सिनेमा कारोबार के बारे में आम धारणा रही है कि बड़े सितारे, भारी बजट और जोरदार प्रचार किसी फिल्म की सफलता की बड़ी गारंटी नहीं होते। हिंदी फिल्मों के इतिहास ने बार-बार इस धारणा को सही साबित किया। कभी किसी अनजान कलाकार की छोटी फिल्म दर्शकों के बीच अपनी जगह बना लेती है तो कभी बिना बड़े प्रचार के बनी धार्मिक फिल्म लंबे समय तक सिनेमाघरों में टिकी रहती है। अब ‘हनुमान अंश’ की सफलता इसी परंपरा की नई कड़ी बनकर सामने आई। 2 करोड़ से भी कम लागत से बनी नीम करोली बाबा के जीवन और उनकी आध्यात्मिक यात्रा से प्रेरित इस फिल्म ने बड़ी फिल्मों के बीच अपनी जगह बनाई। कमजोर शुरुआती प्रदर्शन के बाद फिल्म की कमाई जिस तरह बढ़ी, उसने 50 साल पहले प्रदर्शित हुई ‘जय संतोषी मां’ की याद ताजा कर दी, जिसने 'शोले' जैसी फिल्म के सामने अपनी जगह बनाई थी।
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- हेमंत पाल
इन दिनों ‘हनुमान अंश’ फिल्म खासी चर्चा में है। यह फिल्म नीम करौली बाबा की आध्यात्मिक यात्रा पर केंद्रित है। इस फिल्म ने अपने सामने बड़े सितारों से सजी फिल्मों के कारोबार पर खासा असर डाला। जबकि, इस फिल्म का कोई प्रचार नहीं हुआ और न निर्माण पर बड़ा खर्च किया गया। फिल्म ऐसे बालक की यात्रा दिखाती है, जो मां को खोने के बाद ईश्वर की तलाश में निकलता है और धीरे-धीरे सेवा, त्याग और भक्ति के रास्ते पर आगे बढ़ता हुआ नीम करोली बाबा के रूप में सामने आता है। फिल्म का जोर चमत्कारों से ज्यादा आस्था, करुणा और मानव सेवा पर है। यही शायद इसकी सबसे बड़ी विशेषता भी बन गई। दिलचस्प बात यह कि फिल्म की शुरुआत ऐसी नहीं थी, जिससे उसके लंबे समय तक चलने का अनुमान लगाया जाए। पहले सप्ताह में कारोबार कमजोर रहा, दूसरे सप्ताह में तो इसके सिनेमाघरों से उतरने की चर्चा शुरू हो गई थी। कारोबार करीब 40 लाख रुपए तक सिमट गया था। लेकिन, इसके बाद दर्शकों की प्रतिक्रिया ने पूरी तस्वीर बदल दी। तीसरे सप्ताह से दर्शकों की संख्या बढ़ने लगी और चौथे सप्ताह तक कई जगहों पर इसके शो भरने लगे। यही वह दौर था, जब फिल्म ने बड़े बजट वाली फिल्मों के बीच अपनी मजबूत जगह बनानी शुरू की। फिल्म की कमजोर शुरुआत के बाद तेजी से उभरने और सकारात्मक दर्शक प्रतिक्रिया को इसकी सफलता की बड़ी वजह बताया गया।
करीब 2 करोड़ रुपए में बनी फिल्म का 50 करोड़ से ज्यादा के कारोबार तक पहुंचना इसलिए भी उल्लेखनीय है, क्योंकि इसके प्रदर्शन के समय बड़ी स्टारकास्ट और भारी बजट वाली फिल्में थीं। ‘टॉक्सिक’ में यश जैसे बड़े सितारे हैं, जबकि ‘आवारापन 2’ और ‘बंटवारा 1947’ भी दर्शकों के बीच चर्चा में थीं। ऐसे माहौल में ‘हनुमान अंश’ को अतिरिक्त स्क्रीन मिलना बताता है, कि सिनेमाघर वाले भी दर्शकों की मांग को नजरअंदाज नहीं कर सकते। ताजा रिपोर्ट के अनुसार फिल्म 50 करोड़ के कारोबार का आंकड़ा पार कर चुकी है। फिल्म की खासियत उसका सीमित प्रचार है। न तो इसके पीछे किसी बड़े सितारे का नाम था और न इसे करोड़ों रुपए के प्रचार अभियान का सहारा मिला। मुख्य भूमिका निभाने वाले शॉबिनव सत्य भी दर्शकों के लिए नया चेहरा हैं। खास बात यह कि वे फिल्म के निर्माण के दौरान सहायक निर्देशक के रूप में काम कर रहे थे, लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनी कि उन्हें ही मुख्य भूमिका निभाना पड़ी। निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने उनका लंबा स्क्रीन टेस्ट लिया और उन्हें भूमिका के लिए चुना। आज यही नया चेहरा फिल्म की सफलता की पहचान बन गया।
