Monday, September 14, 2026

सिनेमा में गणेश और कृष्ण का युगीन प्रभाव

    भारतीय सिनेमा का भक्ति परंपरा से नाता उसकी स्थापना के समय से ही अटूट रहा है। जब मूक फिल्मों के बाद परदे ने बोलना सीखा, तब पौराणिक आख्यानों और देव चरित्रों ने सिनेमा कैनवास को एक नई पहचान दी। ब्लैक एंड व्हाइट दौर की धार्मिक फिल्मों से लेकर आज के आधुनिक, तकनीक-संचालित और एक्शन-प्रधान सिनेमा तक, पटकथाओं में ईश्वर के प्रति आस्था को अलग-अलग तरीकों से बुना गया है। यद्यपि फिल्मों के कथानक में समय-समय पर अनेक देवी-देवताओं का स्मरण किया गया। लेकिन, ब्लैक एंड व्हाइट ज़माने से लेकर आज के दौर तक सबसे अधिक उपस्थिति, पूजा और वंदना जिस देव की दिखाई दी, वे विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश हैं। उनके ठीक बाद यदि किसी देव की लीला, भक्ति और जीवन दर्शन का प्रभाव भारतीय फिल्मों पर सबसे गहरा और व्यापक रहा, तो वे हैं भगवान श्रीकृष्ण। फिल्मों में गानों की रचना की दृष्टि से भी देखा जाए, तो गजानन के ही सबसे अधिक और ऊर्जावान गीत रचे गए, जो दशकों से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करते आ रहे हैं।
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- हेमंत पाल

    सिनेमा और भक्ति का रिश्ता उतना ही पुराना है जितना भारतीय फिल्म उद्योग का इतिहास। जब मूक सिनेमा का दौर समाप्त हुआ और सवाक फिल्मों का आगमन हुआ, तब पौराणिक कथाओं और देवताओं की स्तुति को कहानियों का केंद्र बनाया गया। फिल्मों के कथानक में समय-समय पर अनेक देवी-देवताओं का स्मरण किया गया, लेकिन ब्लैक एंड व्हाइट दौर से लेकर आज के आधुनिक मल्टीप्लेक्स सिनेमा तक, जिस देव की सबसे अधिक वंदना और भक्ति परदे पर दिखाई दी, वे विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश हैं। उनके बाद यदि किसी देव का प्रभाव सिनेमाई कैनवास पर सबसे गहरा रहा, तो वे हैं लीलाधर भगवान श्रीकृष्ण। भारतीय संस्कृति में गणेश जी प्रथम पूज्य हैं। सिनेमा ने भी इस परंपरा का अक्षरशः पालन किया। किसी भी बड़े मिशन, पारिवारिक कहानी, एक्शन ड्रामा या गैंगस्टर थ्रिलर में संकट के निवारण अथवा नई शुरुआत के लिए प्रथम पूज्य गजानन की वंदना अनिवार्य अंग बनी। शुरुआती ब्लैक एंड व्हाइट दौर में 'श्री गणेश महिमा' और 'श्री गणेश विवाह' जैसी धार्मिक फिल्मों से शुरू हुआ यह सफर व्यावसायिक सिनेमा के ताने-बाने में इस तरह रचा-बसा कि 'देवता' केवल मंदिर के दृश्य तक सीमित न रहकर सीधे कथानक का हिस्सा बन गए।
     फिल्मों में गणेश जी के गानों की बहुलता और उनकी स्वीकार्यता का मुख्य कारण उनका विघ्नहर्ता रूप और मराठी संस्कृति में गणेशोत्सव का बृहद प्रभाव है। मुंबई, जो हिंदी सिनेमा की कर्मभूमि है, वहाँ गणेशोत्सव केवल धार्मिक अनुष्ठान न होकर एक सामाजिक उत्सव है। फिल्मकारों ने इस स्थानीय ऊर्जा को पर्दे पर उतारने के लिए गणेश जी पर केंद्रित गीतों को कहानी के महत्वपूर्ण मोड़ (क्लाइमेक्स या टर्निंग पॉइंट) पर इस्तेमाल किया। ब्लैक एंड व्हाइट और क्लासिक दौर में गणेश वंदना का रूप पारंपरिक और शास्त्रीय रहा। 'श्री गणेश विवाह' का प्रसिद्ध गीत 'जय वंदन गिरिजा के नंदन' या 'हमसे बढ़कर कौन' का कालजयी गीत 'देवा हो देवा गणपति देवा, तुमसे बढ़कर कौन' इस बात का प्रमाण हैं कि किस प्रकार गणेश वंदना पूरे जनमानस को झूमने पर मजबूर कर देती थी। फिल्म 'दर्द का रिश्ता' में 'गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ' ने मानवीय संवेदनाओं और बीमारी से जूझती एक बच्ची के भावनात्मक मोड़ को गणेश उत्सव से जोड़ा।
     जैसे-जैसे सिनेमा बदला, गणेश गीतों का शिल्प भी बदला। 90 के दशक में फिल्म 'वास्तव' का गीत 'सिंदूर लाल चढ़ायो अच्छा गजमुख को' एक ओर तो गंभीर पूजा की अनुभूति कराता है, वहीं दूसरी ओर कहानी में नायक के जीवन में आने वाले बड़े तूफान का संकेत देता है। इसके बाद आधुनिक दौर की 'अग्निपथ' का 'देवा श्री गणेशा' गीत न केवल संगीत की दृष्टि से भव्य है, बल्कि यह नायक के प्रतिशोध और धर्म युद्ध की शुरुआत का प्रतीक बनता है। इसी तरह 'डॉन' फिल्म में 'मोर्या रे बाप्पा मोरिया रे', 'एबीसीडी' का 'हे गणराया' और 'बजरंगी भाईजान' में 'सेलफ़ी ले ले रे' के साथ गणेश वंदना का समावेश यह दर्शाता है कि गणेश जी का प्रभाव हर वर्ग के सिनेमा में शीर्ष पर रहा है। गणेश जी के बाद हिंदी सिनेमा के कथानक और संगीत पर सबसे गहरा प्रभाव भगवान श्रीकृष्ण का रहा है। श्रीकृष्ण का चरित्र बहुआयामी है। वे माखनचोर हैं, प्रेमी हैं, मित्र हैं, कूटनीतिज्ञ हैं और न्याय के रक्षक हैं। इसी कारण फिल्मकारों ने कृष्ण लीला को विभिन्न मानवीय भावनाओं को दर्शाने के लिए उपयोग किया। विशेष रूप से जन्माष्टमी के अवसर पर माखन मटकी फोड़ने के दृश्य हिंदी फिल्मों का एक बेहद लोकप्रिय फॉर्मेट बने।
      फिल्म 'ब्लफ मास्टर' का गीत 'गोविंदा आला रे आला जरा मटकी संभाल बृजबाला' ने सिनेमा में दही हांडी की परंपरा को अमर कर दिया। इसके बाद 'खुद्दार' का 'मच गया शोर सारी नगरी रे', 'हेलो ब्रदर' का 'चांदी की डाल पर सोने का मोर' और आधुनिक सिनेमा में 'ओ माय गॉड' का 'गो गो गोविंदा' यह स्पष्ट करता है कि श्रीकृष्ण का बाल-रूप और उनकी नटखट लीलाएं युवाओं के उल्लास को दिखाने का सबसे सशक्त माध्यम बनीं। जहाँ एक तरफ कृष्ण के गोकुल अवतार को उत्सव के रूप में दिखाया गया, वहीं दूसरी ओर उनके प्रेमावतार राधा-कृष्ण के संबंध को प्रेम गीतों के रूप में पेश किया गया। फिल्म 'लगाान' का 'राधा कैसे ना जले' गीत शास्त्रीयता और समकालीन सिनेमा का बेहतरीन उदाहरण है, जहां नायक-नायिका के बीच के मीठे प्रेम-कलह को राधा और कृष्ण के प्रसंग से जोड़ा गया। इसी तरह 'सत्यम शिवम सुंदरम' का 'यशोमति मईया से बोले नंदलाला' और 'गाइड' का 'पिया तोसे नैना लागे रे' में छिपी कृष्ण भक्ति का प्रभाव सिनेमा इतिहास की अमूल्य धरोहर है।
      यदि तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो गणेश जी और श्रीकृष्ण दोनों का ही उपयोग फिल्मों में अलग-अलग उद्देश्यों के लिए हुआ, लेकिन गानों की संख्या और उत्सवधर्मिता के मामले में गणेश जी हमेशा आगे रहे। गणेश जी के गीत अक्सर फिल्म के मुख्य नायक के बड़े संकल्प, समाज के एकत्रीकरण या फिर किसी विशाल आयोजन को स्थापित करने के लिए रचे गए। गणेश जी का रूप विघ्नहर्ता का है, इसलिए जब भी कहानी में कोई बड़ा संकट आया या किसी बड़े मिशन की शुरुआत हुई, तो पटकथा लेखकों ने गणेश वंदना का ही सहारा लिया। दूसरी ओर, श्रीकृष्ण के भजनों और गीतों का प्रयोग चरित्रों के व्यक्तिगत भावों, भक्ति, नटखटपन, प्रेम या जीवन दर्शन को उभारने के लिए किया गया।
     'शोले' में जब भी धार्मिक आस्था या न्याय की बात आती है तो पृष्ठभूमि में ईश्वर का स्मरण होता है, लेकिन जब त्यौहार और जनसमूह के बीच ऊर्जा भरने की बात आती है, तो गणेश उत्सव का दृश्य सबसे अधिक प्रभावशाली सिद्ध होता है। ब्लैक एंड व्हाइट दौर के सादे और भक्तिभाव से पूर्ण भजनों से लेकर आज के रॉक और फ़्यूज़न धुनों पर थिरकते गणेश वंदना के गानों तक, सिनेमा ने यह सिद्ध किया है कि विघ्नहर्ता भगवान गणेश भारतीय दर्शकों के दिल के सबसे करीब हैं। गणेश जी के गीतों की लय में जो सामूहिकता, ढोल-ताशों की गूँज और उत्साह होता है, वह किसी भी अन्य देव स्तुति की तुलना में सिनेमाई पर्दे पर अधिक भव्य और प्रभावशाली दिखता है। इसी कारण ब्लैक एंड व्हाइट ज़माने से लेकर आज तक, भारतीय फिल्मों के कथानक में भगवान गणेश की पूजा सबसे शीर्ष पर रही और उनके बाद श्रीकृष्ण की लीलाओं ने भारतीय सिनेमा के पर्दे को भक्ति और आनंद से सराबोर रखा।
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धार्मिक आस्था के सामने मंद पड़े सितारे


