Friday, August 23, 2013

छोटे राज्यों की मांग से उठे बड़े सवाल!

- हेमंत पाल --------------------------------------------------------------- आंध्र प्रदेश को विभाजित कर पृथक तेलंगाना राज्य के निर्माण का फैसला आते ही देश के अन्य भागों में छोटे राज्यों के लिए दशकों से चलते आ रहे आंदोलनों में नई जान आ गई। गोरखालैंड, विदर्भ, कार्बी आंगलांग, बोडोलैंड, पूर्वांचल, पश्चिम प्रदेश, अवध प्रदेश, हरित प्रदेश और बुंदेलखंड आदि अनेक राज्यों की मांग के समर्थन में आंदोलनों का दौर शुरू हो गया है। इस घटनाक्रम को देखते हुए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अब केंद्र सरकार को दूसरे राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन करना चाहिए? जो कि नए राज्यों के पुनर्गठन की समस्या का राजनीतिक, भाषाई, सांस्कृतिक और भौगोलिक सभी पहलुओं का गहराई से अध्ययन करे , ताकि, इस आधार पर सरकार भविष्य में नए और छोटे राज्यों के निर्माण के बारे में सुविचारित मानक नीति तैयार करके उस पर अमल हो सके । तेलंगाना के गठन के केंद्र सरकार के फैसले ने देश के दूसरे हिस्सों में अलग राज्यों की मांग में चल रहे आंदोलनों को भड़का दिया है। इस्तीफों का दौर भी चला और सड़क पर विरोध भी हुआ! कोई खुश हुआ तो कोई दुखी! इस बात की आशंका भी थी, क्योंकि, ऐसे राजनीतिक फैसले सभी को खुश नहीं कर सकते! ऐसे में सवाल उठता है कि देश की आजादी के बाद से हमेशा ही अलग राज्यों की मांगें क्यों उठती रही है? इस तरह की मांगों के पीछे वोट की राजनीति है या फिर कोई और कारण? इन आंदोलनों के लिए क्या सिर्फ राज्यों की सांस्कृतिक और भौगोलिक भिन्नता ही जिम्मेदार है या फिर इसके पीछे कोई और कारण भी है? समाजशास्त्रियों के तर्क हैं कि समाज के अगड़े-पिछड़े के बीच तनाव, शोषण, भाषा और संस्कृति पर मंडराते खतरे, मुख्यधारा से कट जाने का खतरा और आजादी में खलल जैसे कारण ही अलग राज्य की मांगों को हवा दे रही है। लेकिन, इस तरह की मांगों के साथ जब भी राजनीति जुड़ती है तो आंदोलन की यह चिंगारी आग की शक्ल में सबकुछ जला डालती है। लंबे समय से देश के विभिन्न अंचलों से भाषाई, भौगोलिक और जातिगत आधार पर अलग राज्यों की मांग उठती रही है। कुछ मांगें तो आजादी से पहले की हैं और कुछ आजादी के बाद की! पश्चिम बंगाल के पर्वतीय क्षेत्र दार्जिलिंग में सबसे पहले 1907 में गोरखा समुदाय के लिए अलग राज्य की मांग उठी थी! अलग गोरखालैंड की मांग कर रहे 'गोरखा जनमुक्ति मोर्चा' के प्रमुख विमल गुरुंग कहते हैं, कि दार्जिलिंग तो कभी बंगाल का हिस्सा रहा ही नहीं! इतिहास भी इस बात का गवाह है। गोरखाओं की खत्म होती पहचान बनाए रखने के लिए गोरखालैंड जरूरी है। लेकिन, केंद्र सरकार ने कभी भी इन आंदोलनों को गंभीरता से नहीं लिया! कभी आंदोलनों को बल प्रयोग से दबाया गया तो कभी समझौतों के जरिए। किसी भी राजनीतिक दल की सरकार ने समस्या की तह तक जाने की कोशिश नहीं की! असम के 'बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल' के सदस्य हाग्रामा मोहिलारी का कहना है कि असम में रहकर बोडो जनजाति की पहचान ख़त्म होने वाली है। सरकार ने अलग काउंसिल का लालच भले दिया हो, पर अलग राज्य के बिना बोडो जनजाति की पहचान को बनाए रखना संभव नहीं! देश की आजादी के बाद राज्यों के पुनर्गठन की सबसे बड़ी कवायद 1953 में 'राज्य पुनर्गठन आयोग' बनाकर की गई थी! इसके तहत राज्यों की सीमाएं भाषाई आधार पर तय की जानी थी। भाषाई आधार का नतीजा ये हुआ कि भौगोलिक बसावट, क्षेत्रफल, आबादी और भाषा के अलावा दूसरी सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति जैसे मसलों को आयोग ने महत्व नहीं दिया! यही कारण था कि कुछ सालों बाद ही असंतोष पनपने लगा! चार साल बाद ही बंबई से अलग करके गुजरात को अलग राज्य का दर्जा दिया गया। इसके छह साल बाद पंजाब को तीन हिस्सों में बांटकर हरियाणा और हिमाचल प्रदेश बनाना पड़ा। देश में छोटे राज्यों के लिए नए सिरे से उठने वाली मांगों के लिए तीन बातें ख़ास तौर पर जिम्मेदार हैं। पहली वजह जाति और धर्म के आधार पर देश के सामाजिक ताने-बाने का राजनीतिकरण होना है। पिछले कुछ सालों में क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व बढ़ा है, जो लोगों की भावनाओं को भड़काकर मांग को आंदोलन का स्वरूप देने लगे हैं। चुनावी राजनीति में बड़े दल भी अपने क्षेत्रीय एजेंडे के तहत अलगाववाद की भावना को बढ़ावा देने में पीछे नहीं हैं! दूसरा कारण है देश में एकसमान विकास का अभाव! ऐसी स्थिति में यह भावना प्रबल हो जाती है कि अलग राज्य होने की स्थिति में क्षेत्र और वहां के लोगों के विकास की गति तेज होगी! क्योंकि, ये आम धारणा है कि विकसित इलाकों में निजी निवेश होता है, जिससे इलाके का विकास होता है। पिछड़े इलाके विकास की दौड़ में इसीलिए और पिछड़ते रहते हैं! अपने लिए अलग राज्य की मांग का समर्थन करने वालों के पास अपनी दलीलें हैं। मांग का समर्थन करने वाले कहते हैं कि छोटे राज्यों से सुशासन सुनिश्चित करने के अलावा विकास की गति भी तेज हो सकती है। गोरखा आंदोलन से जुड़े नेताओं का कहना है कि राजधानी से दूर होने की वजह से सरकार और प्रशासन का ध्यान इलाके की समस्याओं और विकास की ओर नहीं जाता। इन आंदोलनकारियों का ये भी कहना है कि छोटे राज्यों की विकास दर दूसरे राज्यों से बेहतर है। अपनी बात के समर्थन में वे छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड का हवाला देते हैं जिनकी औसतन सालाना वृद्धि दर दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान अपने मूल राज्यों (जिनसे अलग होकर उनका गठन हुआ था) के मुकाबले बेहतर रही। ऐसी मांगों का विरोध करने वाले इसे देश की एकता व अखंडता पर खतरा मानते हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र बंगाल का अभिन्न हिस्सा रहा है। कुछ इलाके को मिलाकर यदि गोरखालैंड बना भी दिया गया, तो संसाधान कहां से आएंगे? छोटे राज्यों के गठन से राजनीतिक व सामाजिक अस्थिरता भी बढ़ेगी! झारखंड इसका ताजा उदाहरण है जहां हर साल सरकार गिर या बदल जाती है। लेकिन, सिर्फ राजनीतिक अस्थिरता को आधार बनाकर छोटे राज्यों के पक्ष को नाकारा नहीं जा सकता!

