Tuesday, March 3, 2026

प्यार के इजहार का सबसे रंगीन बहाना

    रंगों का त्योहार और भारतीय सिनेमा का रिश्ता वैसा ही है, जैसे किसी कोरे कागज़ पर रंग बिखेर देना। हिंदी फिल्मों में होली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि भावनाओं के उफान, दबे हुए जज़्बात और सबसे बढ़कर 'इज़हार-ए-मोहब्बत' की स्वीकार्यता है। यह वह दिन है, जब समाज की बंदिशें रंगों की फुहार में बह जाती हैं। ऐसे में होली की आड़ में नायक-नायिका अपने दिल की बात कह देते हैं। परदे पर होली हमेशा से प्रेम के व्याकरण को समझाने वाला एक मधुर प्रसंग रही है, जहां गुलाल का एक टीका किसी प्रेम पत्र से भी ज्यादा असरदार साबित होता है।
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 हेमंत पाल

     म भारतीयों के लिए रंगों का त्योहार होली सिर्फ रंग उड़ाने तक सीमित नहीं है। यह वह सामाजिक अवसर है, जहां मर्यादाओं की कठोर लकीरें थोड़ी धुंधली हो जाती हैं और भावनाओं को अभिव्यक्ति के लिए खुला आकाश मिलता है। हिंदी सिनेमा ने इस सांस्कृतिक तत्व को बखूबी समझा और परदे पर इसे 'मोहब्बत की शुरुआत' के प्रसंग के रूप में स्थापित किया। अगर फिल्म इतिहास के पन्नों को पलटा जाए, तो पाएंगे कि जो बातें बंद कमरों या संकोची मुलाकातों में नहीं हो सकीं, उन्हें फागुन की मस्ती और अबीर की परतों ने मुमकिन कर दिया। यह केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक गहरा मनोवैज्ञानिक विश्लेषण है कि कैसे समाज का यह स्वीकार्य 'हुड़दंग' नायक और नायिका के बीच की झिझक को खत्म करने का जरिया बनता है। फिल्मों में ब्लैक एंड व्हाइट दौर से ही होली को एक ऐसे 'मूड' की तरह इस्तेमाल किया गया, जहां नायक अपनी नायिका के प्रति अनुराग व्यक्त करने के लिए रंगों की आड़ लेता है। ऐसा कई फिल्मों में हुआ है। सिनेमा के शुरुआती काल में होली का चित्रण आज के मुकाबले काफी शालीन और अर्थपूर्ण था। 1957 की क्लासिक फिल्म 'मदर इंडिया' का गाना 'होली आई रे कन्हाई' याद कीजिए। यहां होली केवल उत्सव नहीं, बल्कि एक जीवन में खुशियों के चंद लम्हों का प्रतीक थी। उस दौर में रोमांस सीधे न होकर प्रतीकों में होता था। 
     नायक का नायिका को सिर्फ दूर से रंग फेंकना या उसके पल्लू पर गुलाल के हाथ लगा देना भी गहरे प्यार का संकेत माना जाता था। वह ऐसा दौर था, जहां रंग मर्यादाओं की सीमा में रहकर भी भावनाओं को व्यक्त करते थे। इसका प्रसंग फिल्म 'कटी पतंग' में दिखाई देता है। इस होली दृश्य को हिंदी फिल्मों के सबसे भावनात्मक और अर्थपूर्ण दृश्यों में गिना जाता है। इस सीन में गीत 'आज न छोड़ेंगे बस हमजोली' के जरिए रंगों की आड़ में दबी भावनाएं सतह पर आ जाती हैं। नायक राजेश खन्ना और नायिका आशा पारेख के बीच लगाव उभरकर सामने आता है। लेकिन, नायिका अपने अतीत और झूठी पहचान के बोझ तले दबी है। होली का उल्लासपूर्ण वातावरण रंग, नृत्य और सामूहिक उत्सव नायिका के भीतर के द्वंद्व के विपरीत दिखता है। कैमरा क्लोज़-अप के जरिए उसके चेहरे की झिझक और असहजता को उभारता है, जिससे दर्शक उसके आंतरिक संघर्ष को महसूस कर पाते हैं। क्योंकि, यह दृश्य केवल रोमांस नहीं, बल्कि कथानक का मोड़ भी है। रंग यहां प्रेम के साथ-साथ सच के उजागर होने की आशंका का प्रतीक बनता है। इसलिए यह होली दृश्य मनोरंजन के साथ गहरी संवेदना भी रचता है। इसी तरह 'नदिया के पार' की होली बेहद सादगी भरी है। जबकि 'डर' में राहुल का जुनून रंग लगाने में दिखाई देता है। जिसमें उसकी सनक और प्यार दोनों उजागर होते हैं। होली ने हर बार कहानी को एक नया मोड़ दिया। जैसे-जैसे सिनेमा ने रंगों की दुनिया में कदम रखा, होली का रूप 'बोल्ड' और 'ब्यूटीफुल' होता चला गया। 