राजनीति में चुनाव सिर्फ हार और जीत का खेल नहीं होता, बल्कि यह नेतृत्व की क्षमता, संगठन की मजबूती और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को बदलने की योग्यता की भी परीक्षा होती है। कई बार चुनावी पराजय किसी नेता के राजनीतिक जीवन का अंत साबित होती है, तो कई बार वही हार आगे की बड़ी सफलता की आधारशिला बन जाती है। बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर की हाल की जीत इसी उदाहरण के रूप में देखी जा सकती है। विधानसभा चुनाव में लगभग पूरी तरह असफल रहने के बाद जिस नेता को राजनीतिक विश्लेषकों ने समय से पहले खारिज कर दिया था, उसी नेता ने कुछ महीनों बाद बांकीपुर जैसे कठिन निर्वाचन क्षेत्र में जीत दर्ज कर यह संकेत दिया कि राजनीति में अंतिम निर्णय मतदाता देता है, राजनीतिक टिप्पणीकार नहीं।
000
● हेमंत पाल
बिहार विधानसभा चुनाव के बाद 'जन सुराज' की स्थिति अत्यंत निराशाजनक थी। बड़ी संख्या में उम्मीदवार मैदान में उतरे, लेकिन अधिकांश अपनी जमानत तक नहीं बचा सके। परिणाम आने के तुरंत बाद यह धारणा बनने लगी कि प्रशांत किशोर का राजनीतिक प्रयोग विफल हो चुका है। यह भी कहा गया कि चुनावी रणनीतिकार के रूप में सफल रहे व्यक्ति की राजनीति में प्रत्यक्ष भूमिका निभाने की क्षमता सीमित है। लेकिन, प्रशांत किशोर ने इस आलोचना का जवाब बयानबाजी से नहीं, बल्कि संगठन और रणनीति में बदलाव के जरिए देने का रास्ता चुना। भारतीय राजनीति में हार के बाद नेताओं को चुनाव आयोग, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन, संगठन या सहयोगियों को दोष देना आम बात रही है। इसके विपरीत प्रशांत किशोर ने सार्वजनिक रूप से पराजय स्वीकार की और आत्ममंथन का रास्ता अपनाया। यही उनकी राजनीति का पहला महत्वपूर्ण मोड़ माना जा सकता है। किसी भी राजनीतिक दल के लिए हार के बाद सबसे बड़ा सवाल यह होता है, कि वह अपनी कमियों को स्वीकार करता है या नहीं। जन सुराज ने इस मामले में अपेक्षाकृत अलग रवैया अपनाया।
चुनाव के बाद प्रशांत किशोर ने जिस प्रकार सार्वजनिक गतिविधियों से कुछ समय की दूरी बनाकर आत्मचिंतन का संदेश दिया, उसका राजनीतिक महत्व भी था। यह केवल व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, बल्कि कार्यकर्ताओं और समर्थकों को यह संकेत भी था कि पार्टी हार के कारणों को समझे बिना आगे नहीं बढ़ेगी। इसके बाद संगठनात्मक ढांचे में जो परिवर्तन हुए, उन्होंने 'जन सुराज' की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सबसे बड़ा परिवर्तन पार्टी की कार्यशैली में दिखाई दिया। विधानसभा चुनाव के दौरान 'जन सुराज' में बड़ी संख्या में ऐसे लोग सक्रिय थे, जिनकी पहचान पेशेवर चुनाव प्रबंधन से जुड़ी थी। सोशल मीडिया, डिजिटल प्रचार और चुनावी ब्रांडिंग पर विशेष जोर दिया गया था। लेकिन, बिहार जैसे राज्य में केवल डिजिटल मौजूदगी चुनावी सफलता की गारंटी नहीं बन सकती। यहां बूथ स्तर का संगठन, जातीय समीकरण, स्थानीय नेतृत्व और लगातार जनसंपर्क कहीं अधिक प्रभावी साबित होते हैं। चुनाव परिणामों ने इस वास्तविकता को स्पष्ट कर दिया।
इस अनुभव से सीखते हुए प्रशांत किशोर ने संगठन की प्राथमिकताओं को बदला। पेशेवर चुनावी मॉडल की जगह समर्पित कार्यकर्ताओं पर भरोसा बढ़ाया। बूथ स्तर पर संगठन तैयार करने, स्थानीय इकाइयों को सक्रिय करने और अलग-अलग सामाजिक समूहों तक नियमित पहुंच बनाने की रणनीति अपनाई गई। बड़ी जनसभाओं और सोशल मीडिया अभियानों की तुलना में छोटे समूहों के संवाद, मोहल्ला बैठकों और घर-घर संपर्क पर अधिक ध्यान दिया गया। यह बदलाव केवल रणनीति का नहीं, बल्कि राजनीतिक सोच का परिवर्तन था। राजनीति में आर्थिक पारदर्शिता और व्यक्तिगत प्रतिबद्धता भी कार्यकर्ताओं के मनोबल को प्रभावित करती है। प्रशांत किशोर ने अपनी आय और संपत्ति का बड़ा हिस्सा पार्टी को समर्पित करने की घोषणा कर यह संदेश देने का प्रयास किया कि 'जन सुराज' केवल चुनावी मंच नहीं, बल्कि दीर्घकालिक राजनीतिक परियोजना है। साथ ही उन्होंने पार्टी से जुड़े लोगों से आर्थिक सहयोग की अपेक्षा रखकर यह संकेत भी दिया कि संगठन बाहरी संसाधनों पर निर्भर रहने के बजाय अपने समर्थकों की भागीदारी से आगे बढ़ेगा। इस मॉडल का उद्देश्य कार्यकर्ताओं में स्वामित्व की भावना पैदा करना था।
बांकीपुर उपचुनाव इसी बदली हुई रणनीति की पहली बड़ी परीक्षा बना। यह सीट लंबे समय से भारतीय जनता पार्टी का मजबूत गढ़ रही है। ऐसे क्षेत्र में चुनाव लड़ना स्वयं में जोखिम भरा निर्णय था। यदि यहां भी पराजय होती, तो 'जन सुराज' की राजनीतिक विश्वसनीयता पर और गंभीर प्रश्न उठते। लेकिन, प्रशांत किशोर ने इसी चुनौती को अवसर में बदलने का प्रयास किया। इस चुनाव में उन्होंने राज्यस्तरीय बड़े राजनीतिक विमर्श की बजाय स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता दी। जलभराव, यातायात, रोजगार और शहरी अव्यवस्था जैसे विषय लगातार जनता के बीच उठाए गए। इससे चुनाव राष्ट्रीय राजनीतिक बहस से हटकर स्थानीय असंतोष के इर्द-गिर्द केंद्रित होने लगा। यह रणनीति इसलिए भी प्रभावी रही, क्योंकि स्थानीय चुनावों में मतदाता अक्सर अपने दैनिक जीवन से जुड़े मुद्दों पर अधिक प्रतिक्रिया देते हैं। प्रशांत किशोर की एक और महत्वपूर्ण रणनीति यह रही कि उन्होंने स्वयं को राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन और महागठबंधन दोनों के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया। बिहार में लंबे समय से राजनीति दो प्रमुख ध्रुवों के बीच घूमती रही है। ऐसे में उन मतदाताओं को आकर्षित करना, जो दोनों पक्षों से असंतुष्ट थे, 'जन सुराज' के लिए स्वाभाविक राजनीतिक अवसर था। यदि कोई तीसरा दल केवल विरोध की राजनीति करता तो उसकी स्वीकार्यता सीमित रहती है, लेकिन यदि वह व्यवहारिक विकल्प प्रस्तुत करता है. तो उसके लिए राजनीतिक जमीन बन सकती है।
इस पूरे अभियान में एक और राजनीतिक पहलू महत्वपूर्ण रहा। भरत तिवारी एनकाउंटर का मुद्दा लगातार चर्चा में बना रहा। इस विषय को प्रशांत किशोर ने निरंतर राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बनाए रखा। माना गया कि इस मुद्दे ने विशेष रूप से उन मतदाताओं के बीच प्रभाव डाला, जो परंपरागत रूप से भाजपा के समर्थक माने जाते रहे हैं। दूसरी ओर मुख्य विपक्षी दल इस मुद्दे को उतनी प्रभावशीलता से राजनीतिक समर्थन में परिवर्तित नहीं कर सके। इससे 'जन सुराज' को उन वर्गों तक पहुंच बनाने का अवसर मिला, जहां पहले उसकी मौजूदगी सीमित थी। चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा नेताओं के कुछ आत्मविश्वास से भरे बयानों ने भी राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया। जब किसी दल को अपनी जीत पूरी तरह सुनिश्चित मानने का संदेश जाता है, तो कई बार मतदाता इसके विपरीत प्रतिक्रिया भी देते हैं। बांकीपुर के परिणामों ने यह संकेत दिया कि किसी भी निर्वाचन क्षेत्र को केवल परंपरागत राजनीतिक गढ़ मानकर नहीं चला जा सकता। मतदाता समय-समय पर अपने फैसलों से स्थापित धारणाओं को बदलने की क्षमता रखते हैं।
हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि बांकीपुर की जीत को पूरे बिहार की राजनीतिक तस्वीर का अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। उपचुनाव और विधानसभा चुनाव की प्रकृति अलग होती है। उपचुनाव स्थानीय परिस्थितियों, उम्मीदवार की छवि और तत्कालीन राजनीतिक वातावरण से अधिक प्रभावित होते हैं, जबकि विधानसभा चुनाव में व्यापक संगठन, संसाधन, गठबंधन और राज्यव्यापी समीकरण निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इसलिए जन सुराज के सामने अभी भी अपनी नई रणनीति को पूरे राज्य में प्रभावी ढंग से लागू करने की चुनौती बनी हुई है। फिर भी यह स्वीकारना होगा कि प्रशांत किशोर ने एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश दिया है। उन्होंने यह दिखाया कि हार के बाद केवल बयान बदलने से नहीं, बल्कि संगठन, रणनीति और कार्यशैली बदलने से राजनीतिक वापसी संभव होती है। बिहार की राजनीति में उनकी यह वापसी केवल एक सीट की जीत नहीं है, बल्कि यह इस बात का संकेत है कि लगातार सीखने और परिस्थितियों के अनुसार स्वयं को ढालने वाला नेतृत्व लंबे समय तक प्रासंगिक बना रह सकता है। आने वाले वर्षों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बांकीपुर की सफलता एक अपवाद साबित होती है या बिहार की राजनीति में किसी नए राजनीतिक अध्याय की शुरुआत।
---------------------------------------------------------------------------------------------------------------------



No comments:
Post a Comment