Saturday, August 29, 2026

परदे पर राखी : सिनेमा के बदलते कैनवास पर रिश्ते

     सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं रहा, यह समाज का जीता-जागता दर्पण भी है। जब से समाज ने नए दौर में कदम रखा, हमारी फिल्मों ने भारतीय पारिवारिक मूल्यों, लोक-संस्कृति और तीज-त्योहारों को अपने कलेवर में गहराई से समेटा। यही वजह है कि त्योहार केवल कहानी को आगे बढ़ाने का जरिया नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं, रिश्तों की प्रगाढ़ता और सामाजिक समरसता को व्यक्त करने के सशक्त माध्यम भी बने। कुछ दशक पहले तक स्थिति यह थी कि शायद ही कोई ऐसी फिल्म बनती हो, जिसमें होली, दिवाली, ईद या राखी का कोई खूबसूरत प्रसंग न जोड़ा गया हो। त्यौहारों के ये रंग दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींच लाते और उन्हें परदे पर अपना ही परिवार नजर आता था। परंतु, बीते कुछ सालों में हिंदी सिनेमा का रंग-ढंग पूरी तरह बदल गया। 
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- हेमंत पाल

    फिल्मों के कथानक के कई रंग होते हैं, उनमें एक त्योहारों का रंग भी है, जिसकी रौनक धीरे-धीरे कम हो गई। अब बहुत कम फिल्मों में तीज--त्यौहार और रस्मों-रिवाज दिखाई देते हैं। चिंता की बात यह कि आधुनिक सिनेमा से वे गहरे पारिवारिक रिश्ते ही गायब होने लगे, जो कभी हमारी फिल्मों की रीढ़ और त्योहारों के प्रसंग का आधार हुआ करते थे। आज की फिल्मों में रिश्तों की उस भावुकता की जगह हीरो-हीरोइन के लव अफेयर्स, बोल्ड सीन्स, सस्पेंस और अंधाधुंध मारपीट ने ले ली। इस बदलते दौर में रक्षाबंधन जैसे पावन त्योहार का फिल्मी उल्लेख भी बहुत कम हो गया। अब भाई-बहन के रिश्ते की प्रगाढ़ता वाला यह त्यौहार परदे से हाशिये पर आ गया। 
    बीते कुछ दशकों के सिनेमा के सफर पर नजर डालें, तो कथानक में एक बहुत बड़ा वैचारिक बदलाव दिखाई देने लगा। एक जमाना था जब फिल्मों की कहानियां संयुक्त परिवारों के इर्द-गिर्द बुनी जाती थीं। चाचा-चाची, दादा-दादी, भाई-बहन और मां-बाप के प्रति जिम्मेदारी ही नायक के जीवन का मकसद होते थे। आज के दौर में सिनेमा ने 'लार्जर दैन लाइफ' एक्शन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अपना मुख्य एजेंडा बना लिया। फिल्मों से रिश्तों के इस तरह तिरोहित यानी गायब होने के पीछे आधुनिक जीवनशैली और बाजारवाद का बहुत बड़ा हाथ है। आज की फिल्मों का नायक अब अपने परिवार की जिम्मेदारी उठाने वाला सीधा-साधा युवक नहीं, बल्कि वह अपनी ही दुनिया में मग्न, आक्रामक और व्यवस्था से लड़ने वाला एक 'एंग्री यंग मैन' या फिर एक कॉर्पोरेट विलेन जैसा दिखने लगा है।
    अब स्क्रीन पर भाई और बहन के बीच का वह निश्छल, भोला और आदर से भरा प्रेम बहुत कम दिखाई देता है। पहले जहां भाई अपनी बहन की एक राखी के लिए पूरी दुनिया से लड़ जाता था, वहीं आज के सिनेमा में बहन का किरदार या तो सिर्फ नायक की शादी की तैयारियों में नाचने-गाने तक सीमित रह गया या फिर उसे पूरी तरह से कहानी से बाहर कर दिया गया। मारकाट और हिंसक दृश्यों की भरमार ने फिल्मों के उस कोमल पक्ष को पूरी तरह कुचल दिया, जो दर्शकों के दिलों को छूता था। फिल्मों में अब खून-खराबा, बंदूकें, गैंगवार और गालियां इतनी आम हो चुकी हैं कि उनमें राखी के धागे की पवित्रता और भाई-बहन के आंसुओं के लिए कोई जगह ही नहीं बची। जब रिश्तों की बुनियाद ही कमजोर हो गई, तो भला त्योहारों की खुशियां परदे पर कैसे नजर आएंगी!
    सिनेमा के इतिहास में वैसे तो कई त्योहारों को बहुत शिद्दत से फिल्माया गया, लेकिन होली के बाद राखी ही एक ऐसा त्योहार रहा जिसे निर्देशकों ने सबसे ज्यादा तवज्जो दी। ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों के जमाने से ही भाई-बहन के इस रिश्ते को परदे पर अमर करने की कोशिशें शुरू हो गई थीं। रक्षाबंधन के त्यौहार और भाई-बहन के रिश्ते को पूरी तरह समर्पित पहली मूक फिल्म साल 1928 में बनी, जिसका नाम था 'राखी।' इसके बाद बोलती फिल्मों के दौर में साल 1947 में आई फिल्म 'रक्षाबंधन' को इस विषय पर बनी शुरुआती बेहद महत्वपूर्ण फिल्मों में गिना जाता है। अश्विनी कुमार के निर्देशन में बनी साल 1947 की इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर भाई-बहन के प्रेम की एक नई इबारत लिखी थी। इसके बाद तो जैसे हिंदी सिनेमा में राखी केंद्रित फिल्मों की बाढ़ सी आ गई। पचास, साठ और सत्तर के दशक को यदि राखी फिल्मों का स्वर्णिम काल कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इस दौर में केवल त्योहार का एक दृश्य ही नहीं रखा जाता था, बल्कि पूरी की पूरी फिल्म का ताना-बाना ही राखी के एक कच्चे धागे के इर्द-गिर्द बुना जाता था। इन फिल्मों का मुख्य उद्देश्य समाज को यह बताना होता था कि एक भाई के लिए उसकी बहन का मान-सम्मान और उसकी सुरक्षा कितनी ज्यादा मायने रखती है।
    जैसे-जैसे समय आगे बढ़ा, फिल्मकारों ने इस रिश्ते की अहमियत को समझते हुए फिल्मों के नाम भी सीधे त्योहार और भाई-बहन के रिश्ते पर रखने शुरू कर दिए। इन फिल्मों के नाम सुनते ही आज भी पुरानी पीढ़ी के दर्शकों की आंखें नम हो जाती हैं। इस कड़ी में साल 1959 में आई फिल्म 'छोटी बहन' का नाम सबसे ऊपर आता है। इस फिल्म में बलराज साहनी और नंदा ने भाई-बहन का जो कालजयी किरदार निभाया, उसने पूरे देश को रुला दिया था। इसके बाद साल 1962 में आई फिल्म 'राखी' ने इस रिश्ते की जटिलताओं और गहराई को बखूबी परदे पर उतारा, जिसमें अशोक कुमार और वहीदा रहमान मुख्य भूमिकाओं में थे। 
    इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए साल 1969 में आई फिल्म 'भाई बहन' ने भी दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ी। सत्तर के दशक में आई देव आनंद और जीनत अमान की फिल्म 'हरे रामा हरे कृष्णा' (1971) भले ही एक अलग पृष्ठभूमि पर आधारित थी, लेकिन इस फिल्म की मूल आत्मा एक भाई की अपनी भटकी हुई बहन को वापस पाने की तड़प ही थी। इसके अलावा धर्मेंद्र और साधना की फिल्म 'अनीता' हो या फिर बाद के सालों में आई 'प्यारी बहना' (1985) जिसमें मिथुन चक्रवर्ती ने एक अपाहिज बहन के भाई का बेहद भावुक किरदार निभाया था। इन सभी फिल्मों ने यह साबित किया कि राखी का त्योहार भारतीय सिनेमा के लिए कितना अनमोल रहा है। यहां तक कि नब्बे के दशक में भी 'तिरंगा' और 'क्रांतिवीर' जैसी एक्शन फिल्मों में भी राखी के त्योहार को देशप्रेम और न्याय की लड़ाई से जोड़कर एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ के रूप में इस्तेमाल किया गया था।
    राखी केंद्रित फिल्मों की चर्चा तब तक अधूरी है, जब तक कि उन गानों का जिक्र न किया जाए जो आज भी हर साल रक्षाबंधन के दिन देश के कोने-कोने में गूंजते हैं। इन गीतों के बोल और संगीत इतने जादुई थे कि वे सीधे रूह में उतर जाते थे। आज भी जब रेडियो या टेलीविजन पर फिल्म 'छोटी बहन' का गाना 'भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना, भैया मेरे छोटी बहन को न भुलाना' बजता है, तो हर भाई-बहन का दिल भावुकता से भर जाता है। इस गाने को लता मंगेशकर ने अपनी मखमली आवाज दी थी और शैलेन्द्र ने इसके बेहद मार्मिक बोल लिखे थे। इसी तरह फिल्म 'राखी' (1962) का मोहम्मद रफी की आवाज में गाया हुआ गीत 'राखी धागों का त्योहार, बंधा एक-एक धागे में भाई-बहन का प्यार' आज भी इस त्योहार की परिभाषा माना जाता है। 
     एक और बेहद लोकप्रिय और खिलखिलाता हुआ गीत जो हर बहन अपने भाई के लिए गाती है, वह है फिल्म 'सच्चा झूठा' (1970) का गाना 'मेरी प्यारी बहनिया बनेगी दुल्हनिया, सजके आएंगे दूल्हे राजा।' किशोर कुमार की आवाज में गाए गए इस गीत ने भाई की खुशी और उसकी आत्मीयता को एक नया मुकाम दिया। इसके अलावा फिल्म 'चंबल की कसम' (1980) का गाना 'चंदा रे मेरे भैया से कहना, बहना याद करे' और फिल्म 'अंधा कानून' (1983) का गाना 'ये राखी बंधन है ऐसा, जैसे चंदा और चकोरी' जैसे अनगिनत गीत हैं जिन्होंने इस रिश्ते की पवित्रता को सुरों के संसार में हमेशा के लिए सहेज दिया। इन गानों की सबसे बड़ी खूबी यह थी कि ये केवल फिल्म के सीन को पूरा करने के लिए नहीं गाए जाते, बल्कि ये उस दौर के समाज की वास्तविक संवेदनाओं को सुरों में पिरोते थे।
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