Saturday, August 10, 2024

कहानी बदली, कलाकार बदले, फिल्म का नाम वही!

- हेमंत पाल 

     दर्शकों को फ़िल्में जिस भी तरीके से आकर्षित करती है, उसके पीछे कई कारण होते हैं। फिल्म का कथानक, कलाकार और डायरेक्टर के अलावा पहला आकर्षण होता है फिल्म का नाम! ये नाम ही दर्शकों को इस बात का संकेत देता है कि फिल्म का कथानक किस विषय पर केंद्रित है। इस बात पर भले विश्वास न किया जाए, पर फिल्मों के नाम का फिल्म इतिहास में अपना अलग ही महत्व है। इतना ज्यादा कि कई फ़िल्में एक ही नाम से तीन-चार बार नहीं आठ बार तक बनाई गई। इसलिए कि फिल्म के कथानक को ये टाइटल इतने ज्यादा सटीक लगे, कि उसी को दोहराया गया। आज के दौर में फिल्मकार अपनी फिल्मों के कुछ अलग और हटकर नाम रखने की कोशिश करते हैं, ताकि उनकी फिल्म सबसे अलग लगे। लेकिन, फिर भी कुछ टाइटल ऐसे हैं, जिनका लोभ हमेशा बना रहा। समय के साथ टाइटल में बदलाव का रिवाज भी देखने को मिलता है। कभी टाइटल बहुत लंबे तो कभी बहुत छोटे रखे जाते रहे। ये ट्रेंड पर निर्भर है कि उस दौर के दर्शक क्या पसंद करते हैं। फिल्म इंडस्ट्री में 'सलीम लंगड़े पे मत रो' और 'अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है' जैसे लम्बे-लम्बे टाइटल रखे गए तो 'पा' जैसे नाम की फिल्म भी आई।     
       फिल्मकारों ने एक नाम से तीन या चार बार तो फिल्में बनाई। पर, एक नाम ऐसा है, जिस पर आठ बार फिल्म बनी है। न सिर्फ हिंदी में बल्कि बांग्ला, तमिल तेलुगु और उर्दू में भी 'देवदास' फिल्म बनाई गई। इस फिल्म की सबसे अनोखी विशेषता है, कि हर बार एक ही कहानी को दोहराया गया। शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास 'देवदास' पर इतनी बार फ़िल्में बनी है कि उसका रिकॉर्ड शायद ही कभी टूटे। 1917 में लिखे गए इसी उपन्यास पर आठ बार फिल्म बनी। 1928 में पहली बार इस उपन्यास पर नरेश सी मित्रा ने मूक 'देवदास' बनाई थी। नरेश सी मित्रा खुद ने खुद भी एक्टिंग की थी। जबकि, 'देवदास' का किरदार फानी बर्मा ने निभाया था। 1935 में पीसी बरुआ ने बंगाली और हिंदी भाषाओं में 'देवदास' बनाई। ये पहली बोलती 'देवदास' कही जा सकती है। पीसी बरुआ ने बंगाली में बनी 'देवदास' में मुख्य किरदार निभाया था। जबकि, हिंदी में केएल सहगल 'देवदास' बने थे। फिल्म जबरदस्त हिट हुई थी, पर आज इस फिल्म का कोई प्रिंट उपलब्ध नहीं हैं। तीसरी बार 1953 में बनी 'देवदास' तेलुगू और तमिल में वेदान्तम राघावैया ने बनाई थी। इसमें 'देवदास' की भूमिका नागेश्वर राव की थी। दोनों फ़िल्में बेहद सफल रही थीं। 
     हिंदी में दिलीप कुमार वाली चौथी 'देवदास' 1955 में पीसी बरुआ ने ही बनाई। तब उनकी इस फिल्म के कैमरे का काम बिमल रॉय ने संभाला था। फिल्म के किरदार से उन्हें इतना लगाव हो गया था कि बाद में उन्होंने भी 'देवदास' बनाई। बिमल रॉय ने इस फिल्म में ट्रेजेडी किंग दिलीप कुमार को देवदास बनाया। वैजयंती माला चंद्रमुखी और सुचित्रा सेन ने पार्वती की भूमिका निभाई थी। पांचवी बार 'देवदास' 1965 में उर्दू में बनाई गई। इसका निर्देशन ख्वाजा सरफराज ने किया था। छठी बार 'देवदास' 1979 में बांग्ला में बनी जिसमें मुख्य भूमिका सौमित्र चटर्जी ने की थी। इसे दिलीप रॉय ने बनाया और उत्तम कुमार ने चुन्नी बाबू का रोल निभाया था। शक्ति सामंत ने 2002 में बंगाली में 'देवदास' को फिर बनाया। इसमें प्रसनजीत, तापस पॉल और इंद्राणी हलदर मुख्य भूमिका में थे। आठवीं बार इसे संजय लीला भंसाली ने 2002 में बड़े कैनवस पर शाहरुख़ खान को 'देवदास' बनाकर बनाया। इसमें माधुरी दीक्षित और ऐश्वर्या राय भी थी। ये हिंदी में बनी पहली रंगीन 'देवदास' है।  
      इसके बाद फेमस टाइटल आता है 'अंदाज' जिस पर चार बार फ़िल्म बनी और अपने समय काल के दर्शकों ने पसंद भी किया। इस टाइटल से पहली बार 1949 में फिल्म बनी, जो रिलीज होने के साथ ही छाई थी। इस रोमांटिक फिल्म का निर्देशन महबूब खान ने किया था और इसमें नरगिस, दिलीप कुमार और राज कपूर मुख्य भूमिकाओं में थे। इसके बाद 'अंदाज' 1971 में बनाई गई। यह भी रोमांटिक फिल्म थी, जिसका डायरेक्शन रमेश सिप्पी ने किया। इसे चार लेखकों सलीम-जावेद, गुलजार और सचिन भौमिक ने लिखा था। 1994 में डेविड धवन की इसी नाम से बनी फिल्म में एक्शन कॉमेडी थी। इसमें अनिल कपूर, जूही चावला, करिश्मा कपूर और कादर खान थे। आखिरी बार 'अंदाज' 2003 में बना, जिसे राज कंवर ने निर्देशित और सुनील दर्शन ने बनाया था। इसमें अक्षय कुमार, लारा दत्ता और प्रियंका चोपड़ा थे। एक और फिल्म है, जो चार बार एक ही टाइटल से बनी। ये है 'किस्मत' जिसका पहली बार 1943 में ज्ञान मुखर्जी ने उपयोग किया। इसमें अशोक कुमार और मुमताज शांति ने काम किया था। ये फिल्म बार-बार बनी लेकिन, पहली बार को छोड़कर तीनों बार इसे दर्शकों ने नकार दिया। 
      पहली बार की सफलता के बाद 1968 में फिर 'किस्मत' नाम फिल्म बनाई गई। इसे मनमोहन देसाई ने निर्देशित किया था। ये रोमांटिक सस्पेंस थ्रिलर फिल्म थी जिसमें विश्वजीत चटर्जी, बबीता कपूर, हेलेन और कमल मेहरा ने अदाकारी की थी। 1995 में फिर 'किस्मत' नाम से फिल्म बनी जिसका निर्देशन हरमेश मल्होत्रा ने किया। चौथी बार 2004 में इसी टाइटल का उपयोग करके गुड्डू धनोआ ने 'किस्मत' बनाई। ये एक्शन फिल्म थी, जिसमें बॉबी देओल और प्रियंका चोपड़ा मुख्य भूमिका में थे।  
    'आंखे' भी ऐसा ही टाइटल है जिस पर तीन बार फ़िल्म बनी और हर बार हिट रही। पहली बार 1968 में बनी 'आंखे' का निर्माण और निर्देशन रामानंद सागर ने किया था। यह जासूसी थ्रिलर फिल्म थी। इसमें धर्मेंद्र, माला सिन्हा, महमूद अहम रोल में थें। इसे कई देशों में शूट किया गया था और बेरूत में शूट की गई पहली हिंदी फिल्म थी। दूसरी बार 'आंखें' 1993 में बनी जो गोविंदा की सुपरहिट फिल्मों में एक गिनी जाती है। यह एक्शन-कॉमेडी फिल्म थी, जिसे डेविड धवन ने बनाया। इसमें गोविंदा के साथ चंकी पांडे भी लीड रोल में थे और दोनों ही डबल रोल में नजर आए। बाद में इसे तेलुगु में 'पोकिरी राजा (1995)' के नाम से बनाया गया। तीसरी बार 'आंखें' 2002 में बनाई गई जिसमें अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार और अर्जुन रामपाल ने अभिनय किया। इस फिल्म को उसकी अनोखी कहानी की वजह से दर्शकों ने पसंद किया। 
      'जेलर' भी एक ऐसा टाइटल है जो तीन बार उपयोग किया गया। सबसे पहले 1938 में 'जेलर' फिल्म बनी। इसे सोहराब मोदी ने बनाया था। फिल्म में सोहराब मोदी, लीला चिटनिस, सादिक अली मुख्य भूमिकाओं में थे। इसी टाइटल से 1958 में फिर फिल्म बनाई गई। यह 1938 में आई पहली 'जेलर' की रीमेक थी। इसे फिर सोहराब मोदी ने ही निर्देशित किया था। इसकी कहानी और संवाद भी कमाल अमरोही ने ही लिखे थे। सोहराब मोदी ने एक बार फिर खुद को जेलर की मुख्य भूमिका में ढाला था। फिल्म में कामिनी कौशल, गीता बाली, अभि भट्टाचार्य थे। 1938 और 1958 के बाद 2023 में इसी नाम से रजनीकांत की 'जेलर' बनी। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर इतिहास बना डाला। इसमें रजनीकांत के साथ विनायकन, राम्या कृष्णन और वसंत रवि हैं। 
   एक ही टाइटल 'जिद्दी' से भी तीन बार फिल्म बनी। पहली बार 1948 में शाहिद लतीफ ने निर्देशन में बनी, जिसमें देव आनंद मुख्य भूमिका में थे। 1964 में प्रमोद चक्रवर्ती ने 'जिद्दी' बनाई जिसमें जॉय मुखर्जी, आशा पारेख और महमूद ने भूमिकाएं निभाई थी। तीसरी बार 'जिद्दी' 1997 में बनी, जिसमें सनी देओल मुख्य भूमिका में और रवीना टंडन फिल्म की अभिनेत्री थी।
      2008 में आई फिल्म 'रेस' नाम से भी तीन फिल्में आ चुकी हैं। लेकिन, पहली फिल्म जैसी बाद की दोनों फ़िल्में नहीं चली। तीसरी में तो सलमान खान नजर आए थे। 'शानदार' भी एक ऐसा ही नाम है जिस पर अब तक तीन बार फिल्म बन चुकी। पहली बार फिल्म कब बनी इसका उल्लेख नहीं मिलता। लेकिन, दूसरी बार 1990 में जो 'शानदार' रिलीज हुई उसमें मिथुन चक्रवर्ती, मीनाक्षी शेषाद्रि और जूही चावला थे। 2015 में विकास बहन ने एक बार 'शानदार' टाइटल का उपयोग करके शाहिद कपूर और आलिया भट्ट को लेकर फिल्म बनाई जो बुरी तरह फ्लॉप रही।    
    एक टाइटल से दो बार बनने वाली कई फ़िल्में हैं। फिल्म 'लहू के दो रंग' भी टाइटल से दो बार बनी। 1979 में आई फिल्म के निर्देशन की कमान महेश भट्ट ने संभाली थी। इसमें विनोद खन्ना, शबाना आज़मी और डैनी नजर आए थे। इसमें विनोद खन्ना ने दोहरी भूमिका थी। इसके बाद साल 1997 में अक्षय कुमार और करिश्मा कपूर  को लेकर भी 'लहू के दो रंग' बनी। पर, ये खास प्रदर्शन नहीं कर पाई। 2009 में आई दीपिका पादुकोण और सैफ अली खान की फिल्म 'लव आजकल' को दर्शकों ने पसंद किया था। दूसरी बार बनी 'लव आजकल' में सारा और कार्तिक आर्यन नजर आए थे, जिसे खास सफलता नहीं मिली।
    'कुली नंबर वन' में गोविंदा और करिश्मा कपूर की हिट जोड़ी ने धमाल मचा दिया था। इसी नाम से आई वरुण धवन और सारा अली खान की फिल्म कमाल नहीं दिखा पाई। सलमान खान की 'जुड़वां' ब्लॉकबस्टर साबित हुई थी। जबकि वरुण धवन और जैकलीन फर्नांडिस, तापसी पन्नू की 'जुड़वां-2' नापसंद कर दी गई। 'स्टूडेंट ऑफ द ईयर' सिद्धार्थ मल्होत्रा, आलिया भट्ट और वरुण धवन की डेब्यू फिल्म थी। इसके दूसरी पार्ट में टाइगर श्रॉफ, अनन्या पांडे और तारा सुतारिया नजर आए। यंग यूथ पर बेस्ड ये लव स्टोरी पहली फिल्म के मुकाबले एवरेज साबित हुई। अभी ये सिलसिला रुका नहीं है। आगे भी एक ही टाइटल पर बार-बार आगे भी फ़िल्में बनती रहेंगी।
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यादों में बसे 'दूरदर्शन' के वे सीरियल

