Tuesday, March 31, 2026

फिल्मों के मनहूस टाइटल, कुछ तो डराने लगे!

    प्रसिद्ध अंग्रेजी नाटककार विलियम शेक्सपियर ने अपने नाटक 'रोमियो और जूलियट' में एक जगह लिखा था 'नाम में क्या रखा है।' उनकी यह बात उस नाटक के संदर्भ में सही हो सकती है। लेकिन, फिल्मों के नाम के बारे में यह कई बार गलत साबित हुई। क्योंकि, फिल्मकार हर चीज को शुभ-अशुभ के नजरिया से देखते हैं। यदि उन्हें फ़िल्म के नाम में भी कोई अशुभ बात नजर आती है, तो वह उसे बदलने में देर नहीं करते। ऐसे कई उदाहरण हैं, जब फिल्मों के नाम ने ही लाखों-करोड़ों की फिल्मों का बंटाधार कर दिया। यही वजह है कि किसी भी फिल्म के निर्माण से पहले उसके नाम को लेकर अच्छी खासी मशक्कत की जाती है। 
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- हेमंत पाल

   लमान खान ने हाल ही में अपनी फिल्म 'गलवान' का नाम बदलकर 'मातृभूमि' रख दिया। इसके पीछे कारण चाहे जो भी बताए जा रहे हों, लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा रहा कि पुराने नाम को बदलने के पीछे कोई शुभ-अशुभ का गणित भी हो सकता है। क्योंकि, ऐसे प्रयोगों का एक लंबा इतिहास रहा है। कुछ फिल्में सिर्फ नाम की वजह से ही नहीं चली। कई बार तो फिल्मों के नाम की स्पेलिंग बदलकर इस प्रयोग को सुधारा गया, जो सफल रहा। बॉलीवुड की चमक-दमक भरी दुनिया में जहां करोड़ों की कमाई का सपना हर कलाकार देखता है, वहीं अंधविश्वास की जड़ें इतनी गहरी होती है कि टाइटल की एक स्पेलिंग बदलने से फिल्म की किस्मत पलट सकती है। सफलता का मंत्र सिर्फ टैलेंट, स्क्रिप्ट या स्टार पावर नहीं, बल्कि सही टाइमिंग और भाग्य भी है। इंडस्ट्री के पुराने दिग्गजों से लेकर नए सितारों तक, हर कोई टोटकों का सहारा लेता है मंगल दोष दूर करने के लिए पूजा, शुभ मुहूर्त में शूटिंग शुरू करना या फिर नाम बदलकर रिलीज। लेकिन, कुछ टाइटल ऐसे हैं जो जड़ से मनहूस साबित हुए हैं। इनका जिक्र होते ही प्रोड्यूसर्स के चेहरे पीले पड़ जाते हैं। सबसे कुख्यात है 'शहजादा'। पिछले 50 सालों में राजेश खन्ना, अजय देवगन और कार्तिक आर्यन जैसे सितारों ने इस नाम के साथ दांव लगाया, लेकिन हर बार बॉक्स ऑफिस पर पानी फेर गया। 
'शहजादा' बनी तीन सितारों की नाकामियां
    बॉलीवुड में 'शहजादा' नाम की काली छाया इतनी घनी है कि इसका जिक्र भर से स्टार्स सिहर उठते हैं। पहली बार यह अभिशाप 1972 में राजेश खन्ना पर उतरा। सुपरस्टार खान साहब की लहर पर सवार होकर 'शहजादा' रिलीज हुई। डायरेक्टर कोटि कोमीनिनी की यह फिल्म मूल रूप से इटैलियन हिट 'पुडूडा गोगो' का रीमेक थी। राजेश खन्ना के अलावा मोना सिंह और प्रिया राजवंश मुख्य भूमिकाओं में थे। उम्मीदें आसमान छू रही थीं, लेकिन फिल्म ने महज 50 लाख की कमाई की। ट्रेड एनालिस्टों के मुताबिक, बजट के मुकाबले 70 प्रतिशत का घाटा हुआ। दर्शक फिल्म को पुरानी और बेस्वाद मान बैठे। राजेश खन्ना का जलवा उस दौर में था, फिर भी 'शहजादा' ने उनकी लकीर तोड़ दी। इंडस्ट्री में चर्चा फैली कि नाम में ही कुछ खराब है। चार दशक बाद 2012 में अजय देवगन ने इस मनहूस टाइटल को फिर आजमाया। 'सन ऑफ सरदार' के बाद मनोज मुंतशिर की स्क्रिप्ट पर बनी यह फिल्म एक्शन-ड्रामा थी। संजय लीला भंसाली प्रोडक्शन की चमक के साथ अजय देवगन, संजय दत्त और काजोल जैसे सितारे थे। लेकिन रिलीज होते ही धमाका उल्टा फूटा। पहले हफ्ते में 25 करोड़ जुटाए, लेकिन कुल 45 करोड़ पर सिमट गई। बजट 80 करोड़ से ऊपर था, यानी प्रोड्यूसर्स को 50 करोड़ का चूना लगा। क्रिटिक्स ने स्क्रिप्ट को कमजोर बताया, लेकिन ट्रेड गुरु कमल जैन जैसे जानकारों का मानना है कि 'शहजादा' नाम ने ही आग में घी डाला। अजय देवगन ने बाद में स्वीकार किया कि फिल्म की असफलता ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया।
    सबसे ताजा झटका 2023 में कार्तिक आर्यन को लगा। रोहित धवन डायरेक्टोरियल 'शहजादा' तेलुगु हिट 'अला वाइकुंठपुरमलू' का रीमेक थी। कार्तिक आर्यन, कृति सैनन और तब्बू के साथ पूजा हेगड़े थीं। प्रचार भव्य था, ट्रेलर वायरल हुआ, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर जीरो। पहले दिन 6 करोड़, कुल 30 करोड़ की कमाई। 75 करोड़ बजट वाली फिल्म ने 60 प्रतिशत घाटा दिया। कार्तिक की 'फ्रेडी' जैसी पिछली हिट्स के बावजूद दर्शक मुंह फेर लिया। सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ गई। निर्देशक रोहित धवन ने कहा, 'कभी-कभी चीजें नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं।' लेकिन इंडस्ट्री वाले फुसफुसाते हैं शहजादा का अभिशाप फिर चला। तीन दशकों में तीन फ्लॉप, तीन स्टार्स की बर्बादी। क्या यह संयोग है या नाम का जादू?
मनहूस टाइटल जो दुश्मन बने 
    'शहजादा' अकेला नहीं है, बॉलीवुड में कई ऐसे टाइटल हैं जो फ्लॉप की गारंटी बन चुके हैं। 'आग' इसका सबसे काला उदाहरण है। 1980 के दशक में कमल हासन की 'आग' आई, जो सुपरफ्लॉप रही। फिर 1999 में गोविंदा और कैरी अमीन वाली 'आग' ने 5 करोड़ का बजट खा लिया। 2003 में संजय दत्त की 'लूंगी' टाइप 'आग' आई, फिर फुस्स। तीनों 'आग' बॉक्स ऑफिस पर जल गईं। प्रोड्यूसर आज भी इससे दूर भागते हैं एक और नाम है 'बदला।' 1966 में मीना कुमारी की 'बदला' फ्लॉप हुई। 1970 में धर्मेंद्र वाली भी डूबी। 2019 में तापसी पन्नू और अमिताभ बच्चन की 'बदला' ने तो कमाल किया, लेकिन इससे पहले के दो 'बदला' ने इंडस्ट्री को सबक सिखाया। ट्रेड एक्सपर्ट सुमीत कचड़ कहते हैं कि बार-बार फेल होने वाले नामों से बचना चाहिए। 'खिलाड़ी' भी मनहूस साबित हुआ। अक्षय कुमार की 1996 वाली 'खिलाड़ी' हिट रही, लेकिन 2016 में 'खिलाड़ी 786' ने 125 करोड़ बजट पर 50 करोड़ कमाए। फिर 2022 में सिद्धू की 'खिलाड़ी' सीरीज का नया भाग फुस्स। नाम की चमक फीकी पड़ गई। इसी तरह 'हमसे ही सीखो' या 'मिस्टर इंडिया के बाद' जैसे टाइटल भी दुर्भाग्य लाए। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चित 'नो एंट्री' का सीक्वल है। 2005 की अनीस बज्मी वाली हिट थी, लेकिन 2024 तक लटकी 'नो एंट्री 2' रद्द हो गई। प्रोड्यूसर बोले, नाम में ही दिक्कत है। इसके अलावा 'काला' भी काला पड़ा। 2012 में विवेक ओबेरॉय वाली फ्लॉप, 2023 में सलमान खान की साउथ रीमेक भी औसत रही। आशय यह है कि नाम ही बॉक्स ऑफिस का दुश्मन है। पुराने जमाने में 'धुंध' या 'बारिश' जैसे टाइटल भी फ्लॉप रिकॉर्ड बनाए। आजकल डिजिटल एनालिटिक्स से पहले ट्रेड वाले नाम चेक करते हैं।
इस नाम से तबाह हुई कई फ़िल्में 
   1980 में सुभाष घई की 'कर्ज' में ऋषि कपूर लीड रोल में थे, लेकिन यह बुरी तरह फ्लॉप हो गई। बजट के मुकाबले महज आधी कमाई हुई। 2002 में सनी देओल और शिल्पा शेट्टी वाली 'कर्ज: द बर्डन ऑफ ट्रूथ' ने 15 करोड़ ही जुटाए, जबकि उम्मीदें भारी थीं। 2008 में हिमेश रेशमिया का 'कर्ज' रीमेक आया, फिर फुस्स। इसके अलावा कर्ज तेरे खून का (1990), दूध का कर्ज (2016),'प्यार का कर्ज, कर्ज चुकाना है जैसी फिल्में भी बॉक्स ऑफिस पर डूब गईं। इंडस्ट्री वाले इसे शापित मानते हैं। एक एक्ट्रेस का तो करियर ही खत्म हो गया, किसी ने डिप्रेशन झेला, प्रोड्यूसर भी दिवालिया हुए। 'आग' ने भी कमाल किया।
     1980 के दशक में कमल हासन वाली फ्लॉप, 1999 में गोविंदा की असफल, 2003 में संजय दत्त वाली भी जलकर राख। तीनों ने प्रोड्यूसर को बर्बाद किया। 'बदला' का सिलसिला तो 1966 से चला। मीना कुमारी वाली फेल, 1970 में धर्मेंद्र की फिल्म डूबी, हालांकि 2019 वाली हिट रही, लेकिन पुरानी ने नाम खराब कर दिया। 2025 में सलमान खान की 'सिकंदर' सबसे बड़ी फ्लॉप बनी, जिसकी लागत तक नहीं निकली। शूटिंग में स्क्रिप्ट बदली, लेकिन नाम भी मनहूस साबित हुआ। ये उदाहरण बताते हैं कि 'शहजादा' अकेला नाम नहीं है। 'कर्ज' जैसे नाम भी पूरी इंडस्ट्री का दुश्मन बने। ये टाइटल साबित करते हैं कि बॉलीवुड में नाम बदलना क्यों जरूरी माना जाता है।
स्पेलिंग बदलकर बची किस्मत
    बॉलीवुड में नाम बदलना आम है। जब मनहूस टाइटल का डर सताता है, तो स्पेलिंग जादू चल जाता है। सबसे मशहूर केस है 'शोले'। मूल नाम कुछ और था, जिस पर मनोज कुमार ने आपत्ति जताई थी। फिर 'द बॉम्बे समर 1971' सोचा गया, लेकिन अंत में 'शोले' किया गया। 1975 में 35 करोड़ की कमाई, सुपरहिट। अगर पुराना नाम रहता, तो शायद यह नहीं होता! सलमान खान की 'राधे' भी मूल रूप से 'राधिका' थी। अंधविश्वास से 'राधे : योर मोस्ट वांटेड भाई' हो गया। पाइरेटेड रिलीज के बावजूद फील हिट रही। आमिर खान की 'लगान' का नाम पहले 'सरकारी राज' था। ज्योतिषी बोले, यह नाम नेगेटिव है। फिर जो नाम बदला उसके बाद तो ऑस्कर नॉमिनेशन मिला। '3 इडियट्स' का नाम भी पहले '5 इडियट्स' था, जिसे बदला गया तो फिल्म ने इतिहास बना दिया। राजकुमार हिरानी ने कहा था 'नाम में ही ताकत है।' शाहरुख खान की 'ओम शांति ओम' पहले 'ओम शांति शांति' था। शांति दो बार से डर लगा, तो फिल्म 2007 में ब्लॉकबस्टर हुई। 
    अक्षय कुमार की 'रॉकी हैंडसम' पहले 'रॉकी ब्रोमैंश' थी उसकी स्पेलिंग बदली तो फिल्म हिट हुई। सलमान की 'दबंग' पहले 'दबंगग' (तीन जी) था। ज्योतिषी ने दो जी सुझाए, फिर जो हुआ उसमें 138 करोड़ की कमाई जुड़ गई। 'बजरंगी भाईजान' भी पहले 'शुक्ला भाईजान' था, जो बदला गया। कबीर खान भी मानते हैं कि अंधविश्वास काम करता है। 'कहानी 2' को भी 'आखिर क्यों' से बदल दिया। क्योंकि, पहले वाला नाम मनहूस था। विद्या बालन ने कहा था 'बॉलीवुड में नाम ही राजा है।' प्रियंका चोपड़ा की 'मैरी कॉम' का नाम पहले 'मैरी' था। फिर बदलकर पूरा नाम रखा और ये बायोपिक हिट हुई। इन बदलावों से साबित होता है कि स्पेलिंग से किस्मत पलट सकती है।
बॉलीवुड का अंधविश्वास, टोटकों की दुनिया
     बॉलीवुड सिर्फ नामों पर नहीं रुकता। शूटिंग से पहले गणेश पूजा, क्लैपबोर्ड पर 'मां भगवती' लिखना, फर्स्ट शॉट साउथ दिशा में न लेना ये सब आम हैं। अमिताभ बच्चन ने 'कुली' हादसे के बाद कुछ ज्यादा टोटके अपनाए जाने लगे। शाहरुख का काला चश्मा लकी चार्म है और सलमान का ब्रेसलेट। लेकिन, नाम सबसे ऊपर है। ट्रेड एनालिस्ट अक्षय जितेश के मुताबिक, पिछले 20 सालों में 40% फ्लॉप फिल्मों का कारण नाम को माना गया है। डिजिटल दौर में भी यह चल रहा। 'लव आज कल' का नाम बदला गया। 'फुकरे 3' में फुकरे की स्पेलिंग में फेरबदल की गई। अब तो प्रोड्यूसर नाम की पहले ही टेस्टिंग कराने लगे। ज्योतिष जैसे लोग सलाह देते हैं। पर, क्या यह विज्ञान है या अंधविश्वास? बॉलीवुड कहता है दोनों। 'शहजादा' जैसे मनहूस टाइटल बॉलीवुड को सिखाते हैं कि नाम महज शब्द नहीं, बल्कि भाग्य का आईना है। राजेश खन्ना से कार्तिक आर्यन तक, सभी ने दांव गंवाया। लेकिन, स्पेलिंग बदलकर 'शोले' से 'दबंग' तक की फ़िल्में हिट्स बनीं। इंडस्ट्री आगे बढ़ रही है, लेकिन अंधविश्वास की जड़ें ज्यादा गहरा रही हैं। अगली बार कोई प्रोड्यूसर 'शहजादा 4' बनाने से पहले सोचेगा। माना कि सफलता के लिए टैलेंट जरूरी, लेकिन सही नाम तो जरूरी है। बॉलीवुड की यह दास्तान साबित करती है कभी नाम से मत डरो, जरा भी शंका हो, तो बदल दो!
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असफलता की काली राख // बॉक्स ऑफिस पर ढेर, दिग्गजों के सपने

