Friday, August 14, 2026

'नायक' से 'जन नायकन' और जंतर मंतर की पटकथा

सिनेमा और समाज का रिश्ता हमेशा से गहरा रहा है। यही वजह है कि बड़ा परदा सिर्फ कहानियां नहीं फिल्माता, वक्त-बे-वक्त प्रशासनिक व्यवस्था और सामाजिक सरोकारों के खिलाफ उठती चेतना का प्रतिबिंब भी बनता है। जब भी समाज में भ्रष्टाचार, निरंकुशता या नफरत का दौर गहराया, तब एक काल्पनिक 'जन नायक' जन्मा, जिसने आम जनता के अधिकारों और लोकतंत्र के अस्तित्व को बचाने के लिए कड़े कदम उठाए। 'जना नायकन' जैसी फिल्मों ने नारी सशक्तिकरण को उजागर करती हैं, धार्मिक नफरत और कट्टरता के खिलाफ लोकतंत्र के रक्षक के रूप में खड़ी होती हैं। उसी सिनेमा विरासत का एक हिस्सा 'नायक' जैसी फिल्में हैं, जिनमें रातों-रात व्यवस्था बदलने और जनहित में ऐतिहासिक फैसले लेने के फंतासी कारनामे हैं। परदे पर अकेला नायक पूरी व्यवस्था को चुनौती देता दिखे, लेकिन असल जीवन में लोकतंत्र की रक्षा एक के कंधों पर नहीं है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर इंसाफ की आवाज बुलंद करने वाला आंदोलन इसी कड़वी सच्चाई का प्रमाण है। यह दर्शाता है, कि असली 'जन नायक' एक व्यक्ति नहीं, अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करने वाली जनशक्ति है।
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- हेमंत पाल

