Sunday, February 26, 2023

'रामकथा' विवाद के बाद शोधपीठ के निदेशक की कुर्सी खतरे में!

- हेमंत पाल   

      ज्जैन में कुमार विश्वास की रामकथा के पहले दिन जो कुछ हुआ, वो जैसा भी था, लेकिन उसने नए विवाद को जन्म जरूर दे दिया। एक धार्मिक आयोजन के मंच से उन्होंने जो कहा वह कितना सही या गलत था, फिलहाल मुद्दा यह नहीं है! लेकिन, उसे लेकर नया राजनीतिक बवाल जरूर मच गया। सिर्फ बवाल ही नहीं मचा, उसे लेकर एक नई अंतर्कथा का भी जन्म हो गया। अब इस बवाल का खामियाजा किसे भुगतना पड़ेगा, सबकी नजरें वहां लगी है! लेकिन, सभी का मानना कि 'महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ' के निदेशक श्री राम तिवारी पर गाज गिर सकती है! क्योंकि, संघ और भाजपा में इस मामले को लेकर जितना रोष है, उसके प्रतिफल को समझा जा सकता है।   
      संस्कृति विभाग के महाराजा विक्रमादित्य शोध पीठ के बैनर तले हो रहे इस आयोजन पर सवालिया निशान उठने लगे हैं। उमा भारती, जय भान सिंह पवैया सहित भाजपा के कई नेताओं ने इस मामले को लेकर ट्वीट करते हुए कहा है कि कुमार विश्वास की टिप्पणी क्षमा योग्य नहीं है।  उमा भारती ने ट्वीट करके कुमार विश्वास को लपेट दिया। उमा भारती ने ट्वीट किया 'कुमार विश्वास तुमने तो माफी मांगते हुए भी सबको सामान्य बुद्धि का कह दिया, अब कुपढ़, अनपढ़ की बात तो पीछे छूट गई किंतु तुम्हारी बुद्धि विकृत है यह स्थापित हो गया। जबकि, संघ के नेता जयभान सिंह पवैया ने कुमार विश्वास के बारे में कहा कि 'आपकी टिप्पणी शोभनीय और क्षम्य नहीं हो सकती।' जबकि, संघ के कोटे से मंत्री बने उच्च शिक्षा मंत्री मोहन यादव की ख़ामोशी अखरने वाली है। क्योंकि, जब कुमार विश्वास संघ के बारे में बोल रहे थे वहां मोहन यादव भी मौजूद थे। पर, वे न तो उस समय कुछ बोले और और न बाद में उन्होंने कुछ कहा! समूचे मामले में उनकी चुप्पी कई शंकाओं को जन्म दे रही है। 
     कुमार विश्वास के विवादास्पद बयान और उसके बाद जारी अहंकार भरे माफीनामे के अलावा भी इस मामले में बहुत कुछ भी हुआ। महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ के निदेशक श्री राम तिवारी का एक कथित फर्जी पत्र बकायदा महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ के लेटर पैड पर जारी हुआ। जिसमें कुमार विश्वास को संबोधित करते हुए लिखा था 'आपसे विक्रम उत्सव 2023 में श्री राम (अपने अपने राम, राम के शंकर और शंकर के राम) के लिए अनुरोध किया गया था। लेकिन, एक भक्तिमय रामकथा में आपके द्वारा 21 फरवरी को आयोजित 'अपने-अपने राम' कार्यक्रम में अवांछित, अमर्यादित और दुर्भाग्यपूर्ण टिप्पणियां की गई है। जिसको लेकर समाज में अत्यंत रोष है। अतः शेष राम कथा (राम के शंकर और शंकर के राम) 22 और 23 फरवरी को निरस्त करने का निर्णय लिया गया है। खेद है कि एक सांस्कृतिक और धार्मिक श्री राम कथा कार्यक्रम में अमर्यादित टिप्पणियां आपके द्वारा की गई है।' 

