- हेमंत पाल
साहित्य जब इतिहास और राजनीति के साथ कदमताल करता है, तो वह केवल शब्दों का जाल नहीं रह जाता, बल्कि एक पूरे युग की धड़कन बन जाता है। मोहम्मद नौशाद द्वारा संपादित पुस्तक ‘अलविदा नेहरू’ इसका एक जीवंत और प्रामाणिक उदाहरण है। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज से जुड़े शोधकर्ता और लेखक मोहम्मद नौशाद ने इस संकलन के माध्यम से आधुनिक भारत के इतिहास के एक बेहद संवेदनशील और भावुक मोड़ को पन्नों पर उतारा है। यह किताब भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के अवसान पर उर्दू के दिग्गज शायरों द्वारा लिखी गई शोकाकुल नज़्मों और मर्सिया नुमा शायरी का एक अनूठा और ऐतिहासिक संग्रह है, जो पाठक को एक गहरे संवेदनात्मक धरातल पर ले जाता है।
मई 1964 में जब पंडित नेहरू ने अंतिम सांस ली, तो वह केवल एक राजनेता का अंत नहीं था, बल्कि वह एक पूरे युग का अवसान था। उस दौर के लगभग तमाम शीर्ष उर्दू शायरों ने नेहरू को श्रद्धांजलि देते हुए अपनी कलम उठाई थी। इस पुस्तक में उन्हीं चुनिंदा नज़्मों और अशआर को सहेजा गया है, जो नेहरू जी के जीवनकाल में या उनके निधन के तुरंत बाद रची गई थीं। इन रचनाओं को पढ़ते हुए सहज ही यह एहसास होता है कि एक राजनेता और व्यक्ति के रूप में नेहरू को समाज के प्रबुद्ध वर्ग और आम जनमानस में कितनी व्यापक और दिली स्वीकृति हासिल थी। यह मर्सिया नुमा शायरी महज़ एक शोकगीत नहीं है, बल्कि यह उस गहरे लगाव का प्रमाण है जो तत्कालीन साहित्यकारों को नेहरू के धर्मनिरपेक्ष, समावेशी और प्रगतिशील दृष्टिकोण से था।
संपादक मोहम्मद नौशाद ने इन विरल रचनाओं को न केवल बहुत करीने से चुना है, बल्कि पुस्तक की भूमिका में उनका अकादमिक और ऐतिहासिक विश्लेषण भी प्रस्तुत किया है, जो इस संकलन को एक गंभीर दस्तावेज़ बनाता है। इन नज़्मों में केवल एक नेता का गुणगान या स्तुति नहीं है, बल्कि नेहरू के बहुआयामी व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं को उजागर किया गया है। शायरों ने जहाँ एक ओर बच्चों के चहेते 'चाचा नेहरू' के मानवीय रूप को याद किया है, वहीं दूसरी ओर आधुनिक भारत की नींव रखने वाले और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के हिमायती राष्ट्र-निर्माता के प्रति अपना आदर प्रकट किया है। विभाजन की त्रासदी झेल चुके भारत में एक ऐसे नायक को खोने का दर्द इन कविताओं में साफ झलकता है, जिसने देश को बिखरने से बचाया और एक नई राह दिखाई।
यह किताब उस दौर की साहित्यिक और राजनीतिक चेतना को समझने का एक बेहतरीन ज़रिया है, जब उर्दू शायरी देश की मुख्यधारा की भावनाओं और राष्ट्रीय विमर्श को व्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम थी। यह संकलन तत्कालीन समाज में साहित्य और राजनीति के गहरे अंतर्संबंधों को भी रेखांकित करता है। ‘अलविदा नेहरू’ केवल कविता प्रेमियों के लिए ही नहीं, बल्कि इतिहास और राजनीति में रुचि रखने वाले उन पाठकों के लिए भी एक अत्यंत संग्रहणीय पुस्तक है जो आज के भारत को उसके अतीत के आईने में देखना चाहते हैं। शब्दों के माध्यम से एक जननायक को दी गई यह विदाई पाठक को न सिर्फ भावुक करती है, बल्कि उसे उस खोए हुए दौर के गौरव और मूल्यों पर गर्व करने का अवसर भी देती है।
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