Thursday, March 14, 2024

गुरू दत्त एक अबूझ पहेली, जो आज तक हल नहीं हुई!

- हेमंत पाल

    हिंदी सिनेमा के सौ साल से ज्यादा लंबे इतिहास में इतना कुछ घटा है कि सब कुछ याद रखना आसान नहीं। इस दौरान इतनी शख्सियतें दर्शकों के सामने से गुजरी कि सभी का जिक्र करना भी मुश्किल है। सोहराब मोदी, दिलीप कुमार, कमाल अमरोही, देव आनंद, राज कपूर से शुरू किया जाए तो नामों की फेहरिस्त अंतहीन है। लेकिन, फिर भी एक नाम ऐसा है जिसने बहुत कम फ़िल्में बनाई, गिनती की फिल्मों में अभिनय किया, पर वो अपनी छाप छोड़ गया। ये शख्स है गुरू दत्त, जिनका जिक्र किए बिना कभी वर्ल्ड सिनेमा की बात पूरी नहीं होगी। कहा जा सकता है कि अपने समय काल में गुरू दत्त वर्ल्ड सिनेमा के लीडर थे। 1950-60 के दशक में गुरू दत्त ने कागज़ के फूल, प्यासा, साहब बीवी और गुलाम और चौदहवीं का चांद जैसी फिल्में बनाई। इसमें उन्होंने कंटेंट के लेवल पर फिल्मों के क्लासिक पोयटिक एप्रोच को बरकरार रखते हुए रियलिज्म का इस्तेमाल किया। 
      गुरू दत्त अपने आप में एक फिल्म मूवमेंट थे। इसलिए उन्हें किसी और मूवमेंट के ग्रामर पर नहीं कसा जा सकता। गुरू दत्त के बारे में कहा जाता है, कि वे सबसे ज्यादा अपने आप से ही नाराज रहते थे। उनकी इस नाराजगी के कई प्रमाण भी सामने आए। 'कागज के फूल' की असफलता के बाद गुरू दत्त ने कहा भी था 'देखो न मुझे डायरेक्टर बनना था, डायरेक्टर बन गया! एक्टर बनना था एक्टर बन गया! अच्छी पिक्चर बनाना थी, बनाई भी! पैसा है सब कुछ है, पर कुछ भी नहीं रहा।' उनकी जिद के कई किस्से आज भी याद किए जाते हैं। अपनी कालजयी फिल्म 'प्यासा' में वे दिलीप कुमार को बतौर नायक लेने वाले थे। उनकी इस बारे में बात भी हो चुकी थी। लेकिन, किसी बात पर मतभेद हो गए और उन्होंने फिल्म में काम नहीं किया। बाद में गुरू दत्त ने खुद ही इस फिल्म में काम किया। दरअसल, ऐसा कई बार हुआ। मिस्टर एंड मिसेज़ 55, साहेब बीवी और गुलाम और 'आर पार' में भी वे जिस कलाकार को लेना चाहते थे, उन्होंने किसी न किसी कारण इंकार कर दिया था। 'मिस्टर एंड मिसेज़ 55' में सुनील दत्त को लेने वाले थे, पर ऐसा नहीं हो सका। 'साहेब बीवी और गुलाम' के लिए शशि कपूर और विश्वजीत से बात की, लेकिन यहां भी बात टूट गई। अंत में उन्होंने ही वो भूमिका निभाई।
     'साहेब बीवी और गुलाम' फिल्म के दौरान गीता दत्त से उनके संबंध खराब हो गए थे। इसका कारण थी वहीदा रहमान। निजी जिंदगी की परेशानियों के कारण ही गुरू दत्त ने 'साहेब बीवी और गुलाम' का निर्देशन अपने दोस्त अबरार अल्वी से करने को कहा था। इस फिल्म को साहित्यकार बिमल मित्रा ने लिखा था। गुरु दत्त ने इस फिल्म में भी हमेशा की तरह वहीदा रहमान को लेने पर जोर दिया जो उनके और गीता दत्त के रिश्तों में खटास का एक बड़ा कारण थीं। गीता दत्त ने 'साहिब बीबी और गुलाम' को गुरुदत्त और अभिनेत्री वहीदा रहमान की वास्तविक जीवन की कहानी के रूप में माना। 1962 में आई इस फिल्म को अपने समय काल से बहुत आगे माना जाता है। इस फिल्म में व्यभिचार के मुद्दे, विवाह और पितृसत्ता को चुनौती दी गई थी।  गुरु दत्त एक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसकी रचनात्मक प्रतिभा को बहुत कम उम्र में तब अभिव्यक्ति मिली, जब परिवार कलकत्ता चला गया। अल्मोड़ा में उदय शंकर के नृत्य विद्यालय में उनके कार्यकाल ने उनकी फिल्म बनाने की प्रवृत्ति को आकार दिया। सिनेमा की दुनिया में खुद के लिए एक जगह खोजने के लिए उनका संघर्ष और देव आनंद के साथ उनकी मुलाकात उनकी किस्मत बदलने का एक बहाना था।
      एक निर्देशक के रूप में उनकी सफलता अजीबो-गरीब क्राइम थ्रिलर, जबकि उनका आंतरिक स्व कुछ और सार्थक करने के लिए तरस रहा था, जो उन्होंने प्यासा (1957) के साथ पूरा किया। बॉक्स ऑफिस पर उनकी इस फिल्म की पराजय के साथ उनकी पूरी निराशा भर गई, जिसे अब उनकी  महान रचना माना जाता है। गुरुदत्त रचनात्मक व्यक्ति थे इसमें शक नहीं, उन्होंने अपने सपनों को आकार भी दिया, लेकिन उसके आंतरिक संघर्ष और कशमकश ने इन सपनों को तोड़ने में भी देरी नहीं की। यहां तक कि उन्होंने अपने आलीशान पाली हिल वाले बंगले को भी नहीं बख्शा और तोड़ दिया। 
    अपनी फिल्मों के पारंपरिक सौंदर्य के साथ जमीनी सच्चाई का इस्तेमाल करते हुए गुरू दत्त अपने समकालीनों से मीलों आगे थे। गुरुदत्त ने 1951 में अपनी पहली फिल्म 'बाज़ी' बनाई। यह देवानंद के नवकेतन की फिल्म थी। इस फिल्म में 40 के दशक की हॉलीवुड की फिल्म तकनीक और तेवर को अपनाया गया था। इस फिल्म में गुरुदत्त ने 100 एमएम लेंस के साथ क्लोज-अप शॉट्स का इस्तेमाल किया था। इसके अलावा पहली बार कंटेट के लेवल पर गानों का इस्तेमाल फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने के लिए किया था। तकनीक और कंटेट दोनों के लेवल पर ये भारतीय सिनेमा को गुरुदत्त की बड़ी देन हैं। 'बाज़ी' के बाद गुरुदत्त ने 'जाल' और 'बाज' बनाई। इन दोनों फिल्मों को बॉक्स ऑफिस पर कुछ खास सफलता नहीं मिली थी। आर-पार (1954), मिस्टर और मिसेज 55, सीआईडी और 'सैलाब' के बाद उन्होंने 1957 में 'प्यासा' बनाई। 
    'प्यासा' के साथ रियलिज्म की राह पर कदम बढ़ाने के साथ ही गुरू दत्त तेजी से डिप्रेशन की तरफ बढ़ रहे थे। 1959 में बनी 'कागज के फूल' गुरू दत्त की इस मनोवृत्ति को व्यक्त करती है। इस फिल्म में सफलता के शिखर तक पहुंचकर गर्त में गिरने वाले डायरेक्टर की भूमिका गुरू दत्त ने खुद निभाई थी। यदि ऑटर थ्योरी पर यकीन करें तो यह फिल्म पूरी तरह से गुरुदत्त की फिल्म थी। इस फिल्म में वे एक फिल्मकार के रूप में सुपर अभिव्यक्ति रहे। 1964 में शराब और नींद की गोलियों का भारी डोज़ लेने के चलते हुई गुरुदत्त की मौत के बाद देवानंद ने कहा था, वो एक युवा व्यक्ति था उसे डिप्रेसिव फिल्में नही बनानी चाहिए थीं। फ्रेंच वेव के अन्य फिल्मकारों की तरह गुरू दत्त सिर्फ फिल्म बनाने के लिए फिल्म निर्माण नहीं कर रहे थे, बल्कि उनकी हर फिल्म शानदार उपन्यास या काव्य की तरह कुछ न कुछ कह रही थी। वे अपनी खास शैली में फिल्म बनाते रहे और उस दौर में वर्ल्ड सिनेमा में जड़ें भी पकड़ रहे ऑटर थ्योरी को भी सत्यापित कर रहे थे। एक फिल्म के पूरा होते ही गुरू दत्त रुकते नहीं, बल्कि दूसरी फिल्म की तैयारी में जुट जाते थे। कुलीन बंगाली परिवार की बेहद प्रतिभाशाली और लोकप्रिय गायिका गीता दत्त के साथ उनके अशांत विवाह से उनके जीवन का ज्यादातर संघर्ष उत्पन्न हुए। गीता के साथ अपने संबंधों को गुरु दत्त ने पाखंड कहकर उजागर भी किया। 
     उन्होंने अपनी फिल्मों में उन्होंने 'कामकाजी महिलाओं' के बारे में बात की और समाज की पुरातन परंपराओं पर सवाल भी उठाए। जबकि, अपने निजी जीवन में वे चाहते थे कि उनकी पत्नी अपने गायन करियर को छोड़ दें और शादी और मातृत्व के पारंपरिक मूल्यों का पालन करें। फिल्म निर्माण कंपनी के मालिक के रूप में गुरु दत्त अपने सभी कर्मचारियों के जीवन और आजीविका के लिए जिम्मेदार थे। फिर भी, उनके रचनात्मक आग्रह का मतलब था कि वह अक्सर यह तय नहीं कर पाते थे कि उन्हें क्या चाहिए। वे मर्जी से फिल्में बनाना शुरू कर देते थे। 
    10 अक्टूबर 1964 को यह अनोखा अभिनेता मृत पाया गया। कहा जाता है कि वह शराब और नींद की गोलियां मिलाकर पीता था। यह उनका तीसरा और आत्महत्या का प्रयास था। 1963 में वहीदा रहमान के साथ उनके संबंध समाप्त हो गए। गीता दत्त को बाद में एक गंभीर नर्वस ब्रेकडाउन का सामना करना पड़ा। 1972 में उनका भी निधन हो गया। एक बार उन्होंने कहा था लाइफ क्या है। दो ही तो चीज है, कामयाबी और फेल्यर। इन दोनों के बीच कुछ भी नहीं है। फ्रेंच वेव की रियलिस्टिक गूंज उनके इन शब्दों में सुनाई देती है, देखो ना, मुझे डायरेक्टर बनना था, बन गया, एक्टर बनना था बन गया, पिक्चर अच्छी बनानी थी, अच्छी बनी। पैसा है सबकुछ है, पर कुछ भी नहीं रहा। हालांकि समय के साथ गुरुदत्त की फिल्मों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मजबूत पहचान मिली है। टाइम पत्रिका ने प्यासा को 100 सदाबहार फिल्मों की सूची में रखा है। इतनी सारी खासियतों के कारण ही गुरू दत्त आजतक अबूझ पहेली बने हुए हैं। 
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लम्बी फिल्मों का इतिहास भी बहुत लंबा

