Monday, December 15, 2025

राष्ट्रभक्ति का अमर स्वर और 'वंदे मातरम' की गूंज

    अभी तक कालजयी फिल्मों के किस्से ही आम रहे, पर कोई गीत भी कालजयी हो सकता है यह सच पहली बार सामने आया। डेढ़ सौ साल पहले रचे गए गीत 'वंदे मातरम' ने अपनी यात्रा में कई पड़ाव देखे हैं। आजादी से पहले इसे क्रांति जगाने वाले उद्घोष के रूप में पहचान मिली, तो आजादी के बाद इसे राष्ट्रभक्ति का प्रमाण माना गया। इसके बाद भी वंदे मातरम की यात्रा रुकी नहीं। इसे कई फिल्मों में अलग-अलग संदर्भों में उपयोग किया गया। यहां तक कि एक फिल्म में इसे पारिवारिक दृश्य दिया तो दुश्मन देश के खिलाफ जंग वाली फिल्मों में ये जवानों को जोश दिलाने के काम आया। लेकिन, संगीतकार  एआर रहमान ने एक एल्बम में जिस तरह आलाप लेकर वंदे मातरम को गाया, वो अलग ही रूप में सामने आया। 
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- हेमंत पाल

    हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की खासियत है, कि वो हर उस प्रसंग में अपने आपको शामिल कर लेती है, जिसमें लोकप्रियता मिलने की संभावना नजर आती है। ऐसा ही एक मौका है राष्ट्रगीत वंदे मातरम का, जिसकी रचना को डेढ़ सौ साल पूरे हो गए हैं। वास्तव में यह ऐसा गीत है, जो सुनने वाले के दिल में राष्ट्रभक्ति की अलख जगाता है। जब देश अंग्रेजों का गुलाम था, तब इस गीत ने लोगों में विद्रोह की भावना जगाने का काम किया और आजाद होने के बाद यही गीत देश प्रेम का प्रतीक बना। फिल्मकारों ने भी वंदे मातरम को अलग संदर्भों में कई बार प्रयोग किया। फिल्मों में इस गीत ने देशभक्ति को दर्शकों की भावनात्मक गहराई जोड़ने का काम किया। 1952 में आई फिल्म 'आनंद मठ' में इसे लता मंगेशकर ने गाया था। इसके बाद 'एबीसीडी-2' (2015) और 'फाइटर' (2024) जैसी ताजा दौर की फिल्मों में इसे डांस और एक्शन थीम के साथ जोड़ा गया। आशय यह कि एक चर्चित गीत का कई बदले प्रसंगों में उपयोग हुआ। जबकि, इस राष्ट्रगीत की रचना बंकिमचंद्र चटर्जी ने 7 नवंबर 1875 को अक्षय नवमी के अवसर पर की थी। अब इसे डेढ़ सौ साल पूरे हो गए। देश की गुलामी के समय देशभक्ति वाली फिल्मों या किसी फिल्म के देशभक्ति वाले दृश्यों को फिल्माते वक्त राष्ट्र गीत 'वंदे मातरम' को बैकग्राउंड में बजाया जाता रहा। 
    बंकिम चंद्र चटर्जी ने वंदे मातरम को लिखा जरूर, पर इसके बाद इसके प्रसंग और धुन में बदलाव आता गया। यह फिल्म इंडस्ट्री में भी समय के साथ दिखाई दिया। पहली बार 'वंदे मातरम' गीत को 1952 में फिल्म 'आनंद मठ' के लिए लता मंगेशकर ने गाया, जिसकी धुन को संगीतकार और गायक हेमंत कुमार ने धुन में पिरोया था। दरअसल, 'वंदे मातरम' की उत्पत्ति 1882 में लिखे उपन्यास 'आनंदमठ' से जुड़ी है, जो संन्यासी विद्रोह की पृष्ठभूमि पर आधारित था। इस गीत को आजादी की जंग के दौर में रवींद्रनाथ टैगोर ने 1896 में कांग्रेस अधिवेशन में गाया था, तब यह राष्ट्र प्रेम का प्रतीक बना। हिंदी सिनेमा में तो इसका प्रवेश 1952 की फिल्म 'आनंदमठ' से ही हुआ, जिसका निर्देशन हेमेन गुप्ता ने किया था। इस फिल्म में वंदे मातरम दो बार उपयोग हुआ। लता मंगेशकर का स्त्री स्वर में और हेमंत कुमार का पुरुष स्वर। प्रदीप कुमार, गीता बाली और पृथ्वीराज कपूर जैसे सितारों के अभिनय के बीच यह गीत दर्शकों के दिलों में उतर गया था। हेमंत कुमार की धुन ने मूल संस्कृतनिष्ठ बंगाली गीत को हिंदी फिल्म के परदे पर अमर बना दिया, जो आज भी खास अवसरों पर सुनाई देता है। 
    इसके बाद इस गीत को कई फिल्मों में नई धुन में सुना गया। वंदे मातरम हमारे देश का राष्ट्रीय गीत है, जिसे कई नामी गायकों ने गाया। आजादी के समय 15 अगस्त 1947 को पंडित ओंकारनाथ ठाकुर ने आकाशवाणी पर इसे गाया था। इससे पहले 1896 में रवींद्रनाथ टैगोर ने कांग्रेस अधिवेशन में इसे पहली बार स्वरबद्ध कर गाया था। इसके बाद इसे कई गायकों ने स्वरबद्ध किया। लता मंगेशकर ने इसे पहली बार गाया। इसके बाद साधना सरगम, मधुरी मधुकर, मनोज मिश्रा, देबासिस और सुखविंदर सिंह ने भी इसे स्वर दिया। लेकिन,लेकिन, 1997 में संगीतकार एआर रहमान ने 'मां तुझे सलाम' एल्बम के लिए वंदे मातरम को खुद ही संगीतबद्ध कर गाया भी। खास बात यह कि यह गीत रात 2 बजे विशेष परिस्थितियों में रिकॉर्ड किया गया और फिर यह आइकॉनिक बन गया। 1951 से लेकर साल 2012 तक इस गाने की धुनों पर फिल्म इंडस्ट्री के कई गायकों का जादू चला। बाद में इसमें सोनू निगम, सुनिधि चौहान और शंकर महादेवन का नाम भी शामिल है। लेकिन, जब भी 'वंदे मातरम' का जिक्र आया तो जहन में सबसे पहले एआर रहमान का 'मां तुझे सलाम' का ही नाम गूंजा। क्योंकि, एआर रहमान पेशे से संगीतकार है, लेकिन उनकी आवाज का जादू ने 'मां तुझे सलाम गाने' में अपना ऐसा जलवा बिखेरा कि लोग आज भी इस गाने को सुनते हैं तो उनमें देशभक्ति जाग जाती है। इस गाने को उन्होंने साल 1997 में अपने अलग ही अंदाज में गाया था। 
     फिल्म इतिहास के पन्नों को पलटा जाए, तो शाहरुख खान, ऋतिक रोशन, काजोल, करीना कपूर, अमिताभ बच्चन, जया बच्चन, रानी मुखर्जी अभिनीत 'कभी खुशी कभी गम' में भी 'वंदे मातरम' गीत सुनाई दिया। जबकि, यह एक फैमिली ड्रामा फिल्म है। यह गाना फिल्म में ऐसे प्रसंग पर सुनने को मिला, कि दर्शक न सिर्फ भावुक हुए, बल्कि उनमें देशभक्ति की भावना भी उमड़ पड़ी। फिल्म में इसे उषा उत्थुप और कविता कृष्णमूर्ति ने गाया था। साल 2015 में आई इस फिल्म में 'वंदे मातरम' को इसके साउंडट्रैक में शामिल किया गया। इसे काफी अलग, लेकिन दिलचस्प अंदाज में पेश किया गया है। इसी साल (2015) में आई फिल्म 'एबीसीडी-2' के लिए इसे दलेर मेहंदी और बादशाह ने गाया। इसमें संगीत था सचिन-जिगर का। 2019 में आई फिल्म 'इंडियाज मोस्ट वांटेड' में भी राष्ट्रगीत बजा। पापोन, अल्तमश फरीदी और अमित त्रिवेदी द्वारा गाए इस गीत का नया वर्जन शामिल किया गया था। मानुषी छिल्लर और वरुण तेज अभिनीत 'ऑपरेशन वैलेंटाइन' साल 2024 में रिलीज हुई। इसमें सुखविंदर सिंह का गाया 'वंदे मातरम' गीत सुनने को मिला। 2024 में ऋतिक रोशन, अनिल कपूर और दीपिका पादुकोण अभिनीत फिल्म 'फाइटर' में भी 'द फाइटर एंथम' के रूप में वंदे मातरम सुनाई दिया। यह देशभक्ति वाली एक्शन फिल्म है। 2025 की जासूसी फिल्म 'सलाकार' में भी 'वंदे मातरम' काफी अलग लेकिन रोचक अंदाज में सुनने को मिला। सूर्य शर्मा, नवीन कस्तुरिया और मौनी रॉय अभिनीत यह फिल्म अगस्त में रिलीज हुई थी।
     'वंदे मातरम' ने हिंदी सिनेमा को देशभक्ति का मजबूत धागा दिया। यह गीत न केवल स्वतंत्रता संग्राम की याद दिलाता है, बल्कि आधुनिक फिल्मों में एकता और बलिदान का भी प्रतीक भी बन गया। फिल्मों से पहले 1905 में हीरालाल जैन के बनाए भारत के पहले राजकीय चित्रपट में 'वंदे मातरम' में भी इसका उपयोग हुआ था। लेकिन, तब यह हिंदी में नहीं था। आजादी के ठीक बाद 1948 में मराठी फिल्म 'वंदे मातरम' रिलीज हुई, जिसका निर्देशन राम गबाले ने किया और संगीत सुधीर फडके ने दिया। इसमें पुल देशपांडे और सुनीता देशपांडे ने मुख्य भूमिकाएं निभाईं थी तथा गीत गदी माडगूळकर ने लिखे। फिल्म के 'वेद मंत्राहून वंद्य' जैसे गाने लोकप्रिय हुए, लेकिन मूल 'वंदे मातरम' का स्पष्ट उल्लेख नहीं था।
    1985 में इसी नाम पर एक तेलुगु फिल्म भी बनाई गई। टी कृष्णा के निर्देशन में बनी इस फिल्म में विजयशांति और डॉ राजशेखर लीड रोल में दिखाई दिए। आश्चर्य की बात यह कि अभी तक किसी हिंदी फिल्मकार ने इस लोकप्रिय टाइटल का उपयोग करके हिंदी फिल्म नहीं बनाई। जबकि, इस गीत को ऐतिहासिक संदर्भों में देखा जाए तो आजादी से पहले 'वंदे मातरम' आजादी के आंदोलन का प्रमुख जयघोष था। पर, ब्रिटिश सेंसरशिप के कारण फिल्मों में इसका सीधा उपयोग सीमित ही रहा। पहली बार 1952 में 'आनंदमठ' ने इसे हिंदी परदे पर स्थापित किया। आज भी जब 'वंदे मातरम' कानों में सुनाई देता है, तो दिल में एक अलग ही देशभक्ति का उन्माद उभरता है, यही तो इस कालजयी गीत की विशेषता भी है।     
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