     सिनेमा कारोबार के बारे में आम धारणा रही है कि बड़े सितारे, भारी बजट और जोरदार प्रचार किसी फिल्म की सफलता की बड़ी गारंटी नहीं होते। हिंदी फिल्मों के इतिहास ने बार-बार इस धारणा को सही साबित किया। कभी किसी अनजान कलाकार की छोटी फिल्म दर्शकों के बीच अपनी जगह बना लेती है तो कभी बिना बड़े प्रचार के बनी धार्मिक फिल्म लंबे समय तक सिनेमाघरों में टिकी रहती है। अब ‘हनुमान अंश’ की सफलता इसी परंपरा की नई कड़ी बनकर सामने आई। 2 करोड़ से भी कम लागत से बनी नीम करोली बाबा के जीवन और उनकी आध्यात्मिक यात्रा से प्रेरित इस फिल्म ने बड़ी फिल्मों के बीच अपनी जगह बनाई। कमजोर शुरुआती प्रदर्शन के बाद फिल्म की कमाई जिस तरह बढ़ी, उसने 50 साल पहले प्रदर्शित हुई ‘जय संतोषी मां’ की याद ताजा कर दी, जिसने 'शोले' जैसी फिल्म के सामने अपनी जगह बनाई थी।
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- हेमंत पाल

   न दिनों ‘हनुमान अंश’ फिल्म खासी चर्चा में है। यह फिल्म नीम करौली बाबा की आध्यात्मिक यात्रा पर केंद्रित है। इस फिल्म ने अपने सामने बड़े सितारों से सजी फिल्मों के कारोबार पर खासा असर डाला। जबकि, इस फिल्म का कोई प्रचार नहीं हुआ और न निर्माण पर बड़ा खर्च किया गया। फिल्म ऐसे बालक की यात्रा दिखाती है, जो मां को खोने के बाद ईश्वर की तलाश में निकलता है और धीरे-धीरे सेवा, त्याग और भक्ति के रास्ते पर आगे बढ़ता हुआ नीम करोली बाबा के रूप में सामने आता है। फिल्म का जोर चमत्कारों से ज्यादा आस्था, करुणा और मानव सेवा पर है। यही शायद इसकी सबसे बड़ी विशेषता भी बन गई। दिलचस्प बात यह कि फिल्म की शुरुआत ऐसी नहीं थी, जिससे उसके लंबे समय तक चलने का अनुमान लगाया जाए। पहले सप्ताह में कारोबार कमजोर रहा, दूसरे सप्ताह में तो इसके सिनेमाघरों से उतरने की चर्चा शुरू हो गई थी। कारोबार करीब 40 लाख रुपए तक सिमट गया था। लेकिन, इसके बाद दर्शकों की प्रतिक्रिया ने पूरी तस्वीर बदल दी। तीसरे सप्ताह से दर्शकों की संख्या बढ़ने लगी और चौथे सप्ताह तक कई जगहों पर इसके शो भरने लगे। यही वह दौर था, जब फिल्म ने बड़े बजट वाली फिल्मों के बीच अपनी मजबूत जगह बनानी शुरू की। फिल्म की कमजोर शुरुआत के बाद तेजी से उभरने और सकारात्मक दर्शक प्रतिक्रिया को इसकी सफलता की बड़ी वजह बताया गया।
    करीब 2 करोड़ रुपए में बनी फिल्म का 50 करोड़ से ज्यादा के कारोबार तक पहुंचना इसलिए भी उल्लेखनीय है, क्योंकि इसके प्रदर्शन के समय बड़ी स्टारकास्ट और भारी बजट वाली फिल्में थीं। ‘टॉक्सिक’ में यश जैसे बड़े सितारे हैं, जबकि ‘आवारापन 2’ और ‘बंटवारा 1947’ भी दर्शकों के बीच चर्चा में थीं। ऐसे माहौल में ‘हनुमान अंश’ को अतिरिक्त स्क्रीन मिलना बताता है, कि सिनेमाघर वाले भी दर्शकों की मांग को नजरअंदाज नहीं कर सकते। ताजा रिपोर्ट के अनुसार फिल्म 50 करोड़ के कारोबार का आंकड़ा पार कर चुकी है। फिल्म की खासियत उसका सीमित प्रचार है। न तो इसके पीछे किसी बड़े सितारे का नाम था और न इसे करोड़ों रुपए के प्रचार अभियान का सहारा मिला। मुख्य भूमिका निभाने वाले शॉबिनव सत्य भी दर्शकों के लिए नया चेहरा हैं। खास बात यह कि वे फिल्म के निर्माण के दौरान सहायक निर्देशक के रूप में काम कर रहे थे, लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनी कि उन्हें ही मुख्य भूमिका निभाना पड़ी। निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने उनका लंबा स्क्रीन टेस्ट लिया और उन्हें भूमिका के लिए चुना। आज यही नया चेहरा फिल्म की सफलता की पहचान बन गया।
      ऐसी ही कहानी 50 साल पहले कुछ अलग रूप में सामने आई थी। 15 अगस्त 1975 को हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल ‘शोले’ प्रदर्शित हुई थी। अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, जया भादुड़ी और अमजद खान जैसे सितारों से सजी, रमेश सिप्पी के निर्देशन में बनी इस फिल्म को लेकर पहले से ही जबरदस्त उत्सुकता थी। उसी दिन एक बेहद कम बजट की धार्मिक फिल्म ‘जय संतोषी मां’ भी सिनेमाघरों में पहुंची। फिल्म में कोई बड़ा सितारा नहीं था, लेकिन दर्शकों ने उसे ऐसा अपनाया कि वह अपने समय की सबसे बड़ी सफल धार्मिक फिल्मों में शामिल हो गई। खास बात यह भी कि धार्मिक ग्रंथों में भी संतोषी माता का उल्लेख अन्य देवी-देवताओं के मुकाबले कम ही मिलता है। ‘जय संतोषी मां’ की सफलता का स्वरूप केवल टिकट खिड़की तक सीमित नहीं रहा। कई जगह दर्शक फिल्म देखने से पहले दर्शक चप्पल उतारते और परदे की आरती करते थे। इसके गीत भी घर-घर पहुंचे। ‘जय संतोषी मां’ और ‘मैं तो आरती उतारूं रे संतोषी माता की’ जैसे भजन आज भी उस दौर की याद दिलाते हैं। इस फिल्म का कारोबार करीब 5 करोड़ रुपए तक पहुंचा था, जो उस समय के लिहाज से असाधारण सफलता थी।
    1975 में न तो सामाजिक माध्यम थे, न इंटरनेट, न ऑनलाइन टिकट बुकिंग और न फिल्म का प्रचार कुछ ही घंटों में देशभर में पहुंचाने वाली व्यवस्था। ‘जय संतोषी मां’ को दर्शकों तक पहुंचाने का माध्यम मुख्य रूप से लोगों की बातचीत, गीत, धार्मिक वातावरण और सिनेमाघरों में बनी चर्चा थी। दूसरी ओर ‘हनुमान अंश’ ऐसे समय में आई है, जब एक दर्शक का अनुभव कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। इसके बावजूद दोनों फिल्मों की सफलता में एक समान सूत्र दिखाई देता है। दर्शकों ने पहले उन्हें स्वीकार किया और उसके बाद कारोबार बढ़ता चला गया। यही ‘वर्ड ऑफ माउथ’ यानी दर्शकों की जुबानी चर्चा की ताकत है। कोई फिल्म पहले दिन शानदार कारोबार कर सकती है, लेकिन अगर दर्शक उसे पसंद नहीं करते तो अगले कुछ दिनों में उसकी रफ्तार टूट सकती है। इसके उलट कमजोर शुरुआत वाली फिल्म अगर दर्शकों को पसंद आ जाए तो वह कई सप्ताह तक आगे बढ़ सकती है। ‘हनुमान अंश’ इसका ताजा उदाहरण है। फिल्म के निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने भी शुरुआती प्रदर्शन के आधार पर फिल्म को असफल मानने को जल्दबाजी बताया।
    यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि धार्मिक विषय अपने आप किसी फिल्म को सफल बना देता है। हिंदी सिनेमा में धार्मिक और पौराणिक विषयों पर बनी कई फिल्में दर्शकों की कसौटी पर खरी नहीं उतरीं। इसका सबसे ताजा उदाहरण ‘आदिपुरुष’ है। प्रभास, कृति सैनन और सैफ अली खान अभिनीत इस फिल्म पर भारी रकम खर्च की गई थी। शुरुआती दौर में शानदार कारोबार के बावजूद दर्शकों की नकारात्मक प्रतिक्रिया ने इसकी कमाई की रफ्तार रोक दी। संवाद, प्रस्तुति और दृश्य प्रभावों को लेकर भारी आलोचना हुई और फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर बड़ी असफल फिल्म माना गया। इससे साफ है कि धार्मिक फिल्म के लिए केवल धार्मिक विषय पर्याप्त नहीं है। दर्शक यह भी देखते हैं कि कहानी किस तरह कही गई है, पात्र कितने विश्वसनीय हैं और फिल्म उनकी भावनाओं से कितना जुड़ पाती है। ‘हनुमान अंश’ की सफलता इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है। फिल्म ने आस्था को बड़े दृश्य प्रभावों या भारी-भरकम प्रस्तुति के बजाय एक व्यक्ति की जीवन यात्रा और सेवा भावना से जोड़ने की कोशिश की है।
    सिनेमा का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, हर हर महादेव, संपूर्ण रामायण, जय संतोषी मां, गंगा जमुना सरस्वती जैसे अलग-अलग दौर की धार्मिक और आध्यात्मिक फिल्मों ने अपनी-अपनी तरह से दर्शकों पर प्रभाव छोड़ा। बाद के दौर में जय हनुमान, बाल गणेश और 'रामायण' तथा 'कृष्ण' से जुड़े टेलीविजन धारावाहिकों ने भी धार्मिक कथाओं के लिए दर्शकों की स्थायी रुचि को सामने रखा। दक्षिण भारतीय सिनेमा की ‘कांतारा’ जैसी फिल्म ने भी लोक आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक विश्वास को आधुनिक कहानी के साथ जोड़कर व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाया। दरअसल, धार्मिक फिल्मों की सफलता का इतिहास केवल भगवान की कहानियों का इतिहास नहीं है। यह भारतीय समाज की सामूहिक आस्था, लोक परंपराओं और भावनात्मक स्मृतियों का भी इतिहास है। ‘जय संतोषी मां’ ने 1975 में यह दिखाया था कि दर्शक बिना बड़े सितारों के भी किसी फिल्म को सिर-आंखों पर बैठा सकते हैं। 2026 की ‘हनुमान अंश’ ने लगभग आधी सदी बाद उसी बात को नए दौर की भाषा में दोहरा दिया।
   अंतर सिर्फ इतना आया कि तब फिल्म की सफलता के लिए दर्शकों की लंबी कतारें और आपसी चर्चा माध्यम थीं, आज उसी चर्चा को सामाजिक माध्यम और ऑनलाइन टिकट बुकिंग भी गति देते हैं। लेकिन, दर्शक का मूल निर्णय आज भी वही है कि फिल्म उसे भीतर से छूती है या नहीं। इसीलिए ‘हनुमान अंश’ की कहानी केवल 2 करोड़ रुपए की फिल्म के 50 करोड़ रुपए कमाने की कहानी नहीं है। यह उस पुराने फिल्मी सिद्धांत की वापसी है जिसमें प्रचार से ज्यादा दर्शक की पसंद मायने रखती है। ‘जय संतोषी मां’ और ‘हनुमान अंश’ के बीच 50 साल का फासला जरूर है, लेकिन दोनों की सफलता में एक समान धड़कन सुनाई देती है। पहले दर्शक ने फिल्म को खोजा, फिर फिल्म दर्शकों की जुबान पर चढ़ी और आखिरकार सिनेमाघरों तक भीड़ पहुंच गई। यही वह ताकत है, जो कभी-कभी बड़े सितारों और करोड़ों के बजट पर भी भारी पड़ जाती है।
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Saturday, August 29, 2026

