Saturday, December 20, 2025

हीरो से बड़े ये खलनायक, नफरत में पाया प्यार

    अक्षय खन्ना और बॉबी देओल दोनों ही अपने ज़माने के सफल हीरो के बेटे हैं। अपने पिता की तरह उन्होंने भी उसी हीरो की इमेज को अपनाया और शुरूआती दौर में सफल भी रहे। लेकिन, वे दर्शकों में अपने पिता की तरह छवि नहीं बना सके। एक दौर ऐसा भी आया, जब ये दोनों प्रतिभाशाली कलाकार करीब-करीब भुला दिए गए थे। लेकिन, फिर हालात बदले और इन दोनों कलाकारों ने अपनी छवि को उलटकर रख दिया। अक्षय और बॉबी दोनों ने हीरो का मुखौटा उतारकर खलनायक की भूमिका को स्वीकार लिया। इसका असर ये हुआ कि आज दोनों अपने किरदार में सफल हो गए। अक्षय ने 'छावा' और 'धुरंधर' में अपनी क्रूरता का जलवा दिखाया तो बॉबी देओल ने 'आश्रम' वेब सिरीज के बाद 'एनीमल' फिल्म में खलनायक को जिंदा कर दिया। दोनों ने अपनी इमेज तोड़कर जिस तरह निगेटिव किरदारों को नई गरिमा और आकर्षण दिया, वे सचमुच इस दौर के सबसे प्रभावी खलनायकों में गिने जा रहे हैं। दोनों ने साबित कर दिया कि आज का खलनायक सिर्फ हीरो का विरोधी नहीं, बल्कि कहानी का असली इंजन और दर्शकों की जिज्ञासा का केंद्र भी है।
000    

- हेमंत पाल

     हिंदी सिनेमा में आज खलनायक सिर्फ ब्लैक एंड व्हाइट की तरह नैतिक विभाजन नहीं, बल्कि एंटी-हीरो, ग्रे-ज़ोन और क्रिमिनल-सेंट्रिक नैरेटिव का प्रतीक बन चुका है। जिसे केजीएफ, पुष्पा, मिर्ज़ापुर, छावा और एनिमल जैसी फिल्मों और 'आश्रम' जैसी वेब सीरीज़ ने और मजबूत किया। ट्रेंड यह कि कहानी अक्सर हिंसक, कानून विरोधी या नैतिक रूप से संदिग्ध किरदार के नज़रिए से कही जा रही है। जबकि, बॉक्स ऑफिस के आंकड़े बताते हैं कि दर्शक इस अंधेरी जगह में रोमांच और रिलेटेबिलिटी दोनों खोज रहे हैं। इस परिदृश्य में अक्षय खन्ना और बॉबी देओल जैसे कलाकार ‘स्टार विलेन’ का नया मॉडल भी तैयार कर रहे, जहां निगेटिव रोल न केवल करियर रिवाइवल का साधन हैं, बल्कि अभिनय कौशल आज़माने की प्रयोगशाला भी। उनकी सफलता यह संकेत देती है कि आने वाले सालों में खलनायक की परतदार, मानवीय और कभी-कभी ग्लैमराइज्ड छवि ही मुख्यधारा हिंदी सिनेमा की बड़ी धुरी रहने वाली है।
     फिल्मों में अक्षय खन्ना का सफर हमराज़, रेस से शुरू होकर आज ‘धुरंधर’ के रहमान डकैत और ‘छावा’ के औरंगजेब तक पहुंच चुका है, जहां वे पूरी तरह निगेटिव स्पेस को अपनी जगह बना चुके हैं। उनके भारी और नियंत्रित संवाद, धीमी लेकिन भय पैदा करने वाली बॉडी लैंग्वेज और आंखों में ठंडा हिसाब-किताब उन्हें 70-80 के विलेन से बिल्कुल अलग, आधुनिक मनोवैज्ञानिक खलनायक बनाता हैं। ‘धुरंधर’ में रहमान डकैत के रूप में उनकी मौजूदगी इतनी प्रभावी रही कि कई चर्चाओं में हीरो से ज्यादा बात उनके किरदार की हो रही है। उनकी हॉलीवुड के प्रतिष्ठित विलेन कैरेक्टरों से तुलना मिलने लगी। ‘छावा’ में औरंगजेब की भूमिका के साथ उन्होंने इतिहास आधारित निगेटिव किरदार में भी परतें जोड़ते हुए यह दिखाया कि आज का दर्शक खलनायक में भी वैचारिक और भावनात्मक जटिलता देखना चाहता है।
     बॉबी देओल का 'विलेन युग' वेब सीरीज ‘आश्रम’ के बाबा निराला से शुरू होकर फिल्म ‘एनिमल’ के मूक लेकिन हिंसक अबरार हक तक आता है। इस किरदार ने उन्हें फिर से मुख्यधारा चर्चा में ला खड़ा किया। 'आश्रम' में उन्होंने तथाकथित धर्मगुरु के रूप में जिस तरह सत्ता, शोषण और करिश्मे का मेल दिखाया, उसने यह साबित किया कि निगेटिव रोल, स्टार की खोई हुई चमक भी लौटा सकते हैं। ‘एनिमल’ में अबरार जैसे लगभग बिना संवाद वाले किरदार में सिर्फ शरीर, आँखों और हिंसा की कोरियोग्राफी के जरिए प्रभाव छोड़ना, आधुनिक एक्शन-सिनेमा के सौंदर्यशास्त्र के अनुरूप एक नया तरह का खलनायक गढ़ता है, जो स्टाइल और क्रूरता दोनों से याद रहता है।  इस कामयाबी के बाद उन्हें रेस-3, लव हॉस्टल और आगामी बड़े प्रोजेक्ट्स में लगातार कास्ट किया जाना दिखाता है कि इंडस्ट्री उन्हें नए दौर के विलेन के रूप में देख रही है।
     हिंदी सिनेमा के कथानक में ‘नायक’ हमेशा केंद्र में रहा है। फिल्म में नायक वह पात्र होता है, जो अच्छाई, त्याग और नैतिकता का प्रतीक बनकर दर्शकों का दिल जीतता है। परदे के पीछे भी यह सच हमेशा कायम रहा है कि नायक की रोशनी तभी चमकती है, जब उसके सामने एक खलनायक दमदार हो। यह खलनायक कभी डर पैदा करता है, कभी आकर्षण और कभी सामाजिक यथार्थ का चेहरा बन जाता है। हर दौर में कुछ ऐसे कलाकार हुए, जिन्होंने यह साबित किया कि अभिनय की असली गहराई ‘बुराई’ को विश्वसनीय और करिश्माई बनाने में है। उनके किरदारों ने यह दिखाया कि दर्शक नफ़रत करते हुए भी ऐसे पात्रों को भूल नहीं पाते। 1930 और 40 के दशक का हिंदी सिनेमा अच्छाई-बुराई की सीधी लड़ाइयों पर आधारित था। पर, इस दौर में कुछ अभिनेताओं ने खलनायकी का चेहरा बदलना शुरू किया। केएन सिंह ने खलनायक को बौद्धिक आभा दी। 
     जब ज्यादातर निगेटिव किरदार शारीरिक बल या हिंसक प्रवृत्ति पर आधारित थे, तब उन्होंने सोचने-वाले अपराधी की छवि रची। केएन सिंह ने क़ैदी, जीवन नैया और 'हवस' जैसी फिल्मों में संतुलित, ठंडा और परिष्कृत अंदाज़ दर्शाता। इससे पता चलता है कि अपराधी भी तर्क का खेल खेल सकता है। वे ऐसे खलनायक थे, जो कहानी को अपने बुद्धि-बल से संचालित करता था। क्लासिक इंटेलीजेंट विलेन की तरह। इसके बाद आया प्राण का दौर, जिन्होंने 1940 और 50 के दशक में खलनायक की परिभाषा ही बदल दी। परख, जहां आरा और 'बड़ी बहन' जैसी फिल्मों में उनका अभिनय डरावना और सम्मोहक दोनों था। वे बुरे अवश्य थे, पर करिश्माई ढंग से। उनके अंदाज़, आवाज और चाल-ढाल में एक खास चमक थी, जिसने खलनायकी को एक नई प्रतिष्ठा दी। प्राण जितना नफरत का पात्र बने, उतने ही दर्शकों के मन में गहराई से बस गए और यही सिनेमा का विरोधाभास है। अजीत ने इस धारा को और स्टाइलिश बनाया। 1950-60 के दशक में उनकी छवि एक ऐसे 'गैंगस्टर जेंटलमैन' की बन गई, जिसकी बोली और चाल से ही डर बैठ जाए। उनके संवाद और रौबदार उपस्थिति ने साबित किया कि खलनायक भी ‘क्लास’ रख सकता है। अजीत की खलनायकी में ग्लैमर था जिसने अपराध को भी नई शैली दी।
    हिंदी सिनेमा का 1970 का दशक समाज और सिनेमा, दोनों के लिए संक्रमण काल था। रोज़गार, भ्रष्टाचार और नैतिक द्वंद्व इन सबने समाज में एक बेचैनी पैदा की, जिसका प्रतिबिंब परदे पर भी दिखा। रंजीत इस दौर के उस चेहरे के रूप में उभरे जो भय और असहजता का प्रतीक बन गया। उनकी उपस्थिति ही दर्शकों में खौफ पैदा कर देती थी। शर्मीली, कसमें वादे, और 'अमर अकबर एंथनी' जैसी फिल्मों में उनका हिंसक, नैतिक सीमाओं को तोड़ता चरित्र 1970 के समाज की छिपी बेचैनी का प्रतीक बना। उनकी खलनायकी यथार्थ से उपजी थी खतरे की सच्ची गंध लिए हुए रहा।
     इसी दौर में 1975 में 'शोले' आई और गब्बर सिंह ने यह साबित किया कि खलनायक भी नायक बन सकता है। अमजद खान का गब्बर इतना प्रभावशाली था कि वह फिल्म की आत्मा ही बन गया। उस किरदार की खासियत थी उसके 'संवाद में आतंक' जो बंदूक से ज़्यादा असरदार था। इसके बाद चाहे अमजद ने कितनी भी सकारात्मक भूमिकाएं निभाई हों, दर्शकों के मन में उनकी पहचान अमर हो चुकी थी हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार खलनायक के रूप में। इसी परंपरा को अमरीश पुरी ने भी खासी ऊंचाई दी। 1975 में 'शोले' के गब्बर सिंह ने हिंदी सिनेमा के इतिहास को पलट कर रख दिया। अमजद खान का यह किरदार ऐसा दुर्लभ उदाहरण है जहाँ खलनायक ही फिल्म की आत्मा बन गया। दिलचस्प यह है कि अमजद ने कई सकारात्मक भूमिकाएं भी निभाईं। लावारिस, योगी और 'धर्म कांटा' जैसी फिल्मों में वे खलनायक नहीं बने, लेकिन दर्शक उन्हें हमेशा उस खलनायक के रूप में याद करते हैं जिसने डर को एक संवाद में बदल दिया। अमरीश पुरी 'मिस्टर इंडिया' के मोगैंबो से लेकर 'परदेस' या 'नायक' तक, उनके किरदार भारतीय और वैश्विक दोनों स्तरों पर ताकत और भय का प्रतीक बने। उनकी गूंजती आवाज़ और सख़्त उपस्थिति ने खलनायक को ऑरा दिया। इतना ही नहीं 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' में उन्होंने वही रौब एक बदले हुए भाव में दिखाया, जहां बुराई के पीछे मानवीय भावनाएं थीं। अमरीश पुरी शायद पहले भारतीय अभिनेता थे जिन्होंने यह दिखाया कि खलनायक भी नैतिक या भावनात्मक जटिलता वाला इंसान हो सकता है।
