Tuesday, April 28, 2026

अब छुपकर नहीं देखी जाती ‘ए’ फ़िल्में

      सिनेमा में ‘ए’ सर्टिफिकेट का नाम आते ही कभी एक सीमित, संकोच से भरी और विवादित छवि सामने आती थी। ऐसी फिल्में जिन्हें परिवार के साथ देखने योग्य नहीं माना जाता था। इन फिल्मों को देखने के लिए दर्शक अक्सर झिझकते थे या छुपकर सिनेमाघरों का रुख करते थे। लेकिन, समय के साथ दर्शकों की सोच, सिनेमा की भाषा और समाज की संवेदनशीलता में बड़ा बदलाव आया। आज वही ‘ए’ सर्टिफिकेट फिल्में न सिर्फ खुले तौर पर देखी जा रही हैं, बल्कि बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए रिकॉर्ड भी बना रही। यह बदलाव केवल सिनेमा का नहीं, बल्कि दर्शकों की मानसिकता में आए गहरे परिवर्तन का भी संकेत है।
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- हेमंत पाल

   फिल्म कई तरह की होती है। उन्हीं में से सामाजिक यानी सभी के देखने योग्य और 'ए' सर्टिफ़िकेट वाली फ़िल्में भी हैं, जिसके दर्शकों का एक अलग वर्ग होता है। फिल्म उद्योग में लंबे समय तक ‘ए’ श्रेणी की फिल्मों को लेकर एक अलग ही धारणा बनी रही। इन्हें मुख्यधारा से अलग, सीमित और अक्सर विवादास्पद माना जाता था। ‘ए’ सर्टिफिकेट का मतलब आमतौर पर अश्लीलता, अत्यधिक हिंसा या ऐसे विषयों से लगाया जाता था, जिन्हें समाज सहज रूप से स्वीकार नहीं करता था। यही कारण था कि इन फिल्मों का दर्शक वर्ग सीमित रह जाता था। परिवार के साथ फिल्म देखने की भारतीय परंपरा ने भी इस दूरी को और बढ़ाया। ऐसे में जो लोग इन फिल्मों में रुचि रखते थे, वे भी अक्सर इसे सार्वजनिक रूप से स्वीकार नहीं करते थे। सिनेमाघरों में इन फिल्मों के शो कम होते थे और इनकी कमाई भी अपेक्षाकृत सीमित रहती थी। किंतु, यह तस्वीर धीरे-धीरे बदलने लगी। समाज के बदलते स्वरूप, डिजिटल युग के विस्तार और वैश्विक कंटेंट की पहुंच ने दर्शकों की सोच को व्यापक बनाया। अब दर्शक केवल हल्के-फुल्के मनोरंजन तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि वे ऐसी कहानियों की तलाश में हैं जो उन्हें झकझोरें, सोचने पर मजबूर करें और वास्तविकता के करीब हो। यही वह मोड़ था जहां ‘ए’ सर्टिफिकेट फिल्मों ने अपनी नई पहचान बनानी शुरू की।
   ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीय सिनेमा में वयस्क फिल्मों का एक लंबा और उतार-चढ़ाव भरा सफर रहा है। सत्तर और अस्सी के दशक में 'ए' रेटिंग वाली फिल्मों को अक्सर सामाजिक रूप से हेय दृष्टि से देखा जाता था। उस दौर में हिंसा या बोल्ड दृश्यों वाली फिल्मों को केवल एक विशेष वर्ग के दर्शकों तक सीमित माना जाता था। राज कपूर की 'सत्यम शिवम सुंदरम' जैसी फिल्मों ने जब कलात्मकता और वयस्क सामग्री के बीच की रेखा को छुआ, तो उन्हें लेकर काफी विवाद हुए। हालांकि, नब्बे के दशक के उत्तरार्ध और नई सहस्राब्दी की शुरुआत में 'मर्डर' और 'जिस्म' जैसी फिल्मों ने वयस्क श्रेणी में भी व्यावसायिक संभावनाओं के द्वार खोले। फिर भी, वे फिल्में आज के दौर की तुलना में एक छोटे दायरे में सिमटी हुई थीं। उस समय का दर्शक वर्ग डिजिटल क्रांति से अछूता था और सिनेमाघरों में ऐसी फिल्में देखने जाना एक प्रकार की हिचक पैदा करता था। लेकिन, समकालीन समय में सूचना तकनीक के विस्तार और वैश्विक सिनेमा तक आसान पहुंच ने भारतीय दर्शकों की परिपक्वता के स्तर को बढ़ाया है, जिसका सीधा असर अब बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों पर दिखाई दे रहा है।
     इस बदलाव की एक महत्वपूर्ण कड़ी 'उड़ता पंजाब' साबित हुई। नशे की समस्या जैसे गंभीर और असहज विषय को जिस ईमानदारी से इस फिल्म में दिखाया गया, उसने दर्शकों को यह एहसास कराया कि सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज का आईना भी हो सकता है। सेंसर बोर्ड से ‘ए’ सर्टिफिकेट मिलने के बावजूद फिल्म को सराहना और व्यावसायिक सफलता दोनों मिलीं। इसके बाद धीरे-धीरे बड़े सितारों ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाया। 'कबीर सिंह' इसका एक प्रमुख उदाहरण है। यह फिल्म अपने किरदारों की जटिलता और विवादास्पद व्यवहार के कारण चर्चा में रही। इसके बावजूद दर्शकों ने इसे बड़े पैमाने पर स्वीकार किया। इस फिल्म की सफलता ने यह स्पष्ट कर दिया कि ‘ए’ सर्टिफिकेट अब दर्शकों को सिनेमाघरों तक आने से नहीं रोकता, बल्कि अगर कहानी में दम हो, तो वह हर बाधा को पार कर सकती है। यह बदलाव अपने चरम पर तब पहुंचा, जब 'एनिमल' जैसी फिल्में सामने आईं। इस फिल्म ने हिंसा, मनोवैज्ञानिक जटिलताओं और रिश्तों के अंधेरे पहलुओं को बेहद तीव्र और अनगढ़ रूप में प्रस्तुत किया। पारंपरिक सिनेमा से हटकर इसकी शैली और कथानक ने दर्शकों को एक अलग अनुभव दिया। आलोचनाओं और विवादों के बावजूद फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अभूतपूर्व सफलता हासिल की। यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि आज का दर्शक जोखिम लेने वाले सिनेमा को भी पूरी तरह स्वीकार कर रहा है।
    इस क्रम में 'द केरल स्टोरी' और 'द कश्मीर फाइल्स' जैसी फिल्मों ने यह साबित किया कि संवेदनशील और विवादास्पद विषय भी दर्शकों को आकर्षित करते हैं। इन फिल्मों ने समाज और इतिहास के ऐसे पहलुओं को सामने रखा, जिन पर अक्सर खुलकर चर्चा नहीं होती थी। दर्शकों ने न केवल इन फिल्मों को देखा, बल्कि इनके साथ भावनात्मक रूप से भी जुड़ाव महसूस किया। इनकी बॉक्स ऑफिस सफलता इस बात का प्रमाण है कि अब दर्शक कठिन और असहज विषयों से दूर नहीं भागते। दर्शक अब फिल्मों में केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि सच्चाई, गहराई और विविधता भी चाहता है। यही कारण है कि ‘ए’ सर्टिफिकेट फिल्में अब एक नए आत्मविश्वास के साथ बनाई जा रही हैं। 'ओएमजी 2' इस बदलाव का एक अलग और सकारात्मक उदाहरण है। यह फिल्म न तो अत्यधिक हिंसक थी और न पारंपरिक अर्थों में ‘बोल्ड’, लेकिन इसके विषय की संवेदनशीलता के कारण इसे ‘ए’ सर्टिफिकेट मिला। इसके बावजूद फिल्म ने दर्शकों के बीच अच्छी पकड़ बनाई और व्यावसायिक रूप से सफल रही। इसने यह साबित किया कि ‘ए’ सर्टिफिकेट केवल एक सीमा नहीं, बल्कि एक अवसर भी हो सकता है, ऐसे विषयों को प्रस्तुत करने का, जो समाज के लिए महत्वपूर्ण हैं।
    हाल के सालों में 'धुरंधर 2' जैसी फिल्मों ने तो इस धारणा को पूरी तरह बदल दिया कि ‘ए’ सर्टिफिकेट फिल्में केवल सीमित कमाई कर सकती हैं। इस तरह की फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर नए रिकॉर्ड स्थापित किए हैं और यह दिखाया कि यदि कंटेंट मजबूत हो, तो दर्शक हर तरह की फिल्म को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। अब यह श्रेणी केवल प्रयोगात्मक या सीमित नहीं रह गई, बल्कि मुख्यधारा का हिस्सा बन चुकी है। हालांकि, यह बदलाव अचानक नहीं आया। इसके बीज पहले ही बोए जा चुके थे। 'सत्या' और 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' जैसी फिल्मों ने अपने समय में ही यह संकेत दे दिया था कि दर्शक मजबूत कहानी और यथार्थवादी प्रस्तुति को पसंद करते हैं, भले ही वह ‘ए’ सर्टिफिकेट के साथ क्यों न आए। इन फिल्मों ने आने वाली पीढ़ी के फिल्मकारों को यह भरोसा दिया कि वे बिना किसी समझौते के अपनी कहानियां कह सकते हैं। आज की स्थिति यह है कि दर्शक अब ‘ए’ सर्टिफिकेट को किसी नकारात्मक नजरिए से नहीं देखते। पहले जहां लोग ऐसी फिल्मों को छुपकर देखते थे, वहीं अब वे खुलकर सिनेमाघरों में जाकर इन्हें देखते हैं, इन पर चर्चा करते हैं और सोशल मीडिया पर अपनी राय भी साझा करते हैं। यह बदलाव केवल देखने के तरीके में नहीं, बल्कि सोच और स्वीकृति में आया है।
   वयस्क श्रेणी की सफलता का शिखर तब देखने को मिला, जब रणबीर कपूर की फिल्म 'एनिमल' परदे पर उतरी। इस फिल्म ने हिंसक चित्रण और विवादास्पद संवादों के कारण खूब सुर्खियां बटोरीं। पूर्णतः वयस्क सामग्री होने के बाद भी 'एनिमल' ने बॉक्स ऑफिस पर सुनामी ला दी। 917.82 करोड़ की कमाई का विश्वव्यापी संग्रह यह बताने के लिए पर्याप्त है, कि आज का सिनेमाई बाजार कितना विशाल हो गया। संदीप रेड्डी वांगा ने इस फिल्म के माध्यम से साबित किया कि एक निर्देशक अपनी दृष्टि को बिना किसी काट-छांट के पेश कर सकता है और दर्शक उसे हाथों-हाथ लेंगे। इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए 'धुरंधर' और उसकी अगली कड़ी 'धुरंधर 2' ने तो कमाई के सारे पुराने रिकॉर्ड ही ध्वस्त कर दिए। 'धुरंधर' ने जहां करीब 1,500 करोड़ रुपए का कारोबार किया था, वहीं 'धुरंधर 2' ने रिलीज के महज एक महीने के भीतर 1,737.74 करोड़ का आंकड़ा पार कर लिया। ये आंकड़े बताते है, कि वयस्क फिल्में अब केवल एक वर्ग विशेष की पसंद नहीं रह गई, बल्कि वे व्यापक जनसमूह तक अपनी पहुंच बना चुकी हैं।
      ‘ए’ श्रेणी की फिल्मों ने अपने दम पर यह साबित कर दिया कि यदि कहानी सशक्त हो, तो वह हर बाधा को पार कर सकती है। एनिमल, द केरल स्टोरी, ओएमजी 2 और 'धुरंधर 2' जैसी फिल्मों की सफलता इस परिवर्तन का जीवंत प्रमाण है। आने वाले समय में यह प्रवृत्ति और मजबूत होने की संभावना है। दर्शक अब केवल मनोरंजन ही नहीं, बल्कि विचार और अनुभव भी चाहते हैं। ऐसे में ‘ए’ श्रेणी की फिल्में भारतीय सिनेमा को नई दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रहेंगी। यह कहा जा सकता है, कि ‘ए’ सर्टिफिकेट फिल्मों का यह उभार भारतीय सिनेमा के परिपक्व होने का संकेत है। अब फिल्म की सफलता उसके सर्टिफिकेट से नहीं, बल्कि उसकी कहानी, प्रस्तुति और भावनात्मक प्रभाव से तय होती है। दर्शक अब केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि अनुभव और विचार भी चाहते हैं। ऐसे में ‘ए’ श्रेणी की फिल्में सिनेमा को एक नई दिशा दे रही हैं, जहां सीमाएं टूट रही हैं और कहानियां अपने सबसे सच्चे रूप में सामने आ रही हैं। आने वाले समय में यह प्रवृत्ति और मजबूत होगी, और संभव है कि ‘ए’ सर्टिफिकेट की परिभाषा पूरी तरह बदल जाए, एक ऐसी पहचान के रूप में, जो साहस, सच्चाई और रचनात्मक स्वतंत्रता का प्रतीक हो।
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