हाजिरजवाबी थी, उसने जासूस को केवल एक सरकारी मुलाजिम की छवि से निकालकर एक शहरी नायक के रूप में स्थापित किया। देव आनंद ने हिंदी सिनेमा में कई यादगार जासूसी किरदार निभाए। उनकी प्रमुख जासूसी या जासूसी-टच वाली फिल्मों की सूचियों में पहली फिल्म सीआईडी (1956) थी, जिसमें वे एक पुलिस इंस्पेक्टर के रूप में मर्डर मिस्ट्री सुलझाते हैं। काला पानी (1958) जेल और अपराध के रहस्य से जुड़ी कहानी थी, जिसमें देव आनंद सच्चाई खोजते हैं। काला बाजार (1960) में वे ब्लैक मार्केटिंग के खिलाफ पड़ताल करते हैं। 1961 में आई 'हम दोनों' पूरी तरह जासूसी फिल्म नहीं है, लेकिन इसमें पहचान और रहस्य का एंगल है। ज्वेल थीफ (1967) उनकी सबसे हिट स्पाई-थ्रिलर फिल्मों में से एक है। 'जॉनी मेरा नाम' (1970) में वे अंडरकवर एजेंट बनकर अपराधियों की गैंग में घुसते हैं। 1973 में आई 'हीरा पन्ना' चोरी, पीछा और रहस्य से भरी कहानी है। वारंट (1975) में वे अपराधियों का पीछा करते हैं। देव आनंद की जासूसी फिल्मों की खासियत उनका स्टाइल, तेज डायलॉग डिलीवरी और स्मार्ट अंडरकवर रोल था। 
     जासूसी फिल्मों के इतिहास में अगर सबसे अधिक सक्रिय अभिनेताओं और निर्देशकों की बात की जाए, तो देव आनंद के बाद इस मशाल को कई अन्य कलाकारों ने आगे बढ़ाया। आधुनिक दौर में सलमान खान, अक्षय कुमार और ऋतिक रोशन जैसे अभिनेताओं ने जासूसी के अलग-अलग अवतारों को जीवंत किया है। निर्देशकों के मामले में राज खोसला से लेकर आधुनिक समय में कबीर खान और सिद्धार्थ आनंद जैसे नामों ने इस शैली को नई ऊंचाइयां दी हैं। राज खोसला ने 60-70 के दशक में रहस्य और रोमांच का जो ढांचा तैयार किया था, उसी को आधुनिक निर्देशकों ने तकनीक और भव्यता के साथ आगे बढ़ाया है। विशेष रूप से पाकिस्तान की पृष्ठभूमि वाली फिल्मों के प्रति दर्शकों का आकर्षण इस तथ्य से भी जुड़ा है कि ये कहानियां हमारे वास्तविक इतिहास और वर्तमान की घटनाओं के बहुत करीब महसूस होती हैं। 
    जब एक भारतीय जासूस दुश्मन की मांद में घुसकर सूचनाएं निकालता है या किसी बड़े आतंकी हमले को रोकता है, तो वह सिनेमा के नायक से कहीं बढ़कर एक रक्षक की छवि ले लेता है। यही कारण है कि 'राजी' से लेकर 'धुरंधर' तक की फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं। दर्शकों को इन फिल्मों में अपनी सुरक्षा और सामर्थ्य का प्रतिबिंब दिखाई देता है। जासूसी सिनेमा के विकास क्रम को देखते हुए यह स्पष्ट होता है कि यह विधा अब केवल मनोरंजन का साधन नहीं रह गई, बल्कि यह समय के साथ चल रहे बदलावों का आईना भी है। पहले जहां जासूसी के लिए केवल भेष बदलने और गुप्त संकेतों का सहारा लिया जाता था, अब वहां उपग्रह संचार और डिजिटल निगरानी जैसी तकनीकों का समावेश हो गया है। इसके बावजूद, कहानियों का मूल तत्व वही पुराना है। एक अकेला व्यक्ति जो अपनी बुद्धि और साहस के बल पर पूरी दुनिया को बचा सकता है। यह नायकत्व ही है जो दर्शकों को पीढ़ी दर पीढ़ी इन फिल्मों से जोड़े रखता है।
     हिंदी सिनेमा में जासूसी और रहस्य-थ्रिलर पर आधारित फिल्मों की एक लंबी परंपरा रही है। शुरुआत क्लासिक क्राइम-थ्रिलर से हुई और आज यह हाई-टेक इंटरनेशनल स्पाई यूनिवर्स तक पहुंच चुकी है। 1950-70 के क्लासिक दौर में सीआईडी, ज्वेल थीफ और 'जॉनी मेरा नाम' रही। 1980-90 के दौर में धर्मेंद्र की 'आँखें' (1993), आमिर खान की 'बाजी' (1995) आई। 2000 के बाद मॉडर्न स्पाई थ्रिलर का दौर आया और ए वेडनेसडे (2008) आई, जिसमें आतंकवाद और इंटेलिजेंस का सस्पेंस रहा। 2015 की फिल्म 'बेबी' सीक्रेट एजेंसी के मिशन और आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन के कथानक पर बनी। 2017 की 'नाम शबाना' एक महिला जासूस की बैक स्टोरी है। लेकिन, 2018 की आलिया कपूर की फिल्म 'राज़ी' यादगार फिल्म बनी। यह भारत-पाक युद्ध के दौरान एक अंडरकवर महिला भारतीय जासूस की सच्ची कहानी से प्रेरित है। 2019 में 'रोमियो अकबर वालटर' आई जो 1971 के युद्ध में जासूसी मिशन पर बनी। 