70 और 80 का दशक वह मोड़ था, जहां होली 'इज़हार-ए-मोहब्बत' का सबसे बड़ा मंच बनी।
     राज कपूर की फिल्मों में तो होली का एक अलग ही दर्शन था। 'मदर इंडिया' और 'कोहिनूर' जैसी क्लासिक फिल्मों में होली के गीतों के माध्यम से प्रेम और सामाजिक सद्भाव का ताना-बाना बुना गया। उस दौर में जब प्रेम की अभिव्यक्ति बेहद निजी और संयमित होती थी, तब होली के बहाने नायक का नायिका को रंग लगाना साहस भरी और प्रेममयी घटना मानी जाती थी। यह वो समय था, जब स्पर्श की भाषा को रंगों के जरिए पवित्रता के साथ परदे पर उतारा गया। दिलीप कुमार और मीना कुमारी के किरदारों के बीच की वह तड़प होली के गीतों में अक्सर एक उल्लासपूर्ण स्वीकार्यता में बदल जाती थी। वक़्त के साथ जैसे-जैसे सिनेमा का परदा रंगीन हुआ, उसके साथ ही होली के रंगों के जरिए प्रेम की अभिव्यक्ति और भी मुखर होती गई। 70 और 80 के दशक तक आते फिल्मों में होली का त्योहार एक 'प्लाट डिवाइस' बन गई। फिल्म 'शोले' में होली का दृश्य केवल एक उत्सव नहीं था, बल्कि वह नायक और नायिका के बीच बढ़ते आकर्षण और साथ ही फिल्म के खलनायक खास अंदाज का भी संकेत था। 'होली के दिन दिल खिल जाते हैं' गीत केवल नाच-गाना नहीं था, बल्कि वह बसंती और वीरू के बीच के उस अनकहे रिश्ते पर मोहर लगाने वाला क्षण था। यहां होली को एक सामाजिक स्वीकृति की तरह देखा गया, वहां गांव की पंचायत और परिवार के बीच भी प्रेम को एक अलग अंदाज़ में स्वीकार कर लिया जाता है।
     फिल्मों में जब प्रेमी जोड़े के बीच संकोच की बर्फ पिघलानी होती है, कथानक में होली दृश्य रच दिया जाता है। फिर इसमें भांग का सेवन इस पूरे प्रसंग को एक 'कॉमिक रिलीफ' और 'ईमानदारी' का पुट देता है। भांग का नशा चढ़ते ही नायक का डर गायब हो जाता है और वह अपने दिल के राज खोल देता है। यह फिल्मों का वह पुराना और सफल फार्मूला है, जो आज भी प्रासंगिक है। चाहे वो 'बागबान' की मैच्योर होली हो या 'टू स्टेट्स' का मॉडर्न सेलिब्रेशन, रंगों की फुहार ने हमेशा प्रेम की नई इबारत लिखी है। दिलचस्प बात यह है कि फिल्मों में होली का इस्तेमाल अक्सर नायक द्वारा नायिका के करीब जाने के लिए एक 'सेफ पैसेज' के रूप में किया जाता है। 'बद्रीनाथ की दुल्हनिया' में बद्री का वैदेही के पीछे रंग लेकर भागना या 'गोलियों की रासलीला राम-लीला' में रंगों के बीच वह पहला स्पर्श, यह सब होली के उस 'लाइसेंस' का हिस्सा है, जहां छूना अभद्रता नहीं, बल्कि उत्सव का हिस्सा माना जाता है। संजय लीला भंसाली की फिल्मों में तो होली एक दृश्य कविता की तरह दिखाई देती है, वहां लाल रंग और गुलाल प्रेम की तीव्रता को दर्शाते हैं।
