Tuesday, April 28, 2026

अब छुपकर नहीं देखी जाती ‘ए’ फ़िल्में

      सिनेमा में ‘ए’ सर्टिफिकेट का नाम आते ही कभी एक सीमित, संकोच से भरी और विवादित छवि सामने आती थी। ऐसी फिल्में जिन्हें परिवार के साथ देखने योग्य नहीं माना जाता था। इन फिल्मों को देखने के लिए दर्शक अक्सर झिझकते थे या छुपकर सिनेमाघरों का रुख करते थे। लेकिन, समय के साथ दर्शकों की सोच, सिनेमा की भाषा और समाज की संवेदनशीलता में बड़ा बदलाव आया। आज वही ‘ए’ सर्टिफिकेट फिल्में न सिर्फ खुले तौर पर देखी जा रही हैं, बल्कि बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए रिकॉर्ड भी बना रही। यह बदलाव केवल सिनेमा का नहीं, बल्कि दर्शकों की मानसिकता में आए गहरे परिवर्तन का भी संकेत है।
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- हेमंत पाल

   फिल्म कई तरह की होती है। उन्हीं में से सामाजिक यानी सभी के देखने योग्य और 'ए' सर्टिफ़िकेट वाली फ़िल्में भी हैं, जिसके दर्शकों का एक अलग वर्ग होता है। फिल्म उद्योग में लंबे समय तक ‘ए’ श्रेणी की फिल्मों को लेकर एक अलग ही धारणा बनी रही। इन्हें मुख्यधारा से अलग, सीमित और अक्सर विवादास्पद माना जाता था। ‘ए’ सर्टिफिकेट का मतलब आमतौर पर अश्लीलता, अत्यधिक हिंसा या ऐसे विषयों से लगाया जाता था, जिन्हें समाज सहज रूप से स्वीकार नहीं करता था। यही कारण था कि इन फिल्मों का दर्शक वर्ग सीमित रह जाता था। परिवार के साथ फिल्म देखने की भारतीय परंपरा ने भी इस दूरी को और बढ़ाया। ऐसे में जो लोग इन फिल्मों में रुचि रखते थे, वे भी अक्सर इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करते थे। सिनेमाघरों में इन फिल्मों के शो कम होते थे और इनकी कमाई भी अपेक्षाकृत सीमित रहती थी। किंतु, यह तस्वीर धीरे-धीरे बदलने लगी। समाज के बदलते स्वरूप, डिजिटल युग के विस्तार और वैश्विक कंटेंट की पहुंच ने दर्शकों की सोच को व्यापक बनाया। अब दर्शक केवल हल्के-फुल्के मनोरंजन तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि वे ऐसी कहानियों की तलाश में हैं जो उन्हें झकझोरें, सोचने पर मजबूर करें और वास्तविकता के करीब हो। यही वह मोड़ था जहां ‘ए’ सर्टिफिकेट फिल्मों ने अपनी नई पहचान बनानी शुरू की।
   ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीय सिनेमा में वयस्क फिल्मों का एक लंबा और उतार-चढ़ाव भरा सफर रहा है। सत्तर और अस्सी के दशक में 'ए' रेटिंग वाली फिल्मों को अक्सर सामाजिक रूप से हेय दृष्टि से देखा जाता था। उस दौर में हिंसा या बोल्ड दृश्यों वाली फिल्मों को केवल एक विशेष वर्ग के दर्शकों तक सीमित माना जाता था। राज कपूर की 'सत्यम शिवम सुंदरम' जैसी फिल्मों ने जब कलात्मकता और वयस्क सामग्री के बीच की रेखा को छुआ, तो उन्हें लेकर काफी विवाद हुए। हालांकि, नब्बे के दशक के उत्तरार्ध और नई सहस्राब्दी की शुरुआत में 'मर्डर' और 'जिस्म' जैसी फिल्मों ने वयस्क श्रेणी में भी व्यावसायिक संभावनाओं के द्वार खोले। फिर भी, वे फिल्में आज के दौर की तुलना में एक छोटे दायरे में सिमटी हुई थीं। उस समय का दर्शक वर्ग डिजिटल क्रांति से अछूता था और सिनेमाघरों में ऐसी फिल्में देखने जाना एक प्रकार की हिचक पैदा करता था। लेकिन, समकालीन समय में सूचना तकनीक के विस्तार और वैश्विक सिनेमा तक आसान पहुंच ने भारतीय दर्शकों की परिपक्वता के स्तर को बढ़ाया है, जिसका सीधा असर अब बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों पर दिखाई दे रहा है।
     इस बदलाव की एक महत्वपूर्ण कड़ी 'उड़ता पंजाब' साबित हुई। नशे की समस्या जैसे गंभीर और असहज विषय को जिस ईमानदारी से इस फिल्म में दिखाया गया, उसने दर्शकों को यह एहसास कराया कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज का आईना भी हो सकता है। सेंसर बोर्ड से ‘ए’ सर्टिफिकेट मिलने के बावजूद फिल्म को सराहना और व्यावसायिक सफलता दोनों मिलीं। इसके बाद धीरे-धीरे बड़े सितारों ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाया। 'कबीर सिंह' इसका एक प्रमुख उदाहरण है। यह फिल्म अपने किरदारों की जटिलता और विवादास्पद व्यवहार के कारण चर्चा में रही। इसके बावजूद दर्शकों ने इसे बड़े पैमाने पर स्वीकार किया। इस फिल्म की सफलता ने यह स्पष्ट कर दिया कि ‘ए’ सर्टिफिकेट अब दर्शकों को सिनेमाघरों तक आने से नहीं रोकता, बल्कि अगर कहानी में दम हो, तो वह हर बाधा को पार कर सकती है। यह बदलाव अपने चरम पर तब पहुंचा, जब 'एनिमल' जैसी फिल्में सामने आईं। इस फिल्म ने हिंसा, मनोवैज्ञानिक जटिलताओं और रिश्तों के अंधेरे पहलुओं को बेहद तीव्र और अनगढ़ रूप में प्रस्तुत किया। पारंपरिक सिनेमा से हटकर इसकी शैली और कथानक ने दर्शकों को एक अलग अनुभव दिया। आलोचनाओं और विवादों के बावजूद फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अभूतपूर्व सफलता हासिल की। यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि आज का दर्शक जोखिम लेने वाले सिनेमा को भी पूरी तरह स्वीकार कर रहा है।
    इस क्रम में 'द केरल स्टोरी' और 'द कश्मीर फाइल्स' जैसी फिल्मों ने यह साबित किया कि संवेदनशील और विवादास्पद विषय भी दर्शकों को आकर्षित करते हैं। इन फिल्मों ने समाज और इतिहास के ऐसे पहलुओं को सामने रखा, जिन पर अक्सर खुलकर चर्चा नहीं होती थी। दर्शकों ने न केवल इन फिल्मों को देखा, बल्कि इनके साथ भावनात्मक रूप से भी जुड़ाव महसूस किया। इनकी बॉक्स ऑफिस सफलता इस बात का प्रमाण है कि अब दर्शक कठिन और असहज विषयों से दूर नहीं भागते। दर्शक अब फिल्मों में केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि सच्चाई, गहराई और विविधता भी चाहता है। यही कारण है कि ‘ए’ सर्टिफिकेट फिल्में अब एक नए आत्मविश्वास के साथ बनाई जा रही हैं। 'ओएमजी 2' इस बदलाव का एक अलग और सकारात्मक उदाहरण है। यह फिल्म न तो अत्यधिक हिंसक थी और न पारंपरिक अर्थों में ‘बोल्ड’, लेकिन इसके विषय की संवेदनशीलता के कारण इसे ‘ए’ सर्टिफिकेट मिला। इसके बावजूद फिल्म ने दर्शकों के बीच अच्छी पकड़ बनाई और व्यावसायिक रूप से सफल रही। इसने यह साबित किया कि ‘ए’ सर्टिफिकेट केवल एक सीमा नहीं, बल्कि एक अवसर भी हो सकता है, ऐसे विषयों को प्रस्तुत करने का, जो समाज के लिए महत्वपूर्ण हैं।
    हाल के सालों में 'धुरंधर 2' जैसी फिल्मों ने तो इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया कि ‘ए’ सर्टिफिकेट फिल्में केवल सीमित कमाई कर सकती हैं। इस तरह की फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर नए रिकॉर्ड स्थापित किए हैं और यह दिखाया कि यदि कंटेंट मजबूत हो, तो दर्शक हर तरह की फिल्म को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। अब यह श्रेणी केवल प्रयोगात्मक या सीमित नहीं रह गई, बल्कि मुख्यधारा का हिस्सा बन चुकी है। हालांकि, यह बदलाव अचानक नहीं आया। इसके बीज पहले ही बोए जा चुके थे। 'सत्या' और 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' जैसी फिल्मों ने अपने समय में ही यह संकेत दे दिया था कि दर्शक मजबूत कहानी और यथार्थवादी प्रस्तुति को पसंद करते हैं, भले ही वह ‘ए’ सर्टिफिकेट के साथ क्यों न आए। इन फिल्मों ने आने वाली पीढ़ी के फिल्मकारों को यह भरोसा दिया कि वे बिना किसी समझौते के अपनी कहानियां कह सकते हैं। आज की स्थिति यह है कि दर्शक अब ‘ए’ सर्टिफिकेट को किसी नकारात्मक नजरिए से नहीं देखते। पहले जहां लोग ऐसी फिल्मों को छुपकर देखते थे, वहीं अब वे खुलकर सिनेमाघरों में जाकर इन्हें देखते हैं, इन पर चर्चा करते हैं और सोशल मीडिया पर अपनी राय भी साझा करते हैं। यह बदलाव केवल देखने के तरीके में नहीं, बल्कि सोच और स्वीकृति में आया है।
   वयस्क श्रेणी की सफलता का शिखर तब देखने को मिला, जब रणबीर कपूर की फिल्म 'एनिमल' परदे पर उतरी। इस फिल्म ने हिंसक चित्रण और विवादास्पद संवादों के कारण खूब सुर्खियां बटोरीं। पूर्णतः वयस्क सामग्री होने के बाद भी 'एनिमल' ने बॉक्स ऑफिस पर सुनामी ला दी। 917.82 करोड़ की कमाई का विश्वव्यापी संग्रह यह बताने के लिए पर्याप्त है, कि आज का सिनेमाई बाजार कितना विशाल हो गया। संदीप रेड्डी वांगा ने इस फिल्म के माध्यम से साबित किया कि एक निर्देशक अपनी दृष्टि को बिना किसी काट-छांट के पेश कर सकता है और दर्शक उसे हाथों-हाथ लेंगे। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए 'धुरंधर' और उसकी अगली कड़ी 'धुरंधर 2' ने तो कमाई के सारे पुराने रिकॉर्ड ही ध्वस्त कर दिए। 'धुरंधर' ने जहां करीब 1,500 करोड़ रुपए का कारोबार किया था, वहीं 'धुरंधर 2' ने रिलीज के महज एक महीने के भीतर 1,737.74 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया। ये आंकड़े बताते है, कि वयस्क फिल्में अब केवल एक वर्ग विशेष की पसंद नहीं रह गई, बल्कि वे व्यापक जनसमूह तक अपनी पहुंच बना चुकी हैं।
      ‘ए’ श्रेणी की फिल्मों ने अपने दम पर यह साबित कर दिया कि यदि कहानी सशक्त हो, तो वह हर बाधा को पार कर सकती है। एनिमल, द केरल स्टोरी, ओएमजी 2 और 'धुरंधर 2' जैसी फिल्मों की सफलता इस परिवर्तन का जीवंत प्रमाण है। आने वाले समय में यह प्रवृत्ति और मजबूत होने की संभावना है। दर्शक अब केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि विचार और अनुभव भी चाहते हैं। ऐसे में ‘ए’ श्रेणी की फिल्में भारतीय सिनेमा को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेंगी। यह कहा जा सकता है, कि ‘ए’ सर्टिफिकेट फिल्मों का यह उभार भारतीय सिनेमा के परिपक्व होने का संकेत है। अब फिल्म की सफलता उसके सर्टिफिकेट से नहीं, बल्कि उसकी कहानी, प्रस्तुति और भावनात्मक प्रभाव से तय होती है। दर्शक अब केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अनुभव और विचार भी चाहते हैं। ऐसे में ‘ए’ श्रेणी की फिल्में सिनेमा को एक नई दिशा दे रही हैं, जहां सीमाएं टूट रही हैं और कहानियां अपने सबसे सच्चे रूप में सामने आ रही हैं। आने वाले समय में यह प्रवृत्ति और मजबूत होगी, और संभव है कि ‘ए’ सर्टिफिकेट की परिभाषा पूरी तरह बदल जाए, एक ऐसी पहचान के रूप में, जो साहस, सच्चाई और रचनात्मक स्वतंत्रता का प्रतीक हो।
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रिश्तों में नोकझोंक के दिलचस्प कथानक