- हेमंत पाल

    समय के साथ बहुत कुछ बदला और उसके साथ मनोरंजन के तरीके भी बदले। फिल्मों का लम्बा दौर चला, कई बार उसमें भी बदलाव आया। यह दौर आज भी चल रहा है। फर्क इतना आया कि पीढ़ियों बदलने के साथ दर्शकों की पसंद बदलती गई। 80 के दशक में फिल्मों के साथ मनोरंजन का नया माध्यम टेलीविजन भी इसमें जुड़ गया। इससे दर्शकों को घर में बैठकर मन बहलाने का विकल्प मिल गया। सबसे पहले आया 'दूरदर्शन' जिसने दर्शकों का बरसों तक मनोरंजन किया। आज भले ही 'दूरदर्शन' मनोरंजन की दौर में पिछड़ गया हो, पर उस पीढ़ी के दर्शकों की यादों में आज भी दूरदर्शन के सीरियल चस्पा है। शुरू में दूरदर्शन के प्रसारण का समय भी सीमित था। पर, जब भी कोई कार्यक्रम शुरू होता, पूरा परिवार टीवी के सामने बैठ जाता था। जिन घरों में टीवी नहीं था, वे भी पड़ौसी या परिचितों के यहां बिन बुलाए पहुंच जाते थे। ये दर्शक सिर्फ मनोरंजन के कार्यक्रम देखने के लिए ही नहीं जुटते थे, बल्कि वे कृषि दर्शन जैसे कार्यक्रमों को देखने का भी मौका नहीं छोड़ते!         
      भारतीय टेलीविजन इतिहास में 'हम लोग' पहला सीरियल था, जो 7 जुलाई 1984 को दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ। दर्शकों को यह शो इतना पसंद आया था कि इसके चरित्र विख्यात हो गए! इस सीरियल की कहानी लोगों की रोजमर्रा की बातचीत का हिस्सा बन गई थी। इस सीरियल ने देश के मध्यम वर्ग की ज़िंदगी को बहुत नजदीक से दर्शाया था। इसकी लोकप्रियता का पैमाना कुछ वैसा ही था, जैसा बाद में 'रामायण' और 'महाभारत' का रहा! 'रामायण' को भारतीय टेलीविजन के सबसे सफल सीरियलों में से एक माना जाता है। रामानंद सागर के इस सीरियल का असर ऐसा था, जिससे दर्शकों की धार्मिक भावनाएं उभरकर सामने आईं! जबकि, निर्माता रामानंद सागर पर इसका इतना असर हुआ कि उन्होंने इसके बाद फ़िल्में बनाना ही छोड़ दी। दूरदर्शन पर ये सीरियल जब पहली बार प्रसारित किया, तो गाँव व शहरों में कर्फ्यू जैसा माहौल हो गया था। आज की पीढ़ी को ये बात अचरज लग सकती है, पर सच यही था। सीरियल के समय सड़कें खाली हो जाती थी। जो जहां वहीं किसी तरह 'रामायण' देखने लगता।   
'रामायण' के बाद 'महाभारत' ने दर्शकों को लुभाया  
    इसके बाद में बीआर चोपड़ा ने भी 'महाभारत' बनाकर छोटे परदे पर कुछ ऐसा ही जादू किया था। ये सीरियल 2 अक्टूबर 1988 को पहली बार प्रसारित हुआ। इस सीरियल की शुरुआत सबसे खास हिस्सा होता तब होता था, जब हरीश भिमानी की आवाज गूंजती थी 'मैं समय हूं!' ब्रिटेन में इस धारावाहिक का प्रसारण बीबीसी ने किया, तब इसकी दर्शक संख्या 50 लाख पार कर गई थी। 'दूरदर्शन' के सफल सीरियलों में 'चंद्रकांता' भी रहा, जिसका प्रसारण 4 मार्च 1994 को शुरू हुआ था। देवकीनंदन खत्री के फंतासी उपन्यास पर बने इस सीरियल को दर्शकों ने बेहद पसंद किया।
    दूरदर्शन पर 1994 में प्रसारित हुए 'अलीफ लैला' के दो सीजन में 260 एपिसोड प्रसारित हुए! जादू, जिन्न, बोलते पत्थर, एक मिनट में गायब हो जाना, राजा व राजकुमारी की कहानी को मिलाकर बने इस सीरियल को लोग आज भी याद करते हैं। '1001 नाइट्स' पर आधारित इस धारावाहिक में मिस्र, यूनान, फ़ारस, ईरान और अरब देशों की बहुत सी रोमांचक कहानियां थीं जिनके हीरो सिंधबाद, अलीबाबा और चालीस चोर, अलादीन हुआ करते थे। रामानंद सागर ने 'रामायण' से पहले 'विक्रम और बेताल' बनाया था। इस धारावाहिक के सिर्फ 26 एपिसोड ही प्रसारित हुए थे। ये 1985 में दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ था। ये महाकवि सोमदेव की लिखी 'बेताल पच्चीसी' पर आधारित था।
    'जंगल, जंगल बात चली है पता चला है ऐसे ...' ये वो लाइन है, जिन्हें गुलजार ने 'जंगल बुक' सीरियल के लिए लिखा था। ये लाइनें और ये सीरियल आज भी उस दौर के दर्शकों के दिलों में बसा है! बच्चों से लेकर बड़ों तक को बेसब्री से इंतज़ार रहता था। दूरदर्शन पर ये जापानी एनिमेटेड इंग्लिश सीरीज़ आती थी जिसे हिंदी में रूपांतरित किया था। कई गांव में तब बिजली नहीं होती थी, तो लोग बैटरी से टीवी को जोड़कर ये शो देखते थे। यही क्यों 80 और 90 के दशक में दूरदर्शन पर प्रसारित ऐसे कई सीरियल है, जो बहुत ज्यादा पसंद किए गए। 'हम लोग' और 'बुनियाद' तो लोकप्रियता में मील का पत्थर थे। इसके अलावा भी ऐसे कई सीरियल हैं, जो निर्माण के मामले में भले ही आज से हल्के दिखाई देते हों, पर अपने कथानक के कारण दर्शकों की पहली पसंद थे। आरके नारायण की कहानियों पर आधारित 'मालगुडी डेज़' भी बच्चों का पसंदीदा सीरियल था, जिसका प्रसारण 1987 में हुआ था। इसमें स्वामी एंड फ्रेंड्स तथा वेंडर ऑफ स्वीट्स जैसी लघु कथाएं व उपन्यास शामिल थे। इसे हिन्दी और अंग्रेजी में बनाया गया था। इसके 39 एपिसोड प्रसारित हुए, फिर इसे 'मालगुडी डेज़ रिटर्न' नाम से पुनर्प्रसारित भी किया गया। हमारे देश के बच्चों को अपना पहला सुपर हीरो 'शक्तिमान' 27 सितम्बर 1997 को मिला था। इसका अपना अलग ही क्रेज़ था। 400 एपिसोड वाला यह शो करीब 10 साल तक चला!
     'भारत एक खोज' भी दूरदर्शन का 53 एपिसोड तक चला एक कालजयी कार्यक्रम था। यह 1988 से 1989 के बीच हर रविवार प्रसारित होता रहा। जवाहरलाल नेहरु की किताब ‘डिस्कवरी ऑफ़ इंडिया’ (भारत की खोज) पर आधारित यह टीवी सीरीज़ शायद टेलीविज़न के इतिहास में अब तक का सबसे बेहतरीन रूपांतरण है। इसके निर्माता और निर्देशक हिन्दी फिल्मों के मशहूर निर्देशक श्याम बेनेगल थे। अंकुर, निशांत, मंथन और भूमिका जैसी फिल्मों के लिए चर्चित बेनेगल समानांतर सिनेमा के बड़े निर्देशकों में हैं। बेनेगल ने जो सीरियल बनाया, वह न सिर्फ दूरदर्शन बल्कि देश के टीवी सीरियलों के लिए एक मील का पत्थर साबित हुआ। 80 के दशक में जब 'रामायण' और 'महाभारत' जैसे सीरियलों ने हर घर में अपनी जगह बनाई थी। उस समय सरकार को लगा कि भारत के इतिहास पर भी एक टीवी सीरियल बनाया जाना चाहिए। बेनेगल ने देश के दर्शकों तक भारत की ऐसी अनसुनी कहानी को पहुंचाने का मुश्किल काम किया। वास्तव में श्याम बेनेगल की दिलचस्पी 'महाभारत' बनाने में ज्यादा थी। लेकिन, वह पहले ही बीआर चोपड़ा को दिया जा चुका था। जब उनके पास भारतीय इतिहास पर 'भारत एक खोज' बनाने का ऑफर आया तो वे मना नहीं कर सके।
      दूरदर्शन पर धार्मिक सीरियलों में रामायण, महाभारत, जय हनुमान, श्री कृष्णा, ॐ नमः शिवाय, जय गंगा मैया। ऐतिहासिक सीरियलों में टीपू सुल्तान, अकबर द ग्रेट, द ग्रेट मराठा, भारत एक खोज, चाणक्य। पारिवारिक सीरियलों में स्वाभिमान, अंजुमन, संसार, बुनियाद, हम लोग, कशिश, फ़र्ज़, वक़्त की रफ़्तार, अपराजिता, इतिहास, शांति, औरत, फरमान, इंतज़ार और सही, हम पंछी एक डाल जैसे कालजयी सीरियल भला कौन भूला होगा। कॉमेडी और मनोरंजन वाले सीरियल ये जो है जिंदगी, मुंगेरीलाल के हसीन सपने, विक्रम और बेताल, सुराग, मालगुडी डेज, तेनालीराम, व्योमकेश बक्शी, कैप्टेन व्योम, चंद्रकांता, शक्तिमान, आप-बीती, फ्लॉप शो, अलिफ़ लैला, आँखें, देख भाई देख, एक से बढ़कर एक, ट्रक धिना धिन, तहकीकात जैसे कई नाम है।
    उस समय एनिमेशन इंडस्ट्री ज्यादा विकसित नहीं थी, इसलिए विदेशी सीरियलों को डब करके परोसे गए। डिज्नी के मोगली जंगल बुक, टेलस्पिन, डक टेल्स, अलादीन, ऐलिस इन वंडरलैंड, गायब आया जैसे सीरियल बहुत देखे गए। 'सुरभि' भी दूरदर्शन का सबसे लंबे समय तक चलने वाली सीरीज थी, जिसका नाम 'लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स' में भी दर्ज था। शो देखने वाले हर हफ्ते 10 लाख चिट्ठियां भेजते थे। इस सीरीज को रेणुका शहाणे और सिद्धार्थ काक होस्ट करते थे। 'सुरभि' 1990 से 2001 तक चला था। 1991 में इसे प्रसारित नहीं किया गया। 
      करीब 10 साल तक चले इस शो के 415 एपिसोड प्रसारित हुए। 'सुरभि' दूरदर्शन का पहला ऐसा कार्यक्रम था, जिसमें नियमित इनामी प्रतियोगिता होती थी। भारत की संस्कृति और सामान्य ज्ञान से संबंधित सवाल पूछे जाते थे। इनाम में भारत के विभिन्न राज्यों के टूर-पैकेज दिए जाते थे। एक एपिसोड में मचान बांधकर लगाए गए पौधे दिखाए गए थे। उन मचानो से बेलें लटक रही थी। पूछा गया था कि ये किस चीज़ की खेती है। इसके जवाब में उस एपिसोड में लाखों पोस्टकार्ड मिले, जो रिकॉर्ड था। इसी से अंदाजा लगाया गया कि 'सुरभि' कितना लोकप्रिय सीरियल था। लेकिन, अब दूरदर्शन उस पीढ़ी की यादों में दर्ज होकर रह गया।  
   'कृषि दर्शन' दूरदर्शन का क्लासिक शो रहा है। इसमें खेती-बाड़ी और किसानी से संबंधित जानकारी दी जाती थी। इसका 26 जनवरी 1967 को प्रीमियर किया था। 'कृषि दर्शन' के 16,780 एपिसोड प्रसारित हुए। इसके 62 सीजन आए थे। इसी तरह चित्रहार' में बॉलीवुड के नए और पुराने सुपरहिट गानों को दिखाया जाता। 80 और 90 के दशक में इस शो का भी खूब क्रेज रहा था। यह भी दूरदर्शन के सबसे लंबे समय तक चलने वाले शो में शामिल रहा। इसने 12,000 एपिसोड पूरे किए थे। इसी तरह रंगोली' जैसा फ़िल्मी गीतों का कार्यक्रम और 'फूल खिले हैं गुलशन गुलशन' टॉक शो भी उस दौर के दर्शकों को याद होगा। इसमें फिल्म और टीवी हस्तियां अपनी जिंदगी के बारे में खुलकर बात करती थी। इसे एक्ट्रेस तबस्सुम होस्ट किया करती थीं। 'फूल खिले हैं गुलशन गुलशन' साल 1972 से 1993 तक प्रसारित हुआ। यह भी दूरदर्शन के लंबे समय तक चलने वाले शो में से एक रहा। लेकिन, अब ये टीवी शो पिछली पीढ़ी की यादों में ही दर्ज होकर रह गए।  
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Saturday, August 3, 2024

सब कुछ बदल गया, रेखा नहीं बदली

- हेमंत पाल 

     पचास साल का अरसा कम नहीं होता। न जीवन में और अभिनय की दुनिया में! इस समय काल में तीन पीढ़ियां जन्म लेकर जवान हो जाती है। यदि फिल्मों की बात की जाए तो इस अरसे में कई हीरो और हीरोइन आकर, पहचान बनाकर गुम हो जाते हैं। याद किया जाए, तो बीते पचास साल में कलाकारों की एक लंबी कतार आगे निकल गई। लेकिन, कोई अपनी जगह खड़ा है, तो वो है अभिनेत्री रेखा, जिसने उम्र को अपनी मुट्ठी में जकड़ लिया। वे अब फिल्मों में काम नहीं करती, पर उनकी लोकप्रियता बरक़रार है। आज भी उतनी ही खूबसूरत दिखती हैं, जितनी 30 साल पहले लगती थी। जबकि, फ़िलहाल वे 69 साल की हैं। उम्र का ये वो पड़ाव है जिसमें व्यक्ति खुद स्वीकार लेता है कि वो बूढ़ा हो गया, पर रेखा नहीं हुई! आज भी जब टीवी पर किसी फंक्शन में दिखाई देती हैं, तो सारे कैमरे उनकी तरफ मुड़ जाते। भारी कांजीवरम साड़ी, हाई हील, चेहरे पर भरपूर मेकअप, मांग में सिंदूर और चेहरे पर वही मुस्कराहट। सब कुछ वैसा ही जो किसी हीरोइन में दर्शक देखना चाहते हैं। लेकिन, बढ़ती उम्र को थामना आसान नहीं हैं। फिर भी रेखा ने यह सब किया। 
        निःसंदेह रेखा बेहद खूबसूरत है। वे फिल्म इंडस्ट्री की उन हीरोइनों से भी कहीं ज्यादा सुंदर हैं, जिन्हें दुनिया विश्व सुंदरी और ब्रह्मांड सुंदरी के ख़िताब से नवाज चुकी है। उनकी पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ में ढेरों उतार-चढ़ाव आए, लेकिन इसका असर उनकी खूबसूरती पर नहीं पड़ा। किंतु, जिन्होंने रेखा को 1970 में आई उनकी पहली फिल्म 'सावन भादों' में देखा था, वे तब और बाद की रेखा में फर्क समझते हैं। सांवली और बेडौल सी उस रेखा में बाद में बहुत फर्क आता गया। खासकर अमिताभ के साथ आई फिल्मों ने उन्हें लोकप्रियता भी दिलाई और शिखर पर पहुंचाया। अमिताभ के साथ उनकी पहली फिल्म 1976 में आई 'दो अनजाने; थी। इसमें रेखा की अदाकारी से ज्यादा अमिताभ के साथ उनकी केमिस्ट्री को पसंद किया गया था। तभी से रेखा और अमिताभ का नाम जोड़कर देखा जाने लगा। दोनों ने कई हिट फ़िल्में साथ की। इनमें मुकद्दर का सिकंदर, खून पसीना, मिस्टर नटवरलाल, गंगा की सौगंध, राम बलराम और सुहाग आई। दोनों की फिल्मों का यह दौर 'सिलसिला' तक चला। अपने 50 साल के करियर में रेखा ने 180 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। आज भी उनकी पुरानी फिल्मों को पसंद करने वालों की कमी नहीं है। 
    रेखा ने अपनी जिंदगी में बहुत से उतार-चढ़ाव देखे। बचपन में पिता का प्यार नसीब नहीं हुआ। रेखा के पिता जेमिनी गणेशन साउथ सिनेमा के सुपरस्टार थे, जिनका अभिनेत्री पुष्पवल्ली से अफेयर था। पुष्पावल्ली ने बिना शादी किए रेखा को जन्म दिया, इस वजह उन्हें बचपन में पिता के प्यार से वंचित रहना पड़ा। वे एक बिन ब्याही मां की संतान थीं। उन्होंने बहुत कम उम्र में तमिल और कन्नड़ फिल्मों में अभिनय करना शुरू कर दिया था। इसके बाद वे हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में आ गई। रेखा का एक्टिंग करियर तो बहुत अच्छा रहा, पर निजी जिंदगी उतनी ही अस्त-व्यस्त रही। यहां तक कि उम्र के इस दौर में भी रेखा की प्रेम कहानियों के किस्से फिल्म इंडस्ट्री में चर्चित हैं। जीवन में कई रोमांस में उनका नाम जुड़ा, 3 शादियां की, फिर भी वे आज अकेली है। यदि उनके साथ कुछ है, तो अनसुलझे किस्से और कहानियां। इसके अलावा अमिताभ बच्चन से उनके रिश्ते के गॉसिप। ऐसे कई किस्से उनके आसपास हैं, जिनके जवाब कभी बाहर नहीं आए। उनकी दुनिया में सिर्फ उनकी दोस्त, सेक्रेटरी और उनकी राजदां सिर्फ फरजाना ही है। आज भी लोग रेखा का नाम अमिताभ से जोड़कर देखते हैं, पर इसकी सच्चाई कोई नहीं जानता। यदि कोई जानता है तो सिर्फ फरजाना। 
     यह अभिनेत्री अपनी फिल्मों से ज्यादा अपनी प्रेम कहानियों की वजह से चर्चा में रही। अमिताभ उनकी जिंदगी में आने वाले पहले शख्स नहीं रहे, पर आखिरी जरूर। सबसे पहले रेखा का नाम जितेंद्र से जुड़ा था। लेकिन, जितेंद्र शादीशुदा थे, तो यह रिश्ता ज्यादा नहीं चला, पर चर्चा में जरूर आया। फिर चरित्र अभिनेता जीवन का एक्टर बेटा किरण कुमार और रेखा का रोमांस भी कुछ समय तक चला। इसके बाद रेखा की जिंदगी में आए उनके साथी कलाकार विनोद मेहरा। कहा तो यहां तक जाता है कि विनोद मेहरा और रेखा ने शादी कर ली थी। लेकिन, विनोद मेहरा की मां ने रेखा को स्वीकार नहीं किया। उनका नाम संजय दत्त के साथ भी लिया गया। दोनों जब फिल्म 'जमीन आसमान' में साथ काम कर रहे थे, तब उनके नाम जुड़े, पर संजय दत्त ने ऐसी बातों का खंडन किया था। अक्षय कुमार के साथ भी इस सदाबहार अभिनेत्री का नाम जुड़ा। लेकिन, अमिताभ बच्चन के साथ जब रेखा का नाम जुड़ा तो फिर वो कभी अलग नहीं हो सका। कहा जाता है, कि रेखा आज भी अपनी मांग में जो सिंदूर लगाती है, वो अमिताभ के नाम का ही है। फिल्म इंडस्ट्री ने रेखा को पहली बार सिंदूर लगाए हुए ऋषि कपूर और नीतू सिंह की शादी के रिसेप्शन में देखा था। लेकिन, 40 साल बाद भी अभी रेखा ने यह राज नहीं खोला कि उनकी मांग में लगे सिंदूर का कारण क्या है!
      रेखा की जिंदगी में एक पड़ाव मुकेश अग्रवाल के नाम का भी आया। पर, हवा झोंके की तरह आया और चला गया। दिल्ली के इस कारोबारी से रेखा ने 1990 में बकायदा शादी की, पर ये साथ साल भर भी नहीं रहा। संदिग्ध स्थितियों में मुकेश अग्रवाल ने आत्महत्या कर ली। इस तरह इस रिश्ते का दर्दनाक अंत हुआ। आज भी यह राज ही है कि मुकेश अग्रवाल को किस वजह से जीवन से विरक्ति हुई! कहा जाता है कि रेखा को शादी के बाद पता चला था कि मुकेश को मानसिक बीमारी हैं। इसके बाद रेखा ने मुकेश से दूरी बना ली। एक दिन ऐसा भी आया, जब मुकेश अग्रवाल ने आत्महत्या कर ली। मुकेश के परिवार ने इसका दोषी रेखा को ही माना। फिल्म इंडस्ट्री में भी उन्हें 'वैम्प' मान लिया गया। यहां तक कहा गया कि रिश्तों को लेकर उनकी मनहूसियत मौत तक ले जाती है। पहले विनोद मेहरा और उसके बाद मुकेश अग्रवाल। लेकिन, रेखा ने सारे लांछनों को ख़ामोशी से झेल लिया। 

