Friday, July 12, 2024

दर्शकों को बांधता है चौंकाने वाला सस्पेंस

     फिल्मों के विषयों की लिस्ट बहुत लंबी होती है। लेकिन, हर विषय का एक समय होता है। कभी लव स्टोरी, कभी पारिवारिक कहानी, कभी एक्शन तो कभी हल्की-फुल्की कॉमेडी दर्शकों को प्रभावित करती है। लेकिन, सस्पेंस ऐसा विषय है, जो हमेशा ही दर्शकों को पसंद आया। ये फ़िल्में दर्शकों को शुरू से अंत तक बांधकर रखती हैं। कई ऐसी सस्पेंस थ्रिलर फ़िल्में बनी जिन्होंने दर्शकों का दिमाग बुरी तरह चकरा दिया। 'दृश्यम' और अंधाधुन' को ऐसी  फिल्मों में गिना सकता है जिनका अंत चौकाने वाला है।   


- हेमंत पाल

      यदि फिल्म के शौकीन कुछ दर्शकों से सवाल किया जाए कि उन्हें कैसी फ़िल्में पसंद हैं, तो निश्चित रूप से ज्यादातर का जवाब होगा सस्पेंस वाली फ़िल्में। ऐसी फ़िल्में जिनका अंत चौंकाने वाला हो। इसका कारण है, कि इस तरह के कथानक पर बनी फ़िल्में दर्शकों को भी अपने साथ जोड़ लेती है। फिल्म के दृश्यों को देखने वाला सोचता रहता है कि अब क्या होगा! यही वजह है कि इन फिल्मों सफलता ज्यादा होती है। क्योंकि, इनके क्लाइमेक्स दर्शकों को हतप्रभ कर देते हैं! ऐसी फ़िल्में सिर्फ हिंदी में ही सफल नहीं रही, बल्कि हॉलीवुड में भी सस्पेंस, थ्रिलर वाली फिल्‍मों को ही ज्यादा पसंद किया जाता रहा। डायरेक्टर, प्रोड्यूसर और स्क्रिप्ट राइटर अल्फ्रेड हिचकॉक को तो 'मास्‍टर ऑफ सस्पेंस' ही कहा जाता रहा। सस्‍पेंस और थ्रिलर वाले कथानक शुरू से दर्शकों के प्रिय विषय रहे हैं। जिस फिल्म के अंत के बारे में उनका खुद का अनुमान गलत निकले, वो उन्हें ज्यादा पसंद! क्‍लाइमेक्‍स में ऐसा शख्स सामने आए, जिसका दर्शकों ने अनुमान नहीं लगाया हो! ऐसी फिल्में ही दर्शकों को बांधने वाली होती है। सस्पेंस थ्रिलर वाले कथानक की फिल्मों में दर्शकों को शुरू लगता है कि उसे पता था कि आगे यही होने वाला है। इन फिल्मों में ऐसा अजूबा ही होता है। जो सबसे ज्यादा शरीफ दिखता है, शातिर निकलता है। लेकिन यह अनुमान कई बार गलत भी हो जाता है और एक अलग ही थ्रिलर फिल्म का अंत दर्शक के सामने आता है। सस्पेंस का आशय डरावनी फिल्मों से नहीं है। बल्कि, इस तरह की फ़िल्में अपने कसे हुए कथानक से दर्शक को बांधती है। देखने वाला हमेशा इसी उधेड़बुन में लगा रहता है कि अब क्या होगा? 
     परदे पर अभी तक ऐसी फ़िल्में सीमित थीं। पर ओटीटी प्लेटफॉर्म आने के बाद लगने लगा कि दर्शक सस्पेंस, थ्रिलर और मर्डर मिस्‍ट्री ही देखना चाहता है। जबकि, ये तीनों ही अलग-अलग शैलियां हैं। थ्रिलर फिल्मों में एक्शन होता है, लेकिन सस्‍पेंस नहीं! उनमें जो सस्‍पेंस होता है, उसका राज धीरे-धीरे खुलता रहता है। लेकिन, सस्पेंस फिल्म में न तो रहस्‍य जरूरी है और न एक्शन! इनमे चौंकाने वाले सीन ज्यादा होते हैं, जो दर्शक को सोचने का मौका भी नहीं देते। मिस्‍ट्री और सस्‍पेंस थ्रिलर फ़िल्में एक जैसी नहीं होती। दोनों का ट्रीटमेंट अला-अलग होता है। पर, मिस्‍ट्री फिल्मों में सिर्फ एक राज होता है, जिस पर से फिल्म के अंत में परदा उठता है। इस तरह की फिल्मों की पटकथा का ताना-बाना किसी हत्या के इर्द-गिर्द बुना जाता है। पूरी कहानी अनजान हत्यारे की खोज पर आधारित होती है। संदेह के लिए कई पात्रों को निशाने पर रखा जाता है। हत्यारे को पकड़ने के लिए पुलिस जो भी चाल चलती है, वही फिल्म का आकर्षण होता है। कभी फिल्म के नायक, नायिका या सबसे शरीफ पात्र के भी कातिल होने की स्थितियां निर्मित की जाती है। यानी दर्शकों को बांधने और उनका ध्यान बांटने के लिए कई हथकंडे रचे जाते हैं। देखा जाए तो दर्शकों को वही सस्पेंस फ़िल्में ज्यादा पसंद आती है, जो उन्हें हर सीन में चौंका दें। तीसरी मंजिल, ज्वेल थीफ, क़त्ल और 'गुप्त' के बाद 'दृश्यम' सीरीज की दोनों फिल्मों ने दर्शकों को जिस तरह बांधकर रखा वही इन फिल्मों का सफलता रही।     
       इस तरह कथानक पर बनने वाली फिल्मों के पन्ने पलटे जाएं, तो हिंदी में मर्डर मिस्ट्री और सस्पेंस फिल्मों की शुरुआत का श्रेय विजय आनंद को जाता है। उन्होंने 'तीसरी मंजिल' और 'ज्वेल थीफ' उस दौर में बनाने की हिम्मत की, जब दर्शकों को ऐसी कहानियों का अंदाजा भी नहीं था। इन फिल्मों में पैसा लगाना भी एक तरह ही जुआं ही था। पर, विजय आनंद ने दर्शकों पर अपना जादू चलाया और उनकी कई फ़िल्में पसंद की गईं। उन्होंने ऐसे कई प्रयोग किए, जो सस्पेंस से लबरेज थे। इसी तरह रामगोपाल वर्मा की 'कौन' को हिंदी की बेस्ट साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म कहा जा सकता हैं। यह पूरी फिल्म घर में बंद एक लड़की (उर्मिला मातोंडकर) की कहानी है, जो अजनबी (मनोज बाजपेयी) से बचने की कोशिश में रहती है। लेकिन, फिल्म का क्लाईमैक्स दर्शकों के होश उड़ा देता है। इसी तरह की फिल्म 'फोबिया' भी थी, जिसमें राधिका आप्टे ने काम किया। यह फिल्म ऐसी लड़की की कहानी है, जो बाहर निकलने से डरती है और खुद को घर में बंद कर लेती है। उसका डर ही फिल्म का क्लाइमैक्स है।
     बॉबी देओल, काजोल और मनीषा कोइराला की 'गुप्त' बेहतरीन सस्पेंस थ्रिलर फिल्म थी। इसमें अंत तक किसी का ध्यान नहीं जाता और खलनायिका काजोल निकलती है। विद्या बालन की 'कहानी' और 'कहानी-2' दोनों ही फ़िल्में दर्शकों को अंत तक कुर्सी से बांधकर रखती है। किसी दर्शक को अंदाजा नहीं होता कि आखिरी में क्या होगा! फिल्म 'नैना' एक अंधी लड़की की कहानी थी, जिसकी आंखें ट्रांसप्लांट की जाती है। लेकिन, इसके बाद उसे अजीब सी चीजें दिखाई देने लगती है। 'बदला' को हाल के दौर की बड़ी मर्डर मिस्ट्री फिल्म माना जाता है! इसे अंत तक देखने के बाद ही समझ आता है कि आखिर फिल्म क्या चाहती है! ये पूरी फिल्म सस्पेंस से भरी है! कलाकारों का अभिनय भी हैरान करता है! 
      जबकि, आज के दौर की सस्पेंस फिल्मों में ‘दृश्‍यम’ और इसका सीक्वल सबसे अच्छा उदाहरण है। इसमें अपराधी सामने होता है, लेकिन न तो पुलिस उसे पकड़ पाती है और न दर्शकों को समझ आता है कि उसने ये सब किया कैसे होगा! इस फिल्‍म में कोई मारधाड़ नहीं थी और न रहस्‍य! हत्यारा सबके सामने होते हुए अपनी चतुराई से बचता रहता है। कोई ठोस सबूत न होने से पुलिस भी अंत तक उस पर हाथ नहीं डाल पाती! इसमें सस्पेंस और इमोशन का ऐसा घालमेल किया जाता है, कि फिल्म देखने वाले भी हत्यारे के पक्ष में नजर आ जाते हैं। वे भी नहीं चाहते कि अपराधी पकड़ा जाए! कानून, गुमनाम, मेरा साया, इत्तेफाक, धुंध, अपराधी कौन, कब क्‍यों और कहां, खिलाड़ी, गुप्‍त, वह कौन थी, डिटेक्टर व्‍योमकेश बक्‍शी, मनोरमा सिक्‍स फीट अंडर, भूल भुलैया, एक चालीस की लास्‍ट लोकल, बदला, जानी गद्दार, अगली, तलवार, अंधाधुन, क़त्ल, दृश्‍यम और 'कहानी' ऐसी ही फ़िल्में हैं, जिनका जादू दर्शकों पर जमकर चला।  
     कुछ साल पहले तक फिल्म के अंत को गोपनीय बनाए रखने हिदायत भी इसी लिए जाती थी कि फिल्म देखने आने वाले दर्शकों में सस्पेंस बना रहे। इसलिए कि ऐसी फिल्मों के अंत में कुछ ऐसा होता था, जो देखने वालों को चौंका देता था। फिल्म का कथानक कुछ इस तरह गढ़ा जाता था, कि दर्शक उसके आकर्षण में फंस जाते। वे कहानी के ट्विस्ट की असलियत देख नहीं पाते थे और जब राज खुलता तो ऐसा पात्र संदेहों से घिरा मिलता, जिस पर किसी की नजर नहीं जाती! सस्पेंस फिल्मों में चौंकाने वाले अंत का दौर अभी ख़त्म नहीं हुआ! बस, दर्शकों को ये हिदायत देना बंद कर दिया गया कि फिल्म का अंत किसी को न बताएं! ऐसी फ़िल्में सिर्फ कलाकारों के अभिनय से ही दर्शकों को नहीं बांधती, इनकी पटकथा लेखन और डायरेक्शन भी कुछ नयापन होता है। 
    अब तक कई थ्रिलर फिल्में आई, लेकिन सभी दर्शकों को बांध नहीं पाई। याद वहीं रहती, जिन्होंने अपनी पटकथा और डायरेक्शन का जादू दिखाया। पुरानी फिल्मों में तीसरी मंजिल, ज्वेल थीफ, इत्तेफ़ाक़, गुमनाम और आज के दौर की ए वेडनस डे, बदला, हमराज़, 100 डेज के बाद आयुष्मान खुराना की फिल्म 'अंधाधुंन' और अजय देवगन की 'दृश्यम' ऐसी ही ऐसी फ़िल्में हैं, जिनके क्लाइमैक्स ने दर्शकों को कुर्सी पर ठीक से बैठने नहीं दिया। 'अंधाधुन' ने तो एक नया ट्रेंड बना दिया। इसमें एक अंधे आदमी का किरदार काफी रहस्यमय था। फिल्म की कहानी इसी के आस-पास घूमती है। इस पूरी फिल्म में अच्छा-खासा सस्पेंस बनाकर रखा गया। ओटीटी के आने के बाद से सस्पेंस और थ्रिलर फिल्मों का क्रेज कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। 
------------------------------------------------------------------------------------------------

हिंदुस्तानी-2 : भ्रष्टाचार से मुकाबले के लिए कमल हासन की नई जंग

- हेमंत पाल

० डायलॉग-1 : 'ये स्वतंत्रता का नया जन्म है। यहां गांधी के रास्ते पर तुम हो, नेता जी के रास्ते पर मैं हूं। टॉम एंड जेरी का खेल अब शुरू हो चुका है।'
० डायलॉग-2 : ‘कैसा देश है ये, पढ़े-लिखों के पास काम नहीं, काम है तो उस लायक पगार नहीं, टैक्स भरो लेकिन कोई फैसिलिटी नहीं। चोर चोरी करता है करेगा, अपराधी अपराध ही करेगा। 
० डायलॉग-3 : हम जब देखो दुनिया को दोष देते रहते हैं, सिस्टम ठीक नहीं है, इसे ठीक करना होगा, मुंह फाड़कर चिल्लाते हैं। लेकिन, इसे ठीक करने के लिए हम एक तिनका भी नहीं हिलाते।
       ये कलम हासन की नई फिल्म ;हिंदुस्तानी-2' के डायलॉग है, जो इशारा करते हैं कि 28 साल बाद आई इस सीक्वल फिल्म की थीम क्या है। यह फिल्म 'इंडियन' का सीक्वल है। कमल हासन ने 'इंडियन' में सेनापति का किरदार निभाया था। फिल्म में वे देश में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़े थे। अब 'हिंदुस्तानी-2' उसी कहानी का अगला हिस्सा है। फर्क इतना कि उस फिल्म का शीर्षक हिंदी में 'इंडियन' था, इसका अंग्रेजी में 'हिंदुस्तानी 2' है। ट्रेलर से फिल्म में कमल हासन के वही तेवर दिखाई दिखाई दे रहे हैं। इस फिल्म  को लेकर कमल हासन का कहना है 'क्या मैं नफरत करूं या शुक्रिया अदा करूं? आखिर हमने क्या किया है? यह हम ही हैं, राजनेता कोई और नहीं, बल्कि हम में से ही एक है। हम सभी भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार हैं। हम सभी को अपने विचार बदलना चाहिए और अपना विचार बदलने का सबसे अच्छा समय चुनाव के दौरान है। ये सिर्फ याद दिलाते हैं कि हम कितने भ्रष्ट हो गए हैं। भ्रष्टाचार की वजह से कुछ नहीं बदला, हम सब एक साथ आएंगे और अपना विवेक लगाएंगे तो उसकी बदौलत सब कुछ बदल जाएगा।' फिल्म के पहले भाग यानी 'इंडियन' की कहानी में का कथानक था कि एक आदमी ब्रिटिश शासन के खिलाफ लड़ता है। उसे गिरफ्तार करके प्रताड़ित किया जाता है। देश की आजादी के बाद वह भ्रष्टाचार से लड़ने का प्रयास करता है, पर वह इस बात से अनजान रहता है, कि उसका ही बेटा भ्रष्ट है।
     फिल्म के 2 मिनट 37 सेकंड के ट्रेलर में एक्शन और देशभक्ति की भरमार है। इसमें सिद्धार्थ और रकुल प्रीत सिंह भी नजर आएंगे। ट्रेलर देखकर मालूम होता है कि सिद्धार्थ और रकुल उन लोगों से परेशान हैं, जो सिस्टम को गंदा कर रहे हैं। दोनों उनसे लड़ लड़कर थक गए। लेकिन, सिद्धार्थ समझ जाते हैं, कि उनके अकेले से यह ठीक नहीं होगा। इसके खात्मे के लिए हंटिंग डॉग को आना चाहिए। इसके बाद ही ट्रेलर में सेनापति (कमल हासन) की धमाकेदार इंट्री होती है। जो स्वतंत्रता सेनानी वीर सेकरन सेनापति की भूमिका में हैं। जिसकी इंट्री जबरदस्त एक्शन के साथ होती है। इसमें कमल हासन सिस्टम की गंदगी को साफ करने के लिए कई अलग-अलग अवतार में दिखाई देंगे। वे कहते हैं 'ये स्वतंत्रता का नया जन्म है। यहां गांधी के रास्ते पर तुम हो, नेता जी के रास्ते पर मैं हूं। आगे कहते हैं 'टॉम एंड जेरी का खेल अब शुरू हो चुका है।' इस फिल्म की सबसे बड़ी खासियत है 69 साल की उम्र के कमल हासन का जबरदस्त एक्शन। 12 जुलाई को ‘हिंदुस्तानी-2’  हिंदी, तमिल और तेलुगु में रिलीज होगी। 
      फिल्म में कमल हासन को अपने सिग्नेचर स्टाइल मार्शल आर्ट के साथ स्टंट करते दिखाया गया है। ट्रेलर से यह फिल्म भ्रष्टाचार से जंग पर केंद्रित कहानी नजर आ रही है। इसकी कहानी वीर सेकरन सेनापति नाम के स्वतंत्रता सेनानी के इर्द-गिर्द घूमती है, जो सिस्टम में भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने की हर संभव कोशिश करता है। इस आधार पर कमल हासन की फिल्म 'हिंदुस्तानी-2' को बेहतरीन थ्रिलर फिल्म बताया जा रहा है। '2.0' और 'अन्नियन' जैसी हिट फिल्मों के लिए पहचाने जाने वाले एस शंकर निर्देशित फिल्म 'हिंदुस्तानी-2' में कमल हासन का किरदार कुछ अलग है। 
      फिल्म में बेरोजगारी और लचर कानून व्यवस्था को राजनीतिक कारण बताया गया है। सामान्यतः व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाना फिल्मकारों के लिए आसान नहीं है। लेकिन, यह पूरी फिल्म इसी कथानक पर गढ़ी गई। इस बारे में कमल हासन का कहना है कि यह समस्या अंग्रेजों के समय से है। लोग तब भी फिल्में बनाते थे, हम भी ऐसी फिल्में बनाते रहेंगे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सत्ता के शीर्ष पर कौन है। सरकार से सवाल पूछना नागरिकों का अधिकार है। सिर्फ फिल्म निर्माता का ही नहीं, सवाल पूछना तो नागरिकों के अधिकार में भी शामिल है। कलाकारों को राजनीतिक फिल्में बनाते समय मुश्किलों का सामना करना पड़ता है, यह बात सही है। हम कलाकार के रूप में आम जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस बात को भी मानते हैं कि हम उनके प्रतिनिधि हैं। इसलिए हम नतीजों के बारे में सोचे बिना, हिम्मत के साथ मुद्दों के बारे में बात करते हैं। इसमें मुश्किल भी होती है। सरकार नाराज भी हो सकती है लेकिन जनता का स्नेह उस आग को बुझा देगा।
   'इंडियन 2' की टैगलाइन 'जीरो टॉलरेंस' है। इस पर कमल हासन ने कहा कि मैं गांधी जी का फैन हूं। उन्होंने टॉलरेंस सिखाया है। मैं कहता हूं कि मैं उस सहिष्णुता के बिजनेस का फैन नहीं हूं। गांधी मेरे हीरो हैं। लेकिन, आप किसे बर्दाश्त करते हैं, किसी दोस्त को तो नहीं, मैं चाहता हूं कि इस दुनिया में दोस्ती खूब बढ़े। आप जो बर्दाश्त करते हो, वो सिरदर्द है। जो कुछ समाज के लिए सिरदर्द है, उसके लिए आपको जीरो टॉलरेंस रखना चाहिए। कोई दवा खोजिए जो इस सिरदर्द को खत्म करे।
      इस फिल्म की एक खासियत है कमल हासन का मेकअप। शूटिंग के दौरान कमल हासन को सामान्य ढंग से पानी तक पीने को नहीं मिलता था। उन्हें मेकअप को पूरा करने में 3 घंटे लगते थे और वे पूरा दिन उसी मेकअप में बैठते थे। कमल हासन भी अपने मेकअप बनाए रखने के लिए अपनी तरफ से कोई गलती नहीं करते थे। वे स्ट्रॉ से पानी पीते और शूटिंग के दौरान सिर्फ लिक्विड डाइट लेते रहे। कमल हासन को मेकअप हटाने में भी ढाई घंटे का समय लगता था। एस शंकर निर्देशित यह फिल्म कमल हासन को 28 साल बाद फिर एक्शन अवतार में दिखाएगी। इसमें वे स्वतंत्रता सेनानी से लेकर समाज को लेकर सतर्क करने वाले शख्स तक की भूमिका में हैं। फिल्म से जुड़े लोगों का कहना है कि 'हिंदुस्तानी-2' के सतर्क नायक ने सेनापति के रूप में कमाल की वापसी की है। कमल हासन ने दिखा दिया कि एक्टिंग में उनका कोई जोड़ नहीं। फिल्म में शंकर और रॉकस्टार अनिरुद्ध रविचंदर का संयोजन भी देखने को मिलेगा। फिल्म के साउंडट्रैक को भी सराहना मिल चुकी है।  'हिंदुस्तानी-2' की कहानी फिल्म के क्लाइमेक्स के साथ ख़त्म नहीं होगी, अभी यह कहा नहीं जा सकता। संभवतः इसका तीसरा भाग भी आए। इस कहानी को दो हिस्सों तक बढ़ाने का कारण यही था कि निर्देशक एस शंकर को एडिटिंग के दौरान फिल्म का हर सीन अच्छा लगा। वे इन्हें काटने के मूड में नहीं थे। इसका एक ही हल था कि फिल्म के कथानक को दूसरे भाग तक बढ़ाया जाए। यही वजह थी कि 'हिंदुस्तानी-2' बनाई गई।
     दोनों फिल्मों में फर्क यह है कि 'इंडियन' की कहानी एक राज्य के आस-पास घूमती थी। जबकि, 'हिंदुस्तानी-2' की कहानी देशभर की है। ऐसे में 'हिंदुस्तानी-2' में एक लंबी कहानी देखने को मिलेगी। इसलिए कि फिल्म की मूल कहानी बेहद विस्तृत और जटिल है। जब इस कहानी को आगे बढ़ाया तो उन्हें एहसास हुआ कि इसे एक ही फिल्म में समेटना बहुत मुश्किल है। इसलिए उन्होंने इसे दो भागों में बनाने का फैसला किया, ताकि कहानी के सभी महत्वपूर्ण पहलुओं को सही ढंग से दिखाया किया जा सके। पहला पार्ट एक राज्य के इर्द-गिर्द घूमता है। पहली फिल्म अपने आप में तीन घंटे, 20 मिनट की फिल्म है। अब कहानी पूरे देश में सभी राज्यों में फैल गई है। इसलिए कहानी बड़ी हो गई। हमारा शुरुआत में सिर्फ एक पार्ट बनाने का इरादा था। फिल्म मेकिंग शुरू करने के बाद और जब मैं एडिटिंग रूम में बैठा, तो मेरे हिसाब से सभी सीन बहुत अच्छे निकले। 
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------

परदे पर भक्ति से भरे गीतों का माहौल थम गया!

- हेमंत पाल

     लोगों की देवी-देवताओं पर अगाध श्रद्धा होती हैं। उन्हें विश्वास होता है कि भगवान हर उस व्यक्ति की सुनते हैं, जो उन्हें दिल से याद करता है। मंदिर में प्रसाद चढ़ाने के अलावा भक्ति का सबसे आसान उपाय है भगवान की भक्ति में गीत या भजन गाना। फिल्मों में भी हमेशा यही दिखाया जाता है कि किस तरह एक भजन सारे हालात बदल देता है। ख़ास बात यह भी कि धार्मिक फिल्मों में ही भक्ति हों, ये जरुरी नहीं! मल्टीस्टार फिल्मों में भी ऐसे कई भक्ति गीत फिल्माए गए, जो लोकप्रिय हुए और आज भी इन्हें सुना जाता है। 1979 में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की फिल्म 'सुहाग' आई थी जिसमें मां दुर्गा की भक्ति पर गया गया भजन 'नाम रे सबसे बड़ा तेरा नाम रे, ओ शेरोवाली' काफी लोकप्रिय है। आज भी नवरात्रि के दिनों में यह आज सुनाई देता है। अमिताभ और रेखा पर मंदिर में फिल्माए इस भजन पर दोनों ने गरबा भी किया था। आशा भोंसले और मोहम्मद रफी की आवाज का यह गीत यादगार बन गया। जब भी कोई व्यक्ति या फिल्मों के नायक (या नायिका) परेशानी में होते हैं, उन्हें सबसे पहले भगवान ही याद आता है। ऐसे में या तो वो मंदिर जाता है, वहां भगवान से मुसीबत से मुक्ति की गुहार लगाता है। यदि कथानक के मुताबिक यह स्थिति फिल्मों में आती है, तो जो व्यक्ति मुश्किल में होता है, वो धार्मिक गीत या भजन गाता है। ऐसी कई फ़िल्में आई जिनमें भक्ति गीत या भजन गाते ही भगवान ने उसकी बात सुन ली! लेकिन, वास्तविक जीवन में यह सब होता भी है, तो उसमें समय लगता है। 
      फिल्म इतिहास के पन्ने पलटे जाएं तो ब्लैक एंड व्हाइट के ज़माने यही होता आ रहा है और आज भी इसमें कुछ नहीं बदला। कुछ फिल्मों के भक्ति गीत और भजन आज भी इतने लोकप्रिय हैं कि तीज-त्यौहार पर ये बजते सुनाई देते हैं। लेकिन, ये गीत परेशान लोगों को भी मानसिक शांति देते हैं। फिल्मों ने ऐसे कई भजन और भक्ति गीत दिए हैं, जिन्हें सुनकर और गाकर कुछ पलों के लिए हम अपने दुःख भूल जाते हैं। ऐसी स्थिति में मन में विश्वास की एक ज्योति जल उठती है। भक्ति को शक्ति देने वाले कई भक्ति गीत और भजन है। लेकिन, मंदिरों में भक्ति गीत सुनाने वाली इन फिल्मों में मंदिर का एक दृश्य ऐसा भी था, जो आज भी दर्शक भूले नहीं होंगे! फिल्म 'दीवार' में अमिताभ बच्चन का मां की बीमारी पर बोला गया संवाद भक्ति से इतर था। सफल धार्मिक फिल्मों के लोकप्रिय गीतों की बात की जाए तो 1975 में आई फिल्म 'जय संतोषी माँ' कम बजट की फिल्म थी। पर, कमाई के मामले ये आज तक की शीर्ष ब्लॉकबस्टर फिल्मों में गिनी जाती है। इस फिल्म के सभी गीत खूब चले। उषा मंगेशकर, महेंद्र कपूर और मन्ना डे ने कवि प्रदीप के लिखे भक्ति गीत गाए थे। करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं स्वीकार करो माँ, यहां वहां मत पूछो कहां कहां, मैं तो आरती उतारू रे, मदद करो संतोषी माता, जय संतोषी माँ, मत रो मत रो आज राधिके और यहां वहां जहां तहां मत पूछो कहां कहां ऐसे भक्ति गीत हैं जिन्हें देवी आराधना वाले मंदिरों में अकसर सुना जाता है। फिल्म इतिहास में ऐसे कई गायक हैं जिन्होंने कालजयी धार्मिक गाने, भजन और आरतियां गाई। नई और पुरानी फिल्मों में भगवान की भक्ति को लेकर कई अच्छे गीत और भजन लिखे गए। 
      ये गीत इसलिए लोकप्रिय हुए, क्योंकि इन्हें गायकों ने पूरी तन्मयता के साथ गाकर दर्शकों को भाव विभोर किया। इनमें सबसे ज्यादा लोकप्रियता मिली अनुराधा पौडवाल, नरेंद्र चंचल और अनूप जलोटा को जो धार्मिक गीतों के गायक हैं। फिल्मों में धार्मिक गीत और भजन गाने वालों की भी अपनी अलग पहचान होती है। ऐसे गीत और भजन गाने वाले गायक भी लंबे समय तक तय रहे। चंचल, अनूप जलोटा का इसमें काफी योगदान रहा। ऐसी फिल्मों में काम करने वाले कलाकारों का भी सकारात्मक पक्ष यह रहा कि दर्शकों में इनके प्रति भक्ति भाव कुछ ज्यादा ही होता है। 'जय संतोषी मां' में माता संतोषी का किरदार निभाने वाली अनीता गुहा को लोग पूजने लगे थे। 'रामायण' सीरियल में राम और सीता बने अरुण गोविल और दीपिका चिखलिया को आज भी लोग भक्ति भाव से देखते हैं। इसी का प्रताप था कि 'रामायण' के प्रसारण के इतने साल बाद अरुण गोविल लोकसभा की मेरठ सीट से चुनाव जीत गए। हिंदी फिल्मों में सबसे ज्यादा भगवान के रोल करने वाले कलाकार महिपाल को तो लोग भगवान ही मानने लगे थे। उन्होंने 35 से ज्यादा फिल्मों में भगवान या ऐसे किरदार निभाए। वे तुलसीदास भी बने और अभिमन्यु भी। महिपाल ने अपने जीवन काल में संपूर्ण रामायण, वीर भीमसेन, वीर हनुमान, हनुमान पाताल विजय, जय संतोषी माँ जैसी सफल धार्मिक फिल्मों में काम किया। उन्होंने अपने करियर में भगवान राम, कृष्ण, गणेश और विष्णु का किरदार इतने बार निभाया कि असल जिंदगी में भी लोग इन्हें पूजने लगे थे। वे जहां जाते लोग इनके पैर छूते और आशीर्वाद की कामना करते थे।
     याद किया जाए तो ऐसे कालजयी भक्ति गीतों में 1965 में आई फिल्म 'खानदान' के गीत 'बड़ी देर भई नंदलाला तेरी राह तके बृजबाला' को रखा जा सकता है। इस भजन को सुनील दत्त पर फिल्माया गया था। राजेंद्र कृष्ण के लिखे इस भजन को मोहम्मद रफी ने गाया था। जन्माष्टमी के अवसर पर अभी भी ये गीत गूंजता है। यह गीत फिल्म की कहानी को देखते हुए भी सटीक था। उससे पहले 1952 में आई फिल्म 'बैजू बावरा' का गीत मोहम्मद रफी की हिंदू भजनों के प्रति लगाव का सबसे बेहतर प्रमाण कहा जा सकता है। 'ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले' के बोल आज भी किसी दुखी व्यक्ति का चेहरा सामने ले आते हैं। शकील बदायूंनी के लिखे इस गीत में नौशाद ने संगीत दिया था। ख़ास बात ये कि इस भक्ति गीत के गायक, गीतकार और संगीतकार तीनों ही मुस्लिम थे। 1954 में आई फिल्म 'तुलसीदास' के गीत 'मुझे अपनी शरण में ले लो राम' को भी मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज दी है और बीते जमाने के विख्यात संगीतकार चित्रगुप्त ने इसे संगीत से सजाया था। गीत में राम को आराध्य मानकर अपना सब कुछ अर्पण करने की बात कही गई है। 1958 की फिल्म 'दो आंखें बारह हाथ' का गीत 'ऐ मालिक तेरे बंदे हम, ऐसे हो हमारे करम' बुराई पर अच्छाई की जीत का सबसे बेहतरीन प्रमाण कहा जा सकता है। इस गीत में नुकसान पहुंचाने वाले डाकुओं को इंसानियत के नाम पर मदद पहुंचाई जाती है। भरत व्यास ने इस गीत को लिखा और वसंत देसाई ने इसे संगीत दिया था। लता मंगेशकर ने अपनी मधुर आवाज ने मानो इस गीत को अमर कर दिया।
       1965 की फिल्म 'सीमा' में बलराज साहनी पर फिल्माया भजन 'तू प्यार का सागर है, तेरी एक बूंद के प्यासे हम' में आतुर मन की व्यथा सुनाई देती है। शैलेंद्र के लिए इस गीत को मन्ना डे ने अपनी आवाज दी और संगीत शंकर जयकिशन ने दिया था। दिलीप कुमार की 1970 में आई फिल्म 'गोपी' का महेंद्र कपूर की आवाज में गाया गीत 'रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा' ऐसा भजन है जिसमें भविष्य का संकेत था। आशय यह कि सच्चा आदमी भटकेगा और झूठे के पास सबकुछ होगा। राजेंद्र कृष्‍ण के गीत को कल्याणजी-आनंदजी ने संगीत दिया था। भक्ति गीतों में सांई बाबा पर रचे गए गीत भी बड़ी संख्या में हैं। 1977 की फिल्म 'अमर अकबर एंथोनी' का गीत 'तारीफ तेरी निकली है दिल से, आई है लब पे बनके कव्वाली' साईं के भक्तों के लिए एक तरह से संजीवनी है। मोहम्मद रफी की आवाज का इस गीत में रफी की लंबी तान सुनने वाले को झंकृत कर देती है।
      'सरगम' (1979) संगीत पर केंद्रित फिल्म थी। पर, इसका एक गीत 'रामजी की निकली सवारी, रामजी की लीला है न्यारी' में भगवान राम की महिमा का बखूबी वर्णन है। दशहरे में जब रामजी की सवारी निकलती है, तो इस गीत के बिना माहौल नहीं बनता। इस गीत को सुनकर मनोभावों में राम का नाम समा जाता है। आनंद बक्षी के लिखे इस गीत को मोहम्मद रफी ने गाया था और इसका संगीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने दिया था। 'अंकुश' (1986) एक अलग तरह की फिल्म थी, लेकिन, इसका एक भक्ति गीत 'इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना' टूटे मन को दिलासा देता हुआ सा लगता है। गीतकार अभिलाष ने इसे लिखा और पुष्पा पागधरे और सुषमा श्रेष्ठ ने इसे गाया है। कुलदीप सिंह ने इसमें संगीत दिया। 'भर दो झोली मेरी या मुहम्मद, लौटकर मैं ना जाऊंगा खाली' वास्तव में तो एक गैर फ़िल्मी गीत था, पर इसे 2015 में आई फिल्म 'बजरंगी भाईजान' में शामिल किया गया था। फिल्म का हीरो सलमान खान एक भटकी हुई बच्ची को उसके देश पाकिस्तान छोड़ने जाता है। इस दौरान उसे होने वाली परेशानियों को दूर करने के लिए इस अदनान सामी के गाए इस गीत को प्रार्थना के रूप में फ़िल्माया गया। कौसर मुनीर के लिखे इस गीत की धुन संगीतकार प्रीतम ने बनाई थी। लेकिन, लगता है फ़िल्मी कथानक में किरदारों को अब भगवान की कृपा की जरुरत नहीं है। शायद इसीलिए अब भगवान को फिल्मों से किनारे किया जा रहा है। लंबे समय से ऐसी कोई फिल्म नहीं आई, जिसमें धार्मिक गीत, भजन या आरती सुनाई दी हो। 
----------------------------------------------------------------------------------------------------------

फीनिक्स की राख से जन्मा टाईगर

    मध्य प्रदेश में 18 साल तक मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान की राजनीति को समझना आसान नहीं है। 9 जून को सरकार में उन्होंने केंद्र में मंत्री पद की शपथ ली और 17 जून को झारखंड चुनाव का प्रभारी बना दिया। इससे दो संकेत भी मिलता हैं। पहला यह कि शिवराज सिंह की राजनीतिक सक्रियता अब मध्यप्रदेश में कम दिखाई देगी। दूसरा संकेत यह कि जो लोग मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद उन्हें हल्के में ले रहे थे, वे भी संभल जाएं। क्योंकि, वे कब, कौन सा जादू दिखा दें, कहा नहीं जा सकता! 

000 

● हेमंत पाल

     लोकसभा चुनाव के समय मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का एक बयान मीडिया में खूब चला था कि मैं मर भी गया, तो फीनिक्स पक्षी की तरह राख से जिंदा हो जाऊंगा। तब उनके इस बयान को गंभीरता से नहीं लिया और इस बात को मजाक समझा गया। क्योंकि, बयानबाजी के मामले में शिवराज सिंह की अपनी अलग ही अदा है। जब वे मुख्यमंत्री थे, तब अफसरों को चमकाने के लिए कहा था 'टाइगर अभी जिंदा है।' इसके अलावा भी शिवराज सिंह इस तरह के बयानों के जरिए अपने मन की बात बताते रहे और इशारे से अपने विरोधियों को भी चेताते रहे हैं। लेकिन, उनके बयान कभी खोखले और बेमतलब नहीं होते। वे कभी इस बहाने अपने मन का दुख दर्शाते हैं, तो कभी अपने भविष्य का संकेत भी देते रहते हैं। 
    फीनिक्स पक्षी की तरह फिर जिंदा होने की बात, उन्होंने लोकसभा चुनाव के दौरान कहकर अपने इरादों को बता दिया था। आज भी वे जिस स्थिति में है, उससे समझा जा सकता है कि उन्होंने गलत नहीं कहा था। वे फीनिक्स की तरह राख से जिंदा भी हो गए और केंद्र की राजनीति में पांचवे नंबर पर पहुंच गए। मोदी के मंत्रिमंडल में उन्हें कृषि और ग्रामीण विकास जैसे बड़े विभाग मिले। इसके बाद उन्हें झारखंड के विधानसभा चुनाव का प्रभार दे दिया गया। यदि उन्होंने वहां भाजपा का झंडा गाड़ दिया तो उनके लिए राजनीति के नए दरवाजे खुलना तय है।
     नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल में उन्हें दो भारी-भरकम विभाग देकर ये संदेश भी दिया गया कि शिवराज सिंह की ताकत को कम न समझा जाए। ये स्थिति इसलिए आई कि विधानसभा चुनाव के बाद जिस तरह हालात बदले और मुख्यमंत्री की कुर्सी अप्रत्याशित रूप से मोहन यादव को मिली, ये संदेश भी गया कि मध्यप्रदेश में अब शिवराज सिंह का जादू खत्म हो गया। जबकि, वास्तव में भाजपा को 163 सीट आना उनके 'मामा' होने का ही चमत्कार रहा। इसके बाद करीब एक महीने शिवराज सिंह कुछ दबे से रहे और उसी के साथ मोहन यादव की मुखरता बढ़ती गई। उनके कई पुराने फैसलों को बदला गया और उनके खास लोगों को पदों से बाहर कर दिया। लोकसभा चुनाव में जब उन्हें विदिशा से उतारा गया, तो साफ हो गया कि पार्टी उन्हें मध्यप्रदेश से बाहर भेजकर मोहन यादव को निष्कंटक करना चाहती है। यह संदेश छुपा भी नहीं रहा। 
    इसके बाद बहुत कुछ ऐसा हुआ, जिससे लगा कि शिवराज सिंह भले लोगों के दिलों में हों, पर पार्टी की पहली सूची में वे नहीं हैं। लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान कई मंचों पर होते हुए भी उन्हें माइक नहीं थमाया गया। लेकिन, नतीजों ने सारी कहानी बदल दी। विदिशा से शिवराज सिंह की रिकॉर्ड तोड़ 8 लाख से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की और मंत्रिमंडल की शपथ के दौरान पांचवे नंबर पर उनका शपथ लेना एक अलग ही संकेत था। साथ ही उन लोगों को सबक भी, जो ये मान रहे थे, कि 'मामा' अब उनके रास्ते में कहीं नहीं हैं। जबकि, देखा जाए तो लोकसभा चुनाव में भाजपा का क्लीन स्वीप (सभी 29 सीटों पर जीत) भी उनकी 'लाड़ली बहना योजना' का ही असर था। पर, शिवराज सिंह ने इस बात का कभी दावा नहीं किया। 
     इस सबके बाद केंद्रीय मंत्री बनने के बाद जब शिवराज सिंह बीते सप्ताह भोपाल आए, तो उनका जिस तरह स्वागत हुआ, उसने अपना अलग ही असर दिखाया। इसे सिर्फ जनता और समर्थकों का हुजूम नहीं कहा जा सकता। ये सीधे-सीधे इस नेता का शक्ति प्रदर्शन था, जिसे उन्होंने भी समझा जिन्हें यह दर्शाया गया। यहां तक कि उन्हें उस ट्रेन में भी यात्रियों ने भरपूर स्नेह दिया जिससे वे दिल्ली से भोपाल आए थे। रास्ते भर यात्री उनके साथ सेल्फी लेते रहे। भोपाल की सड़कों पर तो उनका पांच घंटे ऐसा स्वागत हुआ, जो आने वाले कई सालों के लिए मिसाल बन गया। उनका ये स्वागत और रोड शो स्वमेव था या प्रयोजित जो भी था, अभूतपूर्व था। इस संयोग ही समझा जाना चाहिए कि भोपाल आने के अगले दिन उन्हें झारखंड विधानसभा चुनाव का प्रभारी बना दिया।
     केंद्र सरकार के बाद अब संगठन के जरिए चुनाव में बड़ी जिम्मेदारी मिलने के बाद कयास लगने लगे हैं कि क्या शिवराज सिंह चौहान को स्थायी रूप से मध्यप्रदेश की राजनीति से अलग कर दिया गया! तो इसका जवाब भी शिवराज सिंह ही देंगे। इस साल के अंत में झारखंड में विधानसभा चुनाव होना है। यदि उन्होंने कोई चमत्कार कर दिया तो फिर वे अपना राजनीतिक भविष्य खुद तय करेंगे। मध्यप्रदेश में जिस तरह उन्होंने 18 साल भाजपा की सरकार चलाई, वैसा ही कुछ जादू उन्होंने झारखंड में किया, तो वे भाजपा की केंद्रीय राजनीति में पार्टी की आंख तारा बन सकते हैं।   
      विदिशा चुनाव के दौरान एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बात का इशारा भी किया था कि हम शिवराज सिंह को दिल्ली ले जा रहे हैं। बात सच निकली और जीत के बाद उन्हें केंद्रीय कैबिनेट में जगह दी गई। जबकि, शिवराज सिंह विधानसभा चुनाव की शुरुआत से ही हाशिए पर दिखाई देने लगे थे। संगठन में भी उनकी पूछ कम होती दिखाई दी। तब वे मुख्यमंत्री जरूर थे, पर कई बार लगा कि उनकी बातों को अनसुना किया जा रहा था। पर, इसका कोई नतीजा नहीं निकला। उनकी 'लाडली बहना' ने ही मतदाताओं को प्रभावित किया और पार्टी ने उस कांग्रेस को नेस्तनाबूद कर दिया, जो अति आत्मविश्वास में सत्ता में आने का सपना देखने लगी थी। उन्होंने न सिर्फ कांग्रेस, बल्कि भाजपा में भी अपने विरोधियों को ध्वस्त किया। इससे लगता है कि उन्होंने गलत नहीं कहा था कि मैं मर भी गया तो फीनिक्स पक्षी की तरह अपनी राख से फिर जिंदा हो जाऊंगा।   
-------------------------------------------------------------------------------------------------------

