सिनेमा की चमकदार दुनिया बाहर से जितनी लुभावनी, हसीन और आकर्षक दिखाई देती है, भीतर से वह उतनी ही असुरक्षित और दबावों से भरी है। रूपहले परदे का सबसे कड़वा सच यही है कि यहां कलाकार की प्रतिभा के साथ उसकी मौजूदगी, उसका आकर्षण और उसकी युवा दिखने की क़ाबलियत को उसकी सफलता का पैमाना माना जाता है। दर्शक अपने पसंदीदा अभिनेताओं को जिस जिस रूप में देखना शुरू करते हैं, वे चाहते हैं कि वे जिंदगी भर उसी रूप में कायम रहें। दर्शक उम्र के साथ बूढ़े होते हैं, लेकिन वे अपने नायक या नायिका को बूढ़ा होते नहीं देखना चाहते। दर्शकों की यही अपेक्षा और परदे पर छाए रहने की भूख फिल्मी सितारों के मन में एक गहरा खौफ पैदा करती है। उम्र बढ़ने का खौफ और खुद को अप्रासंगिक हो जाने का डर। इसी डर के कारण कलाकार हर संभव कोशिश करते हैं कि वे उम्र को गच्चा दे सकें और ढलती उम्र में भी खुद को जवान, सुगठित और सुंदर बनाए रखें।
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- हेमंत पाल
हाल ही में सलमान खान से जुड़ी एक ऐसी ही घटना इस मनोवैज्ञानिक और शारीरिक दबाव की एक बानगी है। रियलिटी शो ‘बिग बॉस’ के मंच पर जब दर्शकों और सोशल मीडिया ट्रोलर्स ने उनके थोड़े ढले हुए रूप या तथाकथित ‘कमजोर लुक’ पर टिप्पणी की, तो सलमान का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने मंच पर ही अपनी टी-शर्ट उतारकर फेंक दी, अपनी सुगठित सिक्स-पैक बॉडी दिखाई और सफाई दी कि क्लीन शेव और छोटे बालों वाली हेयरस्टाइल उनकी कमजोरी या उम्र का असर नहीं, बल्कि उनकी आने वाली फिल्म के किरदार की मांग है। यह सिर्फ सलमान का बॉडी-बिल्डिंग प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक सुपरस्टार का वह बचाव था, जो यह साबित करने के लिए बेचैन था कि वह आज भी उतना ही फिट, हैंडसम और शक्तिशाली है जितना दो दशक पहले था।
यह घटना उस मानसिक दबाव को उजागर करती है जिसके तहत आज के सितारे अपनी छरहरी और युवा छवि बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह कहानी आज के दौर या केवल सलमान खान तक सीमित नहीं है। स्टारडम की यह रक्षात्मक जंग हिंदी सिनेमा के इतिहास जितनी ही पुरानी है। अगर हम पुराने जमाने के कलाकारों और सिनेमा के सुनहरे दौर में झांककर देखें, तो हमें ऐसे कई किस्से और उदाहरण मिलेंगे, जहां अभिनेताओं ने अपनी ढलती उम्र, झड़ते बालों और चेहरे की झुर्रियों को दुनिया की नजरों से छिपाने के लिए अपनी पूरी जिंदगी एक नकाब के पीछे जी ली। आज शाहरुख़ खान और आमिर खान भी उम्र छुपाने के जतन में कोई कमी नहीं रखते, पर इस भीड़ में तमिल और हिंदी अभिनेता रजनीकांत अपवाद है, जो कैमरे से हटते ही अपने असल रूप में आने में देर नहीं करता।
उम्र भर जवान बने रहने और खुद को सदाबहार साबित करने की इस होड़ में सबसे बड़ा और दिलचस्प नाम आता है दिग्गज अभिनेता देव आनंद का। देव साहब सिर्फ परदे पर ही नहीं, बल्कि अपनी असल जिंदगी में भी ढलती उम्र को स्वीकार करने के सख्त खिलाफ थे। 80 का आंकड़ा पार कर जाने के बाद भी वे उसी ऊर्जा, गले में स्कार्फ, सिर पर खास अंदाज की टोपी और अपनी विशिष्ट चाल के साथ जनता के सामने आते थे। उनके भीतर खुद को हमेशा जवान और रोमांटिक हीरो बनाए रखने का ऐसा जुनून था कि उन्होंने उम्र के आखिरी पड़ाव तक मुख्य अभिनेता के रूप में फिल्में बनाना जारी रखा, भले ही दर्शक और समीक्षक उनके उस ढलते रूप को देखकर असहज होते रहे। देव आनंद की यह चाहत सिर्फ उनके पहनावे या फिल्मों तक सीमित नहीं थी, बल्कि उनकी मौत के बाद की छवि से भी जुड़ी थी। वे नहीं चाहते थे कि दुनिया कभी भी उनके