Sunday, October 21, 2012

रिटेल का खेल : राजनीति पास ... जनता फेल

- भारत के मध्यमवर्ग पर दुनिया की नज़र - रिटेल के महारथियों का लोकल बाजार पर गहरा असर (हेमंत पाल) केंद्र सरकार के रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के फैसले ने देश के विपक्षी दलों को नया मुद्दा थमा दिया है! इस मुद्दे पर ममता बेनर्जी ने सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया! जबकि, सरकार भी ऐसे अड़कर बैठी है की उसने भी ममता के फैसले की परवाह नहीं की! बीजेपी भी कमर कसकर सरकार को कटघरे में खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी! दरअसल, सरकार का यह फैसला उसका खुद का कम अमेरिकी दबाव में लिया गया ज्यादा लगता है! किसानों, लोगों और छोटे दुकानदारों को सब्जबाग़ दिखाकर सरकार भले ही उन्हें भ्रमित करने का प्रयास करे पर पिछले अनुभव बताते हैं की दुनिया के जिस भी देश ने इस तरह के फैसले लिए हैं, उन्हें अपने जनता के कोप का भजन बनना पड़ा है! 00000 यह आम जनता के माँगों की अनदेखी कर अपनी दादागिरी बताने जैसा ही है! ... केंद्र सरकार ने रिटेल के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का दरवाजा पूरी तरह से खोल दिया है। देशभर में विरोध और बंद का खेल हुआ, लेकिन अंत में वही हुआ जो सरकार चाहती थी! सरकार ने इसे आर्थिक सुधार तेज करने का प्रयास बताया और तेज गति से निर्णय लेकर तमाम विरोधों के बावजुद रिटेल के क्षेत्र में एफडीआई को मंजूरी दे दी। रिटेल में विदेशी निवेश के पक्षधर इस फैसले को साल 1991 में आर्थिक उदारीकरण लागू होने के बाद से सबसे अहम् फ़ैसला बता रहे हैं! उनका मानना है कि इस फैसले से देश में कोई भी बड़ा निर्णय लेने की रुकी हुई प्रक्रिया फिर से आरंभ होगी। भारत के वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा के हिसाब से भारत 475 अरब अमेरिकी डॉलरों के बराबर के रिटेल के क्षेत्र में विदेशी निवेश चहुँमुखी विकास लाएगा। किसानों को लाभ? कई विशेषज्ञ कहते हैं कि भारत में एक तिहाई फल, सब्जियां और खाने-पीने की चीज़ें हर साल नष्ट हो जाती हैं, क्यों कि उन्हें सुरक्षित ढंग भंडारों में नहीं रखा जा सकता! अगर 'वॉलमार्ट' और 'टेस्को' जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत आती हैं तो वो अगले तीन से पांच साल तक हर साल तीन से पांच अरब डॉलर तक भण्डारण क्षमता को विकसित करने और ट्रांसपोर्ट व्यवस्था को मज़बूत करने में लगाएंगी। इस वजह से किसानों का माल कम सड़ेगा और और वो ज़्यादा बेच पाएगें। विदेशी व्यापारी किसानों का शोषण करने वाले दलालों से किसानों को मुक्ति दिलाएंगे और उनसे सीधे माल खरीदेंगे। इस प्रस्ताव का विरोध करने वालों का कहना है कि यह हसीन सपने कभी पूरे नहीं होंगे। इस फैसले के विरोधी कहते हैं कि रिटेल के क्षेत्र में काम करने वाली बड़ी-बड़ी भारतीय कंपनियों ने ऐसा कुछ नहीं किया! आम तौर पर बड़े-बड़े भारतीय रिटेलरों ने कोल्ड स्टोरेज में कोई खास निवेश नहीं किया और ज़्यादातर मौजूदा दलालों या थोक बाज़ार से खरीदते हैं। क्या उपभोक्ता का लाभ होगा ? इस पक्ष पर फैसले के समर्थकों का कहना है कि किसानों को ज़्यादा दाम देने के बावजूद बड़ी रिटेल कंपनियां उपभोक्ताओं को कम दामों में सामान बेच पाती हैं, क्योंकि वो दलालों को चलता कर देती हैं। वॉलमार्ट सालभर में अपनी १० हज़ार दुकानों के ज़रिये 450 अरब डॉलर का कारोबार करती है। वॉलमार्ट इन सभी दुकानों पर तुलनात्मक रूप से बेहद सस्ता सामान बेचती है। लेकिन, भारत में सर्वाधिक लाभ मध्य और उच्च मध्यवर्ग के उपभोक्ताओं को ही होगा। इस फैसले के विरोधियों का दावा है कि इसकी वजह से छोटे दुकानदार तबाह हो जायेगें। भारत में अभी रिटेल में संगठित क्षेत्र की हिस्सेदारी महज़ 4.2 फीसदी है। उद्योग व्यापार के संगठन 'फिक्की' के महासचिव राजीव कुमार का मानना है कि अगर अगले बीस सालों में ये हिस्सेदारी चार गुना बढ़कर 17 फ़ीसदी भी हो जाती है, तब भी साल 2032 में 900 अरब डॉलर के बाज़ार में इसका हिस्सा केवल 150 अरब डॉलर का होगा। तार्किक रूप से विदेशी रिटेल कंपनियां आरंभ में केवल बड़े शहरों में अपनी दुकानें खोलेंगी, क्योंकि इन शहरों के उपभोक्ताओं के पास ज़्यादा पैसा है। अभी प्रस्तावित सरकारी नीति में बहुराष्ट्रीय कंपनियां केवल उन्ही शहरों में दुकान खोल सकेगीं, जहाँ की आबादी दस लाख से ज़्यादा है। रिटेल की राजनीति नवंबर 2011 में यह फ़ैसला इसलिए नहीं लागू हो सका था, क्योंकि सरकार के कई साथी और विपक्षी दल इसके पक्ष में नहीं थे। जब सरकार को लगा की मामला उलझ सकता है तो वो पीछे हट गई! राज्यों के निर्णय : समर्थन में * हरियाणा : मुख्यमंत्री भुपिंदरसिंह हुड्डा ने ख़ुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के निर्णय का फ़ैसला किया और कहा है कि इससे किसानों को उनके माल की बेहतर क़ीमत मिलेगी और ये उपभोगताओं को फ़ायदेमंद होगा। * दिल्ली : मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने मंत्रीमंडल