अधूरी फिल्मों की दास्तान बहुत लंबी

- हेमंत पाल

      संजय लीला भंसाली अपनी नई वेब सीरीज 'हीरा मंडी' को लेकर चर्चा में हैं। क्योंकि, ये उनका 14 साल पुराना अधूरा ख्वाब था, जो पूरा हुआ। अब वे अपनी एक और रुकी हुई फिल्म 'इंशाअल्लाह' को लेकर ख़बरों में हैं। ये फिल्म 'हम दिल दे चुके सनम' के बाद वे सलमान खान को लेकर बनाने वाले थे। पर, फिल्म नहीं बन सकी। अब फिर 'इंशाअल्लाह' बनने की ख़बरें सुनाई देने लगी। सिर्फ यही फिल्म नहीं जो घोषणा के बाद बरसों से नहीं बनी। ऐसी सैकड़ों फ़िल्में हैं, जिनकी घोषणा तो शोर-शराबे के साथ होती है, पर वे कभी पूरी नहीं हो पाती। इसके पीछे कई कारण है। वैसे तो फिल्म इंडस्ट्री हमेशा ही दर्शकों की पसंद के मनोरंजन का ख़्याल रखती आई है। निर्माता-निर्देशक हमेशा कोशिश करते हैं कि वे ऐसी फ़िल्में बनाएं जिन्हें लोग याद रखें और जो उनके लिए प्रेरणा का स्रोत बनें! हर फिल्म के पीछे राइटर, डायरेक्टर, प्रोड्यूसर, टेक्नीशियन, एक्टर्स जैसे तमाम लोगों की मेहनत और काबिलियत लगती है! लेकिन, इन तमाम चीज़ों के बाद भी कभी कुछ फ़िल्में आधी, तो कुछ पूरी बनकर भी परदे पर जगह नहीं बना पाती!
    जितनी फ़िल्में हर साल परदे पर दिखाई देती हैं, उससे करीब दोगुनी फ़िल्में परदे तक पहुंच ही नहीं पाती! कुछ फ़िल्में सिर्फ घोषणा और मुहूर्त तक सीमित हो जाती हैं तो कुछ फ़िल्में पूरी बन भी नहीं पाती। कुछ फ़िल्में बनकर तैयार हो गई, पर उनकी रिलीज में अड़ंगा आ गया। सवाल उठता है कि जब फिल्म की प्लानिंग के बाद उसकी घोषणा की जाती है, तब सारे हालात का अंदाजा क्यों नहीं लगाया जाता! दरअसल, ये सब किया भी जाता है, पर कई बार ऐसी अनपेक्षित स्थितियां निर्मित हो जाती है जिसका सीधा असर फिल्म निर्माण पर पड़ता है। मज़बूरी में निर्माता-निर्देशक को पीछे हटना पड़ता है! जरूरी नहीं कि जो हालात उभरे वो सार्वजनिक किए जाएं! क्योंकि, कुछ हालात सभी को बताने के लिए नहीं, बल्कि समझने के लिए होते हैं। सभी डायरेक्टर, प्रोड्यूसर जब कोई फिल्म बनाते हैं, तो उनकी कोशिश होती है कि उनकी फिल्म जल्द से जल्द सिनेमा के परदे तक पहुंचे, इसलिए कि फिल्म के साथ उनकी बहुत सारी उम्मीदें जुड़ी होती है। अब जरा उन फिल्मों के बारे में सोचिए जिन्हें इतनी मेहनत से बनाया जाता है, पर वे फिल्म कई कारणों से सिनेमाघरों तक नहीं पहुंच पाती। बहुत सी ऐसी फिल्में हैं, जो बनी, पर लेकिन कभी दर्शकों तक पहुंच नहीं पाई।
      फिल्मों के हमेशा के लिए डिब्बा बंद के ढेर सारे कारणों के साथ एक यह भी है कि जब किसी कलाकार की फ़िल्में लगातार फ्लॉप होने लगती है, तो फिल्मकार उस पर दांव लगाने से बचते हैं! ऐसी स्थिति में पहले से घोषित फिल्मों को किसी न किसी बहाने टाल दिया जाता है। इसका सबसे सटीक उदाहरण तब सामने आया, जब आमिर खान की 'लाल सिंह चड्ढा' फ्लॉप हुई तो टी-सीरीज के फाउंडर गुलशन कुमार की बायोपिक फिल्म 'मुग़ल' टल गई! यही स्थिति अक्षय कुमार के साथ 'सम्राट पृथ्वीराज' और 'रक्षाबंधन' के फ्लॉप होने के बाद दिखाई दी। 'गोरखा' और 'कठपुतली' समेत कई फिल्मों को रोक दिया गया। ये हाल की घटनाएं जरूर है, पर इसका एक लम्बा इतिहास है। जब अमिताभ बच्चन का ख़राब समय था, तब उनकी कई फिल्मों को किसी न किसी कारण से रोक दिया या आगे बढ़ा दिया था। इनमें कुछ बनी, तो कुछ हमेशा के लिए भुला दी गई। अमिताभ को लेकर सुभाष घई 'देवा' बना रहे थे। फिल्म की एक हफ्ते की शूटिंग भी हो गई थी। लेकिन, सुभाष घई और अमिताभ बच्चन के बीच किसी बात को लेकर कहासुनी हो गई और फिल्म बंद हो गई। अमिताभ के साथ रेखा की पहली फिल्म 'अपने-पराए' भी शुरू हुई थी, पर पूरी नहीं हो पाई। फिल्म बनाने वालों ने पैसों की कमी का हवाला देते हुए बंद कर दिया। अमिताभ को लेकर शूजित सरकार 'शूबाइट' बनाई। लेकिन यू-टीवी और डिज़्नी में विवाद की वजह से ये फिल्म रिलीज नहीं हो सकी।
      इन सारे स्वाभाविक और अस्वाभाविक कारणों के अलावा एक और बड़ा कारण होता है कलाकारों, निर्देशक या फिल्म की कहानी का कोई विवाद! देखा गया कि सबसे ज्यादा इसे लेकर ही फ़िल्में बनने से रुकी या रुकवा दी गई! संजय लीला भंसाली की फिल्म 'इंशा अल्लाह' का किस्सा भी कुछ ऐसा ही है। यह फिल्म शुरू होने से पहले ही बंद हो गई। इस फिल्म में संजय लीला का मूड सलमान खान और आलिया भट्ट को कास्ट करने का था। लेकिन, सलमान के साथ क्रिएटिव डिफरेंस के कारण फिल्म की शूटिंग भी शुरू नहीं हो सकी। बाद में संजय लीला ने रितिक रोशन को कास्ट करना चाहा, पर उन्होंने भी इंकार कर दिया। आलिया को पहले ही वे पहले ही कास्ट कर चुके थे, इसलिए आलिया को लेकर 'गंगूबाई काठियावाड़ी' बनाई गई।
    1992 में बनना शुरू हुई शेखर कपूर की फिल्म 'टाइम मशीन' में आमिर खान, रवीना टंडन, रेखा और नसीरुद्दीन शाह को लिया गया था। फिल्म लगभग पूरी बन गई थी। लेकिन, अचानक शेखर कपूर के सामने पैसों का संकट आ गया और फिल्म का बनना थम गया। 'मुन्नाभाई एमबीबीएस' और 'लगे रहो मुन्नाभाई' जैसी सफल फिल्मों के बाद विधु विनोद चोपड़ा ने मुन्ना भाई सीरीज की तीसरी फिल्म 'मुन्ना भाई चले अमेरिका' बनाने की घोषणा की थी। फिल्म की थोड़ी शूटिंग भी हुई, पर संजय दत्त के जेल जाने के बाद फिल्म कहां चली गई पता ही नहीं चला! करण जौहर की दो फिल्म 'तख्त' और 'शुद्धि' भी अनिश्चितकाल के लिए बंद हुई है। 'तख्त' पीरियड फिल्म थी, जिसमें रणवीर सिंह, करीना कपूर, विक्की कौशल, आलिया भट्ट, जाह्नवी कपूर, भूमि पेडनेकर और अनिल कपूर को कास्ट किया गया था। इसकी शूटिंग 2020 में शुरू की गई, पर कोविड के कारण इसे टाल दिया गया।
