Sunday, February 8, 2026

ब्लैक से निकली अंधेरे में उजाले की किरण

- हेमंत पाल

     ब भी हिंदी सिनेमा की बात होती है, तो कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो वक्त के साथ नहीं, बल्कि वक्त के ऊपर चढ़ जाती हैं। संजय लीला भंसाली की ‘ब्लैक’ (2005) उन्हीं में से एक है, जो आज भी न सिर्फ आलोचकों की पसंद, बल्कि दर्शकों की भावनात्मक यादों में जिंदा है। 4 फरवरी 2005 को रिलीज हुई यह फिल्म अब अपने 21 साल पूरे कर चुकी है, लेकिन उसकी गहराई, अभिनय और संदेश आज भी उतना ही ताजा लगता है। यह एक ऐसी फिल्म है जिसने दिव्यांग किरदार को मुख्यधारा में लाया। ‘ब्लैक’ हेलन केलर की जीवनी ‘द स्टोरी ऑफ माय लाइफ’ और उनकी शिक्षिका ऐनी सुलिवन से सीधे प्रभावित है, लेकिन भंसाली ने इसे पूरी तरह भारतीय संदर्भ में ढाल दिया। फिल्म की केंद्रीय किरदार मिशेल मैकनॉली (रानी मुखर्जी) एक दृष्टिहीन और बहरी लड़की है, जो अपने जीवन के शुरूआती दिनों में सिर्फ अंधेरे और खामोशी में जीती है। उसके जीवन में जब डॉ देबराज साहनी (अमिताभ बच्चन) आते हैं, तो वह पहली बार ज्ञान, भाषा और आत्मविश्वास की रोशनी देखती है। इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा में दिव्यांग किरदारों को मुख्यधारा में लाने की पहली बड़ी कोशिशों में से एक बनकर इतिहास रचा। इससे पहले ऐसे किरदार या तो छोटे रोल में दिखते थे या फिर पूरी तरह से भावनात्मक ड्रामा के ज़रिए दिखाए जाते थे, लेकिन ‘ब्लैक’ ने दिव्यांग किरदार को स्वतंत्र व्यक्ति, संघर्षशील और सफल बनाकर दिखाया। 
     ‘ब्लैक’ की सबसे बड़ी कहानियों में से एक है अमिताभ बच्चन का फ्री में काम करना। भंसाली की पिछली फिल्में ‘हम दिल दे चुके सनम’ (1999) और ‘देवदास’ (2002) ने बच्चन साहब को उनके विज़ुअल स्टाइल से प्रभावित किया था। जब भंसाली उनके पास ‘ब्लैक’ की कहानी लेकर आए, तो बच्चन साहब ने तुरंत हामी भर दी और कहा कि फिल्म का हिस्सा बनना ही मेरी फीस है। यह निर्णय न सिर्फ फिल्म के बजट पर असर डाला, बल्कि टीम के मनोबल को भी ऊंचा किया। बच्चन साहब ने डॉ देबराज के किरदार में अपने जीवन के सबसे गहरे अभिनय में से एक दिया। उन्हें 53वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड में बेस्ट एक्टर और 51वें फिल्मफेयर अवॉर्ड में बेस्ट एक्टर के साथ बेस्ट एक्टर (क्रिटिक्स) भी मिला। 
    जब रियलिटी ने अभिनय को बदल दियारानी मुखर्जी के लिए ‘ब्लैक’ एक मोड़ वाली फिल्म थी। शुरू में उन्होंने इस रोल को बहुत चुनौतीपूर्ण मानकर इंकार कर दिया था, लेकिन भंसाली ने उन्हें 6 महीने की वर्कशॉप और ट्रेनिंग दी। रानी ने साइन लैंग्वेज एक्सपर्ट्स से काम किया, ताकि वह बहरापन और दृष्टिहीनता की भावनाओं को वास्तविकता के साथ उतार सकें। फिल्म में छोटी मिशेल का रोल चाइल्ड आर्टिस्ट आयशा कपूर ने निभाया, जिन्हें असल जिंदगी में भी सुनने से जुड़ी समस्या थी। भंसाली ने इसी रियलिटी को फिल्म में इस्तेमाल किया, जिससे किरदार की भावनाएं और भी ज्यादा वास्तविक लगीं। 
    ‘ब्लैक’ से रनवीर कपूर का भी खास कनेक्शन है। उस समय वह असिस्टेंट डायरेक्टर थे और छोटी मिशेल को ट्रेनिंग देते थे। रनवीर ने बाद में बताया कि फिल्म के ओपनिंग सीन में टेबल पर बैठा शख्स बच्चन साहब नहीं, बल्कि वह खुद था। चेहरा न दिखना था, सिर्फ परछाई चाहिए थी, और बच्चन साहब उपलब्ध न होने पर रनवीर ने शॉट कवर किया। यह किस्सा रनवीर की पहली बड़ी जिम्मेदारी को दर्शाता है, जहां उन्होंने भंसाली के स्टाइल से सीखा, जो बाद में उनकी ‘राजनीति’ जैसी फिल्मों में झलका। ‘ब्लैक’ ने तकनीकी रूप से भी मिसाल कायम की। भंसाली ने पहली बार डिजिटल साउंड मिक्सिंग का इस्तेमाल किया, जिससे फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर और डायलॉग दर्शकों के दिमाग में गहराई से उतर गए। मोंटी शर्मा के संगीत में ‘बन्नो रानी’ गाना आज भी हिट है, जो फिल्म की भावनात्मक गहराई को और बढ़ाता है। सिनेमेटोग्राफर विक्रांत भोंडालेकर ने लो-लाइट शॉट्स का इस्तेमाल करके अंधेपन को रियल बनाया। फिल्म में काले, ग्रे और नीले रंगों का इस्तेमाल इतना बखूबी किया गया कि जब भी लाल रंग दिखता है, वह दर्शकों को झकझोर देता है। 
      कमर्शियल नजरिए से ‘ब्लैक’ ने 23 करोड़ के बजट के मुकाबले 23.18 करोड़ की कमाई की, जिसे ट्रेड एनालिस्ट्स ने 'एवरेज' बताया। 2005 की टॉप फिल्मों में यह 14वें स्थान पर रही, जहां नंबर 1 पर ‘नो एंट्री’, नंबर 2 पर ‘बंटी और बबली’ और नंबर 3 पर ‘गरम मसाला’ थी।  टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे 4/5 स्टार दिए और लिखा कि यह एक ऐसी फिल्म है जो सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सोचने पर मजबूर करती है। रेडिफ ने इसे 'भंसाली का सबसे परिपक्व काम' कहा। आज भी आईएमडीबी पर 8.0/10 रेटिंग के साथ यह भंसाली की सबसे ऊंची रैंकिंग वाली फिल्म है। जब फिल्म ने इतिहास रचा‘ब्लैक’ ने 51वें फिल्मफेयर अवॉर्ड में 11 नॉमिनेशन में से सभी जीत लिए, जिसमें बेस्ट फिल्म, बेस्ट डायरेक्टर (भंसाली), बेस्ट एक्टर (बच्चन), बेस्ट एक्ट्रेस (रानी) और बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस (ऐश्वर्या राय) शामिल थे। यह फिल्म फिल्मफेयर के इतिहास में सबसे ज्यादा अवॉर्ड जीतने वाली फिल्मों में से एक बनी। नेशनल फिल्म अवॉर्ड में फिल्म ने बेस्ट फीचर फिल्म इन हिंदी, बेस्ट एक्टर (बच्चन) और बेस्ट कॉस्ट्यूम डिजाइन (सब्यसाची मुखर्जी) जैसे अवॉर्ड जीते। 
      ‘ब्लैक’ ने दुनिया भर में अपना असर छोड़ा। आमतौर पर बॉलीवुड रीमेक बनाता है, लेकिन 2013 में तुर्की के डायरेक्टर उगर युसल ने इसे ‘बेनिम दुनयाम’ (मेरी दुनिया) के नाम से रीमेक किया। यह तुर्की में सुपरहिट रही, लेकिन कॉपीराइट विवाद हुआ, जिसके बाद भंसाली ने सहमति दी। कोरिया और स्पेन में भी अनौपचारिक रूप से इसका प्रभाव दिखा। भारत में 2021 में फिल्म को री-रिलीज किया गया, जहां फिर से कमाई हुई। ‘ब्लैक’ साबित करती है कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि बदलाव का हथियार है। बच्चन साहब का फ्री में काम करना, भंसाली का जुनून, और टीम का समर्पण, सबने इसे अमर बना दिया। यह फिल्म हमें सिखाती है कि अंधेरा कितना भी गहरा हो, ‘लाइट’ हमेशा मिल जाती है।
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------



No comments: