Sunday, January 7, 2024

कंगना रनौत का करियर घिसटने क्यों लगा!

- हेमंत पाल

   कंगना रनौत की अभिनय की दुनिया में अलग ही पहचान रही। वे जब पहली बार परदे पर आई, तो दर्शकों ने उनके चेहरे और अभिनय दोनों में बहुत ताजगी महसूस की। क्योंकि, वे कभी किसी अभिनेत्री के पदचिन्हों पर चलती दिखाई नहीं दी। दर्शकों ने उनमें गंभीरता भी देखी और चंचलता भी, उत्साह भी देखा और आत्मविश्वास भी। लेकिन, अब वे इन दिनों इस वजह से चर्चा में हैं, क्योंकि उनका नाम लोकसभा चुनाव में हिमाचल प्रदेश की एक सीट से बतौर उम्मीदवार लिया जा रहा है। अभी तय नहीं कि वे चुनाव लड़ेंगी तो जीतेंगी भी या नहीं! क्योंकि, ये अभिनेत्री हमेशा ही विवादों के चक्रव्यूह में रही। जबकि, कंगना की शुरुआती फिल्मों क्वीन, तनु वेड्स मनु और इसके सीक्वल ने अपार सफलता पायी। लेकिन, कुछ फिल्मों ने असफलता का स्वाद भी चखा। जल्द ही वो समय भी आ गया, जब वे नए-नए विवादों में फंसती चली गई।
    ये विवाद फ़िल्मी भी थे और गैर फ़िल्मी भी। कुछ मसले तो इतने गैरजरूरी थे, जिनमें कंगना रनौत का दखल उन दर्शकों को नहीं भाया जिनके दिमाग में इस अभिनेत्री की अलग छवि बनी थी। बात यहीं तक नहीं रुकी। कंगना ने ऐसे कई मामलों में टिप्पणी करना शुरू कर दिया, जो बतौर अभिनेत्री बिल्कुल भी जरुरी नहीं था। राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने के बाद हुए विवादों के जवाब,  रितिक रोशन के साथ लंबा विवाद, उनके पासपोर्ट में गलत उम्र, नेपोटिज्म पर फिजूल का बवाल, जेएनयू मामले पर टिप्पणी और इसके बाद चीन से विवाद पर भी टिप्पणी जैसे कई मामले हैं, जिन पर कंगना का टांग अड़ाना ठीक नहीं लगा। इसका नतीजा ये हुआ कि सोशल मीडिया पर 'कंगना' ब्रांड ने निगेटिव रंग ले लिया। खुद अपने प्रोडक्शन हाउस की फिल्म 'मणिकर्णिका' के समय भी उनके अपने डायरेक्टर से कई विवाद हुए! सोशल मीडिया पर कंगना के पक्ष-विपक्ष में अक्सर खेमेबाजी होती है। कंगना के खिलाफ सोशल मीडिया पर नकारात्मक हैशटैग भी ट्रेंड करते रहते हैं। कंगना ने अपनी आदतों से राम मंदिर मामले में अमिताभ बच्चन पर भी उंगली उठाने का मौका निकाल लिया। 
      कंगना रनौत को अब ऐसी अभिनेत्री माना जाने लगा जिनकी तुनक मिजाजी के किस्से आम रहते हैं। इसका असर ये हुआ कि नामी प्रोडक्शन हाउस, जोरदार कहानी और कंगना के अभिनय के बावजूद उनकी फ़िल्में फ्लॉप होने लगी। उनकी फिल्म 'तेजस' की यही गत हुई। इससे पहले आई 'धाकड़' का भी यही हाल हुआ था। कंगना कि इन दोनों फिल्मों ने बेहद ठंडा प्रदर्शन किया। 'तेजस' के बारे में तो कहा गया कि वीक-एंड के दिन जब कमजोर फ़िल्में भी देख ली जाती है, उन दिनों में भी कई सिनेमाघर में 'तेजस' देखने एक भी दर्शक नहीं पहुंचा। आधे से ज्यादा थियटरों में दर्शकों के अभाव में शो तक कैंसिल करने पड़े। जबकि, रिलीज से पहले 'तेजस' का काफी डंका बज रहा था। इस फिल्म का कंगना ने भी प्रमोशन किया। लेकिन, रिलीज होते ही फिल्म का हाल बुरा हो गया। पहले ही दिन दर्शकों के लिए तरसती दिखाई दी। फिल्म कैसी थी, फ़िलहाल इस पर चर्चा नहीं, पर दर्शकों ने कंगना की फिल्मों से कन्नी काट ली है। इसलिए यह कयास गलत नहीं है, कि कंगना की फिल्मों के फ्लॉप होने का कारण इस अभिनेत्री की छवि है, जो धीरे-धीरे बिगड़ती जा रही है। 
    माना जा रहा है कि पहले 'धाकड़' और अब 'तेजस' 2023 की सुपर फ्लॉप फिल्म की लिस्ट में शामिल हो चुकी। दर्शकों की कसौटी पर ये फिल्म खरी नहीं उतर पायी। 45 करोड़ में बनी इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर लागत निकालने के लिए कड़ा संघर्ष किया। कंगना रनौत की ये फिल्म उनके फिल्म करियर की सबसे बड़ी फ्लॉप फिल्म बन गई। इस साल 'धाकड़' की हालत भी यही हुई थी। उस फिल्म के तो कई सिनेमाघरों में एक शो भी नहीं चल सके थे। जानकारों का मानना है कि कंगना की फ़िल्में उनके ख़राब अभिनय की वजह से फ्लॉप नहीं होती, बल्कि तुनक मिजाजी की उनकी आदत, निजी बातों को उजागर करने की सनक और बड़े कलाकारों के साथ काम करने से इंकार करने से उनकी नकारात्मक छवि बन गई। इस कारण ज्यादातर फिल्मकार और कलाकार कंगना से दूर रहने लगे। लोग उनकी बातों का जवाब तक देना जरूरी नहीं समझते। क्योंकि, वे कब, किस बात पर किसे कटघरे में खड़ा कर दें, कहा नहीं सकता। ऐसी आदतों के कारण मीडिया भी कंगना का साथ नहीं देती। मीडिया में ज्यादातर जगह कंगना की खिल्ली ही उड़ाई जाती है। अपने बगावती तेवरों के कारण यह अभिनेत्री सोशल मीडिया में भी खलनायिका बन गई!  अपनी आदतों के कारण कंगना बॉलीवुड में हमेशा अकेली पड़ जाती है! देखा नहीं गया कि कोई कंगना के समर्थन में ज्यादा देर खड़ा रहा हो!
       दरअसल, कंगना की नजर में पूरा बॉलीवुड ख़ामियों से भरा है और सभी उनकी उपलब्धियों से जलते हैं। वास्तव में यह सब इस अभिनेत्री की खुद को सर्वश्रेष्ठ समझने की ग़लतफ़हमी है, और कुछ नहीं! उन्हें हर फ़िल्मकार से शिकायत है कि वे बड़े कलाकारों के बच्चों को लेकर ही फिल्म क्यों बनाते हैं! इससे कई प्रतिभाशाली कलाकार दबकर रह जाते हैं! सुशांत की आत्महत्या वाले मामले में कंगना ने किसी को भी कटघरे में खड़ा करने में देर नहीं की! नेपोटिजम (भाई-भतीजावाद) के नाम पर उन्होंने करण जौहर से लगाकर यशराज फिल्म्स, महेश भट्ट और संजय लीला भंसाली तक को नहीं छोड़ा! इन फिल्मकारों के अलावा टाइगर श्रॉफ और सोनाक्षी सिन्हा तक पर उंगली उठाई! कुछ लोगों ने कंगना को उसी अंदाज में जवाब भी दिया। जबकि, बॉलीवुड में नेपोटिज्म नई बात नहीं है!  ये सिर्फ बॉलीवुड में ही नहीं, राजनीति और बिज़नेस वर्ल्ड में भी ये सब होता है। ये आज की बात भी नहीं है।
     राज कपूर परिवार और भट्ट कैंप आज नहीं पनपे! लेकिन, परदे पर वही लम्बी रेस का घोड़ा बन पाता है, जिसमें क़ाबलियत होती है। राज कपूर का एक ही बेटा ऋषि कपूर चला, देव आनंद का बेटा अभिनय में नहीं चला, राकेश रोशन दूसरे दर्जे के नायक थे, पर उनका बेटा रितिक आज सफल हीरो है। जैकी श्रॉफ का बेटा टाइगर अलग जॉनर का कलाकार है। शशि कपूर का बेटा भी नहीं चला, अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा और जीतेंद्र के बेटे भी आउट हो गए। क्योंकि, उनमें क़ाबलियत नहीं थी। बड़े अभिनेताओं के बच्चों की असफलताओं की लिस्ट बहुत लम्बी है। लेकिन, औसत हीरो जैकी श्रॉफ का बेटा टाइगर आज स्टार है। शत्रुघ्न सिन्हा की बेटी सोनाक्षी भी औसत दर्जे की हीरोइन है, पर महेश भट्ट की बेटी आलिया का जलवा है। इसलिए नेपोटिज्म जैसी बहस फिल्म इंडस्ट्री के लिए बेमतलब है। लेकिन, कंगना ने लंबे समय तक इस विवाद को घसीटा। काफी साल पहले एक फिल्म आई थी 'अल्बर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है!' इस फिल्म में अल्बर्ट पिंटो का गुस्सा महज अभिनय था! लेकिन, अभिनेत्री कंगना रनौत का गुस्सा फ़िल्मी नहीं है। उनके गुस्से का कारण कुछ भी हो सकता है। कंगना रनौत को कब, किस बात पर गुस्सा आ जाए कहा नहीं जा सकता। जरूरी नहीं कि उनके गुस्से का कोई आधार हो! कंगना कब किस बात पर अपना आपा खो दें, कोई नहीं जानता! वास्तव में तो कंगना असहमति का दूसरा नाम है। हर मामले में अपनी सलाह और नज़रिया व्यक्त करना कंगना की आदत रही है!
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फिल्मों में गीत अड़चन या कहानी का हिस्सा!