 

     हिंदी सिनेमा के सौ से भी ज्यादा सालों के सफर में हम अक्सर उन ऊंचाइयों की बात करते हैं जिन्हें शोले, मुगल-ए-आजम या 'दंगल' जैसी फिल्मों ने छुआ। बॉक्स ऑफिस के आंकड़े, करोड़ों का कारोबार और जुबली के जश्न फिल्मी गलियारों की रौनक बढ़ाते हैं। लेकिन, इस चमक-धमक के पीछे एक स्याह कोना और भी है, जहाँ उन फिल्मों का ढेर लगा है जिन्हें दर्शकों ने सिरे से नकार दिया। किसी भी कला के इतिहास में असफलता उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी सफलता, क्योंकि हर फ्लॉप फिल्म फिल्मकारों के लिए एक सबक छोड़कर जाती है। जानिए, आखिर वे कौन सी बड़ी फिल्में थीं जो अपनी भारी-भरकम लागत और बड़े सितारों के बावजूद दर्शकों के दिल तक पहुँचने में नाकाम रहीं।
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- हेमंत पाल

    हिंदी सिनेमा के सौ से भी ज्यादा सालों के शानदार सफर में हम अक्सर उन ऊंचाइयों की चर्चा करते हैं जिन्हें 'शोले', 'मुगल-ए-आजम' या 'दंगल' जैसी फिल्मों ने छुआ। बॉक्स ऑफिस के जादुई आंकड़े, करोड़ों का कारोबार और सिल्वर जुबली के जश्न फिल्मी गलियारों की रौनक बढ़ाते हैं। लेकिन इस चकाचौंध के पीछे एक स्याह और खामोश कोना और भी है, जहाँ उन फिल्मों का ढेर लगा है जिन्हें दर्शकों ने सिरे से नकार दिया। किसी भी कला के इतिहास में असफलता उतनी ही महत्वपूर्ण और कड़वी होती है जितनी सफलता मीठी, क्योंकि हर फ्लॉप फिल्म फिल्मकारों के लिए एक सबक और दर्शकों के बदलते मिजाज का आईना छोड़कर जाती है। आज हम फिल्म इतिहास के उसी 'विफल' अध्याय को पलटेंगे और समझेंगे कि आखिर वे कौन सी महत्वाकांक्षी फिल्में थीं जो भारी-भरकम बजट, चमचमाते सितारों और दिग्गज निर्देशकों के बावजूद दर्शकों के दिल के दरवाजे तक पहुँचने में बुरी तरह नाकाम रहीं।
     भारतीय सिनेमा में असफलता की पहली सबसे बड़ी और ऐतिहासिक गूंज तब सुनाई दी, जब 'शोमैन' राज कपूर ने अपना सब कुछ दांव पर लगाकर 'मेरा नाम जोकर' बनाई थी। आज भले ही हम इसे एक 'कल्ट क्लासिक' मानते हैं और इसकी दार्शनिकता की मिसाल देते हैं, लेकिन 1970 में जब यह रिलीज हुई, तो इसे भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी व्यापारिक आपदाओं में गिना गया। दर्शकों ने इसके भारी-भरकम साढ़े चार घंटे के रनटाइम और फिल्म की अत्यधिक दार्शनिक गंभीरता को स्वीकार नहीं किया। फिल्म का कथानक एक सर्कस के जोकर के जीवन के तीन पड़ावों और उसकी असफल प्रेम कहानियों के इर्द-गिर्द घूमता था। उस दौर का दर्शक जो परदे पर चटख मनोरंजन और रफ़्तार देखने का आदी था, उसे एक जोकर का लंबा दुःख और उसकी लंबी दास्तान बहुत उबाऊ लगी। फिल्म की लंबाई और दो इंटरवल ने दर्शकों के धैर्य की ऐसी परीक्षा ली कि राज कपूर जैसा दिग्गज निर्माता कर्ज के दलदल में डूब गया। यह फिल्म इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि कभी-कभी एक बेहतरीन कलाकृति भी समय से बहुत आगे होने के कारण 'सुपर फ्लॉप' की श्रेणी में खड़ी कर दी जाती है।
शिखर पर भी अमिताभ की फ़िल्में फ्लॉप
    अस्सी और नब्बे के दशक के संधिकाल में जब अमिताभ बच्चन का जादू अपने चरम पर था, तब कुछ ऐसी फिल्में आईं जिन्होंने साबित किया कि केवल सुपरस्टार का नाम फिल्म को वैतरणी पार नहीं लगा सकता। 'जादूगर' और 'तूफान' जैसी फिल्में इसका जीवंत उदाहरण हैं। उस दौर में दर्शकों का स्वाद बदल रहा था और वे यथार्थवाद की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन फिल्मकार अब भी वही पुराने अलौकिक और घिसे-पिटे फार्मूले दोहरा रहे थे। 'जादूगर' में अमिताभ बच्चन को एक ऐसे किरदार में पेश किया गया जो जादुई शक्तियों से बुराई का अंत करता है, लेकिन फिल्म की कहानी इतनी बचकानी और तर्कहीन थी कि इसे बच्चों ने भी पसंद नहीं किया। फिल्म में फैंटेसी और हकीकत का बेमेल घालमेल दर्शकों को रास नहीं आया। वही एंग्री यंग मैन की छवि को जादू की छड़ी के साथ देखना दर्शकों के लिए एक दुखद अनुभव साबित हुआ। इसी तरह यश चोपड़ा जैसे मंझे हुए निर्देशक की 'परंपरा' भी एक ऐसी ही फिल्म थी, जिसने सामंती परंपराओं और खानदानी रंजिश की उस पुरानी सड़ी-गली कहानी को पेश किया जिसे दर्शक दशक भर पहले ही छोड़ चुके थे।
भंसाली जैसे फिल्मकार की फिल्म भी नहीं चली  
    जैसे-जैसे सिनेमा आधुनिक हुआ, प्रयोगों का जोखिम भी बढ़ा। साल 2007 में संजय लीला भंसाली की 'सांवरिया' एक ऐसी फिल्म बनकर आई जिसे लेकर इंडस्ट्री में जबरदस्त उत्साह था। रणबीर कपूर और सोनम कपूर का डेब्यू और भंसाली की भव्यता का मेल। लेकिन फिल्म की नीली और काली रोशनी वाली कृत्रिम बैकग्राउंड सेटिंग और एक ऐसी कहानी जिसमें नायक और नायिका के बीच का द्वंद्व बहुत ही कमजोर था, दर्शकों को समझ ही नहीं आई। फिल्म का कथानक बहुत ही संक्षिप्त था जिसे खींचकर लंबा किया गया था। लोगों को लगा कि वे फिल्म नहीं बल्कि एक सजी-धजी 'पेंटिंग' देख रहे हैं जिसमें भावनाओं की गर्माहट गायब है। इसके मुकाबले उसी दिन रिलीज हुई 'ओम शांति ओम' की मसाला कहानी ने बाजी मार ली। 'सांवरिया' की असफलता ने स्पष्ट किया कि फिल्म निर्माण में तकनीक और भव्यता तभी काम आती है जब उनके पीछे एक ठोस और जुड़ाव पैदा करने वाली कहानी खड़ी हो।
सितारों के बावजूद दर्शक नहीं जुटे 
    सुपर फ्लॉप फिल्मों के जिक्र में सुभाष घई की 'यादें' का नाम लेना भी अनिवार्य है। एक समय था जब सुभाष घई का नाम ही हिट की गारंटी होता था। लेकिन 'यादें' के साथ उन्होंने एक ऐसी कहानी चुनी जो पारिवारिक रिश्तों के उलझे हुए ताने-बाने को सुलझाने के बजाय और उलझा गई। फिल्म में ऋतिक रोशन और करीना कपूर जैसे युवा सुपरस्टार्स होने के बावजूद, पटकथा इतनी बिखरी हुई थी कि दर्शक मुख्य किरदारों के जज्बातों से जुड़ ही नहीं पाए। फिल्म के गानों ने तो लोकप्रियता बटोरी, लेकिन स्क्रीनप्ले में गहराई की कमी और अत्यधिक विज्ञापनों के प्रदर्शन ने दर्शकों के अनुभव को किरकिरा कर दिया। यह फिल्म इस बात का उदाहरण बनी कि केवल विदेशी लोकेशंस और बड़े चेहरे फिल्म को नहीं बचा सकते यदि पटकथा की नींव कमजोर हो।
     भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसी फिल्में भी रहीं जो 'दुस्साहस' का परिणाम थीं। इसमें 'राम गोपाल वर्मा की आग' का नाम सबसे ऊपर आता है। निर्देशक ने कल्ट क्लासिक फिल्म 'शोले' को दोबारा बनाने की कोशिश की, जिसे दर्शकों ने एक अपराध की तरह लिया। गब्बर सिंह जैसे प्रतिष्ठित किरदार को बब्बर सिंह बनाकर और अजीबो-गरीब कैमरा एंगल्स व शोर-शराबे वाले संगीत के साथ पेश करना दर्शकों को कतई मंजूर नहीं हुआ। मूल फिल्म की आत्मा को चोट पहुँचाना और पात्रों के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ करना इस फिल्म की सबसे बड़ी हार बनी। दर्शकों ने इसे भारतीय सिनेमा का सबसे बुरा अनुभव करार दिया। 
बड़े सितारों को कमजोर कहानी ने नकारा 
   अभिषेक बच्चन की 'द्रोणा' ने फैंटेसी और सुपरहीरो शैली में हाथ आजमाया। फिल्म पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए। लेकिन, इसकी कहानी और विलेन का चित्रण इतना कमजोर था कि सिनेमाघरों में दर्शक अपनी हंसी नहीं रोक पाए। हॉलीवुड की तकनीक श्रेष्ठता देख चुके दर्शकों के लिए 'द्रोणा' का बचकाना कथानक एक मजाक बनकर रह गया। फ्लॉप फिल्मों की लिस्ट में अनिल कपूर और श्रीदेवी की सबसे बड़ी फ्लॉप फिल्म 1993 में आई 'रूप की रानी चोरों का राजा' प्रमुख है। इसके अलावा 'मिस्टर बेचारा' (1996), 'हीर रांझा' (1992) और क्रिटिक्स द्वारा सराही गई 'लम्हे' (1991) भी बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही थीं। 
      'हीर रांझा' (1992) फिल्म को भी बॉक्स ऑफिस पर निराशाजनक परिणाम मिले थे। 'मिस्टर बेचारा' (1996) में अनिल कपूर और श्रीदेवी के साथ नागार्जुन भी थे। अक्षय कुमार के करियर में कई बड़ी फ्लॉप और डिजास्टर फिल्में रही। इनमें सरफिरा, खेल खेल में, स्काई फोर्स, बड़े मियां छोटे मियां, रक्षा बंधन, सम्राट पृथ्वीराज, सेल्फी, बच्चन पांडे और 'राम सेतु' शामिल हैं। इनके अलावा, 'सौगंध' (1991), 'जोकर', चांदनी चौक टू चाइना, कमबख्त इश्क, तीस मार खां, लक्ष्मी (ओटीटी पर), 'बेल बॉटम' और 'बॉस' भी बॉक्स ऑफिस पर असफल रहीं।
जब रीमेक को भी नकार दिया गया 
    एक दौर ऐसा भी आया जब रीमेक बनाने की होड़ मची। साजिद खान की 'हिम्मतवाला' ने यह भ्रम पाल लिया था कि अस्सी के दशक की तर्कहीन कॉमेडी और लाउड एक्शन आज के दौर में भी चल जाएगा। लेकिन 2013 का दर्शक बदल चुका था। फिल्म का कथानक इतना शोर-शराबे वाला और सिरदर्द पैदा करने वाला था कि दर्शकों ने इसे पहले ही दिन नकार दिया। यह फिल्म इस बात की गवाह बनी कि गुजरे जमाने के फार्मूले अगर बिना किसी बदलाव के पेश किए जाएं, तो वे डिजास्टर ही साबित होते हैं। इसी कड़ी में आमिर खान और अमिताभ बच्चन की 'ठग्स ऑफ हिंदोस्तान' का नाम भी आता है। दो दिग्गजों को एक साथ देखना दर्शकों का सपना था, लेकिन फिल्म की कहानी 'पाइरेट्स ऑफ द कैरेबियन' की एक सस्ती और कमजोर नकल निकली। दर्शकों को लगा कि उन्हें ठगा गया है, क्योंकि फिल्म में न तो किरदारों की गहराई थी और न ही कोई मौलिकता।
फिल्म के भव्य सेट के नीचे दबा कथानक 
     इतिहास गवाह है कि जब-जब फिल्मकारों ने दर्शकों की बुद्धि को कमतर आंका है, बॉक्स ऑफिस पर 'कलंक' जैसी फ़िल्में पैदा हुई हैं। 'कलंक' अपनी भव्यता, भारी-भरकम सेट्स और सितारों की फौज के बावजूद एक ऐसी सुस्त प्रेम कहानी थी जिसे दर्शक पहले ही कई रूपों में देख चुके थे। फिल्म की गति इतनी धीमी थी कि ढाई घंटे का समय काटना दर्शकों के लिए सजा बन गया। भव्यता जब कहानी पर हावी हो जाती है, तो परिणाम हमेशा शून्य ही निकलता है। इन सभी फ्लॉप और सुपर फ्लॉप फिल्मों का यदि हम गहराई से विश्लेषण करें, तो एक ही निष्कर्ष निकलता है कि दर्शक कभी भी तकनीक, बजट या बड़े नाम से लंबे समय तक धोखा नहीं खाता। वह पर्दे पर एक ऐसी कहानी ढूंढता है जो उसके जीवन, उसकी संवेदनाओं या कम से कम उसकी तर्कशक्ति से मेल खाती हो।
असफलता ने भी कई बार सबक सिखाया 
    चाहे वह 'मेरा नाम जोकर' की अत्यधिक भावुकता हो, 'सांवरिया' की कृत्रिम दुनिया हो या 'आग' जैसा असफल प्रयोग, इन सभी फिल्मों ने फिल्म जगत को कड़वे लेकिन जरूरी सबक दिए हैं। फ्लॉप फिल्में हमें बताती हैं कि फिल्म निर्माण केवल एक व्यापारिक गणित नहीं है, बल्कि यह दर्शकों की नब्ज पहचानने की एक सूक्ष्म कला है। इन फिल्मों की विफलता ने ही अक्सर सिनेमा को नई दिशा दी है और फिल्मकारों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर किया है। इसलिए, जब भी हम हिंदी फिल्म इतिहास की गौरवगाथा लिखें, तो इन असफलताओं को भी वही स्थान मिलना चाहिए, क्योंकि इन्हीं गिरती हुई इमारतों के मलबे पर आज की समझदार और यथार्थवादी फिल्मों की नींव खड़ी है। सफलता अगर मंजिल है, तो ये फ्लॉप फ़िल्में वे मील के पत्थर हैं जो बताते हैं कि किधर नहीं मुड़ना है। अंततः, सिनेमा के इस महासागर में लहरें वही ऊंची उठती हैं जिनकी गहराई में एक सच्ची और सशक्त कहानी छिपी होती है।
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Friday, March 27, 2026

बॉलीवुड के गानों ने हॉलीवुड में मचाया जादू


    भारतीय सिनेमा यानी बॉलीवुड अपने रंग, भावनाओं और खासतौर पर संगीत के लिए पूरी दुनिया में मशहूर है। वहीं हॉलीवुड तकनीक, कहानी और ग्लोबल अपील के लिए जाना जाता है। लेकिन जब ये दोनों दुनिया मिलती हैं, तो कुछ ऐसा होता है जो दर्शकों के दिल में बस जाता है। यही कमाल तब देखने को मिलता है जब बॉलीवुड के गाने हॉलीवुड फिल्मों में इस्तेमाल किए जाते हैं। हाल के सालों में यह ट्रेंड और मजबूत हुआ हैं। 
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- हेमंत पाल 

     भारतीय संगीत सिर्फ 'एक्सॉटिक एलिमेंट' नहीं बल्कि कहानी का अहम हिस्सा बनता जा रहा है। बॉलीवुड संगीत की खासियत उसकी विविधता है क्लासिकल, फोक, पॉप, सूफी और इलेक्ट्रॉनिक का अद्भुत मिश्रण। यही वजह है कि हॉलीवुड फिल्ममेकर्स भी इन गानों की ओर आकर्षित होते हैं। कई बार ये गाने सिर्फ बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं होते, बल्कि फिल्म की शुरुआत, अंत या किसी खास सीन को यादगार बना देते हैं। उदाहरण के लिए 'छैय्या छैय्या' फिल्म 'इनसाइडर मेन' में, जान पहचान हो 'घोस्ट वर्ल्ड' में और बॉम्बे थीम 'लॉर्ड ऑफ़ वार' में। इन गानों ने यह साबित किया कि संगीत की कोई भाषा नहीं होती, वो तो सुनने वाले पर अपना जादू चलाते हैं। बॉलीवुड गानों का हॉलीवुड में इस्तेमाल सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी है। यह भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच देता है और विदेशों में बसे भारतीयों को भावनात्मक जुड़ाव देता है। साथ ही फिल्म की कहानी में नई परतें भी जोड़ता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ये गाने इमोशनल शॉर्टकट की तरह काम करते हैं। कुछ सेकंड में ही दर्शक इससे जुड़ जाते हैं। 
     कुछ और ऐसे मौके भी हैं जब बॉलीवुड गानों ने हॉलीवुड में अपनी छाप छोड़ी। इससे साफ है कि बॉलीवुड संगीत अब सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा। सवाल उठता है कि यह ट्रेंड क्यों बढ़ रहा है! तो इसका सीधा सा जवाब है ग्लोबलाइजेशन का प्रभाव। आज दुनिया पहले से ज्यादा जुड़ी हुई है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और सोशल मीडिया ने कंटेंट की सीमाएं खत्म कर दी। भारत एक बड़ा फिल्म बाजार है और हॉलीवुड इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता। साथ ही बॉलीवुड म्यूजिक का रिदम और मेलोडी पश्चिमी संगीत से अलग है, जो हॉलीवुड फिल्मों में एक नया फ्लेवर जोड़ता है। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक ट्रेंड है या आने वाले समय में और बढ़ेगा! संकेत साफ हैं कि इंटरनेशनल कोलैबोरेशन बढ़ रहा हैं। भारतीय कलाकार ग्लोबल स्तर पर पहचान बना रहे हैं। फिल्मों में क्रॉस-कल्चरल कंटेंट की मांग बढ़ रही है। इससे लगता है कि भविष्य में और भी बॉलीवुड गाने हॉलीवुड फिल्मों में सुनाई देंगे और शायद पूरी फिल्में भी इस तरह के मिश्रण पर आधारित हों। बॉलीवुड और हॉलीवुड का यह मेल सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं है, यह दो संस्कृतियों का मिलन है। जब 'छैय्या छैय्या' जैसे गाने न्यूयॉर्क की सड़कों पर गूंजते हैं या 'मेरा जूता है जापानी' मास्को की सड़कों पर सुनाई देता है, तो यह साबित होता है कि संगीत की कोई सीमा नहीं होती। आने वाले समय में यह सहयोग और गहरा होगा, और शायद वह दिन दूर नहीं जब एक ही फिल्म में दोनों इंडस्ट्री के कलाकार, संगीत और कहानियां बराबरी से नजर आएं।
    आज भी जब कोई बॉलीवुड का गाना विदेश में सुनाई देता है, तो भारतीय दर्शकों के चेहरे पर अपनापन और गर्व दोनों झलकने लगते हैं। फ़िलहाल तक बॉलीवुड‑हॉलीवुड बहस आमतौर पर इस बात पर रही कि हम किन स्टोरीज़ या ट्यून्स को इंस्पायर करते हैं। लेकिन, कम जाने‑माने इस तथ्य को कि बॉलीवुड की ही धुनें भी कई बड़ी हॉलीवुड फिल्मों और टीवी शोज़ में जगह बना चुकी हैं। ये गाने न सिर्फ़ वहां के ऑडियंस को एक अलग कल्चरल लेयर देते हैं, बल्कि बॉलीवुड की म्यूज़िक इंडस्ट्री की ग्लोबल इमेज को भी मजबूत करते हैं। राज कपूर के युग से लेकर नवीनतम मार्वल सीरीज़ तक, बॉलीवुड संगीत कई तरह से हॉलीवुड के फिल्म स्कोर का हिस्सा बन चुका है। उदाहरण के लिए, राइन रेनॉल्ड्स की सुपरहिट फिल्म 'डेडपूल' (2016) ने राज कपूर की 'श्री 420' के अमर गीत 'मेरा जूता है जापानी' को ओपनिंग और क्लाइमेक्स दोनों सीन में इस्तेमाल किया। इससे डरावने‑हास्य‑डरामा वाला यह सुपरहीरो यूनिवर्स अचानक भारतीय सिनेमा की याद दिलाने लगा। इसी फिल्म में बाद में 'कभी हमने नहीं सोचा था' जैसा रोमांटिक क्लासिक भी दिखाया गया, जिससे यह संदेश मिलता है कि हॉलीवुड फ़िल्म‑निर्माता अब भारतीय गानों को सिर्फ़ एक क्विर्की टच नहीं, बल्कि इमोशनल टोन‑सेटर के रूप में भी देख रहे हैं।
     डेज़ी वॉशिंगटन और क्लाइव ओॉन की थ्रिलर 'इनसाइड द मेन' (2006) में की फिल्म दिल से का पॉइंट ऑफ‌ ऑवर गाना 'छैय्यां‑छैय्यां' ओपनिंग क्रेडिट्स में बजता दिखता है, जिसे निर्देशक स्पाइक ली ने खुले अमल तौर पर कल्चरल मिक्स बताया। भारी बैसों और ब्रास इंस्ट्रूमेंट्स के साथ रीमिक्स वर्ज़न यहां उस शहर की गतिविधि को दर्शाता है जिसमें लोग अलग‑अलग धर्मों, भाषाओं और तानों के होते हुए भी एक साथ जीवन जी रहे हैं। इस तरह बॉलीवुड की एक देशी धुन शहर की सामाजिक जटिलता को दर्शाने वाला ऑडियो टेक्स्चर बन जाती है। ऐसा ही एक दिलचस्प उदाहरण निकोल किडमैन और ईवान मैकग्रेगर वाली 'म्यूज़िकल माऊलिन रॉग' (2001) में सुनाई देता है, जहां फिल्म चाइना गेट का गाना 'छम्मा‑छम्मा बाजे में मेरी पैजनिया' निकोल किडमैन के 'डायमंड्स आर अ गर्ल्स बेस्ट फ्रेंड' नंबर के बीच में इंटरकट के रूप में आता है। इस जगह इसे सिर्फ़ एक एक्ज़ॉटिक ट्विस्ट नहीं, बल्कि विश्वव्यापी एंटरटेनमेंट के एक फ्यूज़न फॉर्म के रूप में पेश किया गया है। दरअसल, यह दिखाता है कि बॉलीवुड की डांस नंबर्स अब इंटरनेशनल फिल्मों के विज़ुअल लैंग्वेज का हिस्सा बन चुके हैं।
     मोहम्मद रफी की आवाज़ वाले 'मेरा मन तेरा प्यासा' और लता मंगेशकर के 'वादा न तोड़' को जोना कैरॉन और जिम कैरी की मनोवैज्ञानिक रोम‑ड्रामा 'इटरनल सनशाइन ऑफ द स्पोटलेस माइंड' (2004) में जगह मिली है। यहां ये गाने दो किरदारों के रिश्ते की भावनात्मक गहराई को दिखाने के लिए इस्तेमाल होते हैं, जिससे यह प्रस्तुत होता है कि भारतीय म्यूज़िक की भावनात्मक लय को यूरोप‑अमेरिकी ऑडियंस भी उतनी ही दूरी से नहीं समझते, जितनी दूरी से वे अक्सर भारतीय फिल्मों को देखते हैं। इसी तरह किशोर कुमार का 'लहरों की तरह यादें' ज़ॉम्बी‑कॉमेडी फिल्म 'शौन ऑफ़ द डेड' में लगाया गया, जिससे यह महसूस होता है कि बॉलीवुड की रोमांटिक धुनें यहां भी एक थोड़ा अलग और इरोनिक टोन लेकर ऑडियंस को चुभने का काम करती हैं।
     हॉलीवुड फिल्मों में बॉलीवुड गानों का इस्तेमाल कभी ओपनिंग या क्लाइमेक्स सीन में तो कभी मोड़ वाले मोमेंट पर दिखता है, जैसे 'द डिक्टेटर' (2011) में पंजाबी हिट 'मुंडियां तू बच के रही' का इस्तेमाल, जो फिल्म के हास्य और सतिर पर और भी ज़ोर डालता है। इसी तरह 'द एक्सीडेंटल हसबैंड' (2008) में साथिया का 'छलका छलका रे' शादी की जगह पर बजता हुआ दिखता है, जिससे यह लगता है मानो हॉलीवुड वेडिंग सीन में भी भारतीय बारात की यादें जग रही हैं। इन तरह के इस्तेमाल से ऑडियंस को लगता है कि उनकी फिल्म बस एक जगह की नहीं, बल्कि दुनिया की कहानी है, और भारतीय म्यूज़िक उस कहानी का एक प्रामाणिक पार्ट बन जाता है। आर रहमान की 'बॉम्बे थीम' को निकलॉस केज‑फिल्म 'लार्ड ऑफ़ वार' (2005) में इस्तेमाल किया गया, जहां यह धुन अंडरवर्ल्ड और वैश्विक हथियार ट्रेड के बीच में एक दमामेदार बैकड्रॉप बनती है। यह दिखाता है कि आज भारतीय गाने सिर्फ़ रोमांटिक या डांस सीन तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि गहरे राजनीतिक और सामाजिक थीम वाली फिल्मों में भी स्कोरिंग टूल के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं।
    यह ट्रेंड सिर्फ़ फिल्मों तक ही नहीं रुका है, बल्कि रीसेंट वेब‑सीरीज़ में भी दिखता है। जैसे मार्वल की सुपरहिट सीरीज़ 'लौकी' के फाइनल एपिसोड में सोनाक्षी सिन्हा‑स्टार फिल्म 'हैप्पी फिर भाग जाएगी' (2018) का गाना 'स्वाग सहा नहीं जाए' बैकग्राउंड में बजता दिखता है, जिस पर बाद में एंड क्रेडिट्स में ऑफिशियल रूप से भी लिखा जाता है। इससे यह इमेज बनती है कि बॉलीवुड ने अब न सिर्फ़ फिल्मों, बल्कि डिजिटल‑आधुनिक स्ट्रीमिंग यूनिवर्स में भी अपनी जगह बना ली है। इन सब उदाहरणों से यह साफ़ होता है कि बॉलीवुड की म्यूज़िक इंडस्ट्री अब सिर्फ़ भारत या दिल्ली‑मुंबई तक सीमित नहीं रही, बल्कि एक ग्लोबल रेफरेंस पॉइंट बन गई। 
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बुंदेलखंड-1 // अधूरे वादों, बंटे भूगोल और संघर्षरत समाज की कहानी

    भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में क्षेत्रीय अस्मिता और विकास की असमानताओं का प्रश्न हमेशा से राजनीतिक और सामाजिक विमर्श के केंद्र में रहा है। बुंदेलखंड राज्य की मांग भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में समझी जानी चाहिए। यह मांग केवल एक नए राज्य के गठन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस लंबे ऐतिहासिक अनुभव, उपेक्षा की भावना और विकासात्मक पिछड़ेपन से जुड़ी हुई है, जिसे इस क्षेत्र ने दशकों से झेला है। स्वतंत्रता के बाद से लेकर आज तक यह मुद्दा समय-समय पर उभरता रहा है, लेकिन इसे कभी भी निर्णायक रूप से हल नहीं किया गया।
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- हेमंत पाल

   देश के हृदय में स्थित बुंदेलखंड केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि इतिहास, परंपरा और सांस्कृतिक एकता का जीवंत उदाहरण है। यह वही भूमि है, जहां वीरता की गाथाएं जन्मीं, जहां लोकजीवन में सादगी और संघर्ष दोनों साथ चलते हैं। इसके बावजूद आज यह क्षेत्र विकास की दौड़ में पीछे छूट गया है। इसका एक बड़ा कारण यह माना जाता है कि बुंदेलखंड दो राज्यों उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में विभाजित है। आज जब अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग फिर से तेज हो रही है, तो इसके पीछे केवल वर्तमान की परेशानियां नहीं हैं, बल्कि वह ऐतिहासिक भरोसा भी है जो आजादी के समय इस क्षेत्र को दिया गया था, लेकिन पूरा नहीं हो सका।
      आजादी से पहले बुंदेलखंड कई देशी रियासतों में विभाजित जरूर था, लेकिन उसकी आत्मा एक थी। ओरछा, दतिया, पन्ना, छतरपुर, और समथर जैसी रियासतों के अपने-अपने शासक थे। लेकिन, यहां की भाषा, संस्कृति और जीवनशैली में गहरा सामंजस्य था। बुंदेली बोली इस पूरे क्षेत्र को जोड़ती थी और लोकगीतों में यहां की एकता साफ झलकती थी। जब देश स्वतंत्र हुआ और देशी रियासतों का भारतीय संघ में विलय शुरू हुआ, तब इस क्षेत्र के लोगों को यह विश्वास दिलाया गया कि उनकी सांस्कृतिक और भौगोलिक पहचान को बनाए रखा जाएगा। इस ऐतिहासिक प्रक्रिया का नेतृत्व सरदार वल्लभभाई पटेल ने किया था। उस समय यह उम्मीद जगाई गई थी, कि बुंदेलखंड को एक इकाई के रूप में विकसित किया जाएगा, ताकि इसकी पहचान और संतुलन बना रहे। लेकिन, स्वतंत्रता के बाद प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक परिस्थितियों के चलते बुंदेलखंड को दो हिस्सों में बांट दिया गया। इसका एक भाग उत्तर प्रदेश में शामिल हुआ और दूसरा मध्यप्रदेश में। यह विभाजन प्रारंभ में अस्थायी माना गया, लेकिन समय के साथ यह स्थायी रूप ले गया। यही वह बिंदु है, जहां से बुंदेलखंड के विकास की गति धीमी पड़ती चली गई।
    दो राज्यों में बंटने के कारण बुंदेलखंड की सबसे बड़ी समस्या समन्वय की कमी बन गई। विकास योजनाएं अलग-अलग स्तर पर बनीं, लेकिन उनका प्रभाव पूरे क्षेत्र पर समान रूप से नहीं पड़ा। एक राज्य में बनाई गई योजना दूसरे हिस्से तक नहीं पहुंच पाती, जिससे संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं हो सका। इस क्षेत्र की सबसे गंभीर समस्या जल संकट है। बुंदेलखंड लंबे समय से सूखे की मार झेलता रहा है। यहां वर्षा कम होती है और जो होती भी है, वह अनियमित होती है। पारंपरिक जल स्रोत जैसे तालाब और कुएं या तो सूख चुके हैं या उपेक्षा के कारण खराब हो चुके हैं। पानी की कमी का सीधा असर खेती पर पड़ता है, जिससे किसान लगातार संकट में रहते हैं। कृषि यहां की जीवनरेखा है, लेकिन जब फसल बार-बार खराब होती है, तो किसान कर्ज के बोझ तले दब जाते हैं। कई बार यह स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि लोग अपने गांव छोड़कर दूसरे शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर हो जाते हैं। यह पलायन केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक ढांचे को भी कमजोर करता है।
    बुंदेलखंड में रोजगार के अवसरों की कमी एक और बड़ी चुनौती है। उद्योगों का विकास यहां बहुत सीमित है। बुनियादी ढांचे की कमी के कारण बड़े निवेश नहीं हो पाते। सड़कों, बिजली और अन्य सुविधाओं की स्थिति भी कई स्थानों पर संतोषजनक नहीं है। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी चिंताजनक है। गांवों में अच्छे विद्यालयों और चिकित्सालयों का अभाव है। लोगों को गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए दूर-दराज के शहरों में जाना पड़ता है, जिससे समय और धन दोनों का नुकसान होता है। महिलाओं और बच्चों की स्थिति विशेष रूप से कठिन है, जहां कुपोषण और जागरूकता की कमी जैसी समस्याएं आम हैं। इन सभी समस्याओं के कारण अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग बार-बार उठती रही है। इस मांग के समर्थकों का मानना है कि जब तक यह क्षेत्र एक प्रशासनिक इकाई नहीं बनेगा, तब तक इसका समुचित विकास संभव नहीं है। उनका तर्क है कि अलग राज्य बनने से योजनाएं स्थानीय जरूरतों के अनुसार बनाई जाएंगी और उनका क्रियान्वयन भी बेहतर तरीके से हो सकेगा।
    इस आंदोलन को लंबे समय से आवाज देने वालों में फिल्म अभिनेता और निर्माता राजा बुंदेला का नाम प्रमुख है। उन्होंने पिछले तीन दशक से ज्यादा समय से इस मुद्दे को उठाया और जन जागरण के माध्यम से इसे जीवित रखा है। उनका कहना है कि बुंदेलखंड की उपेक्षा का मूल कारण इसका विभाजन है और जब तक इसे एक राज्य का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक यहां की समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं हो पाएगा। हालांकि, अलग राज्य की मांग जितनी मजबूत दिखती है, उतनी ही जटिल भी है। दो राज्यों के बीच बंटे क्षेत्र को अलग कर नया राज्य बनाना आसान नहीं है। इसमें राजनीतिक सहमति, संसाधनों का बंटवारा और प्रशासनिक ढांचे का निर्माण जैसी कई चुनौतियां शामिल हैं। यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या केवल अलग राज्य बनने से सभी समस्याओं का समाधान हो जाएगा। 
     कुछ लोग मानते हैं कि बेहतर नीतियों और मजबूत प्रशासनिक इच्छाशक्ति के माध्यम से भी विकास संभव है, भले ही क्षेत्र विभाजित रहे। फिर भी, यह सच है कि बुंदेलखंड का मुद्दा केवल प्रशासनिक पुनर्गठन का नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक वादे का भी है जो आजादी के समय किया गया था। यह उस क्षेत्र की पहचान, सम्मान और अधिकार से जुड़ा हुआ सवाल है, जो वर्षों से उपेक्षा का सामना कर रहा है। आज आवश्यकता इस बात की है कि इस मुद्दे को केवल राजनीतिक दृष्टिकोण से न देखा जाए, बल्कि इसे सामाजिक और मानवीय दृष्टि से भी समझा जाए। चाहे समाधान अलग राज्य के रूप में निकले या विशेष योजनाओं और संसाधनों के माध्यम से, लेकिन बुंदेलखंड को उसके विकास का अधिकार मिलना ही चाहिए। जब तक इस क्षेत्र की समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं होगा, तब तक बुंदेलखंड की यह पीड़ा और अलग राज्य की मांग यूं ही समय-समय पर उठती रहेगी।
शेष अगली क़िस्त में 
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बुंदेलखंड-2 // उपेक्षा और असंतुलित विकास की अधूरी पृष्ठभूमि


    बुंदेलखंड राज्य की मांग भारतीय संघीय ढांचे के भीतर क्षेत्रीय अस्मिता, प्रशासनिक दक्षता और विकास की असमानताओं से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। यह मांग न तो अचानक उभरी है और न केवल भावनात्मक आग्रह पर आधारित है, बल्कि इसके पीछे एक लंबा ऐतिहासिक अनुभव, उपेक्षा की भावना और विकासात्मक असंतुलन की ठोस पृष्ठभूमि मौजूद है। स्वतंत्रता के बाद से ही समय-समय पर यह मुद्दा उठता रहा है, परंतु इसे कभी भी निर्णायक राजनीतिक प्राथमिकता नहीं मिल सकी।
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- हेमंत पाल
  