के फ़ैसले को बहुत बड़ा क़दम बताया और कहा कि इससे लोगों को बेहतर गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थ मुहैया हो पाएंगे और नौकरियां पैदा होंगी। * राजस्थान : कांग्रेस शासित एक दूसरे प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत ने कहा कि इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और कृषि क्षेत्र को फ़ायदा पहुंचेगा। * महाराष्ट्र : मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान के मुताबिक़ इससे पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी और माल की सप्लाई में पैदा होनेवाली बाधाएं ख़त्म होंगी। * असम : असम के मुख्यमंत्री के इस फ़ैसले से ख़ुश होने की बात कही गई है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्रियों द्वारा भी इस फैसले के समर्थन की बात कही गई है। फैसले का विरोध रिटेल क्षेत्र को खोले जाने के विरोध के चलते इसे लंबे समय से टाला जाता रहा है। जहां कांग्रेस शासित इन प्रदेशों ने मंत्रीमंडल के फ़ैसले का स्वागत किया है, वहीं दक्षिणी राज्य केरल ख़ुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के ख़िलाफ़ है। * गुजरात : मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि वो नहीं जानते कि प्रधानमंत्री कर क्या रहे हैं! उनके मुताबिक़ छोटे दुकानदारों का धंधा इससे चौपट हो जाएगा। हालांकि, नरेंद्र मोदी पहले इस खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के पक्ष में बोलते रहे हैं। * उड़ीसा : मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने इसे मुल्क को पीछे ले जानेवाला और ग़लत सलाह पर लिया गया फ़ैसला बताया। * पश्चिम बंगाल : तृणमुल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने इस मुद्दे पर सरकार से समर्थन ही वापस ले लिया है और वे आर-पार की लड़ाई लड़ने को तैयार है। * उत्तर प्रदेश : केंद्र की कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार को बाहर से समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी के राज्य के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लखनऊ में किए गए एक प्रेस कांफ्रेस में साफ़ किया है कि वो इस फ़ैसले को राज्य में लागू नहीं करेंगे। * बिहार : मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि इससे लाखों लोगों को कामकाज का नुक़सान होगा। * मध्य प्रदेश : मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के अनुसार इस फ़ैसले से छोटे व्यापारियों और किराना दुकानदारों को नुक़सान उठाना होगा। अनिश्चित स्थिति * पंजाब : मुख्यमंत्री प्रकाशसिंह बादल ने भी कहा है कि वो इस पर बाद में निर्णय देंगे। प्रकाश सिंह बादल राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल हैं, जिसका मुख्य दल भारतीय जनता पार्टी इस फैसले का विरोध कर रहा है। * झारखंड : मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा है कि वो नागरिकों और स्थानीय व्यापारियों से सलाह मशविरा करने के बाद किसी नतीजे पर पहुंचेंगे। * कर्नाटक : उद्योग मंत्री मुरुगेश निरानी ने कहा है कि राज्य सरकार नीति का गहन अध्ययन करने के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचेगी। इस राज्य में बीजेपी की सरकार है। जोरदार तरीके से लाबिंग रिटेल के महारथी जैसे टेस्को व वॉलमार्ट ने भारत में प्रवेश पाने के लिए अपनी ओर से काफी मेहनत की है, ऐसा कहा जा सकता है। राजनीतिक पार्टियों से लेकर नीतियां बनाने वाली संस्थाओं के लिए कंपनी ने जबर्रदस्त लाबिंग की। इसी का परिणाम है कि सरकार ने इस क्षेत्र में एफडीआई की छूट दे दी। हमें यह समझना होगा कि इन रिटेल के दिग्गजों का भारत में आने का रास्ता यू हीं नहीं खुला, बल्कि अमेरिका के दबाव में खोला गया है! वॉलमार्ट कंपनी इस बात को स्वीकार करती है कि उसने भारत में इस एफडीआई के लिए लाबिंग की है। अमेरिका में लाबिंग करना कानून सम्मत है, पर भारत में अभी ऐसा कुछ नहीं है। अगर कोई अमेरिकी कंपनी विदेश में लाबिंग कर रही है, तब उसे अमेरिकन सीनेट को इस बारे में जानकारी देनी होती है। अमेरिका की कई कंपनियां भारत में विभिन्न आयोजनों व अन्य तरीकों से अपने पक्ष में माहौल बनाने में जुटी हैं। यह बात तय है कि रिटेल में एफडीआई के लिए भारत में जोरदार तरीके से लाबिंग हुई और सरकार ने इसी के कारण मंजूरी दी है। अब देश को यह जानकारी मांगने का हक है कि अमेरिकी कंपनियों ने किस तरह से लाबिंग की और इसका असर और फायदा किसे हुआ? इस लाबिंग का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से फायदा कौन से नेताओं और राजनीतिक पार्टियों को हुआ? इनके नुकसान पर कई शोध रिटेल के महारथियों का किसी देश में जाना और वहां उसका असर, इस विषय पर अब तक कई शोध हो चुके हैं। लोवा स्टेट यूनिवर्सिटी के केनेथ स्टोन ने अपने शोध में बताया था कि छोटे शहरों में अगर वॉलमार्ट स्टोर खुलते हैं तो उस शहर का रिटेल व्यापार दस वर्ष में आधा हो जाता है। एक अन्य शोध