- हेमंत पाल 

    फिल्मों में गीतों को लेकर कई बारे सवाल उठाए जाते हैं। कुछ दर्शकों को लगता है, कि कई बार फिल्म के कथानक में गीत अड़चन डालते हैं। जबकि, गीतों को फिल्मों का जरूरी हिस्सा मानने वाले भी कम नहीं! दोनों तरह का सोच रखने वाले दर्शकों की बातें अपनी जगह सही है। क्योंकि, यदि फिल्म को मनोरंजन माना जाता है, तो उसमें गीत की अपनी अलग जगह है। लेकिन, कुछ ऐसी फ़िल्में भी आई, जिन्होंने इस प्रथा को तोड़ा! इन फिल्मों के कथानक में गीतों के लिए कोई जगह नहीं थी! इसके बाद भी इन फिल्मों ने सफलता पाई! ये चमत्कार इसलिए हुआ कि इनकी कहानी बहुत प्रभावशाली थी, जिसने दर्शकों को सोचने तक का मौका नहीं दिया और बांधकर रखा। यानी सारा दारोमदार फिल्म के दमदार कथानक से जुड़ा है। ब्लैक एंड व्हाइट के ज़माने से आज तक बनने वाली फिल्मों में जो नहीं बदला, वो गीत ही है! कभी कहानी को मदद देने के लिए तो कभी कहानी को आगे बढ़ाने के लिए फिल्मों में गीतों का इस्तेमाल किया जाता रहा है। दुनिया में हमारे यहां बनने वाली फ़िल्में ही हैं, जिनमें गीतों के बगैर काम नहीं चलता। कहानी में सिचुएशनल के मुताबिक गाने पिरोकर दर्शकों के सामने ऐसा माहौल बनाया जाता है कि वो बंध जाता है। फ़िल्मी कारोबार में भी गीत-संगीत कमाई का बड़ा जरिया है! ये भी एक कारण है, कि फिल्मों में गीत भी अहम किरदार निभाते हैं। ऐसी बहुत सी फिल्मों के नाम गिनाए जा सकते हैं, जिन्होंने अपने गीतों की वजह से सफलता हासिल की! 
      फिल्म इतिहास में बिना गीतों वाली पहली फिल्म बीआर चोपड़ा की 'कानून' को माना जाता है, जो 1960 आई थी। ये फिल्म कानूनी पैचीदगियों के बीच एक वकील के दांव-पेंच की कहानी थी, जो हत्यारे को बचा लेता है। इसमें सवाल उठाया गया था कि क्या एक ही अपराध में किसी व्यक्ति को दो बार सजा दी जा सकती है? ये फिल्म इसी सवाल का जवाब ढूंढती है। इस फिल्म में अशोक कुमार ने एक वकील का किरदार निभाया था। बगैर गीतों वाली दूसरी फिल्म थी 'इत्तेफ़ाक़' जिसे 1969 में यश चोपड़ा ने निर्देशित किया था। राजेश खन्ना और नंदा ने इसमें मुख्य भूमिकाएं निभाई थी। यह फिल्म एक रात की कहानी है, जिसमें दर्शक बंधा रहता है। गीतों के बिना भी ये फिल्म पसंद की गई थी। यह फिल्म हत्या से जुड़े एक रहस्य पर आधारित थी, यही कारण था कि दर्शको को फिल्म में गीत न होना खला नहीं।
   बरसों बाद श्याम बेनेगल ने 1981 में 'कलयुग' बनाकर इस परम्परा की फिर याद दिलाई थी। इसमें शशि कपूर, राज बब्बर और रेखा मुख्य भूमिकाओं में थे। महाभारत से प्रेरित इस फिल्म में दो व्यावसायिक घरानों की दुश्मनी को नए संदर्भों में फिल्माया गया था। बदले की कहानी पर बनी इस फिल्म में कोई गाना न होने के बावजूद इसे पसंद किया गया था। इसे 1982 में 'फिल्म फेयर' का सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार भी मिला था। इसके अगले साल 1983 में कुंदन शाह की कॉमेडी फिल्म 'जाने भी दो यारो' आई इसमें भी कोई गीत नहीं था। इसमें नसीरुद्दीन शाह, रवि वासवानी, ओमपुरी और सतीश थे। ये एक मर्डर मिस्ट्री थी, जिसने व्यवस्था पर भी करारा व्यंग्य किया था।
     बिना गीतों की फिल्म की सबसे बड़ी खासियत होती है पटकथा की कसावट। यदि फिल्म की कहानी इतनी रोचक है, कि वो दर्शकों को बांधकर रख सकती है, तो फिर गीतों का न होना कोई मायने नहीं रखता! इस तरह की अगली फिल्म 1999 में रामगोपाल वर्मा की 'कौन है' आई थी। ये रोमांचक कहानी वाली फिल्म थी, जिसमें मनोज बाजपेयी, सुशांत सिंह और उर्मिला मातोंडकर ने अभिनय का जादू दिखाया था। इस फिल्म की पटकथा इतनी रोचक थी, कि दर्शकों को हिलने तक का मौका नहीं मिला था। 2005 में आई संजय लीला भंसाली की फिल्म 'ब्लैक' जिसने भी देखी, उसे याद होगा कि फिल्म में कोई गीत नहीं था, पर इस फिल्म को आज भी याद किया जाता है। अमिताभ बच्चन और रानी मुखर्जी की ये फिल्म एक ऐसी लड़की और उसके टीचर की कहानी थी जो देख और सुन नहीं पाती। इस फिल्म को कई अवॉर्ड्स भी मिले।
    इसके अलावा बिना गीतों वाली उल्लेखनीय फिल्मों में 2003 में आई 'भूत' थी, जिसका निर्देशन राम गोपाल वर्मा ने किया था। इस फिल्म में अजय देवगन, फरदीन खान, उर्मिला मातोंडकर और रेखा थे। ये डरावनी फ़िल्म थी और इसमें कोई गीत नहीं था। इसी साल आई फिल्म 'डरना मना है' में सैफ अली खान, शिल्पा शेट्टी, नाना पाटेकर और सोहेल खान थे। इस फिल्म में भी कोई गीत नहीं था, फिर भी यह हिट हुई। 2008 में आई 'ए वेडनेसडे' अपनी कहानी के नएपन की वजह से सुर्खियों रही। फिल्म में एक आम आदमी की कहानी थी, जो व्यवस्था से परेशान होकर खुद उससे टक्कर लेता है। 2013 की फिल्म 'द लंच बॉक्स' दो अंजान अधेड़ प्रेमियों की कहानी थी, जो गलती से लंच बॉक्स जरिए प्रेम पत्रों का आदान-प्रदान करने लगते हैं। ऐसी ही कॉमेडी फिल्म 'भेजा फ्राई' 2007 में आई, लेकिन कमजोर कहानी वाली इस फिल्म को पसंद नहीं किया गया। इसमें विनय पाठक, रजत कपूर और मिलिंद सोमण थे।