    इसके बाद के दौर में एक था टाइगर (2012), मद्रास कैफे (2013), टाइगर जिंदा है (2017), वार (2019) और 'पठान' (2023) ने इस परंपरा को जारी रखा। 2025 की फिल्म 'धुरंधर' और 2026 में आई सीक्वल 'धुरंधर 2' ने बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। ये सभी फिल्में इंटरनेशनल लेवल की जासूसी, हाई-टेक गैजेट्स और बड़े एक्शन पर आधारित हैं। देखने में आया कि 60-70 के दशक में जासूसी फिल्मों में रहस्य और स्टाइल प्रमुख था। 2000 के बाद ये फिल्में रियलिस्टिक इंटेलिजेंस ऑपरेशन और ग्लोबल मिशन पर शिफ्ट हो गईं। जबकि,जबकि, आज जासूसी फिल्में एक पूरा सिनेमैटिक यूनिवर्स बन चुकी हैं। भारतीय सिनेमा में जासूसी की कहानियां हमारे समाज के कौतूहल और साहस का प्रतिनिधित्व करती हैं। चाहे वह देव आनंद का जादुई दौर रहा हो या आज के जांबाजों का एक्शन से भरपूर सफर, जासूसी फिल्मों ने हमेशा यह साबित किया है कि रहस्य और रोमांच की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती। 
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परदे पर अमर है प्यार का जज्बात

   प्यार एक ऐसा शाश्वत जज्बात है जिसकी तलाश किशोर से लेकर अधेड़ उम्र तक के हर व्यक्ति को होती है। जब यही आम जिंदगी की प्रेम कहानियां परदे पर उतरती हैं, तो वे 'लार्जर देन लाइफ' यानी जिंदगी से बड़ी नजर आने लगती हैं। दर्शक फिल्मों के जरिए अपने ही अधूरे सपनों और कल्पनाओं को जीने की कोशिश करता है। यही कारण है कि रोमांटिक फिल्में बॉक्स ऑफिस पर हमेशा रिकॉर्ड तोड़ती रही हैं। 
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- हेमंत पाल

     पिछले नौ दशकों में हिंदी सिनेमा में प्रेम का स्वरूप लगातार बदलता रहा। 1930 से 1950 का दशक आदर्शवाद और सामाजिक बंधन का रहा। इस दौर में प्रेम कहानियों को सामाजिक बंधनों और पारिवारिक मूल्यों के आईने में देखा जाता था। 'देवदास' जैसी फिल्मों ने इस कालखंड में प्रेम, त्याग और सामाजिक वर्जनाओं के बीच के संघर्ष को बेहद आदर्शवादी और भावनात्मक रूप से चित्रित किया। 1960 से 1970 का दशक यथार्थवाद और समकालीनता का रहा। आजादी के बाद के शुरुआती दौर के बाद, यह दशक प्रेम कहानियों से दोबारा गुलजार हुआ। इस दौरान 'मुगल-ए-आजम', 'प्रेम कहानी' और 'लव स्टोरी' जैसी फिल्में बनीं। इनमें प्यार के साथ-साथ व्यक्तिगत संघर्षों, दोस्ती और बदलते पारिवारिक ढांचों के जटिल पहलुओं को अधिक यथार्थवादी ढंग से पेश किया गया। 1980 से 1990 का दशक संगीत, नृत्य और परिवार का उत्सव वाला रहा। यह दौर सिनेमा में रोमांस का स्वर्ण काल माना जा सकता है। 'मैंने प्यार किया' और 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' जैसी फिल्मों ने युवा संस्कृति को पूरी तरह प्रभावित किया। इस दौर की फिल्मों में संगीत, भव्य नृत्य और पारिवारिक मूल्यों का ऐसा मिश्रण था जिसने प्रेम को एक बेहद सुखद और आशावादी दृष्टिकोण दिया।
      इसके बाद आए 2000 के बाद का दौर में विविधता और सामाजिक मुद्दे उठाए गए। नया दशक आते ही प्रेम कहानियों में अंतर-सांस्कृतिक संबंध और सामाजिक मुद्दे हावी होने लगे। 'गदर : एक प्रेम कथा' और 'तेरे नाम' जैसी फिल्मों ने दिखाया कि कैसे प्यार, देशभक्ति और सामाजिक संघर्षों के बीच पिसता है। वहीं, सच्ची घटनाओं पर आधारित 'छपाक' जैसी संवेदनशील फिल्मों ने भी दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद न्यू-जनरेशन के प्यार को परिभाषित करने के लिए रहना है तेरे दिल में, बचना ऐ हसीनों, सलाम नमस्ते, लव आजकल, ये जवानी है दीवानी, वेक अप सिड, बर्फी, टू स्टेट्स, आशिकी 2, मसान और 'तमाशा' जैसी अनगिनत फिल्में आईं, जिन्होंने प्यार के आधुनिक और परिपक्व रूपों को सामने रखा।
