Sunday, December 28, 2025

ब्लॉकबस्टर साल 2025 : चंद हिट, कई फ्लॉप और नए सितारों का जलवा

    कई सालों बाद 2025 को फिल्मों में बदलाव की वजह से याद किया जाएगा। इस साल तीन फिल्मों ने कमाल किया, खास बात यह कि तीनों ही फिल्मों का कंटेंट अलग है। 'छावा' हिस्टोरिकल बायोपिक फिल्म है, तो 'सैयारा' रोमांटिक फैमिली फिल्म रही। जबकि, 'धुरंधर' ने सारे अनुमानों को झुठलाते हुए कमाई का नया कीर्तिमान बनाया। इन तीनों ही फिल्मों ने नए सितारों को भी जन्म दिया। विक्की कौशल और अहान पांडे नए हीरो बने तो अक्षय खन्ना को बतौर विलेन अलग पहचान मिली। साल के दौरान 17 फ़िल्में सौ करोड़ के क्लब में शामिल हुई। 70% फिल्मों को सफलता नहीं मिली। दुःख की बात यह भी रही कि इस साल मनोज कुमार, असरानी, धर्मेंद्र, कामिनी कौशल और संध्या शांताराम जैसे कलाकार इस दुनिया से विदा हो गए। एक और गौर करने वाली बात यह कि इस साल को 'खान मुक्त' साल भी कह सकते हैं।   
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- हेमंत पाल

     हिंदी सिनेमा के लिए यह यादगार साल साबित हुआ। कई फ्लॉप फिल्मों के बीच तीन अलग-अलग जॉनर की फिल्मों ने दर्शकों के दिलों को जीत लिया। ये अपने आप में अलग तरह का अनुभव कहा जा सकता है। ऐतिहासिक ड्रामा फिल्म छावा, स्पाई थ्रिलर 'धुरंधर' और इमोशनल फैमिली फिल्म 'सैयारा' ने दर्शकों को थियेटरों तक खींचा। यही वजह है कि इस साल बॉक्स ऑफिस पर हिंदी फिल्मों ने 4000 करोड़ से ज्यादा का आंकड़ा पार किया। कुछ फिल्मों ने 500 से 600 करोड़ से ऊपर की कमाई कर रिकॉर्ड भी तोड़े। इस साल 100 करोड़ के क्लब में 17 से ज्यादा फिल्में शामिल हुईं, लेकिन, खास बात यह भी कि इस साल चुनिंदा हीरो-हीरोइन ही अपनी चमक बिखेर सके। दर्शकों पर जादू बिखेरने वाली फिल्मों ने भावनात्मक गहराई, एक्शन और सांस्कृतिक जुड़ाव से सफलता पाई। यह साल सफलताओं और असफलताओं का मिश्रण रहा। जबकि, कई बड़े सितारों की फिल्में उम्मीदों से पीछे रहीं। 100 से अधिक हिंदी फिल्में रिलीज हुईं, जिनमें से लगभग 10 से 15 ने हिट या सुपरहिट का दर्जा पाया, जबकि 70% से ज्यादा फ्लॉप साबित हुईं। 'छावा' ने विक्की कौशल की अगुवाई में 585.7 करोड़ कमाए, जो ऐतिहासिक बायोपिक का नया रिकॉर्ड बना।
    'धुरंधर' (रणवीर सिंह, अक्षय खन्ना) ने 650 करोड़ से ज्यादा की कमाई के साथ दूसरा स्थान हासिल किया। इस फिल्म का अक्षय खन्ना का नेगेटिव रोल दर्शकों के दिलों में उतर गया। 'सैयारा' (अहान पांडे, अनीत पड्डा) ने 329.73 करोड़ कमाकर रोमांटिक धमाका किया। 'महावतार नरसिम्हा' (188.24 करोड़ नेट) और 'रेड-2' (173.44 करोड़ नेट) ने भी मजबूती से प्रदर्शन किया। आमिर खान की 'सितारे जमीन पर' ने इमोशनल अपील से 166.19 करोड़ की कमाई की। ये फिल्में दर्शकों को जोड़ने वाली कहानियों पर बनीं, जहां ट्रेलर वायरल होने से ओपनिंग दिन 20-30 करोड़ तक पहुंची। कहा जा सकता है कि ये कंटेंट-ड्रिवेन फिल्में स्टार पावर पर भारी पड़ीं। 17 फिल्मों ने 100 करोड़ क्लब में जगह बनाई। लेकिन, जॉली एलएलबी-3 (113 करोड़) ने भी उम्मीद से अच्छा प्रदर्शन किया। इन फिल्मों को सिर्फ सफलता ही हाथ नहीं लगी, कई फ़िल्में घाटे का सौदा रही। खासकर स्टार-कास्ट वाली कई फिल्में उम्मीदों पर खरी नहीं उतरी। 'सिकंदर' (सलमान खान) ने 110.36 करोड़ नेट बनाए, लेकिन 200 करोड़ बजट के आगे फ्लॉप रही। 'हाउसफुल-5' (अक्षय कुमार) ने 183.38 करोड़ नेट कमाए, जो एवरेज साबित हुई। 'केसरी चैप्टर-2' और 'स्काई फोर्स' जैसी फिल्मों ने घाटा झेला, जहां 100-125 करोड़ नेट कमाई के बावजूद बजट रिकवर नहीं हुआ। 'इमरजेंसी' (कंगना रनौत) ने मात्र 18.4 करोड़ नेट कमाए, जो एक बड़ा झटका था। 'ठग लाइफ' जैसी साउथ डबिंग फिल्म भी फेल रही। कुल मिलाकर, 50 से अधिक हिंदी रिलीज में से आधी फ्लॉप या घाटे में रहीं, ये दर्शाता है कि बेहतर कंटेंट की कमी है। 
       जहां तक कलाकारों के जलवे की बात है तो विक्की कौशल सबसे सफल हीरो साबित हुए, 'छावा' की ब्लॉकबस्टर से वे करियर की ऊंचाई पर पहुंचे। अभी तक उन्हें सीरियसली नहीं लिया जाता था, पर 'छावा' से उन्होंने अपनी प्रतिभा का आकलन करवा दिया। लंबे अरसे बाद रणवीर सिंह ने 'धुरंधर' से कमबैक किया। लेकिन, सिनेमा घर से बाहर निकलने वाला दर्शक उन्हें याद नहीं करता। इस फिल्म में अक्षय खन्ना नेगेटिव रोल्स में जमकर चमके। इस फिल्म से उनकी विलेन की कालजयी इमेज बनी। आमिर खान ने 'सितारे जमीन पर' से फैमिली ऑडियंस का दिल तो जीता, पर उतना नहीं, जितनी उम्मीद की गई थी। जबकि, हीरोइनों में रश्मिका मंदाना (छावा) और अनीत पड्डा (सैयारा) ने मजबूत पकड़ बनाई। दिव्या दत्ता ने 'छावा' में सपोर्टिंग रोल से सराहना बटोरी। ये सभी इसलिए अपनी छाप छोड़ने में कामयाब रहे कि इन्हें कंटेंट-ड्रिवेन फिल्मों में काम करने मौका मिला।
तीन फिल्मों ने अपना जलवा दिखाया 
   ऐतिहासिक महाकाव्य का तूफान बनकर आई 'छावा' ने 2025 की शुरुआत धमाकेदार तरीके से की। विक्की कौशल अभिनीत यह फिल्म छत्रपति संभाजी महाराज की वीरगाथा पर आधारित थी, जिसमें अक्षय खन्ना ने औरंगजेब का शक्तिशाली किरदार निभाया। रिलीज के पहले ही सप्ताह में 121 करोड़ का ओपनिंग वीकेंड दर्ज कर, यह वर्ष की सबसे बड़ी हिंदी हिट बनी। फिल्म में 808 करोड़ का वर्ल्डवाइड कलेक्शन किया। रश्मिका मंदाना की येसूबाई भूमिका ने भावनात्मक गहराई दी, जबकि एआर रहमान का संगीत सुपरहिट रहा। फिल्म ने न केवल बॉक्स ऑफिस रिकॉर्ड बनाए, बल्कि ऐतिहासिक ड्रामा के प्रति दर्शकों की भूख भी उजागर की। इसके बाद 'सैयारा' से न्यूकमर्स का सनसनीखेज रोमांस पनपा। अहान पांडे और अनीत पड्डा की इस डेब्यू फिल्म ने सभी को चौंका दिया। मोहित सूरी निर्देशित यह रोमांटिक ड्रामा 21 करोड़ ओपनिंग से शुरू होकर 570 करोड़ वर्ल्डवाइड तक पहुंची। इस फिल्म ने 'सुल्तान' और '3 इडियट्स' जैसी क्लासिक फिल्मों को भी पीछे छोड़ दिया। पांच दिनों में 133 करोड़ नेट कमाकर 'सैयारा' बड़ी हिट बनी। आईएमडीबी पॉपुलैरिटी में अहान नंबर 1 और अनीत नंबर 2 पर रहे, जो सोशल मीडिया का कमाल था। फिल्म ने साबित किया कि सशक्त स्क्रिप्ट और केमिस्ट्री किसी भी स्टारडम से बहुत ऊपर है।
      इसके बाद साल के अंत में आई 'धुरंधर' ने दिसंबर में तो मानों तहलका ही मचा दिया। सिर्फ दो सप्ताह में देश में 483 करोड़ और वर्ल्डवाइड 739 करोड़ कमाकर इस फिल्म ने 'छावा' को भी पछाड़ दिया। 'छावा' के बाद इस फिल्म में भी अक्षय खन्ना ने विलेन की भूमिका निभाई और अपनी अभिनय क्षमता को नई ऊंचाई दी। थर्ड वीकेंड में 103 करोड़ ओपनिंग के साथ तीसरी सबसे बड़ी बॉलीवुड ओपनर बनी। फिल्म ने एक्शन और ड्रामा का परफेक्ट ब्लेंड पेश किया, जो दर्शकों को थियेटर में बांधे रखा। अभी तक अपनी फिल्मों में जिस कलाकार को लगभग भुला दिया जाता था, 'धुरंधर' के आने से दर्शकों को सिर्फ अक्षय खन्ना ही याद रहता है।    
रीजनल सिनेमा भी पीछे नहीं रहा 
    इस साल बॉलीवुड से लेकर साउथ तक, कई फिल्मों ने धमाकेदार प्रदर्शन किया। बड़े बजट, बड़े स्टार और हाई प्रमोशन के बावजूद बॉलीवुड दर्शकों और क्रिटिक्स को प्रभावित करने में पिछड़ता नजर आया। इस साल ने एक बार फिर साबित किया कि रीजनल सिनेमा तेजी से दर्शकों में अपनी जगह बनाकर आगे बढ़ रहा है और फिल्म में कंटेंट ही असली बादशाह है। रिलीज हुई गुजराती फिल्म फिल्म 'लालो कृष्ण सदा सहाते' एक रिक्शा ड्राइवर की कहानी है, जो एक फार्म हाउस में फंस जाता है और उसे भगवान कृष्ण के होने का अहसास होता है। इससे उसकी जिंदगी बदल जाती है। इस फिल्म को आईएमडीबी पर 8.7 की रेटिंग मिली। 1950 के मद्रास की कहानी दिखाने वाली फिल्म 'कांथा' एक सोशल ट्रांसफॉर्मेशन की कहानी दिखाती है। फिल्म में भारत की स्वतंत्रता के बाद हुए बदलावों पर फोकस किया गया। फिल्म में दुलकर सलमान लीड रोल में हैं। इसे 8.4 की रेटिंग मिली है।
      ऋषभ शेट्टी की फिल्म 'कांथारा चैप्टर 1' सिनेमाघरों में छाई रही। फिल्म की कहानी कदंब राजवंश काल के दौरान की है। इसे 8.3 रेटिंग मिली। दिनजीत अय्यथन के निर्देशन में बनी मलयालम की मिस्ट्री फिल्म 'ईको' को भी अच्छी रेटिंग मिली। फिल्म में संदीप प्रदीप, सिमी जी फी और शाहीर मोहम्मद लीड रोल में हैं। फिल्म को 8.3 की रेटिंग मिली हैं। एम शशिकुमार और सिमरन स्टार की कन्नड़ फिल्म 'टूरिस्ट फैमिली' की कहानी एक श्रीलंका के परिवार पर केंद्रित हैं, जो भारत में नई शुरुआत करने के लिए आता है। इसे 8.2 की रेटिंग मिली। इसी तरह की फिल्म 'बौ बुट्टू भूता' एक बच्चे बुट्टू और उसकी मां की कहानी, जो ओडिशा के एक गांव में रहते हैं। बिट्टू की चाहत है कि वो कहीं और जाकर बेहद जिंदगी जिएं। इसे 8.2 की रेटिंग मिली। 
'होमबाउंड' ने रीजनल में जगह बनाई  
    ईशान खट्टर, विशाल जेठवा और जाह्नवी कपूर स्टार नीरज घावन की फिल्म 'होमबाउंड' भी काफी चर्चित रही। नॉर्थ इंडिया के गांव से निकले दो दोस्ती पुलिस की नौकरी की तैयारी करते दिखाए गए हैं। दोनों के बीच तनाव पैदा होगा और कहानी गंभीर हो जाती है। फिल्म को 8.0 की रेटिंग मिली। ये अकेली हिंदी फिल्म है, जो आईडीबीआई रेटिंग की दस फिल्मों में शामिल हुई। आसिफ अली, अनसवारा राजन और मनोज के जायन स्टारर फिल्म 'रेखाचित्रम' को 7.9 की रेटिंग मिली है। कहानी मजेदार है और रहस्य से भरी हुई है। 'कोर्ट स्टेट वर्सेस ए नोबडी' फिल्म कहानी में एक भावुक बचाव वकील न्याय प्रणाली में पूर्वाग्रह और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ता है, जबकि वह एक किशोर मुवक्किल का प्रतिनिधित्व करता है जिसे गलत तरीके से एक गंभीर अपराध का दोषी मान लिया गया है। फिल्म को 7.9 की रेटिंग मिली। जबकि, 'बाइसन' को 7.8 की रेटिंग मिली है। फिल्म में एक नौजवान की कहानी दिखाई गई, जो अपने गांव में फैली हिंसा से लड़ने और एक प्रोफेशनल कबड्डी प्लेयर बनने के लिए लड़ता है। 
    2025 साल का सबसे बड़ा सबक यह है कि 'कंटेंट ही राजा' है। यह साल साबित करता है कि दर्शक स्टोरी और परफॉर्मेंस चाहते हैं। छावा, सैयारा, धुरंधर जैसी फिल्मों ने फ्लॉप फिल्मों के बीच बड़ा धमाका किया और बॉक्स ऑफिस को रिकॉर्ड ऊंचाई दी। इससे यह भी लगता है कि आने वाले समय में ऐतिहासिक और रोमांटिक कहानियों वाले जॉनर मजबूत रहेंगे। साल का दुखद पहलू यह रहा कि मनोज कुमार, धर्मेंद्र और असरानी हमेशा के लिए विदा हो गए। जबकि, कामिनी कौशल और संध्या शांताराम ने भी अपनी पारी पूरी कर ली। 
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Saturday, December 20, 2025