        इसके बाद एक और पत्र महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ के ही लेटर पैड पर जारी हुआ। इसमें कहा गया 'विक्रम उत्सव 2023 के अंतर्गत 21 से 23 फरवरी तक कुमार विश्वास की चलने वाली राम कथा (अपने-अपने राम, शंकर के राम और राम के शंकर) कार्यक्रम बदस्तूर जारी है। सोशल मीडिया पर निदेशक महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ के नाम से जारी पत्र नकली है, जो विघ्नसंतोषियों द्वारा जारी किया गया है, इसकी कोई सत्यता नहीं है!'
      इन दोनों पत्रों में एक ध्यान देने वाली बात ये है कि दोनों ही पत्रों के क्रमांक (मविशो / 389 और मविशो A389) हैं। यदि पहले वाले पत्र को नकली मान भी लिया जाए, तो भी आवक-जावक में उसका पत्र क्रमांक सही कैसे है! बाद वाले पत्र को भी उसी क्रमांक (A जोड़कर) से जारी किया जाना दर्शाता है, कि कुछ तो ऐसा हुआ, जो बाहर नहीं आया! दोनों ही पत्रों (नकली और असली) पर निदेशक श्रीराम तिवारी के दस्तखत में भी ज्यादा फर्क दिखाई नहीं देता। एक और गौर करने वाली बात ये है, कि जिस पत्र को श्रीराम तिवारी असली बता रहे हैं, उसमें भी उन्होंने लिखा कि 'जारी पत्र नकली है, जो विघ्नसंतोषियों द्वारा जारी किया गया!' तात्पर्य यह कि कुमार विश्वास ने जिन्हें विघ्नसंतोषी कहा, श्रीराम तिवारी ने अपने पत्र में उसकी पुष्टि लिखकर कर दी।               
     एक पत्र को नकली और दूसरे को असली बताया गया जा रहा है! कौन सा पत्र नकली है और कौन सा असली, इस बारे में उज्जैन के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में तरह तरह की चर्चा है। उज्जैन से मिली जानकारियां और चल रही चर्चा पर भरोसा किया जाय तो दोनों ही लेटर असली बताए जा रहे है। स्थानीय लोगों का मानना है कि पहला लेटर कुमार विश्वास की विवादास्पद टिप्पणी और संघ, भाजपा के विरोध के तत्काल बाद जारी किया गया था! क्योंकि, तब इस बात अंदाजा नहीं था कि कुमार विश्वास माफ़ी मांग लेंगे। जब उन्होंने माफीनामे का वीडियो जारी कर दिया तो दूसरा लेटर जारी करके पहले वाले को नकली बता दिया गया!     
     श्री राम तिवारी सरकारी नौकरी से रिटायर हो चुके हैं और अब वे 'महाराजा विक्रमादित्य शोधपीठ' के निदेशक पद पर काबिज है। ये शोधपीठ महाराजा विक्रमादित्य के नाम पर स्थापित की गई है। इसका मुख्यालय तो उज्जैन में है, पर इसका कार्यालय भोपाल में है। शायद इसलिए कि श्रीराम तिवारी के लिए ये ज्यादा सुविधाजनक है। उन्होंने संस्कृति विभाग में लंबे समय तक मुखिया के तौर पर काम किया है, इसलिए वे सारे विभागीय दांव-पेंचों से वाकिफ हैं, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता! उन सभी दांव-पेंचों को जानकर और समझकर ही श्री राम तिवारी इस शोधपीठ के निदेशक बने हैं। 
    अब मुद्दा ये है कि कथित राम कथा वाचक कुमार विश्वास की 'संघ' पर टिप्पणी के बाद भी क्या श्रीराम तिवारी  इस पद पर बने रहेंगे! क्योंकि, सरकार भाजपा की है और मामला 'संघ' पर सीधी टिप्पणी का है। फिर टिप्पणी के बाद अपने कुतर्कों से उसे सही साबित करके माफी मांगने का है। देखना यह है इस पूरे घटनाक्रम की गाज किस पर गिरती है! इसमें किसकी कितनी भूमिका है! विभाग की मंत्री उषा ठाकुर जो संघ के काफी निकट हैं और उन्हें रामभक्ति को लेकर जाना जाता है, वे इस मामले में क्या करती हैं!
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