     ऐतिहासिक रूप से बुंदेलखंड एक सांस्कृतिक और भौगोलिक इकाई रहा है, जो कई रियासतों में विभाजित था। इन रियासतों का विलय स्वतंत्र भारत में तो हो गया, लेकिन एकीकृत बुंदेलखंड की अवधारणा प्रशासनिक रूप नहीं ले सकी। 1956 में राज्यों के पुनर्गठन के दौरान भाषाई आधार को प्राथमिकता दी गई और बुंदेलखंड को उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच विभाजित कर दिया गया। यही विभाजन आगे चलकर इस क्षेत्र की पहचान और विकास के लिए एक जटिल स्थिति पैदा करता है। यह कहना कि उस समय औपचारिक रूप से अलग बुंदेलखंड राज्य का वादा किया गया था, इतिहास में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं है, लेकिन यह सच है कि क्षेत्रीय एकता की भावना को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। परिणामस्वरूप बुंदेलखंड दोनों राज्यों में एक सीमांत क्षेत्र बनकर रह गया, जहां न तो नीति-निर्माण का केंद्र रहा और न ही संसाधनों का पर्याप्त प्रवाह सुनिश्चित हो सका। इस प्रशासनिक बंटवारे ने विकास की गति को प्रभावित किया, क्योंकि दोनों राज्यों की प्राथमिकताएं अलग-अलग रहीं और बुंदेलखंड अक्सर उनके एजेंडे में पीछे छूटता गया।
    बुंदेलखंड राज्य की मांग नई नहीं है। स्वतंत्रता के बाद राज्यों के पुनर्गठन के समय भी क्षेत्रीय पहचान के आधार पर चर्चा हुई थी, लेकिन बुंदेलखंड को अलग राज्य का दर्जा नहीं मिला। 1950 और 60 के दशक में कुछ स्थानीय संगठनों ने आवाज उठाई, पर वह व्यापक जन आंदोलन का रूप नहीं ले सकी। 1990 के दशक में जब उत्तराखंड (तब उत्तरांचल) के आंदोलन ने जोर पकड़ा, उसी समय बुंदेलखंड में भी अलग राज्य की मांग ने फिर सिर उठाया। 2000 में जब तीन नए राज्य बने, तब भी बुंदेलखंड समर्थकों ने उम्मीद जताई थी, लेकिन केंद्र सरकार ने इस दिशा में कदम नहीं बढ़ाया। जब तक बुंदेलखंड पूर्ण राज्य नहीं बन जाता, इसका विकास संभव नहीं है। फिल्म अभिनेता से सामाजिक कार्यकर्ता बने राजा बुंदेला इस मांग को मुखर रूप से उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि जब तक बुंदेलखंड को प्रशासनिक रूप से अलग राज्य का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक इस क्षेत्र की समस्याओं का स्थायी समाधान संभव नहीं है।    1990 के दशक में जब अलग राज्यों की मांग देशभर में जोर पकड़ रही थी, विशेषकर उत्तराखंड (तत्कालीन उत्तरांचल) के आंदोलन के दौरान, तब बुंदेलखंड में भी यह मांग फिर से उभरकर सामने आई। 2000 में जब छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड जैसे नए राज्यों का गठन हुआ, तब बुंदेलखंड के लोगों को भी उम्मीद जगी कि उनकी मांग पर विचार किया जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, जिससे क्षेत्रीय असंतोष और गहरा हो गया। विकास के दृष्टिकोण से बुंदेलखंड आज भी देश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां बार-बार पड़ने वाले सूखे, जल संकट, कृषि पर अत्यधिक निर्भरता, और औद्योगिक विकास की कमी जैसी समस्याएं लगातार बनी हुई हैं। जल प्रबंधन की विफलता ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। केन-बेतवा नदी जोड़ परियोजना जैसी योजनाएं चर्चा में तो रही हैं, लेकिन उनका क्रियान्वयन अपेक्षित गति से नहीं हो सका। परिणामस्वरूप किसानों की आय अस्थिर बनी रहती है और बड़ी संख्या में लोग रोजगार की तलाश में पलायन करने को मजबूर होते हैं।
    प्रशासनिक दृष्टि से देखा जाए तो बुंदेलखंड का विभाजन इसकी सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। दो अलग-अलग राज्यों में बंटे होने के कारण नीतियों में समन्वय की कमी रहती है। एक राज्य में बनाई गई योजना दूसरे हिस्से में लागू नहीं होती, जिससे समग्र क्षेत्रीय विकास बाधित होता है। यदि यह क्षेत्र एक राज्य के रूप में संगठित होता, तो जल, कृषि, उद्योग और बुनियादी ढांचे से जुड़ी नीतियों को एकीकृत तरीके से लागू किया जा सकता था। इसी पृष्ठभूमि में फिल्म अभिनेता से सामाजिक कार्यकर्ता बने राजा बुंदेला ने इस मुद्दे को मुखर रूप से उठाया है। उनका तर्क है कि जब तक बुंदेलखंड को प्रशासनिक रूप से अलग राज्य का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक इसकी समस्याओं का स्थायी समाधान संभव नहीं है। उनका यह भी मानना है कि स्थानीय नेतृत्व और स्थानीय प्राथमिकताओं के आधार पर ही इस क्षेत्र का समुचित विकास हो सकता है। उनका आंदोलन इस बात को रेखांकित करता है कि यह मांग केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय से जुड़ी हुई है।
    हालांकि, अलग राज्य बनने से विकास अपने आप सुनिश्चित हो जाएगा, यह मान लेना भी पूरी तरह उचित नहीं है। छोटे राज्यों के अनुभव मिश्रित रहे हैं। जहां छत्तीसगढ़ ने खनिज संसाधनों के बेहतर उपयोग के जरिए आर्थिक प्रगति की, वहीं कुछ अन्य राज्यों को अभी भी प्रशासनिक और वित्तीय चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। विकास केवल राज्य के आकार या उसकी प्रशासनिक स्थिति पर निर्भर नहीं करता, बल्कि यह सुशासन, पारदर्शिता, निवेश और प्रभावी नीति-क्रियान्वयन पर भी आधारित होता है। इसके अतिरिक्त, नया राज्य बनाने की प्रक्रिया भी सरल नहीं है। इसके लिए संसद में विधेयक पारित करना, संबंधित राज्यों की सहमति, और व्यापक राजनीतिक समर्थन आवश्यक होता है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में यह एक जटिल और लंबी प्रक्रिया हो सकती है। साथ ही, नए राज्य के गठन के साथ प्रशासनिक ढांचे का निर्माण, राजधानी का चयन, संसाधनों का बंटवारा और वित्तीय प्रबंधन जैसी कई चुनौतियां भी सामने आती हैं।
      फिर भी, यह तर्क अनदेखा नहीं किया जा सकता कि बुंदेलखंड की विशिष्ट समस्याओं के समाधान के लिए विशेष ध्यान और समर्पित नीति की आवश्यकता है। चाहे वह अलग राज्य के रूप में हो या विशेष क्षेत्रीय पैकेज के माध्यम से, इस क्षेत्र के विकास को प्राथमिकता देना आवश्यक है। यदि वर्तमान ढांचे में रहते हुए भी प्रभावी और समन्वित प्रयास किए जाएं, तो भी स्थिति में सुधार संभव है, लेकिन इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और प्रशासनिक प्रतिबद्धता अनिवार्य है। बुंदेलखंड राज्य की मांग केवल एक प्रशासनिक पुनर्गठन का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह क्षेत्रीय न्याय, विकास की समानता और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का प्रतीक है। इसे केवल भावनात्मक मुद्दा मानकर नजरअंदाज करना उचित नहीं होगा। आवश्यक है कि इस पर गंभीर, तथ्यात्मक और संतुलित दृष्टिकोण से विचार किया जाए, ताकि बुंदेलखंड के लोगों की वास्तविक समस्याओं का समाधान खोजा जा सके, चाहे वह अलग राज्य के रूप में हो या मौजूदा ढांचे में व्यापक सुधार के जरिए।
(समाप्त)
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Monday, March 23, 2026

पृथक बुंदेलखंड : उपेक्षा, अस्मिता और विकास की अधूरी कहानी


● हेमंत पाल

    त्तर प्रदेश के दक्षिणी हिस्से और मध्य प्रदेश के उत्तरी भाग में फैला बुंदेलखंड लंबे समय से उपेक्षा, सूखा, पलायन और विकास की कमी जैसे सवालों से जूझता रहा है। इसी पृष्ठभूमि में अलग बुंदेलखंड राज्य की मांग समय-समय पर उठती रही है। हाल के वर्षों में फिल्म अभिनेता से सामाजिक कार्यकर्ता बने राजा बुंदेला इस मांग को मुखर रूप से उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि जब तक बुंदेलखंड को प्रशासनिक रूप से अलग राज्य का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक इस क्षेत्र की समस्याओं का स्थायी समाधान संभव नहीं है। बुंदेलखंड को अलग राज्य बनाने का मूल आधार क्षेत्रीय असमानता और ऐतिहासिक उपेक्षा का आरोप है। यह क्षेत्र उत्तर प्रदेश के झांसी, ललितपुर, जालौन, हमीरपुर, महोबा, बांदा और चित्रकूट जिलों के साथ मध्य प्रदेश के सागर, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दमोह, दतिया जैसे जिलों में फैला है।
     प्राकृतिक संसाधनों की दृष्टि से यह इलाका खनिज संपदा, पत्थर, ग्रेनाइट और सांस्कृतिक धरोहर से समृद्ध है, लेकिन मानव विकास सूचकांकों में लगातार पीछे रहा है। यहां औसत वर्षा कम और अनियमित है, जिससे बार-बार सूखे की स्थिति बनती है। खेती मुख्य रूप से वर्षा पर निर्भर है और सिंचाई के साधनों का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया। समर्थकों का तर्क है कि बड़े राज्य की प्रशासनिक प्राथमिकताओं में बुंदेलखंड हमेशा हाशिए पर रहा। लखनऊ या भोपाल से दूर स्थित यह इलाका राजनीतिक रूप से प्रभावशाली नहीं माना जाता, इसलिए बजटीय आवंटन और योजनाओं के क्रियान्वयन में अपेक्षित ध्यान नहीं मिला। वे उदाहरण देते हैं कि सूखा राहत पैकेज, सिंचाई परियोजनाएं और औद्योगिक निवेश घोषणाओं तक सीमित रह जाते हैं। अलग राज्य बनने पर स्थानीय नेतृत्व, स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप नीति बना सकेगा और संसाधनों का उपयोग क्षेत्रीय प्राथमिकताओं के अनुसार होगा।
     आर्थिक आधार के साथ-साथ सांस्कृतिक तर्क भी दिए जाते हैं। बुंदेलखंड की अपनी विशिष्ट बुंदेली बोली, लोकगीत, वीरगाथाएं और ऐतिहासिक परंपराएं हैं। ओरछा, खजुराहो, झांसी जैसे ऐतिहासिक केंद्र इसकी पहचान को विशिष्ट बनाते हैं। अलग राज्य समर्थकों का कहना है कि क्षेत्रीय पहचान और सांस्कृतिक गौरव को संरक्षित करने के लिए प्रशासनिक स्वायत्तता जरूरी है। वे यह भी तर्क देते हैं कि छोटे राज्यों के गठन के बाद विकास की गति तेज होने के उदाहरण सामने आए हैं, जैसे उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड। हालांकि इन राज्यों के अनुभव पूरी तरह एक जैसे नहीं रहे, फिर भी समर्थक इन्हें सकारात्मक मिसाल के रूप में पेश करते हैं।
     बुंदेलखंड राज्य की मांग नई नहीं है। स्वतंत्रता के बाद राज्यों के पुनर्गठन के समय भी क्षेत्रीय पहचान के आधार पर चर्चा हुई थी, लेकिन बुंदेलखंड को अलग राज्य का दर्जा नहीं मिला। 1950 और 60 के दशक में कुछ स्थानीय संगठनों ने आवाज उठाई, पर वह व्यापक जन आंदोलन का रूप नहीं ले सकी। 1990 के दशक में जब उत्तराखंड (तब उत्तरांचल) के आंदोलन ने जोर पकड़ा, उसी समय बुंदेलखंड में भी अलग राज्य की मांग ने फिर सिर उठाया। 2000 में जब तीन नए राज्य बने, तब भी बुंदेलखंड समर्थकों ने उम्मीद जताई थी, लेकिन केंद्र सरकार ने इस दिशा में कदम नहीं बढ़ाया। 2000 के दशक के उत्तरार्ध में यह मुद्दा फिर चर्चा में आया। 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती ने उत्तर प्रदेश को चार हिस्सों पूर्वांचल, बुंदेलखंड, अवध प्रदेश और पश्चिम प्रदेश में बांटने का प्रस्ताव पारित कराया था। विधानसभा में प्रस्ताव पारित हुआ, पर केंद्र सरकार ने उस पर आगे कार्रवाई नहीं की। उस समय यह स्पष्ट हो गया कि राज्य पुनर्गठन केवल विधानसभा प्रस्ताव से संभव नहीं, बल्कि संसद की स्वीकृति और व्यापक राजनीतिक सहमति जरूरी है।
    राजनीतिक दलों का रुख भी समय-समय पर बदलता रहा है। भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दोनों ने अलग-अलग समय पर छोटे राज्यों के सिद्धांत का समर्थन किया, लेकिन बुंदेलखंड के सवाल पर कोई ठोस पहल नहीं की। क्षेत्रीय दलों ने भी इसे चुनावी मुद्दा तो बनाया, पर सत्ता में आने के बाद प्राथमिकता सूची में यह पीछे चला गया। इसी पृष्ठभूमि में राजा बुंदेला का नाम उभरा। फिल्मी करियर के बाद उन्होंने सामाजिक-राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने ‘बुंदेलखंड निर्माण मोर्चा’ जैसे मंचों के माध्यम से अलग राज्य की मांग को संगठित रूप देने का प्रयास किया। उनका दावा है कि बुंदेलखंड की जनता लंबे समय से शोषण और उपेक्षा झेल रही है, और राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में समस्याएं जस की तस हैं। वे धरना-प्रदर्शन, पदयात्रा और जनसभाओं के माध्यम से इस मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श में लाने की कोशिश कर रहे हैं।
    जहां तक उनके साथ लोगों की संख्या का प्रश्न है, इसका सटीक आंकड़ों में मापन कठिन है। कोई आधिकारिक जनगणना या सदस्यता रजिस्टर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है, जिससे यह बताया जा सके कि कितने लोग सक्रिय रूप से आंदोलन से जुड़े हैं। हालांकि, बुंदेलखंड के विभिन्न जिलों में उनके समर्थक संगठन मौजूद हैं और समय-समय पर सैकड़ों-हजारों लोगों की रैलियां आयोजित की जाती रही हैं। यह भी सच है कि यह आंदोलन अभी तक उत्तराखंड आंदोलन जैसी व्यापक जनलहर का रूप नहीं ले सका है। जनसमर्थन क्षेत्र विशेष में केंद्रित है और इसे सर्वदलीय या सर्व समाज समर्थन नहीं मिला है। आंदोलन की एक चुनौती यह भी है कि बुंदेलखंड दो राज्यों उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में फैला है। यदि अलग राज्य बनाना हो तो दोनों राज्यों के हिस्सों को मिलाकर नया राज्य बनाना पड़ेगा, जिसके लिए दोनों विधानसभाओं और केंद्र सरकार की सहमति आवश्यक होगी। यह संवैधानिक और राजनीतिक दृष्टि से जटिल प्रक्रिया है। इसके अलावा, कुछ लोग तर्क देते हैं कि नया राज्य बनने से प्रशासनिक खर्च बढ़ेगा और सीमित संसाधनों वाले क्षेत्र पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ेगा।
    विरोधियों का कहना है कि समस्या राज्य के आकार में नहीं, बल्कि शासन की गुणवत्ता में है। यदि सिंचाई, जल संरक्षण, शिक्षा और स्वास्थ्य पर गंभीरता से काम हो तो बिना राज्य विभाजन के भी विकास संभव है। वे उदाहरण देते हैं कि विशेष पैकेज, जैसे बुंदेलखंड पैकेज, पहले भी दिए गए हैं। हालांकि समर्थक यह सवाल उठाते हैं कि इन पैकेजों का पूरा लाभ जमीन पर क्यों नहीं दिखा। बुंदेलखंड के अलग राज्य की मांग भावनात्मक, आर्थिक और प्रशासनिक तर्कों का मिश्रण है। यह केवल राजनीतिक महत्वाकांक्षा का सवाल नहीं, बल्कि क्षेत्रीय असंतोष की अभिव्यक्ति भी है। फिर भी, किसी भी नए राज्य के गठन के लिए व्यापक जनमत, राजनीतिक सहमति और आर्थिक व्यवहार्यता का स्पष्ट खाका जरूरी होता है। अभी तक यह आंदोलन प्रतीकात्मक और क्षेत्रीय स्तर पर सक्रिय है, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर निर्णायक समर्थन हासिल नहीं कर पाया है।
     राजा बुंदेला और उनके समर्थकों की सक्रियता ने इस मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है। वे इसे केवल राजनीतिक मांग नहीं, बल्कि बुंदेलखंड के सम्मान और अस्तित्व का प्रश्न बताते हैं। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह आंदोलन व्यापक जनसमर्थन जुटा पाता है और क्या राष्ट्रीय राजनीति में इसे वह स्थान मिल पाता है, जो कभी उत्तराखंड या झारखंड आंदोलनों को मिला था। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि बुंदेलखंड का प्रश्न केवल अलग राज्य के गठन तक सीमित नहीं है; यह उस व्यापक बहस का हिस्सा है, जिसमें क्षेत्रीय असमानता, विकास का मॉडल और शासन की जवाबदेही जैसे मूल प्रश्न शामिल हैं।
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Saturday, March 21, 2026

रिश्तों में नोकझोंक के दिलचस्प कथानक

   हिंदी सिनेमा को भारतीय समाज का दर्पण माना जाता रहा है। फिल्मों में दिखाई जाने वाली पारिवारिक कहानियां केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने समाज के रिश्तों, मूल्यों और संघर्षों को भी चित्रित किया। विशेष रूप से पति-पत्नी के रिश्तों में आने वाला तनाव और नोकझोंक फिल्मों का एक प्रमुख विषय रहा। भारतीय सिनेमा ने हमेशा समाज के रिश्तों को परदे पर उतारने की कोशिश की है। पति-पत्नी के रिश्ते को लेकर हिंदी फिल्मों में लंबे समय से कहानियां रची जाती रही। ब्लैक एंड व्हाइट दौर से लेकर आज के रंगीन और आधुनिक दौर तक कई फिल्मों के कथानक वैवाहिक जीवन के तनाव, गलतफहमियों, आपसी अहं और भावनात्मक टकराव के इर्द-गिर्द बुने गए हैं। लेकिन, रब ने बना दी जोड़ी, मर्दानी और 'तुम्हारी सुलू' जैसी फ़िल्में भी हैं जो रिश्तों में आपसी समझ दर्शाती हैं। 
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- हेमंत पाल