   हिंदी सिनेमा को भारतीय समाज का दर्पण माना जाता रहा है। फिल्मों में दिखाई जाने वाली पारिवारिक कहानियां केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने समाज के रिश्तों, मूल्यों और संघर्षों को भी चित्रित किया। विशेष रूप से पति-पत्नी के रिश्तों में आने वाला तनाव और नोकझोंक फिल्मों का एक प्रमुख विषय रहे हैं। भारतीय सिनेमा ने हमेशा समाज के रिश्तों को परदे पर उतारने की कोशिश की है। पति-पत्नी के रिश्ते को लेकर हिंदी फिल्मों में लंबे समय से कहानियां रची जाती रही हैं। ब्लैक एंड व्हाइट दौर से लेकर आज के रंगीन और आधुनिक दौर तक कई फिल्मों के कथानक वैवाहिक जीवन के तनाव, गलतफहमियों, आपसी अहं और भावनात्मक टकराव के इर्द-गिर्द बुने गए हैं। लेकिन, रब ने बना दी जोड़ी, मर्दानी और 'तुम्हारी सुलू' जैसी फ़िल्में भी हैं जो रिश्तों में आपसी समझ दर्शाती हैं। 
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- हेमंत पाल

     ब्लैक एंड व्हाइट दौर से लेकर रंगीन सिनेमा और आधुनिक फिल्मों तक, कई फिल्मकारों ने पति-पत्नी के बीच के मतभेदों, गलतफहमियों, आर्थिक संकट, सामाजिक दबाव, तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण पैदा होने वाले तनाव को परदे पर उतारा है। इन फिल्मों में रिश्तों की कड़वाहट को दिखाया गया। लेकिन, दिलचस्प बात यह रही कि इनका अंत अक्सर सुखद और मेल-मिलाप से भरा हुआ होता था। समय के साथ समाज में वैवाहिक संबंधों की जटिलताएं बढ़ीं, लेकिन विडंबना यह है कि हिंदी सिनेमा से पति-पत्नी के तनावपूर्ण रिश्तों की पारंपरिक पारिवारिक कहानियां धीरे-धीरे कम होती चली गईं। आज की फिल्मों में प्रेम, ब्रेकअप या लिव-इन जैसे विषयों पर अधिक ध्यान है, जबकि विवाह के भीतर के संघर्षों पर आधारित पारिवारिक कथानक अपेक्षाकृत कम देखने को मिलते हैं।
   1950 और 1960 के दशक हिंदी सिनेमा का स्वर्णिम दौर माना जाता है। इस समय की फिल्मों में पारिवारिक रिश्तों की गहराई और सामाजिक मूल्यों को प्रमुखता से दिखाया गया। इस दौर में पति-पत्नी के बीच तनाव अक्सर सामाजिक परिस्थितियों, आर्थिक तंगी या पति के गलत निर्णयों के कारण पैदा होता था। फिल्मों में पत्नी को अक्सर धैर्य, त्याग और सहनशीलता का प्रतीक बनाया गया। फिल्म 'साहिब बीबी और गुलाम' (1962) में एक ऐसे जमींदार परिवार की कहानी दिखाई गई, जहां पति की शराब और अय्याशी की आदत पत्नी के जीवन को दुखों से भर देती हैं। पत्नी अपने पति का प्रेम पाने के लिए संघर्ष करती है, लेकिन उसका जीवन त्रासदी में बदल जाता है। इसी तरह 'घराना' (1961) और 'गृहस्थी' (1963) जैसी फिल्मों में संयुक्त परिवार और वैवाहिक जीवन के संघर्षों को संवेदनशील तरीके से दिखाया गया। इन फिल्मों की खास बात यह थी कि भले ही पति-पत्नी के बीच मतभेद दिखाए जाते थे, लेकिन परिवार और समाज के दबाव के कारण अंततः रिश्ते को बचाने की कोशिश होती थी।