'धुरंधर' के धमाके से निकला अनोखा अक्षय

     'धुरंधर' ने परदे पर आते ही बॉक्स ऑफिस पर धूम मचा दी। रणवीर सिंह की अदाकारी के साथ अक्षय खन्ना का नकारात्मक किरदार दर्शकों के दिलों में बस गया। इस स्पाई थ्रिलर फिल्म ने विवादों के बावजूद अच्छी खासी कमाई की। अक्षय खन्ना के नए अवतार, उनके वायरल डांस और पाकिस्तान विरोध ने फिल्म को चर्चा में ला दिया। यह फिल्म रॉ एजेंट हमजा की पाकिस्तान के ल्यारी इलाके में घुसपैठ की कहानी है, जिसमें अक्षय खन्ना ने रहमान डकैत के रोल में जान फूंक दी। यह फिल्म रियल लाइफ गैंगस्टर रहमान डकैत पर आधारित है। अक्षय का यह किरदार भावनाओं की गहराई, क्रूरता और राजनीतिक महत्वाकांक्षा का मिश्रण है, जो रणवीर के हीरो को भी चुनौती देता है। लंबे समय बाद अक्षय खन्ना का यह रोल उनके करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ, वे सादगी से धमाकेदार एंट्री तक सब कुछ निभाते हैं। यह किरदार अक्षय खन्ना को टॉप विलेन की श्रेणी में ला खड़ा करता है। इसलिए फिल्म की ज्यादा लंबाई भी दर्शकों को बांधकर रखती है।  
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- हेमंत पाल