     ब्लैक एंड व्हाइट दौर से लेकर रंगीन सिनेमा और आधुनिक फिल्मों तक, कई फिल्मकारों ने पति-पत्नी के बीच के मतभेदों, गलतफहमियों, आर्थिक संकट, सामाजिक दबाव, तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी और पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण पैदा होने वाले तनाव को परदे पर उतारा है। इन फिल्मों में रिश्तों की कड़वाहट को दिखाया गया। लेकिन, दिलचस्प बात यह रही कि इनका अंत अक्सर सुखद और मेल-मिलाप से भरा हुआ होता था। समय के साथ समाज में वैवाहिक संबंधों की जटिलताएं बढ़ीं, लेकिन विडंबना यह है कि हिंदी सिनेमा से पति-पत्नी के तनावपूर्ण रिश्तों की पारंपरिक पारिवारिक कहानियां धीरे-धीरे कम होती चली गईं। आज की फिल्मों में प्रेम, ब्रेकअप या लिव-इन जैसे विषयों पर अधिक ध्यान है, जबकि विवाह के भीतर के संघर्षों पर आधारित पारिवारिक कथानक अपेक्षाकृत कम देखने को मिलते हैं।
    1950 और 1960 का दशक हिंदी सिनेमा का स्वर्णिम दौर माना जाता है। इस समय की फिल्मों में पारिवारिक रिश्तों की गहराई और सामाजिक मूल्यों को प्रमुखता से दिखाया गया। इस दौर में पति-पत्नी के बीच तनाव अक्सर सामाजिक परिस्थितियों, आर्थिक तंगी या पति के गलत निर्णयों के कारण पैदा होता था। फिल्मों में पत्नी को अक्सर धैर्य, त्याग और सहनशीलता का प्रतीक बनाया गया। उदाहरण के लिए फिल्म 'साहिब बीबी और गुलाम' (1962) में एक ऐसे जमींदार परिवार की कहानी दिखाई गई, जहां पति की शराब और अय्याशी की आदत पत्नी के जीवन को दुखों से भर देती हैं। पत्नी अपने पति का प्रेम पाने के लिए संघर्ष करती है, लेकिन उसका जीवन त्रासदी में बदल जाता है। इसी तरह 'घराना' (1961) और 'गृहस्थी' (1963) जैसी फिल्मों में संयुक्त परिवार और वैवाहिक जीवन के संघर्षों को संवेदनशील तरीके से दिखाया गया। इन फिल्मों की खास बात यह थी कि भले ही पति-पत्नी के बीच मतभेद दिखाए जाते थे, लेकिन परिवार और समाज के दबाव के कारण अंततः रिश्ते को बचाने की कोशिश होती थी।
   हिंदी फिल्मों में कई बार आर्थिक संकट को पति-पत्नी के रिश्तों में तनाव की बड़ी वजह के रूप में दिखाया गया। 1970 और 1980 के दशक की कई फिल्मों में मध्यमवर्गीय परिवारों के संघर्ष को दिखाया गया। बेरोजगारी, कम आय, बढ़ती जिम्मेदारियां और सामाजिक दबाव पति-पत्नी के बीच तनाव पैदा करते थे। लेकिन, 'अभिमान' (1973) में अलग तरह की कहानी रची गई। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन और जया भादुड़ी के अहं का टकराव दोनों में अलग होने की वजह बन जाता है। फिल्म में पति-पत्नी दोनों ही गायक हैं, लेकिन पत्नी की सफलता पति के अहंकार को चोट पहुंचाती है और रिश्ते में दरार पैदा हो जाती है। यह कहानी बताती है कि पेशेवर प्रतिस्पर्धा भी वैवाहिक जीवन को प्रभावित कर सकती है। इसी तरह 'आंधी' (1975) में राजनीतिक महत्वाकांक्षा और व्यक्तिगत जीवन के बीच टकराव को दिखाया गया। पति-पत्नी अलग हो जाते हैं, लेकिन सालों बाद उनके रिश्ते की भावनात्मक गहराई सामने आती है।
    हिंदी फिल्मों में पति-पत्नी के बीच तनाव का एक प्रमुख कारण तीसरे व्यक्ति का आ जाना भी रहा है फिल्म 'अर्थ' (1982) में विवाहेतर संबंधों के कारण टूटते रिश्तों की कहानी दिखाई गई। इसमें पत्नी अपने आत्मसम्मान के लिए पति से अलग होने का निर्णय लेती है। यह उस दौर की फिल्मों से अलग था जहां  अंत में मेल-मिलाप दिखाया जाता था। इसी तरह अमिताभ, रेखा और जया की फिल्म 'सिलसिला' (1981) में प्रेम, विवाह और समाज के बीच उलझे रिश्तों को दिखाया गया। इस फिल्म में भी पति-पत्नी के बीच तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी रिश्तों में तनाव पैदा करती है। इन फिल्मों ने यह दिखाया कि विवाह केवल सामाजिक संस्था नहीं बल्कि भावनात्मक और व्यक्तिगत संघर्षों से भी भरा होता है।
   1950 और 1960 के दशक के ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा में भी पति-पत्नी के रिश्तों की जटिलता को संवेदनशील तरीके से दिखाया गया। उदाहरण के तौर पर में एक उपेक्षित पत्नी की पीड़ा और पति की उदासीनता को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया था। इसी तरह में विवाह के बाद भी पुराने प्रेम संबंधों की वजह से पैदा हुए तनाव को भी कथानक बनाया गया। इन फिल्मों में रिश्तों के भीतर की खामोश दरारों को सामाजिक मर्यादाओं के साथ चित्रित किया गया। 1970 और 1980 के दशक में वैवाहिक रिश्तों की उलझनों को और खुलकर दिखाया। इन फिल्मों में पति के विवाहेतर संबंध के कारण टूटते रिश्ते और पत्नी के आत्मसम्मान की कहानी सामने आई। वहीं में प्रेम, विवाह और सामाजिक जिम्मेदारियों के बीच संघर्ष को दर्शाया गया। इन फिल्मों में तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी अक्सर पति-पत्नी के बीच तनाव का मुख्य कारण बनती है।
    दिलचस्प बात यह है कि अधिकांश हिंदी फिल्मों में भले ही कहानी का बड़ा हिस्सा पति-पत्नी के कटु रिश्तों, गलतफहमियों या किसी तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी से पैदा हुए तनाव पर आधारित रहा हो, लेकिन उनका अंत अक्सर सुखद ही रहा। फिल्मकारों ने अंत में रिश्तों के पुनर्मिलन, समझदारी या आत्मबोध के जरिए एक सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की। दरअसल, हिंदी सिनेमा का यह रुझान भारतीय समाज की उस सोच को भी दर्शाता है जिसमें विवाह को केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं, बल्कि एक सामाजिक संस्था माना जाता है। इसलिए फिल्में रिश्तों के संकट को दिखाती जरूर हैं, लेकिन अंत में उन्हें संभालने की उम्मीद भी छोड़ती हैं। यही कारण है कि ब्लैक एंड व्हाइट दौर से लेकर आज तक पति-पत्नी के तनावपूर्ण रिश्ते हिंदी फिल्मों की कहानियों का अहम हिस्सा बने हुए हैं।
    कुछ फिल्मों में मुस्लिम सामाजिक कथानक के भीतर तलाक या अलगाव की स्थिति को भी दिखाया गया। इसका प्रमुख उदाहरण है, जिसमें रिश्तों में संवेदनशीलता और गलतफहमी के कारण तलाक की स्थिति पैदा होती है। हालांकि कहानी अंततः रिश्तों और जिम्मेदारियों पर गंभीर सवाल भी खड़े करती है। नई सदी में भी यह विषय खत्म नहीं हुआ। और जैसी फिल्मों ने आधुनिक वैवाहिक जीवन में सम्मान, अपेक्षाओं और भावनात्मक दूरी को केंद्र में रखा। हिंदी सिनेमा में मुस्लिम सामाजिक फिल्मों की भी एक अलग परंपरा रही है। इन फिल्मों में विवाह, तलाक और सामाजिक मान्यताओं से जुड़े मुद्दों को दिखाया गया। फिल्म 'निकाह' (1982) इस संदर्भ में बेहद महत्वपूर्ण है। इसमें तलाक और वैवाहिक रिश्तों की जटिलताओं को संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत किया गया। फिल्म ने यह सवाल उठाया कि क्या तलाक केवल एक कानूनी प्रक्रिया है या इसके पीछे भावनात्मक और सामाजिक दर्द भी छिपा होता है। 
    हिंदी फिल्मों की एक प्रमुख विशेषता यह रही कि अधिकांश पारिवारिक फिल्मों का अंत सुखद होता था भले ही कहानी में पति-पत्नी के बीच कितने भी संघर्ष दिखाए जाएं, अंत में गलतफहमियां दूर हो जाती थीं और परिवार फिर से एक हो जाता था। इस प्रवृत्ति के पीछे भारतीय समाज की पारिवारिक संरचना और विवाह संस्था के प्रति सम्मान की भावना थी। दर्शक भी ऐसी कहानियां पसंद करते थे जिनमें अंत में रिश्ते बच जाते थे। यही कारण है कि 1960 से 1990 तक की कई फिल्मों में संघर्ष के बावजूद अंत में मेल-मिलाप दिखाई देता था। 1990 के बाद हिंदी सिनेमा में बड़े बदलाव आए। ग्लोबलाइजेशन, शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण फिल्मों के विषय भी बदलने लगे। इस दौर में रोमांटिक प्रेम कहानियां और युवा दर्शकों को ध्यान में रखकर बनाई गई फिल्में अधिक लोकप्रिय हुईं। हालांकि, 'अस्तित्व' (2000) जैसी कुछ फिल्मों ने विवाह के भीतर की जटिलताओं को गंभीरता से उठाया, लेकिन ऐसी फिल्में मुख्यधारा में कम ही बनीं। धीरे-धीरे पारिवारिक संघर्षों पर आधारित पारंपरिक कथानक सिनेमा से गायब होने लगे।
    आज समाज में तलाक, वैवाहिक विवाद और पारिवारिक तनाव पहले से अधिक दिखाई देते हैं। शहरी जीवन, करियर का दबाव, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के कारण पति-पत्नी के रिश्ते अधिक जटिल हो गए हैं। लेकिन, आश्चर्य की बात यह है कि हिंदी सिनेमा इन विषयों को इतनी गहराई से नहीं दिखा रहा जितना पहले दिखाया जाता था। अब फिल्मों में विवाह के बाद के संघर्षों की जगह प्रेम-कहानियों, ब्रेकअप या व्यक्तिगत स्वतंत्रता की कहानियों को अधिक महत्व दिया जा रहा है। हिंदी सिनेमा का इतिहास बताता है कि फिल्में हमेशा समाज के बदलावों के साथ बदलती रही हैं। संभव है कि आने वाले समय में फिल्मकार फिर से वैवाहिक रिश्तों की जटिलताओं को गंभीरता से पर्दे पर लाएँ। क्योंकि पति-पत्नी का रिश्ता भारतीय समाज की सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है और इसमें आने वाले संघर्ष हमेशा कहानी कहने के लिए मजबूत आधार प्रदान करते हैं। यदि इन विषयों को संवेदनशीलता और यथार्थ के साथ प्रस्तुत किया जाए, तो वे दर्शकों को न केवल मनोरंजन बल्कि समाज को समझने का अवसर भी दे सकते हैं।
    ऐसी फिल्मों ने पति-पत्नी के रिश्तों को केवल पारिवारिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक विमर्श का विषय भी बनाया। कई फिल्मों में पति-पत्नी के बीच तनाव का कारण बच्चों की जिम्मेदारियां और परिवार की अपेक्षाएं भी रही हैं। फिल्म 'मासूम' (1983) में पति के अतीत से पैदा हुआ एक बच्चा परिवार में तनाव का कारण बनता है। पत्नी के सामने सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि क्या वह उस बच्चे को स्वीकार कर पाएगी। हिंदी सिनेमा ने ब्लैक-एंड-व्हाइट दौर से लेकर आधुनिक समय तक पति-पत्नी के रिश्तों की कई परतों को परदे पर उकेरा है। कभी आर्थिक संघर्ष, कभी अहंकार, कभी तीसरे व्यक्ति की मौजूदगी और कभी पारिवारिक जिम्मेदारियों ने इन रिश्तों में तनाव पैदा किया। इन कहानियों की सबसे खास बात यह रही कि वे केवल संघर्ष नहीं दिखाती थीं, बल्कि रिश्तों को बचाने की कोशिश भी करती थीं। आज जबकि समाज में वैवाहिक रिश्तों की चुनौतियां बढ़ रही हैं, हिंदी सिनेमा के सामने यह अवसर है कि वह फिर से ऐसे विषयों को गंभीरता से उठाए और रिश्तों की जटिलताओं को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करे। क्योंकि, अंततः सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज के भावनात्मक इतिहास को दर्ज करने का भी माध्यम है।
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