Sunday, January 18, 2026

सात दशकों का सवेरा : लोकतांत्रिक अधिकारों को कुरेदता हिंदी सिनेमा

       भारतीय गणतंत्र के 75 सालों के दौर में हिंदी फिल्मों ने दर्शकों के मनोरंजन के साथ लोकतांत्रिक अधिकारों के संरक्षण को भी कथानक का केंद्र बनाया। ब्लैक एंड व्हाइट से डिजिटल दौर तक ये फिल्में न्याय, मताधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी पर जोर देती रहीं। 'रंग दे बसंती' (2006) जैसी फिल्म ने युवाओं को लोकतंत्र के प्रति उदासीनता से झकझोरा। यह फिल्म बैलेट की जगह बुलेट का विकल्प दिखाती है। लेकिन, अंततः जागरूकता पर समाप्त होती है। 'सत्याग्रह' (2013) ने अन्ना आंदोलन से प्रेरित होकर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन दिखाया। 'राजनीति' (2010) ने राजनीति का कच्चा चिट्ठा खोला, जहां सत्ता की भूख लोकतंत्र को निगल जाती है। 'वेलकम टू सज्जनपुर' (2008) ने ग्रामीण पंचायतों के व्यंग्य से महिलाओं के अधिकार उठाए। यही सिलसिला आज भी जारी है। 
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- हेमंत पाल

    सिनेमा ने जनता को जागरूक करने के कई काम किए। जनता के अधिकारों को खतरे से बचाने वाली कहानियों से भी सिनेमा ने हमेशा जागरूक किया। भ्रष्टाचार, जातिवाद और दमन के खिलाफ ये फ़िल्में संवैधानिक मूल्यों को मजबूत बनाती रही। इस कालखंड में सिनेमा ने लोकतांत्रिक अधिकारों जैसे वोट का अधिकार, अभिव्यक्ति की आजादी, समानता और न्याय को न केवल चित्रित किया, बल्कि दर्शकों को जागृत भी किया। ब्लैक एंड व्हाइट दौर की देशभक्ति फिल्मों से लेकर आधुनिक कोर्टरूम ड्रामे तक की ये कृतियां संविधान की मूल भावना को जीवंत बनाती रही। सिनेमा ही वो माध्यम है जिसने मनोरंजन के बहाने साढ़े सात दशकों के लोकतंत्र में बार-बार अधिकारों को चुनौती दी। भ्रष्टाचार, न्याय और नागरिक जागरूकता जैसे मुद्दों पर कथानक रचकर दर्शकों को सोचने पर मजबूर किया। आजादी के बाद ऐसी फिल्में न केवल बनीं, बल्कि पसंद भी की गई। ऐसे कथानक समाज का आईना बनकर लोकतंत्र की कमजोरियों को उजागर करती रहे। ऐसी कई फ़िल्में हैं, जिनके कथानक आजादी के बाद से अब तक लोकतांत्रिक मूल्यों को कुरेदते नजर आए हैं। 
    आजादी के ठीक बाद फिल्मों ने लोकतांत्रिक अधिकारों को स्वतंत्रता संग्राम की विरासत से जोड़ा। 1950-60 के दशक में चेतन आनंद की 'हल्दीघाटी' (1968) ने राजपूत शौर्य के माध्यम से राष्ट्रीय एकता पर जोर दिया। लेकिन, असल में यह  लोकतंत्र की एकता में विविधता को दर्शाती फिल्म थी। 'शहीद' (1965) जैसी पुरानी फिल्मों का प्रभाव भी यहां दिखा, जहां लोकतंत्र को बलिदान से जोड़ा गया। इसी काल की 'आम्रपाली' (1966) ने व्यक्तिगत अधिकारों और राज्य की नैतिकता पर सवाल उठाए। मनोज कुमार की 'उपकार' (1967)  का कथानक ग्रामीण लोकतंत्र को किसान के अधिकारों से जोड़ता नजर आया, जहां हीरो गांव की पंचायत प्रणाली को मजबूत बनाता है। 'पूरब और पश्चिम' (1970) ने लोकतांत्रिक भारत की वैश्विक छवि बनाई, वह भी पश्चिमी भौतिकवाद के विरुद्ध भारतीय मूल्यों को स्थापित करते हुए। ये फिल्में नेहरू युग के समाजवादी लोकतंत्र को मजबूत करने वाली थी और दर्शकों में मताधिकार के महत्व को जगाती थी। आजादी के बाद की फिल्मों ने नेहरू युग के आशावादी लोकतंत्र को दर्शाया। 'जागृति' (1954) बच्चों के माध्यम से नागरिक कर्तव्यों और अधिकारों को सिखाती है, जहां युवा पात्र संवैधानिक मूल्यों को आत्मसात करते दिखते हैं। 'अब दिल्ली दूर नहीं' (1957) में एक बच्चा प्रधानमंत्री के पास न्याय मांगने जाता है, जो राज्य की जवाबदेही और आम नागरिक के अधिकार को रेखांकित करता है। 'श्री 420' (1955) भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष दिखाकर आर्थिक समानता के लोकतांत्रिक आदर्श को उजागर करती है। जबकि 'दो बीघा ज़मीन' (1953) ग्रामीण भारत की उपेक्षा पर राज्य की उदासीनता पर प्रहार करती है।
     सिनेमा के 1960-70 के दौर को संक्रमण का काल कहा जाता है। इस दौर में सिनेमा अधिक यथार्थवादी हो गया था। 'लीडर' (1964) में दिलीप कुमार ने ऐसे राजनेता की भूमिका निभाई, जो भ्रष्ट राजनीति के बीच ईमानदारी की लड़ाई लड़ते हैं। 'आज़ादी की ओर' जैसी फिल्में वोटिंग और चुनाव प्रक्रिया पर केंद्रित रही, वह भी दर्शकों को मताधिकार के महत्व का बोध कराती हुईं। मंथन (1976) सहकारी आंदोलन के ज़रिए सामूहिक अधिकारों और ग्रामीण सशक्तिकरण को चित्रित करती है, जो दुग्ध किसानों को दलालों से मुक्ति दिलाने पर आधारित है। इसके बाद 1980 से 90 का दौर सामाजिक न्याय की लहर रहा। रंगीन सिनेमा के आगमन के साथ मुद्दे गहराए। 'परिणीता' और 'सौतेला भाई' जैसी फ़िल्में सामाजिक असमानता पर आधारित थी। लेकिन, फूलन देवी की 'बैंडिट क्वीन' (1994) की कहानी ने जातिगत उत्पीड़न और दलित अधिकारों को बेबाकी से उजागर किया। यह फिल्म पुलिस अत्याचार और महिलाओं के न्यायिक अधिकारों पर भी केंद्रित रही, जो संविधान के अनुच्छेद 14-21 को प्रतिबिंबित करती है।
     फिल्मों में भ्रष्टाचार और आरक्षण पर बहस का समयकाल 2000 के दशक में आया। आर्थिक उदारीकरण के बाद सिनेमा ने संस्थागत विफलताओं पर निशाना साधा। प्रकाश झा की फिल्म 'आरक्षण' (2011) अनुच्छेद 16 पर आधारित बहस छेड़ती है, जहां अमिताभ बच्चन शिक्षकों के आरक्षण अधिकारों की पैरवी करते नजर आए। 'सत्याग्रह' (2013) अन्ना हजारे आंदोलन से प्रेरित होकर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन दर्शाती है, जो शांतिपूर्ण तरीके से असेंबली के अधिकार (अनुच्छेद 19) को रेखांकित करती है। लेकिन, इसके बाद अधिकारों की बात को दर्शकों को ज्ञान देने वाले कथानकों से अलग किया गया। ऐसे में आई समकालीन युग की कोर्टरूम और चुनावी व्यंग्य वाली फ़िल्में। 'जॉली एलएलबी' (2013) जैसी फिल्मों की सीरीज न्यायपालिका की खामियों पर कटाक्ष करती है। जबकि, 'पिंक' (2016) ने महिलाओं के 'नो मीन्स नो' अधिकार को मजबूती दी। 2019 में आई फिल्म 'आर्टिकल 15' दलित अत्याचार पर अनुच्छेद 15 का उल्लंघन दिखाती है। 2021 की फिल्म 'जय भीम' आदिवासी न्याय पर केंद्रित कथानक रहा। इसके बीच 'अलीगढ़' (2015) निजता और यौनिकता के अधिकारों को रेखांकित करती फिल्म है। कहा जा सकता है कि हाल की फिल्में अधिक साहसी हैं। 'न्यूटन' (2017) छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाके में वोटिंग के संघर्ष को चित्रित करती है, जहां राजकुमार राव का पात्र लोकतंत्र की नाजुकता उजागर करता है।
     ब्लैक एंड व्हाइट से डिजिटल तक, सिनेमा ने संविधान को जीवंत किया, भ्रष्टाचार से लेकर जातिवाद तक चुनौतियों पर बहस छेड़ी। आज ध्रुवीकरण के दौर में सिनेमा को सतर्क रहना होगा। ये कृतियाँ साबित करती हैं कि लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं, अधिकारों का संरक्षण है। सिनेमा ने 75 वर्षों में जागृति का उजाला बनकर लोकतंत्र को मजबूत किया। फिल्मों ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए दर्शकों को निष्क्रिय उपभोक्ता से सक्रिय नागरिक बनाया। 'स्वदेश' (2004) ग्रामीण विकास और नागरिक कर्तव्य पर जोर देती है। 'मुल्क' (2018) अल्पसंख्यक अधिकारों की पैरवी करती है। 'अलीगढ़' (2015) धारा 377 हटाने से निजता अधिकार बचाती है। 'न्यूटन' (2017) नक्सल क्षेत्र में मताधिकार (अनुच्छेद 326) की रक्षा पर आधारित है। 'आर्टिकल 15' (2019) जातिगत भेदभाव के विरुद्ध अनुच्छेद-15 लागू कराती है। 'मुल्क' (2018) अनुच्छेद 20(3) के तहत निर्दोषता का अधिकार उजागर करता है। 'सेक्शन 375' (2019) महिलाओं के यौन अपराध अधिकारों पर केंद्रित है। 'जय भीम' (2021) आदिवासी अधिकारों की पुलिस हिंसा से रक्षा करती है। 'जॉली एलएलबी 2' (2017) न्यायिक भ्रष्टाचार से आम जनता बचाती है। 2026 तक 'बस्तर' जैसी फिल्में नक्सलवाद में लोकतंत्र बचाने पर आती हैं।
    देश की आजादी के बाद की फिल्मों ने राष्ट्र निर्माण के साथ ही अधिकारों के संरक्षण पर भी फोकस किया। 1951 में आई राज कपूर की फिल्म 'आवारा' में राज (राज कपूर) का मुकदमा सामाजिक न्याय की मांग करता है, जहां अदालत गरीबी के खिलाफ खड़ी होती है। 'दो आंखें बारह हाथ' (1957) सुधारगृह के माध्यम से पुनर्वास का अधिकार दिखाता है। 'कागज के फूल' (1959) कलाकार के अभिव्यक्ति अधिकार पर चिंतन करता है। 'साहिब बीवी और गुलाम' (1962) महिलाओं के अधिकारों की उपेक्षा पर प्रहार करता है। जबकि, 1970 में आई फिल्म 'मंथन' में सहकारिता ग्रामीण आर्थिक अधिकार बचाती है। इसके बाद के दशक में न्याय व्यवस्था की पड़ताल की गई। 'क्रांति' (1981) ब्रिटेन के लोकतंत्र की कमियों को उजागर करती है। 'अधिकार' (1986) में राजेश खन्ना अपनी भूमिका में संपत्ति व पारिवारिक अधिकारों का संरक्षण दर्शाते हैं। 'लाल बादशाह' (1990) में अमिताभ बच्चन भ्रष्टाचार से आम आदमी के अधिकार बचाते हैं। ये फिल्में न्यायपालिका को लोकतंत्र का रक्षक बताती हैं। इसके बाद में दशक में आई 'गंगाजल' (2003) पुलिस दमन से न्याय की लड़ाई दिखाती है। जबकि, 'आरक्षण' (2011) (अनुच्छेद 16) के बहाने वंचितों के अधिकार संरक्षण पर बहस छेड़ती है। 'सत्याग्रह' (2013) अनुच्छेद 19 के तहत आंदोलन से भ्रष्टाचार रोकने का संदेश देती है।
    इंदिरा गांधी के आपातकाल (1975-77) को भी सिनेमा ने नहीं छोड़ा और लोकतंत्र के संकट से रूबरू कराया। 'जंजीर' (1973) ने गुस्सैल हीरो के जरिए प्रशासनिक विफलता दिखाई, जो न्यायिक अधिकारों की मांग करता है। 'दीवार' (1975) ने दो भाइयों के माध्यम से वर्ग असमानता उजागर की, जहां गरीब का लोकतांत्रिक अधिकार कुचला जाता है। मनोज कुमार की 'क्रांति' (1974) ने आजादी की जंग को वर्तमान भ्रष्टाचार से जोड़ा। जबकि 'रोटी कपड़ा और मकान' (1974) ने आर्थिक अधिकारों पर ज्यादा जोर दिया। 1980 के दशक में 'अंदाज अपना अपना' जैसी फिल्मों ने व्यंग्य के जरिए राजनीतिक भ्रष्टाचार पर व्यंग्य कसा। उदारीकरण के दौर में भी सिनेमा ने आर्थिक लोकतंत्र पर फोकस किया। 'दामिनी' (1997) ने महिलाओं के न्यायिक अधिकारों को केंद्र में रखा, जहां एक साधारण महिला पूरे सिस्टम से टकराती है। 'सरफरोश' (1999) ने लोकतंत्र की सुरक्षा को रेखांकित करते हुए आतंकवाद के खिलाफ खुफिया तंत्र की भूमिका दिखाई। 'गुलाम' (1998) ने गुंडा राज के विरुद्ध व्यक्तिगत विद्रोह दिखाया, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी पर चोट करता है। 'मिशन कश्मीर' (2000) ने क्षेत्रीय अधिकारों और एकता पर बहस छेड़ी। ये कथानक दर्शकों को वोट की ताकत याद दिलाते रहे। 
2010 के बाद समकालीन चुनौतियां
    प्रकाश झा की फ़िल्में जैसे 'राजनीति' और 'चक्रव्यूह' (2012) ने नक्सलवाद और कॉर्पोरेट लॉबी को लोकतंत्र से जोड़ा। 'उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक' (2019) और 'आर्टिकल 370' (2024) ने राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर लोकतांत्रिक निर्णयों को सकारात्मक चित्रित किया। 'बस्तर: द नक्सल स्टोरी' (2024) ने नक्सली हिंसा के पीछे राजनीतिक संरक्षण दिखाया, जहां पुलिस अधिकारी सिस्टम से टकराती है। 'शूल' (1999) और 'इंकलाब' (1984) का प्रभाव यहां दिखता है, जहां हीरो पूरे कैबिनेट को चुनौती देता है। ये फिल्में दर्शकों को जागरूक करने में सफल रहीं, लेकिन कई बार हिंसा को वैगलोराइज कर लोकतंत्र पर अविश्वास पैदा किया। 'रंग दे बसंती' ने युवा वोटिंग बढ़ाया, जबकि 'न्यूटन' ने चुनावी प्रक्रिया की गरिमा दिखाई। फिर भी, भ्रष्ट नेता का स्टीरियोटाइप लोकतंत्र के प्रति निराशा फैलाता है। सिनेमा ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग कर अधिकारों को कुरेदा, लेकिन समाधान हमेशा संस्थागत रहा। हिंदी सिनेमा ने लोकतंत्र को आईना दिखाया, कथानकों से दर्शकों को मताधिकार, न्याय और समानता की याद दिलाई। भविष्य में ऐसी फिल्में और गहन होनी चाहिए।
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हीरो चिर युवा, हीरोइन की उम्र हाशिये पर

     फिल्मों के हीरो कभी बूढ़े नहीं होते और हीरोइनों को शादी के बाद के बाद हाशिए पर धकेल दिया जाता है। ये समझा जाता है कि अब उनमें दर्शकों को आकर्षित करने का माद्दा नहीं रहा। जबकि, हीरो साठ की उम्र के नजदीक पहुंचकर भी अपने से आधी से भी कम उम्र की हीरोइनों के साथ रोमांस करते नजर आते हैं। जैसे सलमान खान-साई मंजनरेकर (दबंग-3), अक्षय-मानुषी (सम्राट पृथ्वीराज), अमिताभ-सौंदर्या (सूर्यवंशम), शाहरुख-अनुष्का (रब ने बना दी जोड़ी) और शाहरुख-तापसी (डोंकी) आदि। इन सभी फिल्मों में हीरो की उम्र को लगभग अदृश्य कर दिया जाता है। फिल्म में रोमांस को मैजिकल या टाइमलेस लव कहकर पैकेज किया जाता है। यानी उम्र का ये अंतर अगर पुरुष के पक्ष में हो, तो नॉर्मल और महिला के पक्ष में हो तो बोल्ड। यही दोहरा मापदंड इस लैंगिक भेदभाव को संस्थागत रूप देता है। 
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- हेमंत पाल

     फिल्मी नायकों और नायिकाओं के बीच उम्र और भूमिका का फर्क बहुत पुरानी बात है। बूढ़ाते हीरो आज भी 'रोमांटिक लीड' कहलाते हैं। जबकि, उनकी समकालीन हीरोइन मां, बुआ, जज या कैमियो तक सीमित कर दी जाती हैं। हिंदी सिनेमा के इतिहास से लेकर आज तक की फिल्में दिखाती हैं कि उम्र के साथ पुरुषों का स्टारडम परिपक्वता के रूप में महिमामंडित होता रहा है। जबकि, स्त्री की उम्र को आकर्षण के क्षय के रूप में देखा जाता है। हिंदी फिल्मों में सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर खान, अक्षय कुमार या ऋतिक रोशन जैसे सितारे 55-60 की उम्र में भी कॉलेज बॉय, एक्शन हीरो और रोमांटिक हीरो बनकर घूम रहे हैं। जबकि, उनकी समकालीन माधुरी दीक्षित या करीना कपूर जैसी अभिनेत्रियां चरित्र भूमिकाओं, कैमियो या ‘स्पेशल अपीयरेंस’ में दिखती हैं। यह फर्क केवल कास्टिंग का नहीं, बल्कि उस गहरे लैंगिक पूर्वाग्रह का प्रमाण है, जो हीरो की झुर्रियों को परिपक्व आकर्षण और हीरोइन की उम्र को करियर समाप्ति घोषित कर देता है। सामाजिक, सांस्कृतिक नजरिया और दर्शक मानसिकता ही इस भेदभाव की जड़ है। यह भारतीय समाज की उस सोच में है, जहाँ पुरुष की परिपक्वता से उसका सामाजिक मूल्य बढ़ता है। जबकि, स्त्री की युवा देह को ही उसका मुख्य पूंजी मान लिया जाता है। फिल्मों ने इस सोच को चुनौती देने के बजाय अक्सर मजबूत किया। क्योंकि, बॉक्स ऑफिस पर जांच की कसौटी भी वही दर्शक मानसिकता है जिसे फिल्मों ने दशकों से गढ़ा है एक तरह का दुष्चक्र। 