में यह तथ्य सामने आया कि जब भी वॉलमार्ट किसी शहर में अपना मेगा स्टोर आरंभ करता है, तो वहां के बड़े स्टोर्स की सेल्स ४० प्रतिशत, सुपरमार्केट की १७ प्रतिशत तथा ड्रग स्टोर का ६ प्रतिशत सेल्स कम हो जाता है। यह शोध टक स्कूल ऑफ बिजनेस डार्टमाउथ कॉलेज ने किया था। वही लोयलो यूनिवर्सिटी शिकागो ने भी शोध किया था! उसमें यह तथ्य सामने आया कि वॉलमार्ट की किसी शहर में अन्य रिटेल स्टोर्स से दूरी पर ही सबकुछ निर्भर करता है। वहीँ जून २००६ में प्रकाशित एक लेख के अनुसार वॉलमार्ट के कारण कुछ रिटेल बिजनेस बंद जरुर हुए हैं, पर छोटे बिजनेस के लिए नई उम्मीदे भी जगी हैं। वहीँ वॉलमार्ट और कंसल्टिंग फर्म ग्लोबल इनसाईट द्वारा किए गए शोध में यह तथ्य सामने आया कि जहां भी वॉलमार्ट स्टोर खुले, वहां के कार्यकारी परिवारों को प्रतिवर्ष ढाई हजार डॉलर की बचत होती है। इकोनामिक पॉलिसी इंस्टि्‌टयूट के अनुसार वर्ष २००१ से २००६ के बीच वॉलमार्ट के चीन से व्यापारिक संबंधों के कारण दो लाख अमेरिकियों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। आज विश्व में वॉलमार्ट ८९७० जगहों पर हैं, वहीँ टेस्को के ५३८० स्टोर्स हैं। बढेंगे रोजगार या बेरोजगारी इस वक्त सबसे अहम सवाल है कि एफडीआई के आने के बाद नौकरियों के अवसर बढेंगे या फिर बेरोजगारी बढेगी? अर्थशास्त्री और मार्केट विशेषज्ञ डॉ अश्विनी महाजन का कहना है कि एफडीआई आने के बाद रिटेल भी आईटी सेक्टर की तरह बन जाएगा। विदेशी कंपनियों का कारोबार करने का तरीका ही अलग है, उन्हें कुशल पेशेवर चाहिए। जो कुशल नहीं हैं या ज्यादा पढे-लिखे नहीं हैं, उन्हें इन विदेशी रिटेल स्टोर्स में नौकरी नहीं मिलेगी। वे यहां पर उन्नत तकनीक लेकर आएंगे। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं की अमेरिका में रिटेल मार्केट का साइज ५२ लाख करोड़ रुपये का है, मगर वहां रिटेल सेक्टर में महज १५ लाख लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिला है। इसके उलट भारत का रिटेल सेक्टर ५ लाख करोड़ रुपये का है, मगर यहां पर प्रत्यक्ष रोजगार ५ करोड़ हैं। अगर यहां भी रिटेल कारोबार की शक्ल अमेरिका की तरह हो जाए तो रोजगार कितना कम हो जाएगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। कृषि सेक्टर को कितना फायदा? सरकार की चाहत कृषि सेक्टर के ग्रोथ रेट को ४ फीसदी पर पहुंचाने की है। सरकार का भी मानना है कि रिटेल सेक्टर में एफडीआई के आने से कृषि सेक्टर में पैसो की आवक बढ़ेगी, यह कहना सही नहीं होगा। क्योंकि, हमारे यहां नीति और नियम तो बनते हैं, मगर सही तरीके से लागू नहीं होते! बेशक एफडीआई के आने से कंपनियां कृषि उत्पाद सीधे किसानों से खरीदेंगी। कंपनियां परोक्ष रूप से कॉरपोरेट खेती भी शुरू कर सकती हैं। वे किसानों को पैसा देकर खेती करवा सकती हैं और कृषि उत्पाद खरीद सकती हैं। मगर इसकी क्या गारंटी है कि सब कुछ तय नीति-नियमों के आधार पर होगा या बिचौलिया इसका फायदा नहीं उठाएंगे? नियम कड़ाई से लागू करना होंगे रिटेल के क्षेत्र में ध्यान देनेवाली पहली बात यह है कि विदेशी कंपनियां शुरू में अपने बाजार की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए अपना मुनाफा कम कर सकती हैं। इससे चीजों की कीमतें कम हो जाएंगी, मगर दूसरी कंपनियों के लिए उस कीमत पर कारोबार करना मुश्किल हो जाएगा। ऐसा ही थाईलैंड में भी हुआ था। मल्टी-नेशनल कंपनियों ने शुरू में अपना मुनाफा ३ से ५ प्रतिशत रखा। इसकी वजह से घरेलू कंपनियों के लिए काम करना मुश्किल हो गया। सरकार को हस्तक्षेप कर कम से कम कीमत को लेकर एक नीति बनानी पड़ी। दूसरे, विदेशी कंपनियों के कारोबार पर नजर रखने के लिए उनकी समीक्षा करनी होगी। ब्रिटेन और अमेरिका में तिमाही में एक बार मल्टी-नेशनल कंपनियों के कारोबार, उनकी चीजों की दूसरे देशों में कीमतें, विस्तार योजना, रोजगार और दूसरे संबंधित पहलुओं पर एक्सपर्ट कमेटी एक रिपोर्ट तैयार करती है। इससे मल्टी-नेशनल कंपनियां बेकाबू नहीं हो पातीं और मार्केट भी काबू में रहता है। वॉलमार्ट अमेरिकी कंपनी है, मगर अमेरिका में कारोबार के अपने तय नियम हैं। वॉलमार्ट ने जब इन नियमों का उल्लंघन किया तो कैलिफॉर्निया और शिकागो की नगर पालिका ने वॉलमार्ट के स्टोर खोलने पर रोक लगा दी! वॉलमार्ट पर वस्तुओं के भाव बाजार से ज्यादा रखने और अपने कर्मचारियों से तय समय से ज्यादा काम कराने के आरोप लगे थे। क्या है ब्रांडेड रिटेल में एफडीआई आजकल किसी भी मॉल या रिटेल स्टोर में ज्यादातर विदेशी ब्रांड की चीजें एक साथ मिल जाती हैं। मगर किसी विदेशी ब्रांड की दुकानों में सिर्फ उसी ब्रांड की चीजें मिलती हैं। इसे 'सिंगल ब्रांडेड रिटेल' कहते हैं। अब यह स्थिति बदलेगी। विदेशी कंपनियां अपनी भारतीय सहयोगी कंपनियों के साथ मिलकर मॉल या रिटेल स्टोर खोल सकेंगी, जिसमें सभी ब्रांड की चीजें बेची जा सकेंगी। दूसरे शब्दों में कहें तो अब विदेशी कंपनियां भारत में रिटेल स्टोर खोल सकेंगी और वे रिटेल स्टोर की मालिक होंगी।

