Saturday, October 10, 2026

नाना पाटेकर : सिनेमा के पर्दे का कठोर चेहरा, असल जिंदगी का मसीहा!

सोशल मीडिया पर कॉमेडी रील देखते हुए अचानक अंत में एक चेहरा सामने आता है। जोर-जोर से हंसता हुआ, आंखों में शरारत और चेहरे पर वही बेतकल्लुफी, जिसे देखते ही ‘वेलकम’ के उदय शेट्टी की याद आ जाती है। यह चेहरा नाना पाटेकर का है। कभी इस चेहरे पर दर्शक हंसे थे, कभी इसकी आंखों में गुस्सा देखकर सहमे थे और कभी इसकी आवाज में छिपी पीड़ा ने उन्हें भीतर तक छुआ था। पर, अब अफसोस यह है कि यह चेहरा असल दुनिया से विदा हो गया है। ‘वेलकम’ की हंसी से लेकर किसानों के आंसू पोंछने तक, नाना पाटेकर ने अपने पीछे अभिनय से कहीं बड़ी इंसानियत की विरासत छोड़ी। 
000 

- हेमंत पाल

    नाना पाटेकर दुनिया से चले गए, लेकिन उनका चेहरा शायद ही कभी हमारी स्मृतियों से विदा होगा। फिल्मों में वे जितनी बार दिखेंगे, उतनी ही बार उनकी आवाज कानों में गूंजेगी और उनके किरदार आंखों के सामने आकर खड़े होंगे। मगर नाना को सिर्फ अभिनेता के रूप में याद करना उनके व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा। उन्होंने पर्दे पर जितना अभिनय किया, उससे कहीं ज्यादा गहरी भूमिका उन्होंने जिंदगी में निभाई। पर्दे पर वे कठोर थे, आक्रामक थे, व्यवस्था को चुनौती देते थे, कभी अपराधी बने, कभी सैनिक और कभी विद्रोही नायक। लेकिन, कैमरा बंद होने के बाद वही आदमी उन लोगों के बीच खड़ा दिखाई देता था, जिनकी पीड़ा सुनने वाला भी कोई नहीं था। नाना पाटेकर को याद करते हुए सबसे पहले उनकी आवाज सुनाई देती है भारी, खुरदुरी और सीधे दिल में उतर जाने वाली। फिर उनका चेहरा सामने आता है। कभी गुस्से से तना हुआ, कभी व्यवस्था से लड़ता हुआ, कभी किसी को चुनौती देता हुआ और कभी अचानक खिलखिलाकर हंसता हुआ। 

