Monday, July 13, 2026

सतलुज : वैचारिक आजादी और सिनेमा पर लटकी तलवार

     दशकों से देखा जा रहा है कि कला और समाज का संबंध हमेशा पूरक और द्वंद्वात्मक रहा। भारतीय सिनेमा ने अपनी स्थापना से ही समाज की धड़कनों को परदे पर उतारने का प्रयास किया, लेकिन जब भी इस माध्यम ने व्यवस्था, सत्ता या स्थापित सामाजिक विमर्शों के कड़वे सच को उजागर करने की हिम्मत दिखाई, तब-तब उसे राज्य और रूढ़िवादी ताकतों के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। हाल ही में अभिनेता और गायक दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' को लेकर उपजा विवाद इसी वैचारिक टकराव की एक नई और चिंताजनक कड़ी है। सिनेमाघरों में प्रतिबंधित होने के बाद जब इस फिल्म को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जगह मिली, तो वहां भी सरकारी हस्तक्षेप के कारण इसे हटा दिया गया। यह घटना स्पष्ट करती है, कि तकनीकी प्रगति और डिजिटल युग के दावों के बावजूद कलात्मक अभिव्यक्ति के दायरे निरंतर संकुचित हो रहे हैं। यह कोई अकेला मामला नहीं, बल्कि सिनेमा के इतिहास के उस लंबे सिलसिले का हिस्सा है, जहां राज्य की संप्रभुता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच की रेखाएं धुंधली होती दिखती हैं।
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● हेमंत पाल

    फिल्म 'सतलुज' का विवाद डिजिटल स्वतंत्रता के भ्रम पर उंगली उठा रहा है। मूल रूप से 'पंजाब '95' नाम से निर्मित और हनी त्रेहान द्वारा निर्देशित यह फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालरा के जीवन और पंजाब के एक बेहद संवेदनशील दौर पर आधारित है। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड यानी सेंसर ने इस फिल्म को लेकर कड़ा रुख अपनाया और निर्माताओं को लगभग 127 कट लगाने का निर्देश दिया। लंबे कानूनी और प्रशासनिक संघर्ष के बाद, फिल्म को 'सतलुज' नाम से एक ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज तो किया गया, लेकिन सुरक्षा कारणों और राष्ट्रीय संप्रभुता का हवाला देकर इसे डिजिटल स्पेस से भी हटा दिया गया। यह घटनाक्रम इस धारणा को खंडित करता है, कि ओटीटी प्लेटफॉर्म गंभीर और यथार्थवादी सिनेमा के लिए एक स्वतंत्र खिड़की साबित होंगे। अब तक डिजिटल माध्यमों को सिनेमाघरों की तुलना में अधिक उदार और सेंसरशिप से मुक्त माना जाता था, लेकिन सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में हाल के संशोधनों ने सरकार को यह असीमित शक्ति दे दी है कि वह 'सार्वजनिक व्यवस्था' या 'शांति भंग' की आशंका के आधार पर किसी भी डिजिटल सामग्री को प्रतिबंधित कर सके। यह स्थिति कला के क्षेत्र में एक प्रकार का 'चिलिंग इफेक्ट' पैदा करती है, जहां फिल्म निर्माता वित्तीय और कानूनी जोखिमों से बचने के लिए स्वयं ही अपनी रचनात्मकता को सीमित करने लगते हैं।
    भारतीय सिनेमा के इतिहास के पन्ने पलटने पर ऐसे कई प्रसंग मिलते हैं, जहां सेंसर बोर्ड से 'हरी झंडी' मिलने के बावजूद फिल्मों को थियेटर तक पहुंचने से रोका गया। यह प्रवृत्ति दर्शाती है कि सेंसरशिप केवल एक संस्थागत प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक दबावों से संचालित होती है। वर्ष 1993 के मुंबई बम धमाकों पर आधारित अनुराग कश्यप की फिल्म 'ब्लैक फ्राइडे' को सेंसर बोर्ड ने अनुमति दे दी थी, परंतु एक याचिका पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसके प्रदर्शन पर तब तक के लिए रोक लगा दी, जब तक कि अदालती कार्यवाही पूरी नहीं हो गई। तर्क था कि फिल्म वास्तविक गवाहों और न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है। इसी प्रकार, दीपा मेहता की फिल्म 'वाटर' जो वाराणसी की विधवाओं की दयनीय स्थिति का कथानक था, उसे देश में शूट नहीं करने दिया गया। भारी विरोध प्रदर्शनों, सेटों की तोड़फोड़ और संस्कृति विरोधी होने के आरोपों के कारण उत्तर प्रदेश में कानून-व्यवस्था की दुहाई देकर इसकी शूटिंग रोक दी। इस वजह से फिल्म को श्रीलंका में फिल्माया गया। आनंद पटवर्धन की डॉक्यूमेंट्री फिल्मों, विशेषकर 'राम के नाम' और 'फादर, सन एंड होली वॉर' के साथ तो यह संघर्ष दशकों लंबा चला। सेंसर बोर्ड की बाधाओं को पार करने के बाद भी दूरदर्शन जैसे सार्वजनिक प्रसारकों पर इनके प्रदर्शन को रोकने की हर संभव कोशिश की गई। हालांकि, इन मामलों में न्यायपालिका ने हमेशा अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में निर्णय देकर कला का मार्ग प्रशस्त किया।
     राजनीतिक नफा-नुकसान के लिए फिल्मों को बलि का बकरा बनाने के प्रसंगों में प्रकाश झा की 'आरक्षण' और मधुर भंडारकर की 'इंदु सरकार' भी शामिल है। 'आरक्षण' को जातिगत तनाव की आशंका के चलते कुछ राज्यों में प्रतिबंधित किया गया, जबकि 'इंदु सरकार' को 1975 के आपातकाल की पृष्ठभूमि के कारण भारी राजनीतिक विरोध और प्रदर्शनों का सामना करना पड़ा। संजय लीला भंसाली की 'पद्मावत' का विवाद राज्य सरकारों की लाचारी या राजनीतिक अवसरवादिता का सबसे उग्र उदाहरण रहा है। सेंसर बोर्ड के कहने पर फिल्म का नाम बदलने और कई संशोधनों के बाद 'यू/ए' सर्टिफिकेट दिया, इसके बावजूद, कुछ संगठनों के हिंसक विरोध के आगे झुकते हुए राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया था। अंततः सर्वोच्च न्यायालय को हस्तक्षेप करते हुए यह स्पष्ट करना पड़ा कि एक बार जब वैधानिक संस्था फिल्म को पास कर देती है, तो कानून-व्यवस्था बनाए रखना राज्य की प्राथमिक जिम्मेदारी है, न कि फिल्म को प्रतिबंधित करना।
   बीते दशकों की तुलना में वर्तमान में सेंसरशिप का स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। पहले जहां सेंसरशिप केवल 'केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड' (सेंसर) की कैंची तक सीमित थी, वहीं अब एक अधिक खतरनाक 'समानांतर सेंसरशिप' का उदय हो गया। यह समानांतर व्यवस्था राजनीतिक दलों, धार्मिक संगठनों, वैचारिक समूहों और सोशल मीडिया की ट्रोल आर्मी के गठजोड़ से संचालित होती है। जैसे ही कोई फिल्म किसी संवेदनशील या लीक से हटकर मुद्दे को छूती है, ये समूह सड़कों पर हिंसा और डिजिटल स्पेस में 'बॉयकॉट' का अभियान शुरू कर देते हैं।
   राज्य सरकारें अक्सर कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अपनी विफलता को छुपाने के लिए या बहुसंख्यक भावनाओं को तुष्ट करने के लिए शॉर्टकट रास्ता चुनती हैं और फिल्मों के प्रदर्शन पर रोक लगा देती हैं। इस अनिश्चितता के माहौल में सिनेमाघर और मल्टीप्लेक्स मालिक भारी वित्तीय नुकसान के डर से स्वयं ही कदम पीछे खींच लेते हैं। यह प्रवृत्ति सेंसर बोर्ड जैसी वैधानिक संस्था की प्रासंगिकता और स्वायत्तता पर गंभीर सवालिया निशान लगाती है। यदि बोर्ड द्वारा प्रमाणित फिल्म भी देश में सुरक्षित रूप से प्रदर्शित नहीं हो सकती, तो ऐसी नियामक संस्था के होने का तार्किक औचित्य समाप्त हो जाता है।
     सिनेमाई पाबंदियों के इस विमर्श में कुछ अन्य महत्वपूर्ण प्रसंगों को जोड़ना प्रासंगिक होगा, जो यह दर्शाते हैं कि सत्ता चाहे किसी भी दल की हो, वह अपनी आलोचना के प्रति असहिष्णु रही है। वर्ष 1975 के आपातकाल के दौरान अमृत नाहटा की व्यंग्यात्मक फिल्म 'किस्सा कुर्सी का' का पूरा प्रिंट ही नष्ट कर दिया गया था। क्योंकि, वह तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व पर सीधा प्रहार करती थी। इसी तरह गुलज़ार की 'आंधी' को भी इंदिरा गांधी के जीवन से समानताएं दिखाने के भ्रम के कारण प्रतिबंधित कर दिया गया था। सेंसरशिप की यह राजनीति केवल राष्ट्रीय स्तर तक सीमित नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्तर पर भी उतनी ही प्रभावी है। तमिल फिल्म 'दशावतारम' या कमल हासन की 'विश्वरूपम' को लेकर हुआ विवाद इसका सटीक उदाहरण है, जहां धार्मिक भावनाओं के आहत होने के आधार पर राज्य सरकार ने फिल्म के प्रदर्शन को अधर में लटका दिया था। विवेक अग्निहोत्री की 'द कश्मीर फाइल्स' और सुदीप्तो सेन की 'द केरला स्टोरी' जैसी फिल्मों को जहां कुछ राज्यों में कर-मुक्त किया गया, वहीं कुछ अन्य राज्यों में इन पर अघोषित प्रतिबंध लगाने की कोशिश की गई। यह विरोधाभास साबित करता है कि सिनेमा अब केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि राजनीतिक ध्रुवीकरण का एक प्रमुख हथियार और शिकार दोनों बन गया।
    'सतलुज' जैसी फिल्मों का डिजिटल प्लेटफॉर्म से हटाया जाना इस बात का संकेत है कि अब कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए कोई सुरक्षित गलियारा नहीं बचा। राज्य का यह तर्क कि देश की एकता, अखंडता और सार्वजनिक शांति किसी भी रचनात्मक आजादी से ऊपर है, सिद्धांत रूप में सही हो सकता है। परंतु, इस तर्क की आड़ में असहमति की आवाजों को दबाना या इतिहास के कड़वे और असुविधाजनक पन्नों को पूरी तरह से फाड़ देना किसी भी जीवंत लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। सिनेमा केवल मनोरंजन या व्यावसायिक लाभ का जरिया नहीं है, बल्कि यह समाज के दबे हुए दर्द, ऐतिहासिक भूलों और मानवीय त्रासदियों को दर्ज करने का एक जीवंत दस्तावेज है। यदि किसी लोकतांत्रिक समाज या सरकार को किसी फिल्म के दृष्टिकोण से गंभीर आपत्ति है, तो उसका प्रतिकार करने का सही तरीका वैचारिक बहस, समीक्षाएं और स्वस्थ विमर्श होना चाहिए, न कि राज्य की दमनकारी शक्ति का उपयोग करके उस पर ताला लगा देना।
     इतिहास इस बात का गवाह है कि कला पर थोपे गए प्रतिबंध कभी भी स्थायी नहीं रहे हैं। जो फिल्में अपने समय में प्रतिबंधित या प्रताड़ित की गई, वे कालांतर में सिनेमा की कालजयी कृतियां बनीं और दर्शकों तक पहुंचीं। आज के सूचना और संचार क्रांति के युग में, जहां तकनीक ने दुनिया को एक वैश्विक गांव में बदल दिया है, किसी भी विचार या कलाकृति को पूरी तरह से दबाना व्यावहारिक रूप से असंभव है। सरकारें फिल्मों पर तात्कालिक प्रतिबंध लगाकर राजनीतिक विवादों को कुछ समय के लिए भले ही टाल दें, लेकिन वे उस बुनियादी सवाल को नहीं टाल सकतीं जो कला की आजादी और लोकतंत्र की सेहत से जुड़ा है। एक परिपक्व और सुदृढ़ लोकतंत्र की वास्तविक पहचान इसमें है कि वह असुविधाजनक सच का सामना करने और उस पर खुले दिमाग से संवाद करने का साहस दिखाएं, न कि सच दिखाने वाले परदे को ही गिरा दे।
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