ऐसी ही कहानी 50 साल पहले कुछ अलग रूप में सामने आई थी। 15 अगस्त 1975 को हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल ‘शोले’ प्रदर्शित हुई थी। अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, जया भादुड़ी और अमजद खान जैसे सितारों से सजी, रमेश सिप्पी के निर्देशन में बनी इस फिल्म को लेकर पहले से ही जबरदस्त उत्सुकता थी। उसी दिन एक बेहद कम बजट की धार्मिक फिल्म ‘जय संतोषी मां’ भी सिनेमाघरों में पहुंची। फिल्म में कोई बड़ा सितारा नहीं था, लेकिन दर्शकों ने उसे ऐसा अपनाया कि वह अपने समय की सबसे बड़ी सफल धार्मिक फिल्मों में शामिल हो गई। खास बात यह भी कि धार्मिक ग्रंथों में भी संतोषी माता का उल्लेख अन्य देवी-देवताओं के मुकाबले कम ही मिलता है। ‘जय संतोषी मां’ की सफलता का स्वरूप केवल टिकट खिड़की तक सीमित नहीं रहा। कई जगह दर्शक फिल्म देखने से पहले दर्शक चप्पल उतारते और परदे की आरती करते थे। इसके गीत भी घर-घर पहुंचे। ‘जय संतोषी मां’ और ‘मैं तो आरती उतारूं रे संतोषी माता की’ जैसे भजन आज भी उस दौर की याद दिलाते हैं। इस फिल्म का कारोबार करीब 5 करोड़ रुपए तक पहुंचा था, जो उस समय के लिहाज से असाधारण सफलता थी।
1975 में न तो सामाजिक माध्यम थे, न इंटरनेट, न ऑनलाइन टिकट बुकिंग और न फिल्म का प्रचार कुछ ही घंटों में देशभर में पहुंचाने वाली व्यवस्था। ‘जय संतोषी मां’ को दर्शकों तक पहुंचाने का माध्यम मुख्य रूप से लोगों की बातचीत, गीत, धार्मिक वातावरण और सिनेमाघरों में बनी चर्चा थी। दूसरी ओर ‘हनुमान अंश’ ऐसे समय में आई है, जब एक दर्शक का अनुभव कुछ ही मिनटों में हजारों लोगों तक पहुंच सकता है। इसके बावजूद दोनों फिल्मों की सफलता में एक समान सूत्र दिखाई देता है। दर्शकों ने पहले उन्हें स्वीकार किया और उसके बाद कारोबार बढ़ता चला गया। यही ‘वर्ड ऑफ माउथ’ यानी दर्शकों की जुबानी चर्चा की ताकत है। कोई फिल्म पहले दिन शानदार कारोबार कर सकती है, लेकिन अगर दर्शक उसे पसंद नहीं करते तो अगले कुछ दिनों में उसकी रफ्तार टूट सकती है। इसके उलट कमजोर शुरुआत वाली फिल्म अगर दर्शकों को पसंद आ जाए तो वह कई सप्ताह तक आगे बढ़ सकती है। ‘हनुमान अंश’ इसका ताजा उदाहरण है। फिल्म के निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने भी शुरुआती प्रदर्शन के आधार पर फिल्म को असफल मानने को जल्दबाजी बताया।
यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि धार्मिक विषय अपने आप किसी फिल्म को सफल बना देता है। हिंदी सिनेमा में धार्मिक और पौराणिक विषयों पर बनी कई फिल्में दर्शकों की कसौटी पर खरी नहीं उतरीं। इसका सबसे ताजा उदाहरण ‘आदिपुरुष’ है। प्रभास, कृति सैनन और सैफ अली खान अभिनीत इस फिल्म पर भारी रकम खर्च की गई थी। शुरुआती दौर में शानदार कारोबार के बावजूद दर्शकों की नकारात्मक प्रतिक्रिया ने इसकी कमाई की रफ्तार रोक दी। संवाद, प्रस्तुति और दृश्य प्रभावों को लेकर भारी आलोचना हुई और फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर बड़ी असफल फिल्म माना गया। इससे साफ है कि धार्मिक फिल्म के लिए केवल धार्मिक विषय पर्याप्त नहीं है। दर्शक यह भी देखते हैं कि कहानी किस तरह कही गई है, पात्र कितने विश्वसनीय हैं और फिल्म उनकी भावनाओं से कितना जुड़ पाती है। ‘हनुमान अंश’ की सफलता इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाती है। फिल्म ने आस्था को बड़े दृश्य प्रभावों या भारी-भरकम प्रस्तुति के बजाय एक व्यक्ति की जीवन यात्रा और सेवा भावना से जोड़ने की कोशिश की है।
सिनेमा का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है। संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, हर हर महादेव, संपूर्ण रामायण, जय संतोषी मां, गंगा जमुना सरस्वती जैसे अलग-अलग दौर की धार्मिक और आध्यात्मिक फिल्मों ने अपनी-अपनी तरह से दर्शकों पर प्रभाव छोड़ा। बाद के दौर में जय हनुमान, बाल गणेश और 'रामायण' तथा 'कृष्ण' से जुड़े टेलीविजन धारावाहिकों ने भी धार्मिक कथाओं के लिए दर्शकों की स्थायी रुचि को सामने रखा। दक्षिण भारतीय सिनेमा की ‘कांतारा’ जैसी फिल्म ने भी लोक आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक विश्वास को आधुनिक कहानी के साथ जोड़कर व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुंचाया। दरअसल, धार्मिक फिल्मों की सफलता का इतिहास केवल भगवान की कहानियों का इतिहास नहीं है। यह भारतीय समाज की सामूहिक आस्था, लोक परंपराओं और भावनात्मक स्मृतियों का भी इतिहास है। ‘जय संतोषी मां’ ने 1975 में यह दिखाया था कि दर्शक बिना बड़े सितारों के भी किसी फिल्म को सिर-आंखों पर बैठा सकते हैं। 2026 की ‘हनुमान अंश’ ने लगभग आधी सदी बाद उसी बात को नए दौर की भाषा में दोहरा दिया।
अंतर सिर्फ इतना आया कि तब फिल्म की सफलता के लिए दर्शकों की लंबी कतारें और आपसी चर्चा माध्यम थीं, आज उसी चर्चा को सामाजिक माध्यम और ऑनलाइन टिकट बुकिंग भी गति देते हैं। लेकिन, दर्शक का मूल निर्णय आज भी वही है कि फिल्म उसे भीतर से छूती है या नहीं। इसीलिए ‘हनुमान अंश’ की कहानी केवल 2 करोड़ रुपए की फिल्म के 50 करोड़ रुपए कमाने की कहानी नहीं है। यह उस पुराने फिल्मी सिद्धांत की वापसी है जिसमें प्रचार से ज्यादा दर्शक की पसंद मायने रखती है। ‘जय संतोषी मां’ और ‘हनुमान अंश’ के बीच 50 साल का फासला जरूर है, लेकिन दोनों की सफलता में एक समान धड़कन सुनाई देती है। पहले दर्शक ने फिल्म को खोजा, फिर फिल्म दर्शकों की जुबान पर चढ़ी और आखिरकार सिनेमाघरों तक भीड़ पहुंच गई। यही वह ताकत है, जो कभी-कभी बड़े सितारों और करोड़ों के बजट पर भी भारी पड़ जाती है।
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