Tuesday, April 28, 2026

सिनेमा में राम का चेहरा और विवाद


    भारतीय सिनेमा में पौराणिक कथाएं हमेशा सिर्फ मनोरंजन नहीं रहीं, वे आस्था, परंपरा और सांस्कृतिक पहचान का आईना भी रही हैं। जब भी 'रामायण' जैसी किसी भव्य फिल्म की घोषणा होती है, तो उसके साथ अपेक्षाओं और विवादों का एक लंबा सिलसिला भी जुड़ जाता है। फ़िलहाल रणबीर कपूर को राम के रूप में देखने पर जो बहस छिड़ी, वह नई नहीं है। इसकी जड़ें सिनेमा के शुरुआती दौर, यानी ब्लैक एंड व्हाइट युग तक जाती हैं। राम, कृष्ण या किसी भी पौराणिक पात्र को निभाना सिर्फ एक भूमिका नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक जिम्मेदारी बन जाता है। यही कारण है कि जब रणबीर कपूर जैसे अभिनेता को भगवान राम के रूप में कास्ट किया जाता है, तो दर्शक उसे अभिनेता नहीं, आदर्श पुरुष के रूप में देखने लगते हैं। इसी अपेक्षा और वास्तविकता के बीच का अंतर विवाद को जन्म देता है।
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● हेमंत पाल

     भारतीय सिनेमा में रामायण जैसे पौराणिक महाकाव्यों को चित्रित करने की परंपरा शुरुआती दौर से चली आ रही है। लेकिन, हर दौर से ऐसे प्रयास विवादों की भेंट चढ़ते रहे। नितेश तिवारी की आने वाली मेगा बजट फिल्म 'रामायण' के टीजर से उपजे विवाद इसकी ताजा मिसाल हैं, जहां रणबीर कपूर को 'राम' बनाने पर उनके पुराने बयानों और फ़िल्मी लुक को लेकर बहस छिड़ गई। ब्लैक एंड व्हाइट दौर से लेकर आज तक आस्था, व्याख्या और कलाकारों की पृष्ठभूमि ने इन विवादों को और गहरा दिया। शुरुआती सालों में पौराणिक फिल्मों का विशेष स्थान था। 1930 से 1950 के बीच बनी फिल्मों में राम, कृष्ण और शिव जैसे किरदारों को निभाने वाले कलाकारों को दर्शक सचमुच देवता मान बैठते थे। फिल्म 'राम राज्य' इसका सबसे बड़ा उदाहरण कहा जाता है। इस फिल्म में प्रेम अदीब ने राम की भूमिका निभाई थी। कहा जाता है कि लोग उन्हें सचमुच भगवान मानकर उनके चरण छूते थे। महात्मा गांधी ने भी इस फिल्म को देखा था जो अपने आप में इसकी सांस्कृतिक स्वीकार्यता को दर्शाता है। जब किसी अभिनेता की निजी जिंदगी में कोई असंगत बात सामने आती, तो लोग उसे उस पवित्र छवि के खिलाफ मानते। 
     विवाद का बीज तब से आज तक वही है कि देवता का किरदार निभाने वाला व्यक्ति खुद कितना ‘देवत्व’ रखता है! 1987 में 'रामायण' के प्रसारण ने इस भाव को चरम पर पहुंचा दिया। अरुण गोविल राम के रूप में इतने लोकप्रिय हुए कि लोग उन्हें सड़कों पर भी भगवान की तरह पूजते थे। यही वह दौर था, जिसने एक फिक्स्ड इमेज बना दी। राम का चेहरा कैसा होना चाहिए, उनका व्यवहार कैसा होना चाहिए। आज जब रणबीर कपूर को इस भूमिका में देखा जाता है, तो तुलना अनिवार्य हो जाती है। भारतीय सिनेमा की पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' (1913) से ही पौराणिक किरदारों पर ऐसा विवाद शुरू हो गया था, जहां सत्यनिष्ठा की कथा को लेकर धार्मिक समूहों ने सत्यनिष्ठा पर सवाल उठाए और मामला अदालत तक पहुंचा। 1920-30 के दशक में रामायण प्रेरित फिल्में जैसे 'वीर रामायणम' (1923) आईं, लेकिन इनकी व्याख्या पर पारंपरिक विद्वानों ने आपत्ति जताई। क्योंकि, महाकाव्य की घटनाओं को नाटकीय रूप देने को अपमान माना गया। ब्लैक एंड व्हाइट दौर में 'भक्त विदुर' (1921) को ब्रिटिश सरकार ने बैन कर दिया था, क्योंकि विदुर का चरित्र महात्मा गांधी से मिलता-जुलता था, जो राजनीतिक संवेदनशीलता का उदाहरण था।
   1943 में रिलीज हुई 'राम राज्य' एक सफल रामायण-अनुकूलन फिल्म थी। लेकिन, कुछ धार्मिक समूहों ने राम-राज्य की अवधारणा को राजनीतिक रूप देने का आरोप लगाया। 1948 की 'राम राज्य' (विजय भट्ट निर्देशित) में प्रेम अधिकारी राम बने, लेकिन सती प्रथा या सीता के त्याग जैसे दृश्यों पर सामाजिक बहस छिड़ी। इस दौर में पौराणिक फिल्में लोकप्रिय तो हुईं, पर आस्था के नाम पर सेंसरशिप और सामाजिक बहिष्कार आम थे, जो सिनेमा को धार्मिक मान्यताओं के दायरे में बांधने का प्रयास था। ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों में भी अभिनेताओं का चयन आस्था से जुड़ा रहा। 1987 के रामानंद सागर के धारावाहिक 'रामायण' ने अरुण गोविल को अमर कर दिया। लेकिन, सीता के धरती में समा जाने के बाद आगे की कथा दिखाने से इनकार पर दर्शकों ने विरोध किया, जो 10 साल चला। 'आदि पुरुष' (2023) में प्रभास के राम के किरदार और वीएफएक्स पर भारी विवाद हुआ था। यहां तक कि फिल्म के डायलॉग तक बदलने पड़े और बॉक्स ऑफिस पर भी फिल्म को भारी असफलता मिली। यहां तक कि सीता को 'भारत की बेटी' दिखाने पर नेपाल में फिल्म पर बैन की मांग उठी, जो सीता-जन्मस्थली विवाद को उजागर करता है।
वर्तमान 'रामायण' का विवाद-केंद्र
     नितेश तिवारी की 'रामायण' (बजट 4000 करोड़) का टीजर हनुमान जयंती पर रिलीज होने से पहले ही विवादास्पद हो गया। रणबीर कपूर के राम लुक पर सुनील लहरी (पुराने लक्ष्मण) ने कहा कि 'एनिमल' की क्रूरता के बाद उनमें राम की मासूमियत नहीं है। रणबीर का पुराना 'बीफ लवर' वाला बयान भी वायरल हुआ, जिस पर सोशल मीडिया ने उन्हें अयोग्य ठहराया। फिल्म का टीजर भारत से पहले अमेरिका में पहले दिखाए जाने पर भी भारतीय दर्शकों ने भावनाओं से ठेस पहुंचने का आरोप लगाया। वीएफएक्स और मोशन कैप्चर पर सवाल उठे। फिल्मकार को 'आदि पुरुष' जैसे फूहड़ प्रयोग से सबक लेने की मांग की गई। सद्गुरु ने रणबीर पर अतीत का हवाला देकर सवाल किया, लेकिन यश (रावण) की प्रशंसा की। रणबीर ने स्वीकारा कि भूमिका से पहले इनकार किया था, लेकिन पिता बनने और निर्देशक के विजन से वे राजी हुए और उन्होंने मांसाहार छोड़ दिया। 
    आज की ‘रामायण’ सिर्फ कहानी नहीं, एक विजुअल स्पेक्टेकल बनने जा रही है। मोशन कैप्चर, एआई और हाई-एंड वीएफएक्स का उपयोग इसे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाता है। लेकिन, भारतीय दर्शक अभी भी भावनात्मक जुड़ाव को तकनीकी चमत्कार से ऊपर रखते हैं। यही कारण है कि 'आदि पुरुष' में तकनीक होने के बावजूद भावनात्मक कनेक्ट की कमी खल गई। फिल्म की कास्ट में साई पल्लवी सीता, सनी देओल हनुमान, रवि दुबे लक्ष्मण बने हैं। फिल्म का पहला पार्ट दिवाली 2026 और पार्ट-2 की अगले साल रिलीज संभावित है।
    ब्लैक एंड व्हाइट दौर में फिल्म 'कर्मा' (1933) के सीन पर भी बवाल हुआ था, वहीं पेरियार की 'सच्ची रामायण' पर बैन लगा दिया गया था। 'पद्मावत' में सती-गौरवण पर विवाद आधुनिक उदाहरण है। ये विवाद आस्था बनाम अभिव्यक्ति की टकराहट दिखाता हैं। रामानंद सागर के पुत्र मोती सागर ने नई 'रामायण' से तुलना को गलत ठहराया। रणबीर कपूर के मामले में विवाद का एक बड़ा कारण उनकी पिछली फिल्मों की छवि भी है। 'एनिमल' जैसी फिल्म में उनके आक्रामक किरदार को देखकर दर्शकों को उनके 'मर्यादा पुरुषोत्तम' के किरदार में देखना भी कठिन लग रहा है। लेकिन, यही अभिनय की मूल प्रकृति है। एक कलाकार कई रूपों में ढल सकता है। इस पर सद्गुरु का दृष्टिकोण उल्लेखनीय है, जिसमें वे कहते हैं कि अभिनेता को उसके पिछले किरदारों से बांधना उचित नहीं है। ये विवाद सिनेमा को सेंसरशिप और सोशल मीडिया ट्रोलिंग के जाल में फंसा देते हैं।
    ब्लैक एंड व्हाइट से आज के डिजिटल युग तक, पौराणिक किरदारों की व्याख्या आस्था की कसौटी पर कसी जाती है। नितेश तिवारी जैसे निर्देशक 'दंगल' की सफलता से प्रेरित होकर भव्यता लाएं, तो दर्शक स्वीकार करेंगे। सिनेमा को धार्मिक ग्रंथों से प्रेरणा लेनी चाहिए, लेकिन संवेदनशीलता भी बनाए रखना होगा। दरअसल, आज का दर्शक दो हिस्सों में बंटा है। एक वर्ग परंपरा और आस्था को प्राथमिकता देता है, दूसरा वर्ग तकनीक और नए प्रयोगों को स्वीकार करता है। नमित मल्होत्रा और नितेश तिवारी की चुनौती यही है, कि वे इन दोनों के बीच संतुलन स्थापित करें। इतिहास गवाह है कि हर दौर में पौराणिक किरदारों को लेकर विवाद हुए। चाहे वह राम राज्य हो, रामायण हो या आज की 'रामायण।' समय ही तय करता है कि कौन-सा चित्रण दर्शकों के दिल में बसता है। हो सकता है कि आज जिस रणबीर कपूर को लेकर विवाद हो रहा है, वही आने वाले समय में राम के एक नए, आधुनिक और स्वीकार्य चेहरे के रूप में स्थापित हो जाएं। सिनेमा बदल रहा है, तकनीक बदल रही है, लेकिन आस्था का मूल भाव वही है और शायद यही इस बहस की असली खूबसूरती भी! इस विवाद का अंत तभी होगा, जब दर्शक रणबीर कपूर को 'रामायण' में देखेंगे। तभी पता चलेगा कि दर्शकों ने उन्हें 'मर्यादा पुरुषोत्तम' के रूप में स्वीकारा या रणबीर कपूर की तरह ही देखा!   
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