Wednesday, September 3, 2025

'जय संतोषी मां' की चमत्कारिक सफलता के 50 साल

    हिंदी फिल्मों में जब भी धर्म का जिक्र हुआ, दर्शकों ने उस फिल्म को हाथों-हाथ लिया! भगवान की शरण में फिल्मों ने कई बार बड़ी सफलता का स्वाद चखा है। ब्लैक एंड व्हाइट के ज़माने में आई 'रामराज्य' और उसके बाद आई फिल्मों में जब भी परदे पर भगवान उतरे, फ़िल्मकार को उनका आशीर्वाद जरूर मिला! यही वजह है कि फिल्म इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा कमाई का रिकॉर्ड भी एक धार्मिक फिल्म 'जय संतोषी माँ' के नाम है। इसकी लागत चंद लाख थी, पर कमाई करोड़ों में रही। लागत और कमाई का यही अंतर आज भी रिकॉर्ड है। फिल्म ने धार्मिक आस्था का ऐसा माहौल बनाया था कि सिनेमा हॉल में लोग चप्पल उतारकर आते थे। जब परदे पर संतोषी माता की आरती होती, तो दर्शक खड़े हो जाते थे और फिर सिक्के चढ़ाते। फिल्म इतिहास में आस्था का ऐसा ज्वार कभी नहीं देखा गया!
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- हेमंत पाल

       वैसे तो 1975 के साल को अमिताभ बच्चन के साल के तौर पर याद किया जाता है। क्योंकि, इस साल उनकी दो फिल्में 'शोले' और 'दीवार' सबसे ज्यादा कमाई करने वाली टॉप पांच फिल्मों में शामिल रहीं। दर्शकों को लगा था कि 'जंजीर' से शुरू हुआ ये सिलसिला लंबा खिंचेगा। लेकिन, तभी रिलीज हुई 'जय संतोषी' मां ने फिल्म पंडितों के समीकरण बदल दिए। जबकि, थिएटर वाले भूल चुके थे, कि कोई नई फिल्म उन्होंने बीते शुक्रवार लगाई है। फिल्म ने पहले शो में 56 रुपए  दूसरे में 64 और शाम के शो की कमाई रही 98 रुपए रही थी। नाइट शो का कलेक्शन मुश्किल से सौ रुपए हुआ था। लेकिन, सोमवार की सुबह जो हलचल शुरू हुई, उससे सब चमत्कृत थे। जहां भी ये फिल्म लगी थी, वहां दर्शक टूट पड़े। थियेटर की सफाई करने वाले शो के बीच में उछाली गई चिल्लर बटोर कर मालामाल हो गए। 'जय संतोषी मां' ने जो किया उसे चमत्कार ही कहा जाना चाहिए। इस फिल्म ने अपनी लागत का कई गुना बिजनेस करके 'शोले' जैसी फिल्म को टक्कर दी थी! जिस दिन 'शोले' रिलीज हुई, उसी दिन 'जय संतोषी माँ' फिल्म भी रिलीज हुई थी। लेकिन, दोनों ही फिल्मों के कथानक में विरोधाभास था। 'शोले' में हिंसा की भरमार थी, जबकि 'जय संतोषी माँ' के जरिए आस्था और विश्वास का संदेश था। दोनों फिल्मों का मजेदार तथ्य यह था कि 'जय संतोषी माँ' का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 'शोले' के मुकाबले अधिक था! 'शोले' में गब्बर सिंह की गोलियां खून बिखेर रही थी, जबकि 'जय संतोषी माँ' में दर्शक सिनेमाघर में आरती गा रहे थे। 
    आज फिर संतोषी माँ का जिक्र इसलिए कि इस फिल्म को रिलीज हुए 15 अगस्त को 50 साल पूरे हो गए। 'जय संतोषी माँ' अपने समय काल में जबरदस्त चली थी! दर्शकों ने इसे सिर्फ फिल्म की तरह नहीं लिया, बल्कि सिनेमाघर को मंदिर की तरह पूजने भी लगे थे। दर्शक हॉल में चप्पल-जूते पहनकर नहीं आते थे! श्रद्धा इतनी उमड़ती थी, कि आरती के वक़्त लोग सीट से खड़े होकर तालियां बजाते और सिक्के चढ़ाने लगते थे! गांवों और शहरों में हर जगह श्रद्धा का सैलाब उमड़ पड़ा था। हर शुक्रवार महिलाएं संतोषी माता का व्रत करने लगी! मंदिरों में संतोषी माता की मूर्ति स्थापित की जाने लगी थी। संतोषी माता की व्रत कथा सुनी और सुनाई जाने लगी! गुड़-चने का प्रसाद बंटने लगा। लड़कियों से लेकर बूढ़ी महिलाएं तक शुक्रवार व्रत रखकर उद्यापन करने लगी थी! 
    इस फिल्म के बाद भी संतोषी माता को लेकर आस्था का ज्वार कम नहीं हुआ! यही कारण है कि पांच दशक बाद भी इस फिल्म की सफलता और उससे जुड़े किस्से भूले नहीं। फिल्म इंडस्ट्रीज में एक्शन के साथ-साथ धर्म और ईश्वर के चमत्कारों को दिखाने वाली फिल्मों का हमेशा ही वर्चस्व रहा है। 'बजरंगी भाईजान' का हीरो सलमान खान को हनुमान भक्त बताया गया। ‘अग्निपथ’ रितिक रोशन गणेश का गाना भगवान गणेश को समर्पित था। शाहरुख खान ने भी जब ‘डॉन’ का रीमेक बनाया तो गणेश की स्तुति की! अमिताभ बच्चन की तो करीब सभी हिट फिल्मों में भगवान या अल्लाह का आशीर्वाद साथ चला। कुली, अमर-अकबर- एंथनी, सुहाग हो या ‘दीवार’ सभी में आस्था का कोई न कोई तड़का लगा है। अक्षय कुमार ने भी जब ‘खिलाड़ियों के खिलाड़ी’ में जय शेरावालिए तेरा शेर ... गाया तो धूम मच गई। जब बॉलीवुड में हर तरफ भगवानों का ही बोलबाला है। ऐसे में 'संतोषी माँ' का जादू आज भी देश के कई इलाकों में सिर चढ़कर बोलता है। 
      जब यह फिल्म रिलीज हुई, सिनेमा हॉल के बाहर एक अनोखा नजारा देखने को मिलता था। आसपास के गांवों और कस्बों से महिलाएं, जिनमें ज्यादातर बुजुर्ग होती थीं, यह फिल्म देखने आती थी। हॉल के अंदर आने से पहले कई महिलाएं चप्पल बाहर ही उतार देती थी। वे स्क्रीन पर चल रही कहानी को श्रद्धा और आश्चर्य के साथ देखती थीं, जैसे वे किसी सत्संग में शामिल हों। ‘जय संतोषी मां' उनके लिए सिर्फ एक धार्मिक फिल्म नहीं, बल्कि जीवन को प्रभावित करने वाला प्रसंग था। यह सब देश के सैकड़ों छोटे शहरों और गांवों में महीनों तक दोहराया गया। पहली बार निर्देशक बने विजय शर्मा की इस फिल्म ने जो इतिहास बनाया, वो तक टूटा नहीं। 1975 के ट्रेड गाइड की सालाना रिपोर्ट में ‘जय संतोषी मां' और ‘शोले' को ‘दीवार' से ऊपर ब्लॉकबस्टर का दर्जा दिया गया था। कई शहरों में इस फिल्म ने गोल्डन और सिल्वर जुबली मनाई। 'फिल्म इन्फॉर्मेशन पत्रिका' के अनुसार, बंबई के मलाड में महिलाओं के लिए सुबह 9 बजे का अलग शो शुरू किया गया था। इस फिल्म का असर सिर्फ कमाई तक सीमित नहीं था। 
    मूक फिल्मों के दौर से 1960 तक, बंबई के सिनेमा बाजार में धार्मिक फिल्में लगातार बनती रही। पढ़े-लिखे शहरी लोग इनका मजाक उड़ाते थे, लेकिन आम लोगों में इनका बड़ा प्रशंसक वर्ग था। फिल्म के शुरुआती क्रेडिट हिंदी में लिखे गए थे। 1970 के दशक में धार्मिक फिल्मों का निर्माण कम हो गया। 1973 में ‘संपूर्ण रामायण' को छोड़कर ज्यादातर फिल्में असफल रहीं। सतराम रोहिरा की फिल्म ‘जय संतोषी मां' ने इस कमजोर पड़ते बाजार में नई जान फूंक दी थी। फिल्म में संतोषी माता का किरदार निभाने वाली अनीता गुहा ने एक इंटरव्यू में अपना अनुभव साझा किया था। इसके मुताबिक मुंबई के बांद्रा में माइथोलॉजिकल फिल्मों का मार्केट नहीं था, वहां ऐसी फिल्में नहीं चलती थीं। लेकिन, ‘जय संतोषी मां’ उसी इलाके के सिनेमाघर में 50 हफ्तों तक चली।
      इस फिल्म को सुपरहिट बनाने में महिलाओं का बहुत बड़ा हाथ रहा। फिल्म की दर्शक महिलाएं ही थीं। इसलिए उनके लिए कई सिनेमाघरों ने महिला शो रखे। ‘मैं तो आरती उतारू रे संतोषी माता की’ भजन आने पर औरतें आरती की थाल तैयार रखतीं. उषा मंगेशकर ने इस गाने को गाया था और सी अर्जुन ने संगीत दिया था। आगे चलकर इसी गाने को मंदिरों में संतोषी माता की आरती के रूप में भी इस्तेमाल किया जाने लगा। परदे की तरफ फूल उछालती, सिक्के फेंकती, गरबा करतीं महिलाएं सिनेमाघरों के बाहर ही अपनी चप्पल उतारकर आती थी। फिल्म खत्म होने के बाद जब सफाई कर्मचारी हॉल में आते, तो देखते कि परदे के सामने हजारों सिक्के पड़े है। ‘जय संतोषी मां’ की लागत को लेकर अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं। कोई कहता है कि इसका बजट तीन से साढ़े तीन लाख रुपए के बीच था। कोई बताता है कि फिल्म 11 लाख रुपए में बनी तो कोई 15 लाख मानता है। फिल्म के बजट को लेकर कोई एक आंकड़ा नहीं मिलता। लेकिन, बताया जाता है कि इसे कुछ लाख के सीमित बजट में बनाया गया था, पर फिल्म ने पैसों के अंबार लगा दिए। ट्रेड रिपोर्ट्स के मुताबिक ‘जय संतोषी माता’ ने 5 से 10 करोड़ रुपए के बीच की कमाई की थी। 
      ये बात उन दिनों की है, जब जोधपुर में मंडोर के पास संतोषी मां का एक मंदिर हुआ करता था। लोगों को पता भी नहीं था, कि ऐसी कोई देवी पुराणों में भी हैं। खुद इस फिल्म में संतोषी मां का किरदार करने वाली अभिनेत्री अनीता गुहा को नहीं पता था कि ऐसी कोई देवी हैं। जब ये फिल्म हिट हो गई, तो ये चर्चा चल पड़ी कि ये फिल्म बनाने का आइडिया किसे और कैसे आया। क्योंकि, पहले संतोषी माता को सीमित क्षेत्र में पूजा जाता था। विंडी डोनियर की किताब 'द हिंदू' के मुताबिक 1960 के दशक में उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में महिलाएं संतोषी माता की पूजा करती थी। उनके नाम पर 16 शुक्रवार के व्रत रखे जाते।
     फिल्म बनाने के आइडिया पर अलग-अलग दावे हैं। संतोषी माता के काफी गिने-चुने भक्त थे, उनमें से एक थीं निर्देशक विजय शर्मा की पत्नी। उनकी पत्नी ने विजय को प्रोत्साहित किया कि वे संतोषी माता पर फिल्म बनाएं, ताकि लोगों को उनके बारे में पता चले। लेकिन, फिल्म में बिरजू का किरदार निभाने वाले आशीष कुमार ऐसा नहीं मानते। उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि फिल्म का आइडिया उन्हें आया था। उनकी कोई संतान नहीं थीं। मनौती लेकर पत्नी ने 16 शुक्रवार के व्रत रखने शुरू किए। 11वें शुक्रवार तक उनकी पत्नी प्रेग्नेंट थीं। उन दोनों के यहां एक बेटी हुई। इंटरव्यू के मुताबिक, ‘संतोषी मां’ का आइडिया लेकर वे प्रोड्यूसर सतराम रोहिरा के पास गए। सतराम सिंधी फिल्मों के लिए गाते थे, लेकिन उन दिनों वो सिर्फ फिल्में प्रोड्यूस कर रहे थे। आशीष के मुताबिक सतराम को उनका आइडिया पसंद आया और फिल्म के लिए राज़ी हो गए। 
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Saturday, August 9, 2025

