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- हेमंत पाल
भारतीय संगीत सिर्फ 'एक्सॉटिक एलिमेंट' नहीं बल्कि कहानी का अहम हिस्सा बनता जा रहा है। बॉलीवुड संगीत की खासियत उसकी विविधता है क्लासिकल, फोक, पॉप, सूफी और इलेक्ट्रॉनिक का अद्भुत मिश्रण। यही वजह है कि हॉलीवुड फिल्ममेकर्स भी इन गानों की ओर आकर्षित होते हैं। कई बार ये गाने सिर्फ बैकग्राउंड म्यूजिक नहीं होते, बल्कि फिल्म की शुरुआत, अंत या किसी खास सीन को यादगार बना देते हैं। उदाहरण के लिए 'छैय्या छैय्या' फिल्म 'इनसाइडर मेन' में, जान पहचान हो 'घोस्ट वर्ल्ड' में और बॉम्बे थीम 'लॉर्ड ऑफ़ वार' में। इन गानों ने यह साबित किया कि संगीत की कोई भाषा नहीं होती, वो तो सुनने वाले पर अपना जादू चलाते हैं। बॉलीवुड गानों का हॉलीवुड में इस्तेमाल सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी है। यह भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंच देता है और विदेशों में बसे भारतीयों को भावनात्मक जुड़ाव देता है। साथ ही फिल्म की कहानी में नई परतें भी जोड़ता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ये गाने इमोशनल शॉर्टकट की तरह काम करते हैं। कुछ सेकंड में ही दर्शक इससे जुड़ जाते हैं।
कुछ और ऐसे मौके भी हैं जब बॉलीवुड गानों ने हॉलीवुड में अपनी छाप छोड़ी। इससे साफ है कि बॉलीवुड संगीत अब सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रहा। सवाल उठता है कि यह ट्रेंड क्यों बढ़ रहा है! तो इसका सीधा सा जवाब है ग्लोबलाइजेशन का प्रभाव। आज दुनिया पहले से ज्यादा जुड़ी हुई है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और सोशल मीडिया ने कंटेंट की सीमाएं खत्म कर दी। भारत एक बड़ा फिल्म बाजार है और हॉलीवुड इसे नजरअंदाज नहीं कर सकता। साथ ही बॉलीवुड म्यूजिक का रिदम और मेलोडी पश्चिमी संगीत से अलग है, जो हॉलीवुड फिल्मों में एक नया फ्लेवर जोड़ता है। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक ट्रेंड है या आने वाले समय में और बढ़ेगा! संकेत साफ हैं कि इंटरनेशनल कोलैबोरेशन बढ़ रहा हैं। भारतीय कलाकार ग्लोबल स्तर पर पहचान बना रहे हैं। फिल्मों में क्रॉस-कल्चरल कंटेंट की मांग बढ़ रही है। इससे लगता है कि भविष्य में और भी बॉलीवुड गाने हॉलीवुड फिल्मों में सुनाई देंगे और शायद पूरी फिल्में भी इस तरह के मिश्रण पर आधारित हों। बॉलीवुड और हॉलीवुड का यह मेल सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं है, यह दो संस्कृतियों का मिलन है। जब 'छैय्या छैय्या' जैसे गाने न्यूयॉर्क की सड़कों पर गूंजते हैं या 'मेरा जूता है जापानी' मास्को की सड़कों पर सुनाई देता है, तो यह साबित होता है कि संगीत की कोई सीमा नहीं होती। आने वाले समय में यह सहयोग और गहरा होगा, और शायद वह दिन दूर नहीं जब एक ही फिल्म में दोनों इंडस्ट्री के कलाकार, संगीत और कहानियां बराबरी से नजर आएं।