कमजोर, ढले हुए या बेजान शरीर को देखे। उन्होंने अपने परिवार से कह दिया था कि उनकी मृत्यु के बाद उनका मृत चेहरा किसी को न दिखाया जाए, न फोटो सामने आए। जहां भी उनका निधन हो, बिना किसी को सूचना दिए वहीं चुपचाप उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाए। यही वजह थी कि जब लंदन में उनका निधन हुआ, तो उनका अंतिम संस्कार वहीं किया गया। वे दुनिया के जेहन में हमेशा उसी मुस्कुराते, रोमांटिक और जिंदादिल ‘सदाबहार देव आनंद’ की छवि छोड़ जाना चाहते थे, किसी बूढ़े या बेजान इंसान की तस्वीर नहीं। यह प्रसंग दिखाता है कि उम्र और मौत के आगे न झुकने की जिद किस हद तक किसी कलाकार के वजूद पर हावी हो सकती है।
इन्होंने जिंदगीभर गंजेपन को छुपाया
ब्लैक एंड व्हाइट और शुरुआती रंगीन सिनेमा के दौर में तकनीक इतनी उन्नत नहीं थी कि डिजिटल एडिटिंग या वीएफएक्स के जरिए किसी के चेहरे से झुर्रियां मिटाई जा सकें। इसलिए उस दौर के सितारे शारीरिक रूप से अपनी कमियों को छिपाने के लिए तरह-तरह के जतन करते थे। बीते दौर के मशहूर और रोबीले अभिनेता राजकुमार और जाने-माने अभिनेता व निर्देशक राकेश रोशन की मिसाल ली जा सकती है। ये दोनों ही दिग्गज अपने दौर में गंजेपन की समस्या से जूझ रहे थे। लेकिन, अपने स्टारडम और अपनी हीरो वाली छवि को बचाए रखने के लिए उन्होंने कभी सार्वजनिक रूप से बिना विग के आना स्वीकार नहीं किया। राजकुमार ने जीवन भर अपने सिर पर ऐसी विग पहनी कि आम जनता को कभी आभास ही नहीं हुआ कि उनके प्राकृतिक बाल नहीं हैं। राकेश रोशन ने भी अपनी पूरी जवानी और अभिनय के करियर के दौरान सिर पर घने बालों वाली विग लगाए रखी। उनके लिए विग केवल एक मेकअप का सामान नहीं थी, बल्कि उनकी उस पहचान का हिस्सा थी जिसके सहारे वे परदे पर हीरो बने रह सकते थे।
अमिताभ छुपते हैं फैंस के सामने
इसी तरह, महानायक अमिताभ बच्चन का अपने प्रशंसकों के प्रति समर्पण और अपनी सार्वजनिक छवि को लेकर सजगता सर्वविदित है। उम्र के इस पड़ाव पर भी जब वे हर रविवार को अपने बंगले ‘जलसा’ के बाहर प्रशंसकों का अभिवादन स्वीकार करने आते हैं। उस वक़्त वे अपनी वेशभूषा और ग्रूमिंग का पूरा ध्यान रखते हैं। वे सिर पर कपड़ा या स्कार्फ बांधकर बाहर निकलते हैं, ताकि उनके ढले हुए रूप या असल बालों की छवि किसी कैमरे में कैद न हो जाए। यह सतर्कता इस बात का प्रमाण है कि 80 वर्ष की उम्र पार कर जाने के बाद भी सुपरस्टार का ताज सिर पर बनाए रखने का दबाव कितना भारी होता है। स्टारडम और यूथफुल लुक को बनाए रखने का ऐसा ही एक रोचक और थोड़ा दुखद वाकया सदाबहार अभिनेता अनिल कपूर के साथ भी देखने को मिला। अनिल कपूर को दशकों से उनकी कभी न ढलने वाली उम्र और ‘एवरग्रीन’ लुक के लिए जाना जाता है। लेकिन, हाल ही में जब सोशल मीडिया पर उनके खिचड़ी (सफेद और काले) बालों वाली एक अनदेखी तस्वीर बिना उनकी मर्जी के किसी ने खींचकर पोस्ट कर दी, तो वे काफी असहज हो गए। वजह साफ थी दशकों से जिस ‘रिवर्स एजिंग’ वाली जादुई छवि को उन्होंने सहेजकर रखा था, उस पर अचानक वास्तविकता का कड़ा प्रहार हुआ था।
नायिकाएं भी इस दौड़ में पीछे नहीं