    जब कोई अभिनेत्री शादी या मातृत्व के बाद भी रोमांटिक भूमिकाएँ करना चाहती है तो उसे अक्सर गॉसिप, एज शेमिंग और सोशल मीडिया ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है। इसके उलट, शादीशुदा, बच्चों के पिता और 60 के करीब नायक को फिट, चार्मिंग और एवरग्रीन बैचलर जैसे विशेषणों से नवाज़ा जाता है। दर्शक भी ट्रेलर या गानों में उम्रदराज़ हीरो के लिए वाह, यंग दिख रहे हैं जैसी टिप्पणियाँ करते हैं। लेकिन, उसी उम्र की अभिनेत्री को देख कर अब ये क्यों हीरोइन बन रही है जैसा अविश्वास ज़ाहिर करते हैं। यह विरोधाभास चौंकाता है कि जहां 50-60 साल के हीरो से अपेक्षा की जाती है, कि वह 20-25 साल की हीरोइन के साथ रोमांस करता दिखे, वहीं 40-45 की नायिका को उसी परदे पर अचानक माँ, मामी या वकील की भूमिका में धकेल दिया जाता है। बाद के दौर में वही माधुरी, श्रीदेवी या करिश्मा, जिन पर एक समय पूरी फिल्में टिकी रहती थी, उम्र बढ़ते ही सपोर्टिंग एक्ट्रेस बना दो गईं। जबकि, उनके साथ काम करने वाले नायक आज भी 'मास रोमांटिक हीरो' के पोस्टरों पर छाए हैं। देव आनंद से अमिताभ बच्चन तक के क्लासिक दौर में भी बढ़ती उम्र के हीरो के लिए रोमांटिक स्पेस खुला रहता था। जबकि, उनकी समकालीन नायिकाएँ जल्दी रिप्लेस हो जाती। देव आनंद ने 40-50 की उम्र के बाद भी लगातार युवा नायिकाओं के साथ रोमांटिक लीड की, जबकि वही दौर की मीना कुमारी, नरगिस या मधुबाला जैसी अभिनेत्रियाँ अपेक्षाकृत जल्दी पार्श्व में चली गई या फ़िल्मी मुख्यधारा से बाहर हो गईं।
     अमिताभ बच्चन ने अपनी 50 और 60 के दशक की उम्र में भी कई फिल्मों में अपेक्षाकृत कम उम्र की नायिकाओं के साथ जोड़ी बनाई। जैसे 'सूर्यवंशम' में सौंदर्या के साथ लगभग 30 साल का उम्र अंतर दिखता है, जिसे कहानी ने सहज मान लिया। वहीं वही पीढ़ी की नायिकाएँ रेखा, जया भादुड़ी, हेमा मालिनी बहुत जल्दी माँ या विशेष भूमिकाओं तक सीमित कर दी गईं। जबकि, दर्शक उन्हें अब भी रोमांटिक भूमिकाओं में स्वीकार कर सकते थे। खान युग को एवरग्रीन मर्दानगी वाला दौर कहा जा सकता है। 1990 के दशक में शाहरुख, सलमान, आमिर और अक्षय कुमार के उभार के साथ 'एवरग्रीन हीरो' की धारणा और मजबूत हुई। 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' जैसी फिल्मों ने शाहरुख को ऐसी रोमांटिक इमेज दी, जो 30 साल बाद भी 'युवा प्रेमी' के रूप में बेचने लायक मानी जाती है। समय के साथ उनकी उम्र बढ़ती रही, लेकिन उनकी हीरोइनों की पीढ़ियाँ बदलती रहीं काजोल, रानी मुखर्जी और प्रीति जिंटा से होते हुए अनुष्का शर्मा, दीपिका और तापसी पन्नू तक।
    'रब ने बना दी जोड़ी' में 40 पार शाहरुख को 20-21 की डेब्यूअंट अनुष्का शर्मा के साथ जोड़ा गया और इसे कहानी का हिस्सा मानकर स्वीकार किया गया। जबकि, इसी उम्र की नायिकाओं के लिए ऐसे अवसर लगभग बंद थे। यही ट्रेंड 'गजनी' में 40 प्लस आमिर के साथ 20 के दशक की आसिन और बाद में कई फिल्मों में दोहराया गया, जहां कहानी पुरुष की उम्र को अनुभव और महिला की उम्र को सौंदर्य के रूप में रेखांकित करती है। आज की स्थिति और भी स्पष्ट है; 55-60 की उम्र में सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर खान और ऋतिक रोशन अब भी मुख्यतः रोमांटिक या मसीहा-प्रकार के नायक के रूप में कास्ट किए जा रहे हैं, जिनकी जोड़ी 20–30 वर्ष छोटी अभिनेत्रियों के साथ सहज मानी जाती है। हाल के सालों में दबंग-3, रब ने बना दी जोड़ी, गजनी, डोंकी और विभिन्न प्रोजेक्ट्स में इस उम्र-अंतर को न केवल सामान्य, बल्कि 'स्टार वैल्यू' का हिस्सा बताया गया है। 
  
    माधुरी दीक्षित, जो 90 के दशक की सबसे लोकप्रिय नायिकाओं में रही, अब वे प्रायः मल्टीस्टारर फिल्मों में साइड रोल, कैरेक्टर पार्ट या विशेष गानों में दिखती हैं। जबकि, उनकी उम्र उनके समकालीन नायकों से बहुत ज्यादा नहीं है। करीना कपूर खान भी मुख्यधारा की हीरोइन होते हुए अब अधिकतर कंटेंट-ड्रिवेन या मल्टीस्टारर फिल्मों में माँ, पुलिस ऑफिसर या ग्रे-शेड कैरेक्टर में कास्ट हो रही हैं। भले ही वे शारीरिक रूप से उतनी ही फिट और ग्लैमरस हों जितने उनके साथ काम करने वाले पुरुष सितारे। एक दौर में तेजाब, राम लक्ष्मण, दिल, साजन, हम आपके हैं कौन और 'दिल तो पागल है' जैसी फिल्मों की केन्द्रीय नायिका वही थीं। आज उन्हें परिवार की बड़ी बहन, माँ, विलेन की पत्नी, या मल्टीस्टारर कॉमेडी या ड्रामा में