Friday, August 14, 2026

सिनेमा का दर्द, विभाजन की कसक


     देश के इतिहास में 15 अगस्त 1947 का दिन जहां एक तरफ आजादी का महान उल्लास लेकर आया, वहीं दूसरी तरफ देश के दो टुकड़ों में बंट जाने का एक ऐसा नासूर छोड़ गया, जिसकी कसक और टीस आज दशकों बाद भी भारतीय जनमानस के दिलों में जिंदा है। फिल्मकारों ने भी इस मानवीय त्रासदी को हमेशा अपनी संवेदना के केंद्र में रखा। बीते आठ दशकों में बंटवारे के इस असीम दर्द, मानसिक द्वंद्व और नफरत के बीच सुलगती इंसानियत को बेहद संजीदगी से अलग-अलग कथानकों के जरिए परदे पर उतारा गया है। 
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- हेमंत पाल
 
    देश के बंटवारे का दर्द हर भारतीय के दिल में टीस बनकर कचोटता है। इस विषय को फिल्मकारों ने बीते दशकों में कई तरह से फिल्माया और दर्शकों को उस दर्द को याद दिलाया है। हाल ही में इस संवेदनशील और ऐतिहासिक विषय को लेकर एक बार फिर सिनेमा जगत में बड़ी हलचल हुई। आमिर खान की प्रोडक्शन कंपनी ने अभिनेता सनी देओल को लेकर 'बंटवारा 1947' नाम से फिल्म का निर्माण किया है। यह फिल्म इस बात का सीधा प्रमाण है कि विभाजन का वह दौर, उसका दर्द और संघर्ष आज भी एक ऐसा विषय है, जो हर दौर के दर्शकों और फिल्मकारों को गहरे स्तर पर झकझोरता और आकर्षित करता है। 'बंटवारा 1947' के माध्यम से एक बार फिर बड़े परदे पर उस दौर की भयावहता, विस्थापन की पीड़ा और मानवीय रिश्तों के टूटने-जुड़ने की दास्तान को नए दृष्टिकोण और भव्य पैमाने के साथ पेश किया गया है, जो पुरानी यादों को ताज़ा करते हुए नई पीढ़ी को इतिहास के इस दुखद अध्याय से रूबरू कराती है।
    आजादी के बाद से अब तक अगर विभाजन के विषय पर बनी फिल्मों के सफरनामे को काल के क्रम के अनुसार देखें, तो भारतीय सिनेमा ने हर दशक में इस त्रासदी को अलग-अलग कोणों से समझने और बयां करने का प्रयास किया है। इस कड़ी में पहली शुरुआत प्रभावशाली तरीके से यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी फिल्म 'धर्मपुत्र' से हुई, जो वर्ष 1961 में रिलीज़ हुई थी। आचार्य चतुरसेन के प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित इस फिल्म में शशि कपूर और माला सिन्हा ने मुख्य भूमिकाएं निभाई। यह फिल्म बंटवारे के दौर में पनपे धार्मिक कट्टरपंथ और अपनी ही पहचान को लेकर मन में उठते द्वंद्व पर करारा प्रहार करती है। फिल्म उस दौर में हिंदू-मुस्लिम एकता का एक बेहद मजबूत और जरूरी संदेश देती है, जो यह दर्शाता है कि राजनीति और धर्म के नाम पर इंसानी रिश्तों को कैसे बलि चढ़ाया गया था।
    इसके बाद वर्ष 1973 में आई फिल्म 'गर्म हवा' को विभाजन पर बनी भारतीय सिनेमा की सबसे प्रामाणिक, संवेदनशील और यथार्थवादी फिल्मों में गिना जाता है। महान निर्देशक एमएस सथ्यू के निर्देशन में बनी इस फिल्म में बलराज साहनी, फारूक शेख और गीता सिद्धार्थ ने अपनी अभिनय क्षमता की अमिट छाप छोड़ी थी। लेखिका इस्मत चुगताई की कहानी और कैफी आजमी की कालजयी पटकथा पर आधारित यह फिल्म आगरा के एक मुस्लिम व्यवसायी सलीम मिर्जा और उनके परिवार के संघर्ष की मर्मस्पर्शी दास्तान है। फिल्म उन परिवारों की मानसिक, सामाजिक और आर्थिक पीड़ा को उकेरती है, जिन्होंने विभाजन के बाद अपने वतन में ही रहने का फैसला किया था। लेकिन, फिर भी उन्हें हर कदम पर शक, बेगानेपन और आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। बलराज साहनी का अभिनय सलीम मिर्जा के रूप में दर्शक के दिल को छूने वाला था। 
    अस्सी के दशक में दूरदर्शन के दौर में वर्ष 1987 में आया धारावाहिक 'तमस' न केवल एक टीवी के कार्यक्रम के रूप में बल्कि एक यादगार सिनेमेटिक अनुभव के रूप में इतिहास में दर्ज हुआ। गोविंद निहलानी द्वारा निर्देशित और भीष्म साहनी के चर्चित उपन्यास पर आधारित इस कृति में ओम पूरी, दीप्ति नवल, अमरीश पुरी और स्वयं भीष्म साहनी जैसे दिग्गज कलाकारों ने अभिनय किया था। 'तमस' धारावाहिक बंटवारे से ठीक पहले और उस दौरान भड़के सांप्रदायिक दंगों, राजनीतिक षड्यंत्रों और इन सबके बीच पिसते आम, बेकसूर लोगों की तबाही का सबसे नग्न और यथार्थवादी खाका खींचता है। यह दिखाता है कि कैसे चंद स्वार्थी ताकतों के उकसावे में आकर सदियों से साथ रहने वाले पड़ोसी एक-दूसरे के खून के प्यासे बन गए थे।
    नब्बे के दशक के उत्तरार्ध में विभाजन के विषय पर कई महत्वपूर्ण साहित्यिक कृतियों को परदे पर उतारा गया। इस क्रम में वर्ष 1998 में निर्देशक पमेला रूक्स की फिल्म 'ट्रेन टू पाकिस्तान' आई, जो खुशवंत सिंह के विश्व प्रसिद्ध उपन्यास पर आधारित थी। निर्मल पांडे, रजित कपूर, दिव्या दत्ता और स्मृति मिश्रा के सशक्त अभिनय से सजी यह फिल्म भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित 'मनोमाजरा' नामक एक शांत गांव की कहानी कहती है। फिल्म यह दर्शाती है कि कैसे सीमा पार से लाशों से भरकर आने वाली ट्रेनों के खौफनाक मंजर ने उस गांव के भाईचारे और शांति को नफरत की आग में झोंक दिया था।
    1998 में दीपा मेहता के निर्देशन में बनी फिल्म '1947 अर्थ' रिलीज हुई, जो बीपसी सिधवा के उपन्यास 'क्रैकिंग इंडिया' पर आधारित थी। इस फिल्म में आमिर खान, नंदिता दास और राहुल खन्ना ने मुख्य भूमिकाएं निभाई। लाहौर की पृष्ठभूमि पर आधारित यह फिल्म बहुत ही बारीकी से दिखाती है कि कैसे बंटवारे की सांप्रदायिक आग ने सदियों पुरानी दोस्तों की टोलियों, मासूम प्यार और इंसानी रिश्तों को पल भर में जलाकर राख कर दिया। फिल्म में आमिर खान द्वारा निभाया गया 'दिल नवाज' (आइस-कैंडी मैन) का किरदार नफरत और जुनून के उस बदलाव को दर्शाता है जो उस दौर में साधारण इंसानों के भीतर आ गया था।
    सदी के बदलाव के साथ वर्ष 2000 में कमल हासन की ऐतिहासिक फिल्म 'हे राम' आई। कमल हासन द्वारा ही निर्देशित इस फिल्म में स्वयं कमल हासन के साथ शाहरुख खान, रानी मुखर्जी और नसीरुद्दीन शाह जैसे दिग्गज सितारे थे। विभाजन के दौरान फैली भयंकर हिंसा, नफरत और उसके परिणामस्वरूप हुए घटनाक्रमों के साथ-साथ महात्मा गांधी की हत्या के दौर को केंद्र में रखकर बनाई गई यह फिल्म विभाजन से उपजे मानसिक और भावनात्मक आघात की गहराई को दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर तलाशती है।