      इन फ़िल्मी गीतों का एक दूसरा सकारात्मक पक्ष भी है। ऐसी भी फिल्में हैं, जो केवल एक गाने के कारण बाॅक्स ऑफिस पर दर्शकों की भीड़ इकट्ठा करने में कामयाब रही। कभी ये कव्वाली रही, कभी ग़ज़ल तो कभी शादियों में गाए जाने वाले गीत! एक गीत की बदौलत बाॅक्स ऑफिस पर सिक्कों की बरसात कराने में संगीतकार रवि बेजोड़ रहे। उनकी एक नहीं, कई ऐसी फिल्में हैं, जो केवल एक गाने के कारण बार-बार देखी! ऐसी फिल्मों में एक है शम्मी कपूर की 'चाइना टाउन' जिसका गीत 'बार बार देखो, हजार बार देखो' तब जितना मशहूर हुआ था, आज भी उतना ही मशहूर है। शादी ब्याह से लेकर पार्टियों में जहां कई नौजवानों को संगीत के साथ थिरकना होता है, इसी गीत की डिमांड होती है। रवि की दूसरी फिल्म हैं 'आदमी सड़क का' जिसका गीत 'आज मेरे यार की शादी है' बारात का नेशनल एंथम बनकर रह गया। इसके बिना दूल्हे के दोस्त आगे ही नहीं बढ़ते! इसी तरह दुल्हन की विदाई पर 'नीलकमल' का रचा गीत 'बाबुल की दुआएं लेती जा' ने दर्शकों की आंखें नम तो की, फिल्म की सफलता में भी बहुत योगदान दिया।
    रवि ने आरएटी रेट (दिल्ली का ठग), तुम एक पैसा दोगे वो दस लाख देगा (दस लाख ), मेरी छम छम बाजे पायलिया (घूंघट), हुस्न वाले तेरा जवाब नहीं (घराना), हम तो मोहब्बत करेगा (बॉम्बे का चोर), ए मेरे दिले नादां तू गम से न घबराना (टावर हाउस ), सौ बार जनम लेंगे सौ बार फना होंगे (उस्तादों के उस्ताद), आज की मुलाकात बस इतनी (भरोसा), छू लेने दो नाजुक होंठों को (काजल ), मिलती है जिंदगी में मोहब्बत कभी कभी (आंखें), तुझे सूरज कहूँ या चंदा (एक फूल दो माली), दिल के अरमां आंसुओं में बह गए (निकाह) जैसे एक गीत की बदौलत पूरी फिल्म को दर्शनीय बना दिया! फिल्मों को बाॅक्स ऑफिस पर कामयाबी दिलवाने वाले अकेले गीतों में दिल के टुकड़े-टुकड़े करके मुस्करा के चल दिए (दादा), आई एम ए डिस्को डांसर (डिस्को डांसर), बहारों फूल बरसाओ (सूरज), परदेसियों से न अंखियां मिलाना (जब जब फूल खिले), चांद आहें भरेगा (फूल बने अंगारे), चांदी की दीवार न तोड़ी (विश्वास), शीशा हो या दिल हो (आशा), यादगार हैं। 
     सत्तर के दशक में एक फिल्म आई थी 'धरती कहे पुकार के' जिसका एक गीत 'हम तुम चोरी से बंधे इक डोरी से' इतना हिट हुआ था कि इसी गाने की बदौलत यह औसत फिल्म सिल्वर जुबली मना गई। इंदौर के अलका थिएटर में तो उस दिनों प्रबंधकों को फिल्म चलाना इसलिए मुश्किल हो गया था कि काॅलेज के छात्र रोज आकर सिनेमाघर में जबरदस्ती घुस आते और इस गाने को देखकर ही जाते थे। कई बार तो ऐसे मौके भी आए जब रील को रिवाइंड करके छात्रों की फरमाइश पूरी करना पड़ी। हिंदी सिनेमा में एक दौर ऐसा भी आया जब किसी सी-ग्रेड फिल्म की एक कव्वाली ने दर्शकों में गजब का क्रेज बनाया था। इस तरह की फिल्मों में 'पुतलीबाई' भी शामिल है। फिल्म की नायिका आदर्श की पत्नी जयमाला थी। इस फिल्म की एक कव्वाली 'ऐसे ऐसे बेशर्म आशिक हैं ये' ने इतनी धूम मचाई थी, कि सी-ग्रेड फिल्म 'पुतलीबाई' ने उस दौरान प्रदर्शित सभी फिल्मों को पछाड़ते हुए सिल्वर जुबली मनाई थी।
     इसके बाद तो हर दूसरी फिल्म में कव्वाली रखी जाने लगी। 'पुतलीबाई' के बाद एक और फिल्म आई थी नवीन निश्चल, रेखा और प्राण अभिनीत 'धर्मा' जिसमें प्राण और बिंदू पर फिल्माई कव्वाली 'इशारों को अगर समझों राज को राज रहने दो' ने सिनेमा हाॅल में जितनी तालियां बटोरी बॉक्स आफिस पर उससे ज्यादा सिक्के लूटने में सफलता पाई। इसके बाद कव्वाली का दौर थमा,तो फिल्मकारों ने इससे पीछा छुड़ाकर फिर गजलों पर ध्यान केंद्रित किया। एक गजल से सफल होने वाली फिल्मों में राज बब्बर, डिम्पल और सुरेश ओबेराय की फिल्म 'एतबार' (किसी नजर को तेरा इंतजार आज भी है) और 'नाम' (चिट्ठी आई है) यादगार है। इस तरह देखा जाए तो हिंदी फिल्मों का मिजाज बड़ा अजीब है, कभी फिल्में दर्जनों गानों के बावजूद हिट नहीं होती, तो कभी बिना गाने और महज एक गाने के दम पर बाॅक्स ऑफिस पर सारे कीर्तिमान तोड़ देती है।
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बीते साल की खट्टी-मीठी यादें और सिनेमा

- हेमंत पाल

      बीता हुआ हर साल खट्टी-मीठी यादों का गुलदस्ता होता है। इन यादों में से कुछ यादों को नए साल के लिए संजोकर रख लिया जाता है। ये जीवन में भी होता है और फिल्मों में भी। सिनेमा के नजरिए से देखा जाए, तो खट्टी-मीठी यादों का आशय है हिट और फ्लॉप होने वाली फ़िल्में। साल 2023 ने भी फिल्मों को बहुत कुछ ऐसा दिया, जिसका बीते कई सालों से इंतजार किया रहा था। देश के साथ सिनेमा ने भी कोरोना काल में दो साल का बहुत बुरा वक़्त देखा। कई महीनों तक सिनेमाघर बंद रहे। जब खुले तो दर्शकों ने उससे दूरी बनाए रखी, क्योंकि संक्रमण का खतरा टला नहीं था। लंबे समय तक फिल्मकार नई फ़िल्में रिलीज करने से बचते रहे। इस कारण 2022 का साल भी फिल्मों के हिसाब से ठंडा रहा था। कोरोना काल बीतने के बाद दर्शकों को सिनेमाघरों तक खींचने में फिल्म इंडस्ट्री को 3 साल लग गए। लेकिन, साल 2023 ने कई धारणाओं को खंडित करके कई फिल्मों को सफलता का नया शिखर छूने का मौका दिया। 
      साल का आरंभ एक जानवर के नाम वाली फिल्म 'लकड़बग्घा' से हुआ। जो साल के अंत में 'एनिमल' से होते हुए 'डंकी' पर जाकर ख़त्म हुआ। इस साल हिंदी की कुल 148 हिंदी फ़िल्में रिलीज हुई। कुछ फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर कमाई का रिकॉर्ड बनाया, तो कुछ फिल्मों को दर्शकों ने इतना बुरी तरह नकारा कि वे एक-दो शो के बाद ही सिनेमाघरों से ही उतार दी गई। बीते साल को सफलता और असफलता के पैमाने पर परखा जाए, तो फ्लॉप होने वाली फिल्मों की संख्या हिट के मुकाबले बहुत ज्यादा रही। इसी पैमाने पर हिट और फ्लॉप हीरो और हीरोइन को परखा जाए तो अक्षय कुमार और कंगना रनौत की फ़िल्में दर्शकों की कसौटी पर खरी नहीं उतरी। सबसे सफल हीरो शाहरुख़ खान को माना जा सकता है, जिनकी लगातार तीन फिल्मों ने करोड़ों की कमाई की। लंबे समय बाद शाहरुख खान का सितारा आसमान पर चमका। इस लिस्ट में सनी देओल को भी रखा जा सकता है, जिन्होंने सिर्फ एक फिल्म 'ग़दर-2' से लंबे अरसे बाद दर्शकों के दिल में जगह बना ली। सलमान खान भी एक फ्लॉप 'किसी का भाई किसी की जान' और एक हिट 'टाइगर-3' से चर्चा में बने रहे।        
     इस साल कुछ फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर झंडे गाड़े। लेकिन, इनकी संख्या उंगलियों पर गिनने वाली रही। कुछ ऐसी भी फिल्में रहीं, जो बेवजह विवादों में फंसी। सफलता के साथ विवादों में आई फिल्मों में सबसे ज्यादा चर्चित फिल्म रही 'आदिपुरुष' जिसके संवादों पर दर्शकों को एतराज हुआ। 'रामायण' जैसे धार्मिक कथानक पर आधारित इस फिल्म का फिल्मांकन भी दर्शकों के गले नहीं उतरा। भगवान राम बने दक्षिण के हीरो प्रभास से दर्शकों को काफी उम्मीदें थीं, लेकिन उन्होंने खासा निराश किया। भगवान राम और हनुमान के संवादों को पसंद नहीं किया गया। इसी तरह शाहरुख खान की सफल फिल्म 'पठान' ने बॉक्स ऑफिस पर तो कामयाबी के झंडे गाड़े, पर फिल्म के एक गाने 'बेशर्म रंग' की वजह से लंबा विवाद चला। 
       इसी तरह केरल में धर्मांतरण के मुद्दे पर बनी फिल्म 'द केरल स्टोरी' पर भी बहुत झमेला हुआ। इसे लव जिहाद का नया एंगल भी कहा गया, फिर भी फिल्म काफी चर्चित रही। अक्षय कुमार की फिल्म 'ओएमजी-2' को लेकर भी नकारात्मक माहौल बना। वास्तव में ये सीक्वल फिल्म पहली वाली की तरह धार्मिक नहीं थी। इस फिल्म का कथानक सेक्स एजुकेशन पर था, जिसे लेकर नाराजगी भी सामने आई। साल के अंत में भी विवाद से छुटकारा नहीं मिला। रणबीर कपूर की सफल फिल्म 'एनिमल' में महिला किरदारों के चित्रण और अति हिंसा को लेकर बहस छिड़ी और ये बहस संसद तक पहुंची।   
      इस साल कई कलाकारों ने बॉक्स ऑफिस पर जलवा बिखेरा। उनकी फिल्मों ने सिनेमाघरों में दर्शकों की पसंद का रिकॉर्ड बनाया। इन कलाकारों की फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर करोड़ों की कमाई भी की। साउथ से लेकर मुंबई फिल्म इंडस्ट्री तक के कलाकारों ने बॉक्स ऑफिस पर कब्जा जमाए रखा। साल के शुरूआती दौर में शाहरुख खान की फिल्म 'पठान' रिलीज हुई। 'पठान' ने बॉक्स ऑफिस पर जमकर कमाई की। आंकड़े की बात करें तो दुनियाभर में 'पठान' ने 1050 करोड़ का कलेक्शन किया। इसके बाद सनी देओल और अमीषा पटेल की फिल्म 'गदर-2' ने भी 22 साल पहले का वो दौर याद दिला दिया, जब इस सीरीज की पहली फिल्म 'ग़दर' (2001) ने बॉक्स ऑफिस को हिला दिया था। दर्शकों का इस फिल्म को लेकर जबरदस्त क्रेज दिखाई दिया। इस सीक्वल फिल्म ने भी दुनियाभर में 691.08 करोड़ का कारोबार किया। 
       इसके बाद आई शाहरुख़ खान की फिल्म 'जवान' ने तो मानो भूचाल ला दिया। ये शाहरुख़ की दूसरी हिट फिल्म थी। 'जवान' ने दुनियाभर में 1160 करोड़ का बिजनेस किया। इन दो फिल्मों ने शाहरुख़ पर वर्साटाइल एक्टर की मुहर भी लगा दी और शाहरुख़ की उस इमेज को पूरी तरह बदल दिया। अभी तक उन्हें रोमांटिक किरदारों का परफेक्ट हीरो ही माना जाता था। साल के अंत में आई शाहरुख़ की 'डंकी' ने भी अच्छी कमाई के संकेत दिए। खास बात ये भी रही कि शाहरुख़ खान लंबे अरसे बाद परदे पर आए और तीन फिल्मों से छा गए। शाहरुख की इस कॉमेडी-ड्रामा फिल्म का इंतजार हो रहा था। इस फिल्म ने पहले दिन 35 करोड़ की कमाई की। इससे पता चलता है कि दर्शक शाहरुख खान और उनकी फिल्में देखना पसंद करते हैं। उधर, साऊथ में रजनीकांत का अलग ही जलवा रहा। फ़िल्में उनके नाम से चलती है, न कि उनके काम और कहानी से। रजनीकांत की फिल्म 'जेलर' ने भी सिनेमाघरों में धमाल मचाया। 'जेलर' को लेकर रजनीकांत की तारीफ भी हुई और बॉक्स ऑफिस पर फिल्म का कलेक्शन 650 करोड़ रहा। 
      सफल फिल्मों में एक साऊथ की ही फिल्म 'लियो' भी रही जिसके हीरो विजय थलापति थे। 'लियो' एक एक्शन थ्रिलर फिल्म है, जिसमें तृष्णा कृष्णन और संजय दत्त ने भी किरदार निभाए। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर अच्छा कारोबार किया। फिल्म ने 612 करोड़ रुपए कमाए। साल के आखिरी महीनों में आई रणबीर कपूर की फिल्म 'एनिमल' ने उम्मीद से कहीं ज्यादा अच्छा बिजनेस किया। रिलीज के बाद से ही फिल्म दर्शकों के दिलों पर छा गई। फिल्म ने दो सप्ताह में ही 800 करोड़ का कारोबार किया। फिल्म में ज्यादा हिंसा को लेकर भी टिप्पणी की गई, फिर भी दर्शक फिल्म देखने का मोह नहीं छोड़ पाए।
      'द केरल स्टोरी' फिल्म को लेकर शुरू में काफी विवाद हुआ। लेकिन, फिर भी यह फिल्म ब्लॉकबस्टर हुई। इस फिल्म में केरल में होने वाले धर्म बदलाव की कहानी है। इस फिल्म के फैक्ट्स को लेकर सड़क से संसद तक बातें हुई। यह फिल्म एक लड़की फातिमा की कहानी है, जो नर्स बनना चाहती थीं। लेकिन, उसे कट्टरपंथी अपने चंगुल में फंसाकर जबरन धर्म परिवर्तन करवा कर आतंकवादियों के चंगुल में ले आते हैं। इस फिल्म ने साढ़े 500 से ज्यादा कलेक्शन किया। 'रॉकी और रानी की प्रेम कहानी' को भी अप्रत्याशित सफलता मिली। कथानक के अनुसार एक पंजाबी लड़का रॉकी एक बंगाली पत्रकार रानी के प्यार में फंस जाता है। उससे शादी करने के लिए अपने परिवार से लड़ जाता है। कैसे उन दोनों की शादी होती है यही कहानी क्लाइमेक्स है। 'रॉकी और रानी की प्रेम कहानी' में कॉमेडी के साथ रोमांस और ड्रामा का तड़का भी है। डेढ़ सौ करोड़ की इस फिल्म ने करीब 500 करोड़ का बिजनेस करके सबको चौंका तो दिया।  
      कुछ समय पहले रिलीज हुई फिल्म पोंनियिन सेल्वन पार्ट-2 एक सीक्वल फिल्म है। इस फिल्म में ऐतिहासिक चोला साम्राज्य का कथानक था। दक्षिण भारत के इस साम्राज्य की गाथा सुनी तो गई, पर इस फिल्म में उस कहानी को बेहद रोचक ढंग से प्रस्तुत किया गया। सलमान खान और कैटरीना कैफ की सीक्वल फिल्म 'टाइगर 3' को लेकर काफी कयास लगाए गए थे। लेकिन, फिल्म ने संभावना से कम बिजनेस किया। फिल्म ने बजट से ज्यादा कमाई जरूर की, पर सलमान खान का जादू दिखाई नहीं दिया, जो इस सीरीज की दो फिल्मों में दर्शकों ने देखा था। 'टाइगर 3' में देश को दुश्मनों से बचाने के लिए सलमान खान और कैटरीना की कोशिशों की कहानी है। फिल्म ने देश और दुनिया में मिलकर करीब साढ़े 700 करोड़ का कारोबार किया। ये तो हुआ फिल्म के कारोबार का सच।
     लेकिन, बीता साल कुछ कलाकारों के लिए भी अच्छा नहीं रहा। क्योंकि, फिल्मों की सफलता के साथ उसके किरदारों की भी तारीफ होती है। लेकिन, बीते साल दो कलाकार ऐसे रहे, जो दर्शकों की नजर से पूरी तरह उतर गए और उनकी फ़िल्में भी फ्लॉप रही। अक्षय कुमार उनमें एक हैं जिनकी लगातार 5 फिल्में दर्शकों ने नकार दी। इनमें बच्चन पांडे, सम्राट पृथ्वीराज, रक्षा बंधन, राम सेतु और 'सेल्फी' शामिल है। यही स्थिति कंगना रनौत की भी रही। उनकी फिल्म 'धाकड़' और 'तेजस' दोनों बुरी तरह फ्लॉप हुई। एक समय कंगना की फ़िल्में दर्शकों के दिमाग पर चढ़ी थी, पर अब स्थिति ये है, कि दर्शक उसके चार शो भी नहीं झेल पाए।    
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कई बड़ों के पर कतरे, कुछ को नए पंख लगे!

