हिंदी सिनेमा के इतिहास में 1970 का दशक सिर्फ फिल्मों का दौर नहीं था, बल्कि यह बदलाव, टकराव और स्टारडम की नई परिभाषा लिखने वाला समय था। एक तरफ राजेश खन्ना का जादू था, जिन्हें भारत का पहला सुपरस्टार कहा गया, दूसरी तरफ अमिताभ बच्चन का उभरता व्यक्तित्व, जिसने धीरे-धीरे न सिर्फ दर्शकों का स्वाद बदला बल्कि सिनेमा के नायक की छवि ही बदल दी। 1973 से 1978 के बीच आई अमिताभ बच्चन की लगातार सफल फिल्मों ने वह परिदृश्य तैयार किया, जिसने राजेश खन्ना के एकछत्र राज को चुनौती दी और अंततः उसे पीछे छोड़ दिया। 'आनंद' में दोनों कलाकारों ने साथ काम जरूर किया, पर अभिनय की प्रतिद्वंदिता की शुरुआत यहीं से हुई थी। इसके बाद आई 'नमक हराम' से दोनों के संबंध ऐसे बिगड़े कि दोनों ने फिर कभी साथ काम नहीं किया। खास बात यह कि रोमांस के बेताज बादशाह राजेश खन्ना को गुस्सैल अमिताभ बच्चन ने हरा दिया।
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● हेमंत पाल
सिनेमा का दौर हमेशा बदलता रहा है। सौ साल से ज्यादा लंबे इतिहास की कहानी हर दशक में बदलती रही है। ऐसी ही बदलाव की एक कहानी 70 का दशक शुरू होते ही शुरू हुई थी, जब हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में राजेश खन्ना का ऐसा दबदबा था, जैसा पहले कभी किसी स्टार का नहीं रहा। उनकी फिल्मों आराधना, आनंद, अमर प्रेम ने उन्हें दर्शकों के दिलों का बादशाह बना दिया था। उनके हावभाव, मुस्कान और रोमांटिक अंदाज ने एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया। उस समय तक नायक का मतलब था संवेदनशील, प्रेम में डूबा हुआ और भावनात्मक रूप से जुड़ा किरदार। इसी दौर में एक संघर्षरत अभिनेता अमिताभ बच्चन भी थे, जिन्होंने अपने शुरुआती करियर में कई असफलताओं का सामना किया। लंबा कद, भारी आवाज़ और पारंपरिक हीरो जैसी छवि न होने के कारण उन्हें लगातार रिजेक्शन झेलना पड़ा। कहा जाता है कि उनकी शुरुआती 10–12 फिल्में फ्लॉप रहीं। पर यही असफलताएं उनके भीतर उस तीव्रता को जन्म दे रही थीं, जो आगे चलकर ‘एंग्री यंग मैन’ की पहचान बनी।
● हेमंत पाल
सिनेमा का दौर हमेशा बदलता रहा है। सौ साल से ज्यादा लंबे इतिहास की कहानी हर दशक में बदलती रही है। ऐसी ही बदलाव की एक कहानी 70 का दशक शुरू होते ही शुरू हुई थी, जब हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में राजेश खन्ना का ऐसा दबदबा था, जैसा पहले कभी किसी स्टार का नहीं रहा। उनकी फिल्मों आराधना, आनंद, अमर प्रेम ने उन्हें दर्शकों के दिलों का बादशाह बना दिया था। उनके हावभाव, मुस्कान और रोमांटिक अंदाज ने एक पूरी पीढ़ी को प्रभावित किया। उस समय तक नायक का मतलब था संवेदनशील, प्रेम में डूबा हुआ और भावनात्मक रूप से जुड़ा किरदार। इसी दौर में एक संघर्षरत अभिनेता अमिताभ बच्चन भी थे, जिन्होंने अपने शुरुआती करियर में कई असफलताओं का सामना किया। लंबा कद, भारी आवाज़ और पारंपरिक हीरो जैसी छवि न होने के कारण उन्हें लगातार रिजेक्शन झेलना पड़ा। कहा जाता है कि उनकी शुरुआती 10–12 फिल्में फ्लॉप रहीं। पर यही असफलताएं उनके भीतर उस तीव्रता को जन्म दे रही थीं, जो आगे चलकर ‘एंग्री यंग मैन’ की पहचान बनी।
1973 में आई फिल्म 'जंजीर' ने इस कहानी को पलट दिया। इस फिल्म में अमिताभ बच्चन का पुलिस अधिकारी ‘विजय’ एक ऐसा किरदार था, जो व्यवस्था से नाराज़ था, अन्याय के खिलाफ खड़ा था और भावनाओं से ज्यादा क्रोध से संचालित था। यह किरदार उस समय के सामाजिक माहौल से सीधा जुड़ा हुआ था एक ऐसा भारत जो बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और असंतोष से जूझ रहा था। 'जंजीर' की सफलता के बाद उसी साल 'नमक हराम' आई, जिसमें राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन साथ नजर आए। यह फिल्म सिर्फ कहानी के लिए नहीं, बल्कि दोनों सितारों के बीच की अदाकारी की टक्कर के लिए याद की जाती है। फिल्म में राजेश खन्ना मुख्य भूमिका में थे, लेकिन अमिताभ बच्चन की गंभीर और प्रभावशाली उपस्थिति ने दर्शकों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। यही वह मोड़ था, जहां से इंडस्ट्री के समीकरण बदलने लगे। इसके बाद 'अभिमान' ने अमिताभ के अभिनय की गहराई को दिखाया। यह फिल्म रिश्तों में अहंकार और असुरक्षा की कहानी थी, जिसमें उन्होंने एक ऐसे पति का किरदार निभाया, जो अपनी पत्नी की सफलता से असहज हो जाता है। इस तरह के जटिल किरदारों ने यह साबित किया कि अमिताभ सिर्फ एक्शन हीरो नहीं, बल्कि एक सक्षम अभिनेता भी हैं।
1974 और 1975 के बीच मजबूर, बेनाम और 'कसौटी' जैसी फिल्मों ने उनके स्टारडम को मजबूती दी। इन फिल्मों में उन्होंने थ्रिलर, ड्रामा और इमोशन का ऐसा मिश्रण पेश किया, जिसने उन्हें हर वर्ग के दर्शकों का पसंदीदा बना दिया। फिर आया 1975, वह साल जिसने हिंदी सिनेमा को हमेशा के लिए बदल दिया। 'दीवार' में अमिताभ बच्चन का संवाद 'आज खुश तो बहुत होगे तुम' सिर्फ एक डायलॉग नहीं था, बल्कि उस दौर के गुस्से की आवाज़ बन गया। इस फिल्म में उनका किरदार एक ऐसे युवक का था, जो गरीबी और अन्याय से लड़ते-लड़ते अपराध की दुनिया में चला जाता है। उसी साल 'शोले' रिलीज हुई, जो भारतीय सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित फिल्मों में गिनी जाती है। इस फिल्म में अमिताभ का ‘जय’ शांत, गंभीर और संतुलित था, लेकिन उनकी मौजूदगी बेहद प्रभावशाली रही। शोले ने उन्हें एक ऐसे स्टार के रूप में स्थापित कर दिया, जो बड़े कैनवास पर भी उतना ही प्रभावी है।
इसी दौर में मिली और 'जमीर' जैसी फिल्मों ने उनकी संवेदनशीलता और अभिनय की विविधता को भी सामने रखा। यह वह समय था, जब राजेश खन्ना का रोमांटिक हीरो वाला इमेज धीरे-धीरे पुराना पड़ने लगा था। 1976 और 1977 में अमिताभ बच्चन ने अपने करियर को और ऊंचाई दी। 'दो अनजाने' में बदले की कहानी, 'हेरा फेरी' में कॉमेडी और 'अमर अकबर एंथनी' में मनोरंजन का पूरा पैकेज इन फिल्मों ने उन्हें हर शैली में सफल साबित किया। खासकर 'अमर अकबर एंथनी' ने उन्हें मास एंटरटेनर का राजा बना दिया। इसी दौरान परवरिश, खून पसीना और अदालत जैसी फिल्मों ने उनकी लगातार हिट फिल्मों की श्रृंखला को और मजबूत किया। इसके विपरीत, राजेश खन्ना को अपनी फिल्मों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा था। उनका पारंपरिक रोमांटिक अंदाज अब बदलते समाज के साथ मेल नहीं खा रहा था।
1978 वह साल था, जिसने इस बदलाव को पूरी तरह स्थापित कर दिया। 'डॉन' में अमिताभ बच्चन का डबल शेड वाला किरदार एक तरफ खतरनाक अपराधी और दूसरी तरफ भोला-भाला आम आदमी ने दर्शकों को चौंका दिया। 'त्रिशूल' में उन्होंने एक ऐसे बेटे का किरदार निभाया, जो अपने पिता से बदला लेने के लिए पूरी व्यवस्था को चुनौती देता है। यह किरदार भी उस दौर के सामाजिक गुस्से का प्रतीक था। 'कसमे वादे' और 'मुकद्दर का सिकंदर' ने उनके स्टारडम को चरम पर पहुंचा दिया। 'मुकद्दर का सिकंदर' में उनका दुखांत अंत दर्शकों को भावुक कर गया और यह फिल्म उस साल की सबसे बड़ी हिट साबित हुई। इन फिल्मों की लगातार सफलता ने राजेश खन्ना को यह एहसास दिला दिया कि हिंदी सिनेमा का स्वाद बदल चुका है। अब दर्शक सिर्फ रोमांस नहीं, बल्कि संघर्ष, विद्रोह और यथार्थ भी देखना चाहते थे। राजेश खन्ना की गिरावट का सबसे बड़ा कारण यह था कि उन्होंने इस बदलाव को समय रहते स्वीकार नहीं किया।
जहां अमिताभ बच्चन समाज के गुस्से का चेहरा बन गए, वहीं राजेश खन्ना अपनी पुरानी छवि में ही बने रहे। यह बदलाव सिर्फ दो सितारों के बीच की प्रतिस्पर्धा नहीं था, बल्कि यह भारतीय समाज के बदलते मनोविज्ञान का प्रतिबिंब था। 1970 के दशक में आर्थिक संकट, बेरोजगारी और आपातकाल जैसी घटनाओं ने आम आदमी के भीतर असंतोष भर दिया था। अमिताभ बच्चन का ‘एंग्री यंग मैन’ उसी असंतोष की अभिव्यक्ति था। अंततः 1978 के बाद हिंदी सिनेमा में एक नया युग शुरू हुआ, जिसमें अमिताभ बच्चन को ‘वन मैन इंडस्ट्री’ कहा जाने लगा। यह वह दौर था, जब एक अभिनेता पूरी फिल्म इंडस्ट्री की दिशा तय कर रहा था। इस पूरी कहानी को अगर एक लाइन में समझा जाए, तो यह सिर्फ स्टारडम का बदलाव नहीं था, बल्कि यह उस समय के समाज, दर्शकों और सिनेमा के रिश्ते का पुनर्निर्माण था। अमिताभ बच्चन ने जहां नए दौर की नींव रखी, वहीं राजेश खन्ना उस पुराने दौर के प्रतीक बनकर रह गए, एक ऐसा दौर जो कभी खत्म नहीं होता, लेकिन समय के साथ पीछे जरूर छूट जाता है।
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