Saturday, September 19, 2026

विज्ञापन का विवाद : जब प्रचार का पैंतरा उल्टा पड़ा

     त्योहार भारतीय समाज में सिर्फ धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भावनाओं, परंपराओं और सामूहिक स्मृतियों से जुड़े अवसर होते हैं। इसलिए कंपनियां भी दीपावली, होली, रक्षाबंधन, करवा चौथ, ईद और दूसरे त्योहारों को अपने उत्पादों के प्रचार का बड़ा माध्यम मानती हैं। त्योहारों के दौरान जारी विज्ञापन सामान्य दिनों की तुलना में कहीं ज्यादा लोगों तक पहुंचते हैं और यदि उनमें भावनात्मक जुड़ाव पैदा हो जाए तो ब्रांड की पहचान मजबूत हो सकती है। लेकिन, यही कोशिश कभी-कभी उल्टी भी पड़ जाती है। रचनात्मकता, आधुनिकता या सामाजिक संदेश देने की कोशिश में जब विज्ञापन दर्शकों की धार्मिक, सांस्कृतिक या सामाजिक संवेदनशीलता से टकराता है, तो उत्पाद चर्चा में आने के बजाय विवाद का केंद्र बन जाता है। हाल में अभिनेत्री कृति सेनन को लेकर रक्षाबंधन के विज्ञापन का विवाद इसका ताजा उदाहरण है। आभूषण ब्रांड के इस विज्ञापन में कृति के पहनावे को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी आपत्ति जताई गई और आखिरकार ब्रांड ने विज्ञापन वापस ले लिया। ब्रांड ने कहा कि भारतीय संस्कृति, परंपराओं और त्योहारों के प्रति सम्मान के कारण उसने इसे हटाने का फैसला किया।
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- हेमंत पाल

     कृति सेनन वाले विज्ञापन में आपत्ति का मुख्य आधार यह था कि रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक त्योहार के प्रसंग में उनका परिधान एक वर्ग को जरूरत से ज्यादा आधुनिक और अनुपयुक्त लगा। विज्ञापन में उन्होंने ब्रालेट शैली का ब्लाउज, केप और ड्रेप्ड स्कर्ट पहना था। आलोचकों का कहना था कि भाई-बहन के पवित्र रिश्ते और रक्षाबंधन जैसे पारंपरिक अवसर को इस तरह के पहनावे के साथ प्रस्तुत करना भारतीय सांस्कृतिक संदर्भ के अनुकूल नहीं है। कृति ने अपने पहनावे का बचाव करते हुए सवाल उठाया कि आखिर महिलाओं के कपड़ों पर टिप्पणी करना कब बंद होगा। इस विवाद ने एक महत्वपूर्ण सवाल भी खड़ा किया कि किसी विज्ञापन में अभिनेत्री की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्योहार की सांस्कृतिक संवेदनशीलता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
     हालांकि, यह पहला अवसर नहीं है जब किसी विज्ञापन को जनता की आपत्ति के बाद वापस लेना पड़ा हो। भारतीय विज्ञापन जगत में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं। वर्ष 2021 में 'फैब इंडिया' का दीपावली अभियान ‘जश्न-ए-रिवाज’ इसी तरह विवाद में आया था। विज्ञापन में पारंपरिक भारतीय परिधानों में मॉडल्स को दिखाया गया था और अभियान को भारतीय संस्कृति से जोड़कर प्रस्तुत किया गया था। लेकिन, कुछ राजनीतिक नेताओं और सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं ने 'अभियान' के नाम और प्रस्तुति पर आपत्ति जताई। आलोचना यह थी कि दीपावली जैसे हिंदू त्योहार के प्रचार में ‘जश्न-ए-रिवाज’ जैसे उर्दू शब्द का इस्तेमाल क्यों किया गया और मॉडल्स को पारंपरिक हिंदू परिधान में क्यों नहीं दिखाया गया। विरोध बढ़ने के बाद फैब इंडिया ने विज्ञापन वापस ले लिया।
    इसी तरह 2020 में तनिष्क का ‘एकत्वम’ अभियान भी देशभर में बहस का विषय बना था। विज्ञापन में एक हिंदू महिला की गोद भराई की रस्म को उसके मुस्लिम ससुराल वाले आयोजित करते हुए दिखाए गए थे। कंपनी का उद्देश्य अलग-अलग धर्मों और संस्कृतियों के मेल को दिखाना था, लेकिन एक वर्ग ने इसे ‘लव जिहाद’ को बढ़ावा देने वाला विज्ञापन बताया। सोशल मीडिया पर बहिष्कार की मुहिम चली और कर्मचारियों तथा साझेदारों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताते हुए कंपनी ने विज्ञापन वापस ले लिया। यहां दिलचस्प बात यह है कि जिस विज्ञापन को एक वर्ग ने सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश माना, उसी विज्ञापन को दूसरे वर्ग ने धार्मिक-सामाजिक मुद्दे के रूप में देखा।
    विज्ञापन के जरिए सामाजिक संदेश देने की कोशिश का एक और विवाद डाबर के ‘फेम’ अभियान को लेकर हुआ। 2021 में करवा चौथ के अवसर पर जारी विज्ञापन में एक समलैंगिक महिला जोड़े को इस त्योहार की रस्म निभाते हुए दिखाया गया था। विज्ञापन में एक महिला दूसरी महिला के चेहरे पर उत्पाद लगा रही थी और दोनों करवा चौथ मनाने की तैयारी करती दिखाई गई थीं। इसका उद्देश्य समावेशिता और बदलते सामाजिक रिश्तों को सामने रखना था, लेकिन कुछ लोगों ने इसे हिंदू त्योहार की परंपरागत मान्यता के विपरीत बताया। तत्कालीन मध्य प्रदेश के गृह मंत्री ने विज्ञापन पर आपत्ति जताते हुए कानूनी कार्रवाई की चेतावनी दी। इसके बाद डाबर ने विज्ञापन वापस लिया और लोगों की भावनाएं आहत होने के लिए बिना शर्त माफी मांगी।
     'मंगल सूत्र' को लेकर सब्यसाची के विज्ञापन का मामला भी इसी श्रेणी में आता है। 2021 में मशहूर डिजाइनर सब्यसाची मुखर्जी के मंगलसूत्र अभियान में एक महिला को कम गले वाले परिधान में पुरुष मॉडल के साथ अंतरंग मुद्रा में दिखाया गया था। कुछ लोगों ने इसे मंगल सूत्र जैसे पारंपरिक और वैवाहिक प्रतीक का आपत्तिजनक चित्रण बताया। सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना हुई और कुछ राजनीतिक नेताओं ने भी इसे लेकर सवाल उठाए। एक प्रदेश के तत्कालीन गृह मंत्री ने इस विज्ञापन हटाने के लिए 24 घंटे का अल्टीमेटम तक दिया। इसके बाद सब्यसाची ने अभियान वापस लेते हुए कहा कि उन्हें समाज के एक वर्ग के आहत होने पर गहरा दुख है।
    विज्ञापनों में सिर्फ धर्म और संस्कृति ही विवाद का कारण नहीं बने। 2022 का लेयर’आर शॉट बॉडी स्प्रे विज्ञापन इसका सबसे चर्चित उदाहरण है। दो विज्ञापनों में ऐसे दृश्य और संवाद थे, जिनका अर्थ महिलाओं के प्रति यौन हिंसा और बलात्कार जैसी गंभीर सामाजिक समस्या से जोड़कर देखा गया। एक विज्ञापन में चार पुरुष एक महिला के पीछे खड़े दिखाई देते हैं और संवाद इस तरह बनाया गया था कि पहली नजर में वह यौन हिंसा की ओर संकेत करता हुआ लगता था। बाद में उत्पाद की बोतल को लेकर स्थिति स्पष्ट होती थी। लेकिन, तब तक विज्ञापन की भाषा और प्रस्तुति को लेकर भारी विरोध शुरू हो चुका था। विज्ञापन को बलात्कार की संस्कृति को सामान्य बनाने वाला बताया गया। विज्ञापन मानक परिषद, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और दिल्ली महिला आयोग की आपत्तियों के बाद इसे सभी प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। कंपनी ने माफी भी मांगी।
