Wednesday, June 3, 2026

'विजय' की जीत से सिनेमा की सत्ता मजबूत

 
     तमिलनाडु भारतीय राजनीति का वह अनोखा प्रदेश है, जहां सिनेमा मनोरंजन का माध्यम नहीं, जनभावनाओं, सामाजिक चेतना और राजनीतिक नेतृत्व का सबसे प्रभावी मंच रहा है। यहां फिल्मों के नायक अक्सर जनता की उम्मीदों के प्रतीक बन जाते हैं, फिर वही लोकप्रियता उन्हें सत्ता के गलियारों तक पहुंचा देती है। एमजी रामचंद्रन और जे जयललिता जैसे नेताओं ने इस परंपरा को मजबूत किया था। अब अभिनेता विजय थलापति के राजनीति में उतरने जीत हासिल करने से तमिलनाडु की राजनीतिक फिजा बदलती दिखाई दे रही। उनकी लोकप्रियता ने पारंपरिक द्रविड़ दलों को भी चौंकाया। क्या विजय थलापति एक और फिल्मी सितारे की तरह राजनीति में आए हैं या वे वास्तव में तमिल राजनीति का नया अध्याय लिखने वाले हैं!
000 

- हेमंत पाल 

    तमिलनाडु की राजनीति को वहां की फिल्म संस्कृति देश के अन्य राज्यों से अलग बनाती है। यहां सिनेमा और राजनीति का रिश्ता दशकों पुराना है। द्रविड़ आंदोलन के समय से ही फिल्मों का इस्तेमाल राजनीतिक विचारधारा को जनता तक पहुंचाने के लिए किया गया। उस दौर में फिल्मों के संवाद केवल मनोरंजन नहीं थे, बल्कि सामाजिक संदेश और राजनीतिक चेतना के वाहक बन चुके थे। सीएन अन्नादुरई और एम करुणानिधि जैसे नेताओं ने फिल्मों की पटकथाओं और संवादों के जरिए द्रविड़ विचारधारा को मजबूत किया। तमिल अस्मिता, सामाजिक न्याय और हिंदी विरोध जैसे मुद्दे फिल्मों में खुलकर दिखाई देने लगे। यही वह समय था जब सिनेमा तमिल राजनीति का सबसे बड़ा माध्यम बन गया।
    इसी जमीन पर उभरे एमजी रामचंद्रन, जिन्हें जनता केवल अभिनेता नहीं, मसीहा मानने लगी थी। फिल्मों में उनका किरदार गरीबों के रक्षक, ईमानदार नेता और अन्याय के खिलाफ लड़ने वाले नायक का होता था। धीरे-धीरे लोगों ने परदे और वास्तविक जीवन के बीच का फर्क मिटा दिया। जब एमजीआर राजनीति में आए तो जनता ने उन्हें उसी भरोसे के साथ स्वीकार किया, जैसा फिल्मों में करती थी। यही कारण था कि वे तमिल राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हो गए। एमजीआर के बाद जे जयललिता ने इस विरासत को संभाला। वे भी फिल्मों की लोकप्रिय अभिनेत्री थीं और एमजीआर की राजनीतिक उत्तराधिकारी बनीं। जयललिता ने अपने स्टारडम को 'अम्मा' की भावनात्मक छवि से जोड़ा। उन्होंने कल्याणकारी योजनाओं और मजबूत नेतृत्व के जरिए जनता के बीच गहरी पकड़ बनाई। तमिल राजनीति में यह पहली बार नहीं था, जब किसी अभिनेता ने सत्ता हासिल की। लेकिन, जयललिता ने यह साबित किया कि फिल्मी लोकप्रियता अगर राजनीतिक रणनीति से जुड़ जाए तो वह लंबे समय तक सत्ता कायम रख सकती है।
    तमिल समाज में फिल्मी सितारों की लोकप्रियता केवल ग्लैमर की वजह से नहीं होती। यहां अभिनेता आम आदमी की आकांक्षाओं और संघर्षों के प्रतिनिधि बन जाते हैं। तमिल फिल्मों में नायक अक्सर भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ता है, गरीबों के लिए आवाज उठाता है और सामाजिक न्याय की बात करता है। यही छवि जनता के मन में गहरे उतर जाती है। इसलिए जब वही अभिनेता राजनीति में आते हैं, तो लोग उन्हें वास्तविक जीवन का नायक मानने लगते हैं। इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अब विजय थलापति राजनीति में सक्रिय हुए हैं। विजय पिछले दो दशकों से तमिल सिनेमा के सबसे बड़े सुपर स्टारों में गिने जाते हैं। उनकी फिल्मों में व्यवस्था विरोध, युवा आक्रोश और सामाजिक असमानता जैसे मुद्दे बार-बार दिखाई देते रहे। उनकी लोकप्रियता केवल परदे तक सीमित नहीं है; उनके प्रशंसकों का वृहद नेटवर्क पूरे तमिलनाडु में फैला। इसी फैन क्लब ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं का रूप ले लिया।
    विजय की लोकप्रियता को लेकर सबसे दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने युवाओं के बीच अलग तरह की पहचान बनाई है। आज का तमिल युवा सोशल मीडिया से जुड़ा है। वह पारंपरिक राजनीति से कुछ हद तक निराश भी लगता है। ऐसे समय में विजय ने खुद को एक वैकल्पिक नेतृत्व के रूप में पेश किया। उनकी सभाओं में उमड़ती भीड़ केवल फिल्मी दीवानगी नहीं, बल्कि बदलाव की उम्मीद भी दर्शाती है। द्रविड़ मुनेत्र कड़गम और अन्य द्रविड़ दल लंबे समय तक यह मानते रहे कि तमिल राजनीति केवल वैचारिक और जातीय समीकरणों पर टिकी हुई है। लेकिन, विजय ने एक बार फिर यह दिखा दिया कि आज की राजनीति में भावनात्मक जुड़ाव, सोशल मीडिया प्रभाव और सेलिब्रिटी अपील भी बड़ी ताकत बन चुका है। यही कारण है कि विजय की राजनीतिक एंट्री ने तमिल राजनीति में नई बेचैनी पैदा कर दी।
     हालांकि, राजनीति केवल लोकप्रियता का खेल नहीं है। चुनाव जीतने के लिए मजबूत संगठन, स्पष्ट विचारधारा और सामाजिक समीकरणों की समझ भी जरूरी है। तमिलनाडु का वोटर राजनीतिक रूप से जागरूक माना जाता है। वह भावनाओं से प्रभावित जरूर होता है, लेकिन पूरी तरह भावुक नहीं होता। यही वजह है कि रजनीकांत जैसी अपार लोकप्रियता रखने वाले अभिनेता भी राजनीतिक जमीन मजबूत नहीं कर सके। जीत के बाद अब विजय थलापति   के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे अपनी फिल्मी छवि को असल राजनीतिक नेतृत्व में कैसे बदलते हैं। उन्हें यह साबित करना होगा कि वे केवल स्टार नहीं, बल्कि प्रशासनिक दृष्टि रखने वाले नेता भी हैं। रोजगार, शिक्षा, उद्योग, भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता जैसे मुद्दों पर उनकी स्पष्ट नीति ही उनकी नेतृत्व सफलता तय करेगी।
     फिर भी यह मानना पड़ेगा कि विजय ने तमिल राजनीति में एक नई ऊर्जा तो पैदा की है। उनकी भाषा अपेक्षाकृत संतुलित है। वे खुद को पारंपरिक राजनीतिक संघर्षों से थोड़ा अलग रखते हैं। उन्होंने युवाओं और मध्यम वर्ग को आकर्षित करने की कोशिश की और इसमें सफल भी रहे। वे जनता के बीच भरोसा कायम रखने में सफल रहे, पर क्या अब आने वाले वर्षों में तमिल राजनीति का समीकरण बदल सकता है! तमिलनाडु की राजनीति का फिल्मी चरित्र भारतीय लोकतंत्र की सबसे दिलचस्प घटनाओं में से एक है। यहां सिनेमा केवल मनोरंजन उद्योग नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा रहा है। परदे पर दिखने वाला नायक जनता की उम्मीदों का प्रतीक बन जाता है और फिर वही छवि राजनीति में उसकी ताकत बनती है। इतना तय है कि तमिलनाडु में सिनेमा और राजनीति का रिश्ता अभी खत्म नहीं हुआ। वहां जनता आज भी अपने नायक को परदे से उठाकर सत्ता के सिंहासन तक पहुंचाने की ताकत रखती है और विजय थलापति को मिली जीत इसी ताकत का प्रतीक है। 
----------------------------------------------------------------------------------------------------------------

No comments: