Saturday, June 20, 2026

लगान @ 25 : सिनेमा की सांस्कृतिक विजय गाथा


    सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में सिर्फ सफलता के बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों तक सीमित नहीं रही, वक़्त के साथ वे सांस्कृतिक चेतना का अमिट हिस्सा बन गई। आशुतोष गोवारिकर निर्देशित और आमिर खान अभिनीत और निर्मित 'लगान: वन्स अपॉन अ टाइम इन इंडिया' एक ऐसी ही युगांतरकारी सिनेमा कृति है, जिसने अपनी रिलीज के ढाई दशक पूरे कर लिए। सन 1893 के औपनिवेशिक कालखंड की पृष्ठभूमि में रची गई यह फिल्म महज स्पोर्ट्स-म्यूजिकल ड्रामा नहीं, बल्कि यह मानवीय जिजीविषा, समूह की एकता और राष्ट्रवाद की एक ऐसी महागाथा थी, जिसने दुनियाभर में भारतीय सिनेमा को एक नई पहचान दिलाई। 25 साल बाद भी जब इस फिल्म की प्रासंगिकता का विश्लेषण किया जाता है, तो स्पष्ट होता है, कि इसकी सफलता के पीछे केवल एक बेहतरीन कहानी नहीं, इसके निर्माण के पीछे छुपा मेकर्स का वह अटूट विश्वास और अथक परिश्रम था जिसने हर विपरीत परिस्थिति को अवसर में बदल दिया।
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- हेमंत पाल

   ज से पच्चीस साल पहले 15 जून 2001 को जब निर्देशक आशुतोष गोवारिकर और अभिनेता-निर्माता आमिर खान की फिल्म 'लगान' सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह फिल्म भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक मील का पत्थर बन जाएगी। 25 साल बाद भी 'लगान' केवल एक सफल फिल्म नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दस्तावेज, एक सामाजिक रूपक और भारतीय सिनेमा की वैश्विक पहचान का प्रतीक मानी जाती है। ऐसे दौर में जब हिंदी सिनेमा रोमांस, एक्शन और पारिवारिक ड्रामों के इर्द-गिर्द घूम रहा था, 'लगान' ने दर्शकों को 19वीं सदी के एक काल्पनिक गांव ‘चंपानेर’ में पहुंचाकर औपनिवेशिक शोषण, सामूहिक संघर्ष, आत्मसम्मान और खेल भावना की ऐसी कहानी सुनाई, जिसने भाषा, वर्ग और भूगोल की सीमाओं को पार कर लिया। यही कारण है कि ढाई दशक बाद भी यह फिल्म दर्शकों की स्मृतियों में उतनी ही ताजा है, जितनी अपनी रिलीज के समय थी।
    'लगान' के निर्माण का समय काल वह दौर था, जब आमिर खान सफल अभिनेता बन गए थे। लेकिन, निर्माता बनने को लेकर उनके मन में गहरी झिझक थी। उन्होंने अपने पिता और निर्माता ताहिर हुसैन को आर्थिक संकटों और कर्ज के बोझ से गुजरते देखा था। इसलिए उन्होंने स्वयं से वादा किया था कि कभी फिल्म नहीं बनाएंगे। लेकिन, आशुतोष गोवारिकर की पटकथा ने उन्हें अपना फैसला बदलने पर मजबूर कर दिया। आमिर स्वयं स्वीकार करते हैं, कि उन्होंने पहले कई बार कहा था कि वे कभी निर्माता नहीं बनेंगे। लेकिन, 'लगान' की कहानी इतनी प्रभावशाली थी कि उन्होंने जोखिम उठाने का फैसला किया। यही जोखिम आगे चलकर 'आमिर खान प्रोडक्शंस' की नींव बना। विडंबना यह है कि जिस फिल्म ने उन्हें निर्माता के रूप में स्थापित किया, उसी फिल्म के बारे में उन्हें शुरुआत में आशंकाएं भी थीं। आशुतोष की पहले की दो फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं रही थीं। ऐसे में कहानी पर भरोसा होने के बावजूद असफलता का डर बना हुआ था। मगर इतिहास ने साबित किया कि यह जोखिम भारतीय सिनेमा के सबसे सफल दांव में से एक था।
    पहली नजर में 'लगान' एक क्रिकेट मैच की कहानी लगती है, लेकिन इसकी वास्तविक शक्ति उसके प्रतीकवाद में छिपी है। फिल्म में क्रिकेट केवल खेल नहीं, बल्कि सत्ता और प्रतिरोध के बीच संघर्ष का माध्यम बन जाता है। भुवन और उसके गांव के लोग अंग्रेजों के खिलाफ हथियार नहीं उठाते, बल्कि उन्हीं के खेल में उन्हें चुनौती देते हैं। यह औपनिवेशिक मानसिकता के विरुद्ध आत्मविश्वास की लड़ाई होती है। फिल्म का चरम दृश्य वह था जहां अंतिम गेंद तक परिणाम अनिश्चित रहता है। भारतीय दर्शकों के लिए केवल खेल का रोमांच नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ जीत की भावनात्मक अनुभूति बन जाता है। यही कारण है कि 'लगान' का प्रभाव समय के साथ कम नहीं हुआ। हर पीढ़ी इसे अपने संदर्भ में पढ़ती है, कभी संघर्ष की कहानी के रूप में, कभी नेतृत्व के पाठ के रूप में और कभी सामूहिकता की शक्ति के उदाहरण के रूप में।
    दिलचस्प तथ्य यह है कि आमिर खान स्वयं 'लगान' में अपने अभिनय को सबसे कम तैयारी वाला मानते हैं। उनका कहना है, कि निर्माता की जिम्मेदारियों ने उनका अधिकांश समय और ऊर्जा ले ली। शूटिंग, बजट, लोकेशन, तकनीकी व्यवस्थाएं और पूरी यूनिट की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी। इसके बावजूद भुवन का चरित्र भारतीय सिनेमा के सबसे यादगार नायकों में गिना जाता है। इसका कारण अभिनय की तकनीकी तैयारी से अधिक चरित्र की सच्चाई और आमिर की सहजता थी। भुवन न तो पारंपरिक सुपर हीरो है और न किसी असाधारण शक्ति से लैस व्यक्ति। वह एक सामान्य किसान है, जो अपने विश्वास और साहस के दम पर असंभव को संभव बनाने का प्रयास करता है।
    फिल्म की शूटिंग गुजरात के कच्छ क्षेत्र में हुई। आज जब कलाकार फिल्म के 25 वर्ष पूरे होने पर उन दिनों को याद करते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि 'लगान' का निर्माण किसी युद्ध काल से कम नहीं था। ब्रिटिश अधिकारी कैप्टन एंड्रू रसेल की भूमिका निभाने वाले अभिनेता पॉल ब्लैकथॉर्न ने शूटिंग को 'प्रेशर कुकर' जैसा अनुभव बताया। उनके अनुसार, चार महीनों तक भारतीय और ब्रिटिश कलाकारों, स्थानीय ग्रामीणों और विशाल तकनीकी दल के साथ काम करना बेहद चुनौतीपूर्ण था। कच्छ की भीषण गर्मी, धूल भरी आंधियां और टिड्डियों के झुंड कई बार शूटिंग रोकने के लिए मजबूर कर देते थे। लेकिन, इन कठिन परिस्थितियों ने फिल्म के यथार्थवाद को और मजबूत बनाया। स्क्रीन पर दिखाई देने वाली धूप, पसीना और संघर्ष वास्तविक थे, किसी कृत्रिम सेट का परिणाम नहीं।
    'लगान' के अधिकांश सहायक पात्र आज भी दर्शकों की स्मृति में जीवित हैं। इसका कारण उनकी प्रामाणिकता है। मूक ढोल वादक बाघा की भूमिका निभाने वाले अमीन हाजी ने इस किरदार को जीवंत बनाने के लिए मूक-बधिर लोगों और उनके परिवारों से संवाद किया। उन्होंने केवल अभिनय नहीं किया, बल्कि उस जीवन को समझने की कोशिश की, जिसे वे पर्दे पर प्रस्तुत कर रहे थे। परिणामस्वरूप बाघा फिल्म के सबसे संवेदनशील और लोकप्रिय पात्रों में शामिल हो गया। इसी तरह गोली की भूमिका निभाने वाले दया शंकर पांडे का अनोखा गेंदबाजी एक्शन आज भी चर्चा का विषय है। महीनों की मेहनत और अभ्यास के बाद तैयार की गई उनकी गेंदबाजी शैली इतनी प्रभावशाली थी, कि फिल्म देखने के बाद सौरव गांगुली और वीरेंद्र सहवाग जैसे अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों को भी विश्वास नहीं हुआ कि यह किसी कंप्यूटर तकनीक का परिणाम नहीं है।
    'लगान' ने केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी छाप छोड़ी। वर्ष 2002 में इसे अकादमी पुरस्कार (ऑस्कर) में सर्वश्रेष्ठ विदेशी भाषा फिल्म श्रेणी के लिए नामांकन प्राप्त हुआ। यह उपलब्धि उस समय भारतीय सिनेमा के लिए असाधारण मानी गई। फिल्म ने आठ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी जीते। संगीत, गीत, कला निर्देशन, वेशभूषा, कोरियोग्राफी और लोकप्रिय फिल्म जैसी विभिन्न श्रेणियों में मिले सम्मान इस बात का प्रमाण थे कि 'लगान' केवल व्यावसायिक सफलता नहीं, बल्कि कलात्मक उत्कृष्टता का भी उदाहरण थी।
    यदि फिल्म की कथा उसका शरीर है, तो एआर रहमान का संगीत उसकी आत्मा है। 'घनन घनन' में बारिश की प्रतीक्षा, 'राधा कैसे न जले' में प्रेम और ईर्ष्या, 'ओ पालनहारे' में आध्यात्मिक विश्वास, 'चले चलो' में संघर्ष की ऊर्जा और 'मितवा ओ मितवा’ में आशा की धड़कन सुनाई देती है। जावेद अख्तर के गीतों और रहमान की धुनों ने फिल्म को भावनात्मक ऊंचाई प्रदान की। आज भी इन गीतों को सुनते ही दर्शक सीधे चंपानेर पहुंच जाते हैं। यही किसी महान फिल्म संगीत की सबसे बड़ी सफलता होती है।
    फिल्म से जुड़ा एक भावनात्मक प्रसंग इसकी पहली सार्वजनिक स्क्रीनिंग से जुड़ा है। शूटिंग के दौरान कच्छ के ग्रामीण कलाकारों और स्थानीय लोगों ने आमिर खान से पूछा था कि क्या उन्हें फिल्म देखने का अवसर मिलेगा। क्योंकि, उनके क्षेत्र में सिनेमाघर नहीं थे। आमिर ने वादा किया कि फिल्म की पहली सार्वजनिक स्क्रीनिंग वहीं होगी। रिलीज से पहले पूरी टीम फिल्म की प्रिंट लेकर भुज पहुंची और स्थानीय लोगों के लिए विशेष प्रदर्शन आयोजित किया। ब्रिटिश कलाकार भी उसमें शामिल हुए। यह घटना बताती है कि 'लगान' केवल एक फिल्म परियोजना नहीं थी, बल्कि उसमें शामिल लोगों के साथ भावनात्मक साझेदारी भी थी।
    25 सालों बाद भी 'लगान' का आकर्षण इसलिए कायम है, क्योंकि यह अपने समय की सीमाओं में बंधी फिल्म नहीं है। इसमें राष्ट्रवाद है, लेकिन उग्रता नहीं; मनोरंजन है, लेकिन सतहीपन नहीं; इतिहास है, लेकिन बोझिलता नहीं। यह फिल्म हमें बताती है कि नेतृत्व क्या होता है, टीमवर्क कैसे काम करता है, विश्वास किस तरह असंभव दिखने वाले लक्ष्य को संभव बना सकता है और संस्कृति किस प्रकार प्रतिरोध का माध्यम बन सकती है। 'लगान' उन दुर्लभ फिल्मों में है, जो हर बार देखने पर नया अर्थ देती हैं। यही कारण है कि ढाई दशक बाद भी भुवन की वह आखिरी गेंद, कप्तान रसेल की बेचैनी, गांव वालों की उम्मीदें और 'चले चलो' का स्वर दर्शकों के भीतर गूंजता रहता है। शायद आमिर खान के चाचा नासिर हुसैन सही कहते थे 'महान फिल्में बनाई नहीं जातीं, वे बस हो जाती हैं।' यह ऐसी ही एक फिल्म है, जो बनी नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा के इतिहास में घटित हुई।
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