       हिंदी और मराठी सिनेमा में उन्होंने ऐसे किरदारों को जन्म दिया, जिन्हें केवल अभिनय से नहीं, अपने पूरे व्यक्तित्व से जिया। ‘परिंदा’ का अन्ना हो, ‘प्रहार’ का कठोर सैनिक, ‘क्रांतिवीर’ का प्रताप हो या ‘तिरंगा’ का तेवर नाना ने हर किरदार को अपनी आवाज, आंखों और देहभाषा से ऐसा रूप दिया कि वह चरित्र अभिनेता से बड़ा होकर सिनेमा की स्मृति का हिस्सा बन गया। फिर वही नाना ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी बनकर सामने आए तो उनकी अभिनय क्षमता का दूसरा सिरा भी दिखाई दिया। जिस अभिनेता को देखकर दर्शक ‘परिंदा’ और ‘क्रांतिवीर’ में सहम सकते थे, वही ‘वेलकम’ में अपनी अजीबो-गरीब हंसी, अंदाज और संवादों से लोगों को हंसाता रहा। उनकी यही खासियत थी, वे किसी एक खांचे में टिकने वाले अभिनेता नहीं थे। उनके भीतर गुस्सा भी था, करुणा भी; कठोरता भी थी और हास्य भी। नाना पाटेकर का फिल्मी सफर 1978 की ‘गमन’ से शुरू हुआ। ‘अंकुश’ ने उन्हें पहचान दी और ‘परिंदा’ ने उनके अभिनय को नई ऊंचाई तक पहुंचाया। इसके बाद प्रहार, तिरंगा, क्रांतिवीर, खामोशी, अग्निसाक्षी, अब तक छप्पन, नटसम्राट और ‘वेलकम’ जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय के अलग-अलग रंग सामने रखे। 
     उन्होंने राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से लेकर पद्मश्री तक सम्मान हासिल किया। लेकिन, पुरस्कारों की लंबी सूची भी उस नाना को पूरी तरह परिभाषित नहीं कर सकती, जिसे उनके चाहने वाले एक बेहद सादा और संवेदनशील इंसान के रूप में याद करते हैं। उनके अभिनय के लिए उन्हें तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिले और 2013 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया। नाना के व्यक्तित्व को समझने के लिए उनके बचपन और संघर्षों की ओर लौटना भी जरूरी है। उन्होंने कम उम्र में आर्थिक परेशानियों को करीब से देखा। परिवार की मदद के लिए काम किया और जीवन की कठिनाइयों को बहुत नजदीक से महसूस किया। शायद यही कारण था कि जब वे किसी गरीब, किसान या जरूरतमंद परिवार के सामने खड़े होते थे तो वहां उन्हें केवल एक समस्या नहीं दिखाई देती थी। उन्हें उस आदमी का संघर्ष दिखाई देता था, जो रोज जिंदगी से लड़ रहा।
     महाराष्ट्र के किसानों की त्रासदी ने नाना को भीतर तक झकझोरा। विदर्भ और मराठवाड़ा के सूखे इलाकों में जब किसानों की आत्महत्याओं की खबरें लगातार सामने आ रही थीं, तब उन्होंने केवल दुख जताने तक खुद को सीमित नहीं रखा। वे गांवों में गए, किसानों से मिले, उनके परिवारों के बीच बैठे और उनकी परेशानियों को समझने की कोशिश की। अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर उन्होंने किसान परिवारों की सहायता के लिए काम शुरू किया, जो आगे चलकर ‘नाम फाउंडेशन’ के रूप में सामने आया। यह नाना की जिंदगी का शायद सबसे बड़ा अध्याय था। जिस आदमी को सिनेमा ने करोड़ों लोगों की पहचान दी थी, उसने उस पहचान को अपने लिए नहीं, जरूरतमंदों तक पहुंचने के लिए इस्तेमाल किया। सूखे से प्रभावित इलाकों में पानी की समस्या, जल संरक्षण, ग्रामीण विकास और किसान परिवारों की सहायता जैसे काम इस प्रयास से जुड़े। किसान आत्महत्या से प्रभावित परिवारों को आर्थिक सहारा देने से लेकर उनके जीवन को फिर से खड़ा करने की कोशिश तक, इस काम में नाना लगातार जुड़े रहे। 