     1990 के दशक के बाद सिनेमा बदलने लगा। दर्शक अब एकदम अच्छे या एकदम बुरे पात्रों को नहीं, बल्कि ‘ग्रे’ शेड वाले चरित्रों को ज्यादा स्वीकार करने लगे। जीवन की जटिलता पर्दे तक पहुंच गई। अजय देवगन इस दौर के ऐसे नायक बने जिन्होंने खलनायकी और नायकत्व की सीमाओं को मिटा दिया। दीवानगी, खाकी, और 'हम दिल दे चुके सनम' में उनके भीतर का एंटी-हीरो समाज की जटिलता का प्रतीक बन गया  एक ऐसा इंसान जो सही और गलत के बीच झूलता है। इसके बाद आधुनिक सिनेमा के दो चेहरे इस धारा को आगे बढ़ाते हैं अक्षय खन्ना और बॉबी देओल। अक्षय खन्ना का अभिनय संवेदनशीलता और ठंडे करिश्मे का संगम है। रेस, इत्तेफाक और 'धुरंधर' जैसे किरदारों में उन्होंने दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर किया कि खलनायक हमेशा हिंसक नहीं होता कभी-कभी वह बौद्धिक रूप से खतरनाक होता है। वह सिनेमा के ‘मॉडर्न विलेन’ हैं स्टाइलिश, विचारवान और रहस्यमय। दूसरी ओर, बॉबी देओल ने ‘मौन के आतंक’ को साकार किया। 'आश्रम' में बाबा निराला और 'एनिमल' में उनका खामोश, अनकहा खलनायक दर्शकों के भीतर भय और आकर्षण दोनों पैदा करता है। इन किरदारों का विरोधाभास यह है कि वे बुरे हैं, पर मनुष्य भी हैं टूटी हुई आत्माएं, जो हिंसा में अपने अस्तित्व की तलाश करती हैं।
    हर युग का खलनायक उस समय के समाज का भावात्मक आईना होता है। 1950-60 में वह सत्ता और संपत्ति के भ्रष्ट प्रतीक थे। 1970–80 में वह व्यवस्था-विरोधी आम आदमी का गुस्सा बन गया। 2000 के बाद उसने मानवीय अंतर्विरोधों का चेहरा धारण कर लिया। अब दर्शक खलनायक से सिर्फ नफरत नहीं करता, बल्कि उसकी कहानी समझना चाहता है। यह बदलाव हमारी सामाजिक चेतना की परिपक्वता को भी दर्शाता है, जहां अच्छाई और बुराई के बीच की दीवारें धुंधली हो चुकी हैं। किसी अभिनेता के लिए सबसे कठिन काम है। बिना सहानुभूति कमाए प्रभाव पैदा करना। यही खलनायकी की कसौटी है। केएन सिंह की बौद्धिकता, प्राण की अदाओं का आतंक, अजीत की ठसक, अमजद ख़ान की संवाद अवधारणा, अमरीश पुरी का ग्लोबल रौब, अक्षय खन्ना की सधी हुई बुद्धिमत्ता और बॉबी देओल की भावनात्मक ठंडक ये सब मिलकर दिखाते हैं कि हिंदी सिनेमा की सबसे गहरी यादें खलनायकों की बदौलत ही बनी हैं। वैसे यह लिस्ट डैनी, रंजीत, प्रेम चोपड़ा और गुलशन ग्रोवर जैसे नामों के बिना अधूरी है। 
    बुराई में छुपी अभिनय की ऊंचाई का कोई अंत नहीं है। आज जब सिनेमा ‘यथार्थ’ की ओर लौट रहा है, तब भी दर्शक खलनायक की तलाश करता है। वह कहानी को गहराई देता है। उसने जो नैतिक प्रश्न उठाए, वो अंततः हमें सोचने पर मजबूर करे। हीरो अस्थायी मोह पैदा करता है; खलनायक स्थायी स्मृति। शायद यही सिनेमा की सबसे बड़ी सच्चाई है, कि हर अच्छी कहानी को एक सशक्त खलनायक की ज़रूरत होती है। केएन सिंह से लेकर बॉबी देओल और अक्षय खन्ना तक, इन कलाकारों ने दिखाया कि अभिनय की असली ऊंचाई नायकत्व में नहीं, बल्कि खलनायकी की परतों में छिपी होती है जहां नफ़रत और करुणा, दोनों का स्वर एक साथ गूंजता है।
--------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

No comments: