प्रसिद्ध अंग्रेजी नाटककार विलियम शेक्सपियर ने अपने नाटक 'रोमियो और जूलियट' में एक जगह लिखा था 'नाम में क्या रखा है।' उनकी यह बात उस नाटक के संदर्भ में सही हो सकती है। लेकिन, फिल्मों के नाम के बारे में यह कई बार गलत साबित हुई। क्योंकि, फिल्मकार हर चीज को शुभ-अशुभ के नजरिया से देखते हैं। यदि उन्हें फ़िल्म के नाम में भी कोई अशुभ बात नजर आती है, तो वह उसे बदलने में देर नहीं करते। ऐसे कई उदाहरण हैं, जब फिल्मों के नाम ने ही लाखों-करोड़ों की फिल्मों का बंटाधार कर दिया। यही वजह है कि किसी भी फिल्म के निर्माण से पहले उसके नाम को लेकर अच्छी खासी मशक्कत की जाती है।
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- हेमंत पाल
सलमान खान ने हाल ही में अपनी फिल्म 'गलवान' का नाम बदलकर 'मातृभूमि' रख दिया। इसके पीछे कारण चाहे जो भी बताए जा रहे हों, लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा रहा कि पुराने नाम को बदलने के पीछे कोई शुभ-अशुभ का गणित भी हो सकता है। क्योंकि, ऐसे प्रयोगों का एक लंबा इतिहास रहा है। कुछ फिल्में सिर्फ नाम की वजह से ही नहीं चली। कई बार तो फिल्मों के नाम की स्पेलिंग बदलकर इस प्रयोग को सुधारा गया, जो सफल रहा। बॉलीवुड की चमक-दमक भरी दुनिया में जहां करोड़ों की कमाई का सपना हर कलाकार देखता है, वहीं अंधविश्वास की जड़ें इतनी गहरी होती है कि टाइटल की एक स्पेलिंग बदलने से फिल्म की किस्मत पलट सकती है। सफलता का मंत्र सिर्फ टैलेंट, स्क्रिप्ट या स्टार पावर नहीं, बल्कि सही टाइमिंग और भाग्य भी है। इंडस्ट्री के पुराने दिग्गजों से लेकर नए सितारों तक, हर कोई टोटकों का सहारा लेता है मंगल दोष दूर करने के लिए पूजा, शुभ मुहूर्त में शूटिंग शुरू करना या फिर नाम बदलकर रिलीज। लेकिन, कुछ टाइटल ऐसे हैं जो जड़ से मनहूस साबित हुए हैं। इनका जिक्र होते ही प्रोड्यूसर्स के चेहरे पीले पड़ जाते हैं। सबसे कुख्यात है 'शहजादा'। पिछले 50 सालों में राजेश खन्ना, अजय देवगन और कार्तिक आर्यन जैसे सितारों ने इस नाम के साथ दांव लगाया, लेकिन हर बार बॉक्स ऑफिस पर पानी फेर गया।
'शहजादा' बनी तीन सितारों की नाकामियां
बॉलीवुड में 'शहजादा' नाम की काली छाया इतनी घनी है कि इसका जिक्र भर से स्टार्स सिहर उठते हैं। पहली बार यह अभिशाप 1972 में राजेश खन्ना पर उतरा। सुपरस्टार खान साहब की लहर पर सवार होकर 'शहजादा' रिलीज हुई। डायरेक्टर कोटि कोमीनिनी की यह फिल्म मूल रूप से इटैलियन हिट 'पुडूडा गोगो' का रीमेक थी। राजेश खन्ना के अलावा मोना सिंह और प्रिया राजवंश मुख्य भूमिकाओं में थे। उम्मीदें आसमान छू रही थीं, लेकिन फिल्म ने महज 50 लाख की कमाई की। ट्रेड एनालिस्टों के मुताबिक, बजट के मुकाबले 70 प्रतिशत का घाटा हुआ। दर्शक फिल्म को पुरानी और बेस्वाद मान बैठे। राजेश खन्ना का जलवा उस दौर में था, फिर भी 'शहजादा' ने उनकी लकीर तोड़ दी। इंडस्ट्री में चर्चा फैली कि नाम में ही कुछ खराब है। चार दशक बाद 2012 में अजय देवगन ने इस मनहूस टाइटल को फिर आजमाया। 'सन ऑफ सरदार' के बाद मनोज मुंतशिर की स्क्रिप्ट पर बनी यह फिल्म एक्शन-ड्रामा थी। संजय लीला भंसाली प्रोडक्शन की चमक के साथ अजय देवगन, संजय दत्त और काजोल जैसे सितारे थे। लेकिन रिलीज होते ही धमाका उल्टा फूटा। पहले हफ्ते में 25 करोड़ जुटाए, लेकिन कुल 45 करोड़ पर सिमट गई। बजट 80 करोड़ से ऊपर था, यानी प्रोड्यूसर्स को 50 करोड़ का चूना लगा। क्रिटिक्स ने स्क्रिप्ट को कमजोर बताया, लेकिन ट्रेड गुरु कमल जैन जैसे जानकारों का मानना है कि 'शहजादा' नाम ने ही आग में घी डाला। अजय देवगन ने बाद में स्वीकार किया कि फिल्म की असफलता ने उन्हें सोचने पर मजबूर कर दिया।
सबसे ताजा झटका 2023 में कार्तिक आर्यन को लगा। रोहित धवन डायरेक्टोरियल 'शहजादा' तेलुगु हिट 'अला वाइकुंठपुरमलू' का रीमेक थी। कार्तिक आर्यन, कृति सैनन और तब्बू के साथ पूजा हेगड़े थीं। प्रचार भव्य था, ट्रेलर वायरल हुआ, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर जीरो। पहले दिन 6 करोड़, कुल 30 करोड़ की कमाई। 75 करोड़ बजट वाली फिल्म ने 60 प्रतिशत घाटा दिया। कार्तिक की 'फ्रेडी' जैसी पिछली हिट्स के बावजूद दर्शक मुंह फेर लिया। सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ आ गई। निर्देशक रोहित धवन ने कहा, 'कभी-कभी चीजें नियंत्रण से बाहर हो जाती हैं।' लेकिन इंडस्ट्री वाले फुसफुसाते हैं शहजादा का अभिशाप फिर चला। तीन दशकों में तीन फ्लॉप, तीन स्टार्स की बर्बादी। क्या यह संयोग है या नाम का जादू?
मनहूस टाइटल जो दुश्मन बने
'शहजादा' अकेला नहीं है, बॉलीवुड में कई ऐसे टाइटल हैं जो फ्लॉप की गारंटी बन चुके हैं। 'आग' इसका सबसे काला उदाहरण है। 1980 के दशक में कमल हासन की 'आग' आई, जो सुपरफ्लॉप रही। फिर 1999 में गोविंदा और कैरी अमीन वाली 'आग' ने 5 करोड़ का बजट खा लिया। 2003 में संजय दत्त की 'लूंगी' टाइप 'आग' आई, फिर फुस्स। तीनों 'आग' बॉक्स ऑफिस पर जल गईं। प्रोड्यूसर आज भी इससे दूर भागते हैं एक और नाम है 'बदला।' 1966 में मीना कुमारी की 'बदला' फ्लॉप हुई। 1970 में धर्मेंद्र वाली भी डूबी। 2019 में तापसी पन्नू और अमिताभ बच्चन की 'बदला' ने तो कमाल किया, लेकिन इससे पहले के दो 'बदला' ने इंडस्ट्री को सबक सिखाया। ट्रेड एक्सपर्ट सुमीत कचड़ कहते हैं कि बार-बार फेल होने वाले नामों से बचना चाहिए। 'खिलाड़ी' भी मनहूस साबित हुआ। अक्षय कुमार की 1996 वाली 'खिलाड़ी' हिट रही, लेकिन 2016 में 'खिलाड़ी 786' ने 125 करोड़ बजट पर 50 करोड़ कमाए। फिर 2022 में सिद्धू की 'खिलाड़ी' सीरीज का नया भाग फुस्स। नाम की चमक फीकी पड़ गई। इसी तरह 'हमसे ही सीखो' या 'मिस्टर इंडिया के बाद' जैसे टाइटल भी दुर्भाग्य लाए। लेकिन सबसे ज्यादा चर्चित 'नो एंट्री' का सीक्वल है। 2005 की अनीस बज्मी वाली हिट थी, लेकिन 2024 तक लटकी 'नो एंट्री 2' रद्द हो गई। प्रोड्यूसर बोले, नाम में ही दिक्कत है। इसके अलावा 'काला' भी काला पड़ा। 2012 में विवेक ओबेरॉय वाली फ्लॉप, 2023 में सलमान खान की साउथ रीमेक भी औसत रही। आशय यह है कि नाम ही बॉक्स ऑफिस का दुश्मन है। पुराने जमाने में 'धुंध' या 'बारिश' जैसे टाइटल भी फ्लॉप रिकॉर्ड बनाए। आजकल डिजिटल एनालिटिक्स से पहले ट्रेड वाले नाम चेक करते हैं।
इस नाम से तबाह हुई कई फ़िल्में
1980 में सुभाष घई की 'कर्ज' में ऋषि कपूर लीड रोल में थे, लेकिन यह बुरी तरह फ्लॉप हो गई। बजट के मुकाबले महज आधी कमाई हुई। 2002 में सनी देओल और शिल्पा शेट्टी वाली 'कर्ज: द बर्डन ऑफ ट्रूथ' ने 15 करोड़ ही जुटाए, जबकि उम्मीदें भारी थीं। 2008 में हिमेश रेशमिया का 'कर्ज' रीमेक आया, फिर फुस्स। इसके अलावा कर्ज तेरे खून का (1990), दूध का कर्ज (2016),'प्यार का कर्ज, कर्ज चुकाना है जैसी फिल्में भी बॉक्स ऑफिस पर डूब गईं। इंडस्ट्री वाले इसे शापित मानते हैं। एक एक्ट्रेस का तो करियर ही खत्म हो गया, किसी ने डिप्रेशन झेला, प्रोड्यूसर भी दिवालिया हुए। 'आग' ने भी कमाल किया।
1980 के दशक में कमल हासन वाली फ्लॉप, 1999 में गोविंदा की असफल, 2003 में संजय दत्त वाली भी जलकर राख। तीनों ने प्रोड्यूसर को बर्बाद किया। 'बदला' का सिलसिला तो 1966 से चला। मीना कुमारी वाली फेल, 1970 में धर्मेंद्र की फिल्म डूबी, हालांकि 2019 वाली हिट रही, लेकिन पुरानी ने नाम खराब कर दिया। 2025 में सलमान खान की 'सिकंदर' सबसे बड़ी फ्लॉप बनी, जिसकी लागत तक नहीं निकली। शूटिंग में स्क्रिप्ट बदली, लेकिन नाम भी मनहूस साबित हुआ। ये उदाहरण बताते हैं कि 'शहजादा' अकेला नाम नहीं है। 'कर्ज' जैसे नाम भी पूरी इंडस्ट्री का दुश्मन बने। ये टाइटल साबित करते हैं कि बॉलीवुड में नाम बदलना क्यों जरूरी माना जाता है।
स्पेलिंग बदलकर बची किस्मत
बॉलीवुड में नाम बदलना आम है। जब मनहूस टाइटल का डर सताता है, तो स्पेलिंग जादू चल जाता है। सबसे मशहूर केस है 'शोले'। मूल नाम कुछ और था, जिस पर मनोज कुमार ने आपत्ति जताई थी। फिर 'द बॉम्बे समर 1971' सोचा गया, लेकिन अंत में 'शोले' किया गया। 1975 में 35 करोड़ की कमाई, सुपरहिट। अगर पुराना नाम रहता, तो शायद यह नहीं होता! सलमान खान की 'राधे' भी मूल रूप से 'राधिका' थी। अंधविश्वास से 'राधे : योर मोस्ट वांटेड भाई' हो गया। पाइरेटेड रिलीज के बावजूद फील हिट रही। आमिर खान की 'लगान' का नाम पहले 'सरकारी राज' था। ज्योतिषी बोले, यह नाम नेगेटिव है। फिर जो नाम बदला उसके बाद तो ऑस्कर नॉमिनेशन मिला। '3 इडियट्स' का नाम भी पहले '5 इडियट्स' था, जिसे बदला गया तो फिल्म ने इतिहास बना दिया। राजकुमार हिरानी ने कहा था 'नाम में ही ताकत है।' शाहरुख खान की 'ओम शांति ओम' पहले 'ओम शांति शांति' था। शांति दो बार से डर लगा, तो फिल्म 2007 में ब्लॉकबस्टर हुई।
अक्षय कुमार की 'रॉकी हैंडसम' पहले 'रॉकी ब्रोमैंश' थी उसकी स्पेलिंग बदली तो फिल्म हिट हुई। सलमान की 'दबंग' पहले 'दबंगग' (तीन जी) था। ज्योतिषी ने दो जी सुझाए, फिर जो हुआ उसमें 138 करोड़ की कमाई जुड़ गई। 'बजरंगी भाईजान' भी पहले 'शुक्ला भाईजान' था, जो बदला गया। कबीर खान भी मानते हैं कि अंधविश्वास काम करता है। 'कहानी 2' को भी 'आखिर क्यों' से बदल दिया। क्योंकि, पहले वाला नाम मनहूस था। विद्या बालन ने कहा था 'बॉलीवुड में नाम ही राजा है।' प्रियंका चोपड़ा की 'मैरी कॉम' का नाम पहले 'मैरी' था। फिर बदलकर पूरा नाम रखा और ये बायोपिक हिट हुई। इन बदलावों से साबित होता है कि स्पेलिंग से किस्मत पलट सकती है।
बॉलीवुड का अंधविश्वास, टोटकों की दुनिया
बॉलीवुड सिर्फ नामों पर नहीं रुकता। शूटिंग से पहले गणेश पूजा, क्लैपबोर्ड पर 'मां भगवती' लिखना, फर्स्ट शॉट साउथ दिशा में न लेना ये सब आम हैं। अमिताभ बच्चन ने 'कुली' हादसे के बाद कुछ ज्यादा टोटके अपनाए जाने लगे। शाहरुख का काला चश्मा लकी चार्म है और सलमान का ब्रेसलेट। लेकिन, नाम सबसे ऊपर है। ट्रेड एनालिस्ट अक्षय जितेश के मुताबिक, पिछले 20 सालों में 40% फ्लॉप फिल्मों का कारण नाम को माना गया है। डिजिटल दौर में भी यह चल रहा। 'लव आज कल' का नाम बदला गया। 'फुकरे 3' में फुकरे की स्पेलिंग में फेरबदल की गई। अब तो प्रोड्यूसर नाम की पहले ही टेस्टिंग कराने लगे। ज्योतिष जैसे लोग सलाह देते हैं। पर, क्या यह विज्ञान है या अंधविश्वास? बॉलीवुड कहता है दोनों। 'शहजादा' जैसे मनहूस टाइटल बॉलीवुड को सिखाते हैं कि नाम महज शब्द नहीं, बल्कि भाग्य का आईना है। राजेश खन्ना से कार्तिक आर्यन तक, सभी ने दांव गंवाया। लेकिन, स्पेलिंग बदलकर 'शोले' से 'दबंग' तक की फ़िल्में हिट्स बनीं। इंडस्ट्री आगे बढ़ रही है, लेकिन अंधविश्वास की जड़ें ज्यादा गहरा रही हैं। अगली बार कोई प्रोड्यूसर 'शहजादा 4' बनाने से पहले सोचेगा। माना कि सफलता के लिए टैलेंट जरूरी, लेकिन सही नाम तो जरूरी है। बॉलीवुड की यह दास्तान साबित करती है कभी नाम से मत डरो, जरा भी शंका हो, तो बदल दो!
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