उज्जैन के सती गेट पर सड़क चौड़ीकरण के लिए खड़े हनुमान की प्रतिमा हटाने की कोशिश ने सिर्फ आस्था का सवाल नहीं खड़ा किया, बल्कि यह भी पूछ लिया कि हम अपनी पुरानी स्थापत्य विरासत को कितना समझते हैं! 170 साल पुरानी खड़े हनुमान मंदिर की प्रतिमा इन दिनों केवल एक धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है। वह विकास और विरासत के बीच खड़े उस सवाल का प्रतीक बन गई, जिसका आसान जवाब किसी के पास नहीं है। मंदिर का बाहरी हिस्सा हट गया, लेकिन करीब 8 फीट ऊंची प्रतिमा वहीं खड़ी है। उसे हटाना है, लेकिन कैसे हटाया जाए, यह तय करना मुश्किल हो गया। सोशल मीडिया पर यह कहानी तेजी से फैली कि क्रेन और जेसीबी भी प्रतिमा को एक इंच नहीं हिला सकीं। दूसरी ओर प्रशासन का कहना है कि प्रतिमा को नुकसान पहुंचाने वाला कोई जबरन प्रयास किया ही नहीं गया। अब आईआईटी इंदौर के विशेषज्ञ जमीन और प्रतिमा के आधार की वैज्ञानिक जांच कर रहे हैं।
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- हेमंत पाल
इस घटना की कहानी दिलचस्प है। सवाल यह नहीं कि हनुमानजी की प्रतिमा हिली या नहीं। असल सवाल है कि सदियों पुरानी किसी संरचना को हम आज भी उतना ही जानते हैं, जितना उसके सामने खड़े होकर दावा करते हैं? आस्था कहती है, यह चमत्कार है। इंजीनियर कहता है पहले आधार देखिए। पुरातत्वविद कहता है इतिहास समझिए और प्रशासन के सामने सवाल है विकास भी हो और विरासत भी बचे, तो रास्ता क्या हो! मंदसौर के सम्राट यशोधर्मन पुरातत्व संग्रहालय के संस्थापक कैलाश चंद्र पांडे ने एक हजार से अधिक प्रतिमाओं के विस्थापन का अनुभव होने की बात कही है। उनका अनुभव इस मामले को एक अलग नजर से देखने के लिए मजबूर करता है। उनके अनुसार प्राचीन प्रतिमाओं को स्थापित करते समय केवल मूर्ति को जमीन पर नहीं रखा जाता था, बल्कि उसके आधार और भार को ध्यान में रखकर पूरी संरचना तैयार की जाती थी।
उन्होंने मंदसौर के पशुपतिनाथ मंदिर के विकास के दौरान 12 फीट ऊंची सहस्रलिंग प्रतिमा को उसके आधार सहित दूसरी जगह स्थानांतरित करने का उदाहरण दिया है। ऐसी प्रक्रिया में पहले प्रतिमा के चारों तरफ खुदाई कर यह समझा जाता है कि उसका आधार कितना गहरा और किस तरह का है। उसके बाद भार को संभालने के लिए सहारा तैयार किया जाता है और प्रतिमा को धीरे-धीरे सरकाया जाता है। यह तरीका सुनने में पुराना लग सकता है, लेकिन इसमें एक बुनियादी इंजीनियरिंग सिद्धांत छिपा है कि पहले संरचना को समझो, फिर उसे हिलाओ। इसके उलट किसी भारी प्रतिमा पर सीधे मशीन का जोर लगाना हमेशा समाधान नहीं होता। प्रतिमा कितनी भारी है, उसका भार केंद्र कहां है, नीचे का आधार किस सामग्री का है, मिट्टी कितनी मजबूत है और प्रतिमा किस तरह जमीन से जुड़ी है इन सवालों के जवाब जाने बिना लगाया गया अतिरिक्त दबाव प्रतिमा को नुकसान पहुंचा सकता है। इसलिए यदि आधुनिक मशीन के सामने कोई प्राचीन प्रतिमा नहीं हिलती तो पहला निष्कर्ष चमत्कार नहीं, बल्कि ये होना चाहिए कि संरचना हमारी अपेक्षा से अधिक जटिल है।
विशेषज्ञ कैलाश चंद्र पांडे का यह कहना कि तमाम प्रयासों के बाद भी प्रतिमा के विस्थापन में परेशानी आए, तो इसे चमत्कार माना जा सकता है और कुछ बातें विज्ञान से परे होती हैं, आस्था की दुनिया में स्वाभाविक बात है। लेकिन, वैज्ञानिक दृष्टि से इसका दूसरा अर्थ भी है। विज्ञान किसी घटना को इसलिए अस्वीकार नहीं करता कि वह पहली नजर में असाधारण दिखाई देती है। वह उसका कारण खोजता है। अगर कारण अभी नहीं मिला, तो इसका अर्थ यह नहीं कि कारण है ही नहीं। इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि जांच अभी पूरी नहीं हुई। खड़े हनुमान की प्रतिमा के मामले में यही सबसे महत्वपूर्ण बात है। जब तक जमीन की जांच, आधार की संरचना, प्रतिमा की सामग्री, भार और उसके नीचे की स्थिति सामने नहीं आती, तब तक न इसे चमत्कार कहना उचित है और न किसी प्राचीन तकनीक का अंतिम प्रमाण। आईआईटी इंदौर के विशेषज्ञों की जांच इसलिए महत्वपूर्ण है। यह जांच केवल प्रतिमा को हटाने की तकनीक तय नहीं करेगी, बल्कि यह भी बता सकती है कि प्रतिमा को जिस तरह स्थापित किया गया, उसमें किस प्रकार की संरचनात्मक व्यवस्था रही होगी।
इतिहास में इससे कहीं बड़े और कठिन विस्थापन हुए हैं। मिस्र में असवान बांध परियोजना के कारण अबू सिंबल के विशाल मंदिरों को 1960 के दशक में काटकर ऊंचे स्थान पर स्थानांतरित किया गया था। यह काम किसी चमत्कार से नहीं, बल्कि विस्तृत अध्ययन, संरचना की समझ और अत्यंत सावधानी से किया गया। भारत में भी विकास परियोजनाओं के बीच धार्मिक और ऐतिहासिक संरचनाओं को स्थानांतरित करने के उदाहरण मिलते रहे हैं। वाराणसी में 2025 में बीएचयू के आसपास सड़क चौड़ीकरण के लिए एक पुराने मंदिर को स्थानीय सहमति के बाद दूसरी जगह स्थानांतरित किया गया। यानी प्रतिमाओं और मंदिरों का विस्थापन असंभव काम नहीं है। असल प्रश्न तरीका और सुरक्षा का है। उज्जैन में स्थिति इसलिए अलग है, क्योंकि यहां मामला केवल सड़क के बीच खड़े एक ढांचे का नहीं है। खड़े हनुमान से जुड़ी स्थानीय आस्था बहुत गहरी है और सिंहस्थ की तैयारियों के बीच विकास कार्यों की गति भी कम नहीं की जा सकती। ऐसे में प्रशासन के सामने जल्दबाजी का रास्ता सबसे खतरनाक रास्ता हो सकता है।
हर शहर को सड़क चाहिए। हर बड़े धार्मिक आयोजन के लिए यातायात की बेहतर व्यवस्था चाहिए। उज्जैन को भी चाहिए। लेकिन, विकास का सबसे आसान तरीका हमेशा यह नहीं होता कि रास्ते में आने वाली पुरानी चीज को हटा दिया जाए। किसी शहर की पहचान केवल चौड़ी सड़कों, नए पुलों और चमकती इमारतों से नहीं बनती। उसकी पहचान उन स्मृतियों से भी बनती है जो पीढ़ियों से वहां मौजूद हैं। इसलिए खड़े हनुमान का प्रश्न केवल एक प्रतिमा का प्रश्न नहीं है। यह उस सोच की परीक्षा है जिसमें पुराना अक्सर विकास की पहली बाधा मान लिया जाता है। अगर वैज्ञानिक जांच बताती है कि प्रतिमा सुरक्षित रूप से स्थानांतरित की जा सकती है, तो विशेषज्ञों की निगरानी में ऐसा किया जा सकता है। लेकिन, यदि तकनीकी अध्ययन यह संकेत देता है कि प्रतिमा को हिलाने में उसकी संरचना को गंभीर खतरा है तो सड़क की योजना पर पुनर्विचार करना भी विकास विरोधी कदम नहीं होगा। यह जिम्मेदार विकास होगा।
खड़े हनुमान की सबसे बड़ी खासियत शायद यही है कि उन्होंने फिलहाल सबको रोक दिया है। भक्तों को भी, प्रशासन को भी और मशीनों को भी। यह रुकना बुरा नहीं है। कभी-कभी विकास की रफ्तार में एक ठहराव वह देखने का मौका देता है, जिसे हम भागते हुए नहीं देख पाते। इस प्रतिमा को हटाना है या नहीं, यह फैसला भावनाओं के दबाव में नहीं होना चाहिए। इसे केवल सड़क की सुविधा के आधार पर भी नहीं किया जाना चाहिए। फैसला प्रमाण पर होना चाहिए प्रतिमा के आधार की जांच पर, जमीन की संरचना पर, उसके ऐतिहासिक महत्व पर और सुरक्षित विस्थापन की वास्तविक संभावना पर। आस्था को विज्ञान से लड़ाने की जरूरत नहीं है। दोनों की अपनी जगह है। आस्था श्रद्धा देती है, विज्ञान कारण खोजता है और इतिहास संदर्भ देता है। शायद खड़े हनुमान की प्रतिमा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि हर चीज जिसे हम चमत्कार कहते हैं, जरूरी नहीं कि वह विज्ञान के खिलाफ हो। और हर चीज जिसे विज्ञान समझा नहीं पाया, उसे तुरंत चमत्कार कह देना भी उचित नहीं। फिलहाल खड़े हनुमान वहीं खड़े हैं। सवाल यह नहीं कि उन्हें कौन हिलाएगा। सवाल यह है कि क्या हम उन्हें हिलाने से पहले उन्हें समझने की कोशिश करेंगे?
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