     2017 में जोमैटो का एक बाहरी विज्ञापन भी इसी तरह विवाद में आया था। कंपनी ने ‘एमसी’ और ‘बीसी’ जैसे संक्षिप्त शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उन्हें ‘मैकरोनी एंड चीज’ और ‘बटर चिकन’ के अर्थ में पेश किया। कंपनी के लिए यह शब्दों का मजाकिया खेल था, लेकिन भारतीय संदर्भ में वही संक्षिप्त अक्षर बेहद आपत्तिजनक और अश्लील गालियों के रूप में पहचाने जाते हैं। सोशल मीडिया पर इसे सस्ता, अश्लील और महिलाओं के प्रति अपमानजनक बताया गया। सार्वजनिक विरोध के बाद कंपनी ने उस विज्ञापन को वापस लेने का फैसला किया। 2015 में कल्याण ज्वेलर्स का ऐश्वर्या राय बच्चन वाला विज्ञापन भी विज्ञापन इतिहास के विवादित अभियानों में गिना जाता है। विज्ञापन में ऐश्वर्या को शाही अंदाज में आभूषण पहने दिखाया गया था और उनके ऊपर छाता पकड़े एक गहरे रंग के बच्चे को दिखाया गया था। नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने इसे नस्लवादी और बाल मजदूरी या गुलामी की छवि को बढ़ावा देने वाला बताया। आलोचना इतनी तेज हुई कि कंपनी ने विज्ञापन वापस लेने का फैसला किया। ऐश्वर्या ने भी कहा था कि विज्ञापन की अंतिम तस्वीर में बदलाव उनकी जानकारी के बिना किया गया था।
    इन उदाहरणों को देखने से स्पष्ट होता है, कि विवादित विज्ञापन हमेशा एक जैसे नहीं होते। कभी समस्या धार्मिक प्रतीकों के चित्रण से पैदा होती है, कभी पहनावे से, कभी सामाजिक रिश्तों की प्रस्तुति से और कभी ऐसी भाषा से जिसे रचनात्मकता के नाम पर इस्तेमाल किया जाता है। कई बार विज्ञापन बनाने वाली एजेंसी का उद्देश्य विवाद पैदा करना नहीं होता। लेकिन, वह यह अनुमान लगाने में चूक जाती है कि अलग-अलग सामाजिक समूह किसी दृश्य या संवाद को किस तरह ग्रहण करेंगे। आज सोशल मीडिया ने इस जोखिम को कई गुना बढ़ा दिया है। पहले किसी विज्ञापन को लेकर प्रतिक्रिया स्थानीय स्तर पर सीमित रह सकती थी, लेकिन अब कुछ घंटों में कोई अभियान देशव्यापी बहस का विषय बन सकता है। 
     यह भी ध्यान देने योग्य है कि हर विवादित विज्ञापन वास्तव में आपत्तिजनक हो, ऐसा जरूरी नहीं। सर्फ एक्सेल के 2019 के होली विज्ञापन में एक हिंदू लड़की को मुस्लिम दोस्त को होली के रंगों से बचाकर मस्जिद तक पहुंचाते दिखाया गया था। विज्ञापन का उद्देश्य सांप्रदायिक सौहार्द का संदेश देना था, लेकिन इसके खिलाफ बहिष्कार की मुहिम चली और इसे एक वर्ग ने हिंदू त्योहार और मुस्लिम धार्मिक अनुष्ठान के बीच असंतुलित प्रस्तुति के रूप में देखा। दूसरी ओर बहुत से लोगों ने इसे एकता और भाईचारे का खूबसूरत संदेश माना। यह विज्ञापन वापस नहीं लिया गया, लेकिन यह उदाहरण बताता है कि विज्ञापन में संदेश की मंशा और दर्शक की व्याख्या दो अलग-अलग चीजें हो सकती हैं।
