प्यार एक ऐसा शाश्वत जज्बात है जिसकी तलाश किशोर से लेकर अधेड़ उम्र तक के हर व्यक्ति को होती है। जब यही आम जिंदगी की प्रेम कहानियां परदे पर उतरती हैं, तो वे 'लार्जर देन लाइफ' यानी जिंदगी से बड़ी नजर आने लगती हैं। दर्शक फिल्मों के जरिए अपने ही अधूरे सपनों और कल्पनाओं को जीने की कोशिश करता है। यही कारण है कि रोमांटिक फिल्में बॉक्स ऑफिस पर हमेशा रिकॉर्ड तोड़ती रही हैं।
000
- हेमंत पाल
पिछले नौ दशकों में हिंदी सिनेमा में प्रेम का स्वरूप लगातार बदलता रहा। 1930 से 1950 का दशक आदर्शवाद और सामाजिक बंधन का रहा। इस दौर में प्रेम कहानियों को सामाजिक बंधनों और पारिवारिक मूल्यों के आईने में देखा जाता था। 'देवदास' जैसी फिल्मों ने इस कालखंड में प्रेम, त्याग और सामाजिक वर्जनाओं के बीच के संघर्ष को बेहद आदर्शवादी और भावनात्मक रूप से चित्रित किया। 1960 से 1970 का दशक यथार्थवाद और समकालीनता का रहा। आजादी के बाद के शुरुआती दौर के बाद, यह दशक प्रेम कहानियों से दोबारा गुलजार हुआ। इस दौरान 'मुगल-ए-आजम', 'प्रेम कहानी' और 'लव स्टोरी' जैसी फिल्में बनीं। इनमें प्यार के साथ-साथ व्यक्तिगत संघर्षों, दोस्ती और बदलते पारिवारिक ढांचों के जटिल पहलुओं को अधिक यथार्थवादी ढंग से पेश किया गया। 1980 से 1990 का दशक संगीत, नृत्य और परिवार का उत्सव वाला रहा। यह दौर सिनेमा में रोमांस का स्वर्ण काल माना जा सकता है। 'मैंने प्यार किया' और 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' जैसी फिल्मों ने युवा संस्कृति को पूरी तरह प्रभावित किया। इस दौर की फिल्मों में संगीत, भव्य नृत्य और पारिवारिक मूल्यों का ऐसा मिश्रण था जिसने प्रेम को एक बेहद सुखद और आशावादी दृष्टिकोण दिया।
इसके बाद आए 2000 के बाद का दौर में विविधता और सामाजिक मुद्दे उठाए गए। नया दशक आते ही प्रेम कहानियों में अंतर-सांस्कृतिक संबंध और सामाजिक मुद्दे हावी होने लगे। 'गदर : एक प्रेम कथा' और 'तेरे नाम' जैसी फिल्मों ने दिखाया कि कैसे प्यार, देशभक्ति और सामाजिक संघर्षों के बीच पिसता है। वहीं, सच्ची घटनाओं पर आधारित 'छपाक' जैसी संवेदनशील फिल्मों ने भी दर्शकों को गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद न्यू-जनरेशन के प्यार को परिभाषित करने के लिए रहना है तेरे दिल में, बचना ऐ हसीनों, सलाम नमस्ते, लव आजकल, ये जवानी है दीवानी, वेक अप सिड, बर्फी, टू स्टेट्स, आशिकी 2, मसान और 'तमाशा' जैसी अनगिनत फिल्में आईं, जिन्होंने प्यार के आधुनिक और परिपक्व रूपों को सामने रखा।
आज के दौर में जहां बॉक्स ऑफिस पर 'एनिमल' जैसी फिल्मों का दबदबा है और ओटीटी प्लेटफॉर्म्स हिंसा, गाली-गलौज व खूंखार अपराधों से भरी वेब सीरीज से पटे पड़े हैं, वहां 'सैयारा' जैसी प्रेम कहानी ताजी हवा के एक झोंके की तरह आई। दर्शक लंबे समय से परदे पर मेलोड्रामा और कोमल भावनाओं की कमी महसूस कर रहे थे। देखा जाए तो 'सैयारा' के कथानक में कोई नयापन नहीं है। यह फिल्म साल 2004 में आई दक्षिण कोरियाई फिल्म 'ए मोमेंट टू रिमेंबर' का एक अनऑफिशियल अडॉप्टेशन है। इस कहानी की जमीन पर साल 2008 में अजय देवगन और काजोल की फिल्म 'यू मी और हम' भी बन चुकी है, जिसमें नायिका अल्जाइमर (भूलने की बीमारी) से पीड़ित होती है। 'सैयारा' ने भी इसी संवेदनशील विषय को चुना। एक शराबी पिता का परेशान बेटा और अल्जाइमर की गंभीर मरीज लड़की दो अलग-अलग दुखों से जूझते किरदारों का एक-दूसरे की पीड़ा को समझना और करीब आना, दर्शकों को भावुक कर गया। हिंसा से ऊब चुके दर्शकों को जब इस रूप में भावनात्मक सुकून मिला, तो उन्होंने फिल्म को हाथों-हाथ लिया।
लंबे अरसे बाद सिनेमाघरों में एक ऐसा दृश्य देखने को मिला जिसने हिंदी फिल्म इंडस्ट्री को उसके सुनहरे दौर की याद दिला दी। थियेटर की अंधेरी दीर्घाओं में बैठे युवा दर्शक सुबक रहे थे, और उनकी आंखों से बहते आंसू इस बात की गवाही दे रहे थे कि परदे पर चल रही एक मूक-सहज प्रेम कहानी ने सीधे उनके दिलों को छू लिया। 'सैयारा' की कामयाबी का एक बड़ा रहस्य इसके लीड एक्टर्स अहान पांडे और अनीता पड्डा की जोड़ी है। इन दोनों में दर्शकों को 'पेड़ की नई कोपल' जैसी ताजगी का अहसास हुआ। हिंदी सिनेमा का इतिहास गवाह है कि जब भी परदे पर नई उम्र की नई फसल उगानी होती है, तो प्यार की खेती सबसे ज्यादा उपजाऊ साबित होती है। सिनेमा के शुरुआती बाल्यावस्था के दौर में ऐसे अभिनेता भी रोमांटिक रोल करते थे जो अपनी जवानी की दहलीज पार कर चुके थे, क्योंकि तब समाज में सिनेमा को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था और सभ्य समाज के गिने-चुने लोग ही इससे जुड़ते थे। जैसे-जैसे समय बदला, दर्शकों में युवा सितारों को देखने की चाहत बढ़ती गई। हिंदी सिनेमा ने बार-बार नए चेहरों को लॉन्च करने के लिए प्रेम कहानियों का ही सहारा लिया है।
रोमांटिक फिल्मों से करियर की शुरुआत करने वाले सितारों की फेहरिस्त बहुत लंबी है। 'बॉबी' से ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया की जोड़ी ने युवाओं को दीवाना बनाया। 'लव स्टोरी' के जरिए कुमार गौरव और विजयता पंडित रातों-रात स्टार बने। 'बेताब' से सनी देओल और अमृता सिंह, तथा 'रॉकी' से संजय दत्त और टीना मुनीम ने कदम रखा। 'एक दूजे के लिए' में कमल हासन और रति अग्निहोत्री, तथा 'कयामत से कयामत तक' में आमिर खान ने प्यार को नई परिभाषा दी। 'मैंने प्यार किया' से सलमान खान और भाग्यश्री की मासूमियत दर्शकों के दिलों में बस गई। यही सिलसिला आगे चलकर अजय देवगन-मधुश्री (फूल और कांटे), ऋतिक रोशन-अमीषा पटेल (कहो ना प्यार है), राहुल रॉय-अनु अग्रवाल (आशिकी), शाहिद कपूर-अमृता राव (इश्क-विश्क), दीपिका पादुकोण (ओम शांति ओम), रणवीर सिंह-अनुष्का शर्मा (बैंड बाजा बारात) और आलिया भट्ट, सिद्धार्थ मल्होत्रा व वरुण धवन (स्टूडेंट ऑफ द ईयर) के रूप में जारी रहा। इसके लंबे अरसे बाद आई 'सैयारा' इसी परंपरा की अगली कड़ी है।
फिल्म इंडस्ट्री के सवा सौ साल के इतिहास में प्रवृत्तियां बदलती रहीं, तकनीक उन्नत होती रही और दर्शकों का मिजाज भी बदलता रहा। लेकिन 'मुगल-ए-आजम' और 'देवदास' से शुरू हुआ यह रूहानी सफर आज 'सैयारा' तक आते-आते भी उतना ही प्रासंगिक और असरदार बना हुआ है। 'सैयारा' की अप्रत्याशित सफलता यह साबित करती है कि इंसान चाहे जितना आधुनिक हो जाए, दिल को झकझोर देने वाली भावुक प्रेम कहानियां हमेशा अमर रहेंगी। जब तक दुनिया में प्रेम की चाहत जिंदा है, तब तक सिनेमा के परदे पर प्यार की यह रूहानी खेती हमेशा लहलहाती रहेगी।
------------------------------------------------------------------




No comments:
Post a Comment