हिंदी सिनेमा के सौ से भी ज्यादा सालों के सफर में हम अक्सर उन ऊंचाइयों की बात करते हैं जिन्हें शोले, मुगल-ए-आजम या 'दंगल' जैसी फिल्मों ने छुआ। बॉक्स ऑफिस के आंकड़े, करोड़ों का कारोबार और जुबली के जश्न फिल्मी गलियारों की रौनक बढ़ाते हैं। लेकिन, इस चमक-धमक के पीछे एक स्याह कोना और भी है, जहाँ उन फिल्मों का ढेर लगा है जिन्हें दर्शकों ने सिरे से नकार दिया। किसी भी कला के इतिहास में असफलता उतनी ही महत्वपूर्ण होती है जितनी सफलता, क्योंकि हर फ्लॉप फिल्म फिल्मकारों के लिए एक सबक छोड़कर जाती है। जानिए, आखिर वे कौन सी बड़ी फिल्में थीं जो अपनी भारी-भरकम लागत और बड़े सितारों के बावजूद दर्शकों के दिल तक पहुँचने में नाकाम रहीं।
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- हेमंत पाल
हिंदी सिनेमा के सौ से भी ज्यादा सालों के शानदार सफर में हम अक्सर उन ऊंचाइयों की चर्चा करते हैं जिन्हें 'शोले', 'मुगल-ए-आजम' या 'दंगल' जैसी फिल्मों ने छुआ। बॉक्स ऑफिस के जादुई आंकड़े, करोड़ों का कारोबार और सिल्वर जुबली के जश्न फिल्मी गलियारों की रौनक बढ़ाते हैं। लेकिन इस चकाचौंध के पीछे एक स्याह और खामोश कोना और भी है, जहाँ उन फिल्मों का ढेर लगा है जिन्हें दर्शकों ने सिरे से नकार दिया। किसी भी कला के इतिहास में असफलता उतनी ही महत्वपूर्ण और कड़वी होती है जितनी सफलता मीठी, क्योंकि हर फ्लॉप फिल्म फिल्मकारों के लिए एक सबक और दर्शकों के बदलते मिजाज का आईना छोड़कर जाती है। आज हम फिल्म इतिहास के उसी 'विफल' अध्याय को पलटेंगे और समझेंगे कि आखिर वे कौन सी महत्वाकांक्षी फिल्में थीं जो भारी-भरकम बजट, चमचमाते सितारों और दिग्गज निर्देशकों के बावजूद दर्शकों के दिल के दरवाजे तक पहुँचने में बुरी तरह नाकाम रहीं।
भारतीय सिनेमा में असफलता की पहली सबसे बड़ी और ऐतिहासिक गूंज तब सुनाई दी, जब 'शोमैन' राज कपूर ने अपना सब कुछ दांव पर लगाकर 'मेरा नाम जोकर' बनाई थी। आज भले ही हम इसे एक 'कल्ट क्लासिक' मानते हैं और इसकी दार्शनिकता की मिसाल देते हैं, लेकिन 1970 में जब यह रिलीज हुई, तो इसे भारतीय सिनेमा की सबसे बड़ी व्यापारिक आपदाओं में गिना गया। दर्शकों ने इसके भारी-भरकम साढ़े चार घंटे के रनटाइम और फिल्म की अत्यधिक दार्शनिक गंभीरता को स्वीकार नहीं किया। फिल्म का कथानक एक सर्कस के जोकर के जीवन के तीन पड़ावों और उसकी असफल प्रेम कहानियों के इर्द-गिर्द घूमता था। उस दौर का दर्शक जो परदे पर चटख मनोरंजन और रफ़्तार देखने का आदी था, उसे एक जोकर का लंबा दुःख और उसकी लंबी दास्तान बहुत उबाऊ लगी। फिल्म की लंबाई और दो इंटरवल ने दर्शकों के धैर्य की ऐसी परीक्षा ली कि राज कपूर जैसा दिग्गज निर्माता कर्ज के दलदल में डूब गया। यह फिल्म इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण है कि कभी-कभी एक बेहतरीन कलाकृति भी समय से बहुत आगे होने के कारण 'सुपर फ्लॉप' की श्रेणी में खड़ी कर दी जाती है।