     आज के दौर में जहां बॉक्स ऑफिस पर 'एनिमल' जैसी फिल्मों का दबदबा है और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स हिंसा, गाली-गलौज व खूंखार अपराधों से भरी वेब सीरीज से पटे पड़े हैं, वहां 'सैयारा' जैसी प्रेम कहानी ताजी हवा के एक झोंके की तरह आई। दर्शक लंबे समय से परदे पर मेलोड्रामा और कोमल भावनाओं की कमी महसूस कर रहे थे। देखा जाए तो 'सैयारा' के कथानक में कोई नयापन नहीं है। यह फिल्म साल 2004 में आई दक्षिण कोरियाई फिल्म 'ए मोमेंट टू रिमेंबर' का एक अनऑफिशियल अडॉप्टेशन है। इस कहानी की जमीन पर साल 2008 में अजय देवगन और काजोल की फिल्म 'यू मी और हम' भी बन चुकी है, जिसमें नायिका अल्जाइमर (भूलने की बीमारी) से पीड़ित होती है। 'सैयारा' ने भी इसी संवेदनशील विषय को चुना। एक शराबी पिता का परेशान बेटा और अल्जाइमर की गंभीर मरीज लड़की दो अलग-अलग दुखों से जूझते किरदारों का एक-दूसरे की पीड़ा को समझना और करीब आना, दर्शकों को भावुक कर गया। हिंसा से ऊब चुके दर्शकों को जब इस रूप में भावनात्मक सुकून मिला, तो उन्होंने फिल्म को हाथों-हाथ लिया।
     लंबे अरसे बाद सिनेमाघरों में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को उसके सुनहरे दौर की याद दिला दी। थियेटर की अंधेरी दीर्घाओं में बैठे युवा दर्शक सुबक रहे थे, और उनकी आंखों से बहते आंसू इस बात की गवाही दे रहे थे कि परदे पर चल रही एक मूक-सहज प्रेम कहानी ने सीधे उनके दिलों को छू लिया। 'सैयारा' की कामयाबी का एक बड़ा रहस्य इसके लीड एक्टर्स अहान पांडे और अनीता पड्डा की जोड़ी है। इन दोनों में दर्शकों को 'पेड़ की नई कोपल' जैसी ताजगी का अहसास हुआ। हिंदी सिनेमा का इतिहास गवाह है कि जब भी परदे पर नई उम्र की नई फसल उगानी होती है, तो प्यार की खेती सबसे ज्यादा उपजाऊ साबित होती है। सिनेमा के शुरुआती बाल्यावस्था के दौर में ऐसे अभिनेता भी रोमांटिक रोल करते थे जो अपनी जवानी की दहलीज पार कर चुके थे, क्योंकि तब समाज में सिनेमा को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था और सभ्य समाज के गिने-चुने लोग ही इससे जुड़ते थे। जैसे-जैसे समय बदला, दर्शकों में युवा सितारों को देखने की चाहत बढ़ती गई। हिंदी सिनेमा ने बार-बार नए चेहरों को लॉन्च करने के लिए प्रेम कहानियों का ही सहारा लिया है।
     रोमांटिक फिल्मों से करियर की शुरुआत करने वाले सितारों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। 'बॉबी' से ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया की जोड़ी ने युवाओं को दीवाना बनाया। 'लव स्टोरी' के जरिए कुमार गौरव और विजयता पंडित रातों-रात स्टार बने। 'बेताब' से सनी देओल और अमृता सिंह, तथा 'रॉकी' से संजय दत्त और टीना मुनीम ने कदम रखा। 'एक दूजे के लिए' में कमल हासन और रति अग्निहोत्री, तथा 'कयामत से कयामत तक' में आमिर खान ने प्यार को नई परिभाषा दी। 'मैंने प्यार किया' से सलमान खान और भाग्यश्री की मासूमियत दर्शकों के दिलों में बस गई। यही सिलसिला आगे चलकर अजय देवगन-मधुश्री (फूल और कांटे), ऋतिक रोशन-अमीषा पटेल (कहो ना प्यार है), राहुल रॉय-अनु अग्रवाल (आशिकी), शाहिद कपूर-अमृता राव (इश्क-विश्क), दीपिका पादुकोण (ओम शांति ओम), रणवीर सिंह-अनुष्का शर्मा (बैंड बाजा बारात) और आलिया भट्ट, सिद्धार्थ मल्होत्रा व वरुण धवन (स्टूडेंट ऑफ द ईयर) के रूप में जारी रहा। इसके लंबे अरसे बाद आई 'सैयारा' इसी परंपरा की अगली कड़ी है।   
    फिल्म इंडस्ट्री के सवा सौ साल के इतिहास में प्रवृत्तियां बदलती रहीं, तकनीक उन्नत होती रही और दर्शकों का मिजाज भी बदलता रहा। लेकिन 'मुगल-ए-आजम' और 'देवदास' से शुरू हुआ यह रूहानी सफर आज 'सैयारा' तक आते-आते भी उतना ही प्रासंगिक और असरदार बना हुआ है। 'सैयारा' की अप्रत्याशित सफलता यह साबित करती है कि इंसान चाहे जितना आधुनिक हो जाए, दिल को झकझोर देने वाली भावुक प्रेम कहानियां हमेशा अमर रहेंगी। जब तक दुनिया में प्रेम की चाहत जिंदा है, तब तक सिनेमा के परदे पर प्यार की यह रूहानी खेती हमेशा लहलहाती रहेगी।
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नेहरू के विराट व्यक्तित्व का काव्यात्मक दस्तावेज़ ‘अलविदा नेहरू’

- हेमंत पाल