Tuesday, September 6, 2011

'प्रत्यक्ष" से राजनीति को अप्रत्यक्ष लाभ

(हेमंत पाल)
प्रदेश में अब राजनीति की नई पौध फिर से पनप सकेगी। पिछले दो दशकों से राजनीति की जो नर्सरी मुरझाने लगी थी, अब उसके फिर पनपने का संकेत मिल गया है। दो दशक बाद अब कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में वह माहौल फिर दिखाई देगा, जिससे एक पूरी पीढ़ी अनजान रही है। छात्रसंघ चुनाव को रोकने की जरूरत क्यों पड़ी? इसके क्या दुष्परिणाम आँके गए और और फिर प्रत्यक्ष तरीके से छात्रसंघ चुनाव कराने की जरूरत क्यों महसूस हुई? इन सवालों पर चिंतन न भी किया जाए, तो यह सुखद संकेत है, कि प्रदेश सरकार ने इन चुनावों के लिए अपनी रजामंदी दे दी है।
अभी तक कॉलेजों में कक्षा के किसी पढ़ने वाले छात्र को मुखिया बना दिया जाता था। इसका नतीजा यह होता कि वह या तो वह अपनी पढ़ाई से पिछड़ जाता था, या अपने दायित्व का ठीक से निर्वाह नहीं कर पाता! सरकार और शिक्षक भी इस बात को समझ रहे थे, लेकिन इस दिशा में कुछ हो नहीं पा रहा था। जबकि, राजनीतिक नजरिए से देखा जाए तो राजनीति की जो नर्सरी कॉलेजों में पनप कर आगे जाकर प्रदेश में अपनी पहचान बनाती थी, वह पूरी तरह मुरझाकर सूख चुकी थी। लाख खामियों के बावजूद इस सच को नकारा नहीं जा सकता कि छात्र संघ चुनाव राजनीति समझने की पहली सीढ़ी हैं। आज लोकसभा और प्रदेश की विधानसभा में ऐसे नेताओं की संख्या ज्यादा है, जो कभी न कभी छात्र राजनीति से जुड़े रहे थे।
छात्रसंघ चुनाव की प्रत्यक्ष प्रणाली राजनीति की वह पाठशाला है, जहाँ छात्रों को वे सारी प्रक्रियाएं जानने और समझने का मौका मिलता है, जो राजनीति के रीयल मंच पर घटित होती हैं। इसका राजनीतिक दलों को यह लाभ होता है, कि उन्हें कुछ ऐसे तपे तपाए छात्र नेता मिल जाते हैं, जो उनके लिए आधार का काम करते हैं। उनकी राजनीतिक योग्यता और नेतृत्व क्षमता का आकलन भी यहीं हो जाता है और आगे बढ़ने का मौका मिलता है। जब से छात्रसंघ चुनाव की प्रत्यक्ष प्रणाली पर रोक लगी थी, तब से राजनीति में प्रवेश का यह रास्ता पूरी तरह बंद ही हो गया था। क्योंकि, अब तक चल रही प्रणाली में जो छात्र अपनी कक्षा, कॉलेज या विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करते थे, उनका मकसद राजनीति में जाना कतई नहीं होता था। ... ओर जो छात्र प्रत्यक्ष प्रणाली के जरिए इस मैदान में उतरते हैं, उनके जहन में कहीं न कहीं राजनीतिक उत्कंठा रहती है। अब, जबकि सरकार ने प्रत्यक्ष प्रणाली से छात्रसंघ चुनाव का रास्ता खोल दिया है, यह उम्मीद की जाना चाहिए कि प्रदेश की राजनीति की उस सूख चुकी नर्सरी में फिर बहार आएगी और कुछ नए चेहरे अपनी आमद दर्ज कराएंगे।
(मप्र सरकार ने कॉलेजों में प्रत्यक्ष छात्रसंघ चुनाव को मंजूरी दी)

Friday, July 29, 2011

यह सेंध नहीं कब्जा करने तैयारी!

(हेमंत पाल)
राजनीति की चौपाल पर जब भी चुनावी रणनीति बनती है, सबसे पहले कमजोर कडी की तलाश की जाती है। पहले वहाँ चोट की जाती है, जहाँ प्रतिद्वंद्वी कमजोर लग रहा हो और इस चोट से उसका आत्मविश्वास डिगे! इस नजरिए से देखा जाए तो प्रदेश के आदिवासी इलाके में भारतीय जनता पार्टी की घुसपैठ पूरी तरह चुनावी तैयारियों का हिस्सा है। भाजपा को इस बात का अंदेशा हो गया है कि जो आदिवासी वोट अब तक काँग्रेस की सबसे बड़ी ताकत थी, वो उसके हाथ से दरक रही है। यही कारण है कि भाजपा ने अपने सारे रणनीतिक तीरों का मुँह प्रदेश के इस पश्चिमी इलाके के आदिवासी इलाकों की तरफ मोड़ दिया है। प्रभात झा के अध्यक्ष बनने के बाद इन गतिविधियों में कुछ ज्यादा तेजी आती दिखाई दी। अगले चुनाव में उनके 200 सीटों के दावे के पीछे इन्ही गतिविधियों का दम है। राजनीति कहती है कि आपमें सामने वाले को हतप्रभ करने की क्षमता होगी, तभी चमत्कार भी नजर आएंगे। भाजपा इसी रणनीति के तहत काम कर रही है।
मध्यप्रदेश के चुनावी इतिहास को टटोला जाए तो साफ नजर आता है कि आजादी के बाद से ही आदिवासी इलाके काँग्रेस का ऐसा वोट बैंक रहे हैं, जहाँ कोई भी पार्टी सेंध नहीं लगा पाई! क्योंकि, पहले पंडित जवारहरलाल नेहरू फिर इंदिरा गाँधी और इसके बाद राजीव गाँधी ने आदिवासियों को साधने में कोई कसर नहीं छोड़ी। लेकिन, अब काँग्रेस में वह जमीनी सोच नहीं बची जो अपने परंपरागत वोट बैंक को बचाने की कोशिश कर सके। भाजपा भी बरसों से इस वोट बैंक को साधने की कोशिश करती रही, पर उसे पहली बार 2003 में बड़ी सफलता मिली, जब झाबुआ जिले (तब आलीराजपुर भी शामिल था) की सभी विधानसभा सीटें भाजपा ने जीत ली। भाजपा की इस तैयारी के पीछे संघ के आनुशांगिक संगठनों की बड़ी भूमिका थी, जो कई साल तक आदिवासी इलाके में गुपचुप तरीके से काम कर रही थीं। अब वही काम भाजपा खुलकर कर रही है और अपने मकसद को दर्शा भी रही है, ताकि 2003 की कहानी को दोहराया जा सके! कांग्रेस के लिए झाबुआ लिटमस टेस्ट है, यह सभी कांग्रेसी जानते है! क्योंकि, 2003 के विधानसभा चुनावों के नतीजों में जैसे ही झाबुआ का पहला परिणाम भाजपा के पक्ष में गया, तभी दिग्विजय सिंह ने हार स्वीकारते हुए कहा था कि अगर झाबुआ में हार गए तो मध्यप्रदेश में हार गए!
यही कारण है कि पिछले करीब छ: महीने से आलीराजपुर, झाबुआ और बड़वानी भाजपा की प्राथमिकताओं में पहले नंबर पर हैं। भाजपा बार-बार अपनी सक्रियता से आदिवासियों को इस बात का अहसास कराने की कोशिश कर रही है, कि अब काँग्रेस उनकी तारणहार नहीं रही। भाजपा के इस संदेश में दम भी है। केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल के बहाने जिस तरह प्रदेश के आदिवासी इलाके की अवहेलना की गई, उससे यह बात स्पष्ट भी हो जाती है। झाबुआ के सांसद काँतिलाल भूरिया को मंत्रिमंडल से हटाया जाना और उनकी जगह किसी और को मौका न देना, इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि काँग्रेस के शीर्ष नेतृत्व का आदिवासियों के प्रति सोच क्या है! जब इस आदिवासी इलाके में काँग्रेस का नेतृत्व कमजोर पड़ेगा, तो तय है कि उसकी जगह लेने के लिए नया नेतृत्व पनपेगा। भाजपा उसी मौके की तलाश में थी, जो खुद काँग्रेस ने आगे बढ़कर उसकी झोली में डाल दिया।
कांग्रेस ऊपरी तौर पर विरोध जरूर कर रही है, लेकिन इसमें भी उसे केंद्रीय नेतृत्व का सहारा लेना पड़ रहा है। ऐसे में कांग्रेस के आम कार्यकर्ता को चिंता में डालने के लिए प्रभात झा का यह बयान काफी है कि कई कांग्रेसी नेता भाजपा में आने के लिए लाईन लगाए है। कांग्रेस के लिए यह आत्ममंथन करने का समय है और कुछ नई सोच और नए विचार के साथ कार्यकर्ताओं के बीच जाने का भी। वहीं भाबरा में शहीद चंद्रशेखर आजाद को याद करने के बहाने भाजपा ने जिस तरह के पांसे चले हैं, वह काँग्रेस के लिए एक चुनौती भी है! लेकिन, लगता नहीं कि काँग्रेस में इस बात को लेकर कोई गंभीर चिंतन होगा।

Friday, July 15, 2011

काँग्रेस ने मध्यप्रदेश को क्या 'मंदप्रदेश" समझा?