बेमानी बोल, रूहानी धुन और 'अर्थहीन' तुकबंदी

    फिल्म संगीत की दुनिया में गानों को अक्सर उनकी गहरी शायरी, दिल को छू लेने वाली गजलों और संवेदना से भरे अल्फाजों के लिए जाना जाता है। लेकिन, सिनेमा के इस समंदर में एक ऐसा किनारा ऐसा भी है, जहां शब्दों के अर्थ मायने नहीं रखते, बल्कि उनकी लय और रिदम श्रोताओं के सिर चढ़कर बोलती है। लोग सोचते हैं कि गानों के बोल अगर बेतुके या अर्थहीन हों, तो वे जल्दी भूला दिए जाएंगे। लेकिन, फिल्म इंडस्ट्री का इतिहास इस बात का गवाह है, कि जब भी किसी संगीतकार ने गीतों की भाषा के नियमों को किनारे कर केवल 'धुन की चुटकी' ली, तब वे गीत सिर चढ़कर बोले हैं। 'तम्मा तम्मा लोगे' से लेकर 'तूतक तूतक तूतिया' तक और 'ईना मीना डीका' से लेकर आधुनिक दौर के 'ताऊबा ताऊबा' तक, यह सिलसिला संयोग नहीं, बल्कि सिनेमा की एक नियोजित और समृद्ध परंपरा है। जाने-माने गीतकार प्रसून जोशी ने एक कार्यक्रम में 'दिल्ली-6' में अपने लिखे एक गीत 'मसक्कली' की रचना की कहानी सुनाते हुए यह राज भी खोला है।
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- हेमंत पाल