शिखर पर भी अमिताभ की फ़िल्में फ्लॉप
अस्सी और नब्बे के दशक के संधिकाल में जब अमिताभ बच्चन का जादू अपने चरम पर था, तब कुछ ऐसी फिल्में आईं जिन्होंने साबित किया कि केवल सुपरस्टार का नाम फिल्म को वैतरणी पार नहीं लगा सकता। 'जादूगर' और 'तूफान' जैसी फिल्में इसका जीवंत उदाहरण हैं। उस दौर में दर्शकों का स्वाद बदल रहा था और वे यथार्थवाद की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन फिल्मकार अब भी वही पुराने अलौकिक और घिसे-पिटे फार्मूले दोहरा रहे थे। 'जादूगर' में अमिताभ बच्चन को एक ऐसे किरदार में पेश किया गया जो जादुई शक्तियों से बुराई का अंत करता है, लेकिन फिल्म की कहानी इतनी बचकानी और तर्कहीन थी कि इसे बच्चों ने भी पसंद नहीं किया। फिल्म में फैंटेसी और हकीकत का बेमेल घालमेल दर्शकों को रास नहीं आया। वही एंग्री यंग मैन की छवि को जादू की छड़ी के साथ देखना दर्शकों के लिए एक दुखद अनुभव साबित हुआ। इसी तरह यश चोपड़ा जैसे मंझे हुए निर्देशक की 'परंपरा' भी एक ऐसी ही फिल्म थी, जिसने सामंती परंपराओं और खानदानी रंजिश की उस पुरानी सड़ी-गली कहानी को पेश किया जिसे दर्शक दशक भर पहले ही छोड़ चुके थे।
अस्सी और नब्बे के दशक के संधिकाल में जब अमिताभ बच्चन का जादू अपने चरम पर था, तब कुछ ऐसी फिल्में आईं जिन्होंने साबित किया कि केवल सुपरस्टार का नाम फिल्म को वैतरणी पार नहीं लगा सकता। 'जादूगर' और 'तूफान' जैसी फिल्में इसका जीवंत उदाहरण हैं। उस दौर में दर्शकों का स्वाद बदल रहा था और वे यथार्थवाद की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन फिल्मकार अब भी वही पुराने अलौकिक और घिसे-पिटे फार्मूले दोहरा रहे थे। 'जादूगर' में अमिताभ बच्चन को एक ऐसे किरदार में पेश किया गया जो जादुई शक्तियों से बुराई का अंत करता है, लेकिन फिल्म की कहानी इतनी बचकानी और तर्कहीन थी कि इसे बच्चों ने भी पसंद नहीं किया। फिल्म में फैंटेसी और हकीकत का बेमेल घालमेल दर्शकों को रास नहीं आया। वही एंग्री यंग मैन की छवि को जादू की छड़ी के साथ देखना दर्शकों के लिए एक दुखद अनुभव साबित हुआ। इसी तरह यश चोपड़ा जैसे मंझे हुए निर्देशक की 'परंपरा' भी एक ऐसी ही फिल्म थी, जिसने सामंती परंपराओं और खानदानी रंजिश की उस पुरानी सड़ी-गली कहानी को पेश किया जिसे दर्शक दशक भर पहले ही छोड़ चुके थे।
भंसाली जैसे फिल्मकार की फिल्म भी नहीं चली