    साहित्य जब इतिहास और राजनीति के साथ कदमताल करता है, तो वह केवल शब्दों का जाल नहीं रह जाता, बल्कि एक पूरे युग की धड़कन बन जाता है। मोहम्मद नौशाद द्वारा संपादित पुस्तक ‘अलविदा नेहरू’ इसका एक जीवंत और प्रामाणिक उदाहरण है। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज से जुड़े शोधकर्ता और लेखक मोहम्मद नौशाद ने इस संकलन के माध्यम से आधुनिक भारत के इतिहास के एक बेहद संवेदनशील और भावुक मोड़ को पन्नों पर उतारा है। यह किताब भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के अवसान पर उर्दू के दिग्गज शायरों द्वारा लिखी गई शोकाकुल नज़्मों और मर्सिया नुमा शायरी का एक अनूठा और ऐतिहासिक संग्रह है, जो पाठक को एक गहरे संवेदनात्मक धरातल पर ले जाता है।
    मई 1964 में जब पंडित नेहरू ने अंतिम सांस ली, तो वह केवल एक राजनेता का अंत नहीं था, बल्कि वह एक पूरे युग का अवसान था। उस दौर के लगभग तमाम शीर्ष उर्दू शायरों ने नेहरू को श्रद्धांजलि देते हुए अपनी कलम उठाई थी। इस पुस्तक में उन्हीं चुनिंदा नज़्मों और अशआर को सहेजा गया है, जो नेहरू जी के जीवनकाल में या उनके निधन के तुरंत बाद रची गई थीं। इन रचनाओं को पढ़ते हुए सहज ही यह एहसास होता है कि एक राजनेता और व्यक्ति के रूप में नेहरू को समाज के प्रबुद्ध वर्ग और आम जनमानस में कितनी व्यापक और दिली स्वीकृति हासिल थी। यह मर्सिया नुमा शायरी महज़ एक शोकगीत नहीं है, बल्कि यह उस गहरे लगाव का प्रमाण है जो तत्कालीन साहित्यकारों को नेहरू के धर्मनिरपेक्ष, समावेशी और प्रगतिशील दृष्टिकोण से था।
     संपादक मोहम्मद नौशाद ने इन विरल रचनाओं को न केवल बहुत करीने से चुना है, बल्कि पुस्तक की भूमिका में उनका अकादमिक और ऐतिहासिक विश्लेषण भी प्रस्तुत किया है, जो इस संकलन को एक गंभीर दस्तावेज़ बनाता है। इन नज़्मों में केवल एक नेता का गुणगान या स्तुति नहीं है, बल्कि नेहरू के बहुआयामी व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को उजागर किया गया है। शायरों ने जहाँ एक ओर बच्चों के चहेते 'चाचा नेहरू' के मानवीय रूप को याद किया है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक भारत की नींव रखने वाले और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के हिमायती राष्ट्र-निर्माता के प्रति अपना आदर प्रकट किया है। विभाजन की त्रासदी झेल चुके भारत में एक ऐसे नायक को खोने का दर्द इन कविताओं में साफ झलकता है, जिसने देश को बिखरने से बचाया और एक नई राह दिखाई।
    यह किताब उस दौर की साहित्यिक और राजनीतिक चेतना को समझने का एक बेहतरीन ज़रिया है, जब उर्दू शायरी देश की मुख्यधारा की भावनाओं और राष्ट्रीय विमर्श को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम थी। यह संकलन तत्कालीन समाज में साहित्य और राजनीति के गहरे अंतर्संबंधों को भी रेखांकित करता है। ‘अलविदा नेहरू’ केवल कविता प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि इतिहास और राजनीति में रुचि रखने वाले उन पाठकों के लिए भी एक अत्यंत संग्रहणीय पुस्तक है जो आज के भारत को उसके अतीत के आईने में देखना चाहते हैं। शब्दों के माध्यम से एक जननायक को दी गई यह विदाई पाठक को न सिर्फ भावुक करती है, बल्कि उसे उस खोए हुए दौर के गौरव और मूल्यों पर गर्व करने का अवसर भी देती है।
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'विजय' की जीत से सिनेमा की सत्ता मजबूत

 
     तमिलनाडु भारतीय राजनीति का वह अनोखा प्रदेश है, जहां सिनेमा मनोरंजन का माध्यम नहीं, जनभावनाओं, सामाजिक चेतना और राजनीतिक नेतृत्व का सबसे प्रभावी मंच रहा है। यहां फिल्मों के नायक अक्सर जनता की उम्मीदों के प्रतीक बन जाते हैं, फिर वही लोकप्रियता उन्हें सत्ता के गलियारों तक पहुंचा देती है। एमजी रामचंद्रन और जे जयललिता जैसे नेताओं ने इस परंपरा को मजबूत किया था। अब अभिनेता विजय थलापति के राजनीति में उतरने जीत हासिल करने से तमिलनाडु की राजनीतिक फिजा बदलती दिखाई दे रही। उनकी लोकप्रियता ने पारंपरिक द्रविड़ दलों को भी चौंकाया। क्या विजय थलापति एक और फिल्मी सितारे की तरह राजनीति में आए हैं या वे वास्तव में तमिल राजनीति का नया अध्याय लिखने वाले हैं!