    हिंदी फिल्मों में निरर्थक शब्दों जिन्हें पाश्चात्य संगीत में 'स्केटिंग' या 'नॉन-लेक्सिकल वोकेबल्स' कहा जाता है, इनका प्रयोग कोई 80 या 90 के दशक की देन नहीं है। इस ट्रेंड की शुरुआत आजादी के ठीक बाद 1940 और 1950 के दशक में हुई। जब पश्चिमी रॉक एन रोल, जैज़ और लैटिन संगीत भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ घुलने-मिलने लगा, तब संगीतकारों को महसूस हुआ कि हर बार भारी-भरकम उर्दू या हिंदी शब्दों से थिरकने वाली धुनें नहीं बनाई जा सकतीं। इस चलन को स्थापित करने का पहला बड़ा श्रेय महान संगीतकार सी रामचंद्र (चितलकर) को जाता है। 1947 की फिल्म 'शहनाई' में उन्होंने 'छुक छुक छैयां' जैसे शब्दों का प्रयोग किया। लेकिन, 1957 की फिल्म 'आशा' में जब किशोर कुमार और आशा भोसले की आवाज में 'ईना मीना डीका, दे दाई दमनिका, माका नाका' गूंजा, तो मानो हिंदी सिनेमा को एक नया संगीतमय झुनझुना मिल गया। बच्चों के खेल 'ईनी मिनी माइनी मो' से प्रेरित होकर बने इस गीत में कोंकणी शब्द 'माका नाका' और 'रम पम पोस' जैसी तुकबंदी को जोड़ा गया था। इस एक प्रयोग ने साबित कर दिया कि दर्शक केवल शब्द सुनने नहीं, बल्कि उस ऊर्जा को महसूस करने के लिए भी थिरकते हैं। इस दौर में 'लारा लप्पा लारा लप्पा लाई रखदा' (एक थी लड़की, 1949) जैसे गानों ने साबित कर दिया कि अगर मुखड़ा जुबां पर चढ़ जाए, तो फिर उसका कोई शब्दकोशीय अर्थ ढूंढने की जरूरत नहीं पड़ती।
    एक बार जब ऐसे गीतों का दरवाजा खुला, तो फिल्म इंडस्ट्री के हर बड़े संगीतकार ने इसमें अपनी तरफ से रंग भरने का मौका नहीं छोड़ा। यह ऐसा दायरा बन गया, जहां प्रयोग करने की कोई पाबंदी नहीं थी। 1960 के दशक में 'जंगली' का 'याहू .., चाहे कोई मुझे जंगली कहे' आया था। यहां 'याहू' कोई शब्द नहीं, बल्कि एक उल्लासपूर्ण चीख थी, जिसने शम्मी कपूर को स्टारडम के शिखर पर पहुंचा दिया। इस फिल्म में 'अई अईया करूँ मैं क्या, सुक्कू सुक्कू' जैसा गाना भी आया, जो अर्जेंटीना की धुन से प्रेरित था और जिसका हिंदी में कोई शाब्दिक अर्थ नहीं होता। इसके बाद 'जब जब फूल खिले' का 'अफ्फू खुदा' और 'लव इन टोक्यो' का 'सायोनारा' जैसे बोल गूंजे, जिन्होंने विदेशों की भाषा और बेतुके ध्वनि वाले शब्दों को भारतीय दिलों की धड़कन बना दिया। 1970 और 1980 के दशक में आरडी. बर्मन और बप्पी लहरी ने इस विधा को नया मुकाम दिया। आरडी बर्मन ने 'जवानी दीवानी' में 'गिली गिली अक्खा, बिली बिली बिली' जैसे निरर्थक शब्दों से कमाल का समां बांधा।
    बप्पी लहरी इससे कहीं आगे निकल गए, उन्होंने 'मवाली' (1983) के 'उई अम्मा उई अम्मा' की धुन को सालों बाद 2011 में 'द डर्टी पिक्चर' के 'ऊह ला ला' में तब्दील कर दिया। फ्रेंच भाषा का एक विस्मयसूचक शब्द 'ऊह ला ला' भारतीय घरों में बच्चा-बच्चा गाने लगा। अगर हम गानों की गिनती करने बैठें, तो ऐसे सैकड़ों गीत मिल जाएंगे। 1989 की फिल्म 'थानेदार' का 'तम्मा तम्मा लोगे' हो या 'गैंगस्टर' का 'या अली' या फिर सिंधी लोकगीत 'हो जमालो' से प्रेरित होकर पंजाबी भांगड़ा शैली में ढला 'तूतक तूतक तूतिया' इन सभी गानों में मुखड़े या अंतरे के बोल केवल लय (रिदम) को सहारा देने के लिए बनाए गए थे। 90 के दशक में तो यह चलन चरम पर पहुंच गया, जब 'हाय हुकु हाय हुकु', 'गेला गेला', 'चिन्नम्मा चिलकामा' और 'हुक्का मारो' जैसे गानों ने ऑडियो कैसेट और सीडी के बाजार में धूम मचा दी थी। फ़िल्म 'दिल्ली 6' का एक गीत 'मसक्कली मसक्कली' भी इसी श्रेणी का है। इस गीत के बारे में गीतकार प्रसून जोशी ने एक कार्यक्रम में बताया था कि हिंदी में 'मसक्कली' कोई शब्द नहीं है। लेकिन, फिल्म के संगीतकार एआर रहमान ने एक ऐसी धुन बनाई, जिसे सुनकर मेरे दिमाग में यह शब्द आया और मैंने वह गीत लिख दिया। बाद में सवाल उठा कि इस 'मसक्कली' शब्द को जस्टिफाई कैसे करेंगे, तो फिल्म में कबूतर का नाम मसक्कली रखकर इस मसले को हल किया गया।
     संगीत के जानकारों और मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, ऐसे गानों की सफलता के पीछे एक गहरा वैज्ञानिक और संगीतमय कारण होता है। जब कोई इंसान संगीत सुनता है, तो उसका मस्तिष्क सबसे पहले धुन की लय से जुड़ता है। यदि बोल बेहद जटिल और कठिन शब्दावली वाले होंगे, तो मस्तिष्क का ध्यान उनका अर्थ समझने में लग जाता है। लेकिन, जब बोल ऊह ला ला, सुक्कू सुक्कू या 'तूतक तूतक' जैसे सरल और निरर्थक होते हैं, तो इंसान का ध्यान अर्थ से हटकर पूरी तरह से धुन के तालमेल और ऊर्जा पर केंद्रित हो जाता है। यह एक प्रकार का 'कैथार्सिस' (मानसिक तनाव मुक्ति) पैदा करता है, जिससे लोग झूमने और नाचने पर मजबूर हो जाते हैं।
     समय बदला, संगीत की तकनीक बदली, लेकिन 'चुटकी लेने वाले' इन गानों का मिजाज नहीं बदला। आज के डिजिटल और रील्स वाले दौर में भी यह चलन पूरी ताकत के साथ जारी है। अगर हम इस तरह के अर्थहीन या केवल लय आधारित बोल वाले सबसे नए और चर्चित उदाहरणों की बात करें, तो हाल ही में विक्की कौशल पर फिल्माया गया गाना 'तौबा तौबा' (बैड न्यूज़) या 'नाच पुंजबन' और 'काला चश्मा' जैसे गानों का रीमिक्स कल्चर इसी परंपरा की अगली कड़ी हैं। विशेषकर 'तौबा तौबा' या पंजाबी-बॉलीवुड फ्यूज़न वाले हालिया ट्रैक्स में ऐसे शब्दों को बार-बार दोहराया जाता है (जैसे 'तौबा तौबा', 'कुड़ी ताऊबा ताऊबा'), जिनका उद्देश्य कोई दार्शनिक बात कहना नहीं, बल्कि एक ऐसा हुक-स्टेप और कैंची लूप तैयार करना है जो सोशल मीडिया पर वायरल हो सके। इसी तरह 'ब्रह्मास्त्र' का 'डांस का भूत' हो या 'स्त्री 2' के डांस नंबर, इनमें प्रयोग की गई पंक्तियाँ केवल एक हुक-लाइन बनाने के लिए चुनी जाती हैं।
    फिल्मी गानों की यह चुटकी इस बात का जीता-जागता सबूत है कि फिल्म संगीत में पिरोए हुए ये गीत किसी भाषा या व्याकरण के मोहताज नहीं होते। शब्द चाहे 'ईना मीना डीका' हों, 'तम्मा तम्मा' हों या 'तूतक तूतक तूतिया' इनकी असली ताकत उनके अर्थ में नहीं, बल्कि उस खुशी और उमंग में छिपी है, जो ये श्रोताओं के चेहरे पर लाते हैं। जब तक दुनिया में इंसान को तनाव मिटाने और जश्न मनाने के लिए एक धुन की जरूरत रहेगी, तब तक फिल्म इंडस्ट्री के संगीतकार ऐसी ही मीठी, चटपटी और बेतुकी 'चुटकी' लेते रहेंगे, और हम-आप बिना मतलब समझे भी इन गानों पर यूं ही थिरकते रहेंगे।
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परदे पर राखी : सिनेमा के बदलते कैनवास पर रिश्ते

     सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं रहा, यह समाज का जीता-जागता दर्पण भी है। जब से समाज ने नए दौर में कदम रखा, हमारी फिल्मों ने भारतीय पारिवारिक मूल्यों, लोक-संस्कृति और तीज-त्योहारों को अपने कलेवर में गहराई से समेटा। यही वजह है कि त्योहार केवल कहानी को आगे बढ़ाने का जरिया नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं, रिश्तों की प्रगाढ़ता और सामाजिक समरसता को व्यक्त करने के सशक्त माध्यम भी बने। कुछ दशक पहले तक स्थिति यह थी कि शायद ही कोई ऐसी फिल्म बनती हो, जिसमें होली, दिवाली, ईद या राखी का कोई खूबसूरत प्रसंग न जोड़ा गया हो। त्यौहारों के ये रंग दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच लाते और उन्हें परदे पर अपना ही परिवार नजर आता था। परंतु, बीते कुछ सालों में हिंदी सिनेमा का रंग-ढंग पूरी तरह बदल गया। 
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- हेमंत पाल

    फिल्मों के कथानक के कई रंग होते हैं, उनमें एक त्योहारों का रंग भी है, जिसकी रौनक धीरे-धीरे कम हो गई। अब बहुत कम फिल्मों में तीज--त्यौहार और रस्मों-रिवाज दिखाई देते हैं। चिंता की बात यह कि आधुनिक सिनेमा से वे गहरे पारिवारिक रिश्ते ही गायब होने लगे, जो कभी हमारी फिल्मों की रीढ़ और त्योहारों के प्रसंग का आधार हुआ करते थे। आज की फिल्मों में रिश्तों की उस भावुकता की जगह हीरो-हीरोइन के लव अफेयर्स, बोल्ड सीन्स, सस्पेंस और अंधाधुंध मारपीट ने ले ली। इस बदलते दौर में रक्षाबंधन जैसे पावन त्योहार का फिल्मी उल्लेख भी बहुत कम हो गया। अब भाई-बहन के रिश्ते की प्रगाढ़ता वाला यह त्यौहार परदे से हाशिये पर आ गया। 
    बीते कुछ दशकों के सिनेमा के सफर पर नजर डालें, तो कथानक में एक बहुत बड़ा वैचारिक बदलाव दिखाई देने लगा। एक जमाना था जब फिल्मों की कहानियां संयुक्त परिवारों के इर्द-गिर्द बुनी जाती थीं। चाचा-चाची, दादा-दादी, भाई-बहन और मां-बाप के प्रति जिम्मेदारी ही नायक के जीवन का मकसद होते थे। आज के दौर में सिनेमा ने 'लार्जर दैन लाइफ' एक्शन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अपना मुख्य एजेंडा बना लिया। फिल्मों से रिश्तों के इस तरह तिरोहित यानी गायब होने के पीछे आधुनिक जीवनशैली और बाजारवाद का बहुत बड़ा हाथ है। आज की फिल्मों का नायक अब अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाने वाला सीधा-साधा युवक नहीं, बल्कि वह अपनी ही दुनिया में मग्न, आक्रामक और व्यवस्था से लड़ने वाला एक 'एंग्री यंग मैन' या फिर एक कॉर्पोरेट विलेन जैसा दिखने लगा है।
    अब स्क्रीन पर भाई और बहन के बीच का वह निश्छल, भोला और आदर से भरा प्रेम बहुत कम दिखाई देता है। पहले जहां भाई अपनी बहन की एक राखी के लिए पूरी दुनिया से लड़ जाता था, वहीं आज के सिनेमा में बहन का किरदार या तो सिर्फ नायक की शादी की तैयारियों में नाचने-गाने तक सीमित रह गया या फिर उसे पूरी तरह से कहानी से बाहर कर दिया गया। मारकाट और हिंसक दृश्यों की भरमार ने फिल्मों के उस कोमल पक्ष को पूरी तरह कुचल दिया, जो दर्शकों के दिलों को छूता था। फिल्मों में अब खून-खराबा, बंदूकें, गैंगवार और गालियां इतनी आम हो चुकी हैं कि उनमें राखी के धागे की पवित्रता और भाई-बहन के आंसुओं के लिए कोई जगह ही नहीं बची। जब रिश्तों की बुनियाद ही कमजोर हो गई, तो भला त्योहारों की खुशियां परदे पर कैसे नजर आएंगी!
    सिनेमा के इतिहास में वैसे तो कई त्योहारों को बहुत शिद्दत से फिल्माया गया, लेकिन होली के बाद राखी ही एक ऐसा त्योहार रहा जिसे निर्देशकों ने सबसे ज्यादा तवज्जो दी। ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों के जमाने से ही भाई-बहन के इस रिश्ते को परदे पर अमर करने की कोशिशें शुरू हो गई थीं। रक्षाबंधन के त्यौहार और भाई-बहन के रिश्ते को पूरी तरह समर्पित पहली मूक फिल्म साल 1928 में बनी, जिसका नाम था 'राखी।' इसके बाद बोलती फिल्मों के दौर में साल 1947 में आई फिल्म 'रक्षाबंधन' को इस विषय पर बनी शुरुआती बेहद महत्वपूर्ण फिल्मों में गिना जाता है। अश्विनी कुमार के निर्देशन में बनी साल 1947 की इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर भाई-बहन के प्रेम की एक नई इबारत लिखी थी। इसके बाद तो जैसे हिंदी सिनेमा में राखी केंद्रित फिल्मों की बाढ़ सी आ गई। पचास, साठ और सत्तर के दशक को यदि राखी फिल्मों का स्वर्णिम काल कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इस दौर में केवल त्योहार का एक दृश्य ही नहीं रखा जाता था, बल्कि पूरी की पूरी फिल्म का ताना-बाना ही राखी के एक कच्चे धागे के इर्द-गिर्द बुना जाता था। इन फिल्मों का मुख्य उद्देश्य समाज को यह बताना होता था कि एक भाई के लिए उसकी बहन का मान-सम्मान और उसकी सुरक्षा कितनी ज्यादा मायने रखती है।
    जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, फिल्मकारों ने इस रिश्ते की अहमियत को समझते हुए फिल्मों के नाम भी सीधे त्योहार और भाई-बहन के रिश्ते पर रखने शुरू कर दिए। इन फिल्मों के नाम सुनते ही आज भी पुरानी पीढ़ी के दर्शकों की आंखें नम हो जाती हैं। इस कड़ी में साल 1959 में आई फिल्म 'छोटी बहन' का नाम सबसे ऊपर आता है। इस फिल्म में बलराज साहनी और नंदा ने भाई-बहन का जो कालजयी किरदार निभाया, उसने पूरे देश को रुला दिया था। इसके बाद साल 1962 में आई फिल्म 'राखी' ने इस रिश्ते की जटिलताओं और गहराई को बखूबी परदे पर उतारा, जिसमें अशोक कुमार और वहीदा रहमान मुख्य भूमिकाओं में थे। 
    इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए साल 1969 में आई फिल्म 'भाई बहन' ने भी दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी। सत्तर के दशक में आई देव आनंद और जीनत अमान की फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' (1971) भले ही एक अलग पृष्ठभूमि पर आधारित थी, लेकिन इस फिल्म की मूल आत्मा एक भाई की अपनी भटकी हुई बहन को वापस पाने की तड़प ही थी। इसके अलावा धर्मेंद्र और साधना की फिल्म 'अनीता' हो या फिर बाद के सालों में आई 'प्यारी बहना' (1985) जिसमें मिथुन चक्रवर्ती ने एक अपाहिज बहन के भाई का बेहद भावुक किरदार निभाया था। इन सभी फिल्मों ने यह साबित किया कि राखी का त्योहार भारतीय सिनेमा के लिए कितना अनमोल रहा है। यहां तक कि नब्बे के दशक में भी 'तिरंगा' और 'क्रांतिवीर' जैसी एक्शन फिल्मों में भी राखी के त्योहार को देशप्रेम और न्याय की लड़ाई से जोड़कर एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में इस्तेमाल किया गया था।
    राखी केंद्रित फिल्मों की चर्चा तब तक अधूरी है, जब तक कि उन गानों का जिक्र न किया जाए जो आज भी हर साल रक्षाबंधन के दिन देश के कोने-कोने में गूंजते हैं। इन गीतों के बोल और संगीत इतने जादुई थे कि वे सीधे रूह में उतर जाते थे। आज भी जब रेडियो या टेलीविजन पर फिल्म 'छोटी बहन' का गाना 'भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना, भैया मेरे छोटी बहन को न भुलाना' बजता है, तो हर भाई-बहन का दिल भावुकता से भर जाता है। इस गाने को लता मंगेशकर ने अपनी मखमली आवाज दी थी और शैलेन्द्र ने इसके बेहद मार्मिक बोल लिखे थे। इसी तरह फिल्म 'राखी' (1962) का मोहम्मद रफी की आवाज में गाया हुआ गीत 'राखी धागों का त्योहार, बंधा एक-एक धागे में भाई-बहन का प्यार' आज भी इस त्योहार की परिभाषा माना जाता है। 
     एक और बेहद लोकप्रिय और खिलखिलाता हुआ गीत जो हर बहन अपने भाई के लिए गाती है, वह है फिल्म 'सच्चा झूठा' (1970) का गाना 'मेरी प्यारी बहनिया बनेगी दुल्हनिया, सजके आएंगे दूल्हे राजा।' किशोर कुमार की आवाज में गाए गए इस गीत ने भाई की खुशी और उसकी आत्मीयता को एक नया मुकाम दिया। इसके अलावा फिल्म 'चंबल की कसम' (1980) का गाना 'चंदा रे मेरे भैया से कहना, बहना याद करे' और फिल्म 'अंधा कानून' (1983) का गाना 'ये राखी बंधन है ऐसा, जैसे चंदा और चकोरी' जैसे अनगिनत गीत हैं जिन्होंने इस रिश्ते की पवित्रता को सुरों के संसार में हमेशा के लिए सहेज दिया। इन गानों की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि ये केवल फिल्म के सीन को पूरा करने के लिए नहीं गाए जाते, बल्कि ये उस दौर के समाज की वास्तविक संवेदनाओं को सुरों में पिरोते थे।
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Friday, August 14, 2026

बिहार की राजनीति : हार से हासिल सबसे बड़ी राजनीतिक पूंजी

     
राजनीति में चुनाव सिर्फ हार और जीत का खेल नहीं होता, बल्कि यह नेतृत्व की क्षमता, संगठन की मजबूती और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को बदलने की योग्यता की भी परीक्षा होती है। कई बार चुनावी पराजय किसी नेता के राजनीतिक जीवन का अंत साबित होती है, तो कई बार वही हार आगे की बड़ी सफलता की आधारशिला बन जाती है। बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर की हाल की जीत इसी उदाहरण के रूप में देखी जा सकती है। विधानसभा चुनाव में लगभग पूरी तरह असफल रहने के बाद जिस नेता को राजनीतिक विश्लेषकों ने समय से पहले खारिज कर दिया था, उसी नेता ने कुछ महीनों बाद बांकीपुर जैसे कठिन निर्वाचन क्षेत्र में जीत दर्ज कर यह संकेत दिया कि राजनीति में अंतिम निर्णय मतदाता देता है, राजनीतिक टिप्पणीकार नहीं।
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● हेमंत पाल

     बिहार विधानसभा चुनाव के बाद 'जन सुराज' की स्थिति अत्यंत निराशाजनक थी। बड़ी संख्या में उम्मीदवार मैदान में उतरे, लेकिन अधिकांश अपनी जमानत तक नहीं बचा सके। परिणाम आने के तुरंत बाद यह धारणा बनने लगी कि प्रशांत किशोर का राजनीतिक प्रयोग विफल हो चुका है। यह भी कहा गया कि चुनावी रणनीतिकार के रूप में सफल रहे व्यक्ति की राजनीति में प्रत्यक्ष भूमिका निभाने की क्षमता सीमित है। लेकिन, प्रशांत किशोर ने इस आलोचना का जवाब बयानबाजी से नहीं, बल्कि संगठन और रणनीति में बदलाव के जरिए देने का रास्ता चुना। भारतीय राजनीति में हार के बाद नेताओं को चुनाव आयोग, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन, संगठन या सहयोगियों को दोष देना आम बात रही है। इसके विपरीत प्रशांत किशोर ने सार्वजनिक रूप से पराजय स्वीकार की और आत्ममंथन का रास्ता अपनाया। यही उनकी राजनीति का पहला महत्वपूर्ण मोड़ माना जा सकता है। किसी भी राजनीतिक दल के लिए हार के बाद सबसे बड़ा सवाल यह होता है, कि वह अपनी कमियों को स्वीकार करता है या नहीं। जन सुराज ने इस मामले में अपेक्षाकृत अलग रवैया अपनाया।
     चुनाव के बाद प्रशांत किशोर ने जिस प्रकार सार्वजनिक गतिविधियों से कुछ समय की दूरी बनाकर आत्मचिंतन का संदेश दिया, उसका राजनीतिक महत्व भी था। यह केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, बल्कि कार्यकर्ताओं और समर्थकों को यह संकेत भी था कि पार्टी हार के कारणों को समझे बिना आगे नहीं बढ़ेगी। इसके बाद संगठनात्मक ढांचे में जो परिवर्तन हुए, उन्होंने 'जन सुराज' की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सबसे बड़ा परिवर्तन पार्टी की कार्यशैली में दिखाई दिया। विधानसभा चुनाव के दौरान 'जन सुराज' में बड़ी संख्या में ऐसे लोग सक्रिय थे, जिनकी पहचान पेशेवर चुनाव प्रबंधन से जुड़ी थी। सोशल मीडिया, डिजिटल प्रचार और चुनावी ब्रांडिंग पर विशेष जोर दिया गया था। लेकिन, बिहार जैसे राज्य में केवल डिजिटल मौजूदगी चुनावी सफलता की गारंटी नहीं बन सकती। यहां बूथ स्तर का संगठन, जातीय समीकरण, स्थानीय नेतृत्व और लगातार जनसंपर्क कहीं अधिक प्रभावी साबित होते हैं। चुनाव परिणामों ने इस वास्तविकता को स्पष्ट कर दिया।
    इस अनुभव से सीखते हुए प्रशांत किशोर ने संगठन की प्राथमिकताओं को बदला। पेशेवर चुनावी मॉडल की जगह समर्पित कार्यकर्ताओं पर भरोसा बढ़ाया। बूथ स्तर पर संगठन तैयार करने, स्थानीय इकाइयों को सक्रिय करने और अलग-अलग सामाजिक समूहों तक नियमित पहुंच बनाने की रणनीति अपनाई गई। बड़ी जनसभाओं और सोशल मीडिया अभियानों की तुलना में छोटे समूहों के संवाद, मोहल्ला बैठकों और घर-घर संपर्क पर अधिक ध्यान दिया गया। यह बदलाव केवल रणनीति का नहीं, बल्कि राजनीतिक सोच का परिवर्तन था। राजनीति में आर्थिक पारदर्शिता और व्यक्तिगत प्रतिबद्धता भी कार्यकर्ताओं के मनोबल को प्रभावित करती है। प्रशांत किशोर ने अपनी आय और संपत्ति का बड़ा हिस्सा पार्टी को समर्पित करने की घोषणा कर यह संदेश देने का प्रयास किया कि 'जन सुराज' केवल चुनावी मंच नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक परियोजना है। साथ ही उन्होंने पार्टी से जुड़े लोगों से आर्थिक सहयोग की अपेक्षा रखकर यह संकेत भी दिया कि संगठन बाहरी संसाधनों पर निर्भर रहने के बजाय अपने समर्थकों की भागीदारी से आगे बढ़ेगा। इस मॉडल का उद्देश्य कार्यकर्ताओं में स्वामित्व की भावना पैदा करना था।
    बांकीपुर उपचुनाव इसी बदली हुई रणनीति की पहली बड़ी परीक्षा बना। यह सीट लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ रही है। ऐसे क्षेत्र में चुनाव लड़ना स्वयं में जोखिम भरा निर्णय था। यदि यहां भी पराजय होती, तो 'जन सुराज' की राजनीतिक विश्वसनीयता पर और गंभीर प्रश्न उठते। लेकिन, प्रशांत किशोर ने इसी चुनौती को अवसर में बदलने का प्रयास किया। इस चुनाव में उन्होंने राज्यस्तरीय बड़े राजनीतिक विमर्श की बजाय स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता दी। जलभराव, यातायात, रोजगार और शहरी अव्यवस्था जैसे विषय लगातार जनता के बीच उठाए गए। इससे चुनाव राष्ट्रीय राजनीतिक बहस से हटकर स्थानीय असंतोष के इर्द-गिर्द केंद्रित होने लगा। यह रणनीति इसलिए भी प्रभावी रही, क्योंकि स्थानीय चुनावों में मतदाता अक्सर अपने दैनिक जीवन से जुड़े मुद्दों पर अधिक प्रतिक्रिया देते हैं।  प्रशांत किशोर की एक और महत्वपूर्ण रणनीति यह रही कि उन्होंने स्वयं को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और महागठबंधन दोनों के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। बिहार में लंबे समय से राजनीति दो प्रमुख ध्रुवों के बीच घूमती रही है। ऐसे में उन मतदाताओं को आकर्षित करना, जो दोनों पक्षों से असंतुष्ट थे, 'जन सुराज' के लिए स्वाभाविक राजनीतिक अवसर था। यदि कोई तीसरा दल केवल विरोध की राजनीति करता तो उसकी स्वीकार्यता सीमित रहती है, लेकिन यदि वह व्यवहारिक विकल्प प्रस्तुत करता है. तो उसके लिए राजनीतिक जमीन बन सकती है।
     इस पूरे अभियान में एक और राजनीतिक पहलू महत्वपूर्ण रहा। भरत तिवारी एनकाउंटर का मुद्दा लगातार चर्चा में बना रहा। इस विषय को प्रशांत किशोर ने निरंतर राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाए रखा। माना गया कि इस मुद्दे ने विशेष रूप से उन मतदाताओं के बीच प्रभाव डाला, जो परंपरागत रूप से भाजपा के समर्थक माने जाते रहे हैं। दूसरी ओर मुख्य विपक्षी दल इस मुद्दे को उतनी प्रभावशीलता से राजनीतिक समर्थन में परिवर्तित नहीं कर सके। इससे 'जन सुराज' को उन वर्गों तक पहुंच बनाने का अवसर मिला, जहां पहले उसकी मौजूदगी सीमित थी। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा नेताओं के कुछ आत्मविश्वास से भरे बयानों ने भी राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया। जब किसी दल को अपनी जीत पूरी तरह सुनिश्चित मानने का संदेश जाता है, तो कई बार मतदाता इसके विपरीत प्रतिक्रिया भी देते हैं। बांकीपुर के परिणामों ने यह संकेत दिया कि किसी भी निर्वाचन क्षेत्र को केवल परंपरागत राजनीतिक गढ़ मानकर नहीं चला जा सकता। मतदाता समय-समय पर अपने फैसलों से स्थापित धारणाओं को बदलने की क्षमता रखते हैं।
     हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि बांकीपुर की जीत को पूरे बिहार की राजनीतिक तस्वीर का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। उपचुनाव और विधानसभा चुनाव की प्रकृति अलग होती है। उपचुनाव स्थानीय परिस्थितियों, उम्मीदवार की छवि और तत्कालीन राजनीतिक वातावरण से अधिक प्रभावित होते हैं, जबकि विधानसभा चुनाव में व्यापक संगठन, संसाधन, गठबंधन और राज्यव्यापी समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसलिए जन सुराज के सामने अभी भी अपनी नई रणनीति को पूरे राज्य में प्रभावी ढंग से लागू करने की चुनौती बनी हुई है। फिर भी यह स्वीकारना होगा कि प्रशांत किशोर ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश दिया है। उन्होंने यह दिखाया कि हार के बाद केवल बयान बदलने से नहीं, बल्कि संगठन, रणनीति और कार्यशैली बदलने से राजनीतिक वापसी संभव होती है। बिहार की राजनीति में उनकी यह वापसी केवल एक सीट की जीत नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि लगातार सीखने और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने वाला नेतृत्व लंबे समय तक प्रासंगिक बना रह सकता है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बांकीपुर की सफलता एक अपवाद साबित होती है या बिहार की राजनीति में किसी नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत।
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दतिया का जनादेश : असंतोष दोनों तरफ, भाजपा को भारी पड़ा सेबोटेज

      
कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने भाजपा के आशुतोष तिवारी को 6,056 वोटों से हराकर लगातार दूसरी बार भाजपा को उपचुनाव में शिकस्त दी। इससे पहले विजयपुर में भी भाजपा को शिकस्त खाना पड़ी थी। दतिया की जीत इसलिए अहम है, क्योंकि दतिया लंबे समय तक पूर्व गृह मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा का अभेद्य राजनीतिक गढ़ रहा है। भाजपा ने यहां अपनी पूरी ताकत झोंक दी, लेकिन कांग्रेस ने सीमित संसाधनों के बावजूद बेहतर स्थानीय रणनीति, उम्मीदवार की स्वीकार्यता और संगठन की एकजुटता के दम पर बाजी अपने नाम कर ली।
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● हेमंत पाल

   कांग्रेस ने दतिया का प्रतिष्ठापूर्ण उपचुनाव जीत लिया। यह चुनाव नतीजा अप्रत्याशित जरूर है, पर आश्चर्यजनक नहीं। क्योंकि, दतिया उपचुनाव की घोषणा के साथ ही यहां भाजपा और कांग्रेस दोनों पार्टियों में असंतोष खदबदाने लगा था। खासियत यह भी रही कि कांग्रेस ने चुनाव को केवल भाजपा विरोध तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे स्थानीय नेतृत्व और जनविश्वास के चुनाव में बदला। कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह की पहचान  सहज, सुलभ और साफ-सुथरी छवि वाले नेता की रही है। राजपरिवार से जुड़े होने के कारण उनकी सामाजिक स्वीकार्यता पहले से थी और ग्रामीण क्षेत्रों में उनका व्यक्तिगत संपर्क भी मजबूत था। कांग्रेस ने इसी छवि को चुनाव का केंद्र बनाया। बड़े राजनीतिक नारों के बजाय स्थानीय मुद्दों, व्यक्तिगत संपर्क और बूथ स्तर की सक्रियता पर अधिक जोर दिया गया। इसका नतीजा यह हुआ कि मतदान के दिन कांग्रेस का समर्थक वर्ग अपेक्षाकृत अधिक संगठित दिखाई दिया।
   यह भी सच है कि कांग्रेस भी निर्विवाद स्थिति में नहीं थी। पूर्व विधायक राजेंद्र भारती की विधायकी ख़त्म होने के कारण यह उपचुनाव हुआ और चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस के भीतर मतभेद भी सार्वजनिक हुए। घनश्याम सिंह ने राजेंद्र भारती पर भितरघात के आरोप लगाए और बाद में पार्टी ने उन्हें निलंबित भी किया। लेकिन, कांग्रेस नेतृत्व की सफलता इस बात में रही कि उसने इन विवादों को चुनाव का मुख्य मुद्दा नहीं बनने दिया। संगठन ने उम्मीदवार के पक्ष में माहौल बनाए रखा और स्थानीय स्तर पर मतदाताओं को यह संदेश देने में सफलता हासिल की कि चुनाव व्यक्ति नहीं, पार्टी की राजनीतिक दिशा का है।
    दूसरी ओर भाजपा की रणनीति का केंद्र संगठनात्मक शक्ति और शीर्ष नेतृत्व का व्यापक प्रचार रहा। मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद और विधायक लगातार दतिया में सक्रिय रहे। जातीय समीकरणों को साधने के लिए अलग-अलग वर्गों के बीच विशेष अभियान चलाए। लेकिन, चुनाव ने यह साबित कर दिया कि सिर्फ शीर्ष नेतृत्व की मौजूदगी पर्याप्त नहीं होती। यदि स्थानीय संगठन पूरी तरह भावनात्मक रूप से जुड़ा न हो तो चुनावी मशीनरी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाती।
   भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती टिकट वितरण के बाद उभरा असंतोष था। पूर्व गृह मंत्री डॉ नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटकर आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया गया। इसके बाद उनके समर्थकों का खुला विरोध, सड़क पर प्रदर्शन और नाराजगी चुनाव की शुरुआत से ही चर्चा का विषय बन गई। बाद में डॉ मिश्रा ने पार्टी उम्मीदवार के समर्थन में प्रचार भी किया, लेकिन कार्यकर्ताओं का मन पूरी तरह नहीं बदल सका। इसका असर मतदान और मतगणना दोनों में दिखाई दिया। सबसे बड़ा प्रतीकात्मक संदेश तब मिला, जब डॉ नरोत्तम मिश्रा के खुद के मतदान केंद्र पर भी कांग्रेस भाजपा से आगे निकल गई। यह केवल बूथ का परिणाम नहीं था, बल्कि स्थानीय राजनीतिक संदेश था कि भाजपा अपने परंपरागत वोट को पूरी तरह एकजुट नहीं रख सकी।
   हालांकि, भाजपा की हार का कारण केवल भितरघात मान लेना भी अधूरी बात होगी। कांग्रेस ने इस चुनाव में अपनी चुनावी रणनीति को अधिक व्यवस्थित ढंग से लागू किया। उसने बूथ प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया, स्थानीय नेताओं के बीच समन्वय बनाए रखा और ग्रामीण क्षेत्रों में लगातार जनसंपर्क अभियान चलाया। मतदान प्रतिशत लगभग 71.44% रहा, लेकिन अपेक्षाकृत कम मतदान और महिलाओं की घटती भागीदारी का लाभ कांग्रेस को मिला। कांग्रेस अपने परंपरागत मतदाताओं को मतदान केंद्र तक लाने में भाजपा की तुलना में अधिक सफल रही।
    मतगणना के दौरान भी कांग्रेस की बढ़त ने स्पष्ट कर दिया कि उसका समर्थन केवल किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं था। शुरुआती राउंड से ही कांग्रेस आगे रही और कई चरणों में उसकी बढ़त 10 हजार से अधिक मतों तक पहुंच गई। अंतिम चरण में भाजपा ने कुछ अंतर जरूर कम किया, लेकिन चुनाव का रुख बदल नहीं सकी। इसका अर्थ यह है कि कांग्रेस का समर्थन व्यापक और संतुलित था, जबकि भाजपा को कई क्षेत्रों में अपेक्षित मतदान नहीं मिला। इस जीत का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है। लगातार दूसरी उपचुनाव जीत से कांग्रेस संगठन का मनोबल बढ़ेगा। प्रदेश अध्यक्ष जीतू पटवारी, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार और चुनावी रणनीति संभालने वाले नेताओं के लिए यह परिणाम संगठनात्मक सफलता माना जाएगा। कांग्रेस अब यह दावा करने की स्थिति में होगी कि वह केवल सत्ता विरोध के भरोसे नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक तैयारी और स्थानीय नेतृत्व के दम पर भी भाजपा को चुनौती दे सकती है।
   दतिया का जनादेश भाजपा के लिए आत्ममंथन का विषय अवश्य है, लेकिन उससे भी अधिक यह कांग्रेस की रणनीतिक सफलता की कहानी है। इस चुनाव ने साबित किया कि मजबूत उम्मीदवार, स्थानीय विश्वसनीयता, प्रभावी बूथ प्रबंधन और कार्यकर्ताओं की सक्रिय भागीदारी आज भी किसी भी चुनाव की सबसे बड़ी ताकत हैं। संसाधनों, बड़े प्रचार अभियानों और शीर्ष नेताओं की सभाओं से अधिक महत्व उस संगठन का होता है, जो मतदान के दिन मतदाता को अपने पक्ष में खड़ा कर सके। दतिया में कांग्रेस यही करने में सफल रही और यही उसकी जीत का सबसे बड़ा कारण बना।
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सिनेमा का दर्द, विभाजन की कसक


     देश के इतिहास में 15 अगस्त 1947 का दिन जहां एक तरफ आजादी का महान उल्लास लेकर आया, वहीं दूसरी तरफ देश के दो टुकड़ों में बंट जाने का एक ऐसा नासूर छोड़ गया, जिसकी कसक और टीस आज दशकों बाद भी भारतीय जनमानस के दिलों में जिंदा है। फिल्मकारों ने भी इस मानवीय त्रासदी को हमेशा अपनी संवेदना के केंद्र में रखा। बीते आठ दशकों में बंटवारे के इस असीम दर्द, मानसिक द्वंद्व और नफरत के बीच सुलगती इंसानियत को बेहद संजीदगी से अलग-अलग कथानकों के जरिए परदे पर उतारा गया है। 
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- हेमंत पाल
 
    देश के बंटवारे का दर्द हर भारतीय के दिल में टीस बनकर कचोटता है। इस विषय को फिल्मकारों ने बीते दशकों में कई तरह से फिल्माया और दर्शकों को उस दर्द को याद दिलाया है। हाल ही में इस संवेदनशील और ऐतिहासिक विषय को लेकर एक बार फिर सिनेमा जगत में बड़ी हलचल हुई। आमिर खान की प्रोडक्शन कंपनी ने अभिनेता सनी देओल को लेकर 'बंटवारा 1947' नाम से फिल्म का निर्माण किया है। यह फिल्म इस बात का सीधा प्रमाण है कि विभाजन का वह दौर, उसका दर्द और संघर्ष आज भी एक ऐसा विषय है, जो हर दौर के दर्शकों और फिल्मकारों को गहरे स्तर पर झकझोरता और आकर्षित करता है। 'बंटवारा 1947' के माध्यम से एक बार फिर बड़े परदे पर उस दौर की भयावहता, विस्थापन की पीड़ा और मानवीय रिश्तों के टूटने-जुड़ने की दास्तान को नए दृष्टिकोण और भव्य पैमाने के साथ पेश किया गया है, जो पुरानी यादों को ताज़ा करते हुए नई पीढ़ी को इतिहास के इस दुखद अध्याय से रूबरू कराती है।
    आजादी के बाद से अब तक अगर विभाजन के विषय पर बनी फिल्मों के सफरनामे को काल के क्रम के अनुसार देखें, तो भारतीय सिनेमा ने हर दशक में इस त्रासदी को अलग-अलग कोणों से समझने और बयां करने का प्रयास किया है। इस कड़ी में पहली शुरुआत प्रभावशाली तरीके से यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी फिल्म 'धर्मपुत्र' से हुई, जो वर्ष 1961 में रिलीज़ हुई थी। आचार्य चतुरसेन के प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित इस फिल्म में शशि कपूर और माला सिन्हा ने मुख्य भूमिकाएं निभाई। यह फिल्म बंटवारे के दौर में पनपे धार्मिक कट्टरपंथ और अपनी ही पहचान को लेकर मन में उठते द्वंद्व पर करारा प्रहार करती है। फिल्म उस दौर में हिंदू-मुस्लिम एकता का एक बेहद मजबूत और जरूरी संदेश देती है, जो यह दर्शाता है कि राजनीति और धर्म के नाम पर इंसानी रिश्तों को कैसे बलि चढ़ाया गया था।
    इसके बाद वर्ष 1973 में आई फिल्म 'गर्म हवा' को विभाजन पर बनी भारतीय सिनेमा की सबसे प्रामाणिक, संवेदनशील और यथार्थवादी फिल्मों में गिना जाता है। महान निर्देशक एमएस सथ्यू के निर्देशन में बनी इस फिल्म में बलराज साहनी, फारूक शेख और गीता सिद्धार्थ ने अपनी अभिनय क्षमता की अमिट छाप छोड़ी थी। लेखिका इस्मत चुगताई की कहानी और कैफी आजमी की कालजयी पटकथा पर आधारित यह फिल्म आगरा के एक मुस्लिम व्यवसायी सलीम मिर्जा और उनके परिवार के संघर्ष की मर्मस्पर्शी दास्तान है। फिल्म उन परिवारों की मानसिक, सामाजिक और आर्थिक पीड़ा को उकेरती है, जिन्होंने विभाजन के बाद अपने वतन में ही रहने का फैसला किया था। लेकिन, फिर भी उन्हें हर कदम पर शक, बेगानेपन और आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। बलराज साहनी का अभिनय सलीम मिर्जा के रूप में दर्शक के दिल को छूने वाला था। 
    अस्सी के दशक में दूरदर्शन के दौर में वर्ष 1987 में आया धारावाहिक 'तमस' न केवल एक टीवी के कार्यक्रम के रूप में बल्कि एक यादगार सिनेमेटिक अनुभव के रूप में इतिहास में दर्ज हुआ। गोविंद निहलानी द्वारा निर्देशित और भीष्म साहनी के चर्चित उपन्यास पर आधारित इस कृति में ओम पूरी, दीप्ति नवल, अमरीश पुरी और स्वयं भीष्म साहनी जैसे दिग्गज कलाकारों ने अभिनय किया था। 'तमस' धारावाहिक बंटवारे से ठीक पहले और उस दौरान भड़के सांप्रदायिक दंगों, राजनीतिक षड्यंत्रों और इन सबके बीच पिसते आम, बेकसूर लोगों की तबाही का सबसे नग्न और यथार्थवादी खाका खींचता है। यह दिखाता है कि कैसे चंद स्वार्थी ताकतों के उकसावे में आकर सदियों से साथ रहने वाले पड़ोसी एक-दूसरे के खून के प्यासे बन गए थे।
    नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में विभाजन के विषय पर कई महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों को परदे पर उतारा गया। इस क्रम में वर्ष 1998 में निर्देशक पमेला रूक्स की फिल्म 'ट्रेन टू पाकिस्तान' आई, जो खुशवंत सिंह के विश्व प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित थी। निर्मल पांडे, रजित कपूर, दिव्या दत्ता और स्मृति मिश्रा के सशक्त अभिनय से सजी यह फिल्म भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित 'मनोमाजरा' नामक एक शांत गांव की कहानी कहती है। फिल्म यह दर्शाती है कि कैसे सीमा पार से लाशों से भरकर आने वाली ट्रेनों के खौफनाक मंजर ने उस गांव के भाईचारे और शांति को नफरत की आग में झोंक दिया था।
    1998 में दीपा मेहता के निर्देशन में बनी फिल्म '1947 अर्थ' रिलीज हुई, जो बीपसी सिधवा के उपन्यास 'क्रैकिंग इंडिया' पर आधारित थी। इस फिल्म में आमिर खान, नंदिता दास और राहुल खन्ना ने मुख्य भूमिकाएं निभाई। लाहौर की पृष्ठभूमि पर आधारित यह फिल्म बहुत ही बारीकी से दिखाती है कि कैसे बंटवारे की सांप्रदायिक आग ने सदियों पुरानी दोस्तों की टोलियों, मासूम प्यार और इंसानी रिश्तों को पल भर में जलाकर राख कर दिया। फिल्म में आमिर खान द्वारा निभाया गया 'दिल नवाज' (आइस-कैंडी मैन) का किरदार नफरत और जुनून के उस बदलाव को दर्शाता है जो उस दौर में साधारण इंसानों के भीतर आ गया था।
    सदी के बदलाव के साथ वर्ष 2000 में कमल हासन की ऐतिहासिक फिल्म 'हे राम' आई। कमल हासन द्वारा ही निर्देशित इस फिल्म में स्वयं कमल हासन के साथ शाहरुख खान, रानी मुखर्जी और नसीरुद्दीन शाह जैसे दिग्गज सितारे थे। विभाजन के दौरान फैली भयंकर हिंसा, नफरत और उसके परिणामस्वरूप हुए घटनाक्रमों के साथ-साथ महात्मा गांधी की हत्या के दौर को केंद्र में रखकर बनाई गई यह फिल्म विभाजन से उपजे मानसिक और भावनात्मक आघात की गहराई को दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर तलाशती है।
    2001 में आई फिल्म 'गदर : एक प्रेम कथा' ने विभाजन के विषय को एक बिल्कुल नए कमर्शियल और भव्य पैमाने पर दर्शकों के सामने रखा। अनिल शर्मा निर्देशित और सनी देओल, अमीषा पटेल तथा अमरीश पुरी अभिनीत यह फिल्म भले ही एक प्रेम कहानी के ताने-बाने पर बुनी गई थी, लेकिन इसकी शुरुआत में विभाजन के दौरान हुए दंगों, ट्रेनों में कत्लेआम और अपनों से बिछड़ते परिवारों की चीख-पुकार का जो चित्रण किया गया, उसने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए कीर्तिमान रचे और साबित किया कि विभाजन का दौर मुख्यधारा के सिनेमा में भी बहुत गहराई से अपील करता है।
    इसके बाद वर्ष 2003 में डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी के निर्देशन में बनी फिल्म 'पिंजर' आई, जो अमृता प्रीतम के बेहद मशहूर उपन्यास पर आधारित थी। उर्मिला मातोंडकर, मनोज बाजपेयी और संजय सूरी के जीवंत अभिनय से सजी यह फिल्म विभाजन के दौरान महिलाओं पर हुए अमानवीय अत्याचारों, उनके अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और सामाजिक त्रासदियों को बेहद संजीदगी से उजागर करती है। फिल्म की मुख्य पात्र पूरो और रशीद की कहानी के माध्यम से फिल्म यह सवाल उठाती है कि युद्ध और बंटवारे में सबसे बड़ी कीमत हमेशा औरतों को ही क्यों चुकानी पड़ती है।
    आगे चलकर वर्ष 2013 में राकेश ओमप्रकाश मेहरा द्वारा निर्देशित फिल्म 'भाग मिल्खा भाग' रिलीज़ हुई, जिसमें फरहान अख्तर ने महान एथलीट मिल्खा सिंह की भूमिका निभाई। यद्यपि यह फिल्म एक महान खिलाड़ी की बायोपिक थी, लेकिन इसका मुख्य भावनात्मक आधार विभाजन की वही त्रासदी थी। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे बचपन में बंटवारे के दौरान मिल्खा सिंह के माता-पिता को उनकी आंखों के सामने कत्ल कर दिया गया था और विस्थापन के उस खौफनाक दर्द का जख्म ताउम्र उनके दिलो-दिमाग पर हावी रहा। यह फिल्म यह दर्शाती है कि बंटवारे का दर्द केवल उस दौर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने इंसानों की पूरी जिंदगी और आने वाली पीढ़ियों की मानसिकता को प्रभावित किया।
    1961 की 'धर्मपुत्र' से लेकर गर्म हवा, तमस, पिंजर, 1947 अर्थ और अब 'बंटवारा 1947' तक का सिनेमाई सफर यह साफ करता है कि भारत-पाकिस्तान का विभाजन केवल एक बीती हुई ऐतिहासिक घटना नहीं है। यह भारतीय सिनेमा के लिए एक कभी न खत्म होने वाली मानवीय संवेदना की प्रयोगशाला है। इन फिल्मों ने दर्शकों को केवल मनोरंजन नहीं दिया, बल्कि उन्हें इतिहास के उस काले पन्ने से रू-ब-रू कराया जहां इंसानियत हार गई और नफरत जीत गई थी। सिनेमा ने बार-बार इन कहानियों के जरिए दुनिया को यही याद दिलाने की कोशिश की है कि सीमाओं का बंटवारा भले ही ज़मीन पर लकीरें खींच दे, लेकिन दिलों में बिखरे दर्द, यादों और इंसानी रिश्तों के जुड़ाव को कोई लकीर मिटा नहीं सकती। यही कारण है कि भारतीय दर्शक आज भी जब बड़े पर्दे पर विभाजन की इन कहानियों को देखते हैं, तो उनकी आंखें नम हो जाती हैं और सिनेमा का यह संवेदनशील रूप हमेशा दर्शकों के दिलों में प्रासंगिक बना रहता है।
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