- हेमंत पाल 

     मंत्रिमंडल के गठन के बाद मंत्रियों को उनके विभागों के बंटवारे में इतना समय लग सकता है, ये अब से पहले कभी नहीं देखा गया। इसका नतीजा ये हुआ कि अनुमानों वाले विभागों की लिस्ट ज्यादा बांची गई। सोशल मीडिया पर तो स्थिति ये हुई कि जिसे जो लिस्ट बनाना था, वो बनाकर पोस्ट करता रहा। जिससे फर्जी लिस्टों की भीड़ लग गई। जब असली लिस्ट सामने आई तो कुछ देर उसे भी फर्जी ही माना गया। इससे ये समझा जा सकता है कि भाजपा के लिए मुख्यमंत्री का चयन जितना आसान था, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल मंत्रियों के नाम फ़ाइनल करना और अब उससे भी ज्यादा मुश्किल उन्हें विभाग देना रहा। इस सबके पीछे उस दबाव को समझा जा सकता है, जो मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव और पार्टी पर होगा। लेकिन, अंततः मंत्रियों को उनके दफ्तर सौंप दिए गए। निश्चित रूप से कुछ मंत्री विभाग पाकर खुश होंगे, तो कुछ दुखी भी और ये स्वाभाविक भी है!       
      मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अपने पास सामान्य प्रशासन,गृह, जनसंपर्क, नर्मदा घाटी विकास, उद्योग, जेल, खनिज संसाधन, विमानन सहित महत्वपूर्ण विभाग रखे हैं। खास बात यह कि मुख्यमंत्री के बाद दोनों उप मुख्यमंत्रियों को भी महत्वपूर्ण विभागों से नवाजा गया। उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा को वित्त, वाणिज्यिक कर, योजना, आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग दिया गया। जबकि, राजेंद्र शुक्ला को लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण, चिकित्सा शिक्षा विभाग का मंत्री बनाया गया है। पहले अनुमान लगाया जा रहा था कि कैलाश विजयवर्गीय, प्रहलाद पटेल और राकेश सिंह जैसे नेताओं को कई बड़े विभाग दिए जाएंगे, पर ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि, इन्हें लीक से हटकर विधानसभा चुनाव में उतारा गया था। लेकिन, ऐसा नहीं हुआ। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि दिग्गजों को उनके कद के मुकाबले कम विभाग सौंपे गए। हालांकि, कैलाश विजयवर्गीय को शायद उनके पुराने  अनुभव के कारण अच्छा विभाग अच्छा दिया गया। मुख्यमंत्री ने गृह, खनिज समेत जितने विभाग रखे, उससे लगता है कि इन विभागों की वजह से ही विभागों के बंटवारे में पांच दिन लगे। 
       गृह, जनसंपर्क और खनिज जैसे महत्वपूर्ण विभाग मुख्यमंत्री ने अपने पास रखे इस संकेत को स्वतः समझा जा सकता है। उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा पहले वाली सरकार में भी वित्त मंत्री थे, उन्हें फिर उसी दफ्तर की जिम्मेदारी दी गई। कैलाश विजयवर्गीय को नगरीय प्रशासन और संसदीय कार्य जैसे जनता से जुड़े विभाग सौंपे गए हैं। विजयवर्गीय पहले भी यह विभाग संभाल चुके हैं। प्रहलाद पटेल को पंचायत एवं ग्रामीण विकास और श्रम मंत्री बनाया गया। जबकि, वे मुख्यमंत्री पद की दौड़ में सबसे आगे खड़े थे।
     सांसद से विधायक और अब मंत्री बनाए गए राकेश सिंह को जरूर लोक निर्माण जैसा महत्वपूर्ण विभाग दिया। विभागों के बंटवारे में इस बार विजय शाह के पर कतर दिए गए। उन्हें जनजातीय कार्य, लोक परिसंपत्ति प्रबंधन, भोपाल गैस त्रासदी राहत एवं पुनर्वास जैसे विभाग दिए गए। निश्चित रूप से ये उनके कद और जिस तरह की उनकी पहचान है उस हिसाब से इसे छोटा माना जा सकता है। सांसद से विधायक बने उदय प्रसाद सिंह को परिवहन और स्कूली शिक्षा जैसे दमदार विभाग दिए गए। 
    सिंधिया कोटे वाले तीन मंत्रियों में से तुलसी सिलावट और प्रद्युम्न सिंह तोमर के विभाग नहीं बदले गए। प्रधुम्न सिंह को फिर ऊर्जा विभाग दिया गया, जो पिछली सरकार में भी उनके पास था। जबकि, तुलसी सिलावट को फिर जल संसाधन की जिम्मेदारी दी गई। सिंधिया गुट के तीसरे मंत्री गोविंद राजपूत को खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग का मंत्री बनाया गया। राजपूत के पास शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल वाली सरकार में राजस्व और परिवहन जैसे बड़े विभाग थे। इसे सीधे से पर कतरने वाली बात कहा जा सकता है। 
     इस बार करण सिंह वर्मा को राजस्व दिया गया, दो दशक पहले भी वे इस विभाग को संभाल चुके हैं। जिनके पर कतरे गए उनमें विश्वास सारंग का नाम भी लिया जा सकता है। उन्हें खेल एवं युवा कल्याण, सहकारिता विभाग का मंत्री बनाया गया हैं। जबकि, दूसरी बार मंत्री बनी आदिवासी कोटे की निर्मला भूरिया को महिला एवं बाल विकास का मंत्री बनाया गया। पहली बार मंत्री बने आदिवासी नेता नागरसिंह चौहान को वन, पर्यावरण, अनुसूचित जाति कल्याण जैसे बड़े विभाग का मंत्री बनाया गया। पहली बार कैबिनेट में आए जैन समाज से जुड़े चेतन कश्यप को सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योग की जिम्मेदारी दी गई। वे खुद उद्योगपति हैं, इसलिए बतौर मंत्री उनका अनुभव काम आएगा।
     मंत्रिमंडल में पहली बार शामिल की गई कृष्णा गौर को पिछड़ा वर्ग एवं अल्पसंख्यक कल्याण, विमुक्त, घुमंतू और अर्ध घुमंतू कल्याण विभाग दिया गया। लगता नहीं कि ये विभाग उन्हें रास आएंगे। स्वतंत्र प्रभार वाले दूसरे मंत्री गौतम टेटवाल को तकनीकी शिक्षा और धर्मेंद्र लोधी को संस्कृति, पर्यटन, धार्मिक न्यास विभाग का मंत्री बनाया गया। जिस तरह से विभागों का बंटवारा हुआ उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि संतुलन का ध्यान दिया गया। कुछ के पंख कतरे गए तो ऐसे भी मंत्री हैं जिन्हें नए पंख लगाकर ताकतवर बनाया गया हैं।
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Thursday, December 28, 2023

ये मुख्यमंत्री की सख्ती ही नहीं, ब्यूरोक्रेसी को इशारा भी!