आज भी जब कोई बॉलीवुड का गाना विदेश में सुनाई देता है, तो भारतीय दर्शकों के चेहरे पर अपनापन और गर्व दोनों झलकने लगते हैं। फ़िलहाल तक बॉलीवुड‑हॉलीवुड बहस आमतौर पर इस बात पर रही कि हम किन स्टोरीज़ या ट्यून्स को इंस्पायर करते हैं। लेकिन, कम जाने‑माने इस तथ्य को कि बॉलीवुड की ही धुनें भी कई बड़ी हॉलीवुड फिल्मों और टीवी शोज़ में जगह बना चुकी हैं। ये गाने न सिर्फ़ वहां के ऑडियंस को एक अलग कल्चरल लेयर देते हैं, बल्कि बॉलीवुड की म्यूज़िक इंडस्ट्री की ग्लोबल इमेज को भी मजबूत करते हैं। राज कपूर के युग से लेकर नवीनतम मार्वल सीरीज़ तक, बॉलीवुड संगीत कई तरह से हॉलीवुड के फिल्म स्कोर का हिस्सा बन चुका है। उदाहरण के लिए, राइन रेनॉल्ड्स की सुपरहिट फिल्म 'डेडपूल' (2016) ने राज कपूर की 'श्री 420' के अमर गीत 'मेरा जूता है जापानी' को ओपनिंग और क्लाइमेक्स दोनों सीन में इस्तेमाल किया। इससे डरावने‑हास्य‑डरामा वाला यह सुपरहीरो यूनिवर्स अचानक भारतीय सिनेमा की याद दिलाने लगा। इसी फिल्म में बाद में 'कभी हमने नहीं सोचा था' जैसा रोमांटिक क्लासिक भी दिखाया गया, जिससे यह संदेश मिलता है कि हॉलीवुड फ़िल्म‑निर्माता अब भारतीय गानों को सिर्फ़ एक क्विर्की टच नहीं, बल्कि इमोशनल टोन‑सेटर के रूप में भी देख रहे हैं।
डेज़ी वॉशिंगटन और क्लाइव ओॉन की थ्रिलर 'इनसाइड द मेन' (2006) में की फिल्म दिल से का पॉइंट ऑफ ऑवर गाना 'छैय्यां‑छैय्यां' ओपनिंग क्रेडिट्स में बजता दिखता है, जिसे निर्देशक स्पाइक ली ने खुले अमल तौर पर कल्चरल मिक्स बताया। भारी बैसों और ब्रास इंस्ट्रूमेंट्स के साथ रीमिक्स वर्ज़न यहां उस शहर की गतिविधि को दर्शाता है जिसमें लोग अलग‑अलग धर्मों, भाषाओं और तानों के होते हुए भी एक साथ जीवन जी रहे हैं। इस तरह बॉलीवुड की एक देशी धुन शहर की सामाजिक जटिलता को दर्शाने वाला ऑडियो टेक्स्चर बन जाती है। ऐसा ही एक दिलचस्प उदाहरण निकोल किडमैन और ईवान मैकग्रेगर वाली 'म्यूज़िकल माऊलिन रॉग' (2001) में सुनाई देता है, जहां फिल्म चाइना गेट का गाना 'छम्मा‑छम्मा बाजे में मेरी पैजनिया' निकोल किडमैन के 'डायमंड्स आर अ गर्ल्स बेस्ट फ्रेंड' नंबर के बीच में इंटरकट के रूप में आता है। इस जगह इसे सिर्फ़ एक एक्ज़ॉटिक ट्विस्ट नहीं, बल्कि विश्वव्यापी एंटरटेनमेंट के एक फ्यूज़न फॉर्म के रूप में पेश किया गया है। दरअसल, यह दिखाता है कि बॉलीवुड की डांस नंबर्स अब इंटरनेशनल फिल्मों के विज़ुअल लैंग्वेज का हिस्सा बन चुके हैं।