(हेमंत पाल)
कांग्रेस पार्टी के एजेंडे में मध्यप्रदेश लगता है, कहीं नहीं है! या वह प्रदेश को लेकर किसी भी तरह की आशा ही नहीं पालनी। मंत्रिमंडल विस्तार में मध्यप्रदेश की जिस तरह से अनदेखी की गई, वहाँ तक तो ठीक था। परंतु, काँतिलाल भूरिया की जगह किसी और को शामिल न करना और अरुण यादव को निकालना प्रदेश के लिए ऐसा संदेश है, जिससे आम कार्यकर्ता हताश होगा। इससे प्रदेश काँग्रेस अध्यक्ष काँतिलाल भूरिया की मुश्किलें भी बढ़ेगी! क्योंकि, खानापूरी के लिए अरुण यादव को संगठन में लेने से प्रदेश में किसी खास परिवर्तन की उम्मीद नहीं की जा सकती। यह कहना हास्यास्पद होगा कि उत्तरप्रदेश को ध्यान में रखकर मंत्रिमंडल में बदलाव किया गया है। दरअसल, इस बार दबाव भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण इतना ज्यादा था कि कांग्रेस फूँक-फूँककर कदम रख रही थी। नए चेहरों का चुनाव करते वक्त भी इसी बात का ध्यान रखा गया। परंतु जरुरत से ज्यादा ध्यान देना भी कभी मुश्किल में डाल देता है, जैसा लगता है इस बार हुआ है!
मंत्रिमंडल के बदलाव में ऐसा कम ही होता है कि किसी इलाके को प्रतिनिधित्वहीन कर दिया जाए! यह अनुमान लगाए बगैर कि इस फैसले के क्या राजनीतिक नतीजे होंगे! चार में से दो मंत्रियों को हटा दिया गया। अब कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया ही केंद्र सरकार में प्रदेश के प्रतिनिधि के रूप में बचे हैं। काँतिलाल भूरिया और अरूण यादव को जिस तरह बाहर कर दिया गया, उसके पीछे कोई ठोस कारण रहा होगा, यह कहीं नजर नहीं आता। मंत्रिमंडल में जब भी बदलाव की कवायद होती है, राजनीतिक और जातीय समीकरणों का गठजोड़ बैठाया जाता है। फायदे और नुकसान का आकलन किया जाता है। राजनीतिक असंतोष न पनपे इसका भी अंदाजा लगाया जाता है, पर लगता है ताजा फेरबदल में इस मुद्दे पर गंभीरता नहीं बरती गई। कांग्रेस ने मध्यप्रदेश के साथ 'मंदप्रदेश" जैसा व्यवहार किया। राजनीतिक संतुलन के सी-सॉ में कांग्रेस ने मध्यप्रदेश से गुटों के आकाओं से ही राय ली है, संगठन से राय लेने की बात किसी के मन में शायद नहीं आई। यही कारण रहा कि आकाओं ने अपना खेल दिखा दिया! उन्होंने प्रदेश में ऐसे समीकरणों को जन्म दिया, जिसे चाहे जैसा हल करें उत्तर शून्य ही आएगा।
काँतिलाल भूरिया को हटाए जाने के बारे में तर्क दिया जा रहा है, कि मध्यप्रदेश के काँग्रेस संगठन को नए सिरे से गढ़ने के लिए के लिए उन्हें मंत्रिमंडल की जिम्मेदारियों से मुक्त किया जा रहा है। इस बात को कुछ हद तक सही भी मान लिया जाए, तो इसका आशय यह कतई नहीं होता कि उनकी जगह किसी और को शामिल नहीं किया जाए? वह भी ऐसी स्थिति में जब मध्यप्रदेश में काँग्रेस ने लोकसभा और विधानसभा दोनों ही चुनावों में अच्छे प्रदर्शन किया था। पश्चिम मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाके से काँतिलाल भूरिया की जगह गजेंद्रसिंह राजूखेड़ी को जगह दी जाती तो जातीय समीकरण भी बैलेंस होता और इलाका में काँग्रेस की पकड भी बनी रहती। वे तीन बार के सांसद हैं, और उनका दावा भी पुख्ता है। यहाँ यह बात भी ध्यान देने लायक है कि प्रदेश की सत्ता में लगातार दो बार से काबिज भारतीय जनता पार्टी का पूरा जोर पश्चिम मध्यप्रदेश के आदिवासी इलाकों पर ही है और कुक्षी में काँग्रेस की हार इसीका नतीजा है। काँतिलाल भूरिया के प्रदेश काँग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद से ही भाजपा ने संगठनात्मक रूप से अपनी गतिविधियाँ आदिवासी इलाके में केंद्रित की है। ऐसे में भूरिया को हटाकर मैदान को खाली छोड़ देना किसी भी कोण से राजनीतिक समझदारी का तकाजा नहीं है।
अरूण यादव को मंत्रिमंडल से हटाना चौंकाने वाली घटना है। यह ठीक वैसी ही है, जैसा कि उन्हें मत्रिमंडल में शमिल किया जाना था! उनके हटाए जाने के पीछे फिलहाल कोई तार्किक कारण नजर नहीं आता! उन्हें जब मनमोहनसिंह ने अपनी कैबिनेट में शामिल किया था, तब यह बात कही जा रही थी कि वे देश में यादव समाज से जीतने वाले अकेले सांसद हैं, इसलिए उन्हें जगह दी गई! काँग्रेस उनका राजनीतिक लाभ लेना चाहती है, इसलिए मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। पार्टी ने बिहार के चुनाव में उनका उपयोग भी किया, पर चुनाव के बाद उन्हें उठाकर हाशिए पर रख दिया! खानापूरी के लिए उन्हें संगठन में जगह जरूर दी गई, पर उसका कोई नतीजा नहीं निकलने वाला। कुल मिलाकर अगर बारीकी से देखा जाए तब यही तथ्य उभरता है कि यहाँ भी दिग्विजय फैक्टर ने अपना असर दिखाया है। जिस तरह से राहुल गाँधी से उनकी नजदीकी है, इस बात से कोई इंकार नहीं किया जा सकता कि अगले कुछ समय में प्रदेश के संगठन में भी यहीं फैक्टर काम करेगा!