      'शुद्धि' को करण जौहर करीना कपूर और रितिक रोशन को लेकर बनना चाहते थे, पर कुछ वजहों से उन्होंने इस फिल्म को वरुण धवन और आलिया भट्ट के साथ बनाने का फैसला किया, पर ये फिल्म भी नहीं बनी। करण जौहर की ही 'दोस्ताना 2' का भी यही हश्र हुआ। फिल्म में कार्तिक आर्यन को लिया गया। लेकिन, किन्हीं कारणों से करण जौहर ने कार्तिक को फिल्म से बाहर कर दिया। इसके बाद सोशल मीडिया पर उनकी जबरदस्त खिंचाई हुई। इस वजह से करण ने चुपचाप फिल्म को बंद ही कर दिया। एक पुराना उदाहरण दिलीप कुमार का भी है। 1991 में दिलीप कुमार को लेकर सुधाकर बोकाडे ने 'कलिंगा' की घोषणा की थी! इसका निर्देशन भी दिलीप कुमार ही करने वाली थे। फिल्म में दिलीप कुमार के साथ सनी देओल, मीनाक्षी शेषाद्री, राज किरण, शिल्पा शिरोडकर भी कलाकार थे। फिल्म तीन साल में 90% तो बन गई, पर उसके बाद डिब्बा बंद हो गई!
    विद्या बालन के साथ अक्षय कुमार को लेकर 'चांद भाई' बनाए जाने की घोषणा की गई थी। ये फिल्म ऐसे बेसहारा गरीब लड़के की कहानी थी, जो गैंगस्टर बनना चाहता है। बिना गाने की ये फिल्म रॉबिनहुड जैसे किरदार को ध्यान में रखकर लिखी गई थी। इसका निर्देशन निखिल आडवाणी करने वाले थे। लेकिन, अचानक कुछ ऐसा हुआ कि निखिल आडवाणी ने फिल्म न बनाने का ऐलान कर दिया। आजतक इसका कारण सामने नहीं आया। क्योंकि, अक्षय और विद्या ने इस मुद्दे पर खामोशी ही बरती। अक्षय और विद्या की ही फिल्म 'राहगीर' भी मुहूर्त के बाद नहीं बन सकी। इसे प्रीतिश नंदी बनाने वाले थे और निर्देशन था रितुपर्णो घोष का। इसे देवानंद की 1965 की सुपरहिट फिल्म 'गाइड' का रीमेक कहा जा रहा था। जब देवानंद को यह बात पता चली, तो वे नाराज हो गए। वे किसी भी क्लासिक फिल्म का रीमेक बनाने के पक्ष में नहीं थे। देव आनंद की आपत्ति के बाद विवाद बढ़ता गया और फिल्म बंद हो गई।
    इसी तरह 1983 में बनी 'चोर मंडली' राज कपूर के आख़िर दिनों की फिल्म मानी जाती है। इसमें उन्होंने ख़ुद बतौर एक्टर काम किया था। फिल्म में अशोक कुमार भी थे। फिल्म में इन दोनों ने ऐसे चोरों की भूमिका निभाई थी, जो डायमंड चुराने के पीछे पड़े रहते थे। यह फिल्म भी बनकर पूरी हो गई थी, पर कभी सिनेमाघर तक नहीं पहुंची! संजय दत्त और सलमान खान को लेकर मुकुल आनंद ने 1996 में 'दस' बनाने की घोषणा की। मुहूर्त के बाद फिल्म की शूटिंग भी शुरू कर दी गई थी, लेकिन अचानक मुकुल आनंद की मौत ने फिल्म को हमेशा के लिए ठंडे बस्ते भेज दिया। यही स्थिति दिव्या भारती की मौत के कारण भी हुई। अक्षय कुमार के साथ पार्थो घोष दिव्या को लेकर 'परिणाम' बनाने वाले थे। इसमें डैनी और प्राण को भी साइन किया गया था। लेकिन, 1993 में दिव्या भारती की अचानक हुई मौत ने सब कुछ रोक दिया। 2009 में रिलीज हुई फिल्म 'ब्लू' में अक्षय कुमार के साथ संजय दत्त, जायद खान, लारा दत्ता थे। फिल्म की रिलीज से पहले इसके सीक्वल की तैयारी थी, जिसका नाम 'आसमान' तय किया गया था। लेकिन, 'ब्लू' कमाई नहीं कर पाई और मामला अटकता चला गया और फिल्म बंद हो गई।
  अक्षय कुमार की 'सामना' उसकी कहानी की उलझन के कारण नहीं बनी। इसे राजकुमार संतोषी बनाने वाले थे। ये धर्म और राजनीति के किसी विषय पर आधारित थी। इसमें अक्षय कुमार के साथ नाना पाटेकर, अजय देवगन, रितेश देशमुख, उर्मिला मातोंडकर और महिमा चौधरी को साइन किया गया था। इसी तरह राजा कृष्णा मेनन दिवंगत बॉक्सर डिंको सिंह की बायोपिक बनाने वाले थे। इसमें वे शाहिद कपूर को लीड में लेना चाहते थे। लेकिन, इस फिल्म को भी टाल दिया गया। अनुराग कश्यप 'गुलाब जामुन' अभिषेक बच्चन और ऐश्वर्या राय को लेकर बनाना चाहते थे। पर, फिल्म की शूटिंग तक शुरू नहीं हो सकी। 1997 में प्रोड्यूसर आशीष बलराम नागपाल ने 'जिगरबाज' को डायरेक्ट करने के लिए रॉबिन बनर्जी को चुना था। अक्षय कुमार के साथ जैकी श्रॉफ, मनीषा कोइराला, ममता कुलकर्णी, अमरीश पुरी और बिंदु थे। पर, पूरी बनकर भी फिल्म रिलीज नहीं पाई।
     अक्षय की ही 1997 में 'पूरब की लैला-पश्चिम का छैला' घोषित हुई थी। उनके साथ सुनील शेट्टी और नम्रता शिरोडकर थे। अचानक हीरोइन नम्रता ने साउथ के हीरो महेश बाबू से शादी कर ली और फिल्म अटक गई। 12 साल बाद अक्षय ने नए नाम 'हैलू इंडिया' के साथ फिल्म पूरी की, पर इसने सिनेमाघर का मुंह नहीं देखा।  इसी तरह सुशांत सिंह राजपूत की फिल्म 'पानी' का काफी हल्ला था। शेखर कपूर के निर्देशन में बनने वाली इस फिल्म के लिए सुशांत सिंह ने काफी तैयारी की थी। लेकिन, शेखर कपूर का प्रोड्यूसर आदित्य चोपड़ा से किसी बात को लेकर विवाद हुआ और फिल्म बनने से पहले ही ठंडे बस्ते में चली गई। दरअसल, ये सिर्फ उन चंद फिल्मों के नाम और घटनाक्रम हैं, जो सामने आए! ऐसी फिल्मों की संख्या रिलीज हुई फिल्मों से बहुत ज्यादा है। ये सब आगे भी चलता रहेगा, क्योंकि फिल्म इंडस्ट्री का नाम ही अनिश्चितताओं से जुड़ा है।
-----------------------------------------------------------------------------------------------

Friday, June 14, 2024

दो दशक पुराना रिश्ता और प्रशासनिक दक्षता का संगम

   मध्य प्रदेश का अगला मुख्य सचिव कौन होगा, अब इस सवाल का काफी हद तक जवाब मिल गया है। डॉ राजेश राजौरा इस कतार में सबसे आगे खड़े हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है उनकी कार्यशैली और मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के साथ उनके 20 साल पुराने संबंध, जो 2004 से सिंहस्थ के समय बने थे। आज ये दोनों अलग-अलग भूमिकाओं में प्रदेश की दो बड़ी कुर्सियों पर विराजित हैं।
000 

- हेमंत पाल

      सरकार किसी भी पार्टी की हो और मुख्यमंत्री कोई भी हो, कुछ अफसर हमेशा चहेते बने रहते हैं। इसलिए नहीं कि उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता उनसे मेल खाती है। बल्कि, इसलिए उन्हें पसंद किया जाता है कि उनकी काम करने की शैली कुछ ऐसी होती है, जो हर मुख्यमंत्री को रास आती है। याद कीजिए जब मोहन यादव मुख्यमंत्री बने और उन्होंने जो पहली फाइल पर दस्तखत किए वो डॉ राजेश राजौरा ने उनके सामने रखी थी, जिसमें धर्मस्थलों से लाउडस्पीकर निकाले जाने संबंधी आदेश था। इससे पहले जब 2018 में कांग्रेस की कमलनाथ सरकार बनी, तब भी बतौर मुख्यमंत्री उन्होंने सबसे पहले किसानों की कर्जमाफी संबंधित जो आदेश जारी किया, वो फाइल भी डॉ राजेश राजौरा ने ही उनके सामने रखी थी। 
    याद किया जाए तो 18 साल से ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह चौहान के भी वे चहेते अफसरों में एक थे। इन घटनाओं का जिक्र ही उनकी कार्यशैली दर्शाता है। मुख्यमंत्री डॉ यादव से भी उनके संबंधों का इतिहास 20 साल पुराना है। तब स्थितियां अलग थी, आज अलग है। किंतु कहीं न कहीं दोनों के बीच संबंधों का जो अंकुरण उस समय हुआ था, वो आज लहलहाता वृक्ष बन चुका है। अब वे मुख्यमंत्री के एसीएस बनाए गए हैं। 
     डॉ राजेश राजौरा को सभी परिस्थितियों में काम करने का अच्छा खासा अनुभव है। फिर वो उज्जैन का 2004 का सिंहस्थ हो (जब वे वहां कलेक्टर रहे) या आदिवासी जिला झाबुआ जहां वे जिला पंचायत के सीईओ रहे। फिर धार कलेक्टर के रूप में उन्होंने सफल कार्य किया, जिसकी आज भी चर्चा होती है। किसी कलेक्टर के लिए यह बड़ी उपलब्धि होती है कि उनके पद से हटने के बाद भी उनका जिक्र अच्छे संदर्भो में ज्यादा होता है। इंदौर जैसे बड़े जिले में बड़े ओहदे पर रहे डॉ राजेश राजौरा ने शहर में कई बड़े बदलाव किए। उन्होंने बरसों से रुके कई फैसलों को गति दी। इसमें एक एलआईजी और रिंग रोड के बीच का लिंक रोड भी है जो कई सालों से इसलिए नहीं बन पा रहा था कि रास्ते मे एक प्रभावशाली नेता कि बहन का मकान आ रहा था और उसे हटाना प्रशासन के लिए मुश्किल काम था। पर, अपने चातुर्य से डॉ राजौरा ने उसे हटवाया और आज ये लिंक रोड शहर के ट्रैफिक को आसान बना रहा है।
      इसे संयोग ही माना जाना चाहिए कि 2004 में जब राजौरा उज्जैन कलेक्टर थे, तभी वहां सिंहस्थ का आयोजन हुआ था। उस सिंहस्थ की समिति में डॉ मोहन यादव भी शामिल थे। उस समय दोनों के संबंधों की बुनियाद पड़ी। तब न तो डॉ राजौरा को मालूम था और न डॉ यादव को कि एक दिन दोनों अलग-अलग भूमिकाओं में इस ऊंचाई पर मिलेंगे। दोनों के संबंधों की जो शुरुआत 20 साल पहले पड़ी थी, आज वो बीज वटवृक्ष बन गया। यही कारण है कि मुख्यमंत्री डॉ राजेश राजौरा को अपने विश्वस्त अफसरों में मानते हैं और इसलिए उन्होंने यह अवसर दिया।
    यदि कोई अफसर अपने गृह प्रदेश में ही मुख्य सचिव की कुर्सी तक पहुंचे, तो उसके काम करने का तरीका और सोच दूसरे अफसरों से अलग होती है। क्योंकि, उस अफसर की प्रदेश के प्रति आत्मीयता और काम के प्रति ललक कुछ अलग ही होती है। यह शुभ संकेत है कि केएस शर्मा के बाद डॉ राजेश राजौरा भी मूलतः मध्य प्रदेश के ही रहने वाले हैं। केएस शर्मा का प्रदेश के मुख्य सचिव के रूप में कार्यकाल 31 जनवरी 1997 से 31 जुलाई 2001 तक रहा। वे होशंगाबाद के रहने वाले हैं। अब अगर राजौरा मुख्य सचिव बनते है तो वे केएस शर्मा के बाद दूसरे मुख्य सचिव होंगे जो मध्य प्रदेश के निवासी है। डॉ राजौरा मूलतः नीमच के रहने वाले हैं।
      पेशे से डॉक्टर इस अफसर ने एम्स (दिल्ली) से एमबीबीएस किया है। यही वजह है कि स्वास्थ्य को लेकर उनमें अतिरिक्त सजगता है। उनकी काम करने की शैली का एक प्लस पॉइंट उनकी सहजता को भी गिना जा सकता है। वे जिस भी जिले में कलेक्टर रहे, उन्हें चाहने वालों की एक लंबी फौज खड़ी हो गई। क्योंकि, उन्होंने जनता और खुद के बीच कभी कोई सीमा रेखा नहीं खींची। उनके दफ्तर के दरवाजे कभी किसी के लिए बंद हुए हों, ऐसा न कभी दिखाई दिया और न सुना गया। उनकी एक खासियत यह भी है कि उनके चेहरे के भाव देखकर कभी उनके मन की बात को पढ़ना आसान नहीं है। शायद ही कभी किसी ने उन्हें गुस्से में देखा होगा। यही उनकी सहजता भी है। अपनी प्रशासनिक दक्षता से वे हमेशा सीढियां चढ़ते रहे और अब वे उन पायदान से एक कदम पीछे है जहां पहुंचना हर आईएएस अफसर का सपना होता है।
     यहां उनका यह जिक्र इसलिए कि अपनी बेहतरीन प्रशासनिक कार्यशैली की वजह से 1990 बैच के इस आईएएस अधिकारी को अगला मुख्य सचिव बनाए जाने का रास्ता मंगलवार को साफ हो गया। नए फेरबदल में उन्हें वर्तमान दायित्वों के साथ मुख्यमंत्री का एडिशनल चीफ सेक्रेटरी नियुक्त किया गया है। समझा जाता है कि इस पद का दूसरा सिरा चीफ सेक्रेटरी की कुर्सी पर खुलता है। मुख्यमंत्री के एसीएस के साथ वे नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष, जल संसाधन और नर्मदा घाटी विभाग के अपर मुख्य सचिव बने रहेंगे। संभव है कि राजौरा की नियुक्ति में क्षिप्रा शुद्धिकरण के मकसद से की गई हो? मंत्रालय में ये तीनों विभाग काफी भारी-भरकम माने जाते हैं।
     वे मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव के विश्वस्त अफसरों में माने जाते हैं। क्योंकि, सीएम ने उन्हें 22 दिसंबर को अपने गृहनगर उज्जैन संभाग का प्रभारी बनाया। उन्हें संभागीय स्तर पर विकास कार्यों की मॉनिटरिंग के लिए भी उज्जैन संभाग का प्रभारी बनाया गया है। सरकार के इन सारे फैसलों को देखते हुए समझा जा सकता है कि वे उनके प्रदेश के अगले चीफ सेक्रेटरी बनने में अब कोई अड़चन नहीं है। यही कह सकते है कि प्रदेश का अगला मुख्य सचिव वही अधिकारी बन सकता है, जो मुख्यमंत्री के काम करने के ढांचे में अपनी प्रशासनिक दक्षता से फिट बैठता हो। वह कुशल प्रशासक के साथ मुख्यमंत्री की प्राथमिकताओं के इशारे को भी समझता हो और डॉ राजेश राजौरा की कार्यशैली उन्हें इसमें सिद्धहस्त साबित करती है।
--------------------------------------------------------------------------------------------------------

Monday, June 10, 2024

केंद्र की राजनीति में 'मामा' के कद का जवाब नहीं!

    शिवराज सिंह चौहान अब मध्यप्रदेश के नहीं केंद्र की राजनीति के भी बड़े नेता हैं। केंद्रीय मंत्रिमंडल में शपथ के दौरान उन्हें पार्टी में जिस तरह तवज्जो दी गई, वो उनके राजनीतिक भविष्य का संकेत है। चार बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे शिवराज सिंह ने अपने कार्यकाल में कुछ ऐसे कमाल किए, जो मिसाल बन गए। वही उनकी लोकप्रियता की वजह भी बने। अपनी इन्हीं क़ाबलियत से अब वे राज्य से निकलकर केंद्र के बड़े आकाश में पहुंच गए हैं! 
000 

- हेमंत पाल

     शिवराज सिंह अब मध्य प्रदेश की राजनीतिक सीमा से बाहर निकलकर केंद्र की राजनीति का हिस्सा बन गए। बात सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है, इससे कहीं बहुत ज्यादा है। इसलिए कि प्रदेश के इस पूर्व मुख्यमंत्री के राजनीतिक भविष्य लेकर पिछले चार महीने में बहुत सारे अनुमान लगाए गए। लेकिन, किसी भी अनुमान में यह पुख्ता तथ्य नहीं था कि वे राज्य के मुख्यमंत्री पद से निकलकर केंद्र में कोई बड़ी जिम्मेदारी निभाएंगे। केंद्रीय मंत्री बनना बड़ी बात है, पर उससे भी बड़ा है पार्टी में तवज्जो मिलना, जो आज शिवराज सिंह को मिली। एनडीए सरकार के शपथ समारोह में शिवराज सिंह को जो जगह दी गई, यह एक तरह का इशारा है कि उनका भविष्य किस दिशा में जाएगा! उन्होंने प्रधानमंत्री के बाद 6ठे नंबर पर शपथ ली। 
     राजनीति में अमूमन दो तरह के नेता होते हैं। एक वे जो सत्ता के समीकरण गढ़ने में माहिर होते हैं और हर स्थिति में खुद के लिए जगह बना लेते हैं। ऐसे नेताओं की संख्या अनगिनत है। लेकिन, जब वे राजनीति के दायरे बाहर होते हैं, तो उन्हें पहचाना भी नहीं जाता। दूसरी तरह नेता लोगों के दिलों में जगह बनाकर राज करते हैं। राजनीति तो वे करते ही हैं, पर जनता से उनका जुड़ाव दिल से होता है और यह दिखाई भी देता है। भारतीय राजनीति के केंद्र में ऐसे नेताओं में जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के बाद अटल बिहारी का नाम लिया जा सकता है। राज्यों की राजनीति में यह जगह पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु, तमिलनाडु में जयललिता, ओडिसा में वीजू पटनायक और मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह को ही मिली। ये चार नेता बरसों तक अपने राज्यों में मुख्यमंत्री रहे, लेकिन जनता के दिलों में बसकर। उन्होंने कोई जादू नहीं चलाया, बस अपनी काम करने की शैली ऐसी रखी जिसमें जनभावना झलकती रही। 
    शिवराज सिंह ने मुख्यमंत्री पद के अपने करीब 18 साल लम्बे कार्यकाल में सबसे बड़ा कमाल यह किया कि जनता ने उन्हें अपना मान लिया। जबकि, किसी नेता के प्रति जनता ऐसी भावना कम ही रखती है। इसका कारण यह कि नेताओं को कभी ईमानदार जनसेवक के रूप में नहीं देखा जाता। लोगों को लगता है कि नेता जो करते हैं, दिखावे के लिए करते हैं। उनकी हर बात में राजनीतिक स्वार्थ छुपा होता है। लेकिन, शिवराज सिंह अपने पूरे कार्यकाल में उससे परे रहे। उनके काम करने शैली, जनता से जुड़ाव का तरीका और उनके फैसलों से भी अलग झलक दिखाई देती रही। 
       वे बालिकाओं के 'मामा' बने रहे, तो महिलाओं के 'भाई।' ये दोनों सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि एक नजदीकी रिश्ते का प्रतीक है, जो शिवराज सिंह ने प्रदेश में बनाया और उसे निभाया भी। आज प्रदेश में शिवराज सिंह अपने नाम से ज्यादा 'मामा' नाम से लोकप्रिय है। उन्होंने गरीब लड़कियों की पढाई और शादी के लिए जो योजनाएं चलाई, वे बाद में देश के कई राज्यों ने अपनाई। इसके बाद अपने चौथे कार्यकाल से कुछ पहले उन्होंने 'लाड़ली बहना' नाम से गरीब महिलाओं की आर्थिक मदद की जो योजना संचालित की, उसने उनकी जड़े तो मजबूत की ही, मध्यप्रदेश में भाजपा की जड़ें भी इतनी गहराई तक उतार दी कि जिन्हें न तो विधानसभा चुनाव में हिलाया जा सका और न लोकसभा चुनाव में। इसका श्रेय सिर्फ शिवराज सिंह के खाते में हो दर्ज होगा। 
    जिन्होंने शिवराज सिंह को नजदीक से देखा और समझा है, वे जानते हैं कि वे सिर्फ कार्य शैली से ही जनता के नेता नहीं हैं, उनकी भाव भंगिमाएं और भाषा शैली भी जनता और खासकर महिलाओं को प्रभावित करती है। इसे उनका राजनीतिक चातुर्य ही समझा जाना चाहिए कि उन्होंने परिवार की महिलाओं के दिलों में 'भाई' की तरह जगह बनाई। उससे पहले बालिकाओं के 'मामा' बनकर जिम्मेदारी निभाई। उनके इन दो फैसलों ने मध्यप्रदेश में भाजपा की राजनीति का चेहरा ही बदल दिया। इसी का नतीजा है कि उन्हें सम्मान के साथ केंद्र में जगह दी गई। अब वे सिर्फ केंद्र सरकार के ही बड़े नेता नहीं हैं, पार्टी में ओबीसी का भी बड़ा चेहरा हैं।   
      शिवराज सिंह में और अच्छी बात ये भी है, कि वे कभी पार्टी लाइन लांघने की कोशिश नहीं करते। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने हमेशा राजनीतिक मर्यादा का पालन किया। इस बार के विधानसभा चुनाव में सारी मेहनत के बावजूद जब उन्हें मुख्यमंत्री नहीं बनाया गया, तब भी वे संयत बने रहे और पार्टी के फैसलों को शिरोधार्य किया। उनमें एक अच्छाई यह भी है कि वे पार्टी के आदेश का पालन करने में कार्यकर्ता बन जाते हैं, जो बड़े नेताओं में दिखाई नहीं देता। जबकि, शिवराज सिंह ने मुख्यमंत्री पद न मिलने के बाद भी वही किया, जो पार्टी ने कहा। उनके किसी बयान और भाव से कभी नहीं झलका कि उन्हें पांचवी बार मुख्यमंत्री न बनाए जाने की पीड़ा है। वे हमेशा कहते आए हैं, कि वे पार्टी के कार्यकर्ता हैं, पार्टी उन्हें जो काम सौंपेगी, वे उसे जिम्मेदारी से निभाएंगे। उन्हें विदिशा से लोकसभा चुनाव लड़ने का निर्देश मिला, वे लड़े और 8 लाख से ज्यादा वोटों से जीते भी। यही वजह है कि आज वे ऊंचाई पर पहुंच गए जहां से आगे बढ़ने के सारे रास्ते खुले दिखाई देते हैं।                    
-------------------------------------------------------------------------------------------