Sunday, January 18, 2026

सिनेमा के कथानक में समाया अधिकारों का सबक

 
    लोकतांत्रिक अधिकारों के साथ नागरिक जिम्मेदारी कुछ फिल्मों का मूल कथानक होता है। यही इन फिल्मों की साझा धारा भी है, जो इसी मकसद से बनाई जाती है। क्योंकि, संविधान केवल किताब में नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के संघर्षों, जाति, लिंग और वर्ग की असमानताओं, चुनावी राजनीति, न्यायालय और सड़कों पर चलने वाले आंदोलनों में जीवित रहता है। सिनेमा ने कभी सीधे अनुच्छेदों और धाराओं का नाम लेकर, तो कभी प्रतीकात्मक रूपकों के ज़रिए यह समझाया कि लोकतांत्रिक अधिकार वोट देने, सवाल करने, विरोध करने, पसंद का प्रेम चुनने, गरिमा से जीने का उपयोग तभी अर्थपूर्ण है, जब नागरिक सक्रिय, संवेदनशील और समतावादी दृष्टि से लैस हों।
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- हेमंत पाल

    लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों पर हिंदी सिनेमा ने शुरुआत से ही बहस चलाई है। कभी आजादी के आदर्शों के ज़रिए, कभी भ्रष्ट सत्ता के खिलाफ तो कभी संविधान की धाराओं को कथा में पिरोकर। इन फिल्मों ने दर्शकों को केवल मनोरंजन नहीं दिया, बल्कि वोट, अभिव्यक्ति, समानता, असहमति और न्याय जैसे अधिकारों के बारे में जागरूक किया है। भारतीय संविधान की मूल भावना समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय है और कई हिंदी फिल्मों के कथानक में ये भावना प्रत्यक्ष या प्रतीकात्मक रूप से उपस्थित रही है।1950 के बाद की राजनीतिक और सामाजिक उथल‑पुथल जैसे इमरजेंसी, मंडल आयोग, उदारीकरण, नई उदारवादी राजनीति और आज़ादी के बाद की आर्थिक असमानताओं ने फिल्मों को लोकतांत्रिक अधिकारों पर टिप्पणी करने के लिए कई बार उकसाया है। सिनेमा ने अक्सर वही सवाल उठाए जो संविधान पूछता है। सत्ता किसके लिए है, हम लोग कौन हैं, और क्या क़ानून कमजोर के साथ खड़ा है या मज़बूती के साथ!
   आज़ादी के बाद इमरजेंसी तक लोकतांत्रिक मुद्दों पर कई बार फिल्म के परदे पर बहस छिड़ती दिखाई दी। 1964 की फिल्म ‘लीडर’ ने चुनाव, भ्रष्टाचार और मताधिकार पर सबसे पहले सवाल खड़े किए थे। दिलीप कुमार की इस फ़िल्म को ऐसी शुरुआती फिल्मों में गिना जाता है, जिसने चुनावी भ्रष्टाचार, सत्ता‑अपराध गठजोड़ और मतदाता की सजगता को कथानक का केंद्र बनाया। फिल्म में नायक एक आदर्शवादी पत्रकार और नेता के रूप में सामने आता है जो चुनावी धांधलियों, फर्ज़ी वोटिंग और जनता की आवाज़ दबाए जाने के खिलाफ लड़ता है। यह सीधे मताधिकार, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव जैसे लोकतांत्रिक अधिकारों की ओर संकेत करता है। दर्शक यहां समझते हैं कि लोकतंत्र केवल वोट डालने का तंत्र नहीं, बल्कि जागरूक नागरिक की सक्रिय भागीदारी है, जो सत्ता से सवाल पूछे और चुनावी अनियमितताओं के खिलाफ खड़ा हो।