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- हेमंत पाल 

    तमिलनाडु की राजनीति को वहां की फिल्म संस्कृति देश के अन्य राज्यों से अलग बनाती है। यहां सिनेमा और राजनीति का रिश्ता दशकों पुराना है। द्रविड़ आंदोलन के समय से ही फिल्मों का इस्तेमाल राजनीतिक विचारधारा को जनता तक पहुंचाने के लिए किया गया। उस दौर में फिल्मों के संवाद केवल मनोरंजन नहीं थे, बल्कि सामाजिक संदेश और राजनीतिक चेतना के वाहक बन चुके थे। सीएन अन्नादुरई और एम करुणानिधि जैसे नेताओं ने फिल्मों की पटकथाओं और संवादों के जरिए द्रविड़ विचारधारा को मजबूत किया। तमिल अस्मिता, सामाजिक न्याय और हिंदी विरोध जैसे मुद्दे फिल्मों में खुलकर दिखाई देने लगे। यही वह समय था जब सिनेमा तमिल राजनीति का सबसे बड़ा माध्यम बन गया।
    इसी जमीन पर उभरे एमजी रामचंद्रन, जिन्हें जनता केवल अभिनेता नहीं, मसीहा मानने लगी थी। फिल्मों में उनका किरदार गरीबों के रक्षक, ईमानदार नेता और अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले नायक का होता था। धीरे-धीरे लोगों ने परदे और वास्तविक जीवन के बीच का फर्क मिटा दिया। जब एमजीआर राजनीति में आए तो जनता ने उन्हें उसी भरोसे के साथ स्वीकार किया, जैसा फिल्मों में करती थी। यही कारण था कि वे तमिल राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हो गए। एमजीआर के बाद जे जयललिता ने इस विरासत को संभाला। वे भी फिल्मों की लोकप्रिय अभिनेत्री थीं और एमजीआर की राजनीतिक उत्तराधिकारी बनीं। जयललिता ने अपने स्टारडम को 'अम्मा' की भावनात्मक छवि से जोड़ा। उन्होंने कल्याणकारी योजनाओं और मजबूत नेतृत्व के जरिए जनता के बीच गहरी पकड़ बनाई। तमिल राजनीति में यह पहली बार नहीं था, जब किसी अभिनेता ने सत्ता हासिल की। लेकिन, जयललिता ने यह साबित किया कि फिल्मी लोकप्रियता अगर राजनीतिक रणनीति से जुड़ जाए तो वह लंबे समय तक सत्ता कायम रख सकती है।
    तमिल समाज में फिल्मी सितारों की लोकप्रियता केवल ग्लैमर की वजह से नहीं होती। यहां अभिनेता आम आदमी की आकांक्षाओं और संघर्षों के प्रतिनिधि बन जाते हैं। तमिल फिल्मों में नायक अक्सर भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ता है, गरीबों के लिए आवाज उठाता है और सामाजिक न्याय की बात करता है। यही छवि जनता के मन में गहरे उतर जाती है। इसलिए जब वही अभिनेता राजनीति में आते हैं, तो लोग उन्हें वास्तविक जीवन का नायक मानने लगते हैं। इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अब विजय थलापति राजनीति में सक्रिय हुए हैं। विजय पिछले दो दशकों से तमिल सिनेमा के सबसे बड़े सुपर स्टारों में गिने जाते हैं। उनकी फिल्मों में व्यवस्था विरोध, युवा आक्रोश और सामाजिक असमानता जैसे मुद्दे बार-बार दिखाई देते रहे। उनकी लोकप्रियता केवल परदे तक सीमित नहीं है; उनके प्रशंसकों का वृहद नेटवर्क पूरे तमिलनाडु में फैला। इसी फैन क्लब ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं का रूप ले लिया।
    विजय की लोकप्रियता को लेकर सबसे दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने युवाओं के बीच अलग तरह की पहचान बनाई है। आज का तमिल युवा सोशल मीडिया से जुड़ा है। वह पारंपरिक राजनीति से कुछ हद तक निराश भी लगता है। ऐसे समय में विजय ने खुद को एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में पेश किया। उनकी सभाओं में उमड़ती भीड़ केवल फिल्मी दीवानगी नहीं, बल्कि बदलाव की उम्मीद भी दर्शाती है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और अन्य द्रविड़ दल लंबे समय तक यह मानते रहे कि तमिल राजनीति केवल वैचारिक और जातीय समीकरणों पर टिकी हुई है। लेकिन, विजय ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि आज की राजनीति में भावनात्मक जुड़ाव, सोशल मीडिया प्रभाव और सेलिब्रिटी अपील भी बड़ी ताकत बन चुका है। यही कारण है कि विजय की राजनीतिक एंट्री ने तमिल राजनीति में नई बेचैनी पैदा कर दी।
     हालांकि, राजनीति केवल लोकप्रियता का खेल नहीं है। चुनाव जीतने के लिए मजबूत संगठन, स्पष्ट विचारधारा और सामाजिक समीकरणों की समझ भी जरूरी है। तमिलनाडु का वोटर राजनीतिक रूप से जागरूक माना जाता है। वह भावनाओं से प्रभावित जरूर होता है, लेकिन पूरी तरह भावुक नहीं होता। यही वजह है कि रजनीकांत जैसी अपार लोकप्रियता रखने वाले अभिनेता भी राजनीतिक जमीन मजबूत नहीं कर सके। जीत के बाद अब विजय थलापति   के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे अपनी फिल्मी छवि को असल राजनीतिक नेतृत्व में कैसे बदलते हैं। उन्हें यह साबित करना होगा कि वे केवल स्टार नहीं, बल्कि प्रशासनिक दृष्टि रखने वाले नेता भी हैं। रोजगार, शिक्षा, उद्योग, भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दों पर उनकी स्पष्ट नीति ही उनकी नेतृत्व सफलता तय करेगी।
     फिर भी यह मानना पड़ेगा कि विजय ने तमिल राजनीति में एक नई ऊर्जा तो पैदा की है। उनकी भाषा अपेक्षाकृत संतुलित है। वे खुद को पारंपरिक राजनीतिक संघर्षों से थोड़ा अलग रखते हैं। उन्होंने युवाओं और मध्यम वर्ग को आकर्षित करने की कोशिश की और इसमें सफल भी रहे। वे जनता के बीच भरोसा कायम रखने में सफल रहे, पर क्या अब आने वाले वर्षों में तमिल राजनीति का समीकरण बदल सकता है! तमिलनाडु की राजनीति का फिल्मी चरित्र भारतीय लोकतंत्र की सबसे दिलचस्प घटनाओं में से एक है। यहां सिनेमा केवल मनोरंजन उद्योग नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा रहा है। परदे पर दिखने वाला नायक जनता की उम्मीदों का प्रतीक बन जाता है और फिर वही छवि राजनीति में उसकी ताकत बनती है। इतना तय है कि तमिलनाडु में सिनेमा और राजनीति का रिश्ता अभी खत्म नहीं हुआ। वहां जनता आज भी अपने नायक को परदे से उठाकर सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाने की ताकत रखती है और विजय थलापति को मिली जीत इसी ताकत का प्रतीक है। 
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Sunday, May 10, 2026

शहरीकरण की छांव में बदलते गांव

  

    समय के साथ गांव और गाँव के लोग बदल रहे हैं। आधुनिकता का रंग गांववालों पर चढ़ रहा है, तो उसका असर गांव पर भी दिखाई देने लगा। लेकिन, उन गांव की पीड़ा बिल्कुल अलग है, जो शहरों की सीमाओं से लगे हैं। बरसों से इन गांव में रहने वाली पीढ़ियों की मानसिकता तो ग्रामीण परिवेश की है, पर नए बदलाव ने नई पीढ़ी को शहरों से जोड़ दिया। बीते कुछ दशकों में आए इस बदलाव ने शहरों से प्रभावित इन गांव में अलग ही तरह का अंतर्द्वंद्व छेड़ दिया जो सिर्फ दो पीढ़ियों के बीच ही नहीं, दो परंपराओं के बीच भी है। ऐसे में कहा जा सकता है कि ये गांव न तो शहरों जैसे बन सके और न गांव ही बचे। रहन-सहन और सोच का ये फर्क खानपान के साथ हर जगह नजर आता है। गांव के इन घरों में रोटियां भले ही चूल्हे पर बनती हो, पर यहां के युवा जींस पहनते हैं।
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- हेमंत पाल

     हरी और ग्रामीण परिवेश का यह अंतर्द्वंद्व केवल सतही बदलाव तक सीमित नहीं है। यह एक गहरी सांस्कृतिक टकराहट है, जहां परंपरा और आधुनिकता के बीच खींचतान मच रही है। शहरों की सीमाओं से सटे ये गांव, जिन्हें अक्सर 'पेरी-अर्बन' क्षेत्र कहा जाता है, विकास की दौड़ में फंस गए। एक और शहरीकरण का दबाव उन्हें निगल लेना चाहता है, दूसरी ओर ग्रामीण जड़ें उन्हें पीछे खींचती रहती हैं। इन गांवों में रहने वाले लोग न तो पूर्णतः ग्रामीण हैं, न शहरी। उनकी पहचान धुंधली पड़ गई है।
     शहरीकरण के दौर में ये बदलाव स्वाभाविक लगते हैं। लेकिन, इनके मूल कारण बहुआयामी हैं। सबसे बड़ा कारक है औद्योगीकरण और बुनियादी ढांचे का विस्तार। पिछले दो-तीन दशकों में भारत के मध्यम और बड़े शहरों के आसपास फैक्टरियां, आईटी पार्क, हाईवे और मेट्रो प्रोजेक्ट उमड़ आए हैं। बड़े शहरों की परिधि पर बसे गांव इसका जीता-जागता उदाहरण हैं। यहां जमीनें सस्ती मिलती हैं, इसलिए उद्योगपति और रियल एस्टेट कारोबारी इन्हें हथियाने लगे। किसान अपनी खेती छोड़कर मजदूरी या प्लॉट बेचने लगे। नतीजा यह हुआ कि गांव की अर्थव्यवस्था खेती से हटकर मजदूरी, छोटे-मोटे कारोबार और सर्विस सेक्टर की ओर मुड़ गई। सरकारी नीतियां भी इसमें सहायक रहीं। सरकारी योजनाओं ने शहरों को फैलाया, लेकिन इन गांवों को बीच में लटका दिया। विकास के नाम पर बिजली, पानी, सड़कें तो पहुंच गईं, लेकिन ग्रामीण पहचान मिट गई।