खूबसूरती बनाए रखने के सीक्रेट
    फ़िल्मी दर्शक रेखा की जिस टाइमलेस ब्यूटी के दीवाने हैं, उसे बनाए रखने के लिए वे बहुत जतन करती हैं। अच्छी अभिनेत्री होने के साथ रेखा का बेबाक अंदाज और ग्लैमर ने उन्हें सुंदरता का प्रतीक बना दिया। 69 की उम्र में भी रेखा अपनी खूबसूरती और अदाओं से लोगों के दिलों पर राज करती हैं। लेकिन, यह सब आसान नहीं है।    
- प्राचीन आयुर्वेदिक औषधियों और अरोमा थेरेपी पर रेखा को ज्यादा भरोसा है। वे अपने स्पा सेशन के दौरान इसी तरह के स्पा लेती है।
- जीवन की ढेरों पेचीदगियों के बावजूद रेखा अनुशासित जीवन जीती है। हमेशा खुश रहने की कोशिश करती हैं और तनाव-मुक्त रहती हैं। 
- रेखा की खूबसूरती और ग्लैमरस त्वचा का एक बड़ा राज है पानी का सेवन। वे दिन भर में 10 से 12 गिलास पानी पीती हैं। 
- एक सीक्रेट यह भी है कि वे हर काम सही समय पर करती हैं और अच्छी नींद लेती हैं। यह उन्हें पूरा दिन फिट, स्वस्थ और ऊर्जावान बनाए रखता है।  
- सुंदर और स्वस्थ रहने के लिए पोषण आहार लेना जरूरी है। वे जंक, फ्राइड और ओवरकुक्ड फ़ूड खाने से परहेज करती है। 
- इस उम्र में जब सबके बाल सफ़ेद और कमजोर हो जाते हैं, रेखा अपने बालों को मजबूत और स्वस्थ बनाए रखने के लिए सप्ताह में एक बार शहद, दही और अंडे का सफेद पैक का इस्तेमाल करती हैं। इसके अलावा आंवले, शिकाकाई, मेथी के बीज और नारियल के तेल में विश्वास करती है। 
- रेखा शाम साढ़े 7 से पहले ही डिनर कर लेती हैं। उनका मानना है कि केवल खाना ही खाना महत्वपूर्ण नहीं है। बल्कि क्या और कब खाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उनका खाना स्वस्थ, संतुलित, स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है। 
- रेखा अपने चेहरे की नियमित सफाई, टोनिंग और मॉइस्चराइजिंग करती हैं। रात में अपनी त्वचा से सभी मेकअप को हटा देती हैं और उसे अच्छे से साफ कर मॉइस्चराइज करती हैं। 
- रेखा कई सालों से योग और ध्यान करती रही हैं। वे मानती हैं कि योग और ध्यान मुख्य रूप से उनकी सुंदरता, बेदाग त्वचा और करिश्माई व्यक्तित्व के लिए जरूरी है।

रेखा और फरजाना में कैसा रिश्ता 
    रेखा और उनकी सेक्रेटरी फरज़ाना के संबंधों को हमेशा संदेह की नजर से देखा जाता रहा है।  इसलिए कि 40 साल से ज्यादा समय से फरजाना जितनी रेखा से जुड़ी है, उतना कोई नहीं जुड़ा। वे हेयर ड्रेसर के रूप में रेखा के करीब आई थी, पर आज उनका साया हैं। इन दोनों के रिश्ते पर उंगलियां उठी, पर जवाब किसी के पास नहीं है। रेखा पर 2016 में सामने आई यासिर उस्मान की किताब में भी दावा किया था कि फरजाना को ही रेखा के बेडरूम तक जाने की इजाजत है। इसमें उनकी निजी जिंदगी, रोमांस और शादी को लेकर कई अनसुनी बातें लिखी गई थी। वक़्त के साथ दोनों का रिश्ता गहराता गया। रेखा ने उन्हें 1986 में हेयर ड्रेसर से सेक्रेटरी बना लिया। आज भी अगर किसी को रेखा से मिलना है, तो उसे पहले फरजाना से मिलना पड़ता है।
     यासिर उस्मान की लिखी रेखा की बायोग्राफी में तो यह भी दर्ज है कि वे अपनी सेक्रेटरी के साथ लिव-इन में रहती हैं। दोनों के रिश्ते पर कई बार सवाल उठ चुके हैं। मुकेश अग्रवाल की भाभी ने तो दोनों के रिश्ते को लेकर यह कह दिया था कि इनका रिश्ता पति पत्नी जैसा है। कहा जाता है कि मुकेश अग्रवाल यदि फरजाना के बारे में रेखा से कुछ कहते थे, तो रेखा नाराज हो जाती थी। यह रिश्ता आज भी सवालों के घेरे में है। रेखा नजदीक से जानने वालों का तो यह भी कहना है कि फरज़ाना का पहनावा कुछ ख़ास तरह है, अमिताभ की तरह का है। क्या इसलिए कि रेखा को हमेशा अमिताभ के अपने आसपास होने का भ्रम बना रहे!
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Wednesday, July 24, 2024

भाजपा नेताओं को कांग्रेसी घुसपैठ रास नहीं आ रही!

- हेमंत पाल
  
    भाजपा में इन दिनों अंदर और बाहर के तापमान में बहुत अंतर है। देखने में बाहर सब कुछ सामान्य लग रहा, पर अंदर कई नेताओं ने नाराजगी का ख़म ठोंक रखा। उनकी ये नाराजगी अंदर ही नहीं रही। वे कांग्रेस के उन घुसपैठिए नेताओं को मंत्री बनाए जाने से गुस्से में हैं। जिन तीन कांग्रेस विधायकों को भाजपा में लाकर पदों से नवाजा जा रहा है, उसके पीछे का कारण उन्हें समझ नहीं आ रहा! आखिर रामनिवास रावत को मंत्री बनाने के क्या मज़बूरी थी, इसका जवाब नहीं मिल रहा।    
       कांग्रेस से आए रामनिवास रावत को मंत्री बनाया जाना भाजपा के बड़े नेताओं को रास नहीं आ रहा। इस कारण प्रदेश भाजपा में सब कुछ सामान्य नहीं है। सिंधिया प्रसंग को तो भाजपा में इसलिए स्वीकार लिया गया था, कि वो कांग्रेस की सरकार गिरा कर अपनी पार्टी की सरकार बनाने का मामला था। लेकिन, रामनिवास रावत, कमलेश शाह और निर्मला सप्रे को जिस तरह शर्तें मानकर भाजपा में लिया गया, वो पार्टी के कई सीनियर विधायकों और नेताओं को रास नहीं आ रहा। कुछ नेताओं की नाराजगी खुलकर सामने आ रही। वे इसे सही नहीं मान रहे और ये सवाल खड़ा कर रहे हैं कि आखिर इन तीन विधायकों को भाजपा में लेने के पीछे क्या मज़बूरी थी! क्यों इन्हें इनकी शर्तों पर पार्टी में लिया गया। बात सही इसलिए भी है, कि न तो सरकार पर कोई खतरा था और न इनके भाजपा में आने से प्रतिष्ठा बढ़ने जैसी कोई बात समझ में आती है।         
   भाजपा नेताओं की नाराजी खुलकर भी सामने आई और दबकर भी। लेकिन, पार्टी का बड़ा तबका नेतृत्व की इस प्रवृत्ति से खुश नहीं है। इससे उन्हें अपने हक़ पर खतरा मंडराता नजर आने लगा, जो स्वाभाविक भी है। सिंधिया के साथ आए 22 लोगों में चार अभी भी मंत्रिमंडल का हिस्सा है। पिछले मंत्रिमंडल में इनकी संख्या 7 थी। तोड़फोड़ से पार्टी को भले तात्कालिक फ़ायदा होता हो, पर इससे पार्टी के अंदर विद्रोह जैसे हालात बनते हैं। इससे पार्टी संगठन और बड़े नेता भी अनजान नहीं है। उन्हें पता है कि पार्टी में कैसा विरोध पनप रहा है। किंतु, इस नाराजगी को दूर करने के लिए क्या पार्टी ने कोई रास्ता खोजा? अभी इस सवाल का जवाब सामने आना बाकी है। लेकिन, यह बात जरूर सामने आई कि इन नाराज विधायकों को मंत्रिमंडल और निगम-मंडलों में नई जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है! लेकिन, ये कब और कैसे होगा, ये यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब आना बाकी है। 
      मध्यप्रदेश भाजपा में तोड़फोड़ की राजनीति से पार्टी के नेता ऊब गए हैं। यही कारण है कि अब पार्टी के अंदर नाराजगी विद्रोह की भाषा में बदलने लगी। कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए रामनिवास रावत को मंत्री बनाने से पार्टी के वरिष्ठ नेता खुलकर सामने आए। क्योंकि, मंत्रिमंडल विस्तार का सारा तामझाम अकेले रावत के लिए किया गया। इस पर पूर्व मंत्री गोपाल भार्गव और अजय विश्नोई ने तो खुलकर अपनी नाराजगी व्यक्त की। इसलिए कि कांग्रेस के दूसरे विद्रोही और अमरवाड़ा से जीते कमलेश शाह भी मंत्री बनने की कतार में है। भाजपा में नाराजगी जताने वाले ये वे नेता हैं, जो सालों से राजनीति कर रहे हैं।  वे मुखर भी हैं और खुलकर बोलने का मौका नहीं छोड़ते। लेकिन, ऐसे कई नेता जो चुप हैं पर अंदर ही अंदर उनका गुस्सा खदबदा रहा है। पूर्व मंत्री जयंत मलैया और ओमप्रकाश सकलेचा ने तो साफ़ कहा कि वे पार्टी में अपनी बात रखेंगे। आशय है कि वे भी इससे खुश नहीं हैं। सबका एक ही सवाल है कि आखिर कांग्रेस के इन तीन नेताओं को समझौते के तहत पार्टी में शामिल कराने के पीछे पार्टी की क्या मज़बूरी थी!    
    इससे पहले 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ जो नेता भाजपा में शामिल हुए थे, तब उन्हें मंत्री और राज्यमंत्री बनाया गया। जो उपचुनाव हार गए उन्हें समझौते के तहत निगम-मंडल की कमान सौंपी गई थी। तब भी पार्टी के नेताओं ने नाराजगी दिखाई थी। लेकिन, तब के हालात अलग थे। वो माहौल कमलनाथ की सरकार के समय का था और सारी जुगत कांग्रेस की सरकार गिराने के लिए की गई थी। इसलिए भाजपा के नेताओं ने कलेजे पर पत्थर रखकर सहन कर लिया। लेकिन, रामनिवास रावत, कमलेश शाह और निर्मला सप्रे को लोकसभा चुनाव के दौरान भाजपा में लाने से क्या हासिल हुआ! रावत को बिना उप चुनाव जीते मंत्री बना दिया गया। जबकि, कमलेश शाह तो चुनाव जीत गए और उन्हें भी मंत्री बनाया जाना है। निर्मला सप्रे से भाजपा का क्या करार हुआ ये अभी सामने नहीं आया!
    अजय विश्नोई ने सही कहा कि 'वो' (यानी कांग्रेस से भाजपा में आने वाले) शर्तों के साथ ही भाजपा में शामिल होते हैं, हम तो समर्पण भाव से काम करने वाले नेता हैं। त्याग अपनों से करवाया जाता है, दूसरा तो शर्तों के साथ आया। पूर्व मंत्री गोपाल भार्गव का कहना है कि ये पार्टी का फैसला है। वे खुलकर बोलते हैं, तो उनका नुकसान हो जाता है। यही वजह है कि पार्टी के दूसरे नाराज नेता भी खुलकर बोलने से हिचकिचा रहे हैं। इन नेताओं का कहना है कि सरकार बनाने या बचाने की मजबूरी तो नहीं थी, तब क्यों रामनिवास रावत को मंत्री बनाया गया! अजय विश्नोई जैसे सीनियर विधायक प्रतिक्रिया तो दे रहे हैं, पर वे भी पार्टी के फैसले की आड़ लेकर तंज भी कस रहे हैं। विश्नोई का यह भी कहना है कि पार्टी ने रावत को मंत्री बनाकर इनाम दिया है। शायद पार्टी ने उनकी उपयोगिता को समझा होगा। 
    कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया लगातार 9 बार से चुनाव जीते विधायक गोपाल भार्गव की भी सुनाई दी। उनका बयान सामने आया कि भाजपा में मंत्री बनाने का निर्णय शीर्ष नेतृत्व तय करता है। अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए उन्होंने यह भी कहा कि मैं 15000 दिन से विधायक हूं, पता नहीं रावत को किस मजबूरी में मंत्री बनाया। गोपाल भार्गव कई बार मंत्री रहे, पर इस बार उनको मौका नहीं मिला। उनकी भाषा से अंदाजा लगता है कि वे संभलकर बोलने में ही अपनी भलाई समझ रहे हैं। कहना तो वे बहुत कुछ चाहते होंगे, पर पार्टी लाइन भी नहीं छोड़ना चाहते। दो दशक तक मंत्री रहे जयंत मलैया भी पार्टी से बंधे हैं। भाजपा विधायक ओमप्रकाश सकलेचा का बयान सामने आया कि किसे मंत्री बनाना है और किसे नहीं, ये मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है।
    ऐसे में पार्टी भले ही सबकुछ ठीक कहे, पर वास्तव में ऐसा है नहीं! पैराशूट नेताओं को कुर्सी दिए जाने से भाजपा के वे नेता तो नाराज हैं ही जिनका पार्टी के इस फैसले से नुकसान हुआ है। प्रदेश की नई सरकार में पुराने नेताओं को हाशिए पर छोड़ देने के पीछे समझा जा रहा है कि पार्टी पुरानी पीढ़ी को विदा कर नई पीढ़ी को आगे लाने की परंपरा निभा रही है। लेकिन, रामनिवास रावत की उम्र के नेताओं को भाजपा में लाकर मंत्री बनाने को लेकर पनप रही नाराजगी सब चुप क्यों हैं। 
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फिल्मों में प्राकृतिक आपदा के कथानक


- हेमंत पाल 

      पर्यावरण हो रहे बदलाव के चलते हमें कई बार सूखा और बाढ़ का सामना करना पड़ता है। ये सिर्फ हमारे जीवन में ही नहीं होता, इस पर फिल्मों के कथानक भी रचे जाते हैं। हमारा देश लगभग हर साल कभी बाढ़, कभी सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं को झेलता है। करोड़ों लोग इन आपदाओं को हर साल करीब से भोगते हैं। इसके बावजूद यह विषय आमतौर पर हिंदी सिनेमा में कम ही नजर आता है। प्यार, अपराध, खेल, घोटाले जैसे कई विषय हैं, जिन पर हिंदी फिल्मकारों ने खूब फिल्में बनाई, लेकिन प्राकृतिक आपदाओं को अपनी कहानियों में ज्यादा जगह नहीं दी। जबकि, हॉलीवुड की फिल्मों में तरह के तूफान और बाढ़ के दृश्य ज्यादा दिखाई दिए। कई फिल्मों के तो टाइटल में भी आंधी, तूफान और भूकंप को शामिल किया गया। पहले हिंदी फिल्मों में आंधी तूफान और बारिश को कभी सस्पेंस तो कभी परिवार में आई आफत के  रूप में दिखाया जाता रहा। 
     राज कपूर की पहली सफल फिल्म का टाइटल ही 'बरसात' था। उनकी फिल्म 'आवारा' में जब पृथ्वीराज कपूर अपनी गर्भवती पत्नी को घर से बाहर निकाल देते हैं, तो अचानक आंधी, तूफान के साथ बारिश आ जाती है। 'मेरा नाम जोकर' में भी जब राज कपूर फिल्म के तीसरे हिस्से में पद्मिनी का घर छोड़कर जाते है, तब कड़कड़ाकर बिजली गरजती है और भारी बरसात में पद्मिनी उसे लौटकर आने की गुजारिश करते हुए कहती है अंग लग जा बालमा। राज कपूर की ही फिल्म सत्यं शिवं सुंदरम के अंत में बाढ़ का प्रलयंकारी दृश्य दिखाया गया था। पुल टूटने की वजह से पूरा गांव तबाह हो जाता है। लोग अपना गांव छोड़कर दूर-दूर चले जाते है। शशि कपूर और जीनत अमान की इस फिल्म के बाढ वाले दृश्य को राज कपूर ने खुद कैमरा लेकर अपने लोनी वाले फार्म हाऊस में आई वास्तविक बाढ के समय फिल्माया था।
    राज कपूर की तरह ही महबूब खान ने भी बाढ के दृश्यों का प्रभावशाली उपयोग अपनी क्लासिक फिल्म 'मदर इंडिया' में किया था। नरगिस और सुनील दत्त की इस फिल्म में बाढ़ से पूरे गांव में तबाही मच जाती है। भुखमरी और प्लेग की बीमारी से गांव वाले परेशान हैं, इस बीच ग्रामीण अपने परिवार को बचाते हैं। 'मदर इंडिया' भारत की उन फिल्मों में से एक हैं, जो ऑस्कर के नॉमिनेशन तक पहुंचने में कामयाब रही। इसके अलावा 'सोहनी महिवाल' और 'बैजू बावरा' में भी बाढ़ को फिल्म के कथानक से जोडा गया था। बारिश और बाढ़ को मनोज कुमार ने अपनी फिल्म 'पूरब और पश्चिम' के पहले श्वेत श्याम हिस्से में बहुत कलात्मकता से फिल्माया था। मनमोहन देसाई की फिल्म 'सच्चा झूठा' में राजेश खन्ना की बहन नाज भी बाढ़ में फंस जाती है। ऐसा नहीं कि फिल्मों में प्राकृतिक आपदा के नाम पर केवल बाढ़ का ही सहारा लिया गया। जब बाढ़ पर बस नहीं चल पाया तो फिल्मकारों ने भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदा को फिल्म की कथानक में जोड़कर प्रस्तुत किया। 
     इस तरह की फिल्मों में सबसे सफल रही बीआर चोपड़ा की फिल्म 'वक्त।' यश चोपड़ा द्वारा निर्देशित 1965 में आई इस फिल्म की कहानी भूकंप में हुई तबाही से बिछड़े परिवार के फिर मिलने की है। इसमें दिखाया गया कि कैसे एक व्यापारी और उसका परिवार सालों बाद एक अदालत के मुकदमे में फिर से मिलता है। 'मदर इंडिया' के बाद यह हिंदी सिनेमा की पहली ऐसी फिल्म थी, जिसमें इतने सारे सितारे साथ थे। इसमें बलराज साहनी, सुनील दत्त, शशि कपूर, शर्मिला टैगोर सहित कई बेहतरीन सितारों ने काम किया था। फिल्म 'जल' में कच्छ के रण को दिखाया गया। इसकी कहानी बक्का के इर्द गिर्द घूमती है जो सूखे के बीच पानी ढूंढ़ने की कोशिश करता है। डायरेक्टर अमोल गुप्ते की इस फिल्म में पूरब कोहली ने मुख्य भूमिका निभाई थी। साल 2005 में महाराष्ट्र में आई बाढ़ पर आधारित इस फिल्म में इमरान हाशमी और सोहा अली खान मुख्य भूमिका में थे। दोनों बाढ़ के बीच फंसकर कैसे मुसीबत से निकलते हैं, फिल्म में यह दिखाया गया। 
       सारा अली खान और सुशांत सिंह राजपूत की फिल्म 'केदारनाथ' भी बाढ़ की त्रासदी पर बनी है। 2013 में हिमालय पर इतिहास की सबसे भयानक तबाही हुई थी। यह फिल्म हिंदू लड़की और मुस्लिम लड़के बीच लव स्टोरी पर आधारित है। 2013 में आई फिल्म 'काई पो चे' अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की डेब्यू फिल्म थी। इसमें राजकुमार राव भी नजर आए थे। यह फिल्म तीन युवकों की कहानी थी जिनकी जिंदगी 2001 के गुजरात भूकंप के बाद बदल जाती है। फिल्म में इस भूकंप की भयावहता को दिखाया गया है। यह फिल्म चेतन भगत की किताब 'द थ्री मिस्टेक्स ऑफ माई लाइफ' पर आधारित है। कुणाल देशमुख निर्देशित फिल्म 'तुम मिले' 2009 में रिलीज हुई थी। फिल्म में इमरान हाशमी और सोहा अली खान ने मुख्य भूमिका निभाई थी। फिल्म में जुलाई, 2005 में मुंबई में आई बाढ़ को दिखाया गया था। 2017 में आई 'कड़वी हवा' में संजय मिश्रा और रणवीर शौरी मुख्य भूमिका में थे। यह एक सूखा पीड़ित क्षेत्र की कहानी है जहां बरसों से वर्षा नहीं हुई है। साल 2010 में आई ‘पीपली लाइव’ में किसानों की समस्या को बेहद अनोखे अंदाज में फिल्माया गया था। फिल्म में नत्था की कहानी थी, जो जो सूखे के कारण सरकार से लिया कर्ज वापस नहीं दे पाता। इसके बाद सरकार उनकी जमीन जब्त करने का आदेश देती है।
     'ओह माय गॉड' (2012) में परेश रावल ने ऐसे शख्स का किरदार निभाया था, जिसकी दुकान भूकंप से नष्ट हो जाती है। बीमा कंपनी इसे ‘एक्ट ऑफ गॉड’ बताकर उन्हें बीमा की रकम नहीं देती। इसके बाद वह कोर्ट का दरवाजा खटखटाता है और एक दिलचस्प कहानी बुनती है। एक और जहां हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्राकृतिक आपदा को फिल्म के कथानक के साथ जोडकर इस पर कुछ ही रीलें खर्च करने का प्रयास किया गया। वहीं हॉलीवुड ने इस विषय पर पूरी फिल्में ही समर्पित कर दी। उनके इस प्रयास को दर्शकों ने पसंद भी किया। हॉलीवुड में प्राकृतिक आपदाओं पर बनी फिल्मों की खासियत यह होती है, कि ये अपने दर्शकों को असली थ्रिलर महसूस कराती हैं। इतना रोमांच पैदा करती है, कि दर्शक अपनी सीट पर वो आपदा महसूस करता है। ये बिल्कुल असली जैसा लगता है। अब तक प्राकृतिक आपदाओं से लेकर दुनिया के खत्म होने तक, कई प्राकृतिक आपदाओं पर फिल्में बन चुकी हैं। हेलेन हंट और बिल पैक्सटन द्वारा अभिनीत 1996 में आई फिल्म 'ट्विस्टर' बॉक्स ऑफिस पर सबसे धमाकेदार हिट साबित हुई। यह फिल्म वास्तव में जबरदस्त दृश्य प्रभावों को दिखाती है।  
     2004 में आई 'द डे आफ्टर टुमारो' फिल्म में बर्फीले तूफान और सुनामी की त्रासदी को दिखाया गया। अमेरिका में आई इस त्रासदी से पूरा देश तहस नहस हो जाता है। फिल्म का निर्देशन रोलैंड ने किया था।  इसके बाद 2007 में प्रदर्शित टोनी के निर्देशन में बनी फिल्म 'फ्लड' पूरी तरह से बाढ़ पर ही आधारित थी। 2009 में प्रदर्शित फिल्म '2012' में भूकंप और सुनामी से पूरी दुनिया आई तबाही का रोमांचक फिल्मांकन किया गया था। इस फिल्म जॉन कुसैक, अमांडा पीट और ओलिवर जैसे कलाकार मुख्य भूमिका में थे। इस फिल्म का निर्देशन भी रोलैंड ने ही किया था। दुनियाभर के दर्शकों ने फिल्म को काफी पसंद किया था। 2011 में आई स्टीवन सोडरबर्ग की फिल्म 'कंटेजियन' कोरोना वायरस के बढ़ने के बाद सोशल मीडिया पर ट्रेंड हुई। इस फिल्म में ग्वेनेथ पाल्ट्रो, मारिओन कोटिलार्ड, ब्रेयान क्रेन्सटन, मैट डेमन, लॉरेन्स फिशबर्न, जूड लॉ, केट विंसलेट और जेनिफर ने एक्टिंग की है। यह फिल्म 2009 में फैले स्वाइन फ्लू के वायरस के फैलने पर आधारित थी। 
     2015 में प्रदर्शित  फिल्म 'सैन एंड्रियास' में ड्वेन जॉनसन,कार्ला गुजिनो और अलेक्जेन्ड्रा जैसे कलाकार मुख्य भूमिका में थे। इस फिल्म का निर्देशन ब्रैड पेयटन ने किया था। सैन एंड्रियास में भूकंप और सुनामी से होने वाली त्रासदी को दिखाया गया है। हॉलीवुड की ही फिल्म 'जियोस्टॉर्म' एक साइंस डिजास्टर आधारित फिल्म थी। ये फिल्म साल 2017 में आई थी। इस फिल्म का निर्देशन डीन डिवालिन ने किया था। इस फिल्म में जेरार्ड बटलर, जिम स्टर्जेस और अब्बी कॉर्निश जैसे कलाकार मुख्य भूमिका में थे। हॉलीवुड ने जहां इस विषय को शिद्दत के साथ उठाया, वहीं हिंदी फिल्मों के निर्माता निर्देशक इसे फिलर के रूप में ही इस्तेमाल करते रहें। ज्यादा हुआ तो बारिश, तूफान, आंधी, जलजला, आंधी और तूफान और आया तूफान जैसे शीर्षक रचे गए। 
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Friday, July 12, 2024

सिनेमा में सद्भाव का सन्नाटा क्यों छाया

     1994 में आई फिल्म 'क्रांतिवीर' में नाना पाटेकर के कई बेहद दमदार डायलॉग थे। एक दृश्य में नाना का डायलॉग था 'ये मुसलमान का खून ये हिंदू का खून .... बता इसमें मुसलमान का खून कौन सा है और हिंदू का कौन सा है बता।' इस फिल्म में हिंदू-मुस्लिम की एकता की मिसाल दी गई थी। ऐसी कई फ़िल्में बनती रही। लेकिन, अब वो समय नहीं रहा, जब इस तरह की सद्भाव वाली भावनाएं दिखाई जाएं। बरसों से ऐसी कोई फिल्म नहीं आई, जिसमें 'क्रांतिवीर' जैसे जोशीले डायलॉग और कथानक हों। यह कोई संयोग नहीं, बल्कि बदलते माहौल और विचारधारा का असर है।         
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- हेमंत पाल

      हमारे देश में समय के बदलाव को फिल्मों के कथानक के जरिए व्यक्त करने की परंपरा बहुत पुरानी है। जब जैसा माहौल रहता है, तब वैसी फ़िल्में बनती हैं। युद्धकाल में हमारे फिल्मकारों ने जंग पर आधारित फ़िल्में बनाई, युवाओं का आक्रोश उभरा तो ऐसे विषय को चुना गया, कई फिल्मों में तो प्राकृतिक आपदा को भी फिल्म का विषय बनाया गया। यहां तक कि अंतरिक्ष में देश को सफलता मिली तो उसे भी विषय बनाया गया। लेकिन, अब हिंदू-मुस्लिम एकता वाले कथानकों पर फ़िल्में बनना बंद हो गई! जबकि, ब्लैक एंड व्हाइट के ज़माने से कुछ साल पहले तक अलग-अलग कथानकों के जरिए सामाजिक सद्भाव बढ़ाने की कोशिश की गई थी। अब शायद इसलिए ऐसी फ़िल्में नहीं बनती कि वे माहौल में मेल नहीं खाती। फिल्मकार भी इसलिए कोशिश नहीं करते कि उसकी रचनात्मकता पर आंच न आए और न वो किसी आक्रोश का निशाना बने। आज यदि विवेक अग्निहोत्री की 'द कश्मीर फाइल्स' को धुंआधार सफलता मिलती, तो उसी तरह की फिल्मों की बाढ़ आ जाती। फिर 'द केरल स्टोरी' बनाई जाती है और उसके रियल स्टोरी होने के तर्क दिए जाते हैं। आशय है कि समाज के एक वर्ग को नायक और दूसरे को खलनायक की तरह पेश किया जाने लगा।   
   जबकि, हिंदी फिल्म का इतिहास सद्भाव वाली फिल्मों से भरा पड़ा है। 1941 में वी शांताराम ने 'पड़ोसी' नाम से दो दोस्तों की कहानी पर फिल्म बनाई थी। फिल्म की खासियत यह थी, कि इसमें पंडित का किरदार मजहर खान ने और मुस्लिम का गजानन जागीरदार ने निभाया था। फिल्म के अंत में एक ही मकसद के लिए दोनों साथ में जान दे देते हैं। इसके कुछ साल बाद पीएल संतोषी ने 'हम एक है' (1946) बनाई, जिसमें सामाजिक सौहार्द्र दिखाया गया था। उस समय समाज में सांप्रदायिक वैमनस्य जैसा कोई भाव नहीं था, तो ऐसी फिल्मों को मनोरंजन की ही तरह देखा जाता था। तब इन फिल्मों के डायलॉग भी 'क्रांतिवीर' की तरह जोशीले नहीं थे कि रोंगटे खड़े कर दें! यही वजह थी कि इस विषय के प्रचार की जरुरत नहीं पड़ी। यश चोपड़ा की फिल्म 'धूल का फूल' (1959) भी ऐसी ही फिल्म थी। एक मुस्लिम एक हिंदू बच्चे को जंगल में लावारिस देखता है, उसे पालता है। इस फिल्म का गीत 'तू हिंदू बनेगा न मुसलमान बनेगा इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा' काफी चर्चित रहा। मनमोहन देसाई की 'कुली' (1983) में भी सद्भाव का संदेश था। आज के दौर में सांप्रदायिक सौहार्द्र और मानवता से जुड़ी फिल्मों में 'बजरंगी भाईजान' और 'मुल्क' ही बनी।
     हिंदी सिनेमा में धर्म कभी विवाद का मसला नहीं रहा। इस विषय को कभी हवा भी नहीं दी गई, क्योंकि फिल्मों को मनोरंजन के नजरिए से देखा जाता रहा। लेकिन, अब फिल्मों में धर्म को कुछ ज्यादा ही तवज्जो दी जाने लगी। दर्शक भी तरह की विचारधारा में बंट गया। इसे पब्लिसिटी स्टंट भी बनाया जाने लगा, ताकि फिल्म को आसानी से एक वर्ग के पाले में डालकर उसे हिट करवाया जा सके। इसलिए कि फिल्मों का मूल स्वर भी अब सद्भाव से हटने लगा। फिर भी दर्शकों को सिनेमाघर तक लाने के लिए शाहरुख खान आज भी परदे पर राज और आर्यन ही हैं। आमिर खान को भी भुवन, रवि और लाल सिंह चड्ढा की तरह पसंद किया जाता है। सलमान खान को भी सबसे ज्यादा चुलबुल पांडे के किरदार में पसंद किया गया। अमिताभ बच्चन तो विजय के साथ इकबाल भी है और एंथोनी भी। इसी से समझा जा सकता है कि फिल्मों में हर रूप में सद्भाव जिंदा रहा, पर अब उसका लोप होता जा रहा है। देश की आजादी के बाद सभी का पहला मकसद बिखरे समाज से नए देश का निर्माण था। लोगों के पास सामाजिक और आर्थिक बराबरी, समृद्धि और खुशहाली के सपने थे। इसलिए साम्यवादी सपनों वाली फिल्में ज्यादा बनी। मदर इंडिया, दो बीघा जमीन और 'नया दौर' जैसी फिल्में सफल हुई और आज भी ये मील का पत्थर हैं। 
 
       देश के विभाजन के बाद उस त्रासद सच्चाई को कभी फिल्म का विषय नहीं बनाया गया। ऐसी फ़िल्में बनी भी तो बरसों बाद। कोशिश यही थी कि विभाजन के दर्द को भूलकर सांप्रदायिक एकता को बढ़ाया जाए। कुंभ के मेले या ट्रेन में बिछुड़े दो भाईयों की कहानी जैसे कथानक रचे गए। ये दोनों भाई बिछड़कर अलग-अलग धर्मों वाले दो परिवारों में पलते हैं। दोनों अपने-अपने धर्मों का पालन करते हैं और जब मिलते हैं, तो भी खुद को सहारा देने वाले को नहीं भूलते। इसी दौर में गांधी विचारधारा को भी बढ़ाकर छुआछूत और जातिवाद को ख़त्म करने की पहल की गई। कई फिल्मों में गांव की जमींदारी प्रथा और साहूकारी का विरोध किया गया। नए रूप में आज भी ये सारी बुराइयां समाज में हैं, पर इन्हें फिल्म का विषय बनाने से बचा जाता है। 
     देवानंद की फिल्म 'अल्लाह तेरो नाम' (1961) में सद्भाव की अजब मिसाल पेश की गई थी। 'शोले' (1975) में छोटे से रोल में इमाम साहब सभी की तुलना में अधिक साहसी और प्रेरक व्यक्ति के रूप में दिखाए गए। गांव वाले जिस गब्बर सिंह के खिलाफ लड़ने में डरते हैं, वहीं इमाम साहब अपने बेटे को खोने के बाद भी दूसरों को ऐसे बलिदान के लिए तैयार करने का संदेश देते हैं। कच्चे धागे (1999) में हिंदू और मुस्लिम सौतेले भाई अपनी मां मरियम को बचाने के लिए एकजुट होते हैं। सिर्फ यही नहीं, सात हिंदुस्तानी (1969), क्रांति (1981), देश प्रेमी (1982), कर्मा (1986), चाइना गेट (1998), लगान (2001), ईमान धरम (1977) और इंसानियत (1994) जैसी फिल्मों का जिक्र किया जा सकता है। ऐसी कुछ फिल्मों के शीर्षक भी अलग संदेश देते थे। जैसे शंकर हुसैन (1977), पंडित और पठान (1977) और राम-रहीम (1930) इसके अलावा 'आप के दीवाने' (1980) और 'पापी देवता' (1995) दोनों राम और रहीम नाम के दो लोगों की दोस्ती पर केंद्रित रहे।  
     ऐसी भी फिल्में आई जिनमें मुस्लिम को हिंदू किरदार के हित में भले आदमी की भूमिका में दिखाया गया। अमिताभ की फिल्म 'जंजीर' (1973) में गुंडा शेरखान (प्राण) हिंदू पुलिस अधिकारी की मदद करता है। इकबाल (2005) भी ऐसी ही फिल्म थी, जिसमें मूक-बधिर नायक इकबाल क्रिकेट में कामयाब होना चाहता है, जिसका कोच हिंदू होता है। 2006 में आई फिल्म 'डोर' में हिंदू और मुस्लिम दो महिलाओं बीच संवेदनशील रिश्ता दिखाया गया। यह उन दुर्लभ फिल्मों में एक है, जिसमें केंद्रीय चरित्र कोई मर्द नहीं है। मुस्लिम महिला ही अपनी हिंदू सहेली की मदद करती है। यादों की बारात (1973) में शंकर का सबसे अच्छा दोस्त उस्मान है। 'जुनून' (1978) में मुस्लिम नायक ने 1857 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सेवा में अपने प्रेम के हित का त्याग किया था। 'मुकद्दर का सिकंदर' (1978) में अमिताभ को एक मुस्लिम महिला गोद लेती है।
    'खुद्दार' (1982) में एक मुसलमान दो भाईयों को आश्रय देता है। 'विधाता' (1982) में हिंदू नायक अपने मुस्लिम केयर टेकर की हत्या का बदला लेता है। विजेता (1982) में चार दोस्त वायु सेना अकादमी में सभी पायलट विभिन्न धर्मों से हैं। 'प्यार की जीत' (1987) में अन्य भ्रष्ट हिंदू डॉक्टरों के विपरीत, एक मुस्लिम डॉ रहमान को एक ईमानदार और दयालु व्यक्ति के रूप में दिखाया गया। 'खुदा गवाह' (1992) में अमिताभ बच्चन काबुल के एक पठान की भूमिका निभाते हुए एक हिंदू पुलिस अधिकारी से मदद लेते हैं। गुलाम-ए-मुस्तफा (1997) में एक हिंदू महिला और एक मुस्लिम पुरुष के बीच शुरुआती नफरत और कड़वाहट अंततः उनके आपसी विश्वास से दूर हो जाती है। 
      ऐसी फिल्मों का जिक्र बहुत लंबा है। 'हे राम' (2000) में अमजद खान नाम का किरदार अंततः हिंदू नायक को गांधी की हत्या करने से रोकता है। 'राख' (2001) में आमिर खान को एक हिंदू पुलिस अधिकारी की उसकी प्रेमिका के बलात्कार का बदला लेने में मदद करता है। बस इतना सा ख्वाब है (2001) में नावेद अली हिंदू नायक सूरज चंद के जीवन को बदल देते हैं। 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' (2003) में जहीर की मौत कहानी में मोड़ लाती है। यशराज की फिल्म 'चक दे इंडिया' (2007) में मुस्लिम हॉकी कोच महिला हॉकी टीम को जिताता है। ऐसी फिल्मों की संख्या सैकड़ों में हैं जिनमें हिंदू और मुसलमान दोस्त या मददगार के रूप में दिखाई देते हैं। अमिताभ बच्चन की फिल्म 'अंधा कानून' में विजय और खान दोनों ही समाज में अपराधियों से पीड़ित हैं। 'ए वेडनसडे' (2008) में कई आतंकवादी मुस्लिम हैं। लेकिन, ईमानदार पुलिस वालों में से एक किरदार भी मुस्लिम है। तात्पर्य यह कि ऐसी फिल्मों को पसंद करने वालों के लिए उस तरह का माहौल भी जरूरी है, जो अभी दिखाई नहीं देता।  
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दर्शकों को बांधता है चौंकाने वाला सस्पेंस

     फिल्मों के विषयों की लिस्ट बहुत लंबी होती है। लेकिन, हर विषय का एक समय होता है। कभी लव स्टोरी, कभी पारिवारिक कहानी, कभी एक्शन तो कभी हल्की-फुल्की कॉमेडी दर्शकों को प्रभावित करती है। लेकिन, सस्पेंस ऐसा विषय है, जो हमेशा ही दर्शकों को पसंद आया। ये फ़िल्में दर्शकों को शुरू से अंत तक बांधकर रखती हैं। कई ऐसी सस्पेंस थ्रिलर फ़िल्में बनी जिन्होंने दर्शकों का दिमाग बुरी तरह चकरा दिया। 'दृश्यम' और अंधाधुन' को ऐसी  फिल्मों में गिना सकता है जिनका अंत चौकाने वाला है।   


- हेमंत पाल

      यदि फिल्म के शौकीन कुछ दर्शकों से सवाल किया जाए कि उन्हें कैसी फ़िल्में पसंद हैं, तो निश्चित रूप से ज्यादातर का जवाब होगा सस्पेंस वाली फ़िल्में। ऐसी फ़िल्में जिनका अंत चौंकाने वाला हो। इसका कारण है, कि इस तरह के कथानक पर बनी फ़िल्में दर्शकों को भी अपने साथ जोड़ लेती है। फिल्म के दृश्यों को देखने वाला सोचता रहता है कि अब क्या होगा! यही वजह है कि इन फिल्मों सफलता ज्यादा होती है। क्योंकि, इनके क्लाइमेक्स दर्शकों को हतप्रभ कर देते हैं! ऐसी फ़िल्में सिर्फ हिंदी में ही सफल नहीं रही, बल्कि हॉलीवुड में भी सस्पेंस, थ्रिलर वाली फिल्‍मों को ही ज्यादा पसंद किया जाता रहा। डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और स्क्रिप्ट राइटर अल्फ्रेड हिचकॉक को तो 'मास्‍टर ऑफ सस्पेंस' ही कहा जाता रहा। सस्‍पेंस और थ्रिलर वाले कथानक शुरू से दर्शकों के प्रिय विषय रहे हैं। जिस फिल्म के अंत के बारे में उनका खुद का अनुमान गलत निकले, वो उन्हें ज्यादा पसंद! क्‍लाइमेक्‍स में ऐसा शख्स सामने आए, जिसका दर्शकों ने अनुमान नहीं लगाया हो! ऐसी फिल्में ही दर्शकों को बांधने वाली होती है। सस्पेंस थ्रिलर वाले कथानक की फिल्मों में दर्शकों को शुरू लगता है कि उसे पता था कि आगे यही होने वाला है। इन फिल्मों में ऐसा अजूबा ही होता है। जो सबसे ज्यादा शरीफ दिखता है, शातिर निकलता है। लेकिन यह अनुमान कई बार गलत भी हो जाता है और एक अलग ही थ्रिलर फिल्म का अंत दर्शक के सामने आता है। सस्पेंस का आशय डरावनी फिल्मों से नहीं है। बल्कि, इस तरह की फ़िल्में अपने कसे हुए कथानक से दर्शक को बांधती है। देखने वाला हमेशा इसी उधेड़बुन में लगा रहता है कि अब क्या होगा? 
     परदे पर अभी तक ऐसी फ़िल्में सीमित थीं। पर ओटीटी प्लेटफॉर्म आने के बाद लगने लगा कि दर्शक सस्पेंस, थ्रिलर और मर्डर मिस्‍ट्री ही देखना चाहता है। जबकि, ये तीनों ही अलग-अलग शैलियां हैं। थ्रिलर फिल्मों में एक्शन होता है, लेकिन सस्‍पेंस नहीं! उनमें जो सस्‍पेंस होता है, उसका राज धीरे-धीरे खुलता रहता है। लेकिन, सस्पेंस फिल्म में न तो रहस्‍य जरूरी है और न एक्शन! इनमे चौंकाने वाले सीन ज्यादा होते हैं, जो दर्शक को सोचने का मौका भी नहीं देते। मिस्‍ट्री और सस्‍पेंस थ्रिलर फ़िल्में एक जैसी नहीं होती। दोनों का ट्रीटमेंट अला-अलग होता है। पर, मिस्‍ट्री फिल्मों में सिर्फ एक राज होता है, जिस पर से फिल्म के अंत में परदा उठता है। इस तरह की फिल्मों की पटकथा का ताना-बाना किसी हत्या के इर्द-गिर्द बुना जाता है। पूरी कहानी अनजान हत्यारे की खोज पर आधारित होती है। संदेह के लिए कई पात्रों को निशाने पर रखा जाता है। हत्यारे को पकड़ने के लिए पुलिस जो भी चाल चलती है, वही फिल्म का आकर्षण होता है। कभी फिल्म के नायक, नायिका या सबसे शरीफ पात्र के भी कातिल होने की स्थितियां निर्मित की जाती है। यानी दर्शकों को बांधने और उनका ध्यान बांटने के लिए कई हथकंडे रचे जाते हैं। देखा जाए तो दर्शकों को वही सस्पेंस फ़िल्में ज्यादा पसंद आती है, जो उन्हें हर सीन में चौंका दें। तीसरी मंजिल, ज्वेल थीफ, क़त्ल और 'गुप्त' के बाद 'दृश्यम' सीरीज की दोनों फिल्मों ने दर्शकों को जिस तरह बांधकर रखा वही इन फिल्मों का सफलता रही।     
       इस तरह कथानक पर बनने वाली फिल्मों के पन्ने पलटे जाएं, तो हिंदी में मर्डर मिस्ट्री और सस्पेंस फिल्मों की शुरुआत का श्रेय विजय आनंद को जाता है। उन्होंने 'तीसरी मंजिल' और 'ज्वेल थीफ' उस दौर में बनाने की हिम्मत की, जब दर्शकों को ऐसी कहानियों का अंदाजा भी नहीं था। इन फिल्मों में पैसा लगाना भी एक तरह ही जुआं ही था। पर, विजय आनंद ने दर्शकों पर अपना जादू चलाया और उनकी कई फ़िल्में पसंद की गईं। उन्होंने ऐसे कई प्रयोग किए, जो सस्पेंस से लबरेज थे। इसी तरह रामगोपाल वर्मा की 'कौन' को हिंदी की बेस्ट साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म कहा जा सकता हैं। यह पूरी फिल्म घर में बंद एक लड़की (उर्मिला मातोंडकर) की कहानी है, जो अजनबी (मनोज बाजपेयी) से बचने की कोशिश में रहती है। लेकिन, फिल्म का क्लाईमैक्स दर्शकों के होश उड़ा देता है। इसी तरह की फिल्म 'फोबिया' भी थी, जिसमें राधिका आप्टे ने काम किया। यह फिल्म ऐसी लड़की की कहानी है, जो बाहर निकलने से डरती है और खुद को घर में बंद कर लेती है। उसका डर ही फिल्म का क्लाइमैक्स है।
     बॉबी देओल, काजोल और मनीषा कोइराला की 'गुप्त' बेहतरीन सस्पेंस थ्रिलर फिल्म थी। इसमें अंत तक किसी का ध्यान नहीं जाता और खलनायिका काजोल निकलती है। विद्या बालन की 'कहानी' और 'कहानी-2' दोनों ही फ़िल्में दर्शकों को अंत तक कुर्सी से बांधकर रखती है। किसी दर्शक को अंदाजा नहीं होता कि आखिरी में क्या होगा! फिल्म 'नैना' एक अंधी लड़की की कहानी थी, जिसकी आंखें ट्रांसप्लांट की जाती है। लेकिन, इसके बाद उसे अजीब सी चीजें दिखाई देने लगती है। 'बदला' को हाल के दौर की बड़ी मर्डर मिस्ट्री फिल्म माना जाता है! इसे अंत तक देखने के बाद ही समझ आता है कि आखिर फिल्म क्या चाहती है! ये पूरी फिल्म सस्पेंस से भरी है! कलाकारों का अभिनय भी हैरान करता है! 
      जबकि, आज के दौर की सस्पेंस फिल्मों में ‘दृश्‍यम’ और इसका सीक्वल सबसे अच्छा उदाहरण है। इसमें अपराधी सामने होता है, लेकिन न तो पुलिस उसे पकड़ पाती है और न दर्शकों को समझ आता है कि उसने ये सब किया कैसे होगा! इस फिल्‍म में कोई मारधाड़ नहीं थी और न रहस्‍य! हत्यारा सबके सामने होते हुए अपनी चतुराई से बचता रहता है। कोई ठोस सबूत न होने से पुलिस भी अंत तक उस पर हाथ नहीं डाल पाती! इसमें सस्पेंस और इमोशन का ऐसा घालमेल किया जाता है, कि फिल्म देखने वाले भी हत्यारे के पक्ष में नजर आ जाते हैं। वे भी नहीं चाहते कि अपराधी पकड़ा जाए! कानून, गुमनाम, मेरा साया, इत्तेफाक, धुंध, अपराधी कौन, कब क्‍यों और कहां, खिलाड़ी, गुप्‍त, वह कौन थी, डिटेक्टर व्‍योमकेश बक्‍शी, मनोरमा सिक्‍स फीट अंडर, भूल भुलैया, एक चालीस की लास्‍ट लोकल, बदला, जानी गद्दार, अगली, तलवार, अंधाधुन, क़त्ल, दृश्‍यम और 'कहानी' ऐसी ही फ़िल्में हैं, जिनका जादू दर्शकों पर जमकर चला।  
     कुछ साल पहले तक फिल्म के अंत को गोपनीय बनाए रखने हिदायत भी इसी लिए जाती थी कि फिल्म देखने आने वाले दर्शकों में सस्पेंस बना रहे। इसलिए कि ऐसी फिल्मों के अंत में कुछ ऐसा होता था, जो देखने वालों को चौंका देता था। फिल्म का कथानक कुछ इस तरह गढ़ा जाता था, कि दर्शक उसके आकर्षण में फंस जाते। वे कहानी के ट्विस्ट की असलियत देख नहीं पाते थे और जब राज खुलता तो ऐसा पात्र संदेहों से घिरा मिलता, जिस पर किसी की नजर नहीं जाती! सस्पेंस फिल्मों में चौंकाने वाले अंत का दौर अभी ख़त्म नहीं हुआ! बस, दर्शकों को ये हिदायत देना बंद कर दिया गया कि फिल्म का अंत किसी को न बताएं! ऐसी फ़िल्में सिर्फ कलाकारों के अभिनय से ही दर्शकों को नहीं बांधती, इनकी पटकथा लेखन और डायरेक्शन भी कुछ नयापन होता है। 
    अब तक कई थ्रिलर फिल्में आई, लेकिन सभी दर्शकों को बांध नहीं पाई। याद वहीं रहती, जिन्होंने अपनी पटकथा और डायरेक्शन का जादू दिखाया। पुरानी फिल्मों में तीसरी मंजिल, ज्वेल थीफ, इत्तेफ़ाक़, गुमनाम और आज के दौर की ए वेडनस डे, बदला, हमराज़, 100 डेज के बाद आयुष्मान खुराना की फिल्म 'अंधाधुंन' और अजय देवगन की 'दृश्यम' ऐसी ही ऐसी फ़िल्में हैं, जिनके क्लाइमैक्स ने दर्शकों को कुर्सी पर ठीक से बैठने नहीं दिया। 'अंधाधुन' ने तो एक नया ट्रेंड बना दिया। इसमें एक अंधे आदमी का किरदार काफी रहस्यमय था। फिल्म की कहानी इसी के आस-पास घूमती है। इस पूरी फिल्म में अच्छा-खासा सस्पेंस बनाकर रखा गया। ओटीटी के आने के बाद से सस्पेंस और थ्रिलर फिल्मों का क्रेज कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। 
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