सामूहिक किरदारों में अधिक देखा जाता है। यह परिवर्तन उनकी प्रतिभा के क्षय से नहीं, बल्कि इंडस्ट्री के इस पूर्वाग्रह से संचालित है कि रोमांटिक केंद्र में युवा स्त्री का चेहरा होना चाहिए, चाहे कहानी की ज़रूरत कुछ भी कहे। करीना कपूर भी 'जब वी मेट' और 'ओंकारा' जैसी फिल्मों की नायिका से अब ऐसी फिल्मों की तरफ़ शिफ्ट हुई दिखती हैं जहां उनका किरदार या तो परिवार का हिस्सा होता है या कंटेंट-ड्रिवेन सीरियस नैरेटिव का अंग, जबकि उनके समान या अधिक उम्र के नायक अभी भी 20–25 वर्ष की नई नायिकाओं के साथ लव स्टोरी में दिखाए जा रहे हैं। यह अंतर बताता है कि नायकों की उम्र को एसेट और नायिकाओं की उम्र को लायबिलिटी माना जा रहा है।
    बीते कुछ वर्षों में पिकू, इंग्लिश विंग्लिश, नीरजा, क्वीन, थप्पड़, दंगल और ओटीटी प्लेटफॉर्म की कई सीरीज़ ने उम्रदराज़ या शादीशुदा नायिकाओं को कहानी के केंद्र में रखकर यह साबित किया कि दर्शक मजबूत लेखन और सच्चे पात्रों को स्वीकार करते हैं। साथ ही, करीना या अन्य अभिनेत्रियों के संभावित प्रोजेक्ट्स में उम्र से छोटे पुरुष सितारों के साथ उनकी जोड़ी की चर्चा, भले ही बोल्ड टैग के साथ हो। लेकिन, यह संकेत भी है कि मुख्यधारा धीरे-धीरे इस असमानता पर बहस के लिए मजबूर हुई है। कुछ स्टार इंटरव्यू और डिबेट शो में खुद अभिनेताओं से यह प्रश्न पूछा जाने लगा है कि वे क्यों अपने से आधी उम्र की नायिकाओं के साथ काम करना सिनेमैटिक मैजिक मानते हैं, जबकि वही विकल्प अभिनेत्रियों को नहीं मिलता।
     यह चर्चा अगर आगे बढ़ती है और दर्शक भी उम्र और जेंडर के प्रति अधिक संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाते हैं, तो कास्टिंग के स्तर पर धीरे-धीरे संतुलन बन सकता है। जहां हीरो और हीरोइन दोनों की उम्र, अनुभव और व्यक्तित्व, कहानी की ज़रूरत से तय हों, न कि केवल पितृसत्तात्मक बाजार के गणित से।  सिनेमा समाज का दर्पण भी है और ढालने वाला माध्यम भी। जब परदे पर बार-बार यह संदेश जाता है कि 60 साल का पुरुष 20 साल की लड़की का स्वाभाविक प्रेमी है। लेकिन, 40-45 की स्त्री के लिए प्रेम, इच्छा और रोमांस अनुचित या बोल्ड हैं, तो यह समाज के जेंडर फ्रेम को और विकृत करता है। जरूरत इस बात की है कि निर्माता, निर्देशक और दर्शक मिलकर इस भेदभाव को पहचानें और स्वीकारें कि स्त्रियों की उम्र भी पुरुषों की तरह अनुभव, आकर्षण और व्यक्तित्व की परिपक्वता का प्रतीक हो सकती है, न कि उनके सिनेमाई अस्तित्व के अंत का संकेत। लेकिन, ये फार्मूला हिंदी फिल्मों के कथानक में शायद फिट नहीं बैठता। यही वजह है कि शादीशुदा अभिनेत्रियां फिल्म की मूल भूमिका से नकार दी जाती है।   
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सिनेमा के कथानक में समाया अधिकारों का सबक

 
    लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ नागरिक जिम्मेदारी कुछ फिल्मों का मूल कथानक होता है। यही इन फिल्मों की साझा धारा भी है, जो इसी मकसद से बनाई जाती है। क्योंकि, संविधान केवल किताब में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के संघर्षों, जाति, लिंग और वर्ग की असमानताओं, चुनावी राजनीति, न्यायालय और सड़कों पर चलने वाले आंदोलनों में जीवित रहता है। सिनेमा ने कभी सीधे अनुच्छेदों और धाराओं का नाम लेकर, तो कभी प्रतीकात्मक रूपकों के ज़रिए यह समझाया कि लोकतांत्रिक अधिकार वोट देने, सवाल करने, विरोध करने, पसंद का प्रेम चुनने, गरिमा से जीने का उपयोग तभी अर्थपूर्ण है, जब नागरिक सक्रिय, संवेदनशील और समतावादी दृष्टि से लैस हों।
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- हेमंत पाल

    लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों पर हिंदी सिनेमा ने शुरुआत से ही बहस चलाई है। कभी आजादी के आदर्शों के ज़रिए, कभी भ्रष्ट सत्ता के खिलाफ तो कभी संविधान की धाराओं को कथा में पिरोकर। इन फिल्मों ने दर्शकों को केवल मनोरंजन नहीं दिया, बल्कि वोट, अभिव्यक्ति, समानता, असहमति और न्याय जैसे अधिकारों के बारे में जागरूक किया है। भारतीय संविधान की मूल भावना समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय है और कई हिंदी फिल्मों के कथानक में ये भावना प्रत्यक्ष या प्रतीकात्मक रूप से उपस्थित रही है।1950 के बाद की राजनीतिक और सामाजिक उथल‑पुथल जैसे इमरजेंसी, मंडल आयोग, उदारीकरण, नई उदारवादी राजनीति और आज़ादी के बाद की आर्थिक असमानताओं ने फिल्मों को लोकतांत्रिक अधिकारों पर टिप्पणी करने के लिए कई बार उकसाया है। सिनेमा ने अक्सर वही सवाल उठाए जो संविधान पूछता है। सत्ता किसके लिए है, हम लोग कौन हैं, और क्या क़ानून कमजोर के साथ खड़ा है या मज़बूती के साथ!