जैसे-जैसे सिनेमा आधुनिक हुआ, प्रयोगों का जोखिम भी बढ़ा। साल 2007 में संजय लीला भंसाली की 'सांवरिया' एक ऐसी फिल्म बनकर आई जिसे लेकर इंडस्ट्री में जबरदस्त उत्साह था। रणबीर कपूर और सोनम कपूर का डेब्यू और भंसाली की भव्यता का मेल। लेकिन फिल्म की नीली और काली रोशनी वाली कृत्रिम बैकग्राउंड सेटिंग और एक ऐसी कहानी जिसमें नायक और नायिका के बीच का द्वंद्व बहुत ही कमजोर था, दर्शकों को समझ ही नहीं आई। फिल्म का कथानक बहुत ही संक्षिप्त था जिसे खींचकर लंबा किया गया था। लोगों को लगा कि वे फिल्म नहीं बल्कि एक सजी-धजी 'पेंटिंग' देख रहे हैं जिसमें भावनाओं की गर्माहट गायब है। इसके मुकाबले उसी दिन रिलीज हुई 'ओम शांति ओम' की मसाला कहानी ने बाजी मार ली। 'सांवरिया' की असफलता ने स्पष्ट किया कि फिल्म निर्माण में तकनीक और भव्यता तभी काम आती है जब उनके पीछे एक ठोस और जुड़ाव पैदा करने वाली कहानी खड़ी हो।
सितारों के बावजूद दर्शक नहीं जुटे
सुपर फ्लॉप फिल्मों के जिक्र में सुभाष घई की 'यादें' का नाम लेना भी अनिवार्य है। एक समय था जब सुभाष घई का नाम ही हिट की गारंटी होता था। लेकिन 'यादें' के साथ उन्होंने एक ऐसी कहानी चुनी जो पारिवारिक रिश्तों के उलझे हुए ताने-बाने को सुलझाने के बजाय और उलझा गई। फिल्म में ऋतिक रोशन और करीना कपूर जैसे युवा सुपरस्टार्स होने के बावजूद, पटकथा इतनी बिखरी हुई थी कि दर्शक मुख्य किरदारों के जज्बातों से जुड़ ही नहीं पाए। फिल्म के गानों ने तो लोकप्रियता बटोरी, लेकिन स्क्रीनप्ले में गहराई की कमी और अत्यधिक विज्ञापनों के प्रदर्शन ने दर्शकों के अनुभव को किरकिरा कर दिया। यह फिल्म इस बात का उदाहरण बनी कि केवल विदेशी लोकेशंस और बड़े चेहरे फिल्म को नहीं बचा सकते यदि पटकथा की नींव कमजोर हो।
भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसी फिल्में भी रहीं जो 'दुस्साहस' का परिणाम थीं। इसमें 'राम गोपाल वर्मा की आग' का नाम सबसे ऊपर आता है। निर्देशक ने कल्ट क्लासिक फिल्म 'शोले' को दोबारा बनाने की कोशिश की, जिसे दर्शकों ने एक अपराध की तरह लिया। गब्बर सिंह जैसे प्रतिष्ठित किरदार को बब्बर सिंह बनाकर और अजीबो-गरीब कैमरा एंगल्स व शोर-शराबे वाले संगीत के साथ पेश करना दर्शकों को कतई मंजूर नहीं हुआ। मूल फिल्म की आत्मा को चोट पहुँचाना और पात्रों के साथ अनावश्यक छेड़छाड़ करना इस फिल्म की सबसे बड़ी हार बनी। दर्शकों ने इसे भारतीय सिनेमा का सबसे बुरा अनुभव करार दिया।
बड़े सितारों को कमजोर कहानी ने नकारा
अभिषेक बच्चन की 'द्रोणा' ने फैंटेसी और सुपरहीरो शैली में हाथ आजमाया। फिल्म पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए। लेकिन, इसकी कहानी और विलेन का चित्रण इतना कमजोर था कि सिनेमाघरों में दर्शक अपनी हंसी नहीं रोक पाए। हॉलीवुड की तकनीक श्रेष्ठता देख चुके दर्शकों के लिए 'द्रोणा' का बचकाना कथानक एक मजाक बनकर रह गया। फ्लॉप फिल्मों की लिस्ट में अनिल कपूर और श्रीदेवी की सबसे बड़ी फ्लॉप फिल्म 1993 में आई 'रूप की रानी चोरों का राजा' प्रमुख है। इसके अलावा 'मिस्टर बेचारा' (1996), 'हीर रांझा' (1992) और क्रिटिक्स द्वारा सराही गई 'लम्हे' (1991) भी बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही थीं।