    फिल्म इतिहास में कुछ ऐसे पल आते हैं, जब किसी अभिनेता के हाथ अचानक कोई ऐसी भूमिका आती है, जो उसके पूरे करियर को नए सिरे से परिभाषित कर देती है। स्पाई-एक्शन थ्रिलर 'धुरंधर' में अक्षय खन्ना के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। आदित्य धर के निर्देशन में बनी यह फिल्म न केवल बॉक्स ऑफिस पर तूफान लाई, बल्कि इसने ऐसी मिसाल बनाई जो साबित करती है, कि सही वक़्त पर, सही किरदार, सही अभिनेता के हाथों में पहुंच जाए तो फिल्म का भाग्य बदल जाता है। रणवीर सिंह के फिल्म का हीरो होते हुए अक्षय खन्ना का रहमान डकैत का नकारात्मक किरदार पूरी फिल्म पर हावी है। यह ऐसी घटना है, जो बॉलीवुड के विलेन-केंद्रित अभिनय के एक नए युग की शुरुआत लगती है। फिल्म में अक्षय खन्ना की रहमान डकैत की भूमिका को कालजयी कहने का कारण यह है, कि यह ऐसा किरदार है जो समय की परतों को भेदकर दर्शकों के मन में जगह बनाता है। बॉलीवुड में अभी तक के यादगार विलेन के किरदारों को देखें तो सभी में एक विशेष गुण है कि वे मनोविज्ञान और आचरण से एक आभामंडल रचते हैं। अक्षय खन्ना का रहमान डकैत का किरदार भी इसी परंपरा को आगे बढ़ाता है। लेकिन, अपने समकालीन तरीके से। 
    यह किरदार केवल अपराधी नहीं, ऐसा चरित्र है जिसमें चमक है, आकर्षण है और अंधकार भी। जो हर पल सतह के करीब रहता है। अक्षय ने इन सभी परतों को इतनी निपुणता से निभाया कि दर्शक रहमान को समझ तो सकते हैं, लेकिन उसे माफ नहीं कर सकते। यह एक जटिल भूमिका थी और अक्षय ने उसे तन्मयता से निभाया। 'धुरंधर' की सफलता और अक्षय खन्ना की नकारात्मक भूमिका का सराहा जाना, यह सब मिलकर संदेश देते हैं कि सिनेमा केवल लीड रोल तक सीमित नहीं है। असल कलाकार किसी भी भूमिका से अपनी पहचान बना सकता है। 'धुरंधर' का यह धमाका दिखाता है, कि फिल्म इंडस्ट्री में सफलता केवल बड़े नामों से नहीं, बल्कि सही किरदार, सही निर्देशन और सही अभिनेता के संयोग से मिलती है। अक्षय खन्ना, जो दो दशकों तक एक प्रतिभाशाली लेकिन अपरिचित अभिनेता रहे, वे अब नकारात्मक किरदार के नए आइकन बन गए। उनकी यह अभिनय यात्रा न केवल व्यक्तिगत सफलता है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक संदेश भी देती है कि सफलता की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है। कोई अभिनेता कभी भी, किसी भी भूमिका में अपनी पहचान बना सकता है।
   अक्षय खन्ना 28 साल की मेहनत के बाद एक ऐसे मंच पर पहुंचे, जहां उन्हें न केवल पहचान मिली, बल्कि एक नए युग की नींव भी रखी गई। यही है विलेन केंद्रित अभिनय का नया युग। इस फिल्म में विलेन के किरदार को अक्षय खन्ना के पुनर्जन्म की तरह समझा जा सकता है। लेकिन, इसे समझने के लिए उनके लंबे लेकिन अदृश्य रहे करियर को समझना भी जरूरी है। फिल्म परिवार का सदस्य होते हुए भी उन्हें विनोद खन्ना के बेटे जैसा स्टारडम कभी नहीं मिला। 1997 में 'हिमालय पुत्र' से करियर की शुरुआत करने वाले अक्षय ने जेपी दत्ता की फिल्म 'बॉर्डर' में फौजी की भूमिका निभाई। फिल्म तो ब्लॉकबस्टर साबित हुई, पर बॉर्डर की सफलता उन्हें स्टारडम नहीं दे सकी। इसके बाद 40 से अधिक फिल्मों में काम करने के बाद भी वे हमेशा एक सलीकेदार, प्रतिभाशाली लेकिन अदृश्य अभिनेता बने रहे। सिनेमाघर से बाहर निकलने वाले दर्शकों को वे कभी याद नहीं रहे। हंगामा (2003) में उनका कॉमेडी रोल कालजयी माना जाता है, जहां उन्होंने 'जीतू वीडियोकॉन' की भूमिका में हास्य की ऐसी परिभाषा दी, जिसे दर्शक आज भी उन्हें इसी किरदार से पहचानते हैं। ताल, हलचल और 'दृश्यम-2' जैसी फिल्मों में भी उन्होंने शानदार अभिनय किया। लेकिन, कहीं न कहीं पॉजिटिव भूमिकाएं उन्हें स्थापित हीरो नहीं बना सकी। ढाई दशक से ज्यादा कड़ी मेहनत करने के बाद भी अक्षय खन्ना प्रतिभाशाली अभिनेता के रूप में जाने जाते रहे, सुपरस्टार कभी नहीं बने। अक्षय खन्ना के अभिनय को समझना एक तरह से आधुनिक नाटकीय अभिनय के सूक्ष्मताओं को समझना है। वे ऐसे अभिनेता हैं, जो बहुत कम बोलते हैं, लेकिन जब बोलते हैं तो हर शब्द में वजन होता है। उनकी आंखों की भाषा, उनके चेहरे की सूक्ष्म अभिव्यक्ति और बॉडी लैंग्वेज ये सब मिलकर एक पूरा किरदार रचते हैं।
     'धुरंधर' के रहमान डकैत के रोल में अक्षय इसे नई ऊंचाई पर ले गए। अक्षय का यह किरदार सिर्फ एक अभिनय नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक घटना बन गया। 'हंगामा' में उनका हल्का-फुल्का रूप और 'धुरंधर' में उनकी खतरनाक भूमिका अक्षय के अभिनय की विविधता को समझाती हैं। यह ऐसा बदलाव है, जो दर्शकों को विश्वास दिलाता है, कि सिनेमा केवल अभिनय नहीं, बल्कि परिवर्तन की अनोखी कला है। यह तथ्य सबसे अधिक दिलचस्प है, कि रणवीर सिंह जो फिल्म के हीरो हैं, अक्षय के किरदार से पूरी तरह ओवरशैडो हो गए। यह असामान्य घटना फिल्म इंडस्ट्री में कभी-कभार घटती है। लेकिन, 'धुरंधर' में यह स्पष्ट दिखाई दी। रणवीर एक प्रतिष्ठित अभिनेता हैं, लेकिन अक्षय की उपस्थिति इतनी प्रभावशाली है कि हर दृश्य में वे फिल्म को अपने नाम कर लेते हैं। यह एक अलग किस्म की ताकत है, न कि नायकत्व की, न हिंसा की, बल्कि अभिनय की शक्ति की। अक्षय खन्ना की यह वापसी एक नया मानदंड स्थापित करती है। अब यह साफ है कि यदि कोई निर्माता अपनी फिल्म के लिए खूबसूरत चेहरे वाला विलेन चाहता है, तो अक्षय खन्ना उसकी पहली पसंद होंगे।      
    अक्षय खन्ना के लिए 2025 का साल अभिनय जीवन का बदलाव वाला दौर रहा। इस साल आई दो फिल्मों के नकारात्मक किरदार ने सब कुछ बदल दिया। पहले आई फिल्म 'छावा' में अक्षय ने औरंगजेब का जो किरदार निभाया, उसे जबरदस्त सराहा गया। लेकिन, 'धुरंधर' में अक्षय खन्ना के रहमान डकैत के किरदार ऐसा चमत्कार किया, जिसने विलेन के नए मानदंड स्थापित कर दिए। पाकिस्तानी अंडरवर्ल्ड के इस खतरनाक डकैत को अक्षय ने इस तरह जीवंत किया, मानो वह अभिनय नहीं, सच्चाई को परदे पर उतार रहे हों। उनके किरदार रहमान का सबसे खास पहचान है शांति और ठंडक। फिल्म में यह किरदार ऐसा विलेन नहीं है, जो चीखता-चिल्लाता है, बल्कि एक ऐसा पात्र है, जो खामोशी में मौत बिखेरता है। उसकी आंखों में जो ख़ामोशी है, जो किसी भी संवाद को बेमानी कर देती है। अक्षय ने अपनी अदाकारी से दिखा दिया कि दमदार एक्टिंग के लिए चीखना-चिल्लाना जरूरी नहीं। उनकी खामोशी में भी इतना वजन था कि हर दृश्य खास हो गया। 
     'धुरंधर' की जिस बात ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया, वह है अक्षय का वह अनोखा सीन जिसमें वे 'फसला' नामक अरबी गाने पर डांस करते हैं। यह गाना बहरीनी डीजे सिंगर ईप फराजी ने 2022 में बनाया गया था। लेकिन, 'धुरंधर' में इसका उपयोग एक खास सीन में किया गया है। इसमें अक्षय की एंट्री इतनी शानदार है, कि वे दर्शकों के दिल पर छा गए। सोशल मीडिया पर इस सीन की तुलना 'एनिमल' के 'जमाल कुडू' गाने से की जाने लगी। क्योंकि, दोनों ही गानों में विलेन की एंट्री यादगार है। यह सीन सिर्फ एक डांस वाला दृश्य नहीं, इसमें अक्षय के किरदार की पूरी ऊर्जा है, जो उनको एक ही फ्रेम में सेलुलॉइड पर कैद कर देता है।
    फिल्म का यह गाना अक्षय खन्ना की एंट्री का हाइलाइट है, जो बलूच वॉर डांस से प्रेरित है। यह इम्प्रोवाइज्ड डांस एक टेक में शूट हुआ, जहां अक्षय खन्ना ने खुद ही नए स्टेप्स जोड़े। कोरियोग्राफर विजय गांगुली के मुताबिक, यह सीन लास्ट मिनट का था, लेकिन अक्षय खन्ना का जोश में आने से यह आइकॉनिक बन गया। सोशल मीडिया पर वायरल होने से गाना हिट हो गया, जिसने फिल्म की मार्केटिंग को भी आसमान पर पहुंचा दिया। यह डांस न सिर्फ दर्शकों को रोमांचित करता है, बल्कि बलूच कल्चर को भी हाईलाइट करता है। फिल्म में अक्षय की विलेन की भूमिका प्रभावशाली और सफल प्रयोग कहा जा सकता है। लेकिन, करियर में विलेन भूमिकाओं का उनका पहला रोल नहीं है। अक्षय ने अभी तक 6 फिल्मों में ऐसी भूमिकाएं निभाई और हर बार उन्होंने दर्शकों को प्रभावित किया। 2002 में आई फिल्म 'हमराज' में भी उन्होंने विलेन की भूमिका निभाई। इसी साल आई 'दीवानगी' में भी उन्होंने नकारात्मक किरदार में अच्छा प्रदर्शन किया। 2008 की 'रेस' में अभय देओल के साथ रोमांचक दृश्य बनाने वाले अक्षय का विलेन रोल भी कमाल का था। 2016 में 'ढिशूम' में भी उन्होंने इसी तरह का रोल किया। लेकिन, 2025 में 'छावा' और 'धुरंधर' ने एक नया दौर शुरू किया। 'छावा' में औरंगजेब की भूमिका करके पूरी इंडस्ट्री को दिखा दिया कि वे अपने अभिनय में पलट भी सकते हैं। लेकिन, 'धुरंधर' में अक्षय के रहमान डकैत ने तो इतिहास रच दिया। वो सिर्फ विलेन नहीं, ऐसा किरदार है, जो बॉबी देओल और संजय दत्त जैसे दिग्गज विलेन अभिनेताओं के लिए खतरा बन गया। 
     बॉक्स ऑफिस के नजरिए से भी 'धुरंधर' की सफलता की कहानी भी असाधारण है। फिल्म ने 5 दिसंबर को अपनी रिलीज के दिन ही 28 करोड़ की कमाई की, जो रणवीर सिंह के करियर की सबसे बड़ी ओपनिंग थी। पहले सोमवार को फिल्म ने 23.25 करोड़ की कमाई की, जो दर्शकों में फिल्म की मजबूत पकड़ दिखाता है। शुरू के पांच दिनों में इस फिल्म ने देशभर में 150 करोड़ रुपये का नेट कलेक्शन करके अपना बजट 280 करोड़ को पार करने की ओर तेजी से बढ़ गई। सातवें दिन तक यह आंकड़ा 200 करोड़ को पार कर चुका था और दसवें दिन फिल्म ने 351.75 करोड़ का घरेलू कलेक्शन हासिल कर लिया। जबकि दुनिया में इस फिल्म ने 530.75 करोड़ तक पहुंच बना ली। यह सफलता किसी बड़े सितारे की की नहीं, बल्कि दमदार कहानी, जांबाज अभिनय और दर्शकों की माउथ पब्लिसिटी पर आधारित है। लेकिन, फिल्म की सफलता की जो भी कहानी है, वो अक्षय खन्ना से शुरू होकर उन्हीं पर ख़त्म भी होती है।  
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हीरो से बड़े ये खलनायक, नफरत में पाया प्यार

    अक्षय खन्ना और बॉबी देओल दोनों ही अपने ज़माने के सफल हीरो के बेटे हैं। अपने पिता की तरह उन्होंने भी उसी हीरो की इमेज को अपनाया और शुरूआती दौर में सफल भी रहे। लेकिन, वे दर्शकों में अपने पिता की तरह छवि नहीं बना सके। एक दौर ऐसा भी आया, जब ये दोनों प्रतिभाशाली कलाकार करीब-करीब भुला दिए गए थे। लेकिन, फिर हालात बदले और इन दोनों कलाकारों ने अपनी छवि को उलटकर रख दिया। अक्षय और बॉबी दोनों ने हीरो का मुखौटा उतारकर खलनायक की भूमिका को स्वीकार लिया। इसका असर ये हुआ कि आज दोनों अपने किरदार में सफल हो गए। अक्षय ने 'छावा' और 'धुरंधर' में अपनी क्रूरता का जलवा दिखाया तो बॉबी देओल ने 'आश्रम' वेब सिरीज के बाद 'एनीमल' फिल्म में खलनायक को जिंदा कर दिया। दोनों ने अपनी इमेज तोड़कर जिस तरह निगेटिव किरदारों को नई गरिमा और आकर्षण दिया, वे सचमुच इस दौर के सबसे प्रभावी खलनायकों में गिने जा रहे हैं। दोनों ने साबित कर दिया कि आज का खलनायक सिर्फ हीरो का विरोधी नहीं, बल्कि कहानी का असली इंजन और दर्शकों की जिज्ञासा का केंद्र भी है।
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- हेमंत पाल