   हिंदी फिल्मों में कई बार आर्थिक संकट को पति-पत्नी के रिश्तों में तनाव की बड़ी वजह के रूप में दिखाया गया। 1970 और 1980 के दशक की कई फिल्मों में मध्यमवर्गीय परिवारों के संघर्ष को दिखाया गया। बेरोजगारी, कम आय, बढ़ती जिम्मेदारियाँ और सामाजिक दबाव पति-पत्नी के बीच तनाव पैदा करते थे। लेकिन, 'अभिमान' (1973) में अलग तरह की कहानी रची गई। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी के अहं का टकराव दोनों में अलग होने की वजह बन जाता है। फिल्म में पति-पत्नी दोनों ही गायक हैं, लेकिन पत्नी की सफलता पति के अहंकार को चोट पहुंचाती है और रिश्ते में दरार पैदा हो जाती है। यह कहानी बताती है कि पेशेवर प्रतिस्पर्धा भी वैवाहिक जीवन को प्रभावित कर सकती है। इसी तरह 'आंधी' (1975) में राजनीतिक महत्वाकांक्षा और व्यक्तिगत जीवन के बीच टकराव को दिखाया गया। पति-पत्नी अलग हो जाते हैं, लेकिन सालों बाद उनके रिश्ते की भावनात्मक गहराई सामने आती है।
    हिंदी फिल्मों में पति-पत्नी के बीच तनाव का एक प्रमुख कारण तीसरे व्यक्ति का आ जाना भी रहा है फिल्म 'अर्थ' (1982) में विवाहेतर संबंधों के कारण टूटते रिश्तों की कहानी दिखाई गई। जिसमें पत्नी अपने आत्मसम्मान के लिए पति से अलग होने का निर्णय लेती है। यह उस दौर की फिल्मों से अलग था जहां  अंत में मेल-मिलाप दिखाया जाता था। इसी तरह अमिताभ, रेखा और जया की फिल्म 'सिलसिला' (1981) में प्रेम, विवाह और समाज के बीच उलझे रिश्तों को दिखाया गया। इस फिल्म में भी पति-पत्नी के बीच तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी रिश्तों में तनाव पैदा करती है। इन फिल्मों ने यह दिखाया कि विवाह केवल सामाजिक संस्था नहीं बल्कि भावनात्मक और व्यक्तिगत संघर्षों से भी भरा होता है।
   1950 और 1960 के दशक के ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा में भी पति-पत्नी के रिश्तों की जटिलता को संवेदनशील तरीके से दिखाया गया। उदाहरण के तौर पर में एक उपेक्षित पत्नी की पीड़ा और पति की उदासीनता को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया था। इसी तरह में विवाह के बाद भी पुराने प्रेम संबंधों की वजह से पैदा हुए तनाव को भी कथानक बनाया गया। इन फिल्मों में रिश्तों के भीतर की खामोश दरारों को सामाजिक मर्यादाओं के साथ चित्रित किया गया। 1970 और 1980 के दशक में वैवाहिक रिश्तों की उलझनों को और खुलकर दिखाया गया। इन फिल्मों में पति के विवाहेतर संबंध के कारण टूटने वाले रिश्ते और पत्नी के आत्मसम्मान की कहानी सामने आई। वहीं में प्रेम, विवाह और सामाजिक जिम्मेदारियों के बीच संघर्ष को दर्शाया गया। इन फिल्मों में तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी अक्सर पति-पत्नी के बीच तनाव का मुख्य कारण बनती है।
    दिलचस्प बात यह है कि अधिकांश हिंदी फिल्मों में भले ही कहानी का बड़ा हिस्सा पति-पत्नी के कटु रिश्तों, गलतफहमियों या किसी तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी से पैदा हुए तनाव पर आधारित रहा हो, लेकिन उनका अंत अक्सर सुखद ही रहा। फिल्मकारों ने अंत में रिश्तों के पुनर्मिलन, समझदारी या आत्मबोध के जरिए एक सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की। दरअसल, हिंदी सिनेमा का यह रुझान भारतीय समाज की उस सोच को भी दर्शाता है जिसमें विवाह को केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि एक सामाजिक संस्था माना जाता है। इसलिए फिल्में रिश्तों के संकट को दिखाती जरूर हैं, लेकिन अंत में उन्हें संभालने की उम्मीद भी छोड़ती हैं। यही कारण है कि ब्लैक एंड व्हाइट दौर से लेकर आज तक पति-पत्नी के तनावपूर्ण रिश्ते हिंदी फिल्मों की कहानियों का अहम हिस्सा बने हुए हैं।
    कुछ फिल्मों में मुस्लिम सामाजिक कथानक के भीतर तलाक या अलगाव की स्थिति को भी दिखाया गया। इसका प्रमुख उदाहरण है, जिसमें रिश्तों में संवेदनशीलता और गलतफहमी के कारण तलाक की स्थिति पैदा होती है। हालांकि कहानी अंततः रिश्तों और जिम्मेदारियों पर गंभीर सवाल भी खड़े करती है। नई सदी में भी यह विषय खत्म नहीं हुआ। और जैसी फिल्मों ने आधुनिक वैवाहिक जीवन में सम्मान, अपेक्षाओं और भावनात्मक दूरी को केंद्र में रखा। हिंदी सिनेमा में मुस्लिम सामाजिक फिल्मों की भी एक अलग परंपरा रही है। इन फिल्मों में विवाह, तलाक और सामाजिक मान्यताओं से जुड़े मुद्दों को दिखाया गया। फिल्म 'निकाह' (1982) इस संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें तलाक और वैवाहिक रिश्तों की जटिलताओं को संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया गया। फिल्म ने यह सवाल उठाया कि क्या तलाक केवल एक कानूनी प्रक्रिया है या इसके पीछे भावनात्मक और सामाजिक दर्द भी छिपा होता है। 
    हिंदी फिल्मों की एक प्रमुख विशेषता यह रही कि अधिकांश पारिवारिक फिल्मों का अंत सुखद होता था भले ही कहानी में पति-पत्नी के बीच कितने भी संघर्ष दिखाए जाएं, अंत में गलतफहमियां दूर हो जाती थीं और परिवार फिर से एक हो जाता था। इस प्रवृत्ति के पीछे भारतीय समाज की पारिवारिक संरचना और विवाह संस्था के प्रति सम्मान की भावना थी। दर्शक भी ऐसी कहानियां पसंद करते थे जिनमें अंत में रिश्ते बच जाते थे। यही कारण है कि 1960 से 1990 तक की कई फिल्मों में संघर्ष के बावजूद अंत में मेल-मिलाप दिखाई देता था। 1990 के बाद हिंदी सिनेमा में बड़े बदलाव आए। ग्लोबलाइजेशन, शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण फिल्मों के विषय भी बदलने लगे। इस दौर में रोमांटिक प्रेम कहानियां और युवा दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई गई फिल्में अधिक लोकप्रिय हुईं। हालांकि, 'अस्तित्व' (2000) जैसी कुछ फिल्मों ने विवाह के भीतर की जटिलताओं को गंभीरता से उठाया, लेकिन ऐसी फिल्में मुख्यधारा में कम ही बनीं। धीरे-धीरे पारिवारिक संघर्षों पर आधारित पारंपरिक कथानक सिनेमा से गायब होने लगे।
    आज समाज में तलाक, वैवाहिक विवाद और पारिवारिक तनाव पहले से अधिक दिखाई देते हैं। शहरी जीवन, करियर का दबाव, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के कारण पति-पत्नी के रिश्ते अधिक जटिल हो गए हैं। लेकिन, आश्चर्य की बात यह है कि हिंदी सिनेमा इन विषयों को इतनी गहराई से नहीं दिखा रहा जितना पहले दिखाया जाता था। अब फिल्मों में विवाह के बाद के संघर्षों की जगह प्रेम-कहानियों, ब्रेकअप या व्यक्तिगत स्वतंत्रता की कहानियों को अधिक महत्व दिया जा रहा है। हिंदी सिनेमा का इतिहास बताता है कि फिल्में हमेशा समाज के बदलावों के साथ बदलती रही हैं। संभव है कि आने वाले समय में फिल्मकार फिर से वैवाहिक रिश्तों की जटिलताओं को गंभीरता से पर्दे पर लाएँ। क्योंकि पति-पत्नी का रिश्ता भारतीय समाज की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है और इसमें आने वाले संघर्ष हमेशा कहानी कहने के लिए मजबूत आधार प्रदान करते हैं। यदि इन विषयों को संवेदनशीलता और यथार्थ के साथ प्रस्तुत किया जाए, तो वे दर्शकों को न केवल मनोरंजन बल्कि समाज को समझने का अवसर भी दे सकते हैं।
    ऐसी फिल्मों ने पति-पत्नी के रिश्तों को केवल पारिवारिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक विमर्श का विषय भी बनाया। कई फिल्मों में पति-पत्नी के बीच तनाव का कारण बच्चों की जिम्मेदारियां और परिवार की अपेक्षाएं भी रही हैं। फिल्म 'मासूम' (1983) में पति के अतीत से पैदा हुआ एक बच्चा परिवार में तनाव का कारण बनता है। पत्नी के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि क्या वह उस बच्चे को स्वीकार कर पाएगी। हिंदी सिनेमा ने ब्लैक-एंड-व्हाइट दौर से लेकर आधुनिक समय तक पति-पत्नी के रिश्तों की कई परतों को परदे पर उकेरा है। कभी आर्थिक संघर्ष, कभी अहंकार, कभी तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी और कभी पारिवारिक जिम्मेदारियों ने इन रिश्तों में तनाव पैदा किया। इन कहानियों की सबसे खास बात यह रही कि वे केवल संघर्ष नहीं दिखाती थीं, बल्कि रिश्तों को बचाने की कोशिश भी करती थीं। आज जबकि समाज में वैवाहिक रिश्तों की चुनौतियां बढ़ रही हैं, हिंदी सिनेमा के सामने यह अवसर है कि वह फिर से ऐसे विषयों को गंभीरता से उठाए और रिश्तों की जटिलताओं को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करे। क्योंकि, अंततः सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज के भावनात्मक इतिहास को दर्ज करने का भी माध्यम है।
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सिनेमा में राम का चेहरा और विवाद


    भारतीय सिनेमा में पौराणिक कथाएं हमेशा सिर्फ मनोरंजन नहीं रहीं, वे आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान का आईना भी रही हैं। जब भी 'रामायण' जैसी किसी भव्य फिल्म की घोषणा होती है, तो उसके साथ अपेक्षाओं और विवादों का एक लंबा सिलसिला भी जुड़ जाता है। फ़िलहाल रणबीर कपूर को राम के रूप में देखने पर जो बहस छिड़ी, वह नई नहीं है। इसकी जड़ें सिनेमा के शुरुआती दौर, यानी ब्लैक एंड व्हाइट युग तक जाती हैं। राम, कृष्ण या किसी भी पौराणिक पात्र को निभाना सिर्फ एक भूमिका नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक जिम्मेदारी बन जाता है। यही कारण है कि जब रणबीर कपूर जैसे अभिनेता को भगवान राम के रूप में कास्ट किया जाता है, तो दर्शक उसे अभिनेता नहीं, आदर्श पुरुष के रूप में देखने लगते हैं। इसी अपेक्षा और वास्तविकता के बीच का अंतर विवाद को जन्म देता है।
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● हेमंत पाल

