Monday, July 13, 2026

प्राण से बॉबी देओल तक : परदे पर छवि बदलकर अमर हुए सितारे

   सिनेमा में किसी कलाकार की पहचान केवल उसके चेहरे या स्टारडम से नहीं, बल्कि उसकी अभिनय क्षमता से बनती है। कई अभिनेता ऐसे रहे हैं, जिन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक खास छवि के साथ की, लेकिन समय आने पर उसी छवि को तोड़कर नया इतिहास रच दिया। कोई रोमांटिक हीरो से खलनायक बना तो किसी ने खलनायक की छवि छोड़कर नायक या चरित्र अभिनेता के रूप में नई पहचान बनाई। आज इस परंपरा का सबसे चर्चित उदाहरण बॉबी देओल हैं, जिन्होंने अपने करियर की दूसरी पारी में ऐसी दमदार खलनायकी पेश की कि उनकी नई पहचान पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली बन गई।
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- हेमंत पाल

     हिंदी सिनेमा का इतिहास बताता है कि लंबे समय तक वही कलाकार याद रखे जाते हैं जो अपनी स्थापित छवि से बाहर निकलने का साहस करते हैं। एक ही तरह की भूमिकाओं में बंधा कलाकार धीरे-धीरे टाइप्ड हो जाता है। जबकि, नए किरदार उसे नई ऊंचाइयों तक ले जाते हैं। बदलते समय के साथ दर्शकों की पसंद भी बदली है और अब वे केवल आदर्श नायक नहीं, बल्कि जटिल, ग्रे-शेड वाले किरदारों को भी उतनी ही गंभीरता से स्वीकार करते हैं। बॉबी देओल का सफर इसी बदलाव की सबसे ताजा मिसाल है। वर्ष 1995 में फिल्म 'बरसात' से बॉलीवुड में कदम रखने वाले बॉबी अपनी नीली आंखों, घुंघराले बालों और मासूम मुस्कान के कारण जल्द ही युवाओं के पसंदीदा रोमांटिक हीरो बन गए। गुप्त, सोल्जर, बादल और 'बिच्छू' जैसी फिल्मों ने उन्हें एक सफल एक्शन और रोमांटिक स्टार के रूप में स्थापित किया। उनके हेयर स्टाइल और स्टाइल स्टेटमेंट युवाओं के बीच ट्रेंड बन गए। लेकिन, समय के साथ फिल्मों का मिजाज बदला और बॉबी देओल का करियर धीमा पड़ने लगा। कई वर्षों तक उन्हें वैसी सफलता नहीं मिली, जिसकी उम्मीद की जाती थी।
    आमतौर पर फिल्म उद्योग में ऐसा दौर किसी भी अभिनेता के करियर का अंत मानता है। लेकिन, बॉबी देओल ने इसे नई शुरुआत बना दिया। उन्होंने अपनी पूरी स्क्रीन इमेज बदलने का जोखिम उठाया। साल 2018 में 'रेस-3' से उनकी वापसी हुई, जहां पहली बार उन्होंने नकारात्मक छवि की झलक दिखाई। इसके बाद ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई प्रकाश झा की वेब सीरीज 'आश्रम' में बाबा निराला का किरदार उनके करियर का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। लालच, सत्ता, छल और क्रूरता से भरे इस चरित्र को उन्होंने इतनी सहजता से निभाया कि दर्शकों ने पहली बार उनके अभिनय का बिल्कुल अलग रूप देखा। शांत चेहरा, संयमित संवाद और आंखों के भावों से भय पैदा करने की उनकी क्षमता ने उन्हें नई पहचान दिलाई। 
     इसके बाद फिल्म 'एनिमल' में अबरार हक का किरदार उनके अभिनय जीवन का सबसे बड़ा पड़ाव बन गया। इस भूमिका में उनके संवाद बेहद कम थे, लेकिन उनकी मौजूदगी ही दर्शकों के लिए रोमांच और खौफ का कारण बन गई। बिना बोले केवल हावभाव और शारीरिक भाषा के सहारे उन्होंने ऐसा खलनायक रचा जिसकी चर्चा फिल्म के नायक के बराबर हुई। यही किसी अभिनेता की सबसे बड़ी सफलता मानी जाती है कि उसका नकारात्मक किरदार पूरी फिल्म की सबसे यादगार पहचान बन जाए। 'अल्फा' में भी उनका खतरनाक अंदाज यह साबित करता है कि बॉबी देओल ने अपनी दूसरी पारी को पूरी तरह अपने नाम कर लिया। अब इंतजार है रितिक रोशन के साथ आने वाली उनकी फिल्म 'बंदर' और वेब सीरीज 'आश्रम-4' का जिसमें बॉबी का नया चेहरा नजर आएगा।     
    बॉबी देओल इस परंपरा के पहले कलाकार नहीं हैं। हिंदी सिनेमा में कई ऐसे सितारे हुए जिन्होंने अपनी छवि बदलकर नई लोकप्रियता हासिल की। छवि बदलने की बात हो तो सबसे पहला नाम प्राण का आता है। एक समय ऐसा था जब परदे पर उनके आते ही दर्शकों के मन में नफरत पैदा हो जाती थी। उनकी खलनायकी इतनी प्रभावशाली थी कि लोग अपने बच्चों का नाम तक प्राण रखने से कतराते थे। लेकिन 'उपकार' में मलंग चाचा के सकारात्मक किरदार ने उनकी पूरी छवि बदल दी। इसके बाद वे चरित्र अभिनेता के रूप में उतने ही लोकप्रिय हुए जितने पहले खलनायक के रूप में थे। शत्रुघ्न सिन्हा ने भी अपने करियर की शुरुआत नकारात्मक भूमिकाओं से की थी। उनकी दमदार आवाज और प्रभावशाली व्यक्तित्व ने उन्हें अलग पहचान दिलाई, लेकिन बाद में वे सफल नायक बने और दर्शकों ने उन्हें दोनों रूपों में भरपूर प्यार दिया। इसी तरह विनोद खन्ना ने शुरुआती दौर में कई फिल्मों में विलेन की भूमिका निभाई, लेकिन बाद में वे हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय नायकों में शामिल हो गए और अमिताभ बच्चन के समानांतर खड़े नजर आए।
    शाहरुख खान की सफलता की कहानी भी इसी बदलाव का उदाहरण है। आज वे रोमांस के बादशाह माने जाते हैं, लेकिन उनके करियर की शुरुआती पहचान बाजीगर, डर और 'अंजाम' जैसे नकारात्मक किरदारों से बनी थी। उस दौर में जब बड़े अभिनेता खलनायक बनने से बचते थे, शाहरुख ने यह जोखिम उठाया और दर्शकों ने उन्हें हाथों-हाथ लिया। बाद में वही अभिनेता रोमांटिक हीरो के रूप में इतिहास रच गया। सैफ अली खान ने भी अपने करियर के शुरुआती वर्षों में रोमांटिक और हल्के-फुल्के किरदार निभाए। लेकिन, विशाल भारद्वाज की 'ओमकारा' में लंगड़ा त्यागी का किरदार उनके अभिनय जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। चालाक, ईर्ष्यालु और क्रूर चरित्र को उन्होंने जिस गहराई से निभाया, उसने उन्हें गंभीर अभिनेता के रूप में स्थापित कर दिया। संजय दत्त भी लंबे समय तक रोमांटिक और एक्शन स्टार रहे, लेकिन 'अग्निपथ' में कांचा चीना के रूप में उनका भयावह अवतार दर्शकों के लिए बिल्कुल नया था। गंजा सिर, भारी शरीर और डर पैदा करने वाली मुस्कान ने इस किरदार को यादगार बना दिया। बाद में 'केजीएफ चैप्टर-2' में अधीरा के रूप में उन्होंने एक बार फिर साबित किया कि खलनायक की भूमिका भी किसी नायक जितनी प्रभावशाली हो सकती है। खास बात यह कि संजय दत्त की एक फिल्म का नाम ही 'खलनायक' था, जिसमें उनका किरदार नायक का था।  

    अमजद खान का उदाहरण थोड़ा अलग है। 'शोले' में गब्बर सिंह का किरदार उन्हें हमेशा के लिए अमर बना गया। बाद में उन्होंने कई सकारात्मक और हास्य भूमिकाएं निभाईं, लेकिन दर्शकों के मन में उनकी खलनायक वाली छवि इतनी मजबूत रही कि उससे पूरी तरह बाहर निकलना संभव नहीं हो पाया। यह इस बात का भी प्रमाण है कि कभी-कभी एक किरदार अभिनेता की पूरी पहचान बन जाता है। हाल के वर्षों में अजय देवगन, रणदीप हुड्डा, नवाजुद्दीन सिद्दीकी और विजय सेतुपति जैसे कलाकारों ने भी नायक और खलनायक की सीमाओं को लगभग समाप्त कर दिया है। आज दर्शक यह नहीं देखते कि कलाकार हीरो है या विलेन, बल्कि यह देखते हैं कि उसने अपने किरदार को कितनी ईमानदारी और प्रभावशाली ढंग से निभाया है। दरअसल, बदलते सिनेमा के साथ खलनायक की परिभाषा भी बदली है। पहले फिल्मों में नायक पूरी तरह आदर्श और खलनायक पूरी तरह दुष्ट होता था, लेकिन आज के दौर में अधिकांश किरदार ग्रे शेड लिए होते हैं। ऐसे किरदार कलाकारों को अभिनय की अधिक स्वतंत्रता देते हैं। खलनायक बनने पर किसी अभिनेता पर आदर्श दिखने या नैतिकता निभाने का दबाव नहीं होता। वह अपने अभिनय के हर रंग को खुलकर सामने ला सकता है।
    बॉबी देओल स्वयं स्वीकार कर चुके हैं कि नकारात्मक भूमिकाओं ने उन्हें वह रचनात्मक स्वतंत्रता दी जो उन्हें अपने तीन दशक लंबे करियर में पहले कभी नहीं मिली। शायद यही वजह है कि आज बड़े सितारे भी खलनायक बनने से नहीं हिचकते। अब दर्शक भी हीरो और विलेन के पारंपरिक खांचों से आगे बढ़ चुके हैं। बॉबी देओल का 'बरसात' के मासूम प्रेमी से लेकर 'एनिमल' और 'अल्फा' के खतरनाक खलनायक तक का सफर इस बात का प्रमाण है कि सच्चा कलाकार वही है जो समय के साथ खुद को बदल सके और हर नए किरदार में दर्शकों को चौंका दे। हिंदी सिनेमा की यही परंपरा उसे जीवंत और समृद्ध बनाती है। अंततः जीत नायक या खलनायक की नहीं, बल्कि बेहतरीन अभिनय और यादगार किरदारों की होती है।
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