   आज़ादी के बाद इमरजेंसी तक लोकतांत्रिक मुद्दों पर कई बार फिल्म के परदे पर बहस छिड़ती दिखाई दी। 1964 की फिल्म ‘लीडर’ ने चुनाव, भ्रष्टाचार और मताधिकार पर सबसे पहले सवाल खड़े किए थे। दिलीप कुमार की इस फ़िल्म को ऐसी शुरुआती फिल्मों में गिना जाता है, जिसने चुनावी भ्रष्टाचार, सत्ता‑अपराध गठजोड़ और मतदाता की सजगता को कथानक का केंद्र बनाया। फिल्म में नायक एक आदर्शवादी पत्रकार और नेता के रूप में सामने आता है जो चुनावी धांधलियों, फर्ज़ी वोटिंग और जनता की आवाज़ दबाए जाने के खिलाफ लड़ता है। यह सीधे मताधिकार, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव जैसे लोकतांत्रिक अधिकारों की ओर संकेत करता है। दर्शक यहां समझते हैं कि लोकतंत्र केवल वोट डालने का तंत्र नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की सक्रिय भागीदारी है, जो सत्ता से सवाल पूछे और चुनावी अनियमितताओं के खिलाफ खड़ा हो।
     सत्तर के दशक के अंत में बनी कुछ फिल्मों ने सेंसरशिप और इमरजेंसी के दौर की कथित दमनकारी राजनीति पर तीखी टिप्पणी की थी। क्योंकि, इस दौर में अभिव्यक्ति की आजादी और नागरिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया था। इन फिल्मों के जरिए से ये समझ उभरती है कि प्रेस की आज़ादी, असहमति का अधिकार और सत्ता की आलोचना, लोकतंत्र की मूल शर्तें हैं। जब इन्हें कुचला जाता है, तो औपचारिक रूप से लोकतंत्र बरक़रार रहते हुए भी उसकी आत्मा मर जाती है। 2006 की आमिर खान की फिल्म रंग दे बसंती’ देशभक्ति से नागरिक असहमति तक इशारा करती है। यह फ़िल्म युवाओं को केवल राष्ट्रगान गाने या झंडा फहराने से आगे बढ़ाकर व्यवस्था से सवाल करने, भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने और जवाबदेही के सवाल पूछने की तरफ ले जाती है। फिल्म में आज़ादी के आंदोलन के क्रांतिकारियों की कथा और समकालीन युवक‑युवतियों की कहानी समानांतर चलती है। इससे यह विचार उभरता है, कि लोकतंत्र में भी अन्याय दिखे तो शांतिपूर्ण या रचनात्मक प्रतिरोध नागरिक अधिकार का हिस्सा है। मीडिया ट्रायल, रक्षा घोटाला और अहिंसक‑हिंसक प्रतिरोध के बीच झूलते पात्र दर्शक से यह सवाल पूछते हैं कि संविधान द्वारा दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विरोध का अधिकार किस हद तक और किस रूप में इस्तेमाल होना चाहिए।
     2004 की शाहरुख खान की फ़िल्म ‘स्वदेस’ भी विकास के अधिकार और नागरिक जिम्मेदारी का संदेश देती है। ‘स्वदेस’ सीधे किसी अनुच्छेद पर नहीं, बल्कि संविधान की मूल भावना गरिमापूर्ण जीवन, बुनियादी सुविधाएं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ग्राम‑स्वराज पर आधारित है। फिल्म का एनआरआई नायक गांव लौटकर बिजली, शिक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए काम करता है। इससे यह संदेश उभरता है, कि लोकतंत्र केवल शहरों में नहीं, बल्कि आख़िरी नागरिक तक विकास पहुंचाने का वादा है और नागरिक भी इस प्रक्रिया के सहभागी है। संविधान का 'अनुच्छेद-15' भेदभाव को धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर प्रतिबंधित करता है। इसी पर बनी फिल्म ‘आर्टिकल 15’ एक सच्ची घटना से प्रेरित है, जो दलित लड़कियों के बलात्कार, हत्या की जांच के बहाने इस भेदभाव की जड़ें दिखाती है। शहरी, ऊंची जाति का अफसर जब ग्रामीण हिंदुस्तान में जातिगत अलगाव, मैनुअल स्कैवेंजिंग और पुलिस‑प्रशासन की सांठगांठ देखता है, तब दर्शक को समझ आता है कि कागज़ पर लिखे अधिकार और ज़मीन पर जिए जा रहे जीवन में कितना अंतर है। फिल्म दर्शक को केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि संवैधानिक शब्दावली 'अनुच्छेद-15' के साथ जोड़कर यह सोचने पर मजबूर करती है, कि भेदभाव‑रहित समाज बनाना केवल राज्य की नहीं, समाज और नागरिक की भी ज़िम्मेदारी है।
     अमिताभ बच्चन की 2011 में प्रकाश झा निर्मित फिल्म 'आरक्षण ' अनुच्छेद 16 और सामाजिक न्याय पर आधारित है। इस फिल्म का कथानक उच्च शिक्षा में आरक्षण नीति के इर्द‑गिर्द घूमता है और अनुच्छेद-16 के तहत समान अवसर तथा पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों के नैतिक और राजनीतिक सवालों को उठाता है। फिल्म में एक आदर्शवादी प्रिंसिपल और बाजारवादी शिक्षा मॉडल के बीच संघर्ष दिखाया गया। जहां आरक्षण को अक्सर ‘मेरिट’ के खिलाफ बताकर बदनाम किया जाता है। यह बहस दर्शक को यह समझने में मदद करती है कि सामाजिक‑ऐतिहासिक अन्याय को सुधारे बिना 'समान अवसर' का दावा खोखला है। इसी तरह फिल्म ‘सेक्शन 375’ (2019) कानून, सहमति और न्याय की जटिलता पर केंद्रित है। ‘सेक्शन 375’ भारतीय दंड विधान की इस धारा के तहत बलात्कार की परिभाषा, सबूत, सहमति और ‘फर्जी केस’ के सवालों को न्यायालय की बहस के रूप में प्रस्तुत करती है। फिल्म न केवल आरोपी और पीड़िता दोनों पक्षों की कमजोरियों‑मजबूतियों को दिखाती है, बल्कि यह भी रेखांकित करती है कि न्याय, जनमत से नहीं, कानून और साक्ष्य की कसौटी पर तय होना चाहिए। इसके बावजूद पितृसत्ता और शक्ति असमानता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
     निजता, गरिमा और अल्पसंख्यक अधिकार पर बनी फिल्म ‘अलीगढ़’ (2015) में समलैंगिकता के मुद्दे को गंभीरता से उठाया गया था। यह संवेदनशील फिल्म है, जो धारा 377 और संविधान द्वारा सुनिश्चित गरिमा, निजता और समानता के अधिकार से जुड़ती है। एक प्रोफेसर की निजी ज़िंदगी के उजागर होने के बाद जिस तरह विश्वविद्यालय, मीडिया और समाज उसे अलग‑थलग कर देते हैं। वह यह दिखाता है कि 'बहुमत की नैतिकता' अक्सर अल्पसंख्यक नागरिक के अधिकारों को कुचल देती है; फिल्म इस स्थिति को मानवीय स्तर पर समझने के लिए मजबूर करती है। संविधान के अनुच्छेद-19 और शांतिपूर्ण विरोध वाले कथानक की 2013 की फिल्म 'सत्याग्रह’ भ्रष्टाचार के खिलाफ जन आंदोलन को केंद्र में रखती है और अनुच्छेद-19 के तहत अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सभा, विरोध और संगठन बनाने के अधिकार को कथा में रूपांतरित करती है। फिल्म में एक वृद्ध गांधीवादी की गिरफ्तारी के बाद सड़क पर उतरी भीड़, सोशल मीडिया और युवा नेतृत्व यह दिखाते हैं कि लोकतंत्र में अहिंसक प्रतिरोध सत्ता को जवाबदेह बनाने का वैध तरीका है। भले ही राज्य अक्सर इसे ‘कानून‑व्यवस्था’ का मुद्दा बताकर दबाने की कोशिश करे।
      फिल्म ‘न्यूटन’ (2017) मताधिकार और लोकतंत्र की जमीनी चुनौती  रेखांकित करती है। यह छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाके में एक ईमानदार सरकारी अफसर की चुनाव ड्यूटी की कहानी है, जो हर हाल में मतदान कराना चाहता है। यह फिल्म दिखाती है कि लोकतंत्र का सबसे बुनियादी अधिकार वोट है, जो जंगल के आदिवासी तक पहुंचाने के लिए प्रशासन, सुरक्षा बल, विद्रोही समूह और आम नागरिक किन विरोधाभासों से गुजरते हैं। सवाल उठता है कि क्या केवल वोटिंग की प्रक्रिया पूरी कर देना ही पर्याप्त है या मतदाता को सचमुच जागरूक और सशक्त बनाना भी उतना ही ज़रूरी है।
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नया साल और सिनेमा // देशभक्ति, रोमांस और हॉरर कॉमेडी के साथ फिर दिखेंगे राम

   साल बदलने का आशय सिर्फ अंक बदलना नहीं होता। उसके साथ और भी बहुत कुछ बदलता है। यहां तक कि दर्शकों का फिल्म देखने का नजरिया और पसंद भी। फिल्मकार भी उसी मूड को भांपकर कथानक तय करते हैं। 2025 का साल इसका प्रमाण है कि दर्शकों के मनोरंजन मूड में अंतर आ रहा है। छावा, सैयारा और 'धुरंधर' से यह साबित भी हुआ, जिनके कथानक आपस में कहीं मेल नहीं खाते। यह ट्रेंड 2026 में भी दिखाई देगा। नए साल में सीक्वल के साथ एक्शन, हॉरर कॉमेडी, प्रेम और धर्म का बड़ा मेला लगने वाला है। मनोरंजन का ये मॉकटेल कितने दर्शकों को भाएगा, ये तो वक़्त बताएगा। जहां तक कलाकारों के जादू चलने का सवाल है, तो रणवीर कपूर इस कतार में सबसे आगे खड़े हैं। उनकी दो फ़िल्में 'रामायण' और 'लव एंड गॉड' से बड़ी उम्मीदें लगी है। 
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- हेमंत पाल

   या साल (2026) हिंदी सिनेमा के लिए सीक्वल, वॉर ड्रामा और मेगा सागा का साल बनता दिखाई दे रहा है। यहां बड़े बजट, स्टार कास्ट और पैन इंडिया की पहुंच मिलकर बॉक्स ऑफिस पर बड़ा धमाल कर सकते हैं। दर्शकों ने 2025 में कंटेंट ड्रिवेन फिल्मों की ताकत देख ली, 2026 में वही ट्रेंड स्टार पावर और फ्रैंचाइज़ी फिल्मों के साथ मिलकर और तेजी से लौटने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। 2026 की योजना में वॉर ड्रामा बॉर्डर-2, बैटल ऑफ़ गलवान, माईथोलॉजिकल एपिक रामायण, क्राइम थ्रिलर मर्दानी-3, स्पाई-यूनिवर्स : अल्फा, हॉरर कॉमेडी भूत बंगला, भेड़िया-2 और मैड कैप कॉमेडी 'धमाल-4' एक साथ लाइन में खड़ी हैं। ये साल दो बड़े ट्रेंड को और पुख़्ता करेगा, ये हैं कंटेंट और फ्रैंचाइज़ी यानी सुरक्षित खेल। जैसे मर्दानी-3, धमाल-4 और भेड़िया-2.पैन इंडिया और 'यूनिवर्स' फिल्में हैं। यशराज की 'अल्फा' और पौराणिक 'रामायण' का मल्टी लैंग्वेज प्रदर्शन आसमान चढ़कर बोलेगा।
    'बॉर्डर-2' दर्शकों में देशभक्ति जगाने वाली फिल्म है, जिसे जनवरी के रिपब्लिक-डे वीकेंड पर रिलीज किया जा रहा, जो सीधे 1997 की क्लासिक 'बॉर्डर' की याद दिलाएगी और भावनात्मक नॉस्टैल्जिया को कैश करेगी। इसमें सनी देओल के साथ वरुण धवन और दिलजीत दोसांज जैसे कलाकार हैं, यानी इसमें पुरानी पीढ़ी की इमेज और नई जनरेशन की स्टार वैल्यू का मिश्रण होगा। वॉर, एक्शन और देशभक्ति का यह मसाला मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रीन दोनों पर जादू दिखाए तो हैरानी नहीं होना चाहिए। इसके अलावा नितेश तिवारी निर्देशित 'रामायण (पार्ट-1) साल की सबसे बड़ी विज़ुअल सागा होगी, जिसे 2026 की सबसे महत्वाकांक्षी हिंदी फिल्म माना जा रहा है। इसकी स्केल और वीएफएक्स को 'इंडियन सिनेमा की अब तक की सबसे भव्य प्रोजेक्ट्स' में गिना जा रहा है। रणवीर कपूर, साई पल्लवी और यश जैसे नाम इसे पैन-इंडिया इवेंट बना सकते हैं। धार्मिक-सांस्कृतिक भावनाओं के बीच यह फिल्म अगर कंटेंट के स्तर पर बैलेंस साधने में सफल होती है, तो यह 2026 की सबसे ज्यादा चर्चित होने वाली फिल्म बन सकती है।  
    संजय लीला भंसाली की 'लव एंड वार' को मार्च में रिलीज़ के लिए प्लान किया जा रहा है। यह फिल्म प्रेम, संघर्ष और भव्य प्रोडक्शन वाली 'इमोशनल इवेंट' फिल्म होगी, जो भंसाली की पहचान है। संभावना है कि यह फिल्म 2026 के रोमांटिक ड्रामा स्पेस को आकर्षित करे। ठीक वैसे ही जैसे 2025 में 'सैयारा' ने रोमांस, लवर यूथ ऑडियंस को अपनी तरफ खींचा था। इसके अलावा धमाल-4, भूत बंगला, और भेड़िया-2 से कॉमेडी और हॉरर कॉमेडी की वापसी होने वाली है, जिसका 2025 में अभाव देखा गया। 'धमाल-4' पुराने गैंग की लालच और पागलपंती को नए ट्रेज़र-हंट के साथ फिर लौटा सकता है। प्रियदर्शन और अक्षय कुमार की जोड़ी 'भूत बंगला' में हॉरर कॉमेडी की क्लासिक टाइमिंग वापस लाने की कोशिश करेगी, जो कि हॉरर कॉमेडी पंच होता है। इसके गुड फ्राइडे वाले वीकेंड पर रिलीज का मतलब है फैमिली ऑडियंस को टारगेट करना। 'भेड़िया-2' वरुण धवन के क्रिएचर-यूनिवर्स को आगे बढ़ाएगी, जहां वीएफएक्स और डार्क ह्यूमर के साथ जंगल-लोककथा वाला देसी सुपरनैचुरल जोन मजबूत होगा। 
     इसी तरह यशराज की 'मर्दानी-3' और 'अल्फा' महिला केंद्रित एक्शन फिल्म है। 'मर्दानी-3' में रानी मुखर्जी एक बार फिर शिवानी शिवाजी रॉय के रूप में लौटेंगी और फ्रैंचाइज़ी के क्राइम थ्रिलर टोन को आगे बढ़ाएंगी। यह फिल्म मिड-रेंज बजट की है, लेकिन हाई इम्पैक्ट वाली कैटेगरी में मजबूती से खड़े होने ताकत रखती है। इसके पहले वाली दोनों 'मर्दानी' ने महिला दर्शकों को जबरदस्त आकर्षित किया था। यशराज की ही स्पाई यूनिवर्स की 'अल्फ़ा' में आलिया भट्ट और शरवरी वाघ एक नई फीमेल-स्पाई जोड़ी के रूप में नजर आने वाली हैं। पठान, टाइगर, वार जैसी मेल डोमिनेंट फिल्मों की भीड़ में यह फिल्म जेंडर-बैलेंस की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगी। अगर फिल्म की एक्शन मजबूत रही, तो तय है कि यह फिल्म साथ में रिलीज होने वाली फिल्म की बखिया उधेड़ दे।
    'बॉर्डर-2' में सनी देओल 'ग़दर-2' के बाद फिर देशभक्ति ड्रामा के पोस्टर-बॉय बनकर लौटेंगे। अगर फिल्म दर्शकों में अपनी इमोशन पकड़ बना लेती है, तो सनी की 'मास हीरो' इमेज नई पीढ़ी तक दोबारा पहुंचेगी। रणवीर कपूर और यश के लिए 'रामायण' प्रोजेक्ट करियर डिफाइनिंग साबित हो सकता है। एक तरफ रणवीर का देवदत्त नायक वाली धीर-गंभीर इमेज और दूसरी तरफ यश का पैन-इंडिया स्टारडम मिलकर इस फिल्म के हर कैरेक्टर को चर्चा में बनाकर रखेंगे। उधर, रानी मुखर्जी और आलिया भट्ट जैसी एक्ट्रेस 'मर्दानी-3' और 'अल्फा' के ज़रिए यह साबित कर सकती हैं, कि 2025 में दिखी कंटेंट ड्रिवन और फीमेल सेंट्रिक फिल्मों की लहर 2026 में और पावरफुल रूप लेकर सामने आई। 
    वरुण धवन के लिए 'बॉर्डर-2' और 'भेड़िया-2' का कॉम्बो 2026 को 'कमबैक ईयर' बना सकता है। एक तरफ वॉर ड्रामा और दूसरी तरफ हॉरर कॉमेडी ये दोनों अलग-अलग टोन में एक्सपोज़ होंगे। शाहिद कपूर 'ओ रोमियो' जैसे डार्क थ्रिलर में विशाल भारद्वाज के साथ लौटकर अपनी गंभीर अभिनेता वाली साख को और मजबूत कर सकते हैं। 2026 के थ्रिलर स्पेस में यह फिल्म क्रिटिक फेवरेट भी बन जाए, तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। इमरान हाशमी 'आवारापन-2' के ज़रिए नॉस्टैल्जिक और इमोशनल एक्शन जोन में वापसी करेंगे। अगर कहानी ओरिजिनल 'आवारापन' जैसी इमोशन पकड़ बनाती है, तो उनकी इमेज को नया बूस्ट मिलना तय है। रणबीर कपूर के पास 2026 में ज्यादा प्रमुख भूमिकाएं हैं। उनकी दो सबसे बड़ी और बहुप्रतीक्षित फिल्में हैं 'रामायण' और 'लव एंड वार।' ये दोनों बहुत बड़े प्रोजेक्ट हैं और दोनों के टॉपिक भी अलग हैं। 'रामायण' पौराणिक एपिक और 'लव एंड वार' रोमांटिक वॉर ड्रामा हैं। रणवीर की राम की भूमिका वाली फिल्म दिवाली के आसपास परदे पर उतरेगी। उनकी ये दोनों फिल्में 2026 के ऐसे प्रोजेक्ट हैं जिन पर सबकी नजर हैं।
      'रामायण' को तो सबसे महंगी वीएफएक्स फिल्म माना जा रहा है। जबकि, 'लव एंड वार' को संजय लीला भंसाली की वापसी का प्रतीक कहा जा रहा। इस वजह से उनका स्क्रीन टाइम, प्रमोशन और बॉक्स ऑफिस फोकस साल भर बना रहेगा, जैसा 2025 में विक्की कौशल (छावा) और रणवीर सिंह (धुरंधर) के साथ हुआ। इस लाइन में शाहरुख खान हैं जिनकी 'किंग' इसी साल रिलीज होगी। सनी देओल भी 'बॉर्डर-2' और 'रामायण' में हैं, पर उनका रोल हनुमान का है। वरुण धवन के पास भी 'बॉर्डर-2' और'भेड़िया-2' हैं, लेकिन फिर भी रणवीर कपूर की फिल्मों का पैमाना ज्यादा ऊंचा है। बीते बरस (2025) में अक्षय खन्ना और बॉबी देओल जैसे कलाकारों ने निगेटिव शेड्स के साथ परदे पर जबरदस्त प्रभाव डाला। 2026 में 'दृश्यम-3' और कृष-4 जैसी फिल्मों की लाइन में ऐसे स्टार विलेन' का प्रभाव और बढ़ने की संभावना है, जो हीरो के बराबर चर्चा में रहते हैं। फ्रैंचाइज़ी फिल्मों में सपोर्टिंग और ग्रे-शेड कैरेक्टर को बड़ा स्क्रीन टाइम मिलने से कई मिड लेवल एक्टर्स के लिए 2026 बड़ा साल बन सकता है।
     2025 में जहां छावा, धुरंधर और 'सैयारा' जैसी ओरिजिनल कहानियों ने साबित किया कि फिल्म के कलाकार नहीं उसकी ;कहानी ही राजा' है, वहीं 2026 में वही सीख बड़े बजट और फ्रैंचाइज़ी फॉर्मेट के साथ लागू होते दिखाई दे रही है। यानी अब सीक्वल भी तभी चलेंगे जब कंटेंट ताज़ा होगा। ओटीटी की चुनौती के बीच थिएटर फुटफॉल के लिए 2026 की फ़िल्में खुद को 'इवेंट' के रूप में बेचेंगी वॉर-ड्रामा की स्केल, माइथोलॉजी का विज़ुअल ग्रैंड्योर, स्पाई यूनिवर्स की कनेक्टेड स्टोरीज़ और हॉरर कॉमेडी का सामूहिक मज़ा, यह सब मिलकर बॉक्स ऑफिस पर बड़ा धमाका कर सकते हैं। इस नजरिए से अनुमान लगाया जा सकता है कि नया साल कुछ ऐसा नया मनोरंजन लाएगा, जो दर्शकों को अपने मोहपाश मुक्त नहीं होने देगा।  
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