हिंदी सिनेमा में एक दिलचस्प परंपरा रही है। जब किसी खास विषय की फिल्म दर्शकों के बीच असाधारण लोकप्रिय होती है, तो उसी भावभूमि पर आगे कई फिल्में बनती हैं। सिनेमा के जन्म काल से लेकर आधुनिक मल्टीप्लेक्स और डिजिटल युग तक, जब भी किसी फिल्म निर्माता ने जनमानस की धार्मिक आस्था और भक्ति भावना को सही ढंग से पर्दे पर उकेरा, तब-तब बॉक्स ऑफिस पर कमाई के सारे गणित और पुराने रिकॉर्ड ध्वस्त हुए। लेकिन, धार्मिक और पौराणिक फिल्मों का मामला थोड़ा अलग है। यहां सफलता सिर्फ मनोरंजन से नहीं, दर्शकों की आस्था से भी जुड़ जाती है। यही वजह है कि सिनेमा के शुरुआती दौर से लेकर आज तक राम, कृष्ण, शिव, हनुमान और संतों की कहानियां परदे पर बार-बार लौटती रही हैं। कभी दर्शक फिल्म देखते हुए जूते-चप्पल बाहर उतार देते थे, कभी परदे पर भगवान के प्रकट होते ही फूल और सिक्के चढ़ाते थे। आज वही आस्था करोड़ों रुपये के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन में दिखाई दे रही है। 2026 की फिल्म ‘हनुमान अंश’ ने इसी परंपरा को नए दौर में पहुंचाया है।
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- हेमंत पाल
नीम करोली बाबा के जीवन और महिमा पर आधारित फिल्म 'हनुमान अंश' ने सिनेमा जगत में कमाई का एक ऐसा नया इतिहास रच दिया, जिसने ट्रेड विश्लेषकों को भी अचंभित कर दिया है। ट्रेड रिपोर्ट्स के अनुसार करीब 2 करोड़ रुपए में बनी ‘हनुमान अंश’ ने 43वें दिन तक दुनियाभर में लगभग 308 करोड़ रुपए कमाए। इसका संकेत साफ है कि धार्मिक विषय के साथ कम बजट और मजबूत कहानी भी बड़ा असर पैदा कर सकती है। अप्रत्याशित मुनाफा कमाकर इस फिल्म ने न केवल आधुनिक दौर की सुपरहिट फिल्मों को पीछे छोड़ा, बल्कि 51 साल पुराने ऐतिहासिक रिकॉर्ड को भी तोड़ दिया। हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब किसी भक्ति आधारित फिल्म ने सिनेमाघरों को मंदिरों जैसा माहौल प्रदान कर बॉक्स ऑफिस पर सफलता का परचम लहराया हो। सिनेमा के इतिहास में ब्लैक एंड व्हाइट दौर से लेकर रंगीन और अत्याधुनिक वीएफएक्स के युग तक, ऐसी कई मील का पत्थर साबित होने वाली फिल्में आई हैं, जिन्होंने अभूतपूर्व कमाई करते हुए इतिहास रचा है।
धार्मिक फिल्मों को लेकर इंडस्ट्री में सनसनी
‘हनुमान अंश’ की रिलीज के करीब एक महीने बाद हिंदी सिनेमा में धार्मिक और आध्यात्मिक फिल्मों को लेकर नई हलचल दिखाई देने लगी है। 7 अगस्त को रिलीज हुई इस फिल्म के बाद करीब पांच हफ्तों में तेरा सांई, राम बोला, खाटू श्याम और 'राधा-कृष्ण' की कहानी पर फिल्म जैसे कई प्रोजेक्ट घोषित हुए। इन फिल्मों से जुड़े बड़े नाम भी सामने आए हैं। साजन राज कुरूप और शोभा संत ‘कृष्णावतार’ का अगला पार्ट भी ला रहे हैं। उनका लक्ष्य धार्मिक फिल्मों के जरिए भारत की ओर से दुनिया को ‘अवेंजर्स’ जैसा मल्टीवर्स देने का है। उन्होंने पहले पार्ट को अभी ओटीटी पर नहीं बेचा है और इसे दोबारा सिनेमाघरों में लाने की तैयारी है। इस बदलाव की खासियत केवल फिल्मों की संख्या नहीं, बल्कि विषयों का विस्तार भी है।
‘तेरा सांई’ साईं बाबा के जीवन और शिक्षाओं पर आधारित है, जिसमें संजय मिश्रा मुख्य भूमिका में हैं। फिल्म 2027 को हिंदी, मराठी, तेलुगू और तमिल में रिलीज होगी। वहीं खाटू श्याम और राधा-कृष्ण जैसे विषय भी बड़े पर्दे पर आने वाले हैं। 'राधा-कृष्ण' की कहानी पर फिल्म करण जौहर के बैनर के तहत बनने की खबर है। हालांकि, सफलता का आधार सिर्फ धर्म नहीं है। दर्शक कहानी से भावनात्मक रूप से जुड़ें, यह जरूरी है। किसी एक सफल फिल्म के फॉर्मूले को जल्दबाजी में दोहराना इस दौर का सबसे बड़ा जोखिम हो सकता है। ‘इरुमुडी’ में रवि तेजा जैसे बड़े स्टार हैं, जबकि ‘हनुमान अंश’ ने बिना बड़े स्टार के दर्शक जुटाए। इसलिए दोनों फिल्मों से मिलने वाले संकेत अलग हैं।
जब सिनेमाघर ही बन गए थे मंदिर
सिनेमा की नींव ही पौराणिक और धार्मिक कथाओं पर रखी गई थी। दादा साहेब फाल्के द्वारा बनाई गई भारत की पहली मूक फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' (1913) और पहली बोलती पौराणिक फिल्मों के दौर से ही दर्शकों ने भक्ति सिनेमा को सहर्ष अपनाया। 1940 और 1960 के दशकों में जब तकनीक सीमित थी और फिल्में ब्लैक एंड व्हाइट हुआ करती थीं, तब भी पौराणिक फिल्मों ने दर्शकों के दिलों पर गहरा प्रभाव छोड़ा। विजय भट्ट के निर्देशन में बनी फिल्म 'राम राज्य' (1943) ब्लैक एंड व्हाइट युग की सबसे महान और सफल पौराणिक फिल्मों में से एक मानी जाती है। इस फिल्म की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, जो आमतौर पर सिनेमा देखने से दूर रहते थे, उन्होंने अपने जीवन में केवल यही एक फिल्म देखी थी।
'राम राज्य' ने उस दौर में बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड तोड़ कारोबार किया था और यह उस साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों की सूची में शीर्ष पर रही। इस फिल्म ने भारतीय जनमानस में प्रभु श्री राम और माता सीता के प्रति अपार श्रद्धा को सिल्वर स्क्रीन पर बहुत ही सादगी और भक्ति भाव से प्रस्तुत किया था। बाबूभाई मिस्त्री द्वारा निर्देशित फिल्म 'संपूर्ण रामायण' (1961) ने ब्लैक एंड व्हाइट सिनेमा के अंतिम दौर में सफलता का नया इतिहास रचा। महिपाल और अनीता गुहा अभिनीत इस फिल्म में स्पेशल इफेक्ट्स का उस दौर के हिसाब से बेहतरीन इस्तेमाल किया गया था। इस फिल्म ने देश भर के थिएटर में सिल्वर जुबली और गोल्डन जुबली मनाई। लोग दूर-दराज के गांवों से बैलगाड़ियों में भरकर थिएटर तक फिल्म देखने आते थे। इस फिल्म ने न केवल भारत में बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारी व्यावसायिक सफलता हासिल की और यह उस दौर की सबसे बड़ी ब्लॉकबस्टर सिद्ध हुई।
सफलता की ऊंचाई छूने वाली फ़िल्में
दक्षिण भारतीय सिनेमा के इतिहास में निर्मित फिल्म 'लव कुश' (1963) जिसे हिंदी में भी डब किया गया था, पहली ऐसी पौराणिक फिल्म बनी जिसने बॉक्स ऑफिस पर 1 करोड़ रुपये से अधिक की कुल कमाई का रिकॉर्ड बनाया था। इस फिल्म ने सिनेमाघरों में लगातार 75 हफ्तों तक चलने का अद्भुत कीर्तिमान स्थापित किया था। एनटी रामाराव और अंजलि देवी अभिनीत इस फिल्म के गानों और भक्तिमय प्रस्तुति ने दर्शकों को भावविभोर कर दिया था। जब भारतीय सिनेमा ब्लैक एंड व्हाइट से निकलकर रंगीन हो चुका था, तब 1975 में एक ऐसी ऐतिहासिक घटना घटी जिसने पूरे फिल्म व्यापार के सिद्धांतों को बदलकर रख दिया। 1975 का साल भारतीय सिनेमा में अमिताभ बच्चन और धर्मेंद्र की महा-ब्लॉकबस्टर एक्शन फिल्म 'शोले' के लिए जाना जाता है। लेकिन, उसी साल बेहद कम बजट में बनी एक छोटी सी भक्ति फिल्म 'जय मां संतोषी' (1975) रिलीज हुई। विजय शर्मा निर्देशित इस फिल्म का कुल बजट मात्र 25 से 30 लाख रुपए था। शुरुआत में इस फिल्म को वितरक तक नहीं मिल रहे थे और पहले दिन इसका कलेक्शन मात्र 56 रुपये के आसपास था।