    देश में सैकड़ों फिल्में हर साल बनती है। हर फिल्म की कोई न कोई ऐसी खासियत होती है, जिस वजह से वे दर्शकों को आकर्षित करती है। कुछ चुनिंदा फिल्मों की खासियत उनकी लंबाई होती है। कुछ बहुत छोटी तो कुछ की लंबाई का रिकॉर्ड तोड़ होती है। कोई फिल्म इतनी छोटी बनी कि उन्हें इंटरवल की जरुरत नहीं पड़ी, तो कुछ फिल्मों में दो-दो इंटरवल करना पड़े। ऐसी फ़िल्में भी बनी जिनकी लंबाई की वजह से सिनेमाघरों ने उन्हें रिलीज करने से ही इंकार कर दिया। आखिर 5 घंटे से ज्यादा लंबी फिल्म को कोई सिनेमाघर कैसे दिखाएं और दर्शक क्यों देखें।
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- हेमंत पाल
     
     फिल्म इतिहास में कुछ फ़िल्में अपनी लंबाई को लेकर खास रही। ऐसी फिल्में दर्शकों का मनोरंजन करने में भी सफल रहीं। ये लंबी जरूर थी, पर इनमें से ज्यादा ने दर्शकों को उबाया नहीं। आज भी दर्शक इन फिल्मों को इनके दिलचस्प कथानक की वजह से याद करते हैं। रणबीर कपूर की हाल ही में आई फिल्म 'एनिमल' को उसकी लम्बाई के कारण याद किया जाता है। लंबे समय से दर्शकों की छोटी फिल्म देखने की आदत है, ऐसे में 'एनिमल' की सफलता के बाद ऐसी फिल्मों का चलन शुरू होगा, ये नहीं कहा जा सकता। फिल्मकार ये हिम्मत तभी कर सकते हैं, जब कहानी में उसे इतना खींचने की गुंजाइश हो। यदि किसी भी फिल्म की लंबाई दो-ढाई घंटे से ज्यादा हो, तो उसकी कहानी में इतना दम होना चाहिए कि वो दर्शकों को बांध सके। क्योंकि, दर्शकों को इतनी देर तक रोककर रखना आसान नहीं होता। लेकिन, ये तभी संभव हो सकता है जब उसका कथानक और निर्देशन जबरदस्त हो। अगर जरा भी कथानक ढीला पड़ा, तो दर्शक बीच फिल्म में कुर्सी छोड़ने में देर नहीं करेगा। लंबी फिल्म उसे कहा जाता है, जो दो-ढाई घंटे की फिल्म के मुकाबले साढ़े तीन या चार घंटे से ज्यादा लंबी होती है। खास बात यह कही जाएगी कि अधिकांश लंबी फिल्में सफल रही हैं।
      हिंदी सिनेमा का इतिहास देखा जाए, तो लंबी फ़िल्में बनाने की शुरुआत 1964 में राज कपूर ने की थी। उनकी फिल्म 'संगम' लंबी होने की वजह से उसमें दो इंटरवल थे। 'संगम' में राज कपूर, राजेंद्र कुमार और वैजयंती माला जैसे कलाकार थे। यह फिल्म एक प्रेम त्रिकोण पर आधारित कथानक था, जो 3 घंटे 58 मिनट लम्बी थी। हिंदी फिल्म इतिहास की ये पहली इतनी लंबी फिल्म थी। ये उस समय की सुपरहिट फिल्मों में थी। दो इंटरवल होने से सिनेमाघरों में इसके दो शो ही चलते थे। 'संगम' की सफलता कुछ ऐसी रही कि ये फिल्म 60 के दशक में ‘मुगल-ए-आज़म’ के बाद सबसे ज्यादा कमाई वाली फिल्मों में गिनी गई। रिचर्ड एटनबरो की महात्मा गांधी के जीवन पर बनी फिल्म 'गांधी' भी 3 घंटे 11 मिनट लंबी फिल्म थी।  
    हर लंबी फिल्म सफल हो, ये जरूरी नहीं। राज कपूर की ही 1970 में आई 'मेरा नाम जोकर' ने उन्हें कर्ज में डुबो दिया था। जबकि, फिल्म की स्टार कास्ट 'संगम' वाले कलाकार भी थे। यह फिल्म राज कपूर का ड्रीम प्रोजेक्ट था, लेकिन उनके सारे सपनों को ध्वस्त कर दिया। 'संगम' से थोड़ी ही ज्यादा लंबी इस 4 घंटे की फिल्म को देश की सबसे लंबी फिल्मों में शामिल किया जाता है। इसमें भी दो इंटरवल होते थे। यह फिल्म एक सर्कस के जोकर 'राजू' की कहानी थी, जिसका दर्द कोई नहीं समझ पाता। इसे राज कपूर की बेहतरीन फिल्मों में गिना जाता है। इस फिल्म के घाटे से उबरने के लिए राज कपूर ने बेटे ऋषि कपूर को लेकर ही 'बॉबी' बनाई थी।
     1975 में रमेश सिप्पी ने 'शोले' बनाई, इसे भी लंबी फिल्मों गिना जाता है। 3 घंटे 20 मिनट की इस फिल्म का शुरूआती कारोबार बेहद ठंडा था। लेकिन, धीरे-धीरे दर्शक जुटने लगे और फिल्म ने 35 करोड़ की कमाई का रिकॉर्ड बनाया। दो दशक तक 'शोले' की इस कमाई का कोई फिल्म रिकॉर्ड नहीं तोड़ पाई थी। 'शोले' से 6 मिनिट लम्बी बनी राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म 'हम आपके हैं कौन' ने 135 करोड़ रुपए की कमाई की। सलमान खान, माधुरी दीक्षित और मोहनीश बहल इस फिल्म के कलाकार थे। लंबी फिल्मों का दौर यहीं ख़त्म नहीं हुआ। 2001 में आई आशुतोष गोवारिकर निर्देशित आमिर खान की फिल्म 'लगान' भी 3 घंटे 44 मिनट लंबी थी, जो सुपर हिट साबित हुई। इसके अनोखे पात्रों को आज भी दर्शक याद करते हैं। अपनी अलग सी कहानी के कारण इसे ऑस्कर में भी एंट्री मिली। यह फिल्म ब्रिटिश राज के दौरान एक गांव की कहानी बताती है, जो अंग्रेजों के साथ क्रिकेट का खेल खेलते हैं, ताकि वे करों का भुगतान न कर सकें। 
    युद्ध के कथानक पर जेपी दत्ता के निर्देशन में बनी 'एलओसी कारगिल' 2003 में रिलीज हुई। यह फिल्म हिंदी फिल्म इतिहास की तीसरी सबसे लंबी फिल्मों में एक थी। इसकी लंबाई 4 घंटे 10 मिनट थी। इसका कथानक 1999 के भारत-पाकिस्तान युद्ध पर केंद्रित था, जो कारगिल में लड़ी गई थी। आदित्य चोपड़ा के निर्देशन में आई 'मोहब्बतें' भी 3 घंटे 36 लंबी थी। शाहरुख खान, अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय और जुगल हंसराज की यह फिल्म अपने समय में सुपर हिट हुई थी। इस फिल्म को इसलिए भी याद किया जाता है कि इसने अमिताभ बच्चन को बतौर अभिनेता दूसरा जन्म दिया। आशुतोष गोवारिकर की 2008 में आयी फिल्म 'जोधा अकबर' भी लंबी फिल्मों की फेहरिस्त में शामिल है। ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय की यह फिल्म 3 घंटे 33 मिनट लंबी थी।
      अभी तक की सबसे लंबी फिल्मों में अनुराग कश्यप की 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' को गिना जाता है। 5 घंटे 21 मिनट लंबी इस फिल्म को बना तो लिया गया, पर इसकी लंबाई के कारण कोई सिनेमाघर इसे रिलीज करने को राजी नहीं हुआ। इसके बाद फिल्म को दो हिस्सों में बांटकर रिलीज किया गया। फिल्म का पहला हिस्सा जून 2012 और दूसरा पार्ट अगस्त 2012 में रिलीज किया। तीन पीढ़ियों की कहानी बताती इस फिल्म के दोनों हिस्सों ने बॉक्स ऑफिस पर जमकर धमाल मचाया था। अनिल कपूर, सलमान खान, गोविंदा और प्रियंका चोपड़ा की फिल्म 'सलाम-ए-इश्क' (2007) भी 3 घंटे 36 मिनट लम्बी थी। बड़े सितारों के बावजूद ये फिल्म पसंद चली नहीं। इनके अलावा, तमस, हम साथ-साथ हैं और 'कभी अलविदा न कहना’ भी लंबी फिल्मों में शामिल हैं।
     बरसों बाद 2016 में आई सुशांत सिंह राजपूत की फिल्म 'एम एस धोनी' भी 3 घंटे 5 मिनट लंबी थी। इससे पहले 2008 में 'गजनी' ने 3 घंटे का दायरा तोड़ा। 2000 से अभी तक 23 साल में 20 फिल्में भी ऐसी नहीं हैं, जिनकी लंबाई 3 घंटे से ज्यादा हो। क्योंकि, दर्शकों को तीन घंटे तक बांधकर रखना आसान नहीं होता। जब किसी फिल्म की ज्यादा लंबाई का जिक्र होता है, तो स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा होती है कि फिल्म में ऐसा क्या खास है, जो इसकी कहानी कहने में इतना वक़्त लिया गया। ऐसी कई फ़िल्में पौराणिक कहानियों पर भी बनी। जोधा अकबर, लगान, स्वदेस और नायक या ऐसी लंबी फिल्मों को इसी दर्जे में रखा जा सकता है। लंबी फिल्मों का दौर अभी ख़त्म नहीं हुआ। रणबीर कपूर की 'एनिमल' के बाद शाहरुख खान की आने वाली फिल्म 'डंकी' भी लंबी फिल्मों में गिनी जाने वाली फिल्म होगी। 'एनिमल' 3 घंटे 21 मिनट लंबी फिल्म है। जबकि, राजकुमार हिरानी निर्देशित शाहरुख खान 'डंकी' 2 घंटे 40 मिनट की फिल्म बताया गया है। आज दो-सवा दो घंटे से ज्यादा लंबी फिल्म बनने वाली फिल्म को लंबा ही माना जाएगा।
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मध्यप्रदेश की राजनीति // कांग्रेस से मोहभंग के आखिर क्या कारण!

     राजनीति में प्रतिबद्धता के लिए कोई जगह नहीं होती। क्योंकि, ये ऐसा क्षेत्र है, जहां स्वार्थ को हमेशा आगे रखकर चला जाता है। यदि पार्टी नेताओं को भाव देती है, उनकी इच्छा के मुताबिक पद देती है, तब तो वे पार्टी के साथ बने रहते हैं। लेकिन, यदि पार्टी का कोई फैसला उनकी मनमर्जी से परे जाता है, तो वे उसे छोड़ने में भी देर नहीं करते। ऐसे में यदि पार्टी की स्थिति कमजोर होती है, तो नेता उससे अलग होने के बहाने खोजने लगते हैं। इसलिए कि राजनीति में कोई फैसला घाटे का सौदा सोचकर नहीं किया जाता। मध्यप्रदेश की कांग्रेस पार्टी में जिस तरह भगदड़ मची है, उससे नेताओं की मानसिकता और पार्टी का सोच दोनों उजागर होता है।
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- हेमंत पाल

    राजनीति एक ऐसी जगह है जहां सारे फैसले जमीर को किनारे रखकर लिए जाते हैं। क्योंकि, राजनीति में जमीर के लिए कोई जगह नहीं होती। इसमें जो कुछ होता है, वो सिर्फ तात्कालिक स्वार्थ के लिए होता है। राजनीति से जुड़े लोग स्वार्थ के वशीभूत होकर फैसले करते हैं और फिर उन्हें सही ठहराने की कोशिश करने से भी बाज नहीं आते। नैतिकता, खुद्दारी और आत्मसम्मान को हाशिए पर रखकर वे ऐसे फैसले करते हैं, जिसमें निष्ठा और प्रतिबद्धता के लिए कोई जगह नहीं बचती। ऐसे सैकड़ों उदाहरण दिए जा सकते हैं, जब राजनीतिकों ने अपने स्वार्थ की खातिर प्रतिबद्धता की खिल्ली उड़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ा। पार्टी बदल भी राजनीति में एक ऐसी ही घटना है, जो बहुत सामान्य हो गई। चढ़ते सूरज को अर्ध्य देने की पुरातन मान्यता को नेता राजनीति में कुछ इसी तरह से इस्तेमाल करने लगे। इन दिनों मध्यप्रदेश में कांग्रेस के नेताओं की जो भागमभाग लगी है। जरूरी नहीं कि ये राजनीतिक स्वार्थ के लिए हो, इसके अलावा भी बहुत से और भी कारण है, जिस वजह से नेता पाला बदल जुगाड़ में लगे हैं। उनका सोच है कि यदि गले का दुपट्टा बदलने से उनकी स्वार्थ सिद्धि होती है, तो फिर उसमें बुराई क्या है!
      करीब साढ़े तीन साल पहले मध्य प्रदेश की राजनीति में एक भूचाल सा आया था। तब कांग्रेस के नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने 22 समर्थक विधायकों के साथ पार्टी से विद्रोह किया था। इसका नतीजा ये हुआ था कि कांग्रेस की तत्कालीन कमलनाथ सरकार भरभराकर गिर गई। इसके बाद राजनीति में बहुत कुछ बदला। 2018 का विधानसभा चुनाव हारी भाजपा ने फिर प्रदेश में सरकार बना ली। लेकिन, सिंधिया के विद्रोह की जड़ें इतनी गहरे तक उतर गई, कि आज भी वो आज भी पल्लवित हो रही है। यही वजह है कि 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस की सरकार बनने की संभावना आंककर कई भाजपा नेता कांग्रेस के पाले में आए थे। लेकिन, अब हवा उलटी चलती दिखाई दे रही, तो लोकसभा चुनाव से पहले कई नेता कांग्रेस छोड़कर भाजपा का पल्ला थामने में लगे हैं। इनमें वे नेता भी हैं, जो पहले भाजपा से कांग्रेस में गए थे, वे अब यू-टर्न लेने लगे। 
      कांग्रेस में भगदड़ का माहौल अभी ख़त्म नहीं हुआ। कुछ दिनों पहले मध्यप्रदेश के पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री कमलनाथ और उनके सांसद बेटे के भाजपा में जाने को लेकर भी बहुत हल्ला हुआ था। बताते हैं कि वह कोशिश राजनीतिक कारणों से साकार नहीं हो सकी, पर उसकी कमी कांग्रेस से चार बार राज्ययसभा सदस्य रहे सुरेश पचौरी, पूर्व विधायक संजय शुक्ला और विशाल पटेल के साथ तीन बार के सांसद रहे गजेंद्रसिंह राजूखेड़ी ने पूरी कर दी। ये सभी नेता अपने समर्थकों के साथ भाजपा में शामिल हो गए। सोचा जा सकता है कि आखिर कांग्रेस में ऐसा क्या हो गया कि उसमें भगदड़ जैसे हालात बन गए। रोज कोई न कोई बड़ा नेता भाजपा खेमे में खड़ा दिखाई देने लगा। इसके कारणों को खोजा जाए, तो राजनीतिक कारण कम ही दिखाई देंगे। सबके पीछे कोई न कोई निजी स्वार्थ नजर आता है। किसी ने टिकट न मिलने से नाराज होकर पार्टी छोड़ दी तो कुछ नेताओं के कारोबार पर आया संकट इसकी वजह है। लेकिन, सुरेश पचौरी जैसे 72 साल के नेता का कांग्रेस से क्यों मोहभंग हुआ और भाजपा में उनका क्या उपयोग है, ये किसी को समझ नहीं आ रहा। 
    कांग्रेस छोड़ने वाले ज्यादातर नेताओं का कहना है, कि पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का राम मंदिर लोकार्पण समारोह का निमंत्रण ठुकराना सही फैसला नहीं था। इससे कई नेताओं की आस्था आहत हुई और फिर इससे राजनीति की गई। इसलिए कांग्रेस के इन नेताओं ने पार्टी को तिलांजलि देने का फैसला किया। पार्टी में भगदड़ के जो हालात बने, उसका मूल कारण फिलहाल तो यही बताया जा रहा है। क्योंकि, भगवान राम के प्रति श्रद्धा हर भारतीय में है, ऐसे में लोकार्पण का निमंत्रण ठुकराना उन्हें अनुचित लगा। कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को अंदाजा नहीं था कि इस फैसले का खामियाजा उन्हें इस तरह भुगतना पड़ेगा। वास्तव में कांग्रेस को इस सच का अनुमान नहीं था कि मंदिर के निमंत्रण की अवहेलना उन्हें इतनी ज्यादा महंगी पड़ेगी।
    कांग्रेस नेताओं का पार्टी छोड़ने के फैसले को कम से कम राजनीतिक विचारधारा में बदलाव तो नहीं कहा जा सकता। क्योंकि, विचारधारा की जड़ें इतनी कच्ची नहीं होती कि झटके में उखड़ जाएं। इसके अलावा भी बहुत से ऐसे कारण हैं, जिससे ये नेता कांग्रेस छोड़ने को मजबूर हुए। इंदौर के धन्नासेठ पूर्व विधायक संजय शुक्ला ने अपने विधायक कार्यकाल में पूरे पांच साल क्षेत्र के लोगों को अयोध्या की मुफ्त यात्रा कराई। ऐसे में राम मंदिर लोकार्पण को लेकर कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की हठधर्मी ने उन्हें आहत किया। उन्हें पार्टी छोड़ना ही सही विकल्प लगा। ये तो पार्टी से अलग होने का एक उदाहरण है, ऐसे ही हर नेता के पास कोई न कोई तार्किक कारण है, जो उनके फैसले को न्यायोचित ठहराता है। एक आंकड़ा भी सामने आया कि अभी तक 5800 से ज्यादा कांग्रेसियों ने पार्टी का 'हाथ' छोड़ दिया। यानी इन सभी के पास ऐसी कोई न कोई वजह है, जिसने इन्हें कांग्रेस छोड़ने के लिए मजबूर किया।  
      ऐसे नेताओं की भी कमी नहीं, जो पहले भाजपा में रहे, फिर माहौल बदला तो कांग्रेस में आ गए, चुनाव जीतकर सांसद और विधायक बने और अब वापस लौट गए या लौटने वाले हैं। धार संसदीय क्षेत्र से तीन बार सांसद और एक बार मनावर विधानसभा से विधायक रहे आदिवासी नेता गजेंद्र सिंह राजूखेड़ी ने भी गले में भाजपा का भगवा गमछा डाल लिया। जबकि, राजूखेड़ी का रणनीति में पदार्पण भाजपा का झंडा थामकर हुआ था। उन्होंने 1989 में मध्य प्रदेश के उपमुख्यमंत्री रहे कांग्रेस नेता शिवभानुसिंह सोलंकी को मनावर विधानसभा में हराया था। लेकिन, इसके बाद वे भाजपा छोड़कर कांग्रेस में आ गए और तीन बार सांसद चुने गए। लेकिन, उनका आरोप है कि कांग्रेस ने उनकी उपेक्षा की। वे विधानसभा चुनाव लड़ना चाहते थे, पर कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया। लोकसभा चुनाव में भी उनका नाम पैनल से काट दिया गया। यही कारण रहा कि उन्होंने कांग्रेस को बाय-बाय बोल दिया। कहा जा सकता है कि वे जिस भाजपा को छोड़कर आए थे, उसी पार्टी में लौट गए।
    तात्कालिक रूप से कांग्रेस नेताओं का पार्टी बदल का ये माहौल भाजपा के हित में देखा जा रहा हो! लेकिन, इसका भविष्य में इसके क्या परिणाम होंगे, उसका अनुमान जरूर लगाया जा सकता है। निश्चित रूप से इससे भाजपा को नुकसान होगा। क्योंकि, इससे मूल भाजपा के वे प्रतिबद्ध नेता हाशिये पर चले जाएंगे और पार्टी में उनकी उपयोगिता लगभग ख़त्म हो जाएगी। तब कांग्रेस से गए नेता भाजपा में हावी हो जाएंगे। ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके पूरे गुट के भाजपा में जाने के बाद प्रदेश के उन इलाकों में भाजपा के नेता हाशिये पर चले ही गए, जहां सिंधिया-गुट का दबदबा था। लेकिन, अभी की राजनीति इस तरह के सोच की इजाजत नहीं देती कि दूरगामी नजरिया रखा जाए! राजनीति को हमेशा फास्ट फूड की तरह देखा जाता है। ऐसे में भविष्य के नजरिए को अक्सर नजरअंदाज किया जाता है। तात्कालिक रूप से भाजपा को अपने राजनीतिक प्रतिद्वंदी को खत्म करने का मौका मिल रहा है, तो वह उससे चुकेगी भी नहीं। लेकिन, देखना है कि लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी बदल के कितने दौर चलते हैं! 
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Tuesday, March 5, 2024

चांद चुराने और चरखा चलाने से इतर भी गुलजार की दुनिया

- हेमंत पाल

    गुलजार के गीतों में कुछ शब्दों का प्रयोग बहुत ज्यादा दिखाई देता रहा। उनके गीतों में 'चांद' नए रूपों में मौजूद है। लाज, लिहाज, ताना और आत्मीयता लगभग हर एक प्रसंग के लिए गुलजार ने चांद को याद किया। 'चांद' यहां इच्छाओं का बिम्ब बन गया। चांद से यह नजदीकी गुलजार में इतनी गहरी है, कि कभी वे चांद चुराकर चर्च के पीछे बैठने की बात करते हैं, कभी कहते हैं 'शाम के गुलाबी से आंचल में दीया जला है चाँद का, मेरे बिन उसका कहां चांद नाम होता!' उनके गीतों में एक भूखे इंसान को चांद में भी रोटी नजर आती है 'आज की रात फुटपाथ से देखा मैंने रात भर रोटी नजर आया है, वो चांद मुझे।' ये ऐसे कुछ चंद उदाहरण हैं जो गुलजार के एक शब्द के अलग-अलग प्रयोग बताते हैं। एक बात यह भी कि वे ऐसी साहित्यिक ऊंचाई हैं, जिस पर लम्बे समय तक टिके रहना बिरली घटना है।
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     गुलज़ार फिल्मों के ऐसे गीतकार हैं, जिनके गीतों की खनक कुछ अलहदा है। उनके गीतों के लफ्ज़ उनके श्वेत परिधान की तरह उजले और ठसकदार आवाज की तरह ठस्की से भरपूर हैं। गीतों में छायावाद या प्रयोगधर्मिता उनका शगल रहा। शब्दों के बियाबान से वे दूसरी भाषाओं से ऐसे अनोखे शब्द चुनकर लाते हैं, कि सुनने वाला भी हैरान हो जाए! कानों को सुरीला लगने के बावजूद उनके गीतों को गुनगुनाना आसान नहीं होता! क्योंकि, दो चार बार सुनने के बाद भी उनके गीतों के कई शब्दों को समझना मुश्किल होता है। 'गुलामी' फिल्म के एक गीत में फ़ारसी के शब्दों 'ज़ेहाल-ए-मिस्कीन मकुन बारंजिश बाहाल-ए-हिजरा बेचारा दिल है' को आखिर कोई कैसे समझे! शब्दों के साथ चुहलबाजी गुलज़ार का पुराना शगल है। अपनी पहली ही फिल्म 'बंदिनी' के गीतों में उन्होंने 'मोरा गोरा ऱंग लई ले, मोहे श्याम रंग दई दे' लिखकर चौंकाने की शुरुआत की थी, जो आज भी जारी है। लेखन में उर्दू समेत अन्य भाषाओं के शब्दों की बहुलता पर गुलजार का कहते हैं कि मेरे लिखने की भाषा हिन्दुस्तानी है। जिस भाषा का प्रयोग बोलने में करता हूं, उसी में लिखता हूँ।
     शब्दों की इस प्रयोग यात्रा में उन्होंने कभी 'चप्पा चप्पा चरखा' चलाया तो कभी चर्च के पीछे बैठकर चांद चुराने की बात की। 'घर' फिल्म के गीत 'तेरे बिना जिया जाए ना' में 'जीया' और 'जिया' का पारस्परिक संगम छायावाद का बेहतरीन उदाहरण है। 'परिचय' फिल्म के गीत 'सारे के सारे गामा को लेकर गाते चले' में उन्होंने सरगम का जो प्रयोग किया है, वो अद्भुत है। 'मेरे अपने' में उनका एक गीत 'रोज अकेली जाए रे चांद कटोरा लिए' गीत में उन्होंने रात को चांद का कटोरा थमाने की कोशिश बताया, जो ऐसी कल्पनाशीलता का चरम है, जो सहज नहीं कही जा सकती। 'किताब' फिल्म में बाल मनोविज्ञान को गीतों से समझाने के लिए उन्होंने 'धन्नो की आंख में रात का सुरमा' जैसे शब्द रचे! 'चल गुड्डी चल बाग में पक्के जामुन टपकेंगे' और 'जंगल-जंगल बात चली है' के अलावा 'मासूम' फिल्म के लिए उन्होंने 'लकड़ी की काठी  ... काठी पे घोडा' जैसी रचनाएं लिखी, जो बच्चों के प्रति उनके मनोभावों को व्यक्त करती हैं। गुलजार ही हैं जिन्होंने 'चड्डी पहन के फूल खिला है' जैसा बच्चों का गीत लिखने का साहस किया। वे खुद कहते हैं कि बच्चों के लिए लिखना अच्छा लगता है! हर लिखने वाले को बच्चों के लिए लिखना चाहिए। बच्चे संवेदनशील होते हैं, उनसे बतियाना मेरा प्रिय शगल है। वे कहते हैं कभी तो लगता है कि मैं आज भी बच्चा ही हूं। उन्होंने बच्चों के लिए कई किताबें लिखी कायदा, एक में दो, बोस्की की गप्पें, बोस्की का पंचतंत्र का तो कोई जोड़ नहीं। बोस्की दरअसल उनकी बेटी मेघना का प्यार का नाम है, जिसे उन्होंने अपनी किताबों के शीर्षकों में भी उपयोग किया। 
      उर्दू जुबान में फ़िल्मी गीत लिखने वालों में गुलजार के अलावा और भी शायर हैं! पर, गुलजार ने हिंदी के साथ उर्दू, अरबी,फ़ारसी और लोक भाषाओं का जो संगम बनाया वो बेजोड़ है। वे हिंदी और उर्दू को एक करने वाली हिंदुस्तानी जुबान के उस मोड़ पर खड़े दिखाई देते हैं, जहां कविता, कहानी और गीत आकर मिल जाते हैं। उनका एक गीत है 'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है' बेहद सुमधुर कविता है पर फिल्म 'इजाजत' (1987) में ये एक गीत है। उन्होंने एक नई परंपरा की ये शुरुआत भी की, जिसमें हिंदी, उर्दू के साथ राजस्थानी, भोजपुरी, पंजाबी जैसी भाषाओं के शब्दों को भी अपनी रचनाओं में प्रयोग किया! उन्होंने एक ही माला में अलग-अलग भाषाओं के शब्दों को पिरोने में कभी परहेज नहीं किया। फिल्मों के संसार में गुलजार के कई रूप हैं! वे गीतकार के अलावा पटकथाकार, संवाद लेखक और निर्देशक भी हैं! लेकिन, गुलजार को ज्यादा प्रसिद्धि उनके गीतों के कारण मिली। उनके गीत ही उन्हें सिनेमा के शौकीनों से सीधा जोड़ते हैं। उनकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि वे बदलते परिवेश और सिनेमा की मांग के अनुरूप अपने आपको ढालते रहे! 'बंदिनी' से गीतों का सफर शुरू करने वाले गुलजार ने अपने गीतों के जरिए कई विविधताओं के दर्शन कराए! उनका मन बच्चों और युवाओं से लगाकर हर वर्ग को समझता है।
       कोई बचपन में शायद लेखक या कवि बनने की कल्पना नहीं करता, पर गुलजार ने की। उनका मन लेखन और संगीत में ही लगा करता था, जिसे परिवार वाले समय की बर्बादी समझते थे। इस वजह से वे गुलजार के लेखन वाले शौक के खिलाफ रहे। इस विरोध के कारण वे घरवालों से छुपकर पड़ोसी के यहां जाकर लिखा करते थे। जन्म 18 अगस्त 1936 को झेलम जिले के दीना में जन्मे गुलजार का असल नाम तो संपूरण सिंह कालरा है। लेखन के इसी जुनून ने उन्हें मायानगरी का रुख करने पर मजबूर भी किया। पर, यहां आकर उनका संघर्ष बढ़ गया था। कई छोटी-मोटी नौकरियां कीं। पेट पालने के लिए मैकेनिक तक का काम किया। इसी दौरान उनकी पहचान लेखकों से हुई। लंबे संघर्ष के बाद बिमल रॉय, ऋषिकेश  मुखर्जी और संगीत निर्देशक हेमंत कुमार के सहायक बनने का भी उन्हें मौका मिला। लेकिन, गीत लिखने का पहला मौका बिमल रॉय ने 'बंदिनी' में दिया, जिसके वे सहायक रहे।  'बंटी और बबली' तथा 'झूम बराबर झूम' जैसी कमर्शियल फिल्मों के गीतों की जबरदस्त लोकप्रियता इस बात की मिसाल है कि वे हर सुर में शब्द पिरो सकते हैं। उन्हें बाजारू गीत लिखने से भी कभी परहेज नहीं किया। 'कजरारे कजरारे तेरे नैना कारे कारे नैना' का जादू भी दर्शकों के सिर चढ़कर बोला था। 'झूम बराबर झूम' के शीर्षक गीत पर तो युवा पीढ़ी झूम उठी! लेकिन, कौन सोच सकता है कि 'ओमकारा' के 'बीड़ी जलई ले जिगर से पिया' जैसा गीत ने भी गुलजार की कलम से जन्म लिया है। 
      गैर पारंपरिक शब्दों के बावजूद हर रंग के गीत लेखन का नतीजा ये रहा कि गुलजार को दर्जनभर बार फिल्म फेयर पुरस्कार नवाजा गया! ये उनके गीतों की सामाजिक स्वीकार्यता भी दर्शाता है। वे अकेले गीतकार हैं जिनका नाम 'ऑस्कर' जीतने वालों की लिस्ट में भी है। उन्हें फिल्मों की सफलताओं के लिए कई बार नेशनल अवार्ड मिले। ऑस्कर के साथ ग्रैमी अवॉर्ड और दादा साहब फाल्के भी मिला। गुलजार ने पहला गीत 'बंदिनी' के लिए 'मोरा गोरा रंग' लिखा। यहीं से उनका रास्ता खुला और उनकी प्रतिभा को पहचाना गया। बिमल रॉय गुलजार के काम करने के तरीके से खुश थे। उनके साथ गुलजार को निर्देशन की बारीकियां सीखने का मौका मिला और निर्देशन की शुरुआत 'मेरे अपने' फिल्म से की थी। इसके बाद मेरे अपने, आंधी, मौसम, कोशिश, खुशबू, किनारा, नमकीन, मीरा, परिचय, अंगूर, लेकिन, लिबास, इजाज़त, माचिस और 'हू-तू-तू' जैसी कई सार्थक फिल्मे बनाई। उन्होंने मिर्जा गालिब पर टीवी सीरियल बनाया और दूरदर्शन के लिए 'गोदान' पर लंबी फिल्म के अलावा प्रेमचंद की कई कहानियों पर फिल्में बनाईं। गीतकार के रूप में उनका कोई सानी नहीं। सदमा के ऐ जिंदगी गले लगा ले, आंधी के तेरे बिना जिंदगी से, गोलमाल के आने वाला पल जाने वाला है, खामोशी के हमने देखी हैं आंखों से, मासूम के तुझसे नाराज नहीं जिंदगी, परिचय के मुसाफिर हूं यारों, थोड़ी सी बेवफाई के हजार राहें मुड़ के देखी जैसे गीत कालजयी हैं, जिनका कभी किसी से कोई मुकाबला संभव नहीं। 
     गुलजार को साहित्य की दुनिया का सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार 'ज्ञानपीठ' उनके उर्दू लेखन के लिए मिला। लेकिन, सिनेमा की दुनिया में उनकी पहचान सिर्फ उर्दू के लिए नहीं है। गुलजार के गीतों के गुलदस्ते में अरबी भी है और फारसी भी। गुलजार ने शुरुआत में नज़्मों का संग्रह उर्दू में 'जानम' और हिंदी में 'एक बूंद चांद' लिखा था। उनकी कहानियों का पहला संग्रह 'चौरस रात' आया, जिसमें ज्यादातर कहानियां लंबी नहीं थी। उनका सैकड़ों नज़्मों का सफ़र बड़े मुकाम पर पहुंचा और 2002 में एक किताब 'रात पश्मीने की' आई। इसे काफी पसंद किया गया। 2002 में गुलज़ार को कहानी संग्रह 'धुआं' पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। ये उर्दू के गीतकार नहीं, बल्कि साहित्यकार गुलज़ार का सम्मान था। लेकिन, पुरस्कारों ने उन्हें कभी विचलित नहीं किया न तो वे खुश होकर रूके और न अपनी रचनाकर्म के मूल तत्व को बदला। उनके फिल्मी गीतों में भी जो काव्य है, वही उनकी कविता है।
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सिंधिया और शिवराज अपनी पुरानी सीटों से दिल्ली जाएंगे!

- हेमंत पाल 
  
    विधानसभा चुनाव की तरह ही भाजपा ने लोकसभा चुनाव के लिए भी ज्यादातर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी। भाजपा की पहली लिस्ट में 29 सीटों में से 24 उम्मीदवारों के नाम है। अभी 5 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा को रोक दिया गया। ये सीटें हैं इंदौर, उज्जैन, धार छिंदवाड़ा और बालाघाट। माना जा रहा है कि यहां चेहरों में बदलाव होगा। चौंकाने वाला नाम ज्योतिरादित्य सिंधिया और शिवराजसिंह चौहान का रहा, जिन्हें क्रमशः गुना और विदिशा सीट से सिंधिया को मैदान में उतारा गया। ये दोनों नेता पहले इन्हीं लोकसभा सीटों से सांसद रहे हैं। दोनों नेताओं की राजनीतिक शुरुआत भी यहीं से हुई थी। विधानसभा चुनाव हारे दो सांसदों फग्गन सिंह कुलस्ते और गणेश सिंह को फिर लोकसभा में उम्मीदवार बनाया गया है। घोषित 24 सीटों में 11 नए चेहरे हैं।6 मौजूदा सांसदों के टिकट काट दिए गए।   
      2019 के लोकसभा चुनावों में 29 में से 28 जगह भाजपा ने जीत दर्ज की थी। छिंदवाड़ा अकेली सीट थी, जहां से कांग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ चुनाव जीते थे। गुना से पिछला चुनाव ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस के टिकट पर हार गए थे। उन्हें हराने वाले भाजपा के केपी यादव का टिकट इस बार काटकर पार्टी ने फिर सिंधिया को मौका दिया। वैसे भी गुना सीट सिंधिया परिवार की पुश्तैनी सीट रही है। ज्योतिरादित्य सिंधिया खुद भी इस सीट पर तीन बार सांसद रहे। वे कुछ महीनों से जिस तरह गुना में सक्रियता दिखा रहे थे, तय माना जा रहा था कि वे यहां से चुनाव लड़ेंगे। शिवराज सिंह चौहान को विदिशा लोकसभा से उम्मीदवार बनाने के लिए यहां से सांसद रमाकांत भार्गव को किनारे कर दिया गया। इसका सीधा इशारा है कि शिवराज सिंह अब प्रदेश की राजनीति से हटकर केंद्र की राजनीति करेंगे। 
      जिन 6 सांसदों के टिकट काटे गए वे हैं विदिशा से रमाकांत भार्गव, गुना से केपी यादव, भोपाल से प्रज्ञा ठाकुर, रतलाम-झाबुआ सीट से जीएस डामोर, सागर से राजबहादुर सिंह और ग्वालियर से विवेक शेजवलकर। इस लिस्ट में 5 ऐसे भी उम्मीदवार हैं, जो विधानसभा चुनाव नहीं जीत सके थे, पर उन्हें लोकसभा का उम्मीदवार बनाया गया। इनमें फग्गन सिंह कुलस्ते और गणेश सिंह के अलावा भारत सिंह कुशवाह, आलोक शर्मा और राहुल लोधी हैं जिन्हें इस बार विधानसभा का टिकट नहीं दिया था और दमोह से वे उपचुनाव हार गए थे।   
     घोषित 24 सीटों में 13 सांसदों को फिर टिकट मिला, जबकि 11 सीटों पर नए चेहरों को मौका दिया गया। जिन पांच सांसदों ने विधानसभा का चुनाव जीता था, उन सीटों पर सभी नए चेहरे उतारे गए। इसी तरह 6 सांसदों के टिकट काटे गए और इस तरह ये संख्या 11 हुई। जिन 5 सीटों के लिए अभी टिकट की घोषणा नहीं हुई, वहां भी कयास लगाए जा रहे  कि यहां भी नए चेहरों को मौका दिया जाएगा। यदि यह हुआ तो 29 में से 16 नए चेहरे होंगे जो आधे से ज्यादा हैं।   
     भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा फिर खजुराहो से ही चुनाव लड़ेंगे। विधानसभा चुनाव हारे केंद्रीय मंत्री फग्गन सिंह कुलस्ते को मंडला और गणेश सिंह को सतना से फिर उम्मीदवारी दी गई। विधानसभा का चुनाव हारे उमा भारती के भतीजे राहुल लोधी को दमोह से लोकसभा का टिकट दिया गया। मध्य प्रदेश में भाजपा ने इंदौर, बालाघाट, छिंदवाड़ा, धार और उज्जैन सीटों पर उम्मीदवार घोषित नहीं किए। अनुमान है कि इन सीटों पर मौजूदा सांसदों के टिकट काटकर नए चेहरों को मौका दिया जाएगा।   
    जातीय समीकरण के नजरिए से देखा जाए तो 24 उम्मीदवारों की इस सूची में संतुलन बनाकर रखा गया है। खास बात यह कि 8 सामान्य सीटों में से सबसे ज्यादा 5 टिकट ब्राह्मणों को दिए गए। जबकि, एक टिकट क्षत्रिय समाज के शिवमंगल सिंह तोमर को मुरैना से वैश्य समाज के सुधीर गुप्ता को मंदसौर-नीमच से टिकट दिया गया और गुना से ज्योतिरादित्य सिंधिया को टिकट दिया। ब्राह्मण समाज के जिन 5 नेताओं को उम्मीदवार बनाया गया वे हैं वीडी शर्मा (खजुराहो), जनार्दन मिश्रा (रीवा) , डॉ राजेश मिश्रा (सीधी), आशीष दुबे (जबलपुर) और आलोक शर्मा (भोपाल) को मैदान में उतारा गया। माना जा रहा है कि भाजपा उम्मीदवारों की सूची में कांग्रेस की जातीय जनगणना की मांग का जवाब दिया है। अब देखना है कि जातीय जनगणना को मुद्दा बनाने वाली कांग्रेस की सूची में किस समाज को कितना प्रतिनिधित्व दिया जाता है।
    पहली लिस्ट में एससी और एसटी के आठ उम्मीदवार हैं। इसमें अनुसूचित जाति के 3 और अनुसूचित जनजाति के 5 उम्मीदवार हैं। भाजपा ने ओबीसी के 9 उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। ये हैं भारत सिंह कुशवाह (ग्वालियर), लता वानखेड़े (सागर), राहुल लोधी (दमोह), गणेश सिंह (सतना), दर्शन सिंह चौधरी (होशंगाबाद), शिवराज सिंह चौहान (विदिशा), रोडमल नागर (शाजापुर), ज्ञानेश्वर पाटिल (खंडवा) हैं। भाजपा की सूची में 4 महिला उम्मीदवारों को भी टिकट दिया गया। ये हैं लता वानखेड़े (सागर), हिमाद्रि सिंह (शहडोल), अनीता चौहान (झाबुआ-रतलाम) और संध्या रॉय (भिंड) हैं।     
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पंकज जहां गए, वहां चिट्ठी नहीं पहुंचती!

- हेमंत पाल

     फ़िल्मी दुनिया से आजकल दिल दुखाने वाली ख़बरें कुछ ज्यादा ही आ रही है। ऐसी ही एक खबर ने लोगों को चौंका दिया। ये थी 'चिट्ठी आई है' जैसी लोकप्रिय ग़ज़ल के गायक पंकज उधास का निधन। जिन चंद गायकों ने फ़िल्मी गजलों को जन प्रसिद्धि दिलाई, उनमें जगजीत सिंह के अलावा पंकज उधास ही थे। जब ये खबर सामने आई तो लोगों के सामने उनका वो भरा हुआ सा चेहरा घूम गया, जो उन्होंने 'नाम' फिल्म में परदे पर देखा था। क्योंकि, 'चिट्ठी आई है' उन पर ही फिल्माया गया था, जिसने रातों-रात उन्हें चर्चित कर दिया। कहा जाता है कि जब ये गजल रिकॉर्ड की जा रही थी, उस समय भी सबकी आंखों में आंसू थे। क्योंकि, गजल के लिए जिस मखमली आवाज की जरूरत होती है वो पंकज उधास के पास थी। शुरू में पंकज का मकसद गायन में करियर बनाना नहीं था। लेकिन, होनी को शायद यही मंजूर था। ये 1962 की बात है, जब भारत-चीन युद्ध चल रहा था। उस समय पंकज उधास ने अपना पहला स्टेज परफॉर्मेंस दिया। उन्होंने गाया 'ऐ मेरे वतन के लोगों।' उनके गीत से लोगों की आंखें नम हो गईं। दर्शकों में से एक आदमी ने इनाम में उन्हें 51 रुपए दिए। 
      पंकज को संगीत विरासत में मिला था। गुजरात के जैतपुर में जन्में पंकज का परिवार राजकोट के पास चरखाड़ी कस्बे का रहने वाला था। दादा जमींदार और भावनगर के दीवान थे। पिता केशुभाई सरकारी कर्मचारी थे। पिता को इसराज नाम का एक वाद्य यंत्र बजाने में महारत थी और मां जीतूबेन को गाने का शौक था। इसके चलते पंकज उधास और उनके दोनों भाइयों में संगीत का बीज पल्लवित हुआ। उनके दोनों भाई मनहर उधास और निर्जल उधास संगीत की दुनिया में जाना-पहचाना नाम थे। स्कूल में पंकज के अच्छे गायन के बाद उनके परिवार को लगा कि पंकज भी अपने भाइयों की तरह संगीत में कुछ बेहतर कर सकते हैं। इसके बाद उनका एडमिशन राजकोट की संगीत एकेडमी में करा दिया गया था। उन्हें भी मंच पर गाने के मौके मिलने लगे। 
     पंकज का सपना तो फ़िल्मी दुनिया में अपनी जगह बनाना था। इसके लिए उन्होंने चार साल तक संघर्ष किया। पर, कोई ऐसा काम नहीं मिला जिससे उनकी पहचान बन सके। एक फिल्म 'कामना' जरूर मिली, जिसके एक गाना गाया भी, पर न तो फिल्म चली, न उनका गाया गाना। पहले ही मौके ने उन्हें इतना निराश किया कि उन्होंने देश छोड़कर विदेश में बसने का फैसला कर लिया, पर उनको प्रसिद्धि मिली पर थोड़ी देर से। उन्होंने 1980 में अपना पहला एल्बम 'आहट' नाम से निकाला। पहला एल्बम लॉन्च होते ही उन्हें बॉलीवुड से सिंगिंग के ऑफर मिलने लगे। उन्होंने 1981 में एल्बम 'तरन्नुम' और 1982 में 'महफिल' लॉन्च किया।
     उनका यूँ दुनिया से चले जाना, हर किसी के लिए किसी सदमे से कम नहीं है। गीतकार मनोज मुंतशिर ने अपना शोक व्यक्त करते हुए कहा कि आपके तीन कैसेट्स ने मुझे पहली बार ये बताया था गजल क्या होती है। मेरे जैसे हजारों को कविता और शायरी की तमीज सिखाने वाले पंकज उधास जी, इतनी जल्दी आपका जाना बनता नहीं था! अभी तो बहुत कुछ सीखना था आपसे! जाने-माने गायक अदनान सामी ने दुख जताते हुए लिखा 'आज मेरे पास शब्द नहीं हैं। मैं बस इतना कह सकता हूं कि अलविदा प्रिय पंकज जी ...मेरी बचपन की यादों का हिस्सा बनने के लिए आपने जो संगीत दिया उसके लिए धन्यवाद। भगवान उनकी आत्मा को शांति दे। उनके परिवार के प्रति मेरी गहरी संवेदनाएं, उनका म्यूजिक हमेशा जिंदा रहेगा। ये किस्सा भी मशहूर है, कि राजेंद्र कुमार ने एक दिन उन्होंने राज कपूर को डिनर पर बुलाया। डिनर के बाद उन्होंने पंकज उधास की गाई 'चिट्ठी आई है' गजल राज कपूर को सुनाई, तो वे रो पड़े। उन्होंने कहा कि इस गजल को पंकज से बेहतर कोई दूसरा नहीं गा सकता।
      पंकज उधास ने बहुत सी गजलों को अपनी आवाज दी, लेकिन उनकी कुछ गजलें ऐसी है जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता। फिल्म 'नाम' की 'चिट्ठी आई है' वो गजल है, जिसने हर उस दिल को झनझना दिया था। जो अपने घर से दूर थे और जिन्हें हर पल चिट्ठी का इंतजार करना पड़ता है, ये गजल उनका दर्द बयां करती है। अपने घर से दूर  होने का दर्द इस गजल में जिस तरह छलकता है, उसका कोई सानी नहीं। 'चांदी जैसा रंग है तेरा सोने जैसे बाल' भी उनकी सबसे ज्यादा पसंद की जाने वाली गजलों में शामिल है। ये गजल अपनी प्रेयसी की तारीफ का चरम है। इसके खूबसूरत अल्फाज अपनी जगह, पर पंकज उधास ने जिस तरह डूबकर 'चांदी जैसा रंग' गाय है वो कभी भूला नहीं। 'जिएं तो जिएं कैसे बिन आपके' एक सवाल है जिसका जवाब भी इसी गजल में मिलता है। क्योंकि, दिल इतना बेमुरव्वत होता है, जो किसी और का हो तो अपना नहीं रहता। उनकी एक और गजल है 'ए गमे जिंदगी कुछ तो दे मशवरा एक तरफ उसका घर एक तरफ मयकदा' ऐसा सवाल है जिसके घर के एक तरफ घर है और दूसरी तरफ मयकदा। '... और आहिस्ता कीजिए बातें' गजल में मोहब्बत टपकती सी लगती है। इसमें कहा है दो दिल मिले और गुफ्तगू का सिलसिला छिड़ा हो, तो बातें आहिस्ता करना जरूरी है। ऐसा क्यों इसका जवाब पंकज उधास की आवाज से सजी गजल देती है।
      पंकज उधास का लोकप्रिय गीत 'चिट्ठी आई है' से कई रोचक तथ्य जुड़े हैं।  डायरेक्टर महेश भट्ट के निर्देशन में बनी फिल्म 'नाम' को हिंदी सिनेमा में मील का पत्थर माना जाता है। फिल्म के निर्माता राजेंद्र कुमार थे और वे फिल्म को लेकर बहुत सीरियस थे। वे इसे बेस्ट मूवी के नजरिए से तैयार करना चाहते थे। लेखक सलीम खान की लिखी यह फिल्म दो भाइयों के प्रेम की एक अद्भुत कहानी थी। फिल्म के गानों ने भी लोगों को बेहद प्रभावित किया, जिनमें दिग्गज गायक मोहम्मद अजीज की आवाज में 'तू कल चला जाएगा' पंकज उधास का 'चिट्ठी आई है' शामिल हैं। बताते हैं कि निर्माता राजेंद्र कुमार और सलीम खान इस गाने के लिए एक नए गायक को तलाश रहे थे, जिस पर गाने को फीचर किया जा सके। उनका मानना था कि लाइव म्यूजिक कॉन्सर्ट सीन की डिमांड के अनुसार 'चिट्ठी आई है' को संजय दत्त की बजाए एक गायक पर फिल्माना कारगर साबित होगा। इसके लिए राजेंद्र कुमार ने पंकज उधास से कहा कि हम आपको फिल्म में फीचर करना चाहते हैं। पंकज को लगा कि कुमार गौरव और संजय दत्त की तरह वे मुझे भी एक्टर के तौर पर फिल्म में ले रहे हैं, इसलिए उन्होंने मना कर दिया। क्योंकि, पंकज को एक्टिंग में कोई दिलचस्पी नहीं थी। हालांकि, बाद में चीजें साफ हुईं और फिर उन्होंने 'नाम' का ये गाना गाया।  'चिट्ठी आई है' को पंकज उधास के सबसे बेहतरीन गानों में माना जाता है। 
      पंकज उधास ने समाज की धारा से अलग बहकर फरीदा से शादी की थी। फरीदा एयर होस्टेस थीं। एक शादी में दोनों की मुलाकात हुई थी। पंकज को पहली नजर में ही फरीदा पसंद आ गई। पहले दोस्ती हुई, फिर प्यार। लेकिन, पंकज का परिवार इस रिश्ते के लिए तैयार था। फरीदा के परिवार को भी रिश्ता मंजूर नहीं था। वे दूसरे धर्म में लड़की की शादी नहीं कराना चाहते थे। फरीदा के कहने पर पंकज उनके घर गए और खुद ही पिता से अपने रिश्ते की बात की। उन्होंने अपनी बातों से उनका दिल जीत लिया। फरीदा के पिता दोनों की शादी के लिए मान गए। उनकी आवाज में हर दिल को जीतने का अंदाज था। इसीलिए उनकी आवाज ने संगीत की हर शमा को रोशन किया। कहा जाता है कि जो आवाज हर टूटे दिल और तन्हा दिल को सुकून दे, वही गजल है। लेकिन, दिल को छू लेने वाली वह रूहानी आवाज अब हमेशा के लिए रुखसत हो गई। पंकज उधास अब इस नश्वर दुनिया को छोड़कर चले गए। किंतु, जब भी शायरी और गजलों की महफिल सजेगी उनकी आवाज की कमी को हमेशा महसूस किया जाएगा।
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बड़े बजट की फ़िल्में जो औंधे मुंह गिरी

- हेमंत पाल

    किसी फिल्म का हिट होना उसके निर्माण बजट से तय नहीं होता। फिल्म की कहानी अच्छी होगी, पटकथा में बांधने का माद्दा होगा, अभिनय जोरदार होगा और निर्देशन दर्शक को कुछ और न सोचने दे तो कम बजट की फिल्म भी कमाल कर देती है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं, जब बड़े बजट की फिल्म फ्लॉप हुई और उसके सामने छोटे बजट वाली फिल्म को पसंद किया गया। 2023 में भारी शोर-शराबे और उम्मीदों के साथ आई फिल्म 'आदि पुरुष' के साथ भी यही हुआ। 600 करोड़ के बड़े बजट से बनी इस फिल्म में दक्षिण और हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कई बड़े कलाकार थे। लेकिन, फिल्म की रिलीज के पहले दिन ही बवाल हो गया। 
     दक्षिण के सुपर स्टार प्रभास, कृति सेनन और सैफ अली खान जैसे कलाकारों और रामायण की पृष्ठभूमि पर बनी इस फिल्म के कथानक, संवाद और फिल्मांकन से दर्शक नाराज हुए। दर्शकों को इतना गुस्सा था कि पटकथा और संवाद लेखक मनोज मुंतशिर को माफी तक मांगनी पड़ी। फिल्म अपनी लागत भी नहीं निकाल सकी। दरअसल, ये फिल्म फिल्मकारों के लिए सबक है कि वे दर्शकों की धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ न करें। अन्यथा दर्शकों को नकारने में देर नहीं लगती। दर्शकों के लिए बड़े कलाकार, भव्य सेट और महंगी ड्रेसें कोई मायने नहीं रखते। यदि फिल्म में मनोरंजन नहीं है, तो दर्शक उसे स्वीकारते।  
     फिल्मों की सफलता का अपना अलग इतिहास होता है। कोई फिल्म लोकप्रियता और कमाई का इतिहास रच देती है, तो कोई ढेर हो जाती है। राज कपूर की फिल्म 'मेरा नाम जोकर' (1970) के साथ जो हुआ, वो सभी जानते हैं! इस फिल्म को राज कपूर ने बड़े अरमान से कई बड़े सितारों के साथ बनाया था। इस प्रयोगवादी फिल्म को बनाने में उन्होंने अपनी सारी कमाई और संपत्ति दांव पर लगा दी थी। बताते हैं कि अपनी पत्नी कृष्णा के सारे जेवरात भी इस फिल्म को बनाने में लगाए थे। लेकिन, जब फिल्म रिलीज हुई तो भूचाल आ गया। सारी उम्मीदें धराशायी हो गई। फिल्म बुरी तरह फ्लॉप हुई। 
      इसे फ्लॉप फिल्मों के इतिहास में मिसाल माना जाता है। उन्हें यह फिल्म बनाने में 6 साल से ज्यादा समय लगा था। इस जुनून में वे लगभग दिवालिया हो गए थे। 'मेरा नाम जोकर' सर्कस में काम करने वाले जोकर राजू के जीवन के उतार-चढ़ाव भरी यात्रा थी। वह सर्कस में दर्शकों को हंसाने और खुश करने में कामयाब होता है। लेकिन, उसकी जिंदगी बिखर जाती है। 4 घंटे 15 मिनट लंबी फिल्म दर्शकों के साथ समीक्षकों को भी पसंद नहीं आई। इसके अलावा फिल्मकार बोनी कपूर की फिल्म 'रूप की रानी चोरों का राजा' (1993) अपने समय की मल्टी स्टारर और बड़े बजट (10 करोड़) की फिल्म थी। लेकिन, ये फिल्म फ्लॉप रही थी। इस फिल्म में उस दौर की हिट अनिल कपूर और श्रीदेवी की जोड़ी थी।
     कुछ दिनों से दक्षिण बनाम हिंदी सिनेमा की बहस जोर पकड़ रही है। दर्शकों का मानना है कि बॉलीवुड अब तमिल और तेलगू भाषा की फिल्मों का रीमेक बनाकर दर्शकों के सामने परोसा जा रहा है। बड़े बजट के चलते बॉलीवुड फिल्मों को बनाता है और इसके प्रमोशन पर पैसे खर्च किए जाते हैं। लेकिन, जरूरी नहीं कि बड़े बजट के चलते फिल्में हमेशा चलती हैं। कई ऐसी फिल्में हैं जिनका बजट करोड़ों में रहा, लेकिन वे बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी। कई फिल्मों की तो आधी से ज्यादा लागत ही डूब गई। इन फिल्मों में आमिर खान और अमिताभ बच्चन जैसे कई बड़े सितारे भी अपना जादू नहीं दिखा पाए!
      'ठग्स ऑफ हिंदोस्तान' बड़े बजट की फिल्म थी जो 2018 में रिलीज हुई, पर बॉक्स ऑफिस पर नहीं चली। इस फिल्म का बजट 310 करोड़ था। पर, फिल्म जब परदे पर उतरी तो फिल्म की कमाई 138 करोड़ पर ही सिमट गई। जबकि, इस फिल्म में अमिताभ बच्चन, आमिर खान जैसे बड़े कलाकार और कैटरीना कैफ थी। ऐसी ही एक फिल्म कबीर खान के निर्देशन में बनी '83' थी।1983 में इंडियन टीम ने क्रिकेट विश्वकप जीतकर इतिहास रचा था। इसी रोमांच पर बनी यह बड़े बजट की फिल्म बॉक्स ऑफिस पर खास कमाल नहीं कर पाई। रणवीर सिंह ने फिल्म में कपिल देव का किरदार निभाया था। 260 करोड़ में बनी बड़े बजट की फिल्म 103 करोड़ ही कमा पाई। जबकि, इस फिल्म को लेकर काफी उम्मीद थी।
     डायरेक्टर चंद्रप्रकाश द्विवेदी की फिल्म 'सम्राट पृथ्वीराज' भी 200 करोड़ की लागत वाली फिल्म थी। फिल्म की कमाई सिर्फ 65 करोड़ रही। इसमें पृथ्वीराज की भूमिका अक्षय कुमार ने निभाई थी। लेकिन, इस फिल्म ने भी पानी नहीं मांगा। 'रांझणा' (2013) जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्म देने वाले डायरेक्टर आनंद एल राय की फिल्म 'जीरो' भी ऐसी ही फिल्मों की फेहरिस्त में शामिल है। फिल्म में शाहरुख खान, अनुष्का शर्मा और कैटरीना कैफ जैसे बड़े नाम थे। 270 करोड़ की यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर मात्र 100 करोड़ की ही कमाई कर सकी थी। 2016 में आई रितिक रोशन की फिल्म 'मोहन जोदाड़ो' हिस्टोरिकल ड्रामा फिल्म थी। जबकि, निर्देशक आशुतोष गोवारिकर को फिल्म से काफी उम्मीद थीं। इसके बाद भी यह फिल्म कोई कमाल नहीं दिखा सकी। 138 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म की कमाई मात्र 54 करोड़ की हुई।
     निर्देशक अभिषेक बर्मन की फिल्म 'कलंक' भी बुरी तरह फ्लॉप हुई। 2019 में रिलीज हुई फिल्म में संजय दत्त, माधुरी दीक्षित, वरुण धवन, आलिया भट्ट, सिद्धार्थ रॉय कपूर, सोनाक्षी सिन्हा समेत कई बड़े कलाकार थे। 137 करोड़ के बड़े बजट में यह फिल्म 78 करोड़ की ही कमाई कर सकी। सलमान खान की 135 करोड़ में बनी फिल्म 'ट्यूबलाइट' भी महज 114 करोड़ का आंकड़ा पार नहीं कर सकी। शाहरुख खान और करीना कपूर की फिल्म 'रा-वन' भी सुपर फ्लॉप फिल्मों में है। इस फिल्म का बजट 130 करोड़ था और कमाई हुई 113 करोड़ रुपए। अनुराग कश्यप की फिल्म 'बॉम्बे वैलवेट' फ्लॉप फिल्म है। रणबीर कपूर, अनुष्का शर्मा की करण जौहर की यह फिल्म 118 करोड़ में बनी। लेकिन, कमाई हुई 22 करोड़ रुपए। कंगना रनौत की 'धाकड़' और 'तेजस' भी बड़े बजट की फ़िल्में थी। 'धाकड़' 95 करोड़ में बनी थी, पर कमाई 3 करोड़ रही। इसे फिल्म इतिहास की सबसे फ्लॉप फिल्म कहा जाता है। 'आदि पुरुष' को अब तक की बड़े बजट वाली सुपर फ्लॉप फिल्मों में गिना जाता है। इससे पहले सिनेमा में सबसे बड़ी फ्लॉप का रिकॉर्ड 'राधे श्याम' के नाम था, जिसने बॉक्स ऑफिस पर लगभग 170 करोड़ रुपए का नुकसान किया। इसके अलावा शमशेरा (100 करोड़), तेलुगु फिल्म आचार्य (80 करोड़), कन्नड़ फिल्म कब्ज़ा  (80 करोड़) शामिल हैं।
      आमिर खान की 'लाल सिंह चड्ढा' (70 करोड़), प्रभास और पूजा हेगड़े की 'राधे श्याम' को भी दर्ज किया जा सकता है। यह फिल्म 300 करोड़ के बड़े बजट में बनी थी, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर अपनी लागत भी नहीं निकाल सकी। अनुराग कश्यप के निर्देशन में बनी फिल्म 'बॉम्बे वेलवेट' भी एक ऐसी फिल्म है, जिसे दर्शकों ने पसंद नहीं किया था। रणबीर कपूर और अनुष्का शर्मा जैसे बड़े स्टार्स की इस फिल्म नहीं चला सके। फिल्म का ट्रेलर और समीक्षा देखकर ही दर्शकों ने सोच लिया होगा कि ये देखने लायक फिल्म नहीं है। तभी 120 करोड़ के बजट में बनी 'बॉम्बे वेलवेट' ने 43 करोड़ का कलेक्शन किया था। 
     साल 2019 में रिलीज हुई 'साहो' का बजट 350 करोड़ रुपए था। इस फिल्म में प्रभास एक्शन अंदाज में नजर आए। लेकिन, फिल्म लगभग 420 करोड़ का ही कलेक्शन कर सकी। फिल्म की लागत तो निकल आई, पर फिल्म को लेकर जो हाइप क्रिएट किया गया था वो नहीं चला। बड़े कलाकार, भव्य सेट और बड़ा बजट होते हुए इन फिल्मों का धराशायी होना ये बताता है कि बड़े नाम और बड़ा बजट ही किसी फिल्म को हिट नहीं करवा सकता। इसके लिए कसावट वाला कथानक और दर्शकों को बांधे रखने की क्षमता बहुत जरूरी है।
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