     हिंदी सिनेमा में आज खलनायक सिर्फ ब्लैक एंड व्हाइट की तरह नैतिक विभाजन नहीं, बल्कि एंटी-हीरो, ग्रे-ज़ोन और क्रिमिनल-सेंट्रिक नैरेटिव का प्रतीक बन चुका है। जिसे केजीएफ, पुष्पा, मिर्ज़ापुर, छावा और एनिमल जैसी फिल्मों और 'आश्रम' जैसी वेब सीरीज़ ने और मजबूत किया। ट्रेंड यह कि कहानी अक्सर हिंसक, कानून विरोधी या नैतिक रूप से संदिग्ध किरदार के नज़रिए से कही जा रही है। जबकि, बॉक्स ऑफिस के आंकड़े बताते हैं कि दर्शक इस अंधेरी जगह में रोमांच और रिलेटेबिलिटी दोनों खोज रहे हैं। इस परिदृश्य में अक्षय खन्ना और बॉबी देओल जैसे कलाकार ‘स्टार विलेन’ का नया मॉडल भी तैयार कर रहे, जहां निगेटिव रोल न केवल करियर रिवाइवल का साधन हैं, बल्कि अभिनय कौशल आज़माने की प्रयोगशाला भी। उनकी सफलता यह संकेत देती है कि आने वाले सालों में खलनायक की परतदार, मानवीय और कभी-कभी ग्लैमराइज्ड छवि ही मुख्यधारा हिंदी सिनेमा की बड़ी धुरी रहने वाली है।
     फिल्मों में अक्षय खन्ना का सफर हमराज़, रेस से शुरू होकर आज ‘धुरंधर’ के रहमान डकैत और ‘छावा’ के औरंगजेब तक पहुंच चुका है, जहां वे पूरी तरह निगेटिव स्पेस को अपनी जगह बना चुके हैं। उनके भारी और नियंत्रित संवाद, धीमी लेकिन भय पैदा करने वाली बॉडी लैंग्वेज और आंखों में ठंडा हिसाब-किताब उन्हें 70-80 के विलेन से बिल्कुल अलग, आधुनिक मनोवैज्ञानिक खलनायक बनाता हैं। ‘धुरंधर’ में रहमान डकैत के रूप में उनकी मौजूदगी इतनी प्रभावी रही कि कई चर्चाओं में हीरो से ज्यादा बात उनके किरदार की हो रही है। उनकी हॉलीवुड के प्रतिष्ठित विलेन कैरेक्टरों से तुलना मिलने लगी। ‘छावा’ में औरंगजेब की भूमिका के साथ उन्होंने इतिहास आधारित निगेटिव किरदार में भी परतें जोड़ते हुए यह दिखाया कि आज का दर्शक खलनायक में भी वैचारिक और भावनात्मक जटिलता देखना चाहता है।
     बॉबी देओल का 'विलेन युग' वेब सीरीज ‘आश्रम’ के बाबा निराला से शुरू होकर फिल्म ‘एनिमल’ के मूक लेकिन हिंसक अबरार हक तक आता है। इस किरदार ने उन्हें फिर से मुख्यधारा चर्चा में ला खड़ा किया। 'आश्रम' में उन्होंने तथाकथित धर्मगुरु के रूप में जिस तरह सत्ता, शोषण और करिश्मे का मेल दिखाया, उसने यह साबित किया कि निगेटिव रोल, स्टार की खोई हुई चमक भी लौटा सकते हैं। ‘एनिमल’ में अबरार जैसे लगभग बिना संवाद वाले किरदार में सिर्फ शरीर, आँखों और हिंसा की कोरियोग्राफी के जरिए प्रभाव छोड़ना, आधुनिक एक्शन-सिनेमा के सौंदर्यशास्त्र के अनुरूप एक नया तरह का खलनायक गढ़ता है, जो स्टाइल और क्रूरता दोनों से याद रहता है।  इस कामयाबी के बाद उन्हें रेस-3, लव हॉस्टल और आगामी बड़े प्रोजेक्ट्स में लगातार कास्ट किया जाना दिखाता है कि इंडस्ट्री उन्हें नए दौर के विलेन के रूप में देख रही है।
     हिंदी सिनेमा के कथानक में ‘नायक’ हमेशा केंद्र में रहा है। फिल्म में नायक वह पात्र होता है, जो अच्छाई, त्याग और नैतिकता का प्रतीक बनकर दर्शकों का दिल जीतता है। परदे के पीछे भी यह सच हमेशा कायम रहा है कि नायक की रोशनी तभी चमकती है, जब उसके सामने एक खलनायक दमदार हो। यह खलनायक कभी डर पैदा करता है, कभी आकर्षण और कभी सामाजिक यथार्थ का चेहरा बन जाता है। हर दौर में कुछ ऐसे कलाकार हुए, जिन्होंने यह साबित किया कि अभिनय की असली गहराई ‘बुराई’ को विश्वसनीय और करिश्माई बनाने में है। उनके किरदारों ने यह दिखाया कि दर्शक नफ़रत करते हुए भी ऐसे पात्रों को भूल नहीं पाते। 1930 और 40 के दशक का हिंदी सिनेमा अच्छाई-बुराई की सीधी लड़ाइयों पर आधारित था। पर, इस दौर में कुछ अभिनेताओं ने खलनायकी का चेहरा बदलना शुरू किया। केएन सिंह ने खलनायक को बौद्धिक आभा दी। 
     जब ज्यादातर निगेटिव किरदार शारीरिक बल या हिंसक प्रवृत्ति पर आधारित थे, तब उन्होंने सोचने-वाले अपराधी की छवि रची। केएन सिंह ने क़ैदी, जीवन नैया और 'हवस' जैसी फिल्मों में संतुलित, ठंडा और परिष्कृत अंदाज़ दर्शाता। इससे पता चलता है कि अपराधी भी तर्क का खेल खेल सकता है। वे ऐसे खलनायक थे, जो कहानी को अपने बुद्धि-बल से संचालित करता था। क्लासिक इंटेलीजेंट विलेन की तरह। इसके बाद आया प्राण का दौर, जिन्होंने 1940 और 50 के दशक में खलनायक की परिभाषा ही बदल दी। परख, जहां आरा और 'बड़ी बहन' जैसी फिल्मों में उनका अभिनय डरावना और सम्मोहक दोनों था। वे बुरे अवश्य थे, पर करिश्माई ढंग से। उनके अंदाज़, आवाज और चाल-ढाल में एक खास चमक थी, जिसने खलनायकी को एक नई प्रतिष्ठा दी। प्राण जितना नफरत का पात्र बने, उतने ही दर्शकों के मन में गहराई से बस गए और यही सिनेमा का विरोधाभास है। अजीत ने इस धारा को और स्टाइलिश बनाया। 1950-60 के दशक में उनकी छवि एक ऐसे 'गैंगस्टर जेंटलमैन' की बन गई, जिसकी बोली और चाल से ही डर बैठ जाए। उनके संवाद और रौबदार उपस्थिति ने साबित किया कि खलनायक भी ‘क्लास’ रख सकता है। अजीत की खलनायकी में ग्लैमर था जिसने अपराध को भी नई शैली दी।
    हिंदी सिनेमा का 1970 का दशक समाज और सिनेमा, दोनों के लिए संक्रमण काल था। रोज़गार, भ्रष्टाचार और नैतिक द्वंद्व इन सबने समाज में एक बेचैनी पैदा की, जिसका प्रतिबिंब परदे पर भी दिखा। रंजीत इस दौर के उस चेहरे के रूप में उभरे जो भय और असहजता का प्रतीक बन गया। उनकी उपस्थिति ही दर्शकों में खौफ पैदा कर देती थी। शर्मीली, कसमें वादे, और 'अमर अकबर एंथनी' जैसी फिल्मों में उनका हिंसक, नैतिक सीमाओं को तोड़ता चरित्र 1970 के समाज की छिपी बेचैनी का प्रतीक बना। उनकी खलनायकी यथार्थ से उपजी थी खतरे की सच्ची गंध लिए हुए रहा।
     इसी दौर में 1975 में 'शोले' आई और गब्बर सिंह ने यह साबित किया कि खलनायक भी नायक बन सकता है। अमजद खान का गब्बर इतना प्रभावशाली था कि वह फिल्म की आत्मा ही बन गया। उस किरदार की खासियत थी उसके 'संवाद में आतंक' जो बंदूक से ज़्यादा असरदार था। इसके बाद चाहे अमजद ने कितनी भी सकारात्मक भूमिकाएं निभाई हों, दर्शकों के मन में उनकी पहचान अमर हो चुकी थी हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार खलनायक के रूप में। इसी परंपरा को अमरीश पुरी ने भी खासी ऊंचाई दी। 1975 में 'शोले' के गब्बर सिंह ने हिंदी सिनेमा के इतिहास को पलट कर रख दिया। अमजद खान का यह किरदार ऐसा दुर्लभ उदाहरण है जहाँ खलनायक ही फिल्म की आत्मा बन गया। दिलचस्प यह है कि अमजद ने कई सकारात्मक भूमिकाएं भी निभाईं। लावारिस, योगी और 'धर्म कांटा' जैसी फिल्मों में वे खलनायक नहीं बने, लेकिन दर्शक उन्हें हमेशा उस खलनायक के रूप में याद करते हैं जिसने डर को एक संवाद में बदल दिया। अमरीश पुरी 'मिस्टर इंडिया' के मोगैंबो से लेकर 'परदेस' या 'नायक' तक, उनके किरदार भारतीय और वैश्विक दोनों स्तरों पर ताकत और भय का प्रतीक बने। उनकी गूंजती आवाज़ और सख़्त उपस्थिति ने खलनायक को ऑरा दिया। इतना ही नहीं 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' में उन्होंने वही रौब एक बदले हुए भाव में दिखाया, जहां बुराई के पीछे मानवीय भावनाएं थीं। अमरीश पुरी शायद पहले भारतीय अभिनेता थे जिन्होंने यह दिखाया कि खलनायक भी नैतिक या भावनात्मक जटिलता वाला इंसान हो सकता है।
     1990 के दशक के बाद सिनेमा बदलने लगा। दर्शक अब एकदम अच्छे या एकदम बुरे पात्रों को नहीं, बल्कि ‘ग्रे’ शेड वाले चरित्रों को ज्यादा स्वीकार करने लगे। जीवन की जटिलता पर्दे तक पहुंच गई। अजय देवगन इस दौर के ऐसे नायक बने जिन्होंने खलनायकी और नायकत्व की सीमाओं को मिटा दिया। दीवानगी, खाकी, और 'हम दिल दे चुके सनम' में उनके भीतर का एंटी-हीरो समाज की जटिलता का प्रतीक बन गया  एक ऐसा इंसान जो सही और गलत के बीच झूलता है। इसके बाद आधुनिक सिनेमा के दो चेहरे इस धारा को आगे बढ़ाते हैं अक्षय खन्ना और बॉबी देओल। अक्षय खन्ना का अभिनय संवेदनशीलता और ठंडे करिश्मे का संगम है। रेस, इत्तेफाक और 'धुरंधर' जैसे किरदारों में उन्होंने दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर किया कि खलनायक हमेशा हिंसक नहीं होता कभी-कभी वह बौद्धिक रूप से खतरनाक होता है। वह सिनेमा के ‘मॉडर्न विलेन’ हैं स्टाइलिश, विचारवान और रहस्यमय। दूसरी ओर, बॉबी देओल ने ‘मौन के आतंक’ को साकार किया। 'आश्रम' में बाबा निराला और 'एनिमल' में उनका खामोश, अनकहा खलनायक दर्शकों के भीतर भय और आकर्षण दोनों पैदा करता है। इन किरदारों का विरोधाभास यह है कि वे बुरे हैं, पर मनुष्य भी हैं टूटी हुई आत्माएं, जो हिंसा में अपने अस्तित्व की तलाश करती हैं।
    हर युग का खलनायक उस समय के समाज का भावात्मक आईना होता है। 1950-60 में वह सत्ता और संपत्ति के भ्रष्ट प्रतीक थे। 1970–80 में वह व्यवस्था-विरोधी आम आदमी का गुस्सा बन गया। 2000 के बाद उसने मानवीय अंतर्विरोधों का चेहरा धारण कर लिया। अब दर्शक खलनायक से सिर्फ नफरत नहीं करता, बल्कि उसकी कहानी समझना चाहता है। यह बदलाव हमारी सामाजिक चेतना की परिपक्वता को भी दर्शाता है, जहां अच्छाई और बुराई के बीच की दीवारें धुंधली हो चुकी हैं। किसी अभिनेता के लिए सबसे कठिन काम है। बिना सहानुभूति कमाए प्रभाव पैदा करना। यही खलनायकी की कसौटी है। केएन सिंह की बौद्धिकता, प्राण की अदाओं का आतंक, अजीत की ठसक, अमजद ख़ान की संवाद अवधारणा, अमरीश पुरी का ग्लोबल रौब, अक्षय खन्ना की सधी हुई बुद्धिमत्ता और बॉबी देओल की भावनात्मक ठंडक ये सब मिलकर दिखाते हैं कि हिंदी सिनेमा की सबसे गहरी यादें खलनायकों की बदौलत ही बनी हैं। वैसे यह लिस्ट डैनी, रंजीत, प्रेम चोपड़ा और गुलशन ग्रोवर जैसे नामों के बिना अधूरी है। 
    बुराई में छुपी अभिनय की ऊंचाई का कोई अंत नहीं है। आज जब सिनेमा ‘यथार्थ’ की ओर लौट रहा है, तब भी दर्शक खलनायक की तलाश करता है। वह कहानी को गहराई देता है। उसने जो नैतिक प्रश्न उठाए, वो अंततः हमें सोचने पर मजबूर करे। हीरो अस्थायी मोह पैदा करता है; खलनायक स्थायी स्मृति। शायद यही सिनेमा की सबसे बड़ी सच्चाई है, कि हर अच्छी कहानी को एक सशक्त खलनायक की ज़रूरत होती है। केएन सिंह से लेकर बॉबी देओल और अक्षय खन्ना तक, इन कलाकारों ने दिखाया कि अभिनय की असली ऊंचाई नायकत्व में नहीं, बल्कि खलनायकी की परतों में छिपी होती है जहां नफ़रत और करुणा, दोनों का स्वर एक साथ गूंजता है।
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Monday, December 15, 2025

राष्ट्रभक्ति का अमर स्वर और 'वंदे मातरम' की गूंज

    अभी तक कालजयी फिल्मों के किस्से ही आम रहे, पर कोई गीत भी कालजयी हो सकता है यह सच पहली बार सामने आया। डेढ़ सौ साल पहले रचे गए गीत 'वंदे मातरम' ने अपनी यात्रा में कई पड़ाव देखे हैं। आजादी से पहले इसे क्रांति जगाने वाले उद्घोष के रूप में पहचान मिली, तो आजादी के बाद इसे राष्ट्रभक्ति का प्रमाण माना गया। इसके बाद भी वंदे मातरम की यात्रा रुकी नहीं। इसे कई फिल्मों में अलग-अलग संदर्भों में उपयोग किया गया। यहां तक कि एक फिल्म में इसे पारिवारिक दृश्य दिया तो दुश्मन देश के खिलाफ जंग वाली फिल्मों में ये जवानों को जोश दिलाने के काम आया। लेकिन, संगीतकार  एआर रहमान ने एक एल्बम में जिस तरह आलाप लेकर वंदे मातरम को गाया, वो अलग ही रूप में सामने आया। 
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- हेमंत पाल

    हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की खासियत है, कि वो हर उस प्रसंग में अपने आपको शामिल कर लेती है, जिसमें लोकप्रियता मिलने की संभावना नजर आती है। ऐसा ही एक मौका है राष्ट्रगीत वंदे मातरम का, जिसकी रचना को डेढ़ सौ साल पूरे हो गए हैं। वास्तव में यह ऐसा गीत है, जो सुनने वाले के दिल में राष्ट्रभक्ति की अलख जगाता है। जब देश अंग्रेजों का गुलाम था, तब इस गीत ने लोगों में विद्रोह की भावना जगाने का काम किया और आजाद होने के बाद यही गीत देश प्रेम का प्रतीक बना। फिल्मकारों ने भी वंदे मातरम को अलग संदर्भों में कई बार प्रयोग किया। फिल्मों में इस गीत ने देशभक्ति को दर्शकों की भावनात्मक गहराई जोड़ने का काम किया। 1952 में आई फिल्म 'आनंद मठ' में इसे लता मंगेशकर ने गाया था। इसके बाद 'एबीसीडी-2' (2015) और 'फाइटर' (2024) जैसी ताजा दौर की फिल्मों में इसे डांस और एक्शन थीम के साथ जोड़ा गया। आशय यह कि एक चर्चित गीत का कई बदले प्रसंगों में उपयोग हुआ। जबकि, इस राष्ट्रगीत की रचना बंकिमचंद्र चटर्जी ने 7 नवंबर 1875 को अक्षय नवमी के अवसर पर की थी। अब इसे डेढ़ सौ साल पूरे हो गए। देश की गुलामी के समय देशभक्ति वाली फिल्मों या किसी फिल्म के देशभक्ति वाले दृश्यों को फिल्माते वक्त राष्ट्र गीत 'वंदे मातरम' को बैकग्राउंड में बजाया जाता रहा। 
    बंकिम चंद्र चटर्जी ने वंदे मातरम को लिखा जरूर, पर इसके बाद इसके प्रसंग और धुन में बदलाव आता गया। यह फिल्म इंडस्ट्री में भी समय के साथ दिखाई दिया। पहली बार 'वंदे मातरम' गीत को 1952 में फिल्म 'आनंद मठ' के लिए लता मंगेशकर ने गाया, जिसकी धुन को संगीतकार और गायक हेमंत कुमार ने धुन में पिरोया था। दरअसल, 'वंदे मातरम' की उत्पत्ति 1882 में लिखे उपन्यास 'आनंदमठ' से जुड़ी है, जो संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि पर आधारित था। इस गीत को आजादी की जंग के दौर में रवींद्रनाथ टैगोर ने 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में गाया था, तब यह राष्ट्र प्रेम का प्रतीक बना। हिंदी सिनेमा में तो इसका प्रवेश 1952 की फिल्म 'आनंदमठ' से ही हुआ, जिसका निर्देशन हेमेन गुप्ता ने किया था। इस फिल्म में वंदे मातरम दो बार उपयोग हुआ। लता मंगेशकर का स्त्री स्वर में और हेमंत कुमार का पुरुष स्वर। प्रदीप कुमार, गीता बाली और पृथ्वीराज कपूर जैसे सितारों के अभिनय के बीच यह गीत दर्शकों के दिलों में उतर गया था। हेमंत कुमार की धुन ने मूल संस्कृतनिष्ठ बंगाली गीत को हिंदी फिल्म के परदे पर अमर बना दिया, जो आज भी खास अवसरों पर सुनाई देता है। 
    इसके बाद इस गीत को कई फिल्मों में नई धुन में सुना गया। वंदे मातरम हमारे देश का राष्ट्रीय गीत है, जिसे कई नामी गायकों ने गाया। आजादी के समय 15 अगस्त 1947 को पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने आकाशवाणी पर इसे गाया था। इससे पहले 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने कांग्रेस अधिवेशन में इसे पहली बार स्वरबद्ध कर गाया था। इसके बाद इसे कई गायकों ने स्वरबद्ध किया। लता मंगेशकर ने इसे पहली बार गाया। इसके बाद साधना सरगम, मधुरी मधुकर, मनोज मिश्रा, देबासिस और सुखविंदर सिंह ने भी इसे स्वर दिया। लेकिन,लेकिन, 1997 में संगीतकार एआर रहमान ने 'मां तुझे सलाम' एल्बम के लिए वंदे मातरम को खुद ही संगीतबद्ध कर गाया भी। खास बात यह कि यह गीत रात 2 बजे विशेष परिस्थितियों में रिकॉर्ड किया गया और फिर यह आइकॉनिक बन गया। 1951 से लेकर साल 2012 तक इस गाने की धुनों पर फिल्म इंडस्ट्री के कई गायकों का जादू चला। बाद में इसमें सोनू निगम, सुनिधि चौहान और शंकर महादेवन का नाम भी शामिल है। लेकिन, जब भी 'वंदे मातरम' का जिक्र आया तो जहन में सबसे पहले एआर रहमान का 'मां तुझे सलाम' का ही नाम गूंजा। क्योंकि, एआर रहमान पेशे से संगीतकार है, लेकिन उनकी आवाज का जादू ने 'मां तुझे सलाम गाने' में अपना ऐसा जलवा बिखेरा कि लोग आज भी इस गाने को सुनते हैं तो उनमें देशभक्ति जाग जाती है। इस गाने को उन्होंने साल 1997 में अपने अलग ही अंदाज में गाया था। 
     फिल्म इतिहास के पन्नों को पलटा जाए, तो शाहरुख खान, ऋतिक रोशन, काजोल, करीना कपूर, अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, रानी मुखर्जी अभिनीत 'कभी खुशी कभी गम' में भी 'वंदे मातरम' गीत सुनाई दिया। जबकि, यह एक फैमिली ड्रामा फिल्म है। यह गाना फिल्म में ऐसे प्रसंग पर सुनने को मिला, कि दर्शक न सिर्फ भावुक हुए, बल्कि उनमें देशभक्ति की भावना भी उमड़ पड़ी। फिल्म में इसे उषा उत्थुप और कविता कृष्णमूर्ति ने गाया था। साल 2015 में आई इस फिल्म में 'वंदे मातरम' को इसके साउंडट्रैक में शामिल किया गया। इसे काफी अलग, लेकिन दिलचस्प अंदाज में पेश किया गया है। इसी साल (2015) में आई फिल्म 'एबीसीडी-2' के लिए इसे दलेर मेहंदी और बादशाह ने गाया। इसमें संगीत था सचिन-जिगर का। 2019 में आई फिल्म 'इंडियाज मोस्ट वांटेड' में भी राष्ट्रगीत बजा। पापोन, अल्तमश फरीदी और अमित त्रिवेदी द्वारा गाए इस गीत का नया वर्जन शामिल किया गया था। मानुषी छिल्लर और वरुण तेज अभिनीत 'ऑपरेशन वैलेंटाइन' साल 2024 में रिलीज हुई। इसमें सुखविंदर सिंह का गाया 'वंदे मातरम' गीत सुनने को मिला। 2024 में ऋतिक रोशन, अनिल कपूर और दीपिका पादुकोण अभिनीत फिल्म 'फाइटर' में भी 'द फाइटर एंथम' के रूप में वंदे मातरम सुनाई दिया। यह देशभक्ति वाली एक्शन फिल्म है। 2025 की जासूसी फिल्म 'सलाकार' में भी 'वंदे मातरम' काफी अलग लेकिन रोचक अंदाज में सुनने को मिला। सूर्य शर्मा, नवीन कस्तुरिया और मौनी रॉय अभिनीत यह फिल्म अगस्त में रिलीज हुई थी।
     'वंदे मातरम' ने हिंदी सिनेमा को देशभक्ति का मजबूत धागा दिया। यह गीत न केवल स्वतंत्रता संग्राम की याद दिलाता है, बल्कि आधुनिक फिल्मों में एकता और बलिदान का भी प्रतीक भी बन गया। फिल्मों से पहले 1905 में हीरालाल जैन के बनाए भारत के पहले राजकीय चित्रपट में 'वंदे मातरम' में भी इसका उपयोग हुआ था। लेकिन, तब यह हिंदी में नहीं था। आजादी के ठीक बाद 1948 में मराठी फिल्म 'वंदे मातरम' रिलीज हुई, जिसका निर्देशन राम गबाले ने किया और संगीत सुधीर फडके ने दिया। इसमें पुल देशपांडे और सुनीता देशपांडे ने मुख्य भूमिकाएं निभाईं थी तथा गीत गदी माडगूळकर ने लिखे। फिल्म के 'वेद मंत्राहून वंद्य' जैसे गाने लोकप्रिय हुए, लेकिन मूल 'वंदे मातरम' का स्पष्ट उल्लेख नहीं था।
    1985 में इसी नाम पर एक तेलुगु फिल्म भी बनाई गई। टी कृष्णा के निर्देशन में बनी इस फिल्म में विजयशांति और डॉ राजशेखर लीड रोल में दिखाई दिए। आश्चर्य की बात यह कि अभी तक किसी हिंदी फिल्मकार ने इस लोकप्रिय टाइटल का उपयोग करके हिंदी फिल्म नहीं बनाई। जबकि, इस गीत को ऐतिहासिक संदर्भों में देखा जाए तो आजादी से पहले 'वंदे मातरम' आजादी के आंदोलन का प्रमुख जयघोष था। पर, ब्रिटिश सेंसरशिप के कारण फिल्मों में इसका सीधा उपयोग सीमित ही रहा। पहली बार 1952 में 'आनंदमठ' ने इसे हिंदी परदे पर स्थापित किया। आज भी जब 'वंदे मातरम' कानों में सुनाई देता है, तो दिल में एक अलग ही देशभक्ति का उन्माद उभरता है, यही तो इस कालजयी गीत की विशेषता भी है।     
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शब्दों का बारूद : आईएएस संतोष वर्मा विवाद

   मध्यप्रदेश में उपजा संतोष वर्मा विवाद केवल एक बयान की चूक नहीं, बल्कि उस गहरे असंतुलन की परछाई है, जो समाज और नौकरशाही दोनों में अपनी जड़ें जमा चुका है। जब अधिकारी अपनी पहचान या भावनाओं से ऊपर नहीं उठ पाते, तो शासन की निष्पक्षता संदिग्ध हो जाती है। नौकरशाही की साख केवल आदेशों में नहीं, बल्कि उनकी भाषा और सामाजिक मर्यादा में भी निहित होती है। क्योंकि, जब शब्द 'बारूद' बन जाएं, तो उनका विस्फोट किसी व्यक्ति को नहीं पूरे तंत्र को झुलसा देता है।
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- हेमंत पाल

   ध्य प्रदेश की नौकरशाही इन दिनों ऐसे बवंडर से गुजर रही है, जहाँ 'सेवा' और 'संवेदना' की सीमाएं धुंधली पड़ती जा रही। आईएएस अधिकारी और अजाक्स (अनुसूचित जाति एवं जनजाति अधिकारी-कर्मचारी संघ) के अध्यक्ष संतोष कुमार वर्मा के ब्राह्मण समाज के संदर्भ में दिए गए विवादास्पद बयान ने न सिर्फ प्रशासनिक दायरे में असंतोष बढ़ाया, बल्कि राज्य के सामाजिक ताने-बाने में नई दरारें भी खोल दी। यह विवाद उस वक्त शुरू हुआ, जब एक कार्यक्रम में संतोष वर्मा का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वे कथित रूप से कहते दिखे 'ब्राह्मणों को अपनी बेटियां अनुसूचित जाति के लड़कों को देनी चाहिए।'
    इस कथन ने सवर्ण समाज में तीखा आक्रोश पैदा किया। 'सपाक्स' समेत कई संगठनों ने इसे सामाजिक विभाजन फैलाने वाला वक्तव्य बताया। जवाब में 'अजाक्स' और 'जयस' (जय युवा आदिवासी शक्ति संगठन) जैसे समूहों ने संतोष वर्मा का समर्थन किया, यह तर्क देते हुए कि उनका बयान 'जातीय समानता' की अपील के रूप में दिया गया था, जिसे तोड़-मरोड़कर पेश किया गया। सरकार ने उन्हें स्पष्टीकरण नोटिस तो भेजा, पर दो सप्ताह बाद भी कोई ठोस कार्रवाई न होती देख मामला और गरमाने लगा।
     मामला थमता दिख ही रहा था कि एक और वीडियो सामने आया। इसमें संतोष वर्मा बोलते दिखे 'कितने संतोष वर्मा को मारोगे, अब हर घर से एक संतोष वर्मा निकलेगा।' इस पंक्ति ने पूरे विवाद को नया उबाल दे दिया। ब्राह्मण संगठनों ने सरकार को चेतावनी दी कि यदि कार्रवाई नहीं की गई, तो वे सड़क पर उतरेंगे। संतोष वर्मा ने सफाई में कहा कि यह पंक्ति उन्होंने सांसद चंद्रशेखर आजाद रावण के भाषण से उद्धृत की थी, और वीडियो उनके संगठन की आंतरिक बैठक का अंश था। बावजूद इसके, प्रशासनिक आचार संहिता के लिहाज से इस बयान को बेहद संवेदनशील माना गया।
    विवाद के फैलने के साथ राजनीति सक्रिय हो गई। भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों के कई ब्राह्मण विधायक और सांसद कार्रवाई की मांग करने लगे। जनार्दन मिश्रा जैसे सांसदों ने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर संतोष वर्मा की पदोन्नति और सेवा आचरण की जांच की मांग की। करणी सेना और अखिल भारतीय ब्राह्मण समाज ने तो उनकी सेवा समाप्त करने और पुरस्कार वापस लेने जैसे कठोर कदम सुझा दिए। वहीं, सरकार एक कठिन संतुलन साधने की कोशिश में है। एक और एससी-एसटी समुदाय में अजाक्स का व्यापक प्रभाव है, तो दूसरी ओर सवर्ण वर्ग की नाराज़गी सत्ता समीकरण प्रभावित कर सकती है। नतीजतन, प्रशासन न 'कठोर कदम' उठा पा रहा है, न 'खामोशी' तोड़ पा रहा है।
     यह पहला मौका नहीं है जब कोई आईएएस अधिकारी सामाजिक या धार्मिक मुद्दे पर विवादों में आया हो। इससे पहले भी कई आईएएस अधिकारी संवेदनशील विषयों पर मुखर रहे। लेकिन, संतोष वर्मा प्रकरण इसलिए अलग है, क्योंकि इसमें जाति, स्त्री और संवैधानिक मर्यादा तीनों का टकराव निहित है। नियम के अनुसार, किसी अधिकारी को ऐसे बयान से बचना चाहिए, जो किसी वर्ग विशेष की गरिमा को ठेस पहुंचाए या सामाजिक तनाव उत्पन्न करे। यही वजह है कि संतोष वर्मा का मामला केवल 'व्यक्तिगत मत' नहीं, बल्कि सेवा की निष्पक्षता पर प्रश्न बन गया है। आज संतोष वर्मा दलित और आदिवासी समुदायों में प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में देखे जा रहे हैं। उनका बयान समर्थकों के लिए समानता की पुकार बन गया है, भले ही वह शब्दों में उग्र लगे। लेकिन, यही भाषा प्रशासनिक संतुलन और सामाजिक संवाद के लिए 'बारूद' भी साबित हो सकती है।
    सरकार ने संतोष वर्मा को कृषि विभाग से हटाकर सचिवालय भेज दिया है और आगे की कार्रवाई के लिए मामला केंद्र को भेज दिया। इस मामले में सबसे बड़ा पेंच यह है कि शीघ्र कार्रवाई से सरकार को दलित-आदिवासी संगठनों के विरोध का सामना करना पड़ सकता है, जबकि देर करने से सवर्ण आक्रोश बढ़ रहा है। मामला अब केंद्र तक पहुंच चुका है और संभव है कि नौकरशाही अनुशासन के तहत दिल्ली से कोई औपचारिक जांच आदेश जल्द जारी हो।
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Sunday, December 7, 2025

परदे के सितारे और दूसरी शादी का अंतहीन दर्द


    जब फिल्म का कोई अभिनेता अपने करियर के चरम पर होता है, तो उसके प्रेम प्रसंग भी चर्चा में रहते हैं। ऐसे समय में कई बार बात शादी तक भी पहुंचती है। जिनके साथ ऐसा नहीं होता उनके प्रेम प्रसंग लंबे समय तक ख़बरों में बने रहते हैं। लेकिन, जिन कलाकारों ने एक पत्नी के होते, दूसरी शादी की उनके जीवन का उत्तरार्ध सुकून भरा नहीं रहा। सामाजिक रूप से, पहली पत्नियां चुप्पी साध लेती हैं या बचाव करती हैं, जबकि समाज नैतिकता पर बहस जारी रखता है। क्योंकि, दूसरी शादी वाले कलाकारों की पत्नी और बच्चे इसे स्वीकार नहीं करते। ऐसी कई कहानियां गिनाई जा सकती है, जब ऐसे मामलों की बात उनके घरों से निकलकर बाहर आई। 
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- हेमंत पाल

   फिल्म के कलाकारों का जीवन आम लोगों से अलग नहीं होता। वे परदे पर कैसी भी भूमिका निभाएं, पर असल जीवन में उनकी ख़ुशी और गम सबके जैसे होते हैं। उनका पारिवारिक जीवन, उसके दर्द और संबंधों में आपसी खींचतान फ़िल्मी कथानकों से अलग होती हैं। वैसे तो फिल्मों के अंत में सारी समस्याएं सुलझ जाती है, पर असल जीवन में ऐसा नहीं होता। जब जीवन उत्तरार्ध की तरफ बढ़ता है, तो उसकी असलियत की परतें खुलने लगती है। क्योंकि, ऐसे में पति-पत्नी के रिश्ते काफी अहम होते हैं। लेकिन, जब लोकप्रियता के शिखर पर किसी कलाकार की रिश्तों की नौका डगमगाती है और वह दूसरी शादी कर लेता है, तो हालात बदल जाते हैं। ये स्थितियां कभी अनुकूल होती है, कभी विपरीत। किंतु, दूसरी शादी से परिवार जिस तरह की मानसिकता से गुजरता है, उन हालात को संभालना आसान नहीं होता। ऐसे में सारा सच घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहता और निकलकर बाहर आ जाता है। धर्मेंद्र के जीवन के अंतिम दिनों में जो कुछ घटा, उसने इस सच्चाई को बेहतर ढंग से सामने ला दिया।
    कलाकारों के जीवन की जटिलताएं कम नहीं होती। ये उनकी फिल्मों के क्लाइमैक्स की तरह सुखद नहीं होता। इन अभिनेताओं की दो शादियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश और उनके निधन के समय साथ देने के भावनात्मक हालात के कई किस्से हैं। ऐसी स्थितियों ने इन रिश्तों की जरूरत और मजबूरियों को भी उजागर किया, जहां दूसरी पत्नियों ने जीवन भर साथ दिया लेकिन अंतिम समय में वे अकेले या विवादित रहे। धर्मेंद्र के निधन के बाद हेमा मालिनी के साथ जो हुआ वो किसी से छुपा नहीं है। धर्मेंद्र के जीवन के अंतिम दिन बेहद पीड़ादायक रहे। उनके निधन की अफवाह उड़ी, फिर उन्हें अस्पताल से घर लाया गया, उसके बाद इस महान अभिनेता का निधन हो गया। दूसरी पत्नी हेमा मालिनी को धर्मेंद्र की प्रार्थना सभा में भी नहीं आने देना जैसे किस्से आम हुए। पर, ये पहला और आखिरी प्रसंग नहीं है। दो शादी करने वाले कई अभिनेता हैं, जिन्होंने अच्छे हालात में पहली पत्नी के होते हुए शादी तो की, पर बाद के हालात अनुकूल नहीं रहे, तो वे उससे बचते रहे। कई नामचीन फिल्मी हस्तियों ने दो शादियां की। दूसरी पत्नियों ने जीवन भर साथ दिया। लेकिन, अधिकांश के अंतिम समय में पारिवारिक स्थितियां उलझ गई और उन्हें कटु अनुभवों से गुजरना पड़ा। 
   धर्मेंद्र ने अपने जीवन में दो शादियां की। उनकी पहली शादी प्रकाश कौर से 1954 में हुई और उन्होंने दूसरी हेमा मालिनी से 1980 में की। लेकिन, वे जीवन के अंतिम समय में वे पहली पत्नी के साथ रहे। दूसरी पत्नी हेमा मालिनी अंतिम क्षणों में उनके पास नहीं रहीं। जबकि, धर्मेंद्र ने हेमा से शादी के लिए धर्म भी बदला था। धर्मेंद्र ने अपनी पहली पत्नी से तलाक नहीं लिया। हेमा ने अपने पति धर्मेंद्र के पहले परिवार और बच्चों के प्रति सम्मान दिखाते हुए अपनी शादी को दूसरी शादी की नहीं, बल्कि एक विशेष रिश्ता माना। धर्मेंद्र की पहली पत्नी प्रकाश कौर ने भी उनका जीवन भर साथ दिया और अंतिम समय में भी परिवार में उनका सम्मान बना रहा। 
    फ़िल्मी दुनिया के कई अभिनेताओं ने दो शादियां कीं, जहां दूसरी पत्नी उनके अंतिम समय में साथ न होने की वजह से जीवन की विडंबना उजागर हुई। दिलीप कुमार ने 1966 में अपने से उम्र में काफी छोटी, खूबसूरत अभिनेत्री सायरा बानो से निकाह किया। ये रिश्ता हिंदी फिल्म इतिहास के सबसे चर्चित वैवाहिक रिश्तों में से एक माना गया। सायरा बानो के साथ उनका वैवाहिक जीवन लंबे समय तक स्थिर और भावनात्मक रूप से गहरा रहा, लेकिन संतान न होने की कसक अक्सर चर्चा में रही।  इसी पृष्ठभूमि में 1981 के आसपास उनकी ज़िंदगी में आसमा रहमान नाम की महिला आई, जिससे उन्होंने चुपचाप दूसरी शादी कर ली। आम धारणा यह बनी कि संतान की चाहत और भावनात्मक असुरक्षा ने उन्हें इस कदम के लिए प्रेरित किया। कुछ ही वर्षों में यह रिश्ता टूट गया। दिलीप कुमार ने अपनी आत्मकथा में अस्मा रहमान से दूसरी शादी को गंभीर भूल बताया था। वे फिर सायरा के पास लौट आए। बाद के सालों में सायरा ने ही उनकी देखभाल की और आखिरी समय तक उनके साथ रहीं। दूसरी शादी दिलीप कुमार की छवि पर एक धब्बे की तरह दर्ज हुई, परंतु सायरा बानो के अटूट साथ और उनकी चुप्पी ने इस प्रकरण को धीरे-धीरे स्मृति के हाशिये पर पहुंचा दिया। उनकी अभिनय-प्रतिभा, सामाजिक प्रतिष्ठा और उम्र के अंतिम चरण का गरिमामय व्यक्तित्व इस निजी भूल पर भारी पड़ा और उनकी विरासत एक महान अभिनेता और समर्पित जीवनसाथी के रूप में ही याद की जाती है।
    राज बब्बर और स्मिता पाटिल का मामला भी दो पत्नियों के बीच फंसे पति का एक उदाहरण है। राज बब्बर ने 1975 में नादिरा बब्बर से शादी की, जिनसे दो बच्चे हुए। फिर 1983 में स्मिता पाटिल से दूसरी शादी की। स्मिता ने 1986 में बेटे प्रतीक को जन्म दिया, लेकिन प्रसव की जटिलताओं की वजह से 31 साल की उम्र में वे चल बसीं। स्मिता की मृत्यु के बाद राज पहली पत्नी नादिरा के पास लौटे, जिसने उन्हें स्वीकार भी किया। इसी तरह राजेश खन्ना के जीवन में भी वैवाहिक जीवन की जटिलताएं रहीं। उन्होंने डिंपल कपाड़िया से शादी की, लेकिन बाद में वे अलग हो गए, पर दोनों में तलाक नहीं हुआ। उनकी दूसरी पत्नी के बारे में कई खुलासे हुए। अनीता आडवाणी ने दावा किया कि उन्होंने राजेश खन्ना से चुपके शादी की थी। अनीता उनके अंतिम समय तक उनके साथ रहीं। राजेश खन्ना के जीवन में दूसरी शादी और संबंधों ने बहुत विवाद और रहस्यमयता पैदा की, जिसने राजेश खन्ना जैसे बड़े अभिनेता को अंतिम समय में उनके चाहने वालों से दूर कर दिया था।  
    एक और अभिनेता विनोद खन्ना भी थे, जिन्होंने भी दो शादियां कीं। उनके जीवन के उतार-चढाव से कोई नावाकिफ नहीं है। उनकी पहली पत्नी गीतांजलि थी और दूसरी कविता दफ्तरी से। दोनों अपनी-अपनी जगह पर विनोद खन्ना के जीवन का हिस्सा बनी। जब विनोद खन्ना का निधन हुआ, तो दोनों पत्नियां उनके अंतिम संस्कार में मौजूद थीं, इसका मतलब यह नहीं कि दोनों ने आपस में समझौता कर लिया था। ओशो के प्रति गहरे आध्यात्मिक झुकाव ने उन्हें परिवार और फिल्म, दोनों से दूर कर दिया जो तलाक की वजह बना। अध्यात्म से लौटने और करियर में वापसी के बाद उनकी मुलाकात उद्योगपति सरयू दफ्तरी की बेटी कविता दफ्तरी से हुई। 
    उम्र में 16 साल के अंतर के बावजूद 1990 में दोनों ने शादी की। दो शादी करने वाले बड़े फ़िल्म कलाकारों में आमिर खान और सैफ अली खान भी हैं। आमिर ने पहली शादी रीना दत्ता से 1986 में और दूसरी किरण राव से 2005 में की। 16 साल बाद 2002 में तलाक हो गया, लेकिन दोनों आज भी परिवार के रूप में जुड़े हैं। आमिर का दोनों पत्नियों से आपसी सहमति से तलाक भी हो गया। इसी तरह सैफ अली खान ने भी दो शादियां की। पहली 1991 में अभिनेत्री अमृता सिंह से हुई। 2004 में दोनों का तलाक हो गया। सैफ ने दूसरी शादी 2012 में अभिनेत्री करीना कपूर से की, जिनसे उनके दो बेटे तैमूर और जहांगीर हैं। 
   शादियों के मामले में संजय दत्त सबसे अलग ही रहे। संजय दत्त की पहली शादी रिचा शर्मा से 1987 में हुई, जिनकी 1996 में ब्रेन ट्यूमर से मृत्यु हो गई। दूसरी रिया पिल्लई से (1998-2008, तलाक), तीसरी मान्यता से (2008 से चली आ रही)। रिचा की मृत्यु के समय वे युवा थे, उनकी बेटी त्रिशाला की परवरिश अमेरिका में हुई। संजय दत्त के जीवन में भी उनका परिवार और पत्नियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहीं। इसी तरह किशोर कुमार वे गायक और अभिनेता थे, जिन्होंने चार शादियां की। रुमा गुहा ठाकुरता (1950-58), मधुबाला (1960-69), योगिता बाली (1976-78), और लीना चंदावरकर (1980) से। उनकी दूसरी शादी मधुबाला से हुई, जो 1969 में बीमारी से चल बसी। लीना चंदावरकर विवाह के समय वे गर्भवती थीं और 1987 में किशोर को दिल का दौरा पड़ने तक लीना उनके साथ रहीं। 
    इन घटनाओं से स्पष्ट है कि फिल्मों के सफल और लोकप्रिय अभिनेता भी निजी असुरक्षाओं, इच्छाओं और भावनात्मक खालीपन से अछूते नहीं रहते। फर्क सिर्फ यह है कि जहां दिलीप कुमार की दूसरी शादी क्षणिक और त्रासद प्रकरण बनकर रह गई, वहीं धर्मेंद्र और विनोद खन्ना की दूसरी शादी उनके जीवन के उत्तरार्ध की स्थिरता और संतुलन का महत्वपूर्ण अध्याय बनी। राजेश खन्ना की दूसरी शादी दबी-छुपी जरूर रही, पर रिश्तों की रिसन बाहर आती रही। जबकि, राज बब्बर और विनोद खन्ना की दूसरी शादी अलग तरह के हालात से उपजी घटना रही। अभिनेता अक्सर दूसरी शादी के कारण पारिवारिक और सामाजिक दर्द झेलते हैं। वहीं पहली पत्नी को अपमान और विश्वासघात का सामना करना पड़ता है। इन कहानियों से फिल्मी सितारों के निजी जीवन की जटिलताएं झलकती है, जहां प्रेम, अलगाव और अकेलापन अंतिम क्षणों को काला कर देते हैं। इससे लगता है कि वैवाहिक जीवन में स्थिरता कितनी दुर्लभ है।
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