- हेमंत पाल 

    गुना बस हादसे के बाद मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने जिस तरह की सख्ती दिखाई, वो अप्रत्याशित कही जा रही है। वास्तव में ऐसी सख्ती दिखाने की जरुरत भी थी। उनकी इस कार्यवाही की तारीफ की जा रही है। लेकिन, यह जरुरी भी था, जो अभी तक कभी देखने को नहीं मिला। घटना की गंभीरता के नजरिए से भी और मुख्यमंत्री के भविष्य के तेवर दिखाने के लिए भी। डॉ मोहन यादव को लेकर आम लोगों का और प्रशासनिक सोच ऐसा नहीं बना था। उनसे इस तरह की सख्ती की उम्मीद नहीं की गई थी, जो उन्होंने दिखाई। लेकिन, इस एक घटना को लेकर उन्होंने मंत्रालय से लेकर नगरपालिका तक के 6 बड़े अफसरों को जिस तरह नाप दिया, वो प्रशासनिक व्यवस्था के लिए संदेश है कि उन्हें कमजोर मुख्यमंत्री न समझा जाए। बस हादसे पर कलेक्टर, एसपी, आरटीओ के साथ ट्रांसपोर्ट कमिश्नर और विभाग के प्रमुख सचिव तक को हटाया जाना सामान्य बात नहीं है। किंतु, उनकी एक असामान्य कार्यवाही ने उन्हें आज हीरो बना दिया।  
    जब से डॉ मोहन यादव ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, उनकी कामकाज की शैली का स्पष्ट इशारा नहीं मिला था। शिवराज सरकार में वे उच्च शिक्षा मंत्री रहे, जो एकेडमिक जैसा विभाग हैं, जहां के फैसलों का जनता से ज्यादा वास्ता भी नहीं पड़ता। लेकिन, जब से वे मुख्यमंत्री बने, कोई ऐसे फैसले भी सामने नहीं आए, जो उनकी सख्ती का संकेत दें। गुना की इस घटना ने उन्हें मौका दिया, जिसके जरिए उन्होंने बता दिया कि मुझे हल्के में नहीं लिया जाए। वे कड़े प्रशासनिक फैसले लेने में भी पीछे नहीं हटेंगे। ये बात भी है, कि सरकार बदलने के बाद ज्यादातर अफसरों के तबादले की बात की जा रही थी, पर जिस तरह उन्होंने 6 अफसरों को हटाया, उसने बता दिया कि वे किसी के प्रभाव में काम नहीं करेंगे। वे सिर्फ सख्ती की बातें ही नहीं करेंगे, सख्ती भी ऐसी करेंगे जो दिखाई देगी।      
    सबसे पहले तो उन्होंने दो बड़ी मीटिंगों को कैंसिल करके घटना स्थल पर जाने का फैसला किया, उससे उनकी संवेदनशीलता का इशारा मिलता है। वे वहां गए और घटना का जायजा लिया। जो जानकारी उन्हें मिली, उससे निष्कर्ष निकला कि बस अवैध रूप से चल रही थी यानी आरटीओ दोषी, समय पर फायर ब्रिगेड नहीं पहुंची इसके पीछे नगर पालिका के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीएमओ) की लापरवाही है। दोनों को तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया। देखा जाए तो ये सामान्य बात थी और समझा गया कि बात यहीं ख़त्म हो गई। लेकिन, भोपाल पहुंचकर उन्होंने गुना कलेक्टर और वहां एसपी को हटाने के आदेश दिए। गुना कलेक्टर तरुण राठी का मंत्रालय ट्रांसफर कर अपर सचिव बनाया दिया गया। एसपी विजय कुमार खत्री को पुलिस मुख्यालय भेज दिया।
    सबसे बड़ी कार्यवाही तो ट्रांसपोर्ट कमिश्नर संजय झा विभाग के प्रमुख सचिव को हटाने को लेकर की गई। इस घटना से मुख्यमंत्री ने मामले के सारे पहलुओं को समझ लिया कि बात सिर्फ दुर्घटना के बाद समय पर फायर ब्रिगेड भेजने तक सीमित नहीं है। बस बिना परमिट और फिटनेस के चल रही थी, इसका सीधा सा मतलब है कि आरटीओ के अलावा ऊपर तक का अमला इसमें शामिल है। एक और गौर करने वाली बात यह भी है कि बस का मालिक भाजपा का पदाधिकारी बताया जा रहा है, उस पर भी कार्रवाई की बात की गई। डॉ मोहन यादव ने मामले की जांच के लिए समिति का गठन किया है। इसका संकेत यह भी समझा जाना चाहिए कि अभी आग ठंडी नहीं हुई!  
     हादसे की जांच के आदेश के बाद एक समिति गठित हो गई, जो तीन दिन में रिपोर्ट सौंपेगी। अपर कलेक्टर मुकेश कुमार शर्मा को समिति का अध्यक्ष बनाया गया है। उनके नेतृत्व वाली समिति में गुना एसडीएम दिनेश सावले, ग्वालियर से संभागीय उप परिवहन आयुक्त अरुण कुमार सिंह और गुना के विद्युत सुरक्षा सहायक यंत्री प्राणसिंह राय भी इसमें शामिल हैं। यह समिति सारे पहलुओं की जांच करेगी। जिनमें दुर्घटना के कारण, दुर्घटनाग्रस्त बस और डंपर को मिली अनुमतियां, बस में आग लगने के कारण, जिम्मेदार विभागों की भूमिका की जांच शामिल है। मुख्यमंत्री की इस सख्ती को इस तरह भी समझा जाना चाहिए कि वे किसी के आभामंडल की गिरफ्त में नहीं है।
    ट्रांसपोर्ट डिपार्टमेंट को भी दोषियों पर कठोर कार्रवाई करने को कहा गया। राज्य के सभी कलेक्टर्स और पुलिस अधीक्षकों को बिना परमिट और फिटनेस के चल रहे वाहनों पर कार्यवाही के निर्देश दिए गए। यह भी कहा कि आटीओ के सभी बड़े अफसरों की भी जिम्मेदारी तय कर सख्त कार्यवाही की जाए। ऐसी घटनाओं की पुनरावृति न हो, इस बात का ध्यान रखा जाए। यह बेहद संवेदनशील मामला है। सभी जिम्मेदार लोगों के विरुद्ध राज्य सरकार सख्त कार्रवाई करेगी। दरअसल, ये पूरा घटनाक्रम ब्यूरोक्रेसी को मुख्यमंत्री के तेवर दिखाने के साथ अगले पांच साल के लिए भी एक संकेत है कि पहले वाली सरकार में जो हुआ वो गुजर गया। अब वो सब नहीं चलेगा जो अभी तक होता आया है।
ट्रांसपोर्ट एक्सपर्ट का नजरिया 
    प्रदेश के पूर्व ट्रांसपोर्ट आयुक्त एनके त्रिपाठी ने इस घटना पर अपनी टिप्पणी में बताया कि गुना बस हादसे में मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव ने तत्काल परिवहन आयुक्त और प्रमुख सचिव को हटाकर अपने तेवर स्पष्ट कर दिए। उन्होंने यह संदेश दिया कि वरिष्ठतम अधिकारियों को अपने दायित्वों को गंभीरता से लेना होगा। गुना के एसपी और कलेक्टर को हटाया जाना तथा आरटीओ तथा सीएमओ को निलंबित करना इसी श्रृंखला में है। मध्य प्रदेश सहित भारत वर्ष में सड़क दुर्घटनाओं का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है। जबकि, पूरे विश्व में सड़क दुर्घटनाएं घट रही है।
    अधिकारियों के विरुद्ध की गई इस कार्रवाई से सड़क दुर्घटनाओं पर कोई प्रभाव पड़ेगा, इस पर मुझे बहुत संदेह है। सड़क दुर्घटनाओं को कम करने के लिए बहुत श्रम साध्य, तकनीक से पूर्ण तथा संसाधन की आवश्यकता है। राज्य सरकार को राजमार्गों और शहरों के अंदर होने वाली सड़क दुर्घटनाओं को ज़्यादा गंभीरता से लेते हुए इन्हें कम करने के लिए लिए ठोस योजना और क़दम उठाने होंगे।
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Monday, December 25, 2023

नायक के हाथों अपमानित होती नायिका

- हेमंत पाल 

     फ़िल्मी कथानकों में महिलाओं की स्थिति को लेकर अकसर बहस चलती रही है। उंगलियों पर गिनी जाने वाली चंद फिल्मों को छोड़ दिया जाए, तो ज्यादातर फिल्मों में नायिका का किरदार नायक से अलग अपनी पहचान नहीं बना पाता। ऐसी फ़िल्में भी बहुत कम है, जो महिला प्रधान होते हुए हिट हुई। इन दिनों रणबीर कपूर की फिल्म 'एनिमल' की चर्चा है। इसलिए नहीं कि फिल्म को बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त सफलता मिली। इसके अलावा चर्चा का कारण फिल्म में नायिका का अपमानजनक चित्रण है, जो विवाद बन गया। सड़क से संसद तक में फिल्म के उन दृश्यों पर आवाज उठी, जिनमें नायक को नायिका पर हाथ उठाते दर्शाया गया। यह पहली बार नहीं है कि 'एनिमल' जैसी फिल्म को लेकर उंगली उठाई गई हो। इससे पहले शाहिद कपूर की फिल्म 'कबीर सिंह' को लेकर भी सवाल खड़े किए गए थे। संयोग माना जाना चाहिए कि 'एनिमल' और 'कबीर सिंह' दोनों फिल्मों के डायरेक्टर संदीप रेड्डी वांगा ही हैं। जब 'कबीर सिंह' आई तब इस डायरेक्टर ने कहा था कि मैं जानबूझकर एक असामान्य लव स्टोरी बनाना चाहता था। ये प्यार के कारण एक व्यक्ति की जिंदगी बदलने की कहानी है। मैंने किरदार को ज्यादा वास्तविक और सरल रखने की कोशिश की। लेकिन, 'एनिमल' में तो ऐसे दृश्य जरुरी नहीं थे! 
     संसद में फिल्म को लेकर आवाज अच्छे संदर्भ में नहीं उठी, बल्कि फिल्म में महिलाओं को जिस तरह दोयम दर्जे का समझा गया। उस पर राज्यसभा सदस्य रंजीत रंजन ने टिप्पणी की। उनका कहना था कि 'एनिमल' जैसी फिल्में समाज में हिंसा और स्त्री द्वेष को बढ़ावा देती हैं। उनका कहना था कि आजकल कुछ इसी तरह की फिल्में आ रही हैं। अगर आप कबीर, पुष्पा से शुरू करें तो अभी एक और ऐसी फिल्म (एनिमल) चल रही है। मैं आपको कह नहीं पाऊंगी कि मेरी बेटी के साथ बहुत सारी बच्चियां थीं। वे कॉलेज में पढ़ती हैं। वे आधी फिल्म देखने के बाद उठकर और रोकर चली गई। हिंसा और महिलाओं के प्रति इतने असम्मान को फिल्म के जरिए जस्टिफाई किया गया। उनका कहना है कि कबीर फिल्म में शाहिद कपूर को और 'एनिमल' में रणबीर कपूर को जो करते दिखाया गया उसे समाज सही नहीं मान रहा। यह चिंतनीय विषय है। इसके अलावा भी बहुत सारे ऐसे उदाहरण हैं। इस हिंसा और नेगेटिव रोल को नायक की तरह पेश किया जा रहा है। हमारे आज के बच्चे इन्हें रोल मॉडल मानने लगे। सांसद ने फिल्म की रिलीज को मंजूरी देने के लिए केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) और ऐसी फिल्मों को हरी झंडी देने के लिए बोर्ड द्वारा इस्तेमाल किए गए मानदंडों पर भी सवाल उठाया। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी फिल्में समाज के लिए एक ‘बीमारी’ है।
     जो सवाल उठाए, वो गलत नहीं है। पितृसत्ता समाज की जड़ें बेहद गहरी है, इसे समझना है, तो इसका खुलासा 'एनिमल' में होता है। फिल्म में सिर्फ पिता है। फिल्म के कथानक में यह पिता ही हर जगह मौजूद है। बेटे का पिता के लिए लगाव दिखाई भी देता है। मगर यह लगाव सामान्य प्रेम नहीं, बल्कि उसे पिता जैसा बनना है। मां उसके जीवन में कहीं नहीं है। फिल्म के कथानक के मुताबिक, नायक पिता के लिए किसी हद तक जाने को तैयार रहता है। यहां तक कि पिता के जन्मदिन पर वह अपने लम्बे बाल कटवाकर उन्हें एक सरप्राइस गिफ्ट देता है। ऐसा भी वक़्त आता है, जब वो बग़ावत करके घर से निकल जाता है। लेकिन, जब पिता पर हमला होता है, तो उसका बदला लेने के लिए विदेश से लौट आता है। फिल्म में चारों तरफ आदमियों की दुनिया है। उसमें औरतें हैं, पर किसी खास भूमिका में नहीं। 
     इस फिल्म में नायिका की भूमिका को दोयम दर्जे से भी नीचे जगह दी गई। कई दृश्यों में बहस करने पर उसे थप्पड़ भी पड़ते हैं। इसी से समझा जा सकता है कि फिल्म में पुरुष और महिला के बीच किस हद तक असमानता है। इस सबके बाद भी जब नायिका काबू में नहीं आती तो एक दृश्य में हीरो कहता है 'शादी में डर होना चाहिए।' पूरी फिल्म में नायिका को धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करने वाली संस्कारी बताया गया। असल में इस फिल्म पर चर्चा इसलिए जरूरी हो जाती है, कि ऐसी फ़िल्में ही बहस छेड़ती हैं। यह बहस इस बात की, कि औरतों को कितनी आजादी चाहिए। ऐसी फिल्में अलग तरह के समाज की कल्पना करती हैं, जिसमें औरतों के साथ गुलाम की तरह व्यवहार किया जाता है। पुरुष ये क्यों तय करें कि मां, बहनें या फिर पत्नी क्या पहनेंगी, क्या पियेंगी! उनकी हिफाजत की ज़िम्मेदारी सदियों पहले भी मर्दों के हाथ में थी और आज भी है। 
       'एनिमल' से पहले 'कबीर सिंह' के कुछ दृश्यों पर आपत्ति उठाई गई थी। शाहिद का किरदार नशा करते हुए, गालियां देते हुए, लोगों को पीटते दिखाया गया था। चाकू की नोक पर एक लड़की को कपड़े उतारने को कहता है। हीरोइन को मारता है, लड़की की बिना इच्छा कॉलेज में घोषणा करता है कि यह उसकी ‘बंदी’ है, कोई उसकी तरफ देखेगा भी नहीं। वह हीरोइन पर शादी के लिए दबाव बनाता है। ऐसी हरकतों के बावजूद कबीर को बेचारा बताने की कोशिश की गई। वहीं कबीर की प्रेमिका नायक के ख़राब बर्ताव, गुस्से और दबाव के बावजूद उसके सामने झुकी रहती है। इस तरह के दृश्यों को मर्दानगी का विकृत स्वरूप और महिलाओं को कमजोर दिखाने की कोशिश है। 
   मसला सिर्फ इन दो फिल्मों तक सीमित नहीं है। शाहरुख खान की 1993 में आई फिल्म 'डर' में भी नायक का हद से ज्यादा प्यार का पागलपन था। लेकिन, उस किरदार को विलेन की तरह दिखाया गया। 1990 की फिल्म 'राजा' में नायक आमिर खान अपने अपमान का बदला लेने के लिए नायिका माधुरी दीक्षित से जबरदस्ती शादी करता है। फिर भी वो उससे प्यार करने लगती है। सलमान खान की फिल्म 'तेरे नाम' (2003) में नायिका हमेशा नायक के खौफ में जीती है, फिर भी उसे प्यार करती है। सैकड़ों ऐसी फिल्मों के उदाहरण मिल जाएंगे, जिनमें हीरो की जबरदस्ती और हिंसा के बावजूद नायिका को खूंखार नायक ही पसंद आता है। 
    फिल्मों में महिलाओं की भूमिकाएं सिर्फ नायक को रिझाने और एक विपरीत किरदार होने के अलावा दूसरे मामलों में भी कमतर ही रही। आईबीएम रिसर्च और ट्रिपल आईटी दिल्ली ने 5 साल पहले बीते 50 साल में आईं करीब 4 हजार हिंदी फिल्मों की इसी विषय पर रिसर्च की। इसमें देखा गया था कि फिल्म की कहानियों के ऑनलाइन सिनॉप्सिस में महिलाओं और पुरुषों का कैसे जिक्र होता है। उनके लिए कैसे शब्दों, विशेषणों और क्रियाओं का इस्तेमाल किया जाता है। 
      स्टडी में सामने आया कि जहां कहानी में पुरुषों का जिक्र औसतन 30 बार आया, वहीं महिलाओं का जिक्र 15 बार आया। शोधकर्ताओं के मुताबिक यह दर्शाता है कि महिला किरदारों को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता। हीरो के लिए ज्यादातर मजबूत, सफल, ईमानदार जैसे विशेषण और मार दिया, गोली मार दी, बचा लिया, धमकाया जैसी क्रियाओं का इस्तेमाल किया गया। वहीं हीरोइन के लिए खूबसूरत, प्यारी, विधवा, आकर्षक, सेक्सी जैसे विशेषण और शादी की, स्वीकार किया, शोषण हुआ, मान गई जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया। करीब 60% महिला किरदारों को टीचर बताया गया, वहीं पुरुष किरदारों के पेशों में ज्यादा विविधता देखी गई। नायिकाओं के अपमान का ये मुद्दा यहीं ख़त्म नहीं होता। जब तक फिल्मकार ऐसे कथानकों पर फ़िल्में बनाते रहेंगे, ये बहस जारी रहेगी। क्योंकि, महिलाओं को पुरुष की बराबरी का दर्जा सिर्फ कहने से नहीं मिलेगा, उसके लिए सोच बदलना पड़ेगी। इसके लिए सिनेमा को भी बदलना पड़ेगा।    
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Tuesday, December 19, 2023

लम्बी फिल्मों का इतिहास भी बहुत लंबा!

 
- हेमंत पाल 

    देश में सैकड़ों फिल्में हर साल बनती है। हर फिल्म की कोई न कोई ऐसी खासियत होती है, जिस वजह से वे दर्शकों को आकर्षित करती है। कुछ चुनिंदा फिल्मों की खासियत उनकी लंबाई होती है। कुछ बहुत छोटी तो कुछ की लंबाई का रिकॉर्ड तोड़ होती है। कोई फिल्म इतनी छोटी बनी कि उन्हें इंटरवल की जरुरत नहीं पड़ी, तो कुछ फिल्मों में दो-दो इंटरवल करना पड़े। ऐसी फ़िल्में भी बनी जिनकी लंबाई की वजह से सिनेमाघरों ने उन्हें रिलीज करने से ही इंकार कर दिया। आखिर 5 घंटे से ज्यादा लंबी फिल्म को कोई सिनेमाघर कैसे दिखाएं और दर्शक क्यों देखें। आश्चर्य की बात रही कि फिल्म इतिहास में अपनी लंबाई को लेकर खास रही फिल्में दर्शकों का मनोरंजन करने में सफल भी रहीं। ये लंबी जरूर थी, पर इनमें से ज्यादा ने दर्शकों को उबाया नहीं। आज भी दर्शक इन फिल्मों को इनके दिलचस्प कथानक की वजह से याद करते हैं। रणबीर कपूर की नई फिल्म 'एनिमल' को उसकी लम्बाई के कारण याद किया जाता है। क्योंकि, लंबे समय से दर्शकों की छोटी फिल्म देखने की आदत है, ऐसे में 'एनिमल' की सफलता के बाद ऐसी फिल्मों का चलन शुरू होगा, ये नहीं कहा जा सकता। फिल्मकार ये हिम्मत तभी कर सकते हैं, जब कहानी में उसे इतना खींचने की गुंजाइश हो।
     यदि किसी भी फिल्म की लंबाई दो-ढाई घंटे से ज्यादा हो, तो उसकी कहानी में इतना दम होना चाहिए कि वो दर्शकों को बांध सके। क्योंकि, दर्शकों को इतनी देर तक रोककर रखना आसान नहीं होता। लेकिन, ये तभी संभव हो सकता है जब उसका कथानक और निर्देशन जबरदस्त हो। अगर जरा भी कथानक ढीला पड़ा, तो दर्शक बीच फिल्म में कुर्सी छोड़ने में देर नहीं करेगा। लंबी फिल्म उसे कहा जाता है, जो दो-ढाई घंटे की फिल्म के मुकाबले साढ़े तीन या चार घंटे से ज्यादा लंबी होती है। खास बात यह कही जाएगी कि अधिकांश लंबी फिल्में सफल रही हैं।
      हिंदी सिनेमा का इतिहास देखा जाए, तो लंबी फ़िल्में बनाने की शुरुआत 1964 में राज कपूर ने की थी। उनकी फिल्म 'संगम' लंबी होने की वजह से उसमें दो इंटरवल थे। 'संगम' में राज कपूर, राजेंद्र कुमार और वैजयंती माला जैसे कलाकार थे। यह फिल्म एक प्रेम त्रिकोण पर आधारित कथानक था, जो 3 घंटे 58 मिनट लम्बी थी। हिंदी फिल्म इतिहास की ये पहली इतनी लंबी फिल्म थी। ये उस समय की सुपरहिट फिल्मों में थी। दो इंटरवल होने से सिनेमाघरों में इसके दो शो ही चलते थे। 'संगम' की सफलता कुछ ऐसी रही कि ये फिल्म 60 के दशक में ‘मुगल-ए-आज़म’ के बाद सबसे ज्यादा कमाई वाली फिल्मों में गिनी गई। रिचर्ड एटनबरो की महात्मा गांधी के जीवन पर बनी फिल्म 'गांधी' भी 3 घंटे 11 मिनट लंबी फिल्म थी।  
    हर लंबी फिल्म सफल हो, ये जरूरी नहीं। राज कपूर की ही 1970 में आई 'मेरा नाम जोकर' ने उन्हें कर्ज में डुबो दिया था। जबकि, फिल्म की स्टार कास्ट 'संगम' वाले कलाकार भी थे। यह फिल्म राज कपूर का ड्रीम प्रोजेक्ट था, लेकिन उनके सारे सपनों को ध्वस्त कर दिया। 'संगम' से थोड़ी ही ज्यादा लंबी इस 4 घंटे की फिल्म को देश की सबसे लंबी फिल्मों में शामिल किया जाता है। इसमें भी दो इंटरवल होते थे। यह फिल्म एक सर्कस के जोकर 'राजू' की कहानी थी, जिसका दर्द कोई नहीं समझ पाता। इसे राज कपूर की बेहतरीन फिल्मों में गिना जाता है। इस फिल्म के घाटे से उबरने के लिए राज कपूर ने बेटे ऋषि कपूर को लेकर ही 'बॉबी' बनाई थी। 
     1975 में रमेश सिप्पी ने 'शोले' बनाई, इसे भी लंबी फिल्मों गिना जाता है। 3 घंटे 20 मिनट की इस फिल्म का शुरूआती कारोबार बेहद ठंडा था। लेकिन, धीरे-धीरे दर्शक जुटने लगे और फिल्म ने 35 करोड़ की कमाई का रिकॉर्ड बनाया। दो दशक तक 'शोले' की इस कमाई का कोई फिल्म रिकॉर्ड नहीं तोड़ पाई थी। 'शोले' से 6 मिनिट लम्बी बनी राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म 'हम आपके हैं कौन' ने 135 करोड़ रुपए की कमाई की। सलमान खान, माधुरी दीक्षित और मोहनीश बहल इस फिल्म के कलाकार थे। 
    लंबी फिल्मों का दौर यहीं ख़त्म नहीं हुआ। 2001 में आई आशुतोष गोवारिकर निर्देशित आमिर खान की फिल्म 'लगान' भी 3 घंटे 44 मिनट लंबी थी, जो सुपर हिट साबित हुई। इसके अनोखे पात्रों को आज भी दर्शक याद करते हैं। अपनी अलग सी कहानी के कारण इसे ऑस्कर में भी एंट्री मिली। यह फिल्म ब्रिटिश राज के दौरान एक गांव की कहानी बताती है, जो अंग्रेजों के साथ क्रिकेट का खेल खेलते हैं, ताकि वे करों का भुगतान न कर सकें। युद्ध के कथानक पर जेपी दत्ता के निर्देशन में बनी 'एलओसी कारगिल' 2003 में रिलीज हुई। यह फिल्म हिंदी फिल्म इतिहास की तीसरी सबसे लंबी फिल्मों में एक थी। इसकी लंबाई 4 घंटे 10 मिनट थी। इसका कथानक 1999 के भारत-पाकिस्तान युद्ध पर केंद्रित था, जो कारगिल में लड़ी गई थी। आदित्य चोपड़ा के निर्देशन में आई 'मोहब्बतें' भी 3 घंटे 36 लंबी थी। शाहरुख खान, अमिताभ बच्चन, ऐश्वर्या राय और जुगल हंसराज की यह फिल्म अपने समय में सुपर हिट हुई थी। इस फिल्म को इसलिए भी याद किया जाता है कि इसने अमिताभ बच्चन को बतौर अभिनेता दूसरा जन्म दिया। 
    आशुतोष गोवारिकर की 2008 में आयी फिल्म 'जोधा अकबर' भी लंबी फिल्मों की फेहरिस्त में शामिल है। ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय की यह फिल्म 3 घंटे 33 मिनट लंबी थी। लेकिन, अभी तक की सबसे लंबी फिल्मों में अनुराग कश्यप की 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' को गिना जाता है। 5 घंटे 21 मिनट लंबी इस फिल्म को बना तो लिया गया, पर इसकी लंबाई के कारण कोई सिनेमाघर इसे रिलीज करने को राजी नहीं हुआ। इसके बाद फिल्म को दो हिस्सों में बांटकर रिलीज किया गया। फिल्म का पहला हिस्सा जून 2012 और दूसरा पार्ट अगस्त 2012 में रिलीज किया। तीन पीढ़ियों की कहानी बताती इस फिल्म के दोनों हिस्सों ने बॉक्स ऑफिस पर जमकर धमाल मचाया था। अनिल कपूर, सलमान खान, गोविंदा और प्रियंका चोपड़ा की फिल्म 'सलाम-ए-इश्क' (2007) भी 3 घंटे 36 मिनट लम्बी थी। बड़े सितारों के बावजूद ये फिल्म पसंद चली नहीं। इनके अलावा, तमस, हम साथ-साथ हैं और 'कभी अलविदा न कहना’ भी लंबी फिल्मों में शामिल हैं। 
      बरसों बाद 2016 में आई सुशांत सिंह राजपूत की फिल्म 'एम एस धोनी' भी 3 घंटे 5 मिनट लंबी थी। इससे पहले 2008 में 'गजनी' ने 3 घंटे का दायरा तोड़ा। 2000 से अभी तक 23 साल में 20 फिल्में भी ऐसी नहीं हैं, जिनकी लंबाई 3 घंटे से ज्यादा हो। क्योंकि, दर्शकों को तीन घंटे तक बांधकर रखना आसान नहीं होता। जब किसी फिल्म की ज्यादा लंबाई का जिक्र होता है, तो स्वाभाविक रूप से जिज्ञासा होती है कि फिल्म में ऐसा क्या खास है, जो इसकी कहानी कहने में इतना वक़्त लिया गया।
    ऐसी कई फ़िल्में पौराणिक कहानियों पर भी बनी। जोधा अकबर, लगान, स्वदेस और नायक या ऐसी लंबी फिल्मों को इसी दर्जे में रखा जा सकता है। लंबी फिल्मों का दौर अभी ख़त्म नहीं हुआ। रणबीर कपूर की 'एनिमल' के बाद शाहरुख खान की आने वाली फिल्म 'डंकी' भी लंबी फिल्मों में गिनी जाने वाली फिल्म होगी। 'एनिमल' 3 घंटे 21 मिनट लंबी फिल्म है। जबकि, राजकुमार हिरानी निर्देशित शाहरुख खान 'डंकी' 2 घंटे 40 मिनट की फिल्म बताया गया है। आज दो-सवा दो घंटे से ज्यादा लंबी फिल्म बनने वाली फिल्म को लंबा ही माना जाएगा। 
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