मोहम्मद रफी की आवाज़ वाले 'मेरा मन तेरा प्यासा' और लता मंगेशकर के 'वादा न तोड़' को जोना कैरॉन और जिम कैरी की मनोवैज्ञानिक रोम‑ड्रामा 'इटरनल सनशाइन ऑफ द स्पोटलेस माइंड' (2004) में जगह मिली है। यहां ये गाने दो किरदारों के रिश्ते की भावनात्मक गहराई को दिखाने के लिए इस्तेमाल होते हैं, जिससे यह प्रस्तुत होता है कि भारतीय म्यूज़िक की भावनात्मक लय को यूरोप‑अमेरिकी ऑडियंस भी उतनी ही दूरी से नहीं समझते, जितनी दूरी से वे अक्सर भारतीय फिल्मों को देखते हैं। इसी तरह किशोर कुमार का 'लहरों की तरह यादें' ज़ॉम्बी‑कॉमेडी फिल्म 'शौन ऑफ़ द डेड' में लगाया गया, जिससे यह महसूस होता है कि बॉलीवुड की रोमांटिक धुनें यहां भी एक थोड़ा अलग और इरोनिक टोन लेकर ऑडियंस को चुभने का काम करती हैं।
हॉलीवुड फिल्मों में बॉलीवुड गानों का इस्तेमाल कभी ओपनिंग या क्लाइमेक्स सीन में तो कभी मोड़ वाले मोमेंट पर दिखता है, जैसे 'द डिक्टेटर' (2011) में पंजाबी हिट 'मुंडियां तू बच के रही' का इस्तेमाल, जो फिल्म के हास्य और सतिर पर और भी ज़ोर डालता है। इसी तरह 'द एक्सीडेंटल हसबैंड' (2008) में साथिया का 'छलका छलका रे' शादी की जगह पर बजता हुआ दिखता है, जिससे यह लगता है मानो हॉलीवुड वेडिंग सीन में भी भारतीय बारात की यादें जग रही हैं। इन तरह के इस्तेमाल से ऑडियंस को लगता है कि उनकी फिल्म बस एक जगह की नहीं, बल्कि दुनिया की कहानी है, और भारतीय म्यूज़िक उस कहानी का एक प्रामाणिक पार्ट बन जाता है। आर रहमान की 'बॉम्बे थीम' को निकलॉस केज‑फिल्म 'लार्ड ऑफ़ वार' (2005) में इस्तेमाल किया गया, जहां यह धुन अंडरवर्ल्ड और वैश्विक हथियार ट्रेड के बीच में एक दमामेदार बैकड्रॉप बनती है। यह दिखाता है कि आज भारतीय गाने सिर्फ़ रोमांटिक या डांस सीन तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि गहरे राजनीतिक और सामाजिक थीम वाली फिल्मों में भी स्कोरिंग टूल के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं।
यह ट्रेंड सिर्फ़ फिल्मों तक ही नहीं रुका है, बल्कि रीसेंट वेब‑सीरीज़ में भी दिखता है। जैसे मार्वल की सुपरहिट सीरीज़ 'लौकी' के फाइनल एपिसोड में सोनाक्षी सिन्हा‑स्टार फिल्म 'हैप्पी फिर भाग जाएगी' (2018) का गाना 'स्वाग सहा नहीं जाए' बैकग्राउंड में बजता दिखता है, जिस पर बाद में एंड क्रेडिट्स में ऑफिशियल रूप से भी लिखा जाता है। इससे यह इमेज बनती है कि बॉलीवुड ने अब न सिर्फ़ फिल्मों, बल्कि डिजिटल‑आधुनिक स्ट्रीमिंग यूनिवर्स में भी अपनी जगह बना ली है। इन सब उदाहरणों से यह साफ़ होता है कि बॉलीवुड की म्यूज़िक इंडस्ट्री अब सिर्फ़ भारत या दिल्ली‑मुंबई तक सीमित नहीं रही, बल्कि एक ग्लोबल रेफरेंस पॉइंट बन गई।
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