     सत्तर के दशक के अंत में बनी कुछ फिल्मों ने सेंसरशिप और इमरजेंसी के दौर की कथित दमनकारी राजनीति पर तीखी टिप्पणी की थी। क्योंकि, इस दौर में अभिव्यक्ति की आजादी और नागरिक अधिकारों को सीमित कर दिया गया था। इन फिल्मों के जरिए से ये समझ उभरती है कि प्रेस की आज़ादी, असहमति का अधिकार और सत्ता की आलोचना, लोकतंत्र की मूल शर्तें हैं। जब इन्हें कुचला जाता है, तो औपचारिक रूप से लोकतंत्र बरक़रार रहते हुए भी उसकी आत्मा मर जाती है। 2006 की आमिर खान की फिल्म रंग दे बसंती’ देशभक्ति से नागरिक असहमति तक इशारा करती है। यह फ़िल्म युवाओं को केवल राष्ट्रगान गाने या झंडा फहराने से आगे बढ़ाकर व्यवस्था से सवाल करने, भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े होने और जवाबदेही के सवाल पूछने की तरफ ले जाती है। फिल्म में आज़ादी के आंदोलन के क्रांतिकारियों की कथा और समकालीन युवक‑युवतियों की कहानी समानांतर चलती है। इससे यह विचार उभरता है, कि लोकतंत्र में भी अन्याय दिखे तो शांतिपूर्ण या रचनात्मक प्रतिरोध नागरिक अधिकार का हिस्सा है। मीडिया ट्रायल, रक्षा घोटाला और अहिंसक‑हिंसक प्रतिरोध के बीच झूलते पात्र दर्शक से यह सवाल पूछते हैं कि संविधान द्वारा दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और विरोध का अधिकार किस हद तक और किस रूप में इस्तेमाल होना चाहिए।
     2004 की शाहरुख खान की फ़िल्म ‘स्वदेस’ भी विकास के अधिकार और नागरिक जिम्मेदारी का संदेश देती है। ‘स्वदेस’ सीधे किसी अनुच्छेद पर नहीं, बल्कि संविधान की मूल भावना गरिमापूर्ण जीवन, बुनियादी सुविधाएं, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ग्राम‑स्वराज पर आधारित है। फिल्म का एनआरआई नायक गांव लौटकर बिजली, शिक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए काम करता है। इससे यह संदेश उभरता है, कि लोकतंत्र केवल शहरों में नहीं, बल्कि आख़िरी नागरिक तक विकास पहुंचाने का वादा है और नागरिक भी इस प्रक्रिया के सहभागी है। संविधान का 'अनुच्छेद-15' भेदभाव को धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान आदि के आधार पर प्रतिबंधित करता है। इसी पर बनी फिल्म ‘आर्टिकल 15’ एक सच्ची घटना से प्रेरित है, जो दलित लड़कियों के बलात्कार, हत्या की जांच के बहाने इस भेदभाव की जड़ें दिखाती है। शहरी, ऊंची जाति का अफसर जब ग्रामीण हिंदुस्तान में जातिगत अलगाव, मैनुअल स्कैवेंजिंग और पुलिस‑प्रशासन की सांठगांठ देखता है, तब दर्शक को समझ आता है कि कागज़ पर लिखे अधिकार और ज़मीन पर जिए जा रहे जीवन में कितना अंतर है। फिल्म दर्शक को केवल सहानुभूति नहीं, बल्कि संवैधानिक शब्दावली 'अनुच्छेद-15' के साथ जोड़कर यह सोचने पर मजबूर करती है, कि भेदभाव‑रहित समाज बनाना केवल राज्य की नहीं, समाज और नागरिक की भी ज़िम्मेदारी है।
     अमिताभ बच्चन की 2011 में प्रकाश झा निर्मित फिल्म 'आरक्षण ' अनुच्छेद 16 और सामाजिक न्याय पर आधारित है। इस फिल्म का कथानक उच्च शिक्षा में आरक्षण नीति के इर्द‑गिर्द घूमता है और अनुच्छेद-16 के तहत समान अवसर तथा पिछड़े वर्गों के लिए विशेष प्रावधानों के नैतिक और राजनीतिक सवालों को उठाता है। फिल्म में एक आदर्शवादी प्रिंसिपल और बाजारवादी शिक्षा मॉडल के बीच संघर्ष दिखाया गया। जहां आरक्षण को अक्सर ‘मेरिट’ के खिलाफ बताकर बदनाम किया जाता है। यह बहस दर्शक को यह समझने में मदद करती है कि सामाजिक‑ऐतिहासिक अन्याय को सुधारे बिना 'समान अवसर' का दावा खोखला है। इसी तरह फिल्म ‘सेक्शन 375’ (2019) कानून, सहमति और न्याय की जटिलता पर केंद्रित है। ‘सेक्शन 375’ भारतीय दंड विधान की इस धारा के तहत बलात्कार की परिभाषा, सबूत, सहमति और ‘फर्जी केस’ के सवालों को न्यायालय की बहस के रूप में प्रस्तुत करती है। फिल्म न केवल आरोपी और पीड़िता दोनों पक्षों की कमजोरियों‑मजबूतियों को दिखाती है, बल्कि यह भी रेखांकित करती है कि न्याय, जनमत से नहीं, कानून और साक्ष्य की कसौटी पर तय होना चाहिए। इसके बावजूद पितृसत्ता और शक्ति असमानता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
     निजता, गरिमा और अल्पसंख्यक अधिकार पर बनी फिल्म ‘अलीगढ़’ (2015) में समलैंगिकता के मुद्दे को गंभीरता से उठाया गया था। यह संवेदनशील फिल्म है, जो धारा 377 और संविधान द्वारा सुनिश्चित गरिमा, निजता और समानता के अधिकार से जुड़ती है। एक प्रोफेसर की निजी ज़िंदगी के उजागर होने के बाद जिस तरह विश्वविद्यालय, मीडिया और समाज उसे अलग‑थलग कर देते हैं। वह यह दिखाता है कि 'बहुमत की नैतिकता' अक्सर अल्पसंख्यक नागरिक के अधिकारों को कुचल देती है; फिल्म इस स्थिति को मानवीय स्तर पर समझने के लिए मजबूर करती है। संविधान के अनुच्छेद-19 और शांतिपूर्ण विरोध वाले कथानक की 2013 की फिल्म 'सत्याग्रह’ भ्रष्टाचार के खिलाफ जन आंदोलन को केंद्र में रखती है और अनुच्छेद-19 के तहत अभिव्यक्ति, शांतिपूर्ण सभा, विरोध और संगठन बनाने के अधिकार को कथा में रूपांतरित करती है। फिल्म में एक वृद्ध गांधीवादी की गिरफ्तारी के बाद सड़क पर उतरी भीड़, सोशल मीडिया और युवा नेतृत्व यह दिखाते हैं कि लोकतंत्र में अहिंसक प्रतिरोध सत्ता को जवाबदेह बनाने का वैध तरीका है। भले ही राज्य अक्सर इसे ‘कानून‑व्यवस्था’ का मुद्दा बताकर दबाने की कोशिश करे।
      फिल्म ‘न्यूटन’ (2017) मताधिकार और लोकतंत्र की जमीनी चुनौती  रेखांकित करती है। यह छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाके में एक ईमानदार सरकारी अफसर की चुनाव ड्यूटी की कहानी है, जो हर हाल में मतदान कराना चाहता है। यह फिल्म दिखाती है कि लोकतंत्र का सबसे बुनियादी अधिकार वोट है, जो जंगल के आदिवासी तक पहुंचाने के लिए प्रशासन, सुरक्षा बल, विद्रोही समूह और आम नागरिक किन विरोधाभासों से गुजरते हैं। सवाल उठता है कि क्या केवल वोटिंग की प्रक्रिया पूरी कर देना ही पर्याप्त है या मतदाता को सचमुच जागरूक और सशक्त बनाना भी उतना ही ज़रूरी है।
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