     उनकी खासियत यह थी कि वे मंच पर खड़े होकर समाज सेवा की बातें करने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे लोगों के बीच जाने वाले इंसान थे। किसान परिवारों के घर बैठते, उनकी बातें सुनते और उनकी परेशानियों को समझते। जिन परिवारों ने अपने घर का कमाने वाला सदस्य खो दिया था, उनके लिए आर्थिक संकट के साथ भावनात्मक टूटन भी थी। नाना ने उस दर्द को केवल आंकड़ों की तरह नहीं देखा। उनके लिए हर परिवार की अपनी कहानी थी। यहीं नाना पाटेकर अपने फिल्मी किरदारों से कहीं बड़े दिखाई देते हैं। पर्दे पर उन्होंने ऐसे किरदार निभाए जो अपने गुस्से और तेवर से व्यवस्था को चुनौती देते थे। असल जिंदगी में उन्होंने उन लोगों का साथ देने की कोशिश की जो व्यवस्था की सबसे कमजोर सीढ़ी पर खड़े थे। 
      शायद इसीलिए उनकी सामाजिक भूमिका उनके अभिनय से अलग नहीं थी। दोनों के पीछे एक ही चीज काम करती थी अन्याय और पीड़ा को देखकर भीतर से बेचैन हो जाना। नाना को दिखावे से हमेशा दूरी रही। स्टारडम की चमक उन्हें अपनी ओर खींच नहीं पाई। उनका रहन-सहन सादा रहा और बातचीत में भी बनावटीपन नहीं था। यही वजह थी कि उन्हें देखकर लगता था कि यह व्यक्ति पर्दे पर जितना बड़ा अभिनेता है, निजी जिंदगी में उतना ही सहज इंसान है। वे जमीन पर बैठकर लोगों से बात कर सकते थे, किसी किसान की पीड़ा सुनते हुए भावुक हो सकते थे और अगले ही पल अपने सहज हास्य से माहौल हल्का कर सकते थे। उनकी संवाद अदायगी भी इसी व्यक्तित्व की तरह थी। नाना संवाद बोलते नहीं थे, उन्हें जीते थे। शब्द उनके मुंह से निकलकर सीधे दर्शक तक पहुंचते थे। उनकी आवाज में अभिनय की ताकत कम और जीवन का अनुभव ज्यादा महसूस होता था। यही कारण है कि उनके बोले हुए कई संवाद फिल्मों की सीमा से निकलकर लोगों की रोजमर्रा की भाषा का हिस्सा बन गए।
    उनका निधन इसलिए भी बड़ा खालीपन छोड़ता है कि वे उस पीढ़ी के अभिनेता थे, जिन्होंने अभिनय को केवल चेहरे और संवादों का खेल नहीं माना। वे किरदार के भीतर उतरते और उसे अपनी आत्मा से छूते थे। एक तरफ ‘क्रांतिवीर’ का आक्रोश था तो दूसरी ओर ‘वेलकम’ की बेफिक्र हंसी। एक और ‘नटसम्राट’ का टूटता हुआ कलाकार था तो दूसरी ओर किसानों के बीच बैठा वह सहज आदमी, जिसके लिए किसी पुरस्कार से ज्यादा जरूरी किसी जरूरतमंद के घर का चूल्हा जलना था। नाना पाटेकर का जाना सिनेमा के लिए निश्चित रूप से एक बड़ा नुकसान है, लेकिन शायद उससे भी बड़ी क्षति उस दुनिया की हुई है जहां नेकी को प्रचार की जरूरत नहीं होती। वे अपनी फिल्मों में जीवित रहेंगे, उनके संवाद फिर सुनाई देंगे, ‘वेलकम’ का उदय शेट्टी देखकर लोग फिर हंसेंगे और ‘क्रांतिवीर’ या ‘परिंदा’ में वही पुराना गुस्सा फिर दिखाई देगा। 
      मगर अब इन दृश्यों के पीछे खड़ा असली नाना दिखाई नहीं देगा। वह आदमी जो पर्दे पर खूंखार हो सकता था, लेकिन जिंदगी में किसी किसान के आंसू देखकर पिघल जाता था। वह अभिनेता जिसने लाखों दर्शकों को डराया भी, हंसाया भी और रुलाया भी, लेकिन अपनी असल जिंदगी में दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने की कोशिश करता रहा। शायद यही नाना पाटेकर की सबसे बड़ी विरासत है। उन्हें सिर्फ महान अभिनेता कहना कम होगा। वे ऐसे इंसान थे जिन्होंने लोकप्रियता को जिम्मेदारी माना और अपनी कला से मिली पहचान को जरूरतमंदों तक पहुंचने का माध्यम बनाया। सिनेमा का पर्दा उनके बिना जरूर सूना होगा, लेकिन उनकी नेकी की दुनिया में जो जगह उन्होंने बनाई, उसे भर पाना आसान नहीं होगा।
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

No comments: