सिनेमा को केवल मनोरंजन की खिड़की मानना उसके प्रभाव को सीमित करना है। वह समाज की सामूहिक चेतना का आईना भी है और कभी-कभी हथौड़ा भी, जो जमी हुई धारणाओं पर चोट करता है। ‘अछूत कन्या’ से मदर इंडिया, दो आंखें बारह हाथ से दामिनी, तारे जमीन पर से ‘पिंक’ और ‘आर्टिकल 15’ से ‘अस्सी’ तक हिंदी सिनेमा की एक समानांतर धारा ऐसी रही, जो दर्शक को केवल कहानी सुनाकर नहीं छोड़ती, बल्कि उससे सवाल पूछती है। असली समाज सुधार शायद वहीं से शुरू होता है, जब दर्शक सिनेमाघर से बाहर निकलने के बाद भी फिल्म के सवालों से बाहर नहीं निकल पाता।
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- हेमंत पाल
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- हेमंत पाल
फिल्मों पर अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि वे अपराध को बढ़ावा देती हैं। यह आरोप पूरी तरह निराधार भी नहीं है। कई अपराधियों ने पुलिस पूछताछ के दौरान फिल्मों से अपराध करने की तरकीब या प्रेरणा मिलने की बात कही है। लेकिन सिनेमा को केवल उसके नकारात्मक प्रभावों के आधार पर देखना उसके सामाजिक महत्व को बहुत छोटा कर देना होगा। जिस परदे से अपराध की नकल की जा सकती है, उसी परदे से संवेदना, समानता, न्याय और बदलाव की आकांक्षा भी पैदा हो सकती है। वास्तव में सिनेमा समाज का केवल प्रतिबिंब नहीं है, वह कई बार समाज के भीतर चल रही हलचल को दिशा देने वाला माध्यम भी बन जाता है। दर्शक जब किसी पात्र के दुख, संघर्ष या जीत से जुड़ता है तो वह कुछ देर के लिए केवल दर्शक नहीं रहता, उस कहानी का सहभागी बन जाता है। यही सिनेमा की सबसे बड़ी सामाजिक शक्ति है। महात्मा गांधी ने अपने जीवन पर ‘सत्यवादी हरिश्चंद्र’ के प्रभाव का उल्लेख किया था। राजा हरिश्चंद्र की सत्यनिष्ठा ने बाल गांधी के मन पर ऐसी छाप छोड़ी कि सत्य उनके जीवन का मूल मूल्य बन गया। यह उदाहरण बताता है कि सिनेमा या दृश्य माध्यमों की शक्ति केवल मनोरंजन में नहीं, संस्कार निर्माण में भी छिपी है।
बाद के वर्षों में ‘दो आंखें बारह हाथ’ ने अपराधी को केवल दंड देने के बजाय उसे सुधारने की संभावना सामने रखी। ‘जिस देश में गंगा बहती है’ ने डाकुओं के आत्मसमर्पण और पुनर्वास की कल्पना को लोकप्रिय विमर्श का हिस्सा बनाया। ‘आवारा’ ने जन्मजात अपराधी की धारणा पर सवाल खड़ा किया और यह विचार सामने रखा कि व्यक्ति के चरित्र को उसके सामाजिक और आर्थिक परिवेश से अलग करके नहीं समझा जा सकता। सिनेमा का यह समाज सुधारक रूप यहीं नहीं रुका। ‘अछूत कन्या’ ने जातिगत ऊंच-नीच के बीच प्रेम की कहानी के माध्यम से उस सामाजिक दीवार को चुनौती दी, जिसे सामान्य जीवन में छूना भी कठिन था। ‘दो बीघा जमीन’ ने किसान और गरीबी के प्रश्न को भावुकता से आगे ले जाकर सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था के सवाल से जोड़ा। ‘मदर इंडिया’ ने भारतीय किसान, साहूकारी शोषण, स्त्री के संघर्ष और परिवार की नैतिकता को एक साथ परदे पर रखा। ‘सुजाता’ ने जातिगत भेदभाव के विरुद्ध संवेदना जगाई तो ‘बंदिनी’ ने स्त्री के जीवन और उसकी स्वतंत्रता को लेकर समाज की कठोरता पर सवाल उठाए। ‘प्रेम रोग’ ने विधवा विवाह जैसे विषय को मुख्यधारा के मनोरंजन का हिस्सा बनाया। ‘दामिनी’ ने यौन हिंसा के विरुद्ध एक स्त्री के संघर्ष को अदालत और परिवार के बीच स्थापित किया।
बाद के दौर में सिनेमा ने सामाजिक सवालों को और अधिक प्रत्यक्ष रूप से उठाया। ‘तारे जमीन पर’ ने बच्चों की सीखने की अलग-अलग क्षमताओं को समझने की जरूरत बताई। ‘थ्री इडियट्स’ ने शिक्षा को केवल अंक, प्रतियोगिता और नौकरी की मशीन बनाने वाली व्यवस्था पर सवाल उठाया। ‘चक दे! इंडिया’ ने महिला खिलाड़ियों के संघर्ष के साथ क्षेत्रीय और धार्मिक पूर्वाग्रहों को चुनौती दी। ‘पिंक’ ने सहमति को स्त्री की गरिमा और स्वतंत्रता से जोड़ते हुए समाज की उस मानसिकता को कठघरे में खड़ा किया, जिसमें लड़की के कपड़े, दोस्ती, शराब या देर रात बाहर रहने को उसके चरित्र का प्रमाण मान लिया जाता है। ‘आर्टिकल 15’ ने जातिगत भेदभाव को पुलिस व्यवस्था और कानून के संदर्भ में देखने का आग्रह किया। ‘थप्पड़’ ने घरेलू हिंसा के उस सामान्यीकरण पर प्रहार किया जिसमें एक थप्पड़ को परिवार बचाने के नाम पर मामूली घटना मान लिया जाता है।
इस परंपरा को 2026 की फिल्म ‘अस्सी’ एक अधिक असहज और कठोर धरातल पर आगे बढ़ाती है। अनुभव सिन्हा की यह फिल्म बलात्कार, पितृसत्ता, सामाजिक उदासीनता और न्याय व्यवस्था की कमजोरियों को एक साथ सामने रखती है। केंद्रीय पात्र परिमा एक शिक्षिका है, जो यौन हिंसा की शिकार होने के बाद केवल अपराधियों से नहीं लड़ती, बल्कि उस पूरी व्यवस्था से जूझती है जो बार-बार पीड़िता के व्यवहार, चरित्र और फैसलों पर सवाल उठाती है। फिल्म का प्रमाणन रिकॉर्ड भी इसकी मूल कथा को स्पष्ट करता है एक महिला अपराध से बचने के बाद ऐसी सामाजिक और कानूनी व्यवस्था का सामना करती है, जहां उसके साथ हुई हिंसा से अधिक उसके बारे में बने पूर्वाग्रह महत्व पाने लगते हैं। ‘अस्सी’ की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपराध को किसी अकेले खलनायक की मानसिक विकृति बनाकर समाप्त नहीं कर देती। वह पूछती है कि अपराधी पैदा कैसे होता है और उसे सामाजिक स्वीकृति कहां से मिलती है? परिवार की सोच, महिलाओं के प्रति नजरिया, पुलिस की कार्यप्रणाली, अदालत की प्रक्रिया, सबूतों की विश्वसनीयता और समाज की चुप्पी, इन सबको फिल्म एक ही प्रश्न से जोड़ती है। समीक्षकों ने भी इस बात को रेखांकित किया है कि फिल्म का निशाना केवल अपराधी नहीं, बल्कि वह सामाजिक और संस्थागत ढांचा है जो यौन हिंसा को संभव बनाता है और पीड़िता को ही कटघरे में खड़ा करता है।
