फिल्मों के हीरो कभी बूढ़े नहीं होते और हीरोइनों को शादी के बाद के बाद हाशिए पर धकेल दिया जाता है। ये समझा जाता है कि अब उनमें दर्शकों को आकर्षित करने का माद्दा नहीं रहा। जबकि, हीरो साठ की उम्र के नजदीक पहुंचकर भी अपने से आधी से भी कम उम्र की हीरोइनों के साथ रोमांस करते नजर आते हैं। जैसे सलमान खान-साई मंजनरेकर (दबंग-3), अक्षय-मानुषी (सम्राट पृथ्वीराज), अमिताभ-सौंदर्या (सूर्यवंशम), शाहरुख-अनुष्का (रब ने बना दी जोड़ी) और शाहरुख-तापसी (डोंकी) आदि। इन सभी फिल्मों में हीरो की उम्र को लगभग अदृश्य कर दिया जाता है। फिल्म में रोमांस को मैजिकल या टाइमलेस लव कहकर पैकेज किया जाता है। यानी उम्र का ये अंतर अगर पुरुष के पक्ष में हो, तो नॉर्मल और महिला के पक्ष में हो तो बोल्ड। यही दोहरा मापदंड इस लैंगिक भेदभाव को संस्थागत रूप देता है।
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- हेमंत पाल
फिल्मी नायकों और नायिकाओं के बीच उम्र और भूमिका का फर्क बहुत पुरानी बात है। बूढ़ाते हीरो आज भी 'रोमांटिक लीड' कहलाते हैं। जबकि, उनकी समकालीन हीरोइन मां, बुआ, जज या कैमियो तक सीमित कर दी जाती हैं। हिंदी सिनेमा के इतिहास से लेकर आज तक की फिल्में दिखाती हैं कि उम्र के साथ पुरुषों का स्टारडम परिपक्वता के रूप में महिमामंडित होता रहा है। जबकि, स्त्री की उम्र को आकर्षण के क्षय के रूप में देखा जाता है। हिंदी फिल्मों में सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर खान, अक्षय कुमार या ऋतिक रोशन जैसे सितारे 55-60 की उम्र में भी कॉलेज बॉय, एक्शन हीरो और रोमांटिक हीरो बनकर घूम रहे हैं। जबकि, उनकी समकालीन माधुरी दीक्षित या करीना कपूर जैसी अभिनेत्रियां चरित्र भूमिकाओं, कैमियो या ‘स्पेशल अपीयरेंस’ में दिखती हैं। यह फर्क केवल कास्टिंग का नहीं, बल्कि उस गहरे लैंगिक पूर्वाग्रह का प्रमाण है, जो हीरो की झुर्रियों को परिपक्व आकर्षण और हीरोइन की उम्र को करियर समाप्ति घोषित कर देता है। सामाजिक, सांस्कृतिक नजरिया और दर्शक मानसिकता ही इस भेदभाव की जड़ है। यह भारतीय समाज की उस सोच में है, जहाँ पुरुष की परिपक्वता से उसका सामाजिक मूल्य बढ़ता है। जबकि, स्त्री की युवा देह को ही उसका मुख्य पूंजी मान लिया जाता है। फिल्मों ने इस सोच को चुनौती देने के बजाय अक्सर मजबूत किया। क्योंकि, बॉक्स ऑफिस पर जांच की कसौटी भी वही दर्शक मानसिकता है जिसे फिल्मों ने दशकों से गढ़ा है एक तरह का दुष्चक्र।
जब कोई अभिनेत्री शादी या मातृत्व के बाद भी रोमांटिक भूमिकाएँ करना चाहती है तो उसे अक्सर गॉसिप, एज शेमिंग और सोशल मीडिया ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है। इसके उलट, शादीशुदा, बच्चों के पिता और 60 के करीब नायक को फिट, चार्मिंग और एवरग्रीन बैचलर जैसे विशेषणों से नवाज़ा जाता है। दर्शक भी ट्रेलर या गानों में उम्रदराज़ हीरो के लिए वाह, यंग दिख रहे हैं जैसी टिप्पणियाँ करते हैं। लेकिन, उसी उम्र की अभिनेत्री को देख कर अब ये क्यों हीरोइन बन रही है जैसा अविश्वास ज़ाहिर करते हैं। यह विरोधाभास चौंकाता है कि जहां 50-60 साल के हीरो से अपेक्षा की जाती है, कि वह 20-25 साल की हीरोइन के साथ रोमांस करता दिखे, वहीं 40-45 की नायिका को उसी परदे पर अचानक माँ, मामी या वकील की भूमिका में धकेल दिया जाता है। बाद के दौर में वही माधुरी, श्रीदेवी या करिश्मा, जिन पर एक समय पूरी फिल्में टिकी रहती थी, उम्र बढ़ते ही सपोर्टिंग एक्ट्रेस बना दो गईं। जबकि, उनके साथ काम करने वाले नायक आज भी 'मास रोमांटिक हीरो' के पोस्टरों पर छाए हैं। देव आनंद से अमिताभ बच्चन तक के क्लासिक दौर में भी बढ़ती उम्र के हीरो के लिए रोमांटिक स्पेस खुला रहता था। जबकि, उनकी समकालीन नायिकाएँ जल्दी रिप्लेस हो जाती। देव आनंद ने 40-50 की उम्र के बाद भी लगातार युवा नायिकाओं के साथ रोमांटिक लीड की, जबकि वही दौर की मीना कुमारी, नरगिस या मधुबाला जैसी अभिनेत्रियाँ अपेक्षाकृत जल्दी पार्श्व में चली गई या फ़िल्मी मुख्यधारा से बाहर हो गईं।
अमिताभ बच्चन ने अपनी 50 और 60 के दशक की उम्र में भी कई फिल्मों में अपेक्षाकृत कम उम्र की नायिकाओं के साथ जोड़ी बनाई। जैसे 'सूर्यवंशम' में सौंदर्या के साथ लगभग 30 साल का उम्र अंतर दिखता है, जिसे कहानी ने सहज मान लिया। वहीं वही पीढ़ी की नायिकाएँ रेखा, जया भादुड़ी, हेमा मालिनी बहुत जल्दी माँ या विशेष भूमिकाओं तक सीमित कर दी गईं। जबकि, दर्शक उन्हें अब भी रोमांटिक भूमिकाओं में स्वीकार कर सकते थे। खान युग को एवरग्रीन मर्दानगी वाला दौर कहा जा सकता है। 1990 के दशक में शाहरुख, सलमान, आमिर और अक्षय कुमार के उभार के साथ 'एवरग्रीन हीरो' की धारणा और मजबूत हुई। 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' जैसी फिल्मों ने शाहरुख को ऐसी रोमांटिक इमेज दी, जो 30 साल बाद भी 'युवा प्रेमी' के रूप में बेचने लायक मानी जाती है। समय के साथ उनकी उम्र बढ़ती रही, लेकिन उनकी हीरोइनों की पीढ़ियाँ बदलती रहीं काजोल, रानी मुखर्जी और प्रीति जिंटा से होते हुए अनुष्का शर्मा, दीपिका और तापसी पन्नू तक।
'रब ने बना दी जोड़ी' में 40 पार शाहरुख को 20-21 की डेब्यूअंट अनुष्का शर्मा के साथ जोड़ा गया और इसे कहानी का हिस्सा मानकर स्वीकार किया गया। जबकि, इसी उम्र की नायिकाओं के लिए ऐसे अवसर लगभग बंद थे। यही ट्रेंड 'गजनी' में 40 प्लस आमिर के साथ 20 के दशक की आसिन और बाद में कई फिल्मों में दोहराया गया, जहां कहानी पुरुष की उम्र को अनुभव और महिला की उम्र को सौंदर्य के रूप में रेखांकित करती है। आज की स्थिति और भी स्पष्ट है; 55-60 की उम्र में सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर खान और ऋतिक रोशन अब भी मुख्यतः रोमांटिक या मसीहा-प्रकार के नायक के रूप में कास्ट किए जा रहे हैं, जिनकी जोड़ी 20–30 वर्ष छोटी अभिनेत्रियों के साथ सहज मानी जाती है। हाल के सालों में दबंग-3, रब ने बना दी जोड़ी, गजनी, डोंकी और विभिन्न प्रोजेक्ट्स में इस उम्र-अंतर को न केवल सामान्य, बल्कि 'स्टार वैल्यू' का हिस्सा बताया गया है।
माधुरी दीक्षित, जो 90 के दशक की सबसे लोकप्रिय नायिकाओं में रही, अब वे प्रायः मल्टीस्टारर फिल्मों में साइड रोल, कैरेक्टर पार्ट या विशेष गानों में दिखती हैं। जबकि, उनकी उम्र उनके समकालीन नायकों से बहुत ज्यादा नहीं है। करीना कपूर खान भी मुख्यधारा की हीरोइन होते हुए अब अधिकतर कंटेंट-ड्रिवेन या मल्टीस्टारर फिल्मों में माँ, पुलिस ऑफिसर या ग्रे-शेड कैरेक्टर में कास्ट हो रही हैं। भले ही वे शारीरिक रूप से उतनी ही फिट और ग्लैमरस हों जितने उनके साथ काम करने वाले पुरुष सितारे। एक दौर में तेजाब, राम लक्ष्मण, दिल, साजन, हम आपके हैं कौन और 'दिल तो पागल है' जैसी फिल्मों की केन्द्रीय नायिका वही थीं। आज उन्हें परिवार की बड़ी बहन, माँ, विलेन की पत्नी, या मल्टीस्टारर कॉमेडी या ड्रामा में सामूहिक किरदारों में अधिक देखा जाता है। यह परिवर्तन उनकी प्रतिभा के क्षय से नहीं, बल्कि इंडस्ट्री के इस पूर्वाग्रह से संचालित है कि रोमांटिक केंद्र में युवा स्त्री का चेहरा होना चाहिए, चाहे कहानी की ज़रूरत कुछ भी कहे। करीना कपूर भी 'जब वी मेट' और 'ओंकारा' जैसी फिल्मों की नायिका से अब ऐसी फिल्मों की तरफ़ शिफ्ट हुई दिखती हैं जहां उनका किरदार या तो परिवार का हिस्सा होता है या कंटेंट-ड्रिवेन सीरियस नैरेटिव का अंग, जबकि उनके समान या अधिक उम्र के नायक अभी भी 20–25 वर्ष की नई नायिकाओं के साथ लव स्टोरी में दिखाए जा रहे हैं। यह अंतर बताता है कि नायकों की उम्र को एसेट और नायिकाओं की उम्र को लायबिलिटी माना जा रहा है।
बीते कुछ वर्षों में पिकू, इंग्लिश विंग्लिश, नीरजा, क्वीन, थप्पड़, दंगल और ओटीटी प्लेटफॉर्म की कई सीरीज़ ने उम्रदराज़ या शादीशुदा नायिकाओं को कहानी के केंद्र में रखकर यह साबित किया कि दर्शक मजबूत लेखन और सच्चे पात्रों को स्वीकार करते हैं। साथ ही, करीना या अन्य अभिनेत्रियों के संभावित प्रोजेक्ट्स में उम्र से छोटे पुरुष सितारों के साथ उनकी जोड़ी की चर्चा, भले ही बोल्ड टैग के साथ हो। लेकिन, यह संकेत भी है कि मुख्यधारा धीरे-धीरे इस असमानता पर बहस के लिए मजबूर हुई है। कुछ स्टार इंटरव्यू और डिबेट शो में खुद अभिनेताओं से यह प्रश्न पूछा जाने लगा है कि वे क्यों अपने से आधी उम्र की नायिकाओं के साथ काम करना सिनेमैटिक मैजिक मानते हैं, जबकि वही विकल्प अभिनेत्रियों को नहीं मिलता।
यह चर्चा अगर आगे बढ़ती है और दर्शक भी उम्र और जेंडर के प्रति अधिक संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाते हैं, तो कास्टिंग के स्तर पर धीरे-धीरे संतुलन बन सकता है। जहां हीरो और हीरोइन दोनों की उम्र, अनुभव और व्यक्तित्व, कहानी की ज़रूरत से तय हों, न कि केवल पितृसत्तात्मक बाजार के गणित से। सिनेमा समाज का दर्पण भी है और ढालने वाला माध्यम भी। जब परदे पर बार-बार यह संदेश जाता है कि 60 साल का पुरुष 20 साल की लड़की का स्वाभाविक प्रेमी है। लेकिन, 40-45 की स्त्री के लिए प्रेम, इच्छा और रोमांस अनुचित या बोल्ड हैं, तो यह समाज के जेंडर फ्रेम को और विकृत करता है। जरूरत इस बात की है कि निर्माता, निर्देशक और दर्शक मिलकर इस भेदभाव को पहचानें और स्वीकारें कि स्त्रियों की उम्र भी पुरुषों की तरह अनुभव, आकर्षण और व्यक्तित्व की परिपक्वता का प्रतीक हो सकती है, न कि उनके सिनेमाई अस्तित्व के अंत का संकेत। लेकिन, ये फार्मूला हिंदी फिल्मों के कथानक में शायद फिट नहीं बैठता। यही वजह है कि शादीशुदा अभिनेत्रियां फिल्म की मूल भूमिका से नकार दी जाती है।
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