हरीश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट का इच्छा मृत्यु का फैसला भारतीय न्याय व्यवस्था का एक संवेदनशील पहलू है। क्योंकि, जब जीवन केवल पीड़ा और दूसरे पर निर्भरता का रूप ले ले, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या व्यक्ति को जीवन के अलावा गरिमा के साथ मृत्यु चुनने का भी अधिकार होना चाहिए! सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला इसी संवैधानिक भावना को समझने और उसे लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।
000
● हेमंत पाल
भारत में जीवन को सबसे बड़ा मूल्य माना गया है। भारतीय संस्कृति, धर्म और कानून सभी जीवन की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। लेकिन, जब यही जीवन असहनीय पीड़ा, असहायता और निरर्थकता का पर्याय बन जाए, तब समाज और कानून के सामने एक कठिन प्रश्न खड़ा हो जाता है कि क्या किसी व्यक्ति को ऐसी स्थिति में गरिमापूर्ण ढंग से मृत्यु चुनने का अधिकार होना चाहिए! हाल ही में सुप्रीम कोर्ट का हरीश राणा को इच्छा मृत्यु की अनुमति देना, इसी जटिल और संवेदनशील सवाल के केंद्र में खड़ा एक ऐतिहासिक निर्णय है। तेरह सालों से बिस्तर पर निस्तेज पड़े हरीश राणा को जीवन से मुक्ति देने का आदेश केवल एक कानूनी फैसला नहीं, बल्कि यह मानवीय संवेदना, नैतिकता और न्याय के बीच संतुलन खोजने का प्रयास भी है। हरीश राणा का मामला उन हजारों लोगों की पीड़ा का प्रतिनिधित्व करता है, जो गंभीर बीमारी या दुर्घटना के बाद सालों तक ऐसे जीवन के लिए विवश होते हैं, जिसमें न तो कोई सक्रिय चेतना होती है और न जीवन की सामान्य गतिविधियों में भाग लेने की क्षमता। ऐसे लोग केवल मशीनों, दवाओं और दूसरों की देखभाल के सहारे जीवित रहते हैं। चिकित्सा विज्ञान भले ही जीवन को लंबा करने में सक्षम हो गया हो, लेकिन वह हमेशा जीवन की गुणवत्ता को सुनिश्चित नहीं कर पाता। यही वह स्थिति है जहां जीवन के अधिकार और गरिमा के साथ जीवन के अधिकार के बीच अंतर स्पष्ट हो जाता है।
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। समय के साथ न्यायपालिका ने इस अधिकार की व्याख्या व्यापक रूप से की है और इसमें गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार भी शामिल किया है। जब जीवन केवल पीड़ा और निर्भरता का रूप ले ले, तब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या व्यक्ति को गरिमा के साथ मृत्यु चुनने का भी अधिकार होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इसी संवैधानिक भावना को समझने और लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। इच्छा मृत्यु का विषय हमेशा से नैतिक, धार्मिक और सामाजिक बहस का केंद्र रहा है। कई लोग इसे जीवन के प्रति अनादर मानते हुए तर्क देते हैं कि मनुष्य को जीवन देने और लेने का अधिकार केवल प्रकृति या ईश्वर के पास है। दूसरी ओर, एक विचारधारा यह भी कहती है कि यदि कोई व्यक्ति असहनीय पीड़ा में है और उसके ठीक होने की कोई संभावना नहीं है, तो उसे अनावश्यक कष्ट झेलने के लिए मजबूर करना भी अमानवीय है। इन दोनों दृष्टिकोणों के बीच संतुलन बनाना आसान नहीं है।