    किसी भी विज्ञापन की सफलता सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि लोग उसे कितनी बार देख रहे हैं। असली सफलता तब है, जब उपभोक्ता विज्ञापन को सकारात्मक भाव से याद रखे और उसी भाव को उत्पाद से जोड़े। यदि विज्ञापन उत्पाद से ज्यादा विवाद को यादगार बना दे, तो प्रचार की पूरी रणनीति कमजोर पड़ सकती है। ब्रांड को कुछ समय के लिए जबरदस्त चर्चा तो मिल जाती है, लेकिन उसके साथ नकारात्मक छवि भी जुड़ सकती है। त्योहारों से जुड़े विज्ञापनों में यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। रचनात्मक स्वतंत्रता जरूरी है, आधुनिक समाज की बदलती तस्वीर को विज्ञापनों में जगह मिलनी चाहिए और महिलाओं, विभिन्न समुदायों तथा बदलते रिश्तों का प्रतिनिधित्व भी होना चाहिए। लेकिन, इसके साथ यह समझना भी जरूरी है कि भारत जैसे विविध समाज में धार्मिक प्रतीक, पारंपरिक परिधान और त्योहारों की अपनी गहरी भावनात्मक पृष्ठभूमि है। विज्ञापन बनाने वालों को इस संवेदनशीलता को कमजोरी नहीं, बल्कि रचनात्मक चुनौती के रूप में देखना चाहिए।
    कृति सेनन के विज्ञापन से लेकर तनिष्क, फैब इंडिया, डाबर, सब्यसाची, लेयर’आर शॉट, जोमैटो और कल्याण ज्वेलर्स तक के उदाहरण एक ही सबक देते हैं कि विज्ञापन में चौंकाना आसान है, लेकिन सम्मान बनाए रखते हुए यादगार बनना कठिन। आज के दौर में किसी ब्रांड के पास विज्ञापन जारी करने से पहले केवल रचनात्मक टीम की राय पर्याप्त नहीं है। उसे अलग-अलग सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से अपने अभियान को परखना भी जरूरी है। क्योंकि, जिस विज्ञापन को बनाने में महीनों की मेहनत लगती है, उसे जनता की नाराजगी के बाद हटाने में कभी-कभी केवल कुछ घंटे लगते हैं। तब उत्पाद की बिक्री से ज्यादा चर्चा इस बात की होती है कि आखिर विज्ञापन बनाने वालों ने यह सोचा क्यों नहीं कि उनकी रचनात्मकता किस सीमा तक स्वीकार की जाएगी।
चर्चा चाहिए थी, खड़ा हुआ विवाद!
    त्योहारों के मौके पर विज्ञापन बनाना ब्रांडों के लिए बड़ा अवसर होता है, लेकिन जरा-सी चूक पूरा अभियान भारी पड़ सकता है। तनिष्क के विज्ञापन में हिंदू परिवार में मुस्लिम बहू की गोद भराई दिखाना सांप्रदायिक बहस का कारण बना और विज्ञापन हटाना पड़ा। डाबर के करवा चौथ वाले विज्ञापन में समलैंगिक महिला जोड़े को त्योहार मनाते दिखाया गया, जिस पर धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप लगे। फैब इंडिया के ‘जश्न-ए-रिवाज’ अभियान पर दीपावली की सांस्कृतिक पहचान को लेकर सवाल उठे। सब्यसाची के मंगलसूत्र विज्ञापन में अंतरंग दृश्य को लेकर आपत्ति हुई। यानी विज्ञापन की दुनिया में विवाद कभी भाषा से, कभी पहनावे से और कभी सामाजिक संदेश से पैदा होता है। खास बात यह है कि आज सोशल मीडिया के दौर में विज्ञापन हटाने का फैसला भी उतनी ही तेजी से होता है, जितनी तेजी से विवाद फैलता है।
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