'हीर रांझा' (1992) फिल्म को भी बॉक्स ऑफिस पर निराशाजनक परिणाम मिले थे। 'मिस्टर बेचारा' (1996) में अनिल कपूर और श्रीदेवी के साथ नागार्जुन भी थे। अक्षय कुमार के करियर में कई बड़ी फ्लॉप और डिजास्टर फिल्में रही। इनमें सरफिरा, खेल खेल में, स्काई फोर्स, बड़े मियां छोटे मियां, रक्षा बंधन, सम्राट पृथ्वीराज, सेल्फी, बच्चन पांडे और 'राम सेतु' शामिल हैं। इनके अलावा, 'सौगंध' (1991), 'जोकर', चांदनी चौक टू चाइना, कमबख्त इश्क, तीस मार खां, लक्ष्मी (ओटीटी पर), 'बेल बॉटम' और 'बॉस' भी बॉक्स ऑफिस पर असफल रहीं।
जब रीमेक को भी नकार दिया गया
एक दौर ऐसा भी आया जब रीमेक बनाने की होड़ मची। साजिद खान की 'हिम्मतवाला' ने यह भ्रम पाल लिया था कि अस्सी के दशक की तर्कहीन कॉमेडी और लाउड एक्शन आज के दौर में भी चल जाएगा। लेकिन 2013 का दर्शक बदल चुका था। फिल्म का कथानक इतना शोर-शराबे वाला और सिरदर्द पैदा करने वाला था कि दर्शकों ने इसे पहले ही दिन नकार दिया। यह फिल्म इस बात की गवाह बनी कि गुजरे जमाने के फार्मूले अगर बिना किसी बदलाव के पेश किए जाएं, तो वे डिजास्टर ही साबित होते हैं। इसी कड़ी में आमिर खान और अमिताभ बच्चन की 'ठग्स ऑफ हिंदोस्तान' का नाम भी आता है। दो दिग्गजों को एक साथ देखना दर्शकों का सपना था, लेकिन फिल्म की कहानी 'पाइरेट्स ऑफ द कैरेबियन' की एक सस्ती और कमजोर नकल निकली। दर्शकों को लगा कि उन्हें ठगा गया है, क्योंकि फिल्म में न तो किरदारों की गहराई थी और न ही कोई मौलिकता।
एक दौर ऐसा भी आया जब रीमेक बनाने की होड़ मची। साजिद खान की 'हिम्मतवाला' ने यह भ्रम पाल लिया था कि अस्सी के दशक की तर्कहीन कॉमेडी और लाउड एक्शन आज के दौर में भी चल जाएगा। लेकिन 2013 का दर्शक बदल चुका था। फिल्म का कथानक इतना शोर-शराबे वाला और सिरदर्द पैदा करने वाला था कि दर्शकों ने इसे पहले ही दिन नकार दिया। यह फिल्म इस बात की गवाह बनी कि गुजरे जमाने के फार्मूले अगर बिना किसी बदलाव के पेश किए जाएं, तो वे डिजास्टर ही साबित होते हैं। इसी कड़ी में आमिर खान और अमिताभ बच्चन की 'ठग्स ऑफ हिंदोस्तान' का नाम भी आता है। दो दिग्गजों को एक साथ देखना दर्शकों का सपना था, लेकिन फिल्म की कहानी 'पाइरेट्स ऑफ द कैरेबियन' की एक सस्ती और कमजोर नकल निकली। दर्शकों को लगा कि उन्हें ठगा गया है, क्योंकि फिल्म में न तो किरदारों की गहराई थी और न ही कोई मौलिकता।
फिल्म के भव्य सेट के नीचे दबा कथानक
इतिहास गवाह है कि जब-जब फिल्मकारों ने दर्शकों की बुद्धि को कमतर आंका है, बॉक्स ऑफिस पर 'कलंक' जैसी फ़िल्में पैदा हुई हैं। 'कलंक' अपनी भव्यता, भारी-भरकम सेट्स और सितारों की फौज के बावजूद एक ऐसी सुस्त प्रेम कहानी थी जिसे दर्शक पहले ही कई रूपों में देख चुके थे। फिल्म की गति इतनी धीमी थी कि ढाई घंटे का समय काटना दर्शकों के लिए सजा बन गया। भव्यता जब कहानी पर हावी हो जाती है, तो परिणाम हमेशा शून्य ही निकलता है। इन सभी फ्लॉप और सुपर फ्लॉप फिल्मों का यदि हम गहराई से विश्लेषण करें, तो एक ही निष्कर्ष निकलता है कि दर्शक कभी भी तकनीक, बजट या बड़े नाम से लंबे समय तक धोखा नहीं खाता। वह पर्दे पर एक ऐसी कहानी ढूंढता है जो उसके जीवन, उसकी संवेदनाओं या कम से कम उसकी तर्कशक्ति से मेल खाती हो।
असफलता ने भी कई बार सबक सिखाया
चाहे वह 'मेरा नाम जोकर' की अत्यधिक भावुकता हो, 'सांवरिया' की कृत्रिम दुनिया हो या 'आग' जैसा असफल प्रयोग, इन सभी फिल्मों ने फिल्म जगत को कड़वे लेकिन जरूरी सबक दिए हैं। फ्लॉप फिल्में हमें बताती हैं कि फिल्म निर्माण केवल एक व्यापारिक गणित नहीं है, बल्कि यह दर्शकों की नब्ज पहचानने की एक सूक्ष्म कला है। इन फिल्मों की विफलता ने ही अक्सर सिनेमा को नई दिशा दी है और फिल्मकारों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर किया है। इसलिए, जब भी हम हिंदी फिल्म इतिहास की गौरवगाथा लिखें, तो इन असफलताओं को भी वही स्थान मिलना चाहिए, क्योंकि इन्हीं गिरती हुई इमारतों के मलबे पर आज की समझदार और यथार्थवादी फिल्मों की नींव खड़ी है। सफलता अगर मंजिल है, तो ये फ्लॉप फ़िल्में वे मील के पत्थर हैं जो बताते हैं कि किधर नहीं मुड़ना है। अंततः, सिनेमा के इस महासागर में लहरें वही ऊंची उठती हैं जिनकी गहराई में एक सच्ची और सशक्त कहानी छिपी होती है।
चाहे वह 'मेरा नाम जोकर' की अत्यधिक भावुकता हो, 'सांवरिया' की कृत्रिम दुनिया हो या 'आग' जैसा असफल प्रयोग, इन सभी फिल्मों ने फिल्म जगत को कड़वे लेकिन जरूरी सबक दिए हैं। फ्लॉप फिल्में हमें बताती हैं कि फिल्म निर्माण केवल एक व्यापारिक गणित नहीं है, बल्कि यह दर्शकों की नब्ज पहचानने की एक सूक्ष्म कला है। इन फिल्मों की विफलता ने ही अक्सर सिनेमा को नई दिशा दी है और फिल्मकारों को अपनी रणनीति बदलने पर मजबूर किया है। इसलिए, जब भी हम हिंदी फिल्म इतिहास की गौरवगाथा लिखें, तो इन असफलताओं को भी वही स्थान मिलना चाहिए, क्योंकि इन्हीं गिरती हुई इमारतों के मलबे पर आज की समझदार और यथार्थवादी फिल्मों की नींव खड़ी है। सफलता अगर मंजिल है, तो ये फ्लॉप फ़िल्में वे मील के पत्थर हैं जो बताते हैं कि किधर नहीं मुड़ना है। अंततः, सिनेमा के इस महासागर में लहरें वही ऊंची उठती हैं जिनकी गहराई में एक सच्ची और सशक्त कहानी छिपी होती है।
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