'देवदास' से 'सैयारा' तक दर्शकों को पसंद है प्रेम

     लंबे अरसे बाद देखा गया कि किसी प्रेम कहानी ने दर्शकों को इतना ज्यादा प्रभावित किया, कि वे उसमें डूब से गए। अनजान हीरो अहान पांडे और हीरोइन अनीता पड्डा को देखकर थियेटर में युवा दर्शक आंखों से आंसू बहाते दिखाई दिए। ये स्थिति बरसों बाद आई, जब किसी फिल्म ने दर्शकों के दिलों पर इतना असर किया। याद किया जाए, तो प्रेम कहानियों ने हमेशा ही परदे पर जादू किया है। 'देवदास' से शुरू हुई ऐसे कथानक मुगल-ए-आजम, बॉबी, एक दूजे के लिए, हीरो और 'बेताब' से आज तक पसंद किए जाते हैं। खास बात यह भी ऐसी भावनात्मक कहानियों में नए चेहरों को ज्यादा पसंद किया गया। 'सैयारा' इसी श्रृंखला की कड़ी है। 

- हेमंत पाल

    प्यार एक जज़्बात है। किशोर से लेकर अधेड़ व्यक्ति तक को सच्चे प्यार की तलाश होती है। स्वरूप चाहे अलग हो, मगर सच्चा प्यार सबकी चाहत होती है। सिर्फ फिल्म के परदे पर ही नहीं, आम लोगों की जिंदगी में भी प्रेम कहानियां होती है। लेकिन, जब दर्शक उन्हें परदे पर देखता है, तो उसे वो 'लार्जर देन लाइफ' नजर आती हैं। असल में दर्शक फिल्मों के जरिए अपने प्यार के सपनों को पूरा करने की कल्पना करता है। यही वजह है कि फिल्मों में प्रेम कहानियों पर बनी फिल्में ज्यादा पसंद की जाती और बॉक्स ऑफिस पर ऐसी फ़िल्में कमाई का नया रिकॉर्ड बनाती है। दरअसल, सिनेमा में प्रेम कथाओं का इतिहास बेहद समृद्ध और विविधता से भरा रहा है। शुरुआती दौर से आज तक प्रेम, रोमांस और कोमल भावनाओं को प्रमुख विषय के रूप में फिल्माया जाता रहा है, जो दर्शकों की भावनाओं के साथ गहराई से जुड़ता है। फिल्म इतिहास के पन्ने पलटे जाएं तो 1930 से 1950 के दशक में प्रेम कहानियों को सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों के संदर्भ में दर्शाया गया था। उस समय काल में 'देवदास' जैसी फिल्में बनी जिसने प्रेम, त्याग और सामाजिक बंधनों जैसे मसलों को उजागर किया। इस दौर में प्रेम को आदर्शवादी और भावनात्मक रूप से चित्रित किया जाता था। 
    इसके बाद फ़िल्में आजादी की कहानियों में उलझ गई। 1960-70 का दशक फिर प्रेम कहानियों से गुलजार रहा। इस दौरान प्रेम कहानियों में अधिक यथार्थवादी और समकालीन विषयों को शामिल किया गया। 'प्रेम कहानी' और 'लव स्टोरी' जैसी फिल्मों ने प्रेम और व्यक्तिगत संघर्षों के जटिल पहलुओं को दर्शाया। मनोरंजन के साथ इन फिल्मों ने प्रेम, दोस्ती और पारिवारिक रिश्तों के बदलते स्वरूपों पर भी प्रकाश डाला। 1980-90 के दशक की प्रेम कहानियों में संगीत, नृत्य और भावनात्मक दृश्यों का अधिक उपयोग किया गया। 'मैंने प्यार किया' और 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' जैसी फिल्मों ने युवा दर्शकों को आकर्षित किया और प्रेम को एक सुखद और आशावादी दृष्टिकोण से चित्रित किया। इन फिल्मों ने प्रेम, दोस्ती, और परिवार के महत्व पर जोर दिया। लेकिन, 2000 के बाद की लव स्टोरी में सामाजिक मुद्दे, अंतर-सांस्कृतिक प्रेम और प्रेम के विभिन्न रूप शामिल किए गए। 'गदर' और 'तेरे नाम' जैसी फिल्मों ने प्रेम, देशभक्ति और सामाजिक संघर्षों के बीच के जटिल संबंधों को उजागर किया। सच्ची घटनाओं पर बनी 'छपाक' जैसी फ़िल्में भी पसंद की गई।  
अनोखा नहीं, पर 'सैयारा' में भावनात्मक मस्का 
      'सैयारा' की सफलता की एक बड़ी वजह यह भी मानी जा सकती है कि दर्शक ओटीटी की उन फिल्मों और वेब सीरीज से ऊब चुके हैं, जिनमें हिंसा और खून खराबा के अलावा कुछ नहीं होता। रणवीर कपूर की 'एनिमल' जैसी फिल्में भी कम नहीं है। ऐसे माहौल में दर्शकों को कुछ अलग से मनोरंजन की जरुरत थी, जिसे 'सैयारा' ने काफी हद तक पूरा किया। देखा जाए तो फिल्म के कथानक में कोई नयापन नहीं है, जो दर्शकों को बांधकर रखे। ये फिल्म दक्षिण कोरिया की 2004 में आई फिल्म ;ए मोमेंट टू रिमेंबर' का अनऑफिशियल अडॉप्टेशन है। इसी कहानी पर 2008 में अजय देवगन की फिल्म 'मैं, तुम और हम' आ चुकी है। इसमें काजोल का किरदार अल्जाइमर से पीड़ित होता है। इस फिल्म से प्रभावित 'सैयारा' की कहानी लिखते समय ध्यान रखा गया कि खून खराबा से ऊबे दर्शकों को कैसे भावनात्मक तरीके से रुलाया जाए। नायक और नायिका में तालमेल भी मुश्किल से बनता है, पर जब दोनों एक-दूसरे की पीड़ा को समझते हैं, तो जुड़ जाते हैं। शराबी बाप का परेशान बेटा और अल्जाइमर की मरीज लड़की में नजदीकी बढ़ जाती है और इमोशनल दर्शक फिल्म को हिट करा देते हैं।    
'सैयारा' ने बदला दर्शकों का मूड  
    आज के दौर में प्रेम कथा की नई परिभाषा रची है फिल्म 'सैयारा' ने। बिना प्रचार के चुपके से आई नए कलाकारों की इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर कमाई का नया कीर्तिमान रच दिया। देखा जाए, तो फिल्म की कहानी में कोई नयापन नहीं है। फिर भी इस फिल्म में ऐसा क्या है, जो इसने इतनी सफलता और लोकप्रियता दी। 'सैयारा' की नई जोड़ी अहान पांडे और अनीता पड्डा में दर्शकों को पेड़ की नई कोपल सा अहसास हुआ। इसी ताजगी ने 'सैयारा' को सफलता दिलाई। हिंदी सिनेमा खुद लगभग सवा सौ साल की यात्रा पूरी कर चुका है।
     देखा जाए तो इन सालों में दर्शकों को हमेशा से युवा सितारों की चाहत रही, जो बड़े परदे के जरिए उनके दिलों को धड़काए रखे और ताजगी का अहसास कराए। लेकिन, सिनेमा की बाल्यावस्था के दौरान हिंदी सिनेमा को ऐेसे सितारों ने धड़काया, जो खुद तो जवानी की दहलीज पार कर चुके थे। याद कीजिए उस दौर के उन हीरो को जो कहीं से युवा दिखाई नहीं देते थे। फिर भी दर्शक उनके आकर्षण में बंधे रहे। इसलिए कि तब समाज में सिनेमा को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था। इसलिए सभ्य समाज के कम ही लोग इससे जुड़ पाए थे। जो जुड़े वे भी, वह अपनी जवानी को पार कर चुके थे। 
लव स्टोरी के जरिए नए चेहरों का आगाज
    सिनेमा में प्रेम कहानियां वाली फिल्मों में नए चेहरों को सामने लाने की एक परंपरा सी रही है। इतिहास गवाह है कि फिल्मों में नई उम्र की नई फसल लगाने के लिए प्यार की खेती सबसे ज्यादा उपजाऊ रहती है। फिर चाहे वह बॉबी (ऋषि कपूर-डिंपल कपाड़िया), ट्विंकल खन्ना-बॉबी देओल (बरसात), कुमार गौरव-विजयता पंडित (लव स्टोरी), संजय दत्त-टीना मुनीम (रॉकी),सनी देयोल-अमृता सिंह (बेताब), कमल हासन-रति अग्निहोत्री (एक दूजे के लिए), आमिर खान (कयामत से कयामत तक) हो या सलमान खान-भाग्यश्री (मैंने प्यार किया) हो। 
     ये सभी पहली बार परदे पर आए थे। अजय देवगन-मधुश्री (फूल और कांटे), रितिक रोशन-अमीषा पटेल (कहो ना प्यार है), राहुल रॉय-अनु अग्रवाल (आशिकी), शाहिद कपूर-अमृता राव (इश्क-विश्क), दीपिका पादुकोण-शाहरुख़ खान (ओम शांति ओम), इमरान खान (जाने तू या जाने ना), रणबीर सिंह-अनुष्का सिंह (बैंड बाजा बारात), आलिया भट्ट-सिद्धार्थ-वरुण (स्टूडेंट ऑफ द ईयर) आदि भी नए चेहरे थे।
ये हैं परदे की अमर प्रेम कहानियां
    प्रेम कहानियों के मामले में फिल्म इंडस्ट्री हमेशा से अमर रहा है। 'मुगल-ए-आजम' और 'देवदास' से लगाकर 'सैयारा' तक हर बार प्यार के रूहानी जज्बात को दर्शकों ने पसंद कर अपने दिलों में बसाया। हिंदी फिल्मों की अमर कही जाने वाली प्रेम कहानियों की फेहरिस्त बहुत लंबी और समृद्ध है। मुगल-ए-आजम, आवारा, कागज के फूल, प्यासा, साहिब बीवी और गुलाम, पाकीजा, कश्मीर की कली, आराधना, सिलसिला, दिल है कि मानता नहीं, साजन, दिल, उमराव जान, 1942 ए लव स्टोरी,दिलवाले, दुल्हनिया ले जाएंगे, कुछ कुछ होता है, रंगीला, कल हो न हो, जब वी मेट जैसी फिल्मों के बाद फिल्मों में यंग जनरेशन के प्यार को परिभाषित करने के लिए प्रेम कथाएं रची गई। जिसमें हीरो, रहना है तेरे दिल में, बचना ऐ हसीनों, सलाम नमस्ते, लव आजकल, ये जवानी है दीवानी, वेक अप सिड, अजब प्रेम की गजब कहानी, रॉकस्टार, बर्फी, टू स्टेट्स, आशिकी टू,कॉकटेल, शुद्ध देसी रोमांस, तनु वेड्स मनु, मसान, तमाशा, ऐ दिल है मुश्किल, बरेली की बर्फी जैसी कई फिल्में रही जिनकी गिनती तो ख़त्म होने से रही। 
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विशाल रूप में बड़े परदे पर फिर अवतरित होंगे 'राम'

     हिंदी सिनेमा में 'रामकथा' और 'महाभारत' दो ऐसे पौराणिक प्रसंग हैं, जो फिल्म इतिहास में दर्शकों के सबसे पसंदीदा विषय रहे। फिल्म निर्माण के शुरुआती दौर में भी सबसे ज्यादा चलने वाली फिल्म रामायण पर आधारित 'लंका दहन ही थी। इसके बाद भी राम, सीता, हनुमान और रावण इन चार पात्रों पर केंद्रित कथानक हर दशक में फ़िल्में बनती और पसंद की जाती रही। इसी एक कथा को कई बार अलग-अलग प्रसंग जरिए परदे पर उतारा गया। सिर्फ बड़े परदे पर ही नहीं, छोटे परदे पर भी राम-रावण कथा कई बार फिल्माई गई। अब बड़े परदे पर राम कथा को लेकर सबसे भव्य और महंगा प्रयोग हो रहा है। बताते हैं कि 400 करोड़ के बजट पर दो भागों में 'रामायणम' नाम से बड़े कलाकारों को लेकर फिल्म बनाई जा रही है। 
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- हेमंत पाल

     धार्मिक कथाओं में हिंदी सिनेमा का सबसे लोकप्रिय पात्र हैं भगवान राम। सवा सौ साल पहले सिनेमा के शैशव काल में फिल्मकारों ने रामकथा के सहारे ही अपनी नैया पार लगाई थी। क्योंकि, तब माइथोलॉजिकल कथाओं के जरिए ही दर्शकों को सिनेमाघरों तक लाया जाता था। यही वजह है कि भगवान राम की कथा को जनता तक पहुंचाने में सिनेमा का योगदान को बहुत बड़ा माना जाता है। बड़े परदे पर राम जी कि कथा का सिलसिला उस दौर में ही शुरू हो गया था, जब भारत में फिल्में बनना शुरू हुई और उनमें आवाज नहीं होती थी। हिंदी सिनेमा के पुरोधा कहे जाने वाले दादा साहेब फाल्के ने मूक फिल्मों के दौर में 1917 में ‘लंका दहन’ से राम नाम का जो पौधा लगाया था, उसे जीवी साने ने 1920 में ‘राम जन्म’ से आगे बढ़ाया। फिर वी शांताराम ने 1932 में ‘अयोध्या का राजा’ से इस परंपरा को गति दी, तो विजय भट्ट ने 1942 में ‘भरत मिलाप’ और 1943 में ‘राम राज्य’ से इसे सिनेमा के लिए एक आसान और दर्शकों का पसंदीदा विषय बना दिया।
     बताते हैं कि दादासाहब ने जब सिनेमा हॉल में 'द लाइफ ऑफ क्राइस्ट' (1906) देखी, तो स्क्रीन पर जीसस के चमत्कार देखकर उन्हें लगा कि इसी तरह भारतीय देवताओं राम और कृष्ण की कहानियां भी परदे पर आ सकती हैं। इसी विचार के साथ उन्होंने 'मूविंग पिक्चर्स' के बिजनेस में कदम रखा था। भारतीय माइथोलॉजी पर आधारित 'राजा हरिश्चंद्र' बनाने के बाद दादा साहब ने अपनी दूसरी फिल्म की कहानी के लिए 'रामकथा' को चुना। सिनेमा में इस कथानक को उतारने की ये पहली कोशिश ‘लंका दहन’ जबरदस्त कामयाब हुई और बाद के सालों में इसने, हिंदी फिल्मों से लेकर साउथ तक के कई फिल्ममेकर्स को इस तरह की फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया। 
     देखा गया कि फिल्म इतिहास के हर दशक में किसी न किसी रूप में राम अवतरित होते रहे हैं। शुरुआती दिनों में ‘अयोध्या चा राजा’ ने टॉकीजों में दर्शकों की श्रद्धा बरसाकर इस परंपरा को बढ़ाया। कहा जा सकता है कि सिनेमा में कोई चले या नहीं, राम का नाम हमेशा अपना असर दिखाता रहा। इसके बाद 1961 में बाबूभाई मिस्त्री की 'संपूर्ण रामायण' ने फिर दर्शकों को टॉकीज में सियाराम बुलवा दिया था। इस फिल्म में रावण और हनुमान को हवा में उड़ता दिखाकर, लंका दहन और राम-रावण युद्ध के युद्ध के दृश्य फिल्माकर दर्शकों को नया अनुभव दिया था। रावण की भूमिका बीएम व्यास ने रावण बनकर अपने आपको उस ज़माने का चर्चित खलनायक साबित किया था, जो आसान बात नहीं थी। राम, रामायण और हनुमान पर केंद्रित फिल्मों के इतिहास के बाद अब एक बार फिर बड़े परदे पर राम भगवान अवतरित हो रहे हैं। सिनेमा में राम को लेकर कई बार प्रयोग हुए हैं। राम, सीता और रावण की कहानी बरसों से सुनी और सुनाई जाती रही है। फिर भी इसे लेकर दर्शकों की उत्सुकता बनी है। इसलिए कि उसका प्रस्तुतीकरण हमेशा ही चौंकाने वाला रहा।
     पौराणिक कथाओं में 'रामायण' और 'महाभारत' दो ऐसे पौराणिक प्रसंग हैं, जो फिल्म निर्माण की शुरुआत से अब तक फिल्मकारों के सबसे पसंदीदा विषय रहे। शुरुआती दौर में भी रामायण पर फिल्म बनी थी। बाद में भी राम कथा को कई बार अलग-अलग एंगल से परदे पर दिखाया जाता रहा। छोटे परदे पर भी राम-रावण की कथा फिल्माई गई। अब बड़े परदे पर राम कथा को लेकर सबसे भव्य और खर्चीला प्रयोग हो रहा है। नितेश तिवारी की 4000 करोड़ की फिल्म 'रामायणम' को लेकर क्रेज़ होने का कारण इसके कलाकारों के साथ इसका भव्य प्रस्तुतीकरण भी है। इसमें राम का किरदार रणबीर कपूर और रावण का दक्षिण के सितारे यश निभा रहे हैं। सनी देओल जैसे कलाकार का हनुमान का किरदार निभाना भी कम आश्चर्यजनक नहीं है।
    इस 'रामायणम' फिल्म की पहली झलक को जिस तरह पसंद किया गया, वो इस बात का प्रमाण है, कि इस फिल्म के निर्माण का स्तर क्या होगा। इसके रिलीज हुए पहले टीजर में रणबीर कपूर और यश की पहली झलक देखने को मिली। दो हिस्सों में बनने वाली इस फिल्म का पहला हिस्सा अगले साल (2026) में परदे पर आएगा। नितेश तिवारी की इस फिल्म के बजट ने हर किसी को हैरानी में डाल दिया। फिल्म के प्रोड्यूसर नमित मल्होत्रा ने हाल ही में खुलासा किया कि इस मोस्ट अवेटेड माइथोलॉजिकल फिल्म का बजट 4000 करोड़ रुपए है। ये भारत की अब तक की सबसे महंगी फिल्म होगी। फिल्म से इतनी कमाई हो सकेगी या नहीं अभी इस बारे में संशय है। वैसे बॉक्स ऑफिस का फार्मूला है, कि किसी भी फिल्म को हिट होने के लिए उसे अपनी लागत से दोगुना कमाई करना होती है। यदि 'रामायणम' के बारे में बात की जाए को दोनों पार्ट्स को हिट होने के लिए 8000 करोड़ रुपए कमाना पड़ेंगे। लेकिन, जिस तरह फिल्म का निर्माण हो रहा है, ये आंकड़ा बड़ा नहीं लग रहा।  
    'रामायणम' को इतने बड़े खर्च से बनाने का फैसला इसलिए आश्चर्य की बात है, कि फिल्म के मूल कथानक से देश का बच्चा बच्चा वाकिफ है। राम-रावण युद्ध का हर दृश्य दर्शक कई बार फिल्मों और सीरियल में देख चुके हैं। उसी को फिर फिल्माया जाएगा, वो भी बिना किसी बदलाव के। क्योंकि, भगवान राम जैसे किरदार की लोकप्रियता का आलम यह है कि फिल्म जगत के 112 साल के इतिहास में हर दशक में सिनेमा के परदे व टीवी पर किसी-न-किसी रूप में राम अवतरित होते रहे हैं। गिनती लगाई जाए, तो अभी तक 50 से ज्यादा फिल्में और 18 टीवी शो इसी रामकथा पर बन चुके हैं। इनमें 17 हिंदी में और तेलुगु में सबसे ज्यादा 18 फिल्में बनी। अभी तक देश में अलग-अलग भाषाओं में जितनी भी पौराणिक फिल्में बनी, उनमें राम-रावण युद्ध पर बनी फिल्में ही सबसे ज्यादा पसंद की गई। याद किया जाए तो रामानंद सागर के सीरियल 'रामायण' ने तो दर्शकों की श्रद्धा के रिकॉर्ड तोड़ दिए थे। 1980 व 1990 का दशक इसी सीरियल के नाम रहा।
        रामकथा पर आधारित अधिकांश फिल्मों ने अच्छी कमाई की। 1917 में दादा साहब फाल्के के निर्देशन में बनी पहली फिल्म ‘लंका दहन’ (1917) देखने वाले दर्शकों की सिनेमाघर के बाहर कतार लगी रहती थी। मूक फिल्मों के दौर में भी रामकथा पर बनी 'लंका दहन' ऐसी फिल्म आई थी, जिसने दर्शकों की लाइन लगवाई थी। मुंबई के थिएटर्स में ये फिल्म 23 हफ्तों तक चली। इससे ऐसी कमाई हुई थी कि पैसों से लदे बोरे बैलगाड़ी पर प्रोड्यूसर के घर भेजे जाते थे। 'लंका दहन' में अन्ना सालुंके ने सिनेमा के इतिहास का पहला डबल रोल किया था। उन्होंने इस फिल्म में राम के साथ सीता का भी किरदार निभाया था। उन्होंने फिल्म में राम व सीता दोनों के किरदारों को अपने बेहतरीन अभिनय से जीवंत बनाया था। क्योंकि, उस दौर में महिलाओं का फिल्मों में काम करना अच्छा नहीं समझा जाता था। इसलिए महिलाओं के किरदार भी पुरुष निभाया करते थे। इससे पहले दादा साहब फाल्के की फिल्म ‘राजा हरिशचंद्र’ में अन्ना सालुंके तारामती का किरदार निभा चुके थे। यही वजह रही कि फाल्के ने सीता की भूमिका भी उन्हीं को सौंपी। 
उस दौर में पूजे जाने लगे थे प्रेम अदीब  
    मूक फिल्मों के समय में राम का किरदार निभाने वाले अभिनेताओं में 'राम राज्य' के हीरो प्रेम अदीब को सबसे ज्यादा पसंद किया जाता रहा। उनके फोटो पर भगवान की तरह माला चढ़ाई जाती थी। इसी तरह 'संपूर्ण रामायण' में राम का किरदार निभाकर महिपाल भी चर्चित हुए। फिल्मों के लंबे दौर के बाद दूरदर्शन पर 'रामायण' सीरियल में राम की भूमिका निभाने वाले अरुण गोविल को तो देशभर में राम के अवतार के रूप में ही देखा जाने लगा था। आज भी उनकी यही छवि है। 1997 में प्रसारित लोकप्रिय सीरियल 'जय हनुमान' में अभिनेता सिराज मुस्तफा खान ने भगवान राम का किरदार निभाया था। उन्हें भी लोगों ने पसंद किया। मूक फिल्मों के दौर में तो खलील अहमद भी 1920 से 1940 तक सक्रिय रहे। उन्होंने सती पार्वती, महासती अनुसुया, रुक्मिणी हरण, लंका नी लाडी और द्रौपदी जैसी फिल्मों में कृष्ण व राम के किरदार निभाए थे। 
   वर्ष 1942 में आयी भरत मिलाप और वर्ष 1943 में रिलीज हुई राम राज्य में प्रेम अदीब ने ही प्रभु राम की भूमिका निभाई थी। इन दोनों फिल्मों ने उनको उस दौर का एक सफल अभिनेता बनाया था। उनकी निभाई राम की भूमिका लोगों को बेहद पसंद आई। यही वजह रही कि इसके बाद रामायण की कथा पर बनी 6 फिल्मों रामबाण (1948), राम विवाह (1949), रामनवमी (1956), राम हनुमान युद्ध (1957), राम लक्ष्मण (1957), राम भक्त विभीषण (1958) जैसी फिल्मों में वे राम बने। प्रेम अदीब ने तो 'राम राज्य' की शूटिंग के दौरान नॉनवेज तक खाना छोड़ दिया था। 
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'जय संतोषी मां' की चमत्कारिक सफलता के 50 साल

   हिंदी फिल्मों में जब भी धर्म का जिक्र हुआ, दर्शकों ने उस फिल्म को हाथों-हाथ लिया! भगवान की शरण में फिल्मों ने कई बार बड़ी सफलता का स्वाद चखा है। ब्लैक एंड व्हाइट के ज़माने में आई 'रामराज्य' और उसके बाद आई फिल्मों में जब भी परदे पर भगवान उतरे, फ़िल्मकार को उनका आशीर्वाद जरूर मिला! यही वजह है कि फिल्म इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा कमाई का रिकॉर्ड भी एक धार्मिक फिल्म 'जय संतोषी माँ' के नाम है। इसकी लागत चंद लाख थी, पर कमाई करोड़ों में रही। लागत और कमाई का यही अंतर आज भी रिकॉर्ड है। फिल्म ने धार्मिक आस्था का ऐसा माहौल बनाया था कि सिनेमा हॉल में लोग चप्पल उतारकर आते थे। जब परदे पर संतोषी माता की आरती होती, तो दर्शक खड़े हो जाते थे और फिर सिक्के चढ़ाते। फिल्म इतिहास में आस्था का ऐसा ज्वार कभी नहीं देखा गया!
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- हेमंत पाल

       वैसे तो 1975 के साल को अमिताभ बच्चन के साल के तौर पर याद किया जाता है। क्योंकि, इस साल उनकी दो फिल्में 'शोले' और 'दीवार' सबसे ज्यादा कमाई करने वाली टॉप पांच फिल्मों में शामिल रहीं। दर्शकों को लगा था कि 'जंजीर' से शुरू हुआ ये सिलसिला लंबा खिंचेगा। लेकिन, तभी रिलीज हुई 'जय संतोषी' मां ने फिल्म पंडितों के समीकरण बदल दिए। जबकि, थिएटर वाले भूल चुके थे, कि कोई नई फिल्म उन्होंने बीते शुक्रवार लगाई है। फिल्म ने पहले शो में 56 रुपए  दूसरे में 64 और शाम के शो की कमाई रही 98 रुपए रही थी। नाइट शो का कलेक्शन मुश्किल से सौ रुपए हुआ था। लेकिन, सोमवार की सुबह जो हलचल शुरू हुई, उससे सब चमत्कृत थे। जहां भी ये फिल्म लगी थी, वहां दर्शक टूट पड़े। थियेटर की सफाई करने वाले शो के बीच में उछाली गई चिल्लर बटोर कर मालामाल हो गए। 'जय संतोषी मां' ने जो किया उसे चमत्कार ही कहा जाना चाहिए। इस फिल्म ने अपनी लागत का कई गुना बिजनेस करके 'शोले' जैसी फिल्म को टक्कर दी थी! जिस दिन 'शोले' रिलीज हुई, उसी दिन 'जय संतोषी माँ' फिल्म भी रिलीज हुई थी। लेकिन, दोनों ही फिल्मों के कथानक में विरोधाभास था। 'शोले' में हिंसा की भरमार थी, जबकि 'जय संतोषी माँ' के जरिए आस्था और विश्वास का संदेश था। दोनों फिल्मों का मजेदार तथ्य यह था कि 'जय संतोषी माँ' का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 'शोले' के मुकाबले अधिक था! 'शोले' में गब्बर सिंह की गोलियां खून बिखेर रही थी, जबकि 'जय संतोषी माँ' में दर्शक सिनेमाघर में आरती गा रहे थे। 
    आज फिर संतोषी माँ का जिक्र इसलिए कि इस फिल्म को रिलीज हुए 15 अगस्त को 50 साल पूरे हो गए। 'जय संतोषी माँ' अपने समय काल में जबरदस्त चली थी! दर्शकों ने इसे सिर्फ फिल्म की तरह नहीं लिया, बल्कि सिनेमाघर को मंदिर की तरह पूजने भी लगे थे। दर्शक हॉल में चप्पल-जूते पहनकर नहीं आते थे! श्रद्धा इतनी उमड़ती थी, कि आरती के वक़्त लोग सीट से खड़े होकर तालियां बजाते और सिक्के चढ़ाने लगते थे! गांवों और शहरों में हर जगह श्रद्धा का सैलाब उमड़ पड़ा था। हर शुक्रवार महिलाएं संतोषी माता का व्रत करने लगी! मंदिरों में संतोषी माता की मूर्ति स्थापित की जाने लगी थी। संतोषी माता की व्रत कथा सुनी और सुनाई जाने लगी! गुड़-चने का प्रसाद बंटने लगा। लड़कियों से लेकर बूढ़ी महिलाएं तक शुक्रवार व्रत रखकर उद्यापन करने लगी थी! 
धार्मिक आस्था का अद्भुत ज्वार 
    इस फिल्म के बाद भी संतोषी माता को लेकर आस्था का ज्वार कम नहीं हुआ! यही कारण है कि पांच दशक बाद भी इस फिल्म की सफलता और उससे जुड़े किस्से भूले नहीं। फिल्म इंडस्ट्रीज में एक्शन के साथ-साथ धर्म और ईश्वर के चमत्कारों को दिखाने वाली फिल्मों का हमेशा ही वर्चस्व रहा है। 'बजरंगी भाईजान' का हीरो सलमान खान को हनुमान भक्त बताया गया। ‘अग्निपथ’ रितिक रोशन गणेश का गाना भगवान गणेश को समर्पित था। शाहरुख खान ने भी जब ‘डॉन’ का रीमेक बनाया तो गणेश की स्तुति की! अमिताभ बच्चन की तो करीब सभी हिट फिल्मों में भगवान या अल्लाह का आशीर्वाद साथ चला। कुली, अमर-अकबर- एंथनी, सुहाग हो या ‘दीवार’ सभी में आस्था का कोई न कोई तड़का लगा है। अक्षय कुमार ने भी जब ‘खिलाड़ियों के खिलाड़ी’ में जय शेरावालिए तेरा शेर ... गाया तो धूम मच गई। जब बॉलीवुड में हर तरफ भगवानों का ही बोलबाला है। ऐसे में 'संतोषी माँ' का जादू आज भी देश के कई इलाकों में सिर चढ़कर बोलता है। 
चप्पल उतारकर आते थे दर्शक 
   जब यह फिल्म रिलीज हुई, सिनेमा हॉल के बाहर एक अनोखा नजारा देखने को मिलता था। आसपास के गांवों और कस्बों से महिलाएं, जिनमें ज्यादातर बुजुर्ग होती थीं, यह फिल्म देखने आती थी। हॉल के अंदर आने से पहले कई महिलाएं चप्पल बाहर ही उतार देती थी। वे स्क्रीन पर चल रही कहानी को श्रद्धा और आश्चर्य के साथ देखती थीं, जैसे वे किसी सत्संग में शामिल हों। ‘जय संतोषी मां' उनके लिए सिर्फ एक धार्मिक फिल्म नहीं, बल्कि जीवन को प्रभावित करने वाला प्रसंग था। यह सब देश के सैकड़ों छोटे शहरों और गांवों में महीनों तक दोहराया गया। पहली बार निर्देशक बने विजय शर्मा की इस फिल्म ने जो इतिहास बनाया, वो तक टूटा नहीं। 1975 के ट्रेड गाइड की सालाना रिपोर्ट में ‘जय संतोषी मां' और ‘शोले' को ‘दीवार' से ऊपर ब्लॉकबस्टर का दर्जा दिया गया था। कई शहरों में इस फिल्म ने गोल्डन और सिल्वर जुबली मनाई। 'फिल्म इन्फॉर्मेशन पत्रिका' के अनुसार, बंबई के मलाड में महिलाओं के लिए सुबह 9 बजे का अलग शो शुरू किया गया था। इस फिल्म का असर सिर्फ कमाई तक सीमित नहीं था। 
    मूक फिल्मों के दौर से 1960 तक, बंबई के सिनेमा बाजार में धार्मिक फिल्में लगातार बनती रही। पढ़े-लिखे शहरी लोग इनका मजाक उड़ाते थे, लेकिन आम लोगों में इनका बड़ा प्रशंसक वर्ग था। फिल्म के शुरुआती क्रेडिट हिंदी में लिखे गए थे। 1970 के दशक में धार्मिक फिल्मों का निर्माण कम हो गया। 1973 में ‘संपूर्ण रामायण' को छोड़कर ज्यादातर फिल्में असफल रहीं। सतराम रोहिरा की फिल्म ‘जय संतोषी मां' ने इस कमजोर पड़ते बाजार में नई जान फूंक दी थी। फिल्म में संतोषी माता का किरदार निभाने वाली अनीता गुहा ने एक इंटरव्यू में अपना अनुभव साझा किया था। इसके मुताबिक मुंबई के बांद्रा में माइथोलॉजिकल फिल्मों का मार्केट नहीं था, वहां ऐसी फिल्में नहीं चलती थीं। लेकिन, ‘जय संतोषी मां’ उसी इलाके के सिनेमाघर में 50 हफ्तों तक चली।
फिल्म की सफलता में महिलाओं का हाथ 
    इस फिल्म को सुपरहिट बनाने में महिलाओं का बहुत बड़ा हाथ रहा। दर्शक महिलाएं ही थीं। इसलिए उनके लिए कई सिनेमाघरों ने महिला शो रखे। ‘मैं तो आरती उतारू रे संतोषी माता की’ भजन आने पर औरतें आरती की थाल तैयार रखतीं. उषा मंगेशकर ने इस गाने को गाया था और सी अर्जुन ने संगीत दिया था। आगे चलकर इसी गाने को मंदिरों में संतोषी माता की आरती के रूप में भी इस्तेमाल किया जाने लगा। परदे की तरफ फूल उछालती, सिक्के फेंकती, गरबा करतीं महिलाएं सिनेमाघरों के बाहर अपनी चप्पल उतारकर आती थी। 
     फिल्म खत्म होने के बाद जब सफाई कर्मचारी हॉल में आते, तो देखते कि परदे के सामने हजारों सिक्के पड़े है। ‘जय संतोषी मां’ की लागत को लेकर अलग-अलग आंकड़े मिलते हैं। कोई कहता है कि इसका बजट तीन से साढ़े तीन लाख रुपए के बीच था। कोई बताता है कि फिल्म 11 लाख रुपए में बनी तो कोई 15 लाख मानता है। फिल्म के बजट को लेकर कोई एक आंकड़ा नहीं मिलता। लेकिन, बताया जाता है कि इसे कुछ लाख के सीमित बजट में बनाया गया था, पर फिल्म ने पैसों के अंबार लगा दिए। ट्रेड रिपोर्ट्स के मुताबिक ‘जय संतोषी माता’ ने 5 से 10 करोड़ रुपए के बीच की कमाई की थी। 
देवी की लोकप्रियता फिल्म से कैसे जुड़ी 
      ये बात उन दिनों की है, जब जोधपुर में मंडोर के पास संतोषी मां का एक मंदिर हुआ करता था। लोगों को पता भी नहीं था, कि ऐसी कोई देवी पुराणों में भी हैं। खुद इस फिल्म में संतोषी मां का किरदार करने वाली अभिनेत्री अनीता गुहा को नहीं पता था कि ऐसी कोई देवी हैं। जब ये फिल्म हिट हो गई, तो ये चर्चा चल पड़ी कि ये फिल्म बनाने का आइडिया किसे और कैसे आया। क्योंकि, पहले संतोषी माता को सीमित क्षेत्र में पूजा जाता था। विंडी डोनियर की किताब 'द हिंदू' के मुताबिक 1960 के दशक में उत्तर प्रदेश के कई इलाकों में महिलाएं संतोषी माता की पूजा करती थी। उनके नाम पर 16 शुक्रवार के व्रत रखे जाते। 
     फिल्म बनाने के आइडिया पर अलग-अलग दावे हैं। संतोषी माता के काफी गिने-चुने भक्त थे, उनमें से एक थीं निर्देशक विजय शर्मा की पत्नी। उनकी पत्नी ने विजय को प्रोत्साहित किया कि वे संतोषी माता पर फिल्म बनाएं, ताकि लोगों को उनके बारे में पता चले। लेकिन, फिल्म में बिरजू का किरदार निभाने वाले आशीष कुमार ऐसा नहीं मानते। उन्होंने अपने एक इंटरव्यू में कहा था कि फिल्म का आइडिया उन्हें आया था। उनकी कोई संतान नहीं थीं। मनौती लेकर पत्नी ने 16 शुक्रवार के व्रत रखने शुरू किए। 11वें शुक्रवार तक उनकी पत्नी प्रेग्नेंट थीं। उन दोनों के यहां एक बेटी हुई। इंटरव्यू के मुताबिक, ‘संतोषी मां’ का आइडिया लेकर वे प्रोड्यूसर सतराम रोहिरा के पास गए। सतराम सिंधी फिल्मों के लिए गाते थे, लेकिन उन दिनों वो सिर्फ फिल्में प्रोड्यूस कर रहे थे। आशीष के मुताबिक सतराम को उनका आइडिया पसंद आया और फिल्म के लिए राज़ी हो गए। 
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Wednesday, July 30, 2025

सौ बरस पुराने बॉलीवुड में ‘सैयारा’ ने बनाया मोहब्बत का माहौल!


- हेमंत पाल

     हाल ही में प्रदर्शित यशराज की नई फिल्म 'सैयारा' बॉक्स ऑफिस पर कमाई और लोकप्रियता के नए-नए कीर्तिमान रच रही है। इस फिल्म की कहानी में कुछ नयापन नहीं है। तो फिर चुपके से आकर पर्दे पर अवतरित इस फिल्म में ऐसा क्या है, जो इसने इतनी सफलता और लोकप्रियता प्रदान की! इसका सीधा सा जवाब यही है कि बुढियाते बॉलीवुड के जंगल में 'सैयारा' की नई जोड़ी अहान पांडे और अनीता पड्डा में दर्शकों को नव पल्लव और नवबहार के दर्शन हुए। इसी ताजगी ने 'सैयारा' को सफलता की सीढ़ी पर चढाया है। वैसे तो हिन्दी सिनेमा खुद ही लगभग सवा सौ साल की यात्रा पूरी कर चुका है। लेकिन, इन सवा सौ साल में दर्शकों को हमेशा से युवा सितारों की चाहत होती है, जो बड़े परदे के माध्यम से उनके दिलों को धड़काए रखे तथा हमेशा ताजगी का अहसास कराए। लेकिन, सिनेमा की बाल्यावस्था के दौरान हिंदी सिनेमा को ऐेसे सितारों ने धड़काया, जो खुद तो जवानी की दहलीज पार कर चुके थे। लेकिन उनके आकर्षण में दर्शक दर्शकों तक बंधे रहे। उस समय की बात इस मायने में अलग थी, कि तब सिनेमा को समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता था और सभ्य समाज के कम ही लोग इससे जुड़ पाए थे। जो जुड़े भी थे, वह अपनी जवानी को पार कर चुके थे। लेकिन, आज यह हालत नहीं है। युवकों में मूंछों की कोर निर्मित होते ही वे हीरो बनने की सोचता है तो टीनएज का खिताब पाते ही युवतियां भी कैमरे के सामने खड़ा होने का सपना संजोने लगती हैं।
    जब से सिनेमा ने ऐतिहासिक और पौराणिक काल से नाता तोड़ते हुए समाज और युवा समाज से नाता जोड़ा, परदे पर बाली उमर की प्रेम कहानियों ने जन्म लिया। ऐसी कहानियों को स्वाभाविकता देने के लिए युवा कलाकारों को ही सबसे ज्यादा पसंद किया जाता रहा है। यह सिलसिला पिछले एक दो दशक तक बदस्तूर जारी रहा। लेकिन, यदि आज के परिप्रेक्ष्य में बॉलीवुड के सफल सितारों पर नजर दौड़ाई जाए तो पता चलता है कि आज के लगभग सभी सफल सितारे जवानी की दहलीज तो क्या प्रौढ़ावस्था की सीमा रेखा को भी पार कर बुढ़ापे की ओर अग्रसर है। ऐसे में तो यही लगता है कि हमारा बॉलीवुड बुढा होता जा रहा है। पचास से लेकर सत्तर के दशक में हीरो ऐसे होते थे, जिनकी उम्र पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता था। तब हिंदी सिनेमा पर दिलीप कुमार, देव आनंद और राज कपूर की तिकड़ी ने बरसां तक राज किया। दर्शक इनकी अदाओं के इतने दीवाने थे, कि उन्होंने कभी इन सितारों की उम्र पर ध्यान नहीं दिया। देव आनंद तो ऐसे सदाबहार हीरो थे, जिन्होंने तीन-तीन पीढ़ियों के दर्शकों को अपने मोह जाल में उलझाए रखा। इन सितारों ने परदे पर भले ही जवानी को शिद्दत के साथ पेश किया, लेकिन खुद जवानी को पीछे छोड़ आए थे। 
    सत्तर के दशक में जब धर्मेंद्र, मनोज कुमार, विश्वजीत, शशि कपूर, जितेंद्र और राजेश खन्ना ने बॉलीवुड में पदार्पण किया तो वह भी एकदम जवान नहीं थे। इसके बावजूद उन्होंने हर दूसरी फिल्म में कॉलेज स्टूडेंट की भूमिकाएं निभाईं और दर्शकों ने इन्हें भी पसंद किया। खासकर जितेंद्र और राजेश खन्ना को तो जवान ही माना गया। देखा जाए तो परदे पर जवानी की ताजगी की शुरुआत तब हुई, जब राज कपूर ने 'मेरा नाम जोकर' के फ्लॉप होने के हादसे के बाद डिंपल और ऋषि कपूर को लेकर 'बॉबी' का निर्माण किया। इस जोड़ी को देखकर पहली बार यकीन हुआ कि जवानी क्या होती है! इसके बाद कमल हासन और रति अग्निहोत्री की जोड़ी ने 'एक दूजे के लिए' में जवान जोड़ी के रूप में बाली उमर को सलाम कहने के लिए आमदा किया। इस परम्परा को सचिन और रंजीता की जोड़ी ने 'अंखियों के झरोखे से' आगे बढाया। ऋषि कपूर ने नीतू सिंह और पूनम ढिल्लों के साथ मिलकर दर्शकों को जवान बनाए रखने में मदद की।
    आज जिन सितारों को हिट स्टार का दर्जा मिला। उनमें से लगभग सभी ने उस समय सिनेमा में प्रवेश किया, जब वे लगभग जवान थे। इनमें शाहरुख खान, सलमान खान, अजय देवगन, आमिर खान, अक्षय कुमार, गोविंदा, संजय दत्त, सुनील शेट्टी, जैकी श्रॉफ और सनी देओल शामिल हैं। जिस समय शाहरुख खान की 'दीवाना' प्रदर्शित हुई उनके चेहरे से जवानी रही थी। आमिर खान की कयामत से कयामत तक में जूही चावला के साथ उनकी जोड़ी जवां दिलों की धड़कन बनी हुई थी। जैकी श्रॉफ और मीनाक्षी शेषाद्री की 'हीरो' में वाकई हीरो नौजवान था। सलमान की पहली हिट फिल्म 'मैंने प्यार किया' में उनकी और भाग्यश्री की जोड़ी भी एकदम ताजगी से भरपूर थी। अजय देवगन की 'फूल और कांटे' भले ही मारधाड़ से भरपूर थी, लेकिन शक्ल- सूरत और डील डौल से वह कालेज के युवा छात्र ही दिखाई दे रहा था। गोविंदा तो लम्बे समय तक छोटे भाई के रूप में अपनी जवानी का जलवा बिखेरते रहे। जिन लोगों ने सनी देओल और अमृता सिंह अभिनीत उनकी पहली फिल्म 'बेताब' देखी है, उन्हें यह जोड़ी एकदम भोली और मासूम ही लगी है।
     आज इन सभी सितारों के चेहरे पर न तो भोलापन है और न मासूमियत बची। आज सनी देओल वह कलाकार हैं जो इस युवा फौज के सबसे बुजुर्ग कलाकार है। आज वह उम्र के 68 बसंत पार कर चुके हैं। उनके साथ कदमताल कर रहे हैं जैकी श्रॉफ जो अब 68 साल के हो चुके हैं और जिस उम्र में वह नायक बने थे, आज उनका बेटा उसी उम्र को पार कर चुका है। इसके बाद नंबर आता है, संजय दत्त का जो 'रॉकी' के समय एकदम दुबले-पतले थे। लेकिन, आज विशाल काया को थाम कर 66 वर्ष की आयु को पार कर चुके हैं। संजय दत्त से दो ही कदम पीछे उनकी ही तरह एक्शन हीरो सुनील शेट्टी जो न केवल 64 साल की वय को लांघ चुके हैं, बल्कि भारतीय क्रिकेट टीम के सितारे केएल राहुल के ससुर भी बन चुके हैं।
     चॉकलेटी चेहरे वाले गोविंदा की उम्र इतनी हो चुकी है जितनी उम्र में एक सरकारी कर्मचारी रिटायर हो जाता है। वह साठ साल से आगे निकल चुके हैं। हिंदी सिनेमा पर आज के सुपर स्टार खान बिग्रेड सलमान खान, आमिर खान और शाहरुख खान का दबदबा रहा है। संयोग की बात है कि इस समय इन तीनों खानों की आयु 59 साल है। बॉलीवुड को बुढ़ापे की सौगात देने वाले शेष सफल अभिनेताओं में 58 साल के अक्षय कुमार और 56 साल के अजय देवगन का नाम आता है। इन अभिनेताओं ने भले ही मुख्य नायक की भूमिका से अभी परहेज नहीं किया, लेकिन आज इनकी हिम्मत भी नहीं कि वह पेड़ों के आसपास नायिका के साथ प्रेम गीत गाते दिखाई पड़े। इन सब पर भारी पड़ते हैं, दक्षिण के सुपर स्टार रजनीकांत जो 74 साल के होने के बावजूद परदे पर जवान दिखाई देते है। यह बात और है कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन में अपना असली रूप कभी छिपाया नहीं है।
     यदि आज बॉलीवुड में मौजूद जवान नायकों की बात की जाए, तो उनमें कार्तिक आर्यन, सिद्धार्थ मल्होत्रा, वरुण धवन आयुष्मान खुराना, रणबीर कपूर, रणवीर सिंह जैसे गिने चुने नाम ही याद रह पाते है। इनमें भी यदि कार्तिक आर्यन को छोड़ दिया जाए तो रणबीर कपूर और रणवीर सिंह, सिद्धार्थ मल्होत्रा और वरूण धवन शादी कर जवानी को अलविदा कह चुके हैं। इस मामले में हीरोइनों की चर्चा इसलिए भी बेमानी है, क्योंकि परदे पर उनकी जवानी का जीवनकाल बहुत ही छोटा होता है। आज की तमाम नायिकाओं में ऐसी एक भी नायिका नहीं है जिसके चेहरे से जवानी की ज्वाला निकल रही हो। ऐसे में यदि यह कहा जाए कि बॉलीवुड बूढा होता जा रहा है तो यह चिंतनीय है। क्योंकि, दर्शक परदे पर हमेशा ताजगी ही देखना चाहता है। गनीमत है कि 'सैयारा' की नवबहार ने इसमें प्राण फूंकने का काम किया है। 
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इन फ़िल्मी मां के किरदार को भुलाया नहीं जा सका

    फिल्मों के कई तरह के किरदार होते हैं। नायक और नायिका के अलावा खलनायक, कॉमेडियम और कुछ कैरेक्टर एक्टरों की भी भूमिका होती है। ज्यादातर फिल्मों में एक और महत्वपूर्ण किरदार होता है मां का। फिल्म में पिता हो या नहीं, मां जरूर होती है। असल जीवन में ही नहीं, फिल्मी परदे पर भी मां कथानक का अहम हिस्सा है। किरदार अंदाज चाहे जो भी रहा हो, सभी ऑनस्क्रीन मां ने हमेशा दर्शकों पर अपनी अलग छाप छोड़ी। कई बार तो ऐसी फिल्मों में मां के किरदारों ने ही सबसे ज्यादा प्रभावित किया। फिल्मकारों ने मां के अर्थ को बेहतर तरीके से किरदार में उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 
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 - हेमंत पाल


    हिंदी फिल्में बिना मां के किरदार के पूरी नहीं होती। मां के किरदार को फिल्मों में अलग-अलग तरह से पेश किया गया। कुछ अभिनेत्रियों ने मां के किरदार को इतनी बखूबी से निभाया कि परदे पर मां की बात हो, तो इनकी ही छवि उभरती है। यही मां फिल्म में कई बार कहानी में मोड़ लाने का भी काम करती है। याद करें तो मदर इंडिया, दीवार और 'वास्तव' ऐसी ही फ़िल्में हैं, जिन्हें मां की भूमिका के लिए ही याद किया जाता है। सिर्फ यही नहीं, ऐसी फिल्मों की फेहरिस्त बहुत लंबी है, जिनके कथानक में मां का किरदार कई बार नायक-नायिका से ज्यादा प्रभावशाली रहा। मां के कई यादगार किरदार हैं, जिनमें निरूपा रॉय, वहीदा रहमान, नरगिस, रीमा लागू, राखी, फरीदा जलाल और रेखा हैं। ये अभिनेत्रियां अपने अभिनय के लिए जानी जाती हैं। इनके अलावा दुर्गा खोटे ने भी ऑनस्क्रीन मां के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई। उन्होंने कई फिल्मों में मां का संवेदनशील  किरदार निभाकर दर्शकों को प्रभावित किया फिल्मकारों ने मां के सशक्त किरदारों को अपनी फिल्मों में बखूबी तरीके से पेश किया। कई बार ऐसा भी हुआ कि मां के किरदार से ही फिल्में दर्शकों को आकर्षित करने में सफल रही हैं। कभी मां को समर्पित, कभी सकारात्मक, कभी संघर्षशील तो कभी दोस्ताना रूप में सिल्वर स्क्रीन पर इस किरदार को प्रस्तुत किया गया। 
    'मदर इंडिया' में नरगिस ने राधा का किरदार निभाया, जो एक मां है और अपने दोनों बेटों को बेहतर जीवन देने के लिए संघर्ष करती है। 'दीवार' में निरुपा रॉय ने एक ऐसी माँ का किरदार निभाया जो अपने बेटों के लिए सब कुछ करती है, पर एक बेटा रास्ता भटक जाता है। रीमा लागू ने भी ऐसी ही भूमिका 'वास्तव' में निभाई थी। वर्ष 1957 में आई फिल्म ‘मदर इंडिया’ में नरगिस की भूमिका का आज भी उल्लेख किया जाता है। फिल्म में नरगिस ने सुनील दत्त और राजेन्द्र कुमार की मां की भूमिका को जीवंत किया था। उन्होंने ऐसी मां का किरदार निभाया, जिसके हाथ अपने बेटे के अन्याय करने पर उसे जान से मारने से भी नहीं हिचकते। इस भूमिका के लिए नरगिस को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 
    ऐसे ही जब सिनेमा में मां के किरदार का जिक्र होता है, तो निरूपा राय के नाम को भुलाया नहीं जा सकता। उन्हें फिल्मों की आदर्श मां माना जाता है। उन्हें अमिताभ बच्चन की ऑनस्क्रीन मां भी कहा जाता है। क्योंकि, उन्होंने कई फिल्मों में अमिताभ की मां की भूमिका निभाई। दीवार, खून पसीना, मुकद्दर का सिकंदर, अमर अकबर एंथनी और 'सुहाग' जैसी फिल्मों में अमिताभ की मां का रोल निभाया। रेखा जैसी रोमांटिक अभिनेत्री ने भी कई फिल्मों में मां की भूमिका निभाई है, इनमें मुस्कुराहट, कोई मिल गया और 'सत्य और प्रेम' जैसी फिल्में शामिल हैं। फिल्मों में अभिनय करने वाली पहली मिस इंडिया नूतन ने भी कई फिल्मों में मां की भूमिका की। इनमें मेरी जंग, नाम, मुजरिम, युद्ध और 'कर्मा' जैसी फिल्में उल्लेखनीय हैं। 'मेरी जंग' में अपने सशक्त अभिनय के लिए नूतन को सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री के पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। 
    जानी-मानी अभिनेत्री राखी ने भी कई फिल्मों में मां के चरित्र को साकार किया। यदि निरूपा राय को अमिताभ की मां कहा जाता है, तो राखी अनिल कपूर की फिल्मी मां थी। राम लखन, प्रतिकार, जीवन एक संघर्ष में राखी अनिल कपूर की मां बनी थीं। खलनायक, सोल्जर, बार्डर, करण-अर्जुन, बाजीगर और 'अनाड़ी' जैसी फिल्मो में राखी ने मां का किरदार निभाया। 'करण-अर्जुन' फिल्म में उनके मां के किरदार को लोग आज भी याद करते हैं। फिल्म में दुर्गा सिंह का किरदार निभाकर उन्होंने एक मां के अटूट विश्वास को पेश किया था। मां जिसे विश्वास होता है कि उसके बच्चे अपने पिता के हत्यारे से बदला लेने जरूर आएंगे। इन अभिनेत्रियों के अलावा 90 के दशक में रीमा लागू ने कई फिल्मों में इस किरदार को प्रभावशाली तरीके से पेश किया। इनमें रीमा लागू भी है, जिन्हें सलमान खान की मां के रूप में देखा गया है। इनमें मैने प्यार किया, साजन, हम साथ साथ हैं, जुड़वां’ और ‘पत्थर के फूल’ जैसी सुपरहिट फिल्में शामिल हैं। उनकी मां की भूमिका वाली अन्य फिल्मों में कयामत से कयामत तक, आशिकी, हम आपके हैं कौन, कुछ कुछ होता है आदि शामिल हैं। 
    अचला सचदेव ने अपने करियर में कई फिल्मों मां और दादी का किरदार निभाया है। उन्हें इन्हीं किरदारों ने एक अलग पहचान दिलाई थी। उन्होंने 'कभी खुशी कभी गम' में शाहरुख खान और ऋतिक रोशन की दादी और 'दिल वाले दुल्हनिया ले जाएंगे' में काजोल की दादी का किरदार निभाते हुए भी देखा गया। दुर्गा खोटे ने जिस दौर में सिनेमा में कदम रखा, तब महिलाओं के किरदार भी पुरुष निभाया करते थे। दुर्गा खोटे ने कई फिल्मों मे मां का किरदार निभाकर अपनी एक अलग पहचान बनाई। कई फिल्मों में प्यार और दुलार से भरपूर मां का किरदार निभाया। ऋषि कपूर की फिल्म 'कर्ज' में इन्होंने मां का किरादर निभाकर उसे यादगार बना दिया। 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' में काजोल की मां को याद किया जाए तो फरीदा जलाल आ जाती है। उन्होंने कई फिल्मों में कभी भावुक तो कभी हंसमुख और मजाकिया मां का किरदार निभाया है। कुछ कुछ होता है', 'कभी खुशी कभी गम', 'कहो ना प्यार है', जैसी कई फिल्मों में मां का किरदार निभाकर लोगों का दिल जीता है।
    चुलबुली नायिका की भूमिका निभाने से लेकर मां तक का किरदार निभाने में जया बच्चन का कोई सानी नहीं। उन्होंने 'हजार चौरासी की मां' में एक ऐसी मां का किरदार निभाया, जिसके बेटे को नक्सलियों ने मार दिया है। इसके बाद वह फिल्म 'कभी खुशी कभी गम' और 'कल हो ना हो' में भी मां का किरदार निभाती नजर आईं। 'कल हो ना हो' के लिए जया बच्चन को फिल्म फेयर अवार्ड भी मिला। मल्टीपर्पस रोल में किरण खेर ने भी कई भूमिकाएं निभाई। साथ ही मां की इमेज को बदलने में अहम भूमिका निभाई। फिल्म 'दोस्तान' की कूल मदर हो या 'देवदास' की कठोर, स्वाभिमानी मां, किरण खेर ने हर भूमिका को जीवंत किया है। 'हम तुम' में उन्होंने एक ऐसी मां का किरदार निभाया, जो दोस्त से कम नहीं है। फिल्मों में कई अभिनेत्रियों ने मां के किरदार को रूपहले पर्दे पर निभाया। इनमें लीला चिटनिस, दुर्गा खोटे, दीना पाठक, वहीदा रहमान, आशा पारेख, हेमा मालिनी, रेखा, जया भादुड़ी, डिंपल कपाडिया, रति अग्निहोत्री, किरण खेर और रेखा शामिल हैं। 
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Saturday, July 26, 2025

समय के साथ बदलते फ़िल्मी फॉर्मूले और 'दोस्ती'

    जब भी दोस्त और दोस्ती पर बनी फिल्मों का जिक्र होता है, 1964 में राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म 'दोस्ती' के बिना बात पूरी नहीं होती। ये फिल्म ऐसी सभी फिल्मों के लिए मील का पत्थर है। परदे पर दोस्ती के कथानक भाई-चारे, मुश्किलों में साथ खड़े रहने और दोस्त के लिए प्रेमिका का त्याग करने जैसे फार्मूलों के आसपास घूमते रहे हैं। ये कथानक दोस्ती के विभिन्न पहलुओं को उजागर करते हैं। लेकिन, बदलते समय के साथ इनमें तड़का भी लगता रहा। 'थ्री इडियट्स' और 'जिंदगी न मिलेगी दोबारा' ऐसी ही फ़िल्में हैं।
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- हेमंत पाल

   फिल्म बनाने वालों के पास कुछ ऐसे फार्मूले होते हैं, जिन्हें दर्शक हमेशा पसंद करते हैं। ऐसे फार्मूलों में एक दोस्ती भी है। क्योंकि, दोस्ती की कहानियां फिल्मकारों के लिए एक तरह से बिकाऊ फार्मूला रहा। किसी विषय पर एक फिल्म हिट होते ही, उसके आसपास नई कहानियाँ गूंथी जाने लगती है! प्यार में धोखा, खून का बदला खून, प्रेम त्रिकोण, भाइयों का बिछुड़ना और फिर मिलना, दोस्ती में ग़लतफ़हमी और फिर त्याग! ये ऐसे हिट फॉर्मूले हैं, जो फिल्मकारों को हमेशा रास आते रहे। इनमें 'दोस्ती' का फार्मूला हर समय काल में दर्शकों को रास आया। 1964 में बनी राजश्री की फिल्म 'दोस्ती' को अपने समय की सबसे हिट फिल्म माना जाता है। उसके बाद तो दोस्ती की मिसाल वाले इस विषय को कई बार घुमा फिराकर परोसा जाता रहा! हर दौर में दोस्ती की भावना को नए-नए तरीकों से पेश किया गया! जिनमें दोस्त, शोले, चुपके-चुपके, नमक हराम, हेराफेरी, शान, सुहाग, मुकद्दर का सिकंदर, राम-बलराम, दोस्ताना, सौदागर, खुदगर्ज, दिल चाहता है, जिंदगी ना मिलेगी दोबारा, रंग दे बसंती, काई पो चे और चश्मे बद्दूर जैसी फ़िल्में शामिल हैं।
      अमिताभ बच्चन के स्वर्णकाल की ज्यादातर फिल्मों का केंद्रीय विषय भी दोस्ती रहा! अमिताभ ने कई फिल्मों में दोस्ती की भावना पेश की! फिर वो चाहे जंजीर, शोले, नमक हराम, हेराफेरी, शान, सुहाग, दोस्ताना हो या मुकद्दर का सिकंदर! याद कीजिए अमिताभ के साथ हर फिल्म में कोई दोस्त जरूर रहा। निजी जीवन में भी अमिताभ और विनोद खन्ना के बीच अच्छी दोस्ती के बारे में कभी पढ़ा नहीं गया, लेकिन परदे पर इन दोनों ने कई बार दोस्ती को जीवंत किया! इनमें हेराफेरी, मुकद्दर का सिकंदर जैसी फिल्में शामिल हैं। 'दोस्ताना' में शत्रुघ्न सिन्हा के साथ अमिताभ की दोस्ती मिसाल के रूप में याद की जाती है। 1975 की बनी 'शोले' में जय और वीरू की दोस्ती के जज्बे को बेहद खूबसूरती से दर्शाया गया! इस जोड़ी ने बाद में ‘चुपके-चुपके’ और ‘राम बलराम’ जैसी फिल्मों में भी दोस्ती दिखाई! राजेश खन्ना के साथ अमिताभ ने 'आनंद' और ‘नमक हराम’ में दोस्ती को जीवंतता दी! शशि कपूर के साथ ईमान धरम, शान और 'सुहाग' में अमिताभ ने यही दोस्ती निभाई! 
   धर्मेंद्र भी उन कलाकारों में हैं, जिन्होंने कई एक्टर्स के साथ दोस्ती का किरदार अदा किया। धर्मेंद्र की दोस्ती शत्रुघ्न सिन्हा और विनोद खन्ना के साथ कई बार बनी! इसके बाद अनिल कपूर-जैकी श्रॉफ, अक्षय कुमार-सुनील शेट्टी और संजय दत्त-गोविंदा की दोस्ती पर कई फ़िल्मी कहानियाँ बनी! 1991 में सुभाष घई ने फ़िल्मी दुनिया के दो दिग्गजों दिलीप कुमार और राजकुमार को दोस्ती की डोर में बांधा और ‘सौदागर’ बनाई! इस फिल्म को भी दोस्ती के लिहाज से श्रेष्ठ फिल्म कहा जा सकता है। बीच में एक दौर ऐसा भी आया, जब दोस्ती में प्यार का तड़का लगने लगा! दो दोस्तों की दोस्ती के बीच एक लड़की आ जाती है! फिर या तो गलतफहमी पनपती है या प्रेम त्रिकोण बन जाता है! क्लाइमैक्स में या तो ग़लतफ़हमी दूर हो जाती है या फिर एक दोस्त का त्याग सामने आता है! लड़की के कारण दोस्तों में टकराव का ये चलन शायद राज कपूर, राजेंद्र कुमार की फिल्म 'संगम' फिल्म से शुरू हुआ था। जो भी हो, फिल्म का अंत सुखांत ही होता रहा। याद किया जाए तो ऐसी फिल्मों की कमी भी नहीं! लेकिन, प्रयोग के तौर पर हाल ही में कुछ ऐसी फ़िल्में भी बनाई गई जिनमें दोस्ती तो थी, पर फिल्म का केंद्रीय विषय कुछ और ही था! थ्री इडियट्स, दिल चाहता है, जिंदगी ना मिलेगी दोबारा, रंग दे बसंती, कुछ कुछ होता है, दिल तो पागल है और चश्मे बद्दूर! इन फिल्मों ने दर्शकों को दोस्ती के कई नए रंग दिखाए!  
   आज की कुछ फिल्मों का कैनवास दोस्तों के सपनों के साथ उनके आंतरिक टकरावों पर भी फोकस रहा! कहीं विचारों में मतभेद होने के बावजूद दोस्त एक-दूसरे का नजरिया समझने की कोशिश करते हैं। कहीं अलग-अलग सामाजिक और आर्थिक हालात वाले दोस्त एक सपने के साथ आगे बढ़ते हैं और टीम बनाकर उसे पूरा करते हैं। यही कारण है कि अब दोस्ती और विचारधारा के बदलाव की कहानियों पर भी फ़िल्में बनने लगी है। दोस्ती के बहाने कुछ अलग ढंग की कहानियाँ भी कही जा रही है। ये फ़िल्में बताती है कि जीवन में खुद से बात करना, अपने सपनों से बात करना और दोस्तों से सपनों को शेयर करना कितना जरूरी है। दोस्ती में सपनों के साथ उनके टकरावों की कहानी भी कुछ फिल्मों की कथावस्तु रही है। लेकिन, दोस्तों के बीच टकराव कही भी इतने बड़े नहीं होते कि वो पूरी दोस्ती को प्रभावित कर दें। ऐसी ही फिल्म है 'जिंदगी न मिलेगी दोबारा' जिसमें तीन पुराने दोस्त मौज-मस्ती के लिए घूमने निकलते हैं और दर्शक बंधे रहते हैं। दोस्ती पर आधारित कुछ पसंद की गई फिल्मों में 'दोस्ती' (1964) है जो दो गरीब दोस्तों रामू और मोहन की कहानी है। रामू विकलांग है और मोहन की आंखें नहीं है। वे एक-दूसरे के साथ मिलकर जीवन की चुनौतियों का सामना करते हैं। 
     'आनंद' (1971) एक डॉक्टर और एक कैंसर से पीड़ित मरीज के बीच गहरी दोस्ती हो जाती है। इस फिल्म में जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण और दोस्ती पर जोर दिया है। सर्वकालिक हिट 'शोले' (1975) दो दोस्तों वीरू और जय की कहानी पर टिकी है, जो डाकू गब्बर सिंह को पकड़ने के लिए एक साथ आते हैं। 'दिल चाहता है' (2001) तीन दोस्तों, आकाश, समीर और सिद्धार्थ, की कहानी है जो अपनी जिंदगी के अलग-अलग पड़ावों से गुजरते हुए दोस्ती के महत्व को समझते हैं। 'जिंदगी न मिलेगी दोबारा' (2011) भी तीन दोस्तों की कहानी है जो बैचलर पार्टी के लिए स्पेन जाते हैं और वहां अपनी दोस्ती के नए आयाम ढूंढते हैं। '3 इडियट्स' (2009) तीन इंजीनियरिंग छात्रों की कहानी है, जो अपनी पढ़ाई, करियर और जीवन के बारे में अलग-अलग दृष्टिकोण रखते हैं, पर उनकी दोस्ती बनी रहती है। 'काय पो छे' (2013) भी तीन दोस्तों पर टिकी है, जो एक क्रिकेट अकादमी खोलने का फैसला करते हैं और एक साथ काम करते हैं। 'छिछोरे' (2019) कॉलेज के दोस्तों के ग्रुप की कहानी है, जो एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं और दोस्ती को समझते हैं। 'आरआरआर' (2022) दो क्रांतिकारियों की दोस्ती की कहानी है, जो अंग्रेज शासन के खिलाफ लड़ते हैं। 
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