लेकिन, जैसे ही माताओं-बहनों और आम जनता के बीच फिल्म के भक्तिमय संगीत और संतोषी मां की महिमा की बात फैली, सिनेमाघरों के बाहर मील लंबी लाइनें लग गईं। लोग नंगे पैर सिनेमाघर जाते थे, चप्पल बाहर खोलते थे, स्क्रीन पर आरती के समय सिक्के उछालते थे और पूजा की थाली व प्रसाद लेकर थिएटर में बैठते थे। 'जय मां संतोषी' ने उस दौर में लगभग 5 करोड़ रुपये का अभूतपूर्व बॉक्स ऑफिस कलेक्शन किया था। अपने बजट के मुकाबले 2,000% से अधिक का प्रॉफिट कमाकर इसने उस समय तक का सबसे बड़ा ऑल-टाइम रिकॉर्ड बनाया था, जो पिछले 51 वर्षों से अटूट था। 'जय मां संतोषी' की ऐतिहासिक सफलता के बाद भारतीय सिनेमा में धार्मिक फिल्मों का एक नया दौर शुरू हुआ। इसी लहर में 1979 में आई फिल्म 'हर हर गंगे' ने भी बॉक्स ऑफिस पर कमाई के नए कीर्तिमान स्थापित किए। पौराणिक गाथाओं और गंगा अवतरण की कथा पर आधारित इस रंगीन फिल्म को दर्शकों ने हाथों-हाथ लिया और यह उस साल की व्यावसायिक रूप से अत्यधिक सफल फिल्मों में शामिल हुई।
'कांतारा' से 'हनुमान अंश' तक का दौर
आज के दौर में जब मल्टीप्लेक्स संस्कृति और करोड़ों के बजट वाली एक्शन-थ्रिलर फिल्मों का बोलबाला है, तब भी भक्ति और पौराणिक विषयों पर आधारित फिल्मों ने यह साबित कर दिया है कि भारतीय दर्शकों के दिल में आस्था का स्थान आज भी सबसे ऊपर है। ऋषभ शेट्टी की 'कांतारा' (2022) फिल्म ने लोक-मान्यता, दैव-भक्ति और पौराणिक पृष्ठभूमि को जिस नए और आधुनिक अंदाज में प्रस्तुत किया, उसने बॉक्स ऑफिस के पूरे समीकरण बदल दिए। महज 16 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने दुनियाभर में 407 करोड़ रुपये से अधिक का कारोबार कर लगभग 2,448% का अप्रत्याशित मुनाफा दर्ज किया। निखिल सिद्धार्थ स्टारर फिल्म 'कार्तिकेय-2' (2022) भगवान श्री कृष्ण के पौराणिक रहस्य और ऐतिहासिक साक्ष्यों की खोज पर आधारित थी।
15 करोड़ के सीमित बजट में तैयार हुई इस फिल्म ने दुनिया भर में 117 करोड़ रुपये से अधिक की कमाई कर 685% से ज्यादा का लाभ अर्जित किया। इसके बाद तेजा सज्जा स्टारर और प्रशांत वर्मा निर्देशित फिल्म 'हनुमान' (2024) ने सुपरहीरो कॉन्सेप्ट को भगवान हनुमान की शक्तियों और भक्ति से जोड़कर परदे पर पेश किया। 60 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने दुनिया भर में लगभग 295 करोड़ का बिजनेस किया और 392% का रिटर्न दिया। इसके बाद 'महावतार नरसिम्हा' ने भारतीय एनिमेशन के क्षेत्र में इतिहास रचते हुए इस धार्मिक एनिमेटेड फिल्म ने 40 करोड़ के बजट के मुकाबले वैश्विक स्तर पर 326 करोड़ से अधिक का शानदार कारोबार किया और 717% का मुनाफा कमाया।
धार्मिक फिल्मों का समृद्ध इतिहास
हनुमान अंश: नीम करोली बाबा के जीवन और हनुमान जी के प्रति उनकी असीम भक्ति पर केंद्रित इस फिल्म ने महज 1.8 करोड़ के बजट से 153 करोड़ रुपये से ज्यादा की रिकॉर्डतोड़ कमाई की। 8,400% से अधिक का ऐतिहासिक मुनाफा कमाकर इसने 1975 के 'जय मां संतोषी' के 51 साल पुराने प्रॉफिट रिकॉर्ड को ध्वस्त करते हुए भक्ति सिनेमा के इतिहास में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करा लिया।भारतीय सिनेमा का 100 से अधिक वर्षों का इतिहास इस बात का साक्षी है कि तकनीकों और दर्शकों की पसंद में कितने भी बदलाव क्यों न आए हों, लेकिन जब भी पर्दे पर भक्ति, सर्वशक्तिमान पर विश्वास और जन-आस्था का प्रामाणिक संगम होता है, तो दर्शक सिनेमाघरों को उत्सव का केंद्र बना देते हैं। ब्लैक एंड व्हाइट दौर की 'राम राज्य' और 'संपूर्ण रामायण' से लेकर रंगीन दौर की 'जय मां संतोषी' और आज के दौर की 'हनुमान अंश' जैसी फिल्मों की अभूतपूर्व सफलता यह सिद्ध करती है कि भक्ति सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना और बॉक्स ऑफिस की सफलता की मजबूत रीढ़ है।
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