हरीश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी संतुलन को ध्यान में रखते हुए निर्णय दिया। यह फैसला केवल कानूनी तर्कों पर आधारित नहीं था, बल्कि इसमें मानवीय संवेदना की गहरी समझ भी दिखाई देती है। तेरह साल तक एक व्यक्ति का बिस्तर पर निश्चेष्ट पड़े रहना केवल उसकी व्यक्तिगत त्रासदी नहीं होती, बल्कि यह उसके परिवार, देखभाल करने वालों और पूरे सामाजिक तंत्र के लिए भी एक गहरी पीड़ा का कारण बन जाती है। ऐसे में अदालत ने यह माना कि केवल जैविक रूप से जीवित रहना ही जीवन का अंतिम उद्देश्य नहीं हो सकता। यह निर्णय भारतीय न्याय व्यवस्था के मानवीय पक्ष को भी सामने लाता है। अदालत ने यह स्पष्ट किया कि इच्छा मृत्यु को सामान्य विकल्प के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि यह केवल अत्यंत असाधारण परिस्थितियों में ही संभव है। इसके लिए कठोर चिकित्सकीय परीक्षण, विशेषज्ञों की राय और न्यायिक निगरानी जैसी कई प्रक्रियाएं आवश्यक होती हैं। इस प्रकार यह सुनिश्चित किया जाता है कि इस अधिकार का दुरुपयोग न हो और किसी व्यक्ति को जबरन मृत्यु की ओर न धकेला जाए।
इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह समाज को जीवन की गुणवत्ता के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करता है। आधुनिक चिकित्सा ने जीवन को लंबा करने की क्षमता तो विकसित कर ली है। लेकिन, कई बार यह लंबा जीवन केवल पीड़ा और निर्भरता से भरा होता है। ऐसे में यह आवश्यक है कि चिकित्सा प्रणाली केवल जीवन बचाने पर ही नहीं, बल्कि रोगियों की गरिमा और मानसिक स्थिति पर भी ध्यान दे। इसके साथ ही यह निर्णय समाज में करुणा और संवेदना की भावना को भी मजबूत करता है। किसी व्यक्ति की पीड़ा को समझना और उसके प्रति सहानुभूति रखना मानवीय सभ्यता की सबसे बड़ी पहचान है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम इसी मानवीय मूल्य को स्वीकार करता है कि जीवन केवल सांसों का नाम नहीं है, बल्कि उसमें आत्मसम्मान, स्वतंत्रता और गरिमा का होना भी उतना ही आवश्यक है।
हालांकि, यह निर्णय कई नई बहसों को भी जन्म देगा। कुछ लोग इसे मानवाधिकारों की दिशा में प्रगतिशील कदम मानेंगे, तो कुछ इसे नैतिकता और सामाजिक मूल्यों के लिए चुनौती के रूप में देखेंगे। लेकिन यह भी सच है कि बदलते समय में समाज को कठिन प्रश्नों का सामना करना ही पड़ता है और उनके समाधान के लिए संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक होता है। इच्छा मृत्यु पर यह फैसला हमें यह सोचने के लिए भी प्रेरित करता है कि जीवन का वास्तविक अर्थ क्या है। क्या केवल जीवित रहना ही जीवन है, या फिर गरिमा, स्वतंत्रता और सम्मान के साथ जीना ही जीवन का सच्चा स्वरूप है? जब कोई व्यक्ति इन सभी से वंचित हो जाए और केवल पीड़ा का प्रतीक बनकर रह जाए, तब समाज और कानून की जिम्मेदारी है कि वह उसके कष्ट को समझे और मानवीय समाधान खोजे।
अंततः हरीश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय केवल एक व्यक्ति की मुक्ति का फैसला नहीं है, बल्कि यह भारतीय न्याय व्यवस्था की संवेदनशीलता और परिपक्वता का प्रतीक भी है। यह निर्णय हमें याद दिलाता है कि कानून का उद्देश्य केवल नियमों का पालन कराना नहीं है, बल्कि मानवीय गरिमा और करुणा की रक्षा करना भी है। इसी अर्थ में यह फैसला न्याय, संवेदना और मानव गरिमा के बीच एक संतुलित सेतु की तरह है, जो हमें यह सिखाता है कि जीवन का सम्मान तभी पूर्ण होता है जब उसमें पीड़ा से मुक्ति और गरिमा के साथ विदाई की संभावना भी शामिल हो।
-------------------------------------------------------------------------------------------------------------


No comments:
Post a Comment