Sunday, February 2, 2020

नेहरू विचारधारा और फ़िल्में

- हेमंत पाल

   देश की आजादी के बाद फिल्मों का चेहरा कैसा था, आज ये एक अहम् सवाल है। क्योंकि, आजादी से पहले और बाद के भारत में बहुत अंतर था। सोच के अलावा देश के निर्माताओं को भविष्य की भी चिंता थी! वे अपनी इसी चिंता और सोच को फिल्म के परदे पर भी दर्शाने के इच्छुक थे, ताकि फिल्म दर्शकों का भी नजरिया बदले! लेकिन, 50 के दशक की फिल्मों के साथ वास्तव में न्याय नहीं हुआ! क्योंकि, उस समय के फिल्मकार देश के पहले नेता पं जवाहरलाल नेहरू की पहली सरकार द्वारा गढ़े गए राष्ट्रवादी मिथकों को परदे पर उतारने की कोशिश में था। इसका असर ये हुआ कि जो फ़िल्में बनी उसने काफी हद तक सरकार के विचारों को ही परदे पर उतारने की कोशिश ज्यादा की! 
    इसे फिल्मकारों की मज़बूरी भी माना जा सकता है! क्योंकि, फिल्म निर्माण पर सरकारी नियंत्रण का शिकंजा भी धीरे-धीरे कसने लगा था। 1951 में बनाई गई 'फिल्म इन्क्वायरी कमेंटी' ने फिल्म निर्माताओं से साफ़ कहा भी था कि वे राष्ट्र-निर्माण में अपनी फिल्मों से योगदान दें। सरकार ने यह उम्मीद भी जताई थी, कि देश का सिनेमा संस्कृति, शिक्षा और स्वस्थ मनोरंजन को केंद्र में रखकर निर्मित होगा। इसका मकसद ये बताया गया कि इससे बहुआयामीय राष्ट्रीय चरित्र’ का निर्माण होगा। इसी दौर में फिल्मों पर सेंसरशिप भी लगाई जाने लगी। तब ये नियंत्रण इतने कड़े थे कि तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री बीवी केसकर ने आकाशवाणी पर फ़िल्मी गीत बजना भी बंद करवा दिया था।
    हिंदी फिल्मों का इतिहास अपने शुरूआती दौर में दो हिस्सों में बंटा था। पहला, मूक फिल्मों से शुरुआत और फिर फिल्म बोलती फिल्मों का विस्तार! दूसरा, आजाद भारत में वैचारिक बदलाव, चुनौतियाँ और भविष्य की चिंता वाले सवाल। यही कारण है कि दूसरे दौर पर नेहरू के विचारों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई दिया। क्योंकि, आजादी के बाद अवाम में उनका आकर्षण था और देश ने उन्हें उम्मीद की किरण के रूप में भी देखा था। लेकिन, यही वो समय भी था, जब वामपंथी विचारधारा के फिल्मकार भी सामने आए! इस दशक में कुछ ऐसी फ़िल्में बनी जिनमें राष्ट्रवाद झलकता था, तो ऐसी फ़िल्में भी आई जिसमें इस विचारधारा का विरोध नजर आया। श्री-420, आवारा, दो बीघा जमीन, प्यासा, मदर इंडिया, हिंदुस्तान हमारा, जागते रहो, नया दौर और 'दो आँखे बारह हाथ' के जरिए नेहरू विचारधारा को दर्शाया गया तो इसकी आलोचना भी की गई!
    बीआर चोपड़ा की फिल्म 'नया दौर' का कथानक महात्मा गाँधी के विचार 'श्रम के महत्व' पर केंद्रित थी। लेकिन, इसमें नेहरू के आधुनिक विचारों का रुझान भी दिखाई दिया। ये पूरी फिल्म गांव में उतरे फ़िल्मी शहर के संदर्भों से आतप्रोत थी। जबकि, बिमल रॉय की फिल्म 'दो बीघा जमीन' देश के नए विकास मॉडल और उससे उभरे दर्द को सामने लाई थी। इसमें रोजगार की तलाश में गाँव छोड़कर शहर आने वालों की पीड़ा का खुलासा था। गुरुदत्त की फिल्म 'प्यासा' के कथानक में भी गरीबी, भुखमरी, बेकारी और उससे जन्म लेती वैश्यावृत्ति का चित्रण था। फिल्म का नायक जब गाता है 'जिन्हें नाज है हिन्द पर वो कहाँ हैं' तो सहजता से ध्यान उस और जाता है, जिनके हाथ में आजाद भारत के निर्माण का झंडा था। इस दौर की सबसे सशक्त फिल्मों में एक 'मदर इंडिया' थी, जिसने किसानों के दर्द, साहूकारी, सूदखोरी और शोषण के खिलाफ एक औरत के माध्यम से आवाज उठाई थी। लेकिन, इसके विरोध को हिंसक रूप से दर्शाया गया था, जो गांधीवादी नहीं माना गया। 
  इसे संयोग माना जाए या फिर फिल्मकारों के विचारों में आया बदलाव कि इस दशक के फिल्म निर्माण में आई परिपक्वता को दुनियाभर में सराहा गया। आजादी से पहले जिन हिंदी फिल्मों को पौराणिक कथाओं और धार्मिक कथानकों पर केंद्रित माना जाता था, उन्हें दुनिया में मान्यता मिली। राजकपूर की 1955 में आई 'श्री-420' को सोवियत बॉक्स ऑफिस पर सबसे सफल विदेशी फिल्म का तमगा मिला था। 1957 में बनी 'मदर इंडिया' ऑस्कर में जाने वाली पहली भारतीय फिल्म थी, जो अंतिम 5 तक पहुंची। इसी साल आई गुरुदत्त की फिल्म 'प्यासा' को अमेरिकी पत्रिका 'टाइम्स' ने दुनिया की 100 सदाबहार फिल्मों की लिस्ट में शामिल किया, जो अकेली भारतीय फिल्म है। 1957 की ही 'दो आंखें बाहर हाथ' गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड जीतने वाली पहली भारतीय फिल्म थी। आशय यह कि आजादी के बाद नेहरू विचारधारा का जो प्रभाव फिल्मों में दिखाई दिया, वो मनोरंजन के बदलाव का भी आधार बना!
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