ग्लैमर की इस दौड़ में पुरुष कलाकारों के साथ-साथ महिला कलाकारों पर भी खूबसूरत और हमेशा जवां दिखने का दबाव और भी ज्यादा क्रूर रहा है। इसकी सबसे बड़ी मिसाल बॉलीवुड की एवरग्रीन ब्यूटी रेखा हैं। 70 वर्ष का आंकड़ा पार करने के बाद भी रेखा जब किसी अवॉर्ड शो, शादी या सार्वजनिक कार्यक्रम में कदम रखती हैं, तो वे बिल्कुल किसी नवविवाहिता या ढलती उम्र से बेखबर हसीन मलिका की तरह सजी-धजी नजर आती हैं। उनके बारे में तो फिल्म इंडस्ट्री में यहाँ तक कहा जाता है कि वे बिना भारी-भरकम मेकअप, रेशमी साड़ियों और जेवरों के अपने बेडरूम या घर के कमरे से बाहर भी कदम नहीं रखतीं। उनका पूरा जीवन एक ऐसे तिलिस्म को बनाए रखने की कोशिश बन गया है, जहां उम्र ठहर सी गई है। वे अपनी असली उम्र को स्वीकार करने के बजाय हमेशा उस काल्पनिक सुंदरता के खोल में कैद रहना पसंद करती हैं जो दर्शकों ने दशकों पहले परदे पर देखी थी। हालांकि, इसी ग्लैमरस दुनिया में कुछ ऐसे विरले और साहसी अपवाद भी रहे हैं जिन्होंने उम्र के प्राकृतिक नियम को सहर्ष स्वीकार किया और ढलती उम्र के साथ मिलने वाले बड़प्पन व गरिमा को अपनी असली पहचान बनाया।
आशा और जया जैसे उदाहरण अपवाद
अभिनेत्री आशा पारेख और जया भादुड़ी (बच्चन) इसके बेहद सुंदर उदाहरण हैं। आशा पारेख ने अपने जमाने में अपार सफलता देखी, लेकिन जब उम्र ढलने लगी, तो उन्होंने नकली बालों, झुर्रियां छिपाने वाले कॉस्मेटिक सर्जरी या कृत्रिम रंगों का सहारा लेने से मना कर दिया। वे आज अपने पूरी तरह सफेद हो चुके बालों और चेहरे की स्वाभाविक झुर्रियों के साथ पूरी गरिमा और गर्व से दुनिया के सामने आती हैं। इसी तरह जया बच्चन ने भी कभी अपने सफेद बालों को छिपाने या खुद को जबरन जवान दिखाने की बचकानी कोशिश नहीं की। उन्होंने उम्र के हर पड़ाव को उसी रूप में अपनाया जैसा कुदरत ने उन्हें दिया। आशा पारेख या जया बच्चन जैसे उदाहरण अपवाद ही हैं। ज्यादातर कलाकारों के लिए उम्र को धोखा देना एक मजबूरी बन जाता है। सिनेमा का व्यापार और दर्शकों का मनोविज्ञान ही कुछ ऐसा है कि जो दिखता है, वही बिकता है। आज के आधुनिक दौर में तो यह होड़ और भी ज्यादा भयावह हो चुकी है। अब केवल विग या मेकअप तक बात सीमित नहीं रही है; आज के सितारे बोटॉक्स, फेशियल लिफ्टिंग, हेयर ट्रांसप्लांट, लिपोसक्शन और न जाने कितनी तरह की दर्दनाक सर्जरी का सहारा लेकर अपनी ढलती त्वचा को कसने और खुद को जवान दिखाने में लगे हैं।
आकर्षक दिखने की चाहत या मज़बूरी
इस पूरी मानसिक स्थिति के पीछे कलाकारों की एक बहुत बड़ी मानवीय कमजोरी छिपी होती है असुरक्षा की भावना। जिस इंसान ने अपनी जवानी में लाखों-करोड़ों लोगों की तालियां, सीटी और अंधा प्यार देखा हो, उसके लिए अचानक एक दिन आईने में अपनी झुर्रियां देखना और यह अहसास करना कि उसका दौर अब ढल रहा है, बेहद दर्दनाक होता है। वे भूल जाते हैं कि उम्र का बढ़ना एक प्राकृतिक और अटल सत्य है जिसे कोई भी बोटॉक्स या सिक्स-पैक एब्स हमेशा के लिए रोक नहीं सकते। जब दर्शक किसी अभिनेता को उसकी अभिनय क्षमता के बजाय केवल उसके लुक के लिए पूजने लगते हैं, तो अभिनेता भी खुद को एक वस्तु या केवल एक आकर्षक चेहरे के रूप में देखने लगता है।
उम्र को धोखा देकर खुद को हमेशा यंग दिखाने की यह जिद फिल्म कलाकारों की सबसे बड़ी त्रासदी भी है और उनकी सबसे बड़ी कमजोरी भी। वे पूरी जिंदगी परदे पर दूसरों का किरदार निभाते हैं, लेकिन अफसोस की बात यह है कि अपनी असल जिंदगी में भी वे अपने वास्तविक रूप यानी अपनी ढलती उम्र और स्वाभाविक शरीर को स्वीकार नहीं कर पाते। वे उम्रभर एक ऐसे भ्रम और नकाब को ओढ़े रहते हैं जो कभी न कभी टूट ही जाता है। अगर कलाकार और दर्शक दोनों यह समझ लें कि ढलती उम्र के साथ आने वाली झुर्रियां अनुभव, परिपक्वता और अभिनय की गहराई का प्रतीक होती हैं, न कि किसी कमजोरी का, तो शायद हमारे सितारों को अपनी टी-शर्ट उतारकर अपनी जवानी का सबूत नहीं देना पड़ेगा और न ही पूरी जिंदगी किसी विग या भारी मेकअप के पीछे छुपकर गुजारनी पड़ेगी।
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