     भारतीय सिनेमा में रामायण जैसे पौराणिक महाकाव्यों को चित्रित करने की परंपरा शुरुआती दौर से चली आ रही है। लेकिन, हर दौर से ऐसे प्रयास विवादों की भेंट चढ़ते रहे। नितेश तिवारी की आने वाली मेगा बजट फिल्म 'रामायण' के टीजर से उपजे विवाद इसकी ताजा मिसाल हैं, जहां रणबीर कपूर को 'राम' बनाने पर उनके पुराने बयानों और फ़िल्मी लुक को लेकर बहस छिड़ गई। ब्लैक एंड व्हाइट दौर से लेकर आज तक आस्था, व्याख्या और कलाकारों की पृष्ठभूमि ने इन विवादों को और गहरा दिया। शुरुआती सालों में पौराणिक फिल्मों का विशेष स्थान था। 1930 से 1950 के बीच बनी फिल्मों में राम, कृष्ण और शिव जैसे किरदारों को निभाने वाले कलाकारों को दर्शक सचमुच देवता मान बैठते थे। फिल्म 'राम राज्य' इसका सबसे बड़ा उदाहरण कहा जाता है। इस फिल्म में प्रेम अदीब ने राम की भूमिका निभाई थी। कहा जाता है कि लोग उन्हें सचमुच भगवान मानकर उनके चरण छूते थे। महात्मा गांधी ने भी इस फिल्म को देखा था जो अपने आप में इसकी सांस्कृतिक स्वीकार्यता को दर्शाता है। जब किसी अभिनेता की निजी जिंदगी में कोई असंगत बात सामने आती, तो लोग उसे उस पवित्र छवि के खिलाफ मानते। 
     विवाद का बीज तब से आज तक वही है कि देवता का किरदार निभाने वाला व्यक्ति खुद कितना ‘देवत्व’ रखता है! 1987 में 'रामायण' के प्रसारण ने इस भाव को चरम पर पहुंचा दिया। अरुण गोविल राम के रूप में इतने लोकप्रिय हुए कि लोग उन्हें सड़कों पर भी भगवान की तरह पूजते थे। यही वह दौर था, जिसने एक फिक्स्ड इमेज बना दी। राम का चेहरा कैसा होना चाहिए, उनका व्यवहार कैसा होना चाहिए। आज जब रणबीर कपूर को इस भूमिका में देखा जाता है, तो तुलना अनिवार्य हो जाती है। भारतीय सिनेमा की पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' (1913) से ही पौराणिक किरदारों पर ऐसा विवाद शुरू हो गया था, जहां सत्यनिष्ठा की कथा को लेकर धार्मिक समूहों ने सत्यनिष्ठा पर सवाल उठाए और मामला अदालत तक पहुंचा। 1920-30 के दशक में रामायण प्रेरित फिल्में जैसे 'वीर रामायणम' (1923) आईं, लेकिन इनकी व्याख्या पर पारंपरिक विद्वानों ने आपत्ति जताई। क्योंकि, महाकाव्य की घटनाओं को नाटकीय रूप देने को अपमान माना गया। ब्लैक एंड व्हाइट दौर में 'भक्त विदुर' (1921) को ब्रिटिश सरकार ने बैन कर दिया था, क्योंकि विदुर का चरित्र महात्मा गांधी से मिलता-जुलता था, जो राजनीतिक संवेदनशीलता का उदाहरण था।
   1943 में रिलीज हुई 'राम राज्य' एक सफल रामायण-अनुकूलन फिल्म थी। लेकिन, कुछ धार्मिक समूहों ने राम-राज्य की अवधारणा को राजनीतिक रूप देने का आरोप लगाया। 1948 की 'राम राज्य' (विजय भट्ट निर्देशित) में प्रेम अधिकारी राम बने, लेकिन सती प्रथा या सीता के त्याग जैसे दृश्यों पर सामाजिक बहस छिड़ी। इस दौर में पौराणिक फिल्में लोकप्रिय तो हुईं, पर आस्था के नाम पर सेंसरशिप और सामाजिक बहिष्कार आम थे, जो सिनेमा को धार्मिक मान्यताओं के दायरे में बांधने का प्रयास था। ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों में भी अभिनेताओं का चयन आस्था से जुड़ा रहा। 1987 के रामानंद सागर के धारावाहिक 'रामायण' ने अरुण गोविल को अमर कर दिया। लेकिन, सीता के धरती में समा जाने के बाद आगे की कथा दिखाने से इनकार पर दर्शकों ने विरोध किया, जो 10 साल चला। 'आदि पुरुष' (2023) में प्रभास के राम के किरदार और वीएफएक्स पर भारी विवाद हुआ था। यहां तक कि फिल्म के डायलॉग तक बदलने पड़े और बॉक्स ऑफिस पर भी फिल्म को भारी असफलता मिली। यहां तक कि सीता को 'भारत की बेटी' दिखाने पर नेपाल में फिल्म पर बैन की मांग उठी, जो सीता-जन्मस्थली विवाद को उजागर करता है।
वर्तमान 'रामायण' का विवाद-केंद्र
     नितेश तिवारी की 'रामायण' (बजट 4000 करोड़) का टीजर हनुमान जयंती पर रिलीज होने से पहले ही विवादास्पद हो गया। रणबीर कपूर के राम लुक पर सुनील लहरी (पुराने लक्ष्मण) ने कहा कि 'एनिमल' की क्रूरता के बाद उनमें राम की मासूमियत नहीं है। रणबीर का पुराना 'बीफ लवर' वाला बयान भी वायरल हुआ, जिस पर सोशल मीडिया ने उन्हें अयोग्य ठहराया। फिल्म का टीजर भारत से पहले अमेरिका में पहले दिखाए जाने पर भी भारतीय दर्शकों ने भावनाओं से ठेस पहुंचने का आरोप लगाया। वीएफएक्स और मोशन कैप्चर पर सवाल उठे। फिल्मकार को 'आदि पुरुष' जैसे फूहड़ प्रयोग से सबक लेने की मांग की गई। सद्गुरु ने रणबीर पर अतीत का हवाला देकर सवाल किया, लेकिन यश (रावण) की प्रशंसा की। रणबीर ने स्वीकारा कि भूमिका से पहले इनकार किया था, लेकिन पिता बनने और निर्देशक के विजन से वे राजी हुए और उन्होंने मांसाहार छोड़ दिया। 
    आज की ‘रामायण’ सिर्फ कहानी नहीं, एक विजुअल स्पेक्टेकल बनने जा रही है। मोशन कैप्चर, एआई और हाई-एंड वीएफएक्स का उपयोग इसे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाता है। लेकिन, भारतीय दर्शक अभी भी भावनात्मक जुड़ाव को तकनीकी चमत्कार से ऊपर रखते हैं। यही कारण है कि 'आदि पुरुष' में तकनीक होने के बावजूद भावनात्मक कनेक्ट की कमी खल गई। फिल्म की कास्ट में साई पल्लवी सीता, सनी देओल हनुमान, रवि दुबे लक्ष्मण बने हैं। फिल्म का पहला पार्ट दिवाली 2026 और पार्ट-2 की अगले साल रिलीज संभावित है।
    ब्लैक एंड व्हाइट दौर में फिल्म 'कर्मा' (1933) के सीन पर भी बवाल हुआ था, वहीं पेरियार की 'सच्ची रामायण' पर बैन लगा दिया गया था। 'पद्मावत' में सती-गौरवण पर विवाद आधुनिक उदाहरण है। ये विवाद आस्था बनाम अभिव्यक्ति की टकराहट दिखाता हैं। रामानंद सागर के पुत्र मोती सागर ने नई 'रामायण' से तुलना को गलत ठहराया। रणबीर कपूर के मामले में विवाद का एक बड़ा कारण उनकी पिछली फिल्मों की छवि भी है। 'एनिमल' जैसी फिल्म में उनके आक्रामक किरदार को देखकर दर्शकों को उनके 'मर्यादा पुरुषोत्तम' के किरदार में देखना भी कठिन लग रहा है। लेकिन, यही अभिनय की मूल प्रकृति है। एक कलाकार कई रूपों में ढल सकता है। इस पर सद्गुरु का दृष्टिकोण उल्लेखनीय है, जिसमें वे कहते हैं कि अभिनेता को उसके पिछले किरदारों से बांधना उचित नहीं है। ये विवाद सिनेमा को सेंसरशिप और सोशल मीडिया ट्रोलिंग के जाल में फंसा देते हैं।
    ब्लैक एंड व्हाइट से आज के डिजिटल युग तक, पौराणिक किरदारों की व्याख्या आस्था की कसौटी पर कसी जाती है। नितेश तिवारी जैसे निर्देशक 'दंगल' की सफलता से प्रेरित होकर भव्यता लाएं, तो दर्शक स्वीकार करेंगे। सिनेमा को धार्मिक ग्रंथों से प्रेरणा लेनी चाहिए, लेकिन संवेदनशीलता भी बनाए रखना होगा। दरअसल, आज का दर्शक दो हिस्सों में बंटा है। एक वर्ग परंपरा और आस्था को प्राथमिकता देता है, दूसरा वर्ग तकनीक और नए प्रयोगों को स्वीकार करता है। नमित मल्होत्रा और नितेश तिवारी की चुनौती यही है, कि वे इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करें। इतिहास गवाह है कि हर दौर में पौराणिक किरदारों को लेकर विवाद हुए। चाहे वह राम राज्य हो, रामायण हो या आज की 'रामायण।' समय ही तय करता है कि कौन-सा चित्रण दर्शकों के दिल में बसता है। हो सकता है कि आज जिस रणबीर कपूर को लेकर विवाद हो रहा है, वही आने वाले समय में राम के एक नए, आधुनिक और स्वीकार्य चेहरे के रूप में स्थापित हो जाएं। सिनेमा बदल रहा है, तकनीक बदल रही है, लेकिन आस्था का मूल भाव वही है और शायद यही इस बहस की असली खूबसूरती भी! इस विवाद का अंत तभी होगा, जब दर्शक रणबीर कपूर को 'रामायण' में देखेंगे। तभी पता चलेगा कि दर्शकों ने उन्हें 'मर्यादा पुरुषोत्तम' के रूप में स्वीकारा या रणबीर कपूर की तरह ही देखा!   
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बॉक्स ऑफिस पर ढेर, दिग्गजों के सपने

     हिंदी सिनेमा के सौ से भी ज्यादा सालों के सफर में हम अक्सर उन ऊंचाइयों की बात करते हैं जिन्हें शोले, मुगल-ए-आजम या 'दंगल' जैसी फिल्मों ने छुआ। बॉक्स ऑफिस के आंकड़े, करोड़ों का कारोबार और जुबली के जश्न फिल्मी गलियारों की रौनक बढ़ाते हैं। लेकिन, इस चमक-धमक के पीछे एक स्याह कोना और भी है, जहाँ उन फिल्मों का ढेर लगा है जिन्हें दर्शकों ने सिरे से नकार दिया। किसी भी कला के इतिहास में असफलता उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी सफलता, क्योंकि हर फ्लॉप फिल्म फिल्मकारों के लिए एक सबक छोड़कर जाती है। जानिए, आखिर वे कौन सी बड़ी फिल्में थीं जो अपनी भारी-भरकम लागत और बड़े सितारों के बावजूद दर्शकों के दिल तक पहुँचने में नाकाम रहीं।

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- हेमंत पाल


    हिंदी सिनेमा के सौ से भी ज्यादा सालों के शानदार सफर में हम अक्सर उन ऊंचाइयों की चर्चा करते हैं जिन्हें 'शोले', 'मुगल-ए-आजम' या 'दंगल' जैसी फिल्मों ने छुआ। बॉक्स ऑफिस के जादुई आंकड़े, करोड़ों का कारोबार और सिल्वर जुबली के जश्न फिल्मी गलियारों की रौनक बढ़ाते हैं। लेकिन इस चकाचौंध के पीछे एक स्याह और खामोश कोना और भी है, जहाँ उन फिल्मों का ढेर लगा है जिन्हें दर्शकों ने सिरे से नकार दिया। किसी भी कला के इतिहास में असफलता उतनी ही महत्वपूर्ण और कड़वी होती है जितनी सफलता मीठी, क्योंकि हर फ्लॉप फिल्म फिल्मकारों के लिए एक सबक और दर्शकों के बदलते मिजाज का आईना छोड़कर जाती है। आज हम फिल्म इतिहास के उसी 'विफल' अध्याय को पलटेंगे और समझेंगे कि आखिर वे कौन सी महत्वाकांक्षी फिल्में थीं जो भारी-भरकम बजट, चमचमाते सितारों और दिग्गज निर्देशकों के बावजूद दर्शकों के दिल के दरवाजे तक पहुँचने में बुरी तरह नाकाम रहीं।
     भारतीय सिनेमा में असफलता की पहली सबसे बड़ी और ऐतिहासिक गूंज तब सुनाई दी, जब 'शोमैन' राज कपूर ने अपना सब कुछ दांव पर लगाकर 'मेरा नाम जोकर' बनाई थी। आज भले ही हम इसे एक 'कल्ट क्लासिक' मानते हैं और इसकी दार्शनिकता की मिसाल देते हैं, लेकिन 1970 में जब यह रिलीज हुई, तो इसे भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी व्यापारिक आपदाओं में गिना गया। दर्शकों ने इसके भारी-भरकम साढ़े चार घंटे के रनटाइम और फिल्म की अत्यधिक दार्शनिक गंभीरता को स्वीकार नहीं किया। फिल्म का कथानक एक सर्कस के जोकर के जीवन के तीन पड़ावों और उसकी असफल प्रेम कहानियों के इर्द-गिर्द घूमता था। उस दौर का दर्शक जो परदे पर चटख मनोरंजन और रफ़्तार देखने का आदी था, उसे एक जोकर का लंबा दुःख और उसकी लंबी दास्तान बहुत उबाऊ लगी। फिल्म की लंबाई और दो इंटरवल ने दर्शकों के धैर्य की ऐसी परीक्षा ली कि राज कपूर जैसा दिग्गज निर्माता कर्ज के दलदल में डूब गया। यह फिल्म इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि कभी-कभी एक बेहतरीन कलाकृति भी अपने समय से बहुत आगे होने के कारण 'सुपर फ्लॉप' की श्रेणी में खड़ी कर दी जाती है।

    अस्सी और नब्बे के दशक के संधिकाल में जब अमिताभ बच्चन का जादू अपने चरम पर था, तब कुछ ऐसी फिल्में आईं जिन्होंने साबित किया कि केवल सुपरस्टार का नाम फिल्म को वैतरणी पार नहीं लगा सकता। 'जादूगर' और 'तूफान' जैसी फिल्में इसका जीवंत उदाहरण हैं। उस दौर में दर्शकों का स्वाद बदल रहा था और वे यथार्थवाद की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन फिल्मकार अब भी वही पुराने अलौकिक और घिसे-पिटे फार्मूले दोहरा रहे थे। 'जादूगर' में अमिताभ बच्चन को एक ऐसे किरदार में पेश किया गया जो जादुई शक्तियों से बुराई का अंत करता है, लेकिन फिल्म की कहानी इतनी बचकानी और तर्कहीन थी कि इसे बच्चों ने भी पसंद नहीं किया। फिल्म में फैंटेसी और हकीकत का बेमेल घालमेल दर्शकों को रास नहीं आया। वही एंग्री यंग मैन की छवि को जादू की छड़ी के साथ देखना दर्शकों के लिए एक दुखद अनुभव साबित हुआ। इसी तरह यश चोपड़ा जैसे मंझे हुए निर्देशक की 'परंपरा' भी एक ऐसी ही फिल्म थी, जिसने सामंती परंपराओं और खानदानी रंजिश की उस पुरानी सड़ी-गली कहानी को पेश किया जिसे दर्शक दशक भर पहले ही छोड़ चुके थे।
    जैसे-जैसे सिनेमा आधुनिक हुआ, प्रयोगों का जोखिम भी बढ़ा। साल 2007 में संजय लीला भंसाली की 'सांवरिया' एक ऐसी फिल्म बनकर आई जिसे लेकर इंडस्ट्री में जबरदस्त उत्साह था। रणबीर कपूर और सोनम कपूर का डेब्यू और भंसाली की भव्यता का मेल। लेकिन फिल्म की नीली और काली रोशनी वाली कृत्रिम बैकग्राउंड सेटिंग और एक ऐसी कहानी जिसमें नायक और नायिका के बीच का द्वंद्व बहुत ही कमजोर था, दर्शकों को समझ ही नहीं आई। फिल्म का कथानक बहुत ही संक्षिप्त था जिसे खींचकर लंबा किया गया था। लोगों को लगा कि वे फिल्म नहीं बल्कि एक सजी-धजी 'पेंटिंग' देख रहे हैं जिसमें भावनाओं की गर्माहट गायब है। इसके मुकाबले उसी दिन रिलीज हुई 'ओम शांति ओम' की मसाला कहानी ने बाजी मार ली। 'सांवरिया' की असफलता ने स्पष्ट किया कि फिल्म निर्माण में तकनीक और भव्यता तभी काम आती है जब उनके पीछे एक ठोस और जुड़ाव पैदा करने वाली कहानी खड़ी हो।
    सुपर फ्लॉप फिल्मों के जिक्र में सुभाष घई की 'यादें' का नाम लेना भी अनिवार्य है। एक समय था जब सुभाष घई का नाम ही हिट की गारंटी होता था। लेकिन 'यादें' के साथ उन्होंने एक ऐसी कहानी चुनी जो पारिवारिक रिश्तों के उलझे हुए ताने-बाने को सुलझाने के बजाय और उलझा गई। फिल्म में ऋतिक रोशन और करीना कपूर जैसे युवा सुपरस्टार्स होने के बावजूद, पटकथा इतनी बिखरी हुई थी कि दर्शक मुख्य किरदारों के जज्बातों से जुड़ ही नहीं पाए। फिल्म के गानों ने तो लोकप्रियता बटोरी, लेकिन स्क्रीनप्ले में गहराई की कमी और अत्यधिक विज्ञापनों के प्रदर्शन ने दर्शकों के अनुभव को किरकिरा कर दिया। यह फिल्म इस बात का उदाहरण बनी कि केवल विदेशी लोकेशंस और बड़े चेहरे फिल्म को नहीं बचा सकते यदि पटकथा की नींव कमजोर हो।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसी फिल्में भी रहीं जो 'दुस्साहस' का परिणाम थीं। इसमें 'राम गोपाल वर्मा की आग' का नाम सबसे ऊपर आता है। निर्देशक ने कल्ट क्लासिक फिल्म 'शोले' को दोबारा बनाने की कोशिश की, जिसे दर्शकों ने एक अपराध की तरह लिया। गब्बर सिंह जैसे प्रतिष्ठित किरदार को बब्बर सिंह बनाकर और अजीबो-गरीब कैमरा एंगल्स व शोर-शराबे वाले संगीत के साथ पेश करना दर्शकों को कतई मंजूर नहीं हुआ। मूल फिल्म की आत्मा को चोट पहुँचाना और पात्रों के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ करना इस फिल्म की सबसे बड़ी हार बनी। दर्शकों ने इसे भारतीय सिनेमा का सबसे बुरा अनुभव करार दिया। 
   अभिषेक बच्चन की 'द्रोणा' ने फैंटेसी और सुपरहीरो शैली में हाथ आजमाया। फिल्म पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए। लेकिन, इसकी कहानी और विलेन का चित्रण इतना कमजोर था कि सिनेमाघरों में दर्शक अपनी हंसी नहीं रोक पाए। हॉलीवुड की तकनीक श्रेष्ठता देख चुके दर्शकों के लिए 'द्रोणा' का बचकाना कथानक एक मजाक बनकर रह गया। फ्लॉप फिल्मों की लिस्ट में अनिल कपूर और श्रीदेवी की सबसे बड़ी फ्लॉप फिल्म 1993 में आई 'रूप की रानी चोरों का राजा' प्रमुख है। इसके अलावा 'मिस्टर बेचारा' (1996), 'हीर रांझा' (1992) और क्रिटिक्स द्वारा सराही गई 'लम्हे' (1991) भी बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही थीं। 'हीर रांझा' (1992) फिल्म को भी बॉक्स ऑफिस पर निराशाजनक परिणाम मिले थे। 'मिस्टर बेचारा' (1996) में अनिल कपूर और श्रीदेवी के साथ नागार्जुन भी थे। अक्षय कुमार के करियर में कई बड़ी फ्लॉप और डिजास्टर फिल्में रही। इनमें सरफिरा, खेल खेल में, स्काई फोर्स, बड़े मियां छोटे मियां, रक्षा बंधन, सम्राट पृथ्वीराज, सेल्फी, बच्चन पांडे और 'राम सेतु' शामिल हैं। इनके अलावा, 'सौगंध' (1991), 'जोकर', चांदनी चौक टू चाइना, कमबख्त इश्क, तीस मार खां, लक्ष्मी (ओटीटी पर), 'बेल बॉटम' और 'बॉस' भी बॉक्स ऑफिस पर असफल रहीं।
    एक दौर ऐसा भी आया जब रीमेक बनाने की होड़ मची। साजिद खान की 'हिम्मतवाला' ने यह भ्रम पाल लिया था कि अस्सी के दशक की तर्कहीन कॉमेडी और लाउड एक्शन आज के दौर में भी चल जाएगा। लेकिन 2013 का दर्शक बदल चुका था। फिल्म का कथानक इतना शोर-शराबे वाला और सिरदर्द पैदा करने वाला था कि दर्शकों ने इसे पहले ही दिन नकार दिया। यह फिल्म इस बात की गवाह बनी कि गुजरे जमाने के फार्मूले अगर बिना किसी बदलाव के पेश किए जाएं, तो वे डिजास्टर ही साबित होते हैं। इसी कड़ी में आमिर खान और अमिताभ बच्चन की 'ठग्स ऑफ हिंदोस्तान' का नाम भी आता है। दो दिग्गजों को एक साथ देखना दर्शकों का सपना था, लेकिन फिल्म की कहानी 'पाइरेट्स ऑफ द कैरेबियन' की एक सस्ती और कमजोर नकल निकली। दर्शकों को लगा कि उन्हें ठगा गया है, क्योंकि फिल्म में न तो किरदारों की गहराई थी और न ही कोई मौलिकता।
     इतिहास गवाह है कि जब-जब फिल्मकारों ने दर्शकों की बुद्धि को कमतर आंका है, बॉक्स ऑफिस पर 'कलंक' जैसी फ़िल्में पैदा हुई हैं। 'कलंक' अपनी भव्यता, भारी-भरकम सेट्स और सितारों की फौज के बावजूद एक ऐसी सुस्त प्रेम कहानी थी जिसे दर्शक पहले ही कई रूपों में देख चुके थे। फिल्म की गति इतनी धीमी थी कि ढाई घंटे का समय काटना दर्शकों के लिए सजा बन गया। भव्यता जब कहानी पर हावी हो जाती है, तो परिणाम हमेशा शून्य ही निकलता है। इन सभी फ्लॉप और सुपर फ्लॉप फिल्मों का यदि हम गहराई से विश्लेषण करें, तो एक ही निष्कर्ष निकलता है कि दर्शक कभी भी तकनीक, बजट या बड़े नाम से लंबे समय तक धोखा नहीं खाता। वह पर्दे पर एक ऐसी कहानी ढूंढता है जो उसके जीवन, उसकी संवेदनाओं या कम से कम उसकी तर्कशक्ति से मेल खाती हो।
    चाहे वह 'मेरा नाम जोकर' की अत्यधिक भावुकता हो, 'सांवरिया' की कृत्रिम दुनिया हो या 'आग' जैसा असफल प्रयोग, इन सभी फिल्मों ने फिल्म जगत को कड़वे लेकिन जरूरी सबक दिए हैं। फ्लॉप फिल्में हमें बताती हैं कि फिल्म निर्माण केवल एक व्यापारिक गणित नहीं है, बल्कि यह दर्शकों की नब्ज पहचानने की एक सूक्ष्म कला है। इन फिल्मों की विफलता ने ही अक्सर सिनेमा को नई दिशा दी है और फिल्मकारों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर किया है। इसलिए, जब भी हम हिंदी फिल्म इतिहास की गौरवगाथा लिखें, तो इन असफलताओं को भी वही स्थान मिलना चाहिए, क्योंकि इन्हीं गिरती हुई इमारतों के मलबे पर आज की समझदार और यथार्थवादी फिल्मों की नींव खड़ी है। सफलता अगर मंजिल है, तो ये फ्लॉप फिल्में वे मील के पत्थर हैं जो बताते हैं कि किधर मुड़ना है। अंततः, सिनेमा के इस महासागर में लहरें वही ऊंची उठती हैं जिनकी गहराई में एक सच्ची और सशक्त कहानी छिपी होती है।
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गुस्से के सामने हारा रोमांस, बदल गया सिनेमा का इतिहास



     हिंदी सिनेमा के इतिहास में 1970 का दशक सिर्फ फिल्मों का दौर नहीं था, बल्कि यह बदलाव, टकराव और स्टारडम की नई परिभाषा लिखने वाला समय था। एक तरफ राजेश खन्ना का जादू था, जिन्हें भारत का पहला सुपरस्टार कहा गया, दूसरी तरफ अमिताभ बच्चन का उभरता व्यक्तित्व, जिसने धीरे-धीरे न सिर्फ दर्शकों का स्वाद बदला बल्कि सिनेमा के नायक की छवि ही बदल दी। 1973 से 1978 के बीच आई अमिताभ बच्चन की लगातार सफल फिल्मों ने वह परिदृश्य तैयार किया, जिसने राजेश खन्ना के एकछत्र राज को चुनौती दी और अंततः उसे पीछे छोड़ दिया। 'आनंद' में दोनों कलाकारों ने साथ काम जरूर किया, पर अभिनय की प्रतिद्वंदिता की शुरुआत यहीं से हुई थी। इसके बाद आई 'नमक हराम' से दोनों के संबंध ऐसे बिगड़े कि दोनों ने फिर कभी साथ काम नहीं किया। खास बात यह कि रोमांस के बेताज बादशाह राजेश खन्ना को गुस्सैल अमिताभ बच्चन ने हरा दिया। 
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● हेमंत पाल

    सिनेमा का दौर हमेशा बदलता रहा है। सौ साल से ज्यादा लंबे इतिहास की कहानी हर दशक में बदलती रही है। ऐसी ही बदलाव की एक कहानी 70 का दशक शुरू होते ही शुरू हुई थी, जब हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में राजेश खन्ना का ऐसा दबदबा था, जैसा पहले कभी किसी स्टार का नहीं रहा। उनकी फिल्मों आराधना, आनंद, अमर प्रेम ने उन्हें दर्शकों के दिलों का बादशाह बना दिया था। उनके हावभाव, मुस्कान और रोमांटिक अंदाज ने एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया। उस समय तक नायक का मतलब था संवेदनशील, प्रेम में डूबा हुआ और भावनात्मक रूप से जुड़ा किरदार। इसी दौर में एक संघर्षरत अभिनेता अमिताभ बच्चन भी थे, जिन्होंने अपने शुरुआती करियर में कई असफलताओं का सामना किया। लंबा कद, भारी आवाज़ और पारंपरिक हीरो जैसी छवि न होने के कारण उन्हें लगातार रिजेक्शन झेलना पड़ा। कहा जाता है कि उनकी शुरुआती 10–12 फिल्में फ्लॉप रहीं। पर यही असफलताएं उनके भीतर उस तीव्रता को जन्म दे रही थीं, जो आगे चलकर ‘एंग्री यंग मैन’ की पहचान बनी। 
     1973 में आई फिल्म 'जंजीर' ने इस कहानी को पलट दिया। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन का पुलिस अधिकारी ‘विजय’ एक ऐसा किरदार था, जो व्यवस्था से नाराज़ था, अन्याय के खिलाफ खड़ा था और भावनाओं से ज्यादा क्रोध से संचालित था। यह किरदार उस समय के सामाजिक माहौल से सीधा जुड़ा हुआ था एक ऐसा भारत जो बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और असंतोष से जूझ रहा था। 'जंजीर' की सफलता के बाद उसी साल 'नमक हराम' आई, जिसमें राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन साथ नजर आए। यह फिल्म सिर्फ कहानी के लिए नहीं, बल्कि दोनों सितारों के बीच की अदाकारी की टक्कर के लिए याद की जाती है। फिल्म में राजेश खन्ना मुख्य भूमिका में थे, लेकिन अमिताभ बच्चन की गंभीर और प्रभावशाली उपस्थिति ने दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। यही वह मोड़ था, जहां से इंडस्ट्री के समीकरण बदलने लगे। इसके बाद 'अभिमान' ने अमिताभ के अभिनय की गहराई को दिखाया। यह फिल्म रिश्तों में अहंकार और असुरक्षा की कहानी थी, जिसमें उन्होंने एक ऐसे पति का किरदार निभाया, जो अपनी पत्नी की सफलता से असहज हो जाता है। इस तरह के जटिल किरदारों ने यह साबित किया कि अमिताभ सिर्फ एक्शन हीरो नहीं, बल्कि एक सक्षम अभिनेता भी हैं।
     1974 और 1975 के बीच मजबूर, बेनाम और 'कसौटी' जैसी फिल्मों ने उनके स्टारडम को मजबूती दी। इन फिल्मों में उन्होंने थ्रिलर, ड्रामा और इमोशन का ऐसा मिश्रण पेश किया, जिसने उन्हें हर वर्ग के दर्शकों का पसंदीदा बना दिया। फिर आया 1975, वह साल जिसने हिंदी सिनेमा को हमेशा के लिए बदल दिया। 'दीवार' में अमिताभ बच्चन का संवाद 'आज खुश तो बहुत होगे तुम' सिर्फ एक डायलॉग नहीं था, बल्कि उस दौर के गुस्से की आवाज़ बन गया। इस फिल्म में उनका किरदार एक ऐसे युवक का था, जो गरीबी और अन्याय से लड़ते-लड़ते अपराध की दुनिया में चला जाता है। उसी साल 'शोले' रिलीज हुई, जो भारतीय सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित फिल्मों में गिनी जाती है। इस फिल्म में अमिताभ का ‘जय’ शांत, गंभीर और संतुलित था, लेकिन उनकी मौजूदगी बेहद प्रभावशाली रही। शोले ने उन्हें एक ऐसे स्टार के रूप में स्थापित कर दिया, जो बड़े कैनवास पर भी उतना ही प्रभावी है।
     इसी दौर में मिली और 'जमीर' जैसी फिल्मों ने उनकी संवेदनशीलता और अभिनय की विविधता को भी सामने रखा। यह वह समय था, जब राजेश खन्ना का रोमांटिक हीरो वाला इमेज धीरे-धीरे पुराना पड़ने लगा था। 1976 और 1977 में अमिताभ बच्चन ने अपने करियर को और ऊंचाई दी। 'दो अनजाने' में बदले की कहानी, 'हेरा फेरी' में कॉमेडी और 'अमर अकबर एंथनी' में मनोरंजन का पूरा पैकेज इन फिल्मों ने उन्हें हर शैली में सफल साबित किया। खासकर 'अमर अकबर एंथनी' ने उन्हें मास एंटरटेनर का राजा बना दिया। इसी दौरान परवरिश, खून पसीना और अदालत जैसी फिल्मों ने उनकी लगातार हिट फिल्मों की श्रृंखला को और मजबूत किया। इसके विपरीत, राजेश खन्ना को अपनी फिल्मों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था। उनका पारंपरिक रोमांटिक अंदाज अब बदलते समाज के साथ मेल नहीं खा रहा था।
   1978 वह साल था, जिसने इस बदलाव को पूरी तरह स्थापित कर दिया। 'डॉन' में अमिताभ बच्चन का डबल शेड वाला किरदार एक तरफ खतरनाक अपराधी और दूसरी तरफ भोला-भाला आम आदमी ने दर्शकों को चौंका दिया। 'त्रिशूल' में उन्होंने एक ऐसे बेटे का किरदार निभाया, जो अपने पिता से बदला लेने के लिए पूरी व्यवस्था को चुनौती देता है। यह किरदार भी उस दौर के सामाजिक गुस्से का प्रतीक था। 'कसमे वादे' और 'मुकद्दर का सिकंदर' ने उनके स्टारडम को चरम पर पहुंचा दिया। 'मुकद्दर का सिकंदर' में उनका दुखांत अंत दर्शकों को भावुक कर गया और यह फिल्म उस साल की सबसे बड़ी हिट साबित हुई। इन फिल्मों की लगातार सफलता ने राजेश खन्ना को यह एहसास दिला दिया कि हिंदी सिनेमा का स्वाद बदल चुका है। अब दर्शक सिर्फ रोमांस नहीं, बल्कि संघर्ष, विद्रोह और यथार्थ भी देखना चाहते थे। राजेश खन्ना की गिरावट का सबसे बड़ा कारण यह था कि उन्होंने इस बदलाव को समय रहते स्वीकार नहीं किया। 
    जहां अमिताभ बच्चन समाज के गुस्से का चेहरा बन गए, वहीं राजेश खन्ना अपनी पुरानी छवि में ही बने रहे। यह बदलाव सिर्फ दो सितारों के बीच की प्रतिस्पर्धा नहीं था, बल्कि यह भारतीय समाज के बदलते मनोविज्ञान का प्रतिबिंब था। 1970 के दशक में आर्थिक संकट, बेरोजगारी और आपातकाल जैसी घटनाओं ने आम आदमी के भीतर असंतोष भर दिया था। अमिताभ बच्चन का ‘एंग्री यंग मैन’ उसी असंतोष की अभिव्यक्ति था। अंततः 1978 के बाद हिंदी सिनेमा में एक नया युग शुरू हुआ, जिसमें अमिताभ बच्चन को ‘वन मैन इंडस्ट्री’ कहा जाने लगा। यह वह दौर था, जब एक अभिनेता पूरी फिल्म इंडस्ट्री की दिशा तय कर रहा था। इस पूरी कहानी को अगर एक लाइन में समझा जाए, तो यह सिर्फ स्टारडम का बदलाव नहीं था, बल्कि यह उस समय के समाज, दर्शकों और सिनेमा के रिश्ते का पुनर्निर्माण था। अमिताभ बच्चन ने जहां नए दौर की नींव रखी, वहीं राजेश खन्ना उस पुराने दौर के प्रतीक बनकर रह गए, एक ऐसा दौर जो कभी खत्म नहीं होता, लेकिन समय के साथ पीछे जरूर छूट जाता है।
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राजनीतिक महत्वाकांक्षा से खंडित हुई 'आप'



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भारतीय राजनीति में 2010 के दशक की शुरुआत एक बड़े बदलाव की उम्मीद लेकर आई थी। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकली एक नई राजनीतिक शक्ति अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व में बनी 'आम आदमी पार्टी' (आप) ने न केवल पारंपरिक राजनीति को चुनौती दी, बल्कि शासन के नए मॉडल का वादा भी किया। शुरुआती दौर में यह पार्टी एक आंदोलन की तरह दिखी, जिसमें वैचारिक विविधता, पारदर्शिता और जनभागीदारी प्रमुख तत्व थे। लेकिन, समय के साथ यह सवाल उठने लगा कि क्या यह पार्टी भी उसी केंद्रीकृत नेतृत्व और राजनीतिक महत्वाकांक्षा का शिकार हो गई, जिसके खिलाफ यह खड़ी हुई थी।
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● हेमंत पाल

     म आदमी पार्टी की स्थापना के समय इसके साथ कई ऐसे चेहरे जुड़े, जिनकी अपनी अलग विश्वसनीयता और पहचान थी। अन्ना हजारे के आंदोलन से प्रेरित यह पार्टी एक नैतिक राजनीतिक विकल्प के रूप में उभरी। इसके संस्थापकों में प्रशांत भूषण, कुमार विश्वास और योगेंद्र यादव जैसे नाम शामिल थे। इन नेताओं की उपस्थिति ने पार्टी को बौद्धिक मजबूती और वैचारिक गहराई दी। ऐसा लगा कि 'आप' केवल चुनाव जीतने की मशीन नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक राजनीतिक संस्कृति की शुरुआत है। लेकिन, यही विविधता आगे चलकर आंतरिक टकराव का कारण भी बनी।
      समय के साथ पार्टी के भीतर मतभेद खुलकर सामने आने लगे। योगेश यादव और प्रशांत भूषण जैसे नेताओं का पार्टी से अलग होना केवल व्यक्तिगत विवाद नहीं था, बल्कि यह संगठन के भीतर लोकतांत्रिक संवाद की कमी की ओर संकेत करता था। आलोचकों का मानना रहा कि अरविंद केजरीवाल ने धीरे-धीरे पार्टी को एक 'हाई-कमांड' मॉडल की ओर मोड़ दिया, जहां अंतिम निर्णय एक ही व्यक्ति के हाथ में केंद्रित हो गया। यह वही मॉडल था, जिसकी आलोचना 'आप' अपने शुरुआती दौर में करती थी।
      दिल्ली विधानसभा में लगातार दो कार्यकाल तक सरकार चलाना 'आप' की बड़ी उपलब्धि रही। शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली-पानी जैसे क्षेत्रों में किए गए प्रयोगों को व्यापक सराहना मिली। 'मोहल्ला क्लिनिक' और सरकारी स्कूलों के सुधार जैसे मॉडल को अन्य राज्यों ने भी अपनाने की कोशिश की। लेकिन, शासन की सफलता संगठनात्मक एकता की गारंटी नहीं बन सकी। पार्टी के भीतर असंतोष पनपता गया। कई वरिष्ठ नेताओं ने या तो दूरी बना ली या पूरी तरह अलग हो गए। इससे यह धारणा मजबूत हुई कि पार्टी का विस्तार तो हुआ, लेकिन उसकी आंतरिक लोकतांत्रिक संरचना कमजोर पड़ती गई।
     हाल के घटनाक्रम जिनमें कथित रूप से सांसदों का एक साथ पार्टी छोड़ना और राघव चड्ढा की भूमिका 'आप' के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है। हालांकि, राजनीतिक संदर्भों का विश्लेषण आवश्यक है। लेकिन, यह परिदृश्य पार्टी के लिए गंभीर संकट का संकेत है। दलबदल कानून के तहत दो-तिहाई सदस्यों के साथ पार्टी छोड़ने से सदस्यता बचाने की रणनीति यह दिखाती है कि राजनीतिक गणित अब 'आप' में भी उतना ही महत्वपूर्ण हो गया है जितना अन्य दलों में।
     अरविंद केजरीवाल की सबसे बड़ी ताकत उनकी आक्रामक और स्पष्ट राजनीतिक शैली रही है। उन्होंने खुद को एक ऐसे नेता के रूप में स्थापित किया, जो सीधे जनता से संवाद करता है और प्रशासनिक निर्णय लेने में तेज है। लेकिन, यही शैली उनकी कमजोरी भी बन सकती है। अत्यधिक केंद्रीकरण, असहमति को सीमित करना और नेतृत्व का व्यक्तिवादी स्वरूप ये सभी कारक किसी भी संगठन को लंबे समय में कमजोर कर सकते हैं। 'आप' का उदाहरण इस संदर्भ में अध्ययन का विषय बनता जा रहा है।
      अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि 'आप' का भविष्य क्या होगा? क्या यह पार्टी अपने शुरुआती आदर्शों की ओर लौट पाएगी या फिर यह भी एक पारंपरिक राजनीतिक दल बनकर रह जाएगी? एक ओर, पार्टी के पास अभी भी एक मजबूत वोट बैंक, शासन का अनुभव और एक पहचाना हुआ नेतृत्व है। दूसरी ओर, संगठनात्मक टूटन, नेतृत्व पर निर्भरता और वैचारिक स्पष्टता की कमी जैसी चुनौतियां सामने हैं। यदि अरविंद केजरीवाल पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक संवाद को पुनर्जीवित करते हैं। नए नेतृत्व को उभरने का अवसर देते हैं और संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करते हैं, तो 'आप' फिर से अपनी खोई हुई विश्वसनीयता हासिल कर सकती है। लेकिन, अगर वर्तमान प्रवृत्तियां जारी रहती हैं, तो यह पार्टी धीरे-धीरे अपनी विशिष्ट पहचान खो सकती है और भारतीय राजनीति में एक और 'सामान्य' दल बनकर रह जाएगी।
    'आम आदमी पार्टी' की कहानी केवल एक राजनीतिक दल की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस उम्मीद की कहानी है जो भारतीय जनता ने एक वैकल्पिक राजनीति से जोड़ी थी। अरविंद केजरीवाल के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे उस उम्मीद को फिर से जीवित कर सकें। राजनीति में करिश्मा महत्वपूर्ण होता है। लेकिन, स्थायित्व के लिए संस्थागत मजबूती और सामूहिक नेतृत्व अनिवार्य है। 'आप' का भविष्य इसी संतुलन पर निर्भर करेगा और यही इस पार्टी की असली परीक्षा भी है।
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Tuesday, April 7, 2026

व्यक्ति केंद्रित 'आप' को राघव स्वीकार्य नहीं!


   राघव चड्ढा को राजयसभा में उपनेता पद से हटाना 'आम आदमी पार्टी' के आंतरिक संकट और नेतृत्व की असुरक्षा को उजागर करता है। अरविंद केजरीवाल ने जिस स्वराज और आंतरिक लोकतंत्र का सपना दिखाकर पार्टी खड़ी की थी, वह अब धीरे-धीरे एक ऐसी व्यवस्था में बदलती जा रही है, जहां एक ही धुरी के इर्द-गिर्द पूरी राजनीति घूमती है। पुराने साथियों का साथ छूटना और नए उभरते सितारों के पर कतरना पार्टी की लंबी अवधि की सेहत के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
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● हेमंत पाल
 
   म आदमी पार्टी (आप) के राज्यसभा सदस्य राघव चड्ढा को पार्टी ने उपनेता के पद से हटा दिया गया। इसके पीछे पार्टी ने जो आधिकारिक कारण बताए हैं, वे न तो स्पष्ट है और न विश्वसनीय। कहा जा रहा है कि यह 'आंतरिक समन्वय' के लिए जरूरी था। लेकिन, राजनीतिक गलियारों में साफ है कि अरविंद केजरीवाल की नेतृत्व शैली एक बार फिर परीक्षा की घड़ी में आ गई। केजरीवाल, जो कभी भ्रष्टाचार के खिलाफ क्रांति के प्रतीक थे, अब उन सहयोगियों को ही किनारे लगाने का खेल खेल रहे हैं जो पार्टी को मजबूत ऊंचाइयों तक ले जा सकते थे। राघव चड्ढा जैसे युवा, परिपक्व और वाकपटु नेता का यह अपमान 'आप' के भविष्य पर सवाल खड़े करता है। क्या यह केजरीवाल का नियंत्रण बनाए रखने का पुराना तरीका है!
      'आप' का राजनीतिक सफर शुरू से ही केजरीवाल-केंद्रित रहा। 2012 में पार्टी के गठन के समय अन्ना हजारे जैसे सामाजिक आंदोलनकारियों ने इसे समर्थन दिया था। अन्ना ने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को 'आप' का आधार बनाया, लेकिन जल्द ही केजरीवाल ने खुद को केंद्र में स्थापित कर लिया। अन्ना हजारे ने तो 2012 में ही पार्टी से दूरी बना ली, क्योंकि उन्हें लगा कि केजरीवाल राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण आंदोलन के मूल सिद्धांतों से भटक रहे हैं। इसके बाद योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण जैसे संस्थापक सदस्यों की विदाई हुई। 2015 में पार्टी के राष्ट्रीय परिषद बैठक में केजरीवाल समर्थकों ने इन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया। योगेंद्र यादव ने खुलेआम कहा था कि 'आप' अब एक व्यक्ति-केंद्रित दल बन चुका है, जहां आंतरिक लोकतंत्र का कोई स्थान नहीं। कुमार विश्वास, जो केजरीवाल के करीबी कवि-साथी थे, वे भी 2017 तक पार्टी से अलग हो गए। उन्होंने आरोप लगाया कि केजरीवाल ने उन्हें जानबूझकर हाशिए पर धकेल दिया। इन सभी मामलों में पैटर्न एक ही था कोई भी नेता जो केजरीवाल की छाया से बाहर निकलने की कोशिश करता, उसे या तो पद से हटाया जाता या पार्टी से निष्कासित कर दिया जाता।
     राघव चड्ढा का मामला इसी सिलसिले का नवीनतम अध्याय लगता है। चड्ढा 'आप' के सबसे चमकते सितारों में से एक हैं। पंजाब और दिल्ली में पार्टी की मजबूत पैरवी करने वाले, वे राज्यसभा में विपक्ष के प्रभावी प्रवक्ता बने। उनकी वाकपटुता ने विपक्षी दलों को भी प्रभावित किया। उन्होंने जनहित के जो मुद्दे उठाए, वे सोशल मीडिया और लोगों में चर्चा का विषय बने। उनकी लोकप्रियता का ग्राफ 'आप' के कद से ऊपर निकलने लगा था, जो शायद केजरीवाल को रास नहीं आया। पार्टी ने उन्हें उपनेता पद से हटाते हुए कोई ठोस कारण भी नहीं बताया। आधिकारिक बयान में केवल 'पार्टी के संगठनात्मक बदलाव' का जिक्र है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चड्ढा की बढ़ती लोकप्रियता केजरीवाल को खल रही थी। खासकर दिल्ली विधानसभा चुनावों के बाद, जहां 'आप' को झटका लगा, चड्ढा जैसे युवा चेहरे पार्टी को फिर खड़ा कर सकते थे। लेकिन, केजरीवाल की शैली ऐसी नहीं। वे किसी को खुद से आगे नहीं बढ़ने देते। संजय सिंह को नेता पद पर रखना और चड्ढा को हटाना इसी का प्रमाण है। सोशल मीडिया पर चड्ढा के समर्थक इसे 'केजरीवाल का ईर्ष्या-प्रदर्शन' बता रहे हैं। क्या चड्ढा कांग्रेस या अन्य विपक्षी दलों की ओर रुख करेंगे? संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि 'आप' में रहकर उनका भविष्य सीमित हो चुका है।
     इस घटना के अपने व्यापक राजनीतिक निहितार्थ हैं। 'आप' जो कभी 'आम आदमी' की आवाज थी, अब एक केंद्रीकृत, केजरीवाल-प्रधान मशीन बन चुकी है। दिल्ली और पंजाब में सत्ता बनाए रखने के बावजूद, पार्टी का राष्ट्रीय विस्तार रुक गया है। 2024 लोकसभा चुनावों में 'आप' का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। गुजरात, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में प्रयास विफल हो चुके हैं। आंतरिक कलह इसका प्रमुख कारण है। केजरीवाल की गिरफ्तारी के बाद भी पार्टी ने संगठन को मजबूत नहीं किया। उल्टे, आतिशी और मनीष सिसोदिया जैसे नेता भी केजरीवाल की छत्रछाया में ही दुबक कर रह गए। राघव चड्ढा को हटाया जाना, 'आप' के युवा नेतृत्व को कमजोर करता है। भाजपा और कांग्रेस इसे हथियार बना रही हैं। भाजपा प्रवक्ता ने ट्वीट किया कि 'आप में लोकतंत्र का अंत हो चुका है'। इससे पार्टी का विपक्षी गठबंधन पर असर पड़ सकता है। 'इंडिया' ब्लाक में 'आप' की भूमिका पहले से कमजोर थी, अब चड्ढा जैसे प्रभावी वक्ता के बिना यह और कमजोर हो जाएगी।
     केजरीवाल की नेतृत्व शैली पर सवाल उठना स्वाभाविक है। राजनीति में करिश्माई नेता जरूरी हैं, लेकिन बिना आंतरिक लोकतंत्र के कोई दल लंबे समय तक नहीं टिकता। 'आप' भी उसी रास्ते पर हैं। केजरीवाल ने कभी संगठन निर्माण पर ध्यान नहीं दिया। वे चुनावी वादों और पीआर पर निर्भर रहे। राघव चड्ढा जैसे प्रतिभावान नेता को हटाकर उन्होंने पार्टी के भविष्य को ही खतरे में डाल दिया। मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां 'आप' विस्तार की कोशिश कर रही है, ऐसे कदम स्थानीय नेताओं को हतोत्साहित करेंगे। इंदौर-भोपाल क्षेत्र में इस पार्टी के कार्यकर्ता पहले से ही असंतुष्ट हैं। यदि चड्ढा बाहर चले जाते हैं, तो यह पलायन का संकेत बनेगा। राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि 'आप' एकल नेता पर टिकी है, बिना केजरीवाल के यह ढह जाएगी। लेकिन केजरीवाल के साथ भी यह टूट रही है।
     इस संकट से उबरने के लिए 'आप' में आंतरिक सुधार जरूरी हैं। पारदर्शी चुनाव प्रक्रिया, युवा नेताओं को जिम्मेदारी और केजरीवाल को अधिक विकेंद्रीकरण ये कदम आवश्यक हैं। अन्यथा, पार्टी का सफर योगेंद्र यादव, कुमार विश्वास और अब शायद राघव चड्ढा के साथ समाप्त हो जाएगा। भारतीय राजनीति में 'आप' जैसा प्रयोग दुर्लभ था, इसे बचाने की जिम्मेदारी केजरीवाल पर है। लेकिन, इतिहास गवाह है कि शक्ति के लालच ने कई आंदोलनों को निगल लिया। राघव चड्ढा का मामला 'आप' के पतन का शुभ लक्षण न साबित हो, यही कामना है।
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