यही वह बिंदु है जहां सिनेमा की समाज सुधारक भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। कानून किसी अपराध के बाद सजा दे सकता है, लेकिन वह मानसिकता को सीधे नहीं बदल सकता जो अपराध को जन्म देती है। कानून बलात्कार को अपराध घोषित कर सकता है, लेकिन यह नहीं सिखा सकता कि किसी लड़की के देर रात घर लौटने को उसके चरित्र से न जोड़ा जाए। अदालत फैसला दे सकती है, लेकिन समाज को यह समझना होगा कि न्याय पाने के लिए किसी पीड़िता को अपने चरित्र की परीक्षा नहीं देनी चाहिए। सिनेमा इन दोनों के बीच की खाली जगह भर सकता है। वह कानून की भाषा को मानवीय अनुभव में बदल देता है। ‘अस्सी’ का महत्व इसलिए भी है कि वह दर्शक को आसान सांत्वना नहीं देती। सामान्य व्यावसायिक सिनेमा में अंततः नायक आता है, अपराधी पराजित होता है और दर्शक राहत के साथ घर लौटता है। लेकिन सामाजिक सरोकार वाला सिनेमा कई बार इस सुविधा को छीन लेता है। ‘अस्सी’ यह सवाल छोड़ती है कि किसी एक मामले में न्याय मिल जाने से क्या उस मानसिकता का अंत हो जाएगा जिसने अपराध को जन्म दिया? फिल्म की यही बेचैनी उसे महज अदालत की कहानी से आगे ले जाती है।
हालांकि यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जरूरी है। किसी फिल्म को समाज सुधारक मान लेने का अर्थ यह नहीं कि उसके प्रभाव को स्वतः सकारात्मक मान लिया जाए। अच्छी मंशा और अच्छी फिल्म दो अलग बातें हैं। ‘फुले’ इसका उदाहरण है। ज्योतिराव और सावित्रीबाई फुले के जीवन और स्त्री शिक्षा तथा जातिगत भेदभाव के विरुद्ध उनके संघर्ष को परदे पर लाने का विषय अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण था, लेकिन समीक्षकों ने फिल्म की प्रस्तुति और कथानक की गति को लेकर अलग-अलग मत व्यक्त किए। इसका अर्थ यही है कि समाज सुधार का संदेश तभी दूर तक जाता है, जब वह उपदेश के बजाय प्रभावशाली कहानी और जीवंत पात्रों के माध्यम से दर्शक तक पहुंचे।
आज के दौर में दर्शक भी बदल चुका है। वह केवल यह नहीं पूछता कि फिल्म मनोरंजक है या नहीं; वह यह भी देखता है कि फिल्म उसके समय की कौन-सी बेचैनी को आवाज दे रही है। यही कारण है कि जाति, लैंगिक समानता, शिक्षा, दिव्यांगता, धार्मिक कट्टरता, किसान, बेरोजगारी और न्याय व्यवस्था जैसे विषय लगातार फिल्मों का हिस्सा बन रहे हैं। ‘सितारे जमीन पर’ ने बौद्धिक दिव्यांगता और समावेशन को केंद्र में रखकर यह सवाल उठाया कि सामान्य होने की हमारी परिभाषा आखिर किसने तय की है। सिनेमा समाज को बदलता है या समाज में पहले से चल रहे बदलाव को गति देता है, इस पर बहस जारी रह सकती है। संभवतः दोनों बातें सही हैं। कोई फिल्म अकेले कानून नहीं बदल सकती, अपराध समाप्त नहीं कर सकती और सामाजिक भेदभाव मिटा नहीं सकती। लेकिन वह उस बहस को जन्म दे सकती है जिसे समाज लंबे समय से टालता आया है। वह किसी बच्चे के मन में गांधी के सत्य की तरह कोई मूल्य बैठा सकती है, किसी अपराधी के सामने सुधार की संभावना रख सकती है, किसी किसान के दर्द को शहर के दर्शक तक पहुंचा सकती है और किसी महिला को यह एहसास दिला सकती है कि उसकी चुप्पी ही उसकी नियति नहीं है।
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