हिंदी फिल्मों के गीत केवल मनोरंजन नहीं होते, वे उस दौर की भावनाओं, रचनात्मकता और कलाकारों की जद्दोजहद की कहानी भी अपने भीतर समेटे होते हैं। कभी कोई गीत आखिरी वक्त में फिल्म में जुड़ता है और अमर हो जाता है, तो कभी बेहद लोकप्रिय गीत भी फिल्म से बाहर कर दिया जाता है। कई बार गीतों के मुखड़े और अंतरे पर महीनों बहस चलती है, तो कभी एक धुन अचानक पैदा होकर इतिहास बन जाती है। हिंदी सिनेमा के लंबे सफर में ऐसे अनगिनत किस्से बिखरे पड़े हैं, जो बताते हैं कि पर्दे पर दिखने वाला तीन-चार मिनट का गीत दरअसल कितनी दिलचस्प परिस्थितियों में जन्म लेता है।
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- हेमंत पाल
फिल्मी गीतों के इतिहास में ऐसे अनेक दिलचस्प प्रसंग मिलते हैं। एक मशहूर किस्सा फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ के गीत 'प्यार किया तो डरना क्या' से जुड़ा है। बताया जाता है कि इस गीत के भव्य दृश्यांकन के लिए शीश महल का विशाल सेट बनाया गया था और इसे फिल्माने में लंबे समय और भारी खर्च लगा। बाद में यही गीत फिल्म की पहचान बन गया। इसी तरह फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ का गीत 'जीना यहां मरना यहां' भी दिलचस्प कहानी समेटे हुए है। कहा जाता है कि यह गीत कहानी के भाव को समेटने के लिए बाद में जोड़ा गया और अंततः वही फिल्म की आत्मा बन गया। वहीं कुछ गीत ऐसे भी रहे जो रिकॉर्ड होने और फिल्माए जाने के बाद भी अंतिम संपादन में हटा दिए गए। कई बार फिल्म की लंबाई, कहानी की गति या बदलती परिस्थितियों के कारण ऐसे फैसले लेने पड़े। इन रोचक घटनाओं से स्पष्ट है कि फिल्मी गीत केवल धुन और शब्द नहीं होते, बल्कि उनके पीछे भी एक अनकही कहानी छिपी होती है, जो भारतीय सिनेमा के इतिहास को और भी रंगीन बनाती है।
इन्हीं कहानियों में एक बेहद मशहूर किस्सा जुड़ा है 1960 में आई फिल्म 'काला बाजार' के गीत खोया खोया चांद से। कहा जाता है कि इस गीत के बोल एक माचिस की डिब्बी पर लिखे गए थे। उस दौर में फिल्म के निर्माता और अभिनेता देव आनंद थे और संगीतकार थे महान सचिन देव बर्मन। गीत लिखने की जिम्मेदारी मशहूर गीतकार शैलेन्द्र को दी गई थी। कहानी कुछ यूं है कि शैलेंद्र बेहद व्यस्त थे और गीत लिखने में देरी हो रही थी। तब एसडी बर्मन ने अपने बेटे राहुल देव बर्मन यानी पंचम दा को भेजा कि वे शैलेंद्र से गीत लिखवाकर ही लौटें। दोनों रात में मुंबई के जुहू बीच पर टहलते हुए धुन और शब्द तलाश रहे थे। समुद्र की लहरें, आसमान में पूरा चांद और सन्नाटा माहौल बेहद काव्यात्मक था, लेकिन शब्द अभी भी गायब थे। इस बीच शैलेंद्र की माचिस खत्म हो गई और उन्होंने पंचम दा से माचिस मांगी। पंचम दा ने उसी डिब्बी पर ताल देते हुए धुन गुनगुनाई। बस, वही क्षण गीत के जन्म का क्षण बन गया। शैलेंद्र ने आसमान की ओर देखा और अचानक बोल निकले 'खोया-खोया चांद, खुला आसमान …!' पास में कागज-कलम नहीं था, तो पंचम दा ने तुरंत माचिस की डिब्बी पर ही शब्द लिख लिए। बाद में इस गीत को मोहम्मद रफ़ी की आवाज मिली और यह गीत हिंदी फिल्म संगीत का अमर हिस्सा बन गया। यह कहानी बताती है कि महान गीत कभी-कभी बेहद साधारण परिस्थितियों में भी जन्म ले लेते हैं।
हिंदी फिल्म इतिहास में ऐसा पहला किस्सा नहीं था। कई गीतों के पीछे ऐसी घटनाएं हैं जो आज भी संगीत प्रेमियों को रोमांचित करती हैं। उदाहरण के लिए 1964 की फिल्म 'संगम' का प्रसिद्ध गीत 'दोस्त दोस्त ना रहा' को गाने के लिए पहले किसी और गायक पर विचार किया गया था, लेकिन अंततः अभिनेता-निर्माता राज कपूर ने फैसला किया कि यह गीत मुकेश ही गाएंगे। मुकेश की दर्द भरी आवाज ने इस गीत को इतना असरदार बना दिया कि यह दोस्ती और विश्वासघात का प्रतीक बन गया। इसी तरह 1957 की फिल्म 'प्यासा' का गीत 'ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है' भी अपने बनने की कहानी के कारण खास माना जाता है। निर्देशक गुरु दत्त चाहते थे कि यह गीत फिल्म के चरम भावनात्मक क्षण को व्यक्त करे। संगीतकार सचिन देव बर्मन और गीतकार साहिर लुधियानवी के बीच इस गीत के मूड को लेकर लंबी चर्चा हुई। कई ड्राफ्ट के बाद जब अंतिम शब्द बने और मोहम्मद रफ़ी ने उसे गाया, तब जाकर वह गीत सिनेमा के इतिहास में दर्ज हो गया।
कभी-कभी गीत बनने के बाद भी फिल्म का हिस्सा नहीं बन पाते। 1965 की फिल्म 'गाइड' के निर्माण के दौरान भी ऐसा हुआ था। निर्देशक विजय आनंद और अभिनेता देव आनंद की इस फिल्म में कई गीत रिकॉर्ड किए गए, लेकिन संपादन के दौरान कुछ गीतों को हटा दिया गया ताकि कहानी की गति बनी रहे। हालांकि जो गीत फिल्म में रहे, जैसे 'आज फिर जीने की तमन्ना है' और 'तेरे मेरे सपने' भारतीय फिल्म संगीत के क्लासिक बन गए। इसके विपरीत कई बार ऐसा भी हुआ कि गीत आखिरी समय में फिल्म में जोड़ा गया और वह सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुआ। 1971 की फिल्म 'आनंद' का गीत 'जिंदगी कैसी है पहेली' इसका अच्छा उदाहरण है। निर्देशक हृषिकेश मुखर्जी चाहते थे कि फिल्म के अंत में जीवन के रहस्य को दर्शाने वाला एक गीत हो। संगीतकार सलिल चौधरी और गीतकार योगेश ने मिलकर यह गीत तैयार किया, जिसे मन्ना डे ने गाया। यह गीत फिल्म के दर्शन को बेहद खूबसूरती से व्यक्त करता है।
हिंदी सिनेमा में ऐसे भी दौर आए जब बिना गीत वाली फिल्मों का प्रयोग किया गया। उदाहरण के तौर पर 'इत्तेफ़ाक़' को बिना किसी पारंपरिक गीत के बनाया गया था। निर्देशक यश चोपड़ा की इस फिल्म में केवल बैकग्राउंड म्यूजिक था। उस समय यह एक साहसिक प्रयोग माना गया, क्योंकि दर्शक फिल्मों में गीतों के आदी थे। दूसरी ओर कुछ फिल्में ऐसी भी बनीं जिनमें गीतों की भरमार थी। 1952 की फिल्म 'बैजू बावरा' इसका शानदार उदाहरण है। संगीतकार नौशाद ने इस फिल्म में शास्त्रीय संगीत पर आधारित कई गीत तैयार किए, जिनमें ;मन तड़फत हरी दर्शन को आज' और 'ओ दुनिया के रखवाले' आज भी संगीत प्रेमियों के बीच बेहद लोकप्रिय हैं। इन गीतों ने यह साबित किया कि शास्त्रीय संगीत भी मुख्यधारा सिनेमा में दर्शकों का दिल जीत सकता है। गीतों के मुखड़े और अंतरे को लेकर भी कई दिलचस्प घटनाएं हुई हैं। कभी-कभी एक छोटा सा शब्द पूरे गीत की पहचान बन जाता है। 1969 की फिल्म 'आराधना' के गीत 'मेरे सपनों की रानी' को ही लें। संगीतकार सचिन देव बर्मन उस समय बीमार थे, इसलिए उनके बेटे आरडी बर्मन ने रिकॉर्डिंग की जिम्मेदारी संभाली। गीतकार आनंद बक्षी के सरल शब्द और किशोर कुमार की मस्ती भरी आवाज ने इस गीत को युवाओं का एंथम बना दिया।
इन तमाम कहानियों से यह साफ होता है कि फिल्मी गीत केवल स्टूडियो में बैठकर नहीं बनते। कभी समुद्र किनारे टहलते हुए धुन जन्म लेती है, कभी किसी कवि को अचानक कोई पंक्ति सूझ जाती है, तो कभी निर्देशक और संगीतकार के बीच लंबी बहस के बाद कोई गीत आकार लेता है। आज के डिजिटल दौर में जब कंप्यूटर और आधुनिक तकनीक से संगीत बनता है, तब इन पुराने किस्सों को सुनना और भी रोमांचक लगता है। उस समय कलाकारों के पास सीमित साधन थे, लेकिन कल्पना शक्ति असीमित थी। शायद यही वजह है कि उस दौर के गीत आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। दरअसल, हिंदी सिनेमा के गीतों की यही खूबसूरती है, वे केवल फिल्म का हिस्सा नहीं होते, बल्कि समय के साथ संस्कृति का हिस्सा बन जाते हैं। चाहे वह माचिस की डिब्बी पर लिखा गया कोई मुखड़ा हो या अचानक रिकॉर्ड हुआ कोई गीत, हर धुन के पीछे एक कहानी छिपी होती है। और यही कहानियां फिल्म संगीत के इतिहास को इतना जीवंत और दिलचस्प बनाती हैं।
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