Tuesday, July 5, 2011

प्रसंग : जबेरा उपचुनाव

राजनीति से सहानुभूति की लहर नदारद!
(हेमंत पाल)
मध्यप्रदेश में काँग्रेस ने नई टीम बनाकर भारतीय जनता पार्टी को मात देने का जो सपना देखा था, वह जबेरा में टूट गया! काँग्रेस की इस हार के पीछे संगठनात्मक खामी थी या भाजपा का पलड़ा भारी था, इस निष्कर्ष पर पहुँचना आसान नहीं है। लेकिन, एक बात तो स्पष्ट हो गई कि राजनीति में सिर्फ सहानुभूति की लहर पर सवार होकर चुनाव जीतने का फार्मूला अब पुराना पड़ गया। किसी नेता के आकस्मिक निधन से खाली हुई सीट पर उसके परिवार का कोई सदस्य चुनाव जीत ही जाएगा, इस बात का दावा नहीं किया जा सकता! इस जीत के लिए पार्टी को एड़ी-चोटी का जोर भी लगाना पड़ता है। सहानुभूति अकेली अपना कमाल नहीं दिखाती! कम से कम हाल के उपचुनावों के नतीजों का संकेत तो यही बताता है। जबेरा में हुई काँग्रेस की हार ने जहाँ पार्टी को भाजपा के खिलाफ और ज्यादा मेहनत करने का संदेश दिया, वहीं यह भी जता दिया कि अब मतदाताओं को सहानुभूति के आँसुओं से भरमाना आसान नहीं है।
प्रदेश विधानसभा के पिछले चुनाव में जबेरा से काँग्रेस के रत्नेश सोलोमन जीते थे। वे पहले भी विधायक रह चुके हैं, और मंत्री भी रहे। उनके निधन के बाद खाली हुई सीट के लिए हुए उपचुनाव में काँग्रेस ने उनकी बेटी डॉ तान्या सोलोमन को उम्मीदवार बनाया। काँग्रेस को उम्मीद थी, कि रत्नेश सोलोमन के प्रति क्षेत्र के लोगों की सहानुभूति और पार्टी का परंपरागत वोट बैंक तान्या की जीत सुनिश्चित कर देगा। लेकिन, काँग्रेस की यह रणनीति सफल नहीं हुई और पार्टी को बुरी तरह मात खाना पड़ी। यह पुश्तैनी-राजनीति का सोच रखने वाली पार्टियों के लिए भी एक संदेश है। अब उन्हें सोचना होगा कि राजनीति को परिवार की बपौती नहीं माना जा सकता। जहाँ तक सहानुभूति की बात है, तो राजनीति में भी इतना पेशेवर अंदाज आ गया है, कि मतदाता अब सहानुभूति जैसे फैक्टर को खास तवज्जो नहीं देते। यह बात सिर्फ जबेरा तक ही सीमित नहीं है, हाल ही में ऐसे कई राजनीतिक संकेत मिले जो पुश्तैनी नेतागिरी को हाशिए पर धकेलते दिखाई दिए। इसलिए कि अब राजनीति महज सहानुभूति से नहीं, समीकरणों के जोड़-घटाव से चलती है।
भाजपा के दिलीप भटेले के 2007 में निधन के बाद पार्टी ने भटेले की पत्नी धारेश्वरी भटेले को यह सोचकर लाँजी से चुनाव मैदान में उतारा था, कि मतदाताओं की सहानुभूति अपना असर दिखाएगी, पर पांसा उल्टा पड़ गया। लाँजी से समाजवादी पार्टी के किशोर समरीते ने चुनाव जीता। सांवेर से भाजपा के टिकट पर जीतने वाले प्रकाश सोनकर के निधन के बाद दिसंबर 2007 में हुए उपचुनाव में तो पार्टी ने सोनकर परिवार के किसी सदस्य को टिकट न देकर अन्य उम्मीदवार को उतारा, पर वो चुनाव हार गया। पार्टी को लगा कि शायद उसने गलत उम्मीदवार का फैसला किया था। यही कारण था कि 2009 में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी ने गलती सुधारकर प्रकाश सोनकर की पत्नी निशा सोनकर को टिकट दिया। यह सोचकर कि शायद उनके परंपरागत वोट बैंक और मतदाताओं की सहानुभूति कोई कमाल कर जाए, पर पार्टी की यह रणनीति भी पलट गई और भाजपा को हार का मुँह देखना पड़ा।
हाल ही एक मामला जमुनादेवी का भी है जो प्रदेश की बड़ी काँग्रेस नेता थी और कुक्षी में उन्हें मात देना टेढ़ी खीर था। लेकिन, उनके निधन के बाद हुए उपचुनाव में काँग्रेस उनकी भतीजी निशा सिंघार को जीत नहीं दिला पाई! जबकि, देखा जाए तो जमुनादेवी के नाम पर तो सहानुभूति का बवंडर चलना था, पर ऐसा कुछ नहीं हुआ! इन उदाहरणों के बीच लक्ष्मणसिंह गौड़ की पत्नी मालनी गौड़ की जीत मायने रखती है। सहानुभूति के जरिए चुनाव जीतने वाले मामले में मालिनी गौड़ के अलावा एक नाम काँग्रेस रणवीरसिंह जाटव का भी है जो गोहद क्षेत्र से अपने पिता माखनसिंह जाटव के निधन के बाद हुए उपचुनाव में जीते। गौर करने वाली बात यह, कि हादसे में हुई नेताओं की मौत के साथ सहानुभूति अब भी कायम है।
भाजपा राष्ट्रीय स्तर पर भले ही कोई बड़ा कमाल नहीं कर पा रही हो, पर प्रदेश में तो भाजपा का ही सिक्का चल रहा है। जबेरा की जीत ने इस बात पर मुहर भी लगा दी! जबेरा से पहले सोनकच्छ और कुक्षी के उपचुनावों में भी भाजपा ने अपनी चुनावी रणनीति का असर दिखा दिया था। इस नजरिए से देखा जाए तो यह भाजपा की जीत की हैट्रिक है। वैसे राजनीति में अभी तक यह माना जाता था, कि जो भी पार्टी सत्ता में होती है, उसके लिए उपचुनाव में जीत हांसिल करना मुश्किल होता है। क्योंकि, एंटीइनकम्बेंसी फैक्टर मतदाताओं को सत्ताधारी पार्टी के खिलाफ वोट देने के लिए प्रभावित करता है। लेकिन, सहानुभूति के नाम पर चुनाव की जंग जीत लेने का काँग्रेस का फार्मूला कुक्षी के बाद जबेरा में भी फेल हो गया। इसे उम्मीदवार के चयन की खामी तो कहा ही जा सकता है, चुनाव में पार्टी को झौंक देने की शिद्दत की भी कमी नजर आई! जबेरा और इससे पहले के उपचुनाव में काँग्रेस की हार को सिर्फ उम्मीदवार की हार नहीं कहा जा सकता, यह सीधे-सीधे पार्टी की रणनीतिक खामी है।

Thursday, April 14, 2011

कहीं दिग्विजय युग की वापसी तो नहीं!