     माइग्रेशन भी एक प्रमुख कारण है। रोजगार की तलाश में युवा शहरों की ओर रुख करते हैं। सुबह गांव से निकलकर शाम को लौटना आम हो गया। मोबाइल फोन, इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इस प्रक्रिया को तेज कर दिया। फेसबुक, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर शहरी जीवनशैली की चकाचौंध देखकर गांव के बच्चे वैसी ही जिंदगी की कल्पना करने लगे। पहले जहां खेती ही जीवन था, अब कोचिंग सेंटर, प्राइवेट स्कूल और ऑनलाइन कोर्स ने शिक्षा को शहरी रंग दे दिया। माता-पिता भले ही चूल्हे पर रोटी सेंकें, लेकिन बच्चे मैकडॉनल्ड्स की बर्गर की चाहत रखते हैं। यह बदलाव आर्थिक रूप से मजबूत हुआ। जीडीपी ग्रोथ के साथ मध्यम वर्ग का विस्तार हुआ, जिसने उपभोक्तावाद को गांवों तक पहुंचा दिया। मॉल, सुपरमार्केट और ई-कॉमर्स ने खरीदारी को बदल दिया। अब गांव में भी एसी, फ्रिज और वॉशिंग मशीन आम हो गई हैं। लेकिन, यह सब बाहरी दिखावा है; अंदर से गांव की आत्मा खोखली हो रही है।
     इन कारणों से गांव की सोच में जो परिवर्तन आया, वह मौलिक है। पहले ग्रामीण सोच सामूहिकता पर आधारित थी पंचायत, जाति और परिवार। अब व्यक्तिवाद हावी हो गया है। युवा 'आत्मनिर्भर भारत' के नारे को अपनाते हुए शहरों की नौकरियों की दौड़ में हैं। वे खेती को घाटे का धंधा मानते हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत में 40% से अधिक युवा कृषि से बाहर हो चुके हैं। इन गांवों में सोच का यह बदलाव खान-पान से लेकर विवाह तक दिखता है। चूल्हे की रोटी अब स्टेटस सिंबल नहीं, बल्कि मजबूरी है। लड़कियां जींस-टॉप पहनकर कॉलेज जाती हैं, लड़के बाइक पर सवार होकर जिम जाते हैं। त्योहार अब ड्रोन शो और सेल्फी से सजे हैं, न कि सामूहिक भोज से। पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ी है प्लास्टिक कम, सोलर पैनल ज्यादा लेकिन यह शहरी प्रभाव है। गांव की सोच अब 'सस्टेनेबल डेवलपमेंट' की बात करने लगी है, जो पहले 'खेत की मिट्टी' तक सीमित थी। महिलाओं की सोच में सबसे बड़ा बदलाव आया। पहले घर-परिवार तक सीमित, अब वे स्वरोजगार, ऑनलाइन बिजनेस और राजनीति में उतर आई हैं। लेकिन, यह बदलाव चुनौतीपूर्ण है। पुरुष प्रधान मानसिकता अभी भी बाकी है, जिससे घरेलू कलह बढ़ा है। कुल मिलाकर, गांव की सोच अब हाइब्रिड हो गई। ग्रामीण मूल्य शहरी महत्वाकांक्षा के साथ।
       इस बदलते परिदृश्य में सबसे गहरा अंतर्द्वंद्व पीढ़ियों के बीच है। बुजुर्गों की पीढ़ी जिसने खेतों में पसीना बहाकर जीवन बिताया, नई पीढ़ी को समझ नहीं पाती। उनके लिए जींस पहनना पाप है, मोबाइल लत है। वे कहते हैं 'गांव का पानी पीने वाले शहर की हवा में कैसे सांस लेंगे?' वहीं युवा बुजुर्गों को रूढ़िवादी मानते हैं। विवाह का उदाहरण लें, बुजुर्ग जाति और गोत्र देखते हैं, युवा लव मैरिज और करियर मैच। एक परिवार में दादा जी चूल्हे पर चाय बनाते हैं, पोता स्टारबक्स कॉफी ऑर्डर करता है। यह फर्क शिक्षा से उपजा है। सरकारी स्कूलों से प्राइवेट इंग्लिश मीडियम तक का सफर सोच बदल गया। नतीजा यह हुआ कि घर में बहसें। बुजुर्ग परंपराओं की रक्षा करना चाहते हैं जैसे संयुक्त परिवार, लोकगीत और मेला। लेकिन, युवा न्यूक्लियर फैमिली और वेस्टर्न म्यूजिक की ओर। यह अंतर्द्वंद्व मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। बुजुर्ग अकेलापन महसूस करते हैं, युवा पहचान के संकट से जूझते हैं।
    एक सर्वे के अनुसार, ऐसे गांवों में डिप्रेशन के केस 30% बढ़े हैं। दो परंपराओं का संघर्ष भी ग्रामीण सामूहिकता बनाम शहरी व्यक्तिवाद है। गांव के मंदिर में पूजा होती है, लेकिन घर में नेटफ्लिक्स चलता है। यह टकराहट संस्कृति को लील रही है। फिर भी, आशा की किरण है। कई गांव होमस्टे, ऑर्गेनिक फार्मिंग और इको-टूरिज्म से अपनी पहचान जोड़ रहे हैं। नीतियां जैसे ग्रामीण उद्यमिता योजना इनकी मदद कर सकती हैं। लेकिन जरूरी है संवाद। पीढ़ियों को एक-दूसरे की सुनना होगा। बुजुर्गों को आधुनिकता अपनानी होगी, युवाओं को जड़ें। वरना ये गांव न शहर बनेंगे, न गांव बचेंगे बस एक उदासीन सीमा रह जाएगी। समाज को इस अंतर्द्वंद्व को समझना होगा, ताकि विकास संतुलित हो।
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विजय की 'रील' सफलता क्या 'रियल' में बदलेगी!

     तमिलनाडु की धरती पर राजनीति और सिनेमा का संबंध केवल व्यावसायिक नहीं, बल्कि भावनात्मक और ऐतिहासिक रहा है। यहाँ के मतदाताओं ने हमेशा परदे के नायकों में अपना मसीहा तलाशा है। हाल ही में तमिल सुपरस्टार विजय थलापति द्वारा 'तमिलगा वेत्री कड़गम' से राजनीति में प्रवेश ने इस चर्चा को फिर से जीवित कर दिया। सीएन अन्नादुरई से शुरू हुई यह परंपरा एमजीआर और जयललिता के दौर से होती हुई अब विजय के कंधों पर टिकी है। लेकिन, क्या विजय थलापति अपनी फिल्मी छवि और प्रशंसकों की फौज को एक ठोस राजनीतिक आधार में बदल पाएंगे!

- हेमंत पाल

     तमिलनाडु में 'राजनीति' और 'सिनेमा' का इतिहास बहुत पुराना है। इन दोनों पेशों के मिलन की नींव सीएन अन्नादुरई और एम करुणानिधि ने रखी थी। उन्होंने अपनी फिल्मों की पटकथाओं और संवादों के माध्यम से द्रविड़ विचारधारा को घर-घर पहुँचाया। यह वह दौर था जब सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक सुधार और राजनीतिक संदेश का सबसे सशक्त माध्यम बन गया था। इसके बाद एमजीआर (एमजी रामचंद्रन) ने इस परंपरा को एक नई ऊँचाई दी। एमजीआर ने अपनी फिल्मों में हमेशा एक ऐसे नायक की भूमिका निभाई, जो गरीबों का रक्षक, महिलाओं का सम्मान करने वाला और अन्याय के खिलाफ लड़ने वाला था। उनकी रील लाइफ की छवि इतनी प्रभावी थी कि जनता ने उन्हें 'मक्कल थिलागम' (जनता का लाडला) मान लिया। जयललिता ने भी इसी विरासत को आगे बढ़ाया। तमिल मतदाताओं के मानस पर इन सितारों का प्रभाव इतना गहरा था कि वे परदे के संघर्ष को वास्तविक मानने लगे और अपने पसंदीदा नायक को सत्ता की कुर्सी तक पहुँचा दिया।
     विजय थलापति इसी परंपरा की अगली और महत्वपूर्ण कड़ी हैं। विजय की फिल्मों का सफर अगर पिछले एक दशक में देखें, तो कत्थी, मेर्सल, सरकार और 'बीस्ट' जैसी फिल्मों ने उन्हें केवल एक अभिनेता नहीं, बल्कि एक व्यवस्था-विरोधी नायक के रूप में स्थापित किया। उनकी फिल्मों में अक्सर भ्रष्टाचार, कॉर्पोरेट लालच और किसानों की समस्याओं को उठाया गया। विजय ने बहुत ही चतुराई से अपनी फिल्मों के माध्यम से युवाओं के बीच अपनी पैठ बनाई। उनकी फिल्मों के गीत और संवाद सीधे तौर पर सत्ता को चुनौती देते नजर आए, जिससे उनके प्रशंसकों के बीच यह धारणा प्रबल हुई कि विजय ही वह व्यक्ति हैं जो उनके हक की लड़ाई लड़ सकते हैं। उनके 'विजय मक्कल इयक्कम' (प्रशंसक क्लब) ने वर्षों तक जमीनी स्तर पर समाज सेवा की, जिससे यह क्लब एक संगठित राजनीतिक कार्यबल में बदल गया।
    विजय थलापति का राजनीति में उतरना इसलिए भी साहसिक माना जा रहा है, क्योंकि उनके समकालीन और दिग्गज अभिनेता रजनीकांत और कमल हासन वह सफलता या प्रभाव नहीं दिखा सके, जिसकी उनसे उम्मीद थी। रजनीकांत ने वर्षों तक सस्पेंस बनाए रखने के बाद स्वास्थ्य कारणों से पीछे हटने का फैसला किया, वहीं कमल हासन की 'मक्कल निधि मय्यम' चुनावी मैदान में वह करिश्मा नहीं कर पाई जो एमजीआर या करुणानिधि के दौर में दिखता था। विजय ने अपने करियर के चरम पर फिल्मों को अलविदा कहकर राजनीति को पूर्णकालिक समय देने का निर्णय लिया। यह एक बड़ा जुआ है, जो उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। जहाँ रजनीकांत ने हिचकिचाहट दिखाई, वहीं विजय ने सीधे तौर पर 2026 के विधानसभा चुनावों को लक्ष्य बनाकर अपनी रणनीति स्पष्ट कर दी है।
   विजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि रील लाइफ में समस्याओं का समाधान ढाई घंटे में हो जाता है, लेकिन रियल लाइफ की राजनीति जटिल समीकरणों, जातिगत गणित और विचारधाराओं का खेल है। तमिलनाडु की राजनीति वर्तमान में द्रमुक और अन्नाद्रमुक के बीच ध्रुवीकृत है। विजय को केवल फिल्मी संवादों से इतर एक स्पष्ट वैचारिक ढांचा पेश करना होगा। क्या वे द्रविड़ राजनीति के पुराने ढर्रे पर चलेंगे या कोई नया विकल्प देंगे? प्रशंसकों को राजनीतिक कैडर में बदलना आसान नहीं होता। एक मतदाता के रूप में प्रशंसक वफादार हो सकते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के लिए बूथ स्तर के प्रबंधन की आवश्यकता होती है। सत्ताधारी दल और अन्य क्षेत्रीय शक्तियां विजय को एक 'पैराशूट लीडर' के रूप में चित्रित करने की कोशिश करेंगी। उनसे निपटने के लिए उन्हें प्रशासनिक समझ और नीतिगत स्पष्टता दिखानी होगी।
    विजय थलापति ने निश्चित रूप से तमिलनाडु की उस परंपरा को जीवित रखा है जहाँ सिनेमाई ग्लैमर सत्ता के गलियारों तक पहुँचने का रास्ता बनता है। उनकी लोकप्रियता और युवाओं का उनके प्रति आकर्षण निर्विवाद है। हालांकि, तमिलनाडु की जनता अब पहले से अधिक जागरूक है। वे अभिनेता को प्यार तो देते हैं, लेकिन वोट विकास और ठोस नीतियों के आधार पर देते हैं। क्या विजय थलापति एमजीआर की तरह इतिहास रच पाएंगे या वे केवल एक और लोकप्रिय अभिनेता बनकर रह जाएंगे जो राजनीति की गहराई को नहीं माप सके! इसका जवाब उनकी भविष्य की राजनीति देगी। फिलहाल, उन्होंने दक्षिण की राजनीति में एक नई हलचल पैदा कर दी और यह साबित किया कि तमिल राजनीति में अभी भी 'सिनेमा ही सत्ता' का सबसे बड़ा प्रवेश द्वार है।
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