    2001 में आई फिल्म 'गदर : एक प्रेम कथा' ने विभाजन के विषय को एक बिल्कुल नए कमर्शियल और भव्य पैमाने पर दर्शकों के सामने रखा। अनिल शर्मा निर्देशित और सनी देओल, अमीषा पटेल तथा अमरीश पुरी अभिनीत यह फिल्म भले ही एक प्रेम कहानी के ताने-बाने पर बुनी गई थी, लेकिन इसकी शुरुआत में विभाजन के दौरान हुए दंगों, ट्रेनों में कत्लेआम और अपनों से बिछड़ते परिवारों की चीख-पुकार का जो चित्रण किया गया, उसने दर्शकों के रोंगटे खड़े कर दिए। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के नए कीर्तिमान रचे और साबित किया कि विभाजन का दौर मुख्यधारा के सिनेमा में भी बहुत गहराई से अपील करता है।
    इसके बाद वर्ष 2003 में डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी के निर्देशन में बनी फिल्म 'पिंजर' आई, जो अमृता प्रीतम के बेहद मशहूर उपन्यास पर आधारित थी। उर्मिला मातोंडकर, मनोज बाजपेयी और संजय सूरी के जीवंत अभिनय से सजी यह फिल्म विभाजन के दौरान महिलाओं पर हुए अमानवीय अत्याचारों, उनके अपहरण, जबरन धर्म परिवर्तन और सामाजिक त्रासदियों को बेहद संजीदगी से उजागर करती है। फिल्म की मुख्य पात्र पूरो और रशीद की कहानी के माध्यम से फिल्म यह सवाल उठाती है कि युद्ध और बंटवारे में सबसे बड़ी कीमत हमेशा औरतों को ही क्यों चुकानी पड़ती है।
    आगे चलकर वर्ष 2013 में राकेश ओमप्रकाश मेहरा द्वारा निर्देशित फिल्म 'भाग मिल्खा भाग' रिलीज़ हुई, जिसमें फरहान अख्तर ने महान एथलीट मिल्खा सिंह की भूमिका निभाई। यद्यपि यह फिल्म एक महान खिलाड़ी की बायोपिक थी, लेकिन इसका मुख्य भावनात्मक आधार विभाजन की वही त्रासदी थी। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे बचपन में बंटवारे के दौरान मिल्खा सिंह के माता-पिता को उनकी आंखों के सामने कत्ल कर दिया गया था और विस्थापन के उस खौफनाक दर्द का जख्म ताउम्र उनके दिलो-दिमाग पर हावी रहा। यह फिल्म यह दर्शाती है कि बंटवारे का दर्द केवल उस दौर तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने इंसानों की पूरी जिंदगी और आने वाली पीढ़ियों की मानसिकता को प्रभावित किया।
    1961 की 'धर्मपुत्र' से लेकर गर्म हवा, तमस, पिंजर, 1947 अर्थ और अब 'बंटवारा 1947' तक का सिनेमाई सफर यह साफ करता है कि भारत-पाकिस्तान का विभाजन केवल एक बीती हुई ऐतिहासिक घटना नहीं है। यह भारतीय सिनेमा के लिए एक कभी न खत्म होने वाली मानवीय संवेदना की प्रयोगशाला है। इन फिल्मों ने दर्शकों को केवल मनोरंजन नहीं दिया, बल्कि उन्हें इतिहास के उस काले पन्ने से रू-ब-रू कराया जहां इंसानियत हार गई और नफरत जीत गई थी। सिनेमा ने बार-बार इन कहानियों के जरिए दुनिया को यही याद दिलाने की कोशिश की है कि सीमाओं का बंटवारा भले ही ज़मीन पर लकीरें खींच दे, लेकिन दिलों में बिखरे दर्द, यादों और इंसानी रिश्तों के जुड़ाव को कोई लकीर मिटा नहीं सकती। यही कारण है कि भारतीय दर्शक आज भी जब बड़े पर्दे पर विभाजन की इन कहानियों को देखते हैं, तो उनकी आंखें नम हो जाती हैं और सिनेमा का यह संवेदनशील रूप हमेशा दर्शकों के दिलों में प्रासंगिक बना रहता है।
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