    हिंदी सिनेमा में होली और प्रेम के विश्लेषण में फिल्म 'सिलसिला' का जिक्र होना जरुरी है। यश चोपड़ा ने इस त्योहार को जिस गरिमा के साथ प्रेम की उलझनों से जोड़ा, वह अद्वितीय था। 'रंग बरसे भीगे' सिर्फ एक गीत नहीं, बल्कि वह उन दबे जज्बातों का सैलाब है, जो समाज के बंधनों को तोड़कर बाहर आने के लिए छटपटा रहे थे। इस फिल्म में होली फ्लर्ट करने की सामाजिक अनुमति के विचार को चरितार्थ करती है। भांग का नशा और रंगों की धुंधली दुनिया नायक को वह साहस देती है, कि वह दुनिया के सामने अपनी प्रेमिका के प्रति अपने झुकाव को व्यक्त कर सके। यहां होली केवल मिलन का त्योहार नहीं, बल्कि सत्य की स्वीकारोक्ति का मंच बन जाती है। 90 के दशक और उसके बाद के दौर में होली का स्वरूप और भी चंचल और आधुनिक हो गया। 'डर' जैसी फिल्मों में होली को एकतरफा जुनून और प्रेम के खतरे को दिखाने के लिए इस्तेमाल किया गया, जहां 'तू है मेरी किरण' का उद्घोष रंगों के पीछे छुपकर किया जाता है। वहीं, 'मोहब्बतें' में होली को परंपराओं की बेड़ियां तोड़ने के प्रतीक के रूप में पेश किया गया। शाहरुख खान का चरित्र जब गुरुकुल की कठोरता के खिलाफ जाकर रंगों का आह्वान करता है, तो वह युवाओं को अपने प्रेम को बिना किसी डर के स्वीकार करने का निमंत्रण देता है। ऐसे में यहां होली विद्रोह और अनुराग का अद्भुत संगम बन जाती है।
     आज के समकालीन सिनेमा में जैसे 'ये जवानी है दीवानी' या 'बद्रीनाथ की दुल्हनिया' के होली दृश्य नायक और नायिका की केमिस्ट्री को एक नया आयाम देते हैं। 'बलम पिचकारी' जैसे गीतों में नायिका के संकोच को पूरी तरह ख़त्म होते दिखाया गया, जहां वे आधुनिक परिवेश में अपने साथी के साथ बराबरी से मस्ती और प्रेम में सराबोर होती है। इन फिल्मों में होली वह केंद्र बिंदु है, जहां नायक और नायिका अपनी मर्यादा को छोड़कर एक-दूसरे के करीब आते हैं। यह प्रसंग दर्शकों को यह समझाता है कि प्रेम में डूबने के लिए किसी विशेष मुहूर्त की नहीं, बल्कि रंगों जैसे उल्लास की जरूरत होती है। होली का यह 'कैमरा एंगल' वास्तव में मानवीय मनोविज्ञान की उस परत को छूता है, जहां व्यक्ति रंग लग जाने के बाद अपनी पहचान और अपने अहंकार को भूलकर केवल एक प्रेमी रह जाता है।
    फिल्मों में होली का प्रसंग केवल दृश्य को सुंदर और रंगीला बनाने के लिए नहीं किया जाता, बल्कि यह भारतीय समाज की उस मानसिकता का प्रतिबिंब है, जहां त्योहारों के बहाने मर्यादा की सीमा को थोड़ा लचीला कर दिया जाता है। नायक और नायिका के लिए होली वह ढाल है, जिसके पीछे छुपकर वे अपने दिल की बात कह जाते हैं और दुनिया इसे बुरा भी नहीं मानती। ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों की सादगी से लेकर आज के दौर की चकाचौंध तक, होली हमेशा से फ़िल्मी मोहब्बत का सबसे विश्वसनीय और रंगीन गवाह रही है। भारतीय सिनेमा में होली महज एक कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि यह वह रंगमंच है जहां नायक अपनी नायिका को अपनी दुनिया में शामिल करने का न्योता देता है। यह प्यार का वह मौसम है, जो नफरत की धूल झाड़ देता है और रंजिशों को गुलाल से ढंक देता है। ब्लैक एंड व्हाइट दौर की वह शर्मीली होली अब आज के दौर की बिंदास और बेबाक होली में बदल चुकी है, लेकिन इसका मूल तत्व आज भी वही है अपने पसंदीदा इंसान के गालों पर रंग मलकर चुपके से कह देना 'तुम मेरे हो या मेरी हो।'
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