-हेमंत पाल
लंबे असमंजस और उहा-पोह के बाद काँग्रेस हाईकमान ने मध्यप्रदेश में अपनी कमान थामने के लिए नए नेता का चुनाव कर लिया। आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया के नाम पर पार्टी ने एक बड़ा दाँव खेला है। बड़ा दाँव इसलिए कि भूरिया को मंत्री पद से हटाकर ढेर सारी उम्मीदों के साथ मध्यप्रदेश में पार्टी में संजीवनी फूँकने के लिए भेजा गया है। यह दाँव किस हद तक सफल होगा, अभी इसके कयास ही लगाए जा सकते हैं। क्योंकि, फिलहाल न तो भूरिया के सामने चुनाव की कोई चुनौती है, न सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी से दो-दो हाथ करने के लिए मैदान में उतरने जैसा कोई हालात! भूरिया के सामने विपक्ष से बड़ी चुनौती तो खुद की पार्टी ही होगी जो बुरी तरह बिखरी हुई है। गुटों में बँटी पार्टी को समेटकर एक करना और उसमें नया जोश भरना राजनीतिक रूप से आसान नहीं होता! खासकर ऐसी स्थिति में जब उपचुनाव में हार के बाद पार्टी का आत्मविश्वास डोल गया हो और उस पर मातमी साया हो!
कांतिलाल भूरिया की राजनीति की शुरूआत तो प्रदेश की राजनीति से ही हुई थी, लेकिन लंबे समय से वे केंद्र की राजनीति में हैं। लाल बत्ती वाली राजनीति की आदत वाले भूरिया के लिए नई चुनौती की राह काफी मुश्किलों भरी है। उनके सामने प्रदेश में दूसरे कार्यकाल में सरपट दौड़ रही भाजपा सरकार है, तो दूसरी तरफ उन्हें ऐसी पार्टी की लगाम दी गई है जिसमें जुता हर घोड़ा अपनी दिशा में भाग रहा है। इन सभी घोड़ों को एक राह पर आने और साथ दौड़ने के लिए राजी करना और प्रतिद्वंद्वी को मात देना बेहद कठिन काम है। ऐसे में लगाम कसने के लिए चाबुक भी चलाना पड़ेंगे और घोड़ो की मालिश भी करना होगी। प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की जो स्थिति है उसे देखकर यह बात साफ है कि कांतिलाल भूरिया को स्वयं की कांति से कांग्रेस में ओज भरना होगी और इसके लिए उन्हें ऑपरेशन भी करना पड़ेगें और मवाद लगे घावों को भी साफ करना होगा! हो सकता है कि पार्टी की सेहत को जल्द सुधारने के लिए बूस्टर इंजेक्शन भी लगाना पड़ें!
इस आदिवासी नेता के लिए एक चुनौती यह भी होगी कि वे खुद पर लगी दिग्विजय-मुहर को धोकर साफ कर दें! उनके नाम की घोषणा के साथ ही जिस तरह दिग्विजय-युग की वापसी का डंका पीटा जा रहा है, वह पार्टी की भविष्य की रणनीति के लिए घातक साबित हो सकता है। कारण यह है कि एक बड़ा वर्ग अभी भी दिग्विजय सिंह से खफा है। यदि उन्हें लगता है कि कांतिलाल भूरिया के बहाने उसी युग की वापसी हो रही है, तो वह बिदक सकता है! भूरिया के लिए अपनी पहचान वाले उस खोल से बाहर निकलना आसान तो नहीं है, पर उन्हें यह करना होगा, क्योंकि मुकाबला जीतने और लक्ष्य पाने के लिए कई बार कुछ मोह त्यागने भी पड़ते हैं।
नए मुखिया को संगठन वाली सड़क की राजनीति की आदत नहीं है। उनकी छवि भी आक्रामक और मुखर नहीं है। जबकि, आज पार्टी को मध्यप्रदेश में बतौर मुखिया ऐसे ही नेता की ज्यादा जरूरत है। यदि कांतिलाल भूरिया को अपने चयन को सही साबित करके भाजपा को मात देना है, तो उन्हें अपनी छवि के विपरीत आक्रामकता दिखाना होगी और प्रतिद्वंद्वी को उनके घर में घेरना होगा। यह इसलिए भी जरूरी है कि सुरेश पचौरी भी आक्रामकता और मुखरता दिखाने में चूक कर गए थे।
भूरिया को एक निर्धारित कार्य-योजना और रणनीतिक कुशलता के साथ काम की शुरूआत करना होगी! यह इसलिए भी जरूरी है कि दो साल बाद आने वाला समय चुनावी होंगा, जो भूरिया के चयन को सही या गलत साबित करेंगे! उन्हें सबसे बड़ा काम तो अपनी टीम को चुनने का करना होगा। इसलिए कि चुकी और थकी टीम के साथ वे ज्यादा लंबा रास्ता तय नहीं कर सकते! राजनीतिक रूप से बासी हो चुके चेहरे पार्टी में कोई जान फँूक सकेंगे, इस भरोसे को त्याग करके नई टीम चुनना होगी। ऐसे लोगों को चाँस देना होगा जिनकी छवि साफ हो और वे चुनौतियाँ झेलने के आदी हों! आज जमाना युवाओं का है और सबसे पहले कांतिलाल भूरिया को स्वयं की सोच और व्यक्तित्व में युवा जोश भरना होगा, उसके बाद ही वे विपक्ष को टक्कर देने के काबिल हो सकेंगें। इसके अलावा किसी भी राजनीतिक पार्टी का आधार संगठन होता है और भूरिया के सामने संगठन को फिर नए सिरे से खड़े करने की कवायद भी करना है। इसमें उन्हें मैेंद्र सिंह धोनी जैसा जोश और सचिन तेंडुलकर जैसा धैर्य बताना होगा।
अण्णा हजारे के आंदोलन के बाद देश की तासीर में जबरदस्त बदलाव के आसार देखे जा रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरे देश में चिंगारी सुलगने लगी है, ऐसे में कांतिलाल भूरिया के लिए राह और कांटो भरी है। उन्हें कांँग्रेस का ऐसा चेहरा समाज के सामने लाने की तैयारी करना होगी जो दागदार, चुका और थका हुआ न हो! अपने मुकाबले की पार्टी को वे तभी बचाव के लिए बाध्य कर सकते हैं, जब काँग्रेस के दाँव सही निशाने पर लगें! यदि ऐसा नहीं हुआ तो काँग्रेस को प्रदेश की राजनीति में फिर विपक्ष की कुर्सी खाली मिलेगी!