     सिनेमा सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि समय-समय पर इसने समाज का आईना बनने के साथ राजनीतिक और सामाजिक चेतना के जगाने का काम भी किया। जब व्यवस्था में भ्रष्टाचार, निरंकुशता और धार्मिक विषैलेपन का बोलबाला हुआ, तब सिनेमा के परदे पर ऐसे 'जना नायकन' का जन्म हुआ, जिसने जनता की आवाज बनकर लोकतंत्र की रक्षा का बीड़ा उठाया। निर्माता एच विनोथ की हाल की यह फ़िल्म इसी परंपरा को आगे बढ़ाती हुई एक सशक्त रूप में सामने आई है। हालांकि, यह फिल्म नंदामुरी बालकृष्ण की 2023 की हिट फिल्म 'भगवंत केसरी' की रीमेक है। यह एक पूर्व पुलिस अफसर के एक लड़की को सशक्त बनाकर भारतीय सेना में भेजने की कहानी थी। लेकिन, विनोथ ने इसमें राजनीतिक तेवर और सामाजिक संदेशों की एक ऐसी नई परत जोड़ी, जिसने इसे रीमेक से अलग कर लोकतंत्र के रक्षक की कहानी बना दिया। विजय थलापति की 'जना नायकन' की कहानी पिता-पुत्री के भावनात्मक रिश्ते, नारी सशक्तिकरण और डर से संघर्ष के इर्द-गिर्द घूमती है। 
     अपने मित्र इंस्पेक्टर श्रीकांत की असमय मृत्यु के बाद, थलपति वेट्री कोंडन (विजय) उनकी बेटी विजी (ममिता बैजू) के संरक्षक की भूमिका निभाता है। विजी मानसिक आघात के कारण एक गहरे डर से जूझ रही है, जो एक छोटी सी आवाज से सिहर उठती है। वेट्री का उद्देश्य केवल उसे सेना में शामिल कराना ही नहीं, बल्कि उसके भीतर के भय को समाप्त कर उसे आत्मनिर्भर बनाना है। कहानी तब एक बड़ा राजनीतिक मोड़ लेती है, जब इसमें जॉन हिमलर (बॉबी देओल) के रूप में एक खतरनाक खलनायक का प्रवेश होता है। जहां मूल फिल्म में खलनायक का उद्देश्य व्यावसायिक साम्राज्य स्थापित करना था, वहीं 'जना नायकन' में निर्देशक ने एक नई परत जोड़ते हुए उसे धार्मिक घृणा और कट्टरता के जरिए भारत के लोकतंत्र को नष्ट करने वाली शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया है। यहीं से वेट्री कोंडन का चरित्र केवल एक अभिभावक न रहकर एक ऐसे नायक के रूप में उभरता है, जो देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए ढाल बनकर खड़ा होता है।
     फिल्म 'जना नायकन' को अगर इस पूरे परिदृश्य में रखकर देखा जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि यह फिल्म विजय थलापति की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और उनकी जन-नायक की छवि को मजबूत करने का एक सुनियोजित प्रयास है। एमजीआर के दौर से ही दक्षिण भारतीय सिनेमा में फिल्मों का इस्तेमाल राजनीतिक संदेश देने और नायक को जनता के तारणहार के रूप में स्थापित करने के लिए होता रहा है। 'जना नायकन' भी इसी परंपरा का निर्वहन करती है। फिल्म में जब वेट्री कोंडन धार्मिक नफरत फैलाने वाली ताकतों से मुकाबला करता है, तो वह केवल एक फिल्मी विलेन से नहीं लड़ रहा होता, बल्कि वह समकालीन समाज में मौजूद कट्टरता और भय के माहौल के खिलाफ एक मजबूत स्टैंड ले रहा होता है। यह मोड़ फिल्म को मनोरंजन के दायरे से निकालकर एक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना देता है।
      व्यावसायिक सिनेमा की इस शैली में लोकतंत्र की रक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था को रातों-रात या त्वरित फैसलों से बदलने का विचार कोई नया नहीं है। हिंदी फिल्म 'नायक' इसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है। एस शंकर के निर्देशन में बनी और अनिल कपूर द्वारा जीवंत की गई इस फिल्म में एक आम पत्रकार (शिवाजी राव) को एक दिन का मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिलता है। समय की अत्यधिक बाध्यता के कारण शिवाजी राव औपचारिकताओं के जाल में उलझने के बजाय रास्ते चलते कड़े और त्वरित आदेश जारी करता है। भ्रष्टाचार में लिप्त अधिकारियों को निलंबित करना, राशन की दुकानों में कालाबाजारी रोकना और आम जनता की समस्याओं का मौके पर ही निवारण करना जैसी उसकी शैली ने जनता को एक काल्पनिक लेकिन बेहद संतोषजनक राहत दी थी। 'नायक' ने दिखाया था कि यदि इच्छाशक्ति मजबूत हो और नीतियां स्पष्ट हों, तो व्यवस्था में सुधार असंभव नहीं है।
      इसी तरह की लोकतांत्रिक चेतना और व्यवस्था से टकराव की भावना अमिताभ बच्चन की फिल्म 'इंकलाब' में भी देखने को मिली है। आठवें दशक के उस दौर में जब राजनीति और अपराध का गठजोड़ चरम पर था, 'इंकलाब' का नायक भ्रष्टाचार और राजनीतिक सड़न को मिटाने के लिए अतिवादी, लेकिन लोकतांत्रिक शुद्धिकरण का रास्ता चुनता है। इसी कड़ी में प्रकाश झा की फिल्म 'राजनीति' और 'सत्याग्रह' का नाम भी प्रमुखता से लिया जा सकता है। 'सत्याग्रह' में अमिताभ बच्चन और अजय देवगन का किरदार एक समानांतर व्यवस्था खड़ी करके सरकार को जनहित में कड़े फैसले लेने पर मजबूर करता है। वहीं दूसरी ओर, 'युवा' और 'रंग दे बसंती' जैसी फिल्मों ने यह दिखाया कि जब तक देश की युवा शक्ति राजनीतिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनती या व्यवस्था के खिलाफ आवाज नहीं उठाती, तब तक सच्चा लोकतंत्र कायम नहीं हो सकता। इन सभी फिल्मों का मूल संदेश यही रहा है कि एक नायक अपनी निडरता और फैसलों से कैसे एक पूरी भ्रष्ट व्यवस्था को चुनौती देकर जनता के अधिकारों की रक्षा कर सकता है।
     वास्तविक जीवन में भी जब कभी लोकतंत्र पर संकट आया है या जनता के अधिकारों का हनन हुआ, तब ऐसी ही नाटकीय और ऐतिहासिक घटनाएं सड़कों पर घटित हुई हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुआ छात्र आंदोलन इसी तरह की जन-चेतना का एक उदाहरण है। सिनेमा कहानियों और इस तरह के जमीनी आंदोलनों में फर्क सिर्फ इतना होता है कि फिल्मों में नायक प्रायः अकेला होता है, जो पूरी व्यवस्था से टकरा जाता है। जबकि, वास्तविक आंदोलनों में नायक अकेला नहीं होता, उसके पीछे एक जागरूक जनसमूह और युवाओं की एक बड़ी फौज होती है। जंतर-मंतर पर जुटे छात्रों ने भी अपने उस मंतव्य को पूरा करने के लिए शांतिपूर्ण और संवैधानिक संघर्ष किया, जिसके लिए वह आंदोलन शुरू हुआ था। यह आंदोलन साबित करता है कि लोकतंत्र केवल मतपेटी तक सीमित नहीं है, बल्कि जब नागरिक अपने अधिकारों के लिए सजग होकर खड़े होते हैं, तभी लोकतंत्र वास्तव में जीवित और सुरक्षित रहता है।
      चाहे फिल्म का 'नायक' का एक दिन का मुख्यमंत्री हो, 'सत्याग्रह' का जन-आंदोलन हो या फिर 'जना नायकन' का लोकतंत्र रक्षक थलपति वेट्री कोंडन। सिनेमा हमेशा से जनता की इस गहरी इच्छा को व्यक्त करता आया है कि कोई आए और इस तंत्र की कमियों को दूर करे। 'जना नायकन' मसाला सिनेमा के तमाम तामझाम, एक्शन दृश्यों और पारिवारिक भावनाओं के बीच भी लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों समानता, भयमुक्त समाज और धार्मिक सौहार्द की वकालत करती है। यह फिल्म इस बात का प्रतीक है कि जब सिनेमा व्यावसायिकता के साथ-साथ एक राजनीतिक और लोकतांत्रिक दायित्व को अपने कंधों पर उठाता है, तो वह केवल एक मनोरंजन का साधन न रहकर समाज के लिए एक प्रेरणा बन जाता है।
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