Monday, January 13, 2025

भाजपा जिला अध्यक्षों के 62 नाम में कौन सा पेंच

- हेमंत पाल  

     भाजपा जिला अध्यक्षों की सूची को लेकर फंसा पेंच लगता है अभी निकला नहीं। शनिवार को पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने अपना रटा रटाया जवाब फिर दोहराया कि जिला अध्यक्षों की लिस्ट जल्दी जारी की जाएगी। पर, वे ये नहीं बता पाए कि उनकी 'जल्दी' का मतलब क्या निकाला जाए! क्योंकि, पार्टी के कार्यक्रम के मुताबिक तो 5 जनवरी को सभी जिलों के अध्यक्षों के नाम सामने आ जाना थे, जो नहीं आए। यानी अभी भी कुछ जिलों में नामों को लेकर उलझन है। उधर, पार्टी के दिल्ली में बैठे नेता अधूरी लिस्ट जारी करने के पक्ष में नहीं है। एक अनुमान यह भी है कि मलमास की वजह से यह लिस्ट शायद 14 जनवरी के बाद जारी हो!  
     प्रदेश भाजपा अध्यक्ष पार्टी के जिलों के अध्यक्ष को लेकर जिस तरह के दावे कर रहे हैं, अब वे दावे भरोसे वाले नहीं कहे जा सकते। क्योंकि, वे भी हितानंद शर्मा के साथ इस मामले को लेकर दिल्ली तलब किए जा चुके हैं। इसके बावजूद अभी उन 62 नामों लिस्ट को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका, जो भाजपा के लिए जिलों की जिम्मेदारी संभालेंगे। वीडी शर्मा का यह भी कहना था कि मंडल स्तर पर लिस्ट को अलग से जारी नहीं किया गया था। वैसे ही जिला अध्यक्ष की ही प्रोसेस होगी। पार्टी में इस प्रकार के निर्णय संवार और तंत्र के आधार पर ही लिए जाते हैं, जिसकी कोई तारीख नहीं है। हम लोग लगे हुए हैं। जो भी होगा जल्द आपके समक्ष होगा। सवाल उठता है कि फिर पार्टी ने 5 जनवरी किस आधार पर तय थी! 
   भाजपा पहले 60 संगठनात्मक जिलों के लिए लिस्ट जारी करने वाली थी, अब 62 अध्यक्षों की घोषणा करेगी। सीधा सा आशय है कि बड़े जिलों में शहर और ग्रामीण के लिए अलग-अलग को जिम्मेदारी दी जाएगी। भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर की ही तरह सागर और धार में भी दो अध्यक्ष बनाए जाएंगे। अभी तक भोपाल, इंदौर, ग्वालियर और जबलपुर ही चार ऐसे जिले थे. जहां दो अध्यक्षों की व्यवस्था थी, अब इसमें सागर और धार को भी जोड़ा गया है। प्रदेश संगठन ने पहले 60 संगठनात्मक इकाइयों में से प्रत्येक के लिए नामों का एक पैनल दिल्ली भेजा था। बताया गया कि इसके बाद बड़े नेताओं ने दिल्ली तक भागदौड़ करके अपनी पसंद के नाम पर दबाव बनाया। 
   बीजेपी से जुड़े एक पदाधिकारी ने कहा कि जब पैनल की सूची दिल्ली पहुंची, तो इसमें एक और पेंच आया। बड़े नेता ने पैनल पर सहमत नहीं हुए और उन्होंने अपनी आपत्ति लगाई। इसलिए कि पार्टी का कोई भी बड़ा नेता अपने खेमे के आदमी को ही अध्यक्ष बनाने से चूकना नहीं चाहता। इसका कारण यह है कि 2028 के विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव तक यही अध्यक्ष पद पर रहेंगे और उनकी अनुशंसा उम्मीदवार के पैनल में मायने रखती है। ऐसे में उन्हें जिला अध्यक्ष कुर्सी पर अपना ही आदमी चाहिए, ताकि वे जिले में अपनी पसंद को आगे बढ़ा सकें।  
     जिलों का पैनल भोपाल पहुंचने के बाद 3 जनवरी को मुख्यमंत्री मोहन यादव, प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा, राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री शिवप्रकाश, प्रदेश संगठन महामंत्री हितानंद शर्मा की बंद कमरा बैठक हुई थी। अंदर क्या हुआ, ये तो औपचारिक रूप से बाहर नहीं आया, पर बताते हैं कि इस बैठक में कई जिलों के पैनल के नामों पर गतिरोध था। सभी जिलों के पैनल तो दिल्ली भेज दिए गए, पर 5 जनवरी को नाम घोषित नहीं हुए। दिल्ली में यदि नाम फाइनल हो जाते तो अभी तक लिस्ट घोषित हो जाती, पर अंदर की ख़बरें बताती है कि अभी कुछ जिलों के नाम फंसे हुए हैं। अधिकांश नाम तय हो गए, पर दिल्ली के नेता अधूरी लिस्ट जारी करने के पक्ष में नहीं हैं। क्योंकि, जो जिले बचेंगे उनके बारे में साफ़ समझा जाएगा कि पेंच की वजह से इन्हें रोका गया है। दिल्ली का संगठन यह भी नहीं चाहता कि नाम की लिस्ट जारी होने के बाद कोई असंतोष सामने आए और अनुशासनहीनता जैसे हालात बने।      
      इसके अलावा लिस्ट अटकने का एक कारण यह भी बताया जा रहा कि सनातन पार्टी मलमास में किसी अच्छे फैसले को अंतिम रूप देना नहीं चाहती। समझा जाता है कि हिंदू मान्यताओं के अनुसार इस एक माह में कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता। यही वजह है कि नाम फ़ाइनल होने के बाद भी लिस्ट को 14 फ़रवरी तक रोक लिया गया। कारण चाहे जो भी हो, पर 5 जनवरी को भाजपा ने किस आधार पर सभी जिलों के अध्यक्षों की घोषणा का दावा किया था उसकी हवा जरूर निकल गई। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष जिस 'जल्दी' की बात कर रहे हैं, कहीं वो 14 जनवरी ही तो नहीं है! 
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Friday, January 3, 2025

उम्मीदों से भरा होगा हिंदी सिनेमा का नया साल!

 

   नया साल सबके लिए नई उम्मीद लेकर आता है। फिल्म वालों के लिए तो नए साल से ढेरों उम्मीदें बंधी होती है। क्योंकि, उनका सारा दारोमदार और मेहनत फिल्म की हिट से ही जुड़ी होती है। यह नया साल भी उम्मीदों का पिटारा लेकर आया, जिसमें कई फिल्में हैं जो कलाकारों, निर्देशकों के साथ कई लोगों के सपनों को पूरा करेंगी। बीते साल हॉरर-कॉमेडी जैसे नए जॉनर ने दर्शकों का खूब मनोरंजन किया और बॉक्स ऑफिस पर सफलता का डंका बनाया। इस साल फिर वही ट्रेंड अपना असर दिखाएगा या दर्शकों का मूड बदलेगा, यह तय होना बाकी है। लेकिन, सलमान खान 'सिकंदर' से फिर अपने रंग में हैं। जबकि, शाहरुख़ खान और रणवीर कपूर की इस साल कोई फिल्म नहीं दिखाई देगी। 
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- हेमंत पाल

    या साल वैसे तो तारीखों का सिलसिला होता है, लेकिन अलग-अलग पेशे और काम धाम में इसका महत्व कुछ अलग होता है। सिनेमा में भी नया साल कुछ अलग अंदाज रखता है। यह साल हिंदी फिल्मों के नजरिए से बहुत महत्वपूर्ण समझा जा सकता है। इनसे न सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री की दिशा तय होगी, बल्कि साल भर में आने वाली फिल्मों से यह भी देखने को मिलेगा कि क्या साउथ की फिल्मों का हिंदी फिल्मों पर दबदबा कायम रहेगा या नए चेहरे और नए ट्रेंड का जादू चलेगा। इस साल यह भी तय होने वाला है, कि हिंदी फिल्मों में कौन कैसा रंग जमाएगा। खास बात यह कि इसकी झलक जनवरी से ही मिलनी शुरू हो जाएगी। इसके बाद जनवरी से लेकर दिसंबर तक रिलीज होने वाली फिल्मों की कतार में हिंदी सिनेमा की आस टिकी है। क्योंकि, हर साल नए ट्रेंड की फ़िल्में दर्शकों को आकर्षित करती  है। 2023 में शाहरुख़ खान की 'पठान' और 'जवान' के अलावा सनी देओल की 'ग़दर-2' जैसी एक्शन फिल्मों ने धूम मचाई थी। 2024 में दर्शकों बदली और हॉरर-कॉमेडी वाली फिल्मों ने माहौल बनाया। स्त्री-2, भूल भुलैया-3 और 'मुँज्या' ने दर्शकों का मनोरंजन किया। अब नए साल में नजारा क्या होगा, फ़िलहाल  में कुछ कहा नहीं जा सकता। लेकिन, लगता नहीं कि हॉरर-कॉमेडी और एक्शन  अभी जाएगा। ये 2025 में कायम रहे तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। 
      नए साल के पहले महीने जनवरी को दिलचस्प बनाने की फिल्मकारों ने पूरी तैयारी कर ली। पहले महीने में जो बड़ी फ़िल्में आने वाली है उनमें सोनू सूद की एक्शन फिल्म फतेह, साउथ स्टार राम चरण की गेम चेंजर, कंगना रनौत की 'इमरजेंसी' और अक्षय कुमार की 'स्काई फोर्स' का नाम है। इन फिल्मों के लिए दर्शकों में क्रेज देखा जा रहा है। इस महीने सिनेमाघरों में 12 फ़िल्में रिलीज होने वाली हैं। इनमें हिंदी से लगाकर साउथ तक की कई फ़िल्में हैं। लेकिन, इनमें चार फिल्में हिंदी की भी हैं। कुछ फिल्में ऐसी हैं, जो एक-दूसरे के साथ बॉक्स ऑफिस पर भी टकराएगी। हिंदी की 'इमर्जेन्सी' और 'आजाद' ऐसी ही फ़िल्में हैं, जो 17 जनवरी को आमने-सामने होंगी। इन दोनों के अलावा तीसरी हिंदी फिल्म 'फतेह' है जो 10 जनवरी को सिनेमाघरों में उतरेगी। इसके अलावा तमिल की 'रिंग-रिंग' 3 जनवरी को रिलीज हो चुकी है। 
      तमिल की ही 'विदामुयार्ची' 9 जनवरी को आएगी, तेलुगु की 'गेम चेंजर' की रिलीज 10 जनवरी को तय है। मलयालम की 'रचेल' भी 10 जनवरी को दर्शकों के सामने आने वाली है। 12 जनवरी को तेलुगु की 'डाकू महाराज' रिलीज होगी। 14 जनवरी संक्रांति को तेलुगु फिल्म 'संक्रांतिकी वस्तुन्नम' परदे पर दिखाई देगी। कंगना रनौत की हिंदी फिल्म 'इमरजेंसी' अब 17 जनवरी को आएगी। इस फिल्म की रिलीज तारीख पहले भी दो बार आगे बढ़ चुकी है। अजय देवगन की 'आजाद' भी इसी दिन मुकाबले में आ रही है। कन्नड़ की 'रुद्र गरुणा पूर्णा' 24 जनवरी से दर्शकों को देखने का मौका मिलेगा। अक्षय कुमार की हिंदी फिल्म 'स्काई फोर्स' 24 जनवरी को आएगी। मलयालम फिल्म 'थुडारम' की रिलीज डेट 30 जनवरी को है। 
   जहां तक साल भर में आने वाली नई फिल्मों का मुद्दा है, तो इस साल रवीना टंडन की बेटी राशा और अजय देवगन के भांजे अमन ‘आजाद’ के जरिए बड़े परदे पर उतरने जा रहे हैं। अमन ने भी अपने मामा की तरह एक्शन फिल्मों से ही अपनी शुरुआत करना तय किया है। प्रदीप रंगनाथन की तमिल फिल्म 'लव टुडे' की रीमेक ‘लवयापा’ से आमिर खान के बेटे जुनैद दर्शकों के सामने आ रहे हैं। वैसे तो उनकी पहली फिल्म ‘महाराज’ है, लेकिन वो ओटीटी पर रिलीज हुई। इस फिल्म से बोनी कपूर की बेटी खुशी बड़े परदे पर डेब्यू कर रही है। साल की सबसे बड़ी और बहुप्रतीक्षित सलमान खान की फिल्म 'सिकंदर' ईद पर आएगी। एआर मुरुगदास की इस फिल्म में सलमान का धांसू एक्शन अवतार दिखेगा। इसका अंदाजा उसके टीजर से हो चुका है। इस फिल्म में पुष्पा सीरीज की हीरोइन रश्मिका मंदाना भी लीड रोल में है। सनी देओल की अगली फिल्म 'जाट' है। रेजिना कसांड्रा और सैयामी खेर फिल्म हीरोइन हैं और रणदीप हुड्डा, विनीत कुमार सिंह व उपेंद्र लिमये जैसे कलाकार भी फिल्म में हैं। अजय देवगन की आने वाली दूसरी फिल्म ‘रेड 2’ होगी। छापेमारी पर पहले आई फिल्म को ही इसके दूसरे भाग में आगे बढ़ाया गया है। फिल्म की वाणी कपूर, रितेश देशमुख और रजत कपूर भी हैं।
     कुछ सालों से अक्षय कुमार के सितारे गर्दिश में हैं। इस साल उनकी पहली फिल्म जून में ‘हाउसफुल-5’ रिलीज होगी। इस फिल्म में कलाकारों की भीड़ है। ये हैं जैकलीन फर्नांडीज, रितेश देशमुख, जैकी श्रॉफ, संजय दत्त, अभिषेक बच्चन, नरगिस फखरी, नाना पाटेकर, डीनो मोरिया और फरदीन खान। सिद्धार्थ मल्होत्रा और जाह्नवी कपूर की फिल्म 'परम सुंदरी' भी इसी साल आएगी। 'वॉर' के बाद ऋतिक रोशन के साथ साउथ के सुपरस्टार जूनियर एनटीआर अब ‘वॉर 2’ में नजर आएंगे। टाइगर श्रॉफ को अपना करियर बचाने का मौका 'बागी-4' से मिलेगा। टाइगर की 2019 के बाद से कोई फिल्म हिट नहीं हुई। 
      इस फिल्म से पूर्व विश्व सुंदरी हरनाज संधू हिंदी फिल्मों में डेब्यू कर रही हैं। उनके साथ पंजाबी फिल्मों की हीरोइन सोनम बाजवा और संजय दत्त भी दिखाई देंगे। अभिनेता वरुण धवन की फिल्म 'है जवानी तो इश्क होना है' से बहुत कुछ तय होना है। अपने पिता डेविड धवन निर्देशित इस फिल्म पर बहुत कुछ निर्भर है। इस फिल्म की हीरोइन पूजा हेगड़े है, जिनकी फिल्म को लंबे समय से हिट का इंतजार है। इस साल अजय देवगन की तीसरी फिल्म ‘दे दे प्यार दे 2’ आएगी जिसमें वे रकुल प्रीत सिंह के साथ एक अलग अंदाज की प्रेम कहानी में नजर आएंगे। उनके साथ आर माधवन और अनिल कपूर भी दिखाई देंगे। इस साल क्रिसमस पर यशराज स्पाई यूनिवर्स की फिल्म 'अल्फा’ पहली महिला प्रधान फिल्म है, जिसमें आलिया भट्ट और शरवरी वाघ हैं। शिव रवैल इस फिल्म से बड़े परदे पर शुरुआत करेंगे। 
    बीते साल हॉरर कॉमेडी फ़िल्में स्त्री-2, भूलभुलैया-3 और मुँज्या की सफलता के बाद हॉरर कॉमेडी फिल्मों का ट्रेंड फिल्मों में आता दिखाई दिया। इस साल भी इस जॉनर की दो बड़ी फिल्में आएंगी। ये हैं आयुष्मान खुराना की 'थामा' और प्रभास की 'राजा साब' जो हॉरर कॉमेडी। इसके अलावा सीक्वल फिल्मों के बॉक्स ऑफिस कलेक्शन को देखते हुए कई सीक्वल फिल्में घोषित हुई। इस साल धड़क-2, सितारे जमीन पर, जॉली एलएलबी-3, हाउसफुल-5, वेलकम टु जंगल, वॉर-2, रेड और बागी-4 समेत कई सीक्वल फ़िल्में परदे पर दिखाई देने वाली है।
    फिल्मों में बायोग्राफी की वापसी का ट्रेंड भी दिखाई दिया। फरहान अख्तर की '120 बहादुर' में परमवीर चक्र विजेता मेजर शैतान सिंह की बहादुरी दिखाई देगी। जबकि, 'इक्कीस' में परमवीर चक्र विजेता सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण क्षेत्रपाल की जांबाजी के किस्से होंगे। 'इमरजेंसी' में कंगना रनौत इंदिरा गांधी की भूमिका में दिखाई देगी। इस साल में परदे पर कॉमेडी की भी कई फिल्में मनोरंजन करेंगी। इनमें अक्षय कुमार की 'हाउसफुल-5' से वेलकम-3' तक हैं। वहीं 'है जवानी तो इश्क होना है' से कॉमेडी डायरेक्टर डेविड धवन की वापसी हो रही  हैं। फिल्म इंडस्ट्री ने 'पद्मावत' और 'बाजीराव मस्तानी' जैसी इतिहास आधारित फ़िल्में दी। लेकिन, ऐसी फिल्मों को लेकर विवाद भी होते रहे। इस साल विक्की कौशल की फिल्म 'छावा' कतार में है। 
    सलमान खान की 'टाइगर-3' के बाद परदे से बाहर थे। अब वे फिल्म 'सिकंदर' से वापसी करने वाले हैं। जबकि, 2022 में फिल्म 'लाल सिंह चड्ढा' के फ्लॉप होने के बाद आमिर खान ने फिल्मों से लंबा ब्रेक लिया था। इस साल 'सितारे जमीन पर' से उनकी वापसी होना थी। लेकिन, अब शायद ये फिल्म अगले साल बड़े पर्दे पर आएगी। 2023 में शाहरुख खान की दो फिल्मों 'पठान' और 'जवान' ने बॉक्स ऑफिस पर कमाई का तूफान मचा दिया था। लेकिन, 2024 में उनकी कोई फिल्म नहीं आई। इस साल भी दर्शकों को उनकी फिल्म का इंतजार रहेगा। उनकी अगली फिल्म अब 2026 में परदे पर नजर आएगी। सिर्फ वही नहीं इस साल रणबीर कपूर भी दर्शकों को दिखाई नहीं देंगे। उनकी फिल्म 'एनिमल' को काफी पसंद किया गया था। पहले उम्मीद थी कि उनकी कोई फिल्म इस साल आएगी, पर उनकी आने वाली फिल्म 'रामायण' होगी, जो अब अगले साल (2026) ही आएगी। सनी देओल ने अपनी फिल्म 'गदर-2' से बॉक्स ऑफिस पर गदर मचाया था। उसके बाद से दर्शकों को उनकी अगली फिल्म का इंतजार है। इस साल उनकी 'जाट' और 'लाहौर 1947' रिलीज होगी।
    15 अगस्त 2024 को तीन फिल्में स्त्री 2, खेल खेल में और 'वेदा' एक साथ परदे पर उतरी थी। इस साल भी इसी दिन तीन फ़िल्में वॉर-2, द दिल्ली फाइल्स और कार्तिक आर्यन की नै फिल्मों में टकराव होगा। सिर्फ यही नहीं, अप्रैल में सनी देओल की 'जाट' के सामने अक्षय कुमार की 'जॉली एलएलबी-3' और जून में कमल हासन की 'ठग लाइफ' और 'हाउसफुल-5' एक-दूसरे को टक्कर देंगी। दशहरे पर 'कांतारा-2' के सामने वरुण धवन की 'है जवानी तो इश्क होना है' टकराएगी। पिछले साल दिवाली पर रोहित शेट्टी की अजय देवगन स्टारर सीक्वल फिल्म 'सिंघम अगेन' ने उम्मीद के मुताबिक कलेक्शन नहीं किया। 
      इस साल वे अपनी दो हिट फिल्मों के सीक्वल 'रेड-2' और 'दे दे प्यार-2' लेकर आने वाले हैं। अक्षय कुमार को भी इस साल अपनी फिल्मों से बहुत उम्मीद है। वे इस साल नए कलेवर में जोरदार वापसी करने वाले हैं। इस साल उनकी स्काई फोर्स, शंकरा, जॉली एलएलबी 3, हाउसफुल-5 और 'वेलकम टू जंगल' जैसी फिल्में आने वाली है। देशभक्ति वाली फिल्में हमेशा का ट्रेंड रहा है। इस साल भी ऐसी कहानियों का बोलबाला रहेगा। साल की शुरुआत ही 'स्काई फोर्स' जैसी फिल्म से हो रही है। साल के अंत में फरहान अख्तर की '120 बहादुर' आएगी। इसके अलावा 'लाहौर 1947' और 'इक्कीस' जैसी फिल्में भी दर्शकों के मनोरंजन की कतार में है। 
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दरवाजा तोड़ने फिर लौट आए दया!

- हेमंत पाल

     टीवी को आए 6 दशक से ज्यादा हो गए। लेकिन, इतने लंबे अरसे बाद भी यदि दर्शकों की पसंद पर खरे उतरे सीरियलों का जिक्र किया जाए, तो ऐसे सीरियल उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। इन्हीं में से एक है क्राइम-इन्वेस्टिगेशन शो 'सीआईडी' जो अपने बहुप्रतीक्षित दूसरे सीजन के साथ वापस आ गया। करीब 21 साल तक ये नॉन स्टॉप प्रसारित होता रहा। इसके बाद ये 6 साल तक छोटे परदे से गायब हो गया था। अब ये फिर अपने उसी कलेवर के साथ वापस लौट आया। जिस तरह फिल्मों का दूसरा सीजन आता है 'सीआईडी' की वापसी भी कुछ उसी तरह हुई। शो के वही तीन प्रमुख किरदार हैं जिनमें कोई बदलाव नहीं किया गया। इसके प्रमुख किरदार प्रद्युम्न सिंह हैं, जो 'सीआईडी' के एसीपी की भूमिका में हैं। '
       सीआईडी' 1998 में 'सोनी टीवी' पर आना शुरू हुआ था। 2018 तक इस शो ने छोटे परदे के दर्शकों का मनोरंजन किया। एसीपी प्रद्युम्न सिंह और इंस्पेक्टर दया का आज भी लोग जिक्र करते हैं। इसके चर्चित डायलॉग 'कुछ तो गड़बड़ है' और 'दया दरवाजा तोड़ो' लोगों की बातचीत का जैसे हिस्सा बन गए। 6 साल के लंबे अंतराल के बाद 'सीआईडी' फिर छोटे परदे पर उसी चैनल पर वापस आ गया। शो के कलाकार अपने अभिनय की बदौलत घर-घर में मशहूर थे। अब एक बार फिर पसंदीदा किरदारों की छोटे परदे पर वापसी हो गई। लंबे अरसे बाद फिल्मों के प्रति दर्शकों की रूचि फिर बढ़ने लगी है। फ़िल्में हिट और सुपरहिट होने लगी। इसके अलावा ओटीटी जैसा विकल्प भी दर्शकों की पसंद में शामिल हो गया। ऐसे में टीवी सीरियल दर्शकों की रूचि से बाहर होने लगे हैं। 
        इस माहौल में 'सीआईडी' की वापसी अलग तरह का सुकून है। अपराध कथाओं पर आधारित ये सीरियल भले ही चैनल पर बंद हो गया था, पर इसकी दो एपिसोड लंबी कहानियां कई बार दिखाई देती रही। टीवी पर 'सीआईडी' की अहमियत वैसी ही थी, जैसी रामानंद सागर के 'रामायण' और बीआर चोपड़ा की 'महाभारत' के अलावा 'हम लोग' और 'बालिका वधु' जैसे सीरियलों की रही। सीरियल के हर एपिसोड में किसी रोचक आपराधिक केस की गुत्थी 'सीआईडी' की टीम सुलझाती रही। कथानक की रोचकता और डायरेक्शन ने दर्शकों को इससे बांध रखा था। लेकिन, 6 साल के लिए जो साथ छूट गया था, वो फिर जुड़ गया। एसीपी के किरदार में शिवाजी साटम, आदित्य श्रीवास्तव और दयानंद शेट्टी की तिकड़ी पर ही इस सीरियल का दारोमदार रहा, वही आज भी है। 'सीआईडी-2' के एपिसोड सोनी टीवी के साथ अब ओटीटी 'सोनी लिव' पर भी आने लगे। बहुचर्चित किरदार एसीपी प्रद्युम्न सिंह, इंस्पेक्टर अभिजीत और दया अपनी इन्वेस्टिगेशन करने वापस आ गए। 
       टेलीविजन पर दो दशकों तक चलने वाले सीरियलों का इतिहास काफी लम्बा है। इसके सामने सास-बहू पुराण और पारिवारिक षड्यंत्रों वाले सीरियलों को तब तक खींचा जाता रहा, जब तक दर्शक उससे बिदकने न लगें! लेकिन, लम्बा चलकर भी जो शो दर्शकों की पसंद बने रहे, तो उन्हें उंगलियों पर गिना जा सकता है। 'रामायण' और 'महाभारत' जैसे धार्मिक ग्रंथों पर बने सीरियलों के बरसों तक चलने के अपने कारण हैं। उनका कथानक कई मोड़ लिए होता है। इनके कथानक को बीच में ख़त्म नहीं किया जा सकता। जबकि, अधिकांश लम्बे चलने वाले सीरियलों की कहानी को रबर की तरह तब तक खींचा जाता है, जब तक वो टूट न जाए! ऐसे में 'सीआईडी' जैसे किसी टीवी सीरियल का लगातार 21 साल मनोरंजन करना मायने रखता है। उसके बाद भी यदि दर्शकों में उसकी लोकप्रियता बनी हुई है, तो ये एक बड़ी उपलब्धि कही जाएगी! सोनी टीवी के अपराध आधारित सीरियल 'सीआईडी' ने ये कामयाबी हासिल की थी। ये शो अपने पहले सीजन में दो दशक तक से दर्शकों का मनोरंजन करता रहा और आज भी इसे पसंद करने वाले कम नहीं हुए। इस शो में हर बार नए केस आते रहते हैं, जिन्हें सीआईडी की पूरी टीम मिलकर हल करती है।
     'सीआईडी' की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण है कथानक की कसावट और रोचकता के साथ कलाकार का अभिनय। एसीपी प्रद्युम्न सिंह के नाम से शिवाजी साटम इस शो के केंद्रीय पात्र हैं। इसके अलावा आदित्य श्रीवास्तव, दयानंद शेट्टी, दिनेश फड़नीस, श्रद्धा मुसले, अंशा सय्यद और नरेंद्र गुप्ता जैसे कलाकारों की टीम ने जो किया वो कामयाबी का शिखर बन गया। यह शो अपराध और हत्या के रहस्यों को सुलझाने वाली पैचीदा कहानी के लिए जाना जाता रहा है। दो दशक किसी एक शो का परदे पर बने रहना आसान नहीं है। यह शो दुनिया में सबसे लम्बे समय तक चलते रहने वाले शो की लिस्ट में भी शामिल किया गया था। शो के निर्माता और एसीपी प्रद्युम्न बने शिवाजी साटम ने खुद एक बार कहा था कि उन्हें कभी आभास नहीं था कि 'सीआईडी' का सफर इतना लम्बा होगा। 'सीआईडी' पूरी दुनिया में सबसे लंबे समय तक चलने वाला शो बना, तो इसके पीछे दर्शकों का लगाव ही रहा।
     छह साल पहले 27 अक्टूबर 2018 को जब 21 साल तक चलने के बाद यह शो बंद होने वाला था, तब इसे लेकर कई तरह की चर्चा मीडिया में थी। उन्हीं में से एक थी चैनल और शो के प्रोड्यूसर के बीच सब कुछ ठीक नहीं है, इसलिए शो को बंद किया जा रहा। दया का किरदार निभाने वाले दयानंद शेट्टी ने भी कहा था कि शो के बंद होने की बात सुनकर मैं स्तब्ध हूं। शो सक्सेसफुली चल रहा था, फिर क्या वजह थी कि इसे ऑफ एयर किया जा रहा। जब ये शो बंद हुआ, इसके 1546 एपिसोड दिखाए जा चुके थे। दर्शकों के कई ग्रुप ने शो को चालू रखने की मांग की थी। अचानक शो बंद होने से दर्शक बेहद निराश हुए थे और उन्होंने चैनल-मेकर्स से इसे बंद करने का कारण भी पूछा। लेकिन, किसी के पास कोई ठोस कारण नहीं था। इसलिए माना गया कि ये चैनल का ही फैसला है। जिस समय 'सीआईडी' का प्रसारित हो रहा था, उसी समय सोनी चैनल पर ही 'क्राइम पेट्रोल' भी दिखाया जाता था। यह शो भी अपराध कथाओं पर आधारित था। इसमें भी इन्वेस्टिगेशन दिखाई जाती थी। इसके अलावा एक अन्य चैनल पर 'सावधान इंडिया' भी दिखाया जाता था। इन दो शो से 'सीआईडी' को काफी टक्‍कर मिली थी। हालांकि, दया उस चुभन को लंबे समय तक नहीं भूले कि कैसे 'सीआईडी' के साथ सब कुछ खत्म हो गया था। 2018 में शो ऑफ-एयर हुआ, किसी को इसका कारण नहीं पता था। शो अच्छा चल रहा था लेकिन ऑर्गेनाइज्‍ड तरीके से इसे टारगेट किया गया। उनका तो ये भी कहना था कि 2016 से ही चैनल इसे बंद करने की कोशिश में था। आखिरकार 2018 में उन लोगों ने शो बंद कर ही दिया। 
     1998 में जब 'सीआईडी' शुरू हुआ था, तब टीवी पर कोई क्राइम इन्वेस्टिगेशन आधारित शो नहीं था। इसके बाद कई चैनलों पर ऐसे शो शुरू हुए, पर 'सीआईडी' की लोकप्रियता पर कोई असर नहीं पड़ा। यही कारण है कि जब तक ये शो चलता रहा सबसे ज्यादा पसंद किए जाने वाले टीवी क्राइम शो में एक बना रहा। इस शो के डायलॉग 'दया, दरवाजा तोड़ दो' और 'कुछ तो गड़बड़ है' सोशल मीडिया पर भी जमकर वायरल हुए।  लॉकडाउन के दौर में जब सिनेमाघरों के दरवाजे बंद कर दिए गए और सीरियलों की शूटिंग पर भी रोक लग गई थी, तब घरों में बंद दर्शकों के लिए टीवी पर 'रामायण' और 'महाभारत' के साथ 'सीआईडी' के पुराने सीरियल भी दिखाए गए थे। तब भी दया ने कहा था मुझे नहीं पता था कि 'सीआईडी' रोज सुबह फिर से आ रहा है। लोग मुझे कॉल और मैसेज करके बताते कि आप सभी को टीवी पर फिर से देखना अच्छा लग रहा है। तब मुझे पता चला कि लॉकडाउन में चैनल ने शो को फिर से दिखाने का फैसला किया है। मुझे बहुत ख़ुशी हुई थी। अब, जबकि 'सीआईडी' का दूसरा सीजन परदे पर है दया निश्चित रूप से बहुत खुश होंगे। क्योंकि, दरवाजा तो दया जैसे ताकतवर कलाकार ही तोड़ करते हैं!  
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बीता बरस 2024 : कुछ ने जीता दिल, कुछ गिरी धड़ाम से

 
    हिंदी सिनेमा की अपनी अलग परंपरा और इतिहास है। सौ साल से ज्यादा पुरानी फिल्म इंडस्ट्री ने कई उतार-चढ़ाव देखे। इसके बावजूद दर्शकों की पसंद और नापसंद को फिल्मकार अब तक समझ नहीं सके। कब कौन सी फिल्म दर्शकों का दिल जीत लेगी, इसका अनुमान नहीं लगाया जा सकता। यही वजह है कि कई बार बड़े बजट और मल्टी स्टार फिल्म धड़ाम हो जाती है और छोटे बजट की फिल्म दर्शकों के सिर चढ़कर बोलती है। बीते बरस भी यही हुआ। 'लापता लेडीज' जैसी अनाम कलाकारों की फिल्म दर्शकों पसंद पर खरी उतरी। जबकि, 'सिंघम अगेन' और 'मैदान' जैसी सितारों से भरी फिल्म नहीं चली। साल की सबसे खास बात ये रही कि दर्शकों ने हॉरर-कॉमेडी वाली फिल्मों को हाथों-हाथ लिया। इसके साथ ही बड़े कलाकारों की जगह छोटे कलाकारों का रंग खूब जमा। राजकुमार राव और कार्तिक आर्यन दर्शकों के पसंदीदा रहे!
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- हेमंत पाल

      र व्यक्ति के लिए हर साल कुछ अलग होता है। जिस तरह घटनाएं अपने आपको नहीं दोहराती, वही स्थिति सिनेमा की भी है। यहां तक कि सिनेमा की दुनिया में भी हर साल उतार-चढाव आते रहते हैं। कभी दर्शक रिलीज हुई ज्यादातर फिल्मों को पसंद नहीं करते, पर बीता साल इस मामले में लकी रहा कि दर्शकों ने अधिकांश फिल्मों को सराहा। उनमें भी हॉरर-कॉमेडी और एक्शन फिल्मों का जलवा कुछ ज्यादा छाया। स्त्री-2, भूल भुलैया-3 और 'मुँज्या' के अलावा सिंघम अगेन, किल और 'फाइटर' जैसी फिल्मों को सराहा गया। साल खत्म होने से पहले 'पुष्पा-2' रिलीज हुई। अल्लू अर्जुन और रश्मिका मंदाना की इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया। इसने कई बड़ी फिल्मों के रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए और हिंदी सिनेमा की सबसे बड़ी ओपनिंग फिल्म बन गई। बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के हिसाब से भी यह साल फिल्मों के लिए अच्छा कहा जा सकता है। लेकिन, कई बड़ी फ़िल्में फ्लॉप भी हुई। सबसे खास बात यह रही कि बीते बरस बड़े सितारों का जादू दर्शकों के सिर चढ़कर नहीं बोला, बल्कि राजकुमार राव और कार्तिक आर्यन की फिल्मों के अच्छी कमाई की। अक्षय कुमार की फिल्मों के फ्लॉप होने का सिलसिला इस साल भी जारी रहा। अजय देवगन भी दर्शकों को प्रभावित करने में नाकाम ही रहे। 
      कहा जा सकता है कि फिल्म इंडस्ट्री के लिए साल 2024 बीते सालों के मुकाबले बेहतर रहा। ऐसी कई फिल्में आई, जिसे दर्शकों ने पसंद किया। लेकिन, कुछ फिल्में ऐसी भी हैं, जिन्होंने बॉक्स ऑफिस पर खास कमाई नहीं की, लेकिन उनकी कहानी ने लोगों को प्रभावित किया। इस लिस्ट में किरण राव के डायरेक्शन में बनी 'लापता लेडीज' भी है, जिसे भारत की तरफ से ऑस्कर में भेजा गया है। यह जिक्र उन फिल्मों का जो सुपरहिट रही। ऐसी फिल्मों में '2-स्त्री' अव्वल रही, जिसमें श्रद्धा कपूर, राजकुमार राव, पंकज त्रिपाठी ने काम किया। ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर छाई रही और बॉक्स ऑफिस पर वर्ल्ड वाइड 858 करोड़ का कलेक्शन किया। 'भूल भुलैया-3' दिवाली के मौके पर रिलीज हुई थी। 150 करोड़ में बनी इस फिल्म का वर्ल्ड वाइड ग्रॉस कलेक्शन 396.7 करोड़ बताया गया। फिल्म का घरेलू कलेक्शन 260.7 करोड़ है। कार्तिक आर्यन की इस फिल्म ने कलेक्शन के मामले में 'सिंघम अगेन' को भी पीछे छोड़ दिया। 
      प्रभास, दीपिका पादुकोण और अमिताभ बच्चन की फिल्म 'कल्कि 2898 एडी' भी बॉक्स ऑफिस पर हिट हुई। फिल्म को दर्शकों ने पसंद किया। कलेक्शन की बात करें तो बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने 378.4 करोड़ का वर्ल्ड वाइड कलेक्शन किया। विजय सेतुपति की फिल्म 'महाराजा' कुछ अलग तरह की फिल्म रही, जिसमें सस्पेंस और थ्रिलर है। फिल्म की कहानी ने दर्शकों को बांध दिया था। अजय देवगन और आर माधवन की 'शैतान' भी हिट रही। इस हॉरर फिल्म को पसंद किया गया। फिल्म ने कलेक्शन भी अच्छा किया था और सिनेमाघरों में टिकी रही। इस लिस्ट में किरण राव के डायरेक्शन में बनी फिल्म 'लापता लेडीज' को भूला नहीं जा सकता। 'लापता लेडीज' में ज्यादातर नए कलाकार हैं, पर फिल्म के कथानक ने दर्शकों को बांधकर रखा। फिल्म की कहानी इतनी दमदार थी कि दर्शकों को वो अपने आसपास की घटना लगी। यह ओटीटी की सबसे ज्यादा देखने वाली फिल्म तो बनी, इसका वर्ल्डवाइड कलेक्शन तो बेहद सीमित 27.06 करोड़ रहा। वहीं घरेलू कलेक्शन भी 20.58 करोड़ रहा।
    साल की शुरुआत में आई ऋतिक रोशन, दीपिका पादुकोण और अनिल कपूर की फिल्म 'फाइटर' को देखने वालों ने पसंद किया। लंबे समय से दर्शक ऋतिक और दीपिका की जोड़ी को देखने का इंतजार कर रहे थे। बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने 355.4 करोड़ का वर्ल्ड वाइड ग्रॉस कलेक्शन किया है। मल्टी स्टार फिल्म 'सिंघम अगेन' देखने वालों को अच्छी तो लगी, लेकिन यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर अपेक्षा के अनुरूप कलेक्शन नहीं कर सकी। पर, फिल्म ने हंसाया बहुत। रणवीर सिंह की एक्टिंग की अच्छी तारीफ हुई। उनकी परफॉर्मेंस से लोग बहुत प्रभावित हुए। राघव जुयाल और लक्ष्य की एक्शन फिल्म 'किल' में जबरदस्त मारधाड़ दिखाई गई। फिल्म की कहानी एक ट्रेन की थी, जिसमें बहुत खून खराबा होता है। इस लिस्ट की आखिरी फिल्म 'मंजुमेल बॉयज' एक सच्ची घटना पर आधारित है। ये तमिलनाडु के जंगलों में गुना केव्स की सच्ची घटना है। ये मलयालम फिल्म है, जिसे ओटीटी पर डब किया गया है। इसके अलावा 'देवरा-1' ने 443.8 करोड़ का वर्ल्ड वाइड ग्रॉस कलेक्शन किया। 
    हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए साल संतोषजनक कहा जाएगा। कुछ बड़े बजट की फिल्में बॉक्स ऑफिस पर फ्लॉप साबित हुई, तो कुछ कम बजट की फिल्मों ने धमाल मचाया। हॉरर-कॉमेडी वाली फिल्मों को दर्शकों ने बहुत पसंद किया। पसंद भी इतना किया गया कि बॉक्स ऑफिस पर भी इन फिल्मों ने अच्छी कमाई की। 'मुंज्या' इस साल के शुरू में आई, जिसे देखकर हर दर्शक प्रभावित हुआ। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर इतना धमाल मचाया कि दर्शक चौंक गए। 'मुंज्या' ने बॉक्स ऑफिस पर 132 करोड़ का कलेक्शन किया। जबकि, फिल्म का बजट 30 करोड़ के आसपास रहा। श्रद्धा कपूर और राजकुमार राव की फिल्म 'स्त्री-2' अगस्त में रिलीज हुई। फिल्म के साथ दो और बड़ी फिल्में आईं थीं। 'स्त्री-2' ने दोनों बड़ी फिल्मों को पटखनी देकर बॉक्स ऑफिस पर धमाल कर दिया। 'स्त्री-2' साल की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्मों में से एक है। इस फिल्म ने वर्ल्ड वाइड 840 करोड़ का कलेक्शन किया। जबकि, फिल्म की लागत 50 करोड़ थी। ऐसी फिल्मों में कार्तिक आर्यन की 'भूल भुलैया-3' ने भी रंग जमाया। ये फिल्म दर्शकों को डराने के साथ हंसाती भी है। 'भूल भुलैया-3' का बजट 150 करोड़ था और इसने बॉक्स ऑफिस पर 450 करोड़ से ज्यादा का कलेक्शन किया। सोनाक्षी सिन्हा के डबल रोल वाली फिल्म 'काकुड़ा' ओटीटी पर रिलीज हुई थी। हॉरर कॉमेडी पसंद करने वालों के लिए ये अच्छी फिल्म रही। 
     फिल्मों के अलावा कलाकारों के लिए भी यह साल बेहतरीन साबित हुआ। लोगों ने कई कलाकारों के अभिनय को सराहा। इस साल अपनी अदाकारी से लोगों का दिल जीतने वाले कलाकारों का जिक्र किया जाए तो राजकुमार राव का नाम ही सबसे पहले आता है। यह साल इस अभिनेता के लिए सफल साबित हुआ। इस साल उनकी कई फ़िल्में सुपरहिट रही। राजकुमार राव और श्रद्धा कपूर की 'स्त्री-2' को दर्शकों का जबरदस्त प्यार मिला। फिल्म ने रिकॉर्ड तोड़ कमाई की। फिल्म में पंकज त्रिपाठी के अभिनय को भी पसंद किया गया। इस फिल्म ने उन्हें बॉक्स ऑफिस का महाराजा बना दिया।
   राजकुमार राव की हिट फिल्मों में 'श्रीकांत' भी है, जो मई में रिलीज हुई। इसमें राजकुमार ने एक दृष्टिहीन का किरदार निभाया है। इस फिल्म को अच्छी सफलता भी मिली। फिल्म ने 50.05 करोड़ का कलेक्शन किया। उनकी फिल्म 'विक्की विद्या का वो वाला वीडियो' फिल्म रिलीज हुई। इसमें उनके साथ तृप्ति डिमरी को देखा गया। इस कॉमेडी फिल्म की कहानी को दर्शकों ने पसंद किया, पर फिल्म चली नहीं। इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर सिर्फ 41.93 करोड़ रुपए का कलेक्शन किया। राजकुमार राव और जाह्नवी कपूर की फिल्म 'मिस्टर एंड मिसेज माही' का नाम भी इस सूची में है। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर 36.28 करोड़ का कलेक्शन किया। जाह्नवी और राजकुमार की जोड़ी को भी दर्शकों ने पसंद किया, पर फिल्म बॉक्स ऑफिस पर जलवा नहीं दिखा। 
      इस साल कई बड़े बजट वाली और बड़े कलाकारों की फ़िल्में आईं। लेकिन, कई फ़िल्में उम्मीद के मुताबिक बॉक्स ऑफ़िस कमाल नहीं कर सकी और न दर्शकों पर खास प्रभाव नहीं छोड़ सकी। आलिया भट्ट की फ़िल्म 'जिगरा' से लेकर कार्तिक आर्यन की चंदू चैंपियन, विक्की विद्या का वो वाला वीडियो समेत कई फिल्में हैं, जिन्होंने दर्शकों पर असर नहीं छोड़ा और इस वजह से बॉक्स ऑफिस पर भी फ्लॉप रही। आलिया भट्ट की फिल्म 'जिगरा' में भाई-बहन का प्रेम दिखाया गया। लेकिन, फिल्म बॉक्स ऑफिस पर असर नहीं दिखा सकी। इसका बॉक्स ऑफ़िस कलेक्शन: मात्र 55.05 करोड़ रुपए ही रहा। अक्षय कुमार, टाइगर श्रॉफ की फिल्म 'बड़े मियां छोटे मियां' भी उन फिल्मों में शामिल है जिसे दर्शकों ने नापसंद किया। फिल्म का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन भी 102.16 करोड़ रुपए रहा। पैरालंपिक में भारत को पहला गोल्ड मेडल दिलाने वाले मुरलीकांत पेटकर की जीवनी पर आधारित फिल्म 'चंदू चैंपियन' भी नहीं चली। कार्तिक आर्यन की इस फिल्म ने 88.14 करोड़ रुपए का कलेक्शन किया!
      इंडियन फुटबॉल टीम के मैनेजर और कोच सैयद अब्दुल रहीम की रियल लाइफ आधारित फिल्म 'मैदान' भी उम्मीद पर खरी नहीं उतरी। सैयद अब्दुल रहीम को इंडियन फुटबॉल का आर्किटेक्ट माना जाता है। इसमें अजय देवगन की मुख्य भूमिका है। फिल्म का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 71 करोड़ रुपए ही रहा! 1999 में इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट 814 और भारतीय इतिहास में अन्य हवाई जहाज अपहरण ने फिल्म 'योद्धा' के लिए प्रेरणा का काम किया। सिद्धार्थ मल्होत्रा, राशि खन्ना और दिशा पटानी मुख्य कलाकार है। 'योद्धा' ने बॉक्स ऑफिस पर सिर्फ 35.56 करोड़ रुपए कमाए। 
     शाहिद कपूर और कृति सेनन की फिल्म 'तेरी बातों में ऐसा उलझा जिया' इंजीनियर और रोबोट की प्रेम कहानी है। फिल्म को दर्शकों से ज्यादा प्यार नहीं मिला और 85.16 करोड़ रुपए पर बॉक्स ऑफिस कलेक्शन सिमट गया। राजकुमार राव और जाह्नवी कपूर की फिल्म 'मिस्टर और मिसेज माही' क्रिकेट के जुनून पर आधारित फिल्म है ,पर फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर पटखनी खा गई। फिल्म ने सिर्फ 35.55 करोड़ रुपए कमाए! राजकुमार राव और तृप्ति डिमरी की फिल्म 'विक्की विद्या का वो वाला वीडियो' में कॉमेडी जरूर थी लेकिन फिल्म बॉक्स ऑफिस पर पूरी तरह फ्लॉप रही। 
      फिल्मों के दर्शक अब ओटीटी तरफ भी जाने लगे हैं और इसका सबसे बड़ा प्रमाण है संजय लीला भंसाली की वेब सीरीज 'हीरामंडी: द डायमंड बाजार' के सुपरहिट होने का। ओटीटी पर रिलीज के बाद से इस सीरीज ने तहलका मचा दिया। 'हीरामंडी' ने ग्लोबल लेवल पर भी अपना असर दिखाया। शानदार विज़ुअल्स, बेहतरीन संगीत, बांधने वाली कहानी, निर्देशन और कलाकारों के बेहतरीन परफॉर्मेंस ने दर्शकों के साथ समीक्षकों का भी दिल जीत लिया। गूगल ट्रेंड्स में ये वेब सीरीज साल 2024 की सबसे ज्यादा सर्च की जाने वाली सीरीज बन गई। ग्लोबल लिस्ट में जगह बनाने वाली यह एकमात्र भारतीय वेब सीरीज है। इसके अलावा मिर्जापुर-3, ग्यारह ग्यारह, पंचायत-3, सिटाडेल : हनी बनी, मर्डर इन माहिम और शेखर होम को दर्शकों ने पसंद किया। 
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Sunday, December 15, 2024

एक तरफा नाकाम मोहब्बत का फलसफा

   मोहब्बत कई तरह की होती है। दो तरफ़ा हो, तो उसे सफल मोहब्बत कहा जाता है। लेकिन, एक तरफा मोहब्बत भी कम नहीं होती। ऐसी मोहब्बत हमेशा एक नई कहानी को जन्म देती है। इस विषय पर कई फ़िल्में बनी, जिनमें एकतरफा मोहब्बत पर पूरी कहानी गढ़ दी गई। ऐसी मोहब्बत को समझने के लिए कुछ साल पहले आई 'ऐ दिल है मुश्किल' का एक डायलॉग मौजूं है। यह था 'एकतरफा प्यार की ताकत ही कुछ और होती है, औरों के रिश्तों की तरह ये दो लोगों के बीच नहीं बंटती, सिर्फ मेरा हक है इस पर!' वास्तव में यह डायलॉग कई लोगों की जिंदगी का फलसफा है। किंतु, ऐसी मोहब्बत पर आई फिल्म 'डर' एकतरफा मोहब्बत का काला पक्ष दर्शाती है। 
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- हेमंत पाल

     जब से फ़िल्में बनना शुरू हुई, प्रेम कथाओं का कथानकों में सबसे ज्यादा उपयोग किया गया। विषय कोई भी हो, प्रेम उसमें स्थाई भाव की तरह समाहित रहा। यहां तक कि युद्ध कथाओं और डाकुओं की फिल्मों में भी प्रेम को किसी न किसी तरह जोड़ा गया। न सिर्फ जोड़ा गया, बल्कि उस कथा को अंत तक निभाया भी। प्रेम कहानी में प्रेमी और प्रेमिका दोनों की भूमिका होती है, इसलिए कथानक को विस्तार देना मुश्किल नहीं होता। लेकिन, कुछ फ़िल्में ऐसी भी बनी, जिनमें प्यार को सिर्फ एकतरफा दिखाया गया। यानी प्रेमी या प्रेमिका में से कोई एक ही आगे कदम बढ़ाता है, दूसरा या तो वहीं खड़ा रहता है या पीछे हट जाता है। देखा गया कि ऐसी फिल्मों का कथानक हमेशा ही उलझा हुआ रहा। क्योंकि, जरूरी नहीं, जिससे आप प्यार करो, वह भी आप से प्यार करे। ऐसी फिल्मों का लंबा हिस्सा प्रेम के बिखरे हिस्से को समेटने में ही निकल जाता है। लेकिन, प्यार अधूरा हो या एक तरफा, दर्द बहुत देता है। चंद फ़िल्में ऐसी भी बनी जिनमें एकतरफ़ा प्रेम हिंसा के अतिरेक तक पहुंचा। आशय यह कि अपनी मोहब्बत को पाने के लिए खून तक बहाया गया। फिर भी क्या उन्हें प्यार मिला हो, ये जरूरी नहीं है।  
       इस तरह की एकतरफा दर्द भरी प्रेम कथा पर बनी फिल्म 'देवदास' एक तरह से मील का पत्थर है। इस फिल्म की कहानी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के बंगाली उपन्यास पर आधारित है। इस एकतरफा प्रेम कथा पर अलग-अलग भाषाओं में कई फ़िल्में बनी। पहली बार 'देवदास' 1928 में रिलीज़ हुई थी। सबसे पहले बंगाली में बनी, फिर हिंदी में ही ये तीन बार बन चुकी है। साउथ में भी 'देवदास' पर फिल्म बनाई जा चुकी है। इस कहानी में एक वैश्या के प्यार में देवदास खुद को बर्बाद कर लेता है। जबकि, देवदास के इश्क में चंद्रमुखी अपने देवबाबू को भगवान मानने लगती है! एकतरफा प्यार में खुद को तबाह कर देने की सबसे चर्चित दास्तां 'देवदास' ही है। इसी कथानक पर संजय लीला भंसाली ने भी 2002 में 'देवदास' बनाई। फिल्म में मुख्य किरदार देव बाबू (शाहरुख खान), पारो यानी ऐश्वर्या राय और चंद्रमुखी यानी माधुरी दीक्षित ने निभाई थी। फिल्म में देव बाबू पारो से बहुत प्यार करता है। लेकिन, उसकी शादी नहीं हो पाती। वह एकतरफा प्यार में जब कुछ नहीं कर पाता, तो खुद को तबाह करता है। फिल्म के अंत में देव पारो के दरवाजे पर जाकर दम तोड़ देता है। ये फिल्म एकतरफा प्यार की सबसे सशक्त फिल्म मानी जाती है। 
     1999 में संजय लीला भंसाली ने ही सलमान खान, ऐश्वर्या राय बच्चन और अजय देवगन लेकर 'हम दिल दे चुके सनम' बनाई। इसमें समीर (सलमान खान) और नंदिनी (ऐश्वर्या राय) एक-दूसरे से बेइंतहा मोहब्बत करते हैं। लेकिन, अचानक परिवार वाले नंदिनी की शादी वनराज (अजय देवगन) से कर देते हैं। इसके बाद नंदिनी का प्यार समीर उससे दूर हो जाता है। वनराज नंदिनी से पहली नजर से प्यार करता है, और शादी के बाद उसका प्यार और बढ़ता है। लेकिन, किसी भी एकतरफा प्यार का सबसे बड़ा इम्तिहान तब होता है, जब उसे पता चलता कि उसकी पत्नी किसी दूसरे से प्यार करती है। यह फिल्म एकतरफा प्यार की ताकत को बहुत आगे लेकर जाती है। वनराज दोनों प्रेमियों को मिलाने की कोशिश में करता है। वनराज अपनी पत्नी को उसके प्रेमी से मिलाने लेकर जाता है। उसकी आंखों में आंसू होते हैं, लेकिन फिर भी वो पीछे नहीं हटता। किंतु, नंदिनी यह स्वीकार नहीं करती और पति के साथ लौट आती है। ये अपनी तरह की अनोखी प्रेम कहानी थी। 
    ऐसी चंद कहानियों में एक फिल्म यश चोपड़ा की 'डर' (1993) भी है जिसमें एकतरफा प्यार का हिंसक रूप सामने आता है। 'डर' नाकाम प्रेमियों की उस कहानी को बयां करती है, जिन्हें प्रेमी को खोने का डर सबसे ज्यादा होता है। शाहरुख़ खान (राहुल) फिल्म में जूही चावला (किरण) से एकतरफा प्यार करता है। जब जूही उसके प्यार को स्वीकार नहीं करती तो शाहरुख का प्यार पागलपन की हद तक चला जाता है। लेकिन, किरण तो सुनील (सनी देओल) को चाहती थी। 'डर' में एकतरफा प्यार का जो रूप दिखाया, वो काफी भयानक है। अंत में राहुल को किरण का पति सुनील मार देता है। 
    शाहरुख खान की एक और फिल्म 'कभी हां कभी ना' (1994) शुरुआती फिल्म थी। फिल्म की कहानी में शाहरुख़ एक लड़की सुचित्रा कृष्णमूर्ति को चाहता हैं, पर वो किसी और को। लेकिन, इस फिल्म का अंत खुशनुमा होता है। अमिताभ बच्चन की हिट फिल्म 'मुकद्दर का सिकंदर' में भी एकतरफा प्यार के दो किस्से थे। कथानक में एक गरीब बच्चे की मदद एक अमीर लड़की करती है। वो बच्चा उसे प्यार करने लगता है। बड़े होने तक और मरने तक उसे यह प्यार रहता है। लेकिन, वो लड़की किसी और को चाहती है। 'मुकद्दर का सिकंदर' में वो गरीब बच्चा अमिताभ थे और अमीर लड़की जयाप्रदा जिससे वे एकतरफा प्यार करते हैं। वहीं रेखा अमिताभ को चाहती है। फिल्म में अमजद खान भी रेखा से एकतरफा प्यार करते थे।
   आमिर खान की फिल्म 'लगान' (2001) भी ऐसी ही फिल्म थी, जिसमें एकतरफा प्यार का बहुत हल्का सा इशारा था। इस फिल्म में एकतरफा प्यार पनपता है भुवन (आमिर खान) के लिए एलिजाबेथ में। जब एलिजाबेथ गांव वालों को क्रिकेट सिखाने में मदद करती है, उसी दौरान वह अपना दिल भुवन को दे देती है। लेकिन, भुवन को इस बात का पता नहीं होता। क्योंकि, वह तो गौरी से प्यार करता है। फिल्म के अंत में जरूर दर्शकों को इस एकतरफा मोहब्बत का अंदाजा मिलता है। 
      2001 में ही आई 'दिल चाहता है' की कहानी में भी एकतरफा प्यार था। इस फिल्म ने दोस्ती में नया अध्याय जरूर जोड़ा। फिल्म की कहानी में तीनों दोस्तों को प्यार होता है। सिड (अक्षय खन्ना) को तलाकशुदा महिला तारा (डिंपल कपाड़िया) से एकतरफा प्यार हो जाता है। लेकिन, तारा उसे दोस्त ही समझती रहती है। जबकि, सिड को तारा की दोस्ती प्यार लगती है। अंत में उसका दिल टूट जाता है। ऐसी ही एक फिल्म 'कॉकटेल' आई थी, जिसकी कहानी एकतरफा आशिकों के लिए थी। ऐसा नहीं कि लड़का ही एकतरफा आशिक होता है। लड़की को भी एकतरफा इश्क हो सकता है। फिल्म में वही दिखाया गया। गौतम (सैफ अली) वेरॉनिका (दीपिका पादुकोण) एक जोड़े की तरह साथ रहते हैं। लेकिन, दोनों के बीच प्यार पूरा नहीं होता। इनके साथ डायना पेंटी (मीरा) भी रहती है। जब गौतम को मीरा से इश्क हो जाता है, तो वेरोनिका भी उससे प्यार करने लगती है। तब मामला गंभीर हो जाता है। 1997 में आई फिल्म 'दिल तो पागल है' में निशा (करिश्मा कपूर) और राहुल (शाहरुख खान) अच्छे दोस्त होते हैं। लेकिन निशा के दिल में राहुल के लिए दोस्त से बढ़कर जगह होती है। पर, वह यह बात राहुल से नहीं कहती। लेकिन राहुल की जिंदगी में जब पूजा (माधुरी दीक्षित) की एंट्री होती है, तो निशा का प्यार दिल में ही रह जाता है और राहुल-पूजा प्रेमी जोड़ा बन जाते हैं।
     करण जौहर की फिल्म 'ऐ दिल है मुश्किल' (2016) में एकतरफा प्यार की ताकत को दिखाया गया। किस तरह लड़के को लड़की से प्यार होता है लेकिन लड़की किसी और को चाहती है। रणबीर कपूर ने फिल्म में अयान का किरदार निभाया था। फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर तो कोई कमाल नहीं किया। लेकिन, एकतरफा मोहब्बत करने वालों को सीख जरूर दी। दो अजनबी टकराते हैं, फिर रिश्ते की शुरुआत होती है। अयान इसे प्यार समझ लेता है। लेकिन अनुष्का शर्मा (अलिजेह) इस रिश्ते को दोस्ती का नाम देती है। कहानी में अयान को अविजेह से प्यार रहता है। जबकि अलिजेह के लिए अयान सिर्फ एक अच्छा दोस्त होता है। 2005 में आई आदित्य दत्त की फिल्म 'आश‌िक बनाया आपने' में सोनू सूद (करण) तनुश्री दत्ता (स्नेहा) से एकतरफ़ा प्यार करते हैं। लेकिन, वे कभी बताते नहीं। लेकिन, जब स्नेहा इमरान हाशमी (विकी) से प्यार करने लगती हैं, तो करण अपने दोस्त विकी के खिलाफ साजिश रचकर उससे सब छीन लेता है। 
    आज के दौर में ऐसी फिल्मों में यादगार फिल्म 'रांझणा' (2013) है। आनंद एल राय ने सोनम कपूर, अभय देओल और धनुष को लेकर यह फिल्म बनाई। वाराणसी शहर की पृष्ठभूमि और हिंदू-मुस्लिम धर्मों के दो किरदारों की कहानी है। कुंदन (धनुष) बचपन से ही जोया (सोनम कपूर) से एकतरफा प्यार करता है। लेकिन, जोया जसजीत सिंह (अभय देओल) नाम के छात्र व यूनियन में चुनाव में सक्रिय लड़के से प्यार करती है। कहानी कुछ ऐसा मोड़ लेती है कि कुंदन की एक गलती की वजह से जसजीत सिंह की मौत हो जाती है। इसके बाद एक तरफा मुहब्बत एक नए मुकाम पर पहुंच जाती है। कुंदन अपना सब कुछ पहले ही जोया पर हार चुका होता है। अंत में जोया के कहने पर सब जानते हुए अपनी जान तक दे देता है। रणबीर कपूर की फिल्म 'ये जवानी है दीवानी' में भी दीपिका पादुकोण को एकतरफा प्यार करते दिखाया गया। 'बर्फी' फिल्म में रणबीर कपूर को इलियाना डिक्रूज के एकतरफा प्यार में दीवाना दिखाया था। इसके अलावा मेरी प्यारी बिंदु, रॉकस्टार, मोहब्बतें और 'जब तक है जान' भी वे फ़िल्में हैं जिनका कथानक एकतरफा प्यार पर केंद्रित था।  
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स्वप्नीली नीली आंखों का वो रंगीन जादू

   भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े फिल्ममेकर्स रहे राज कपूर ने सिर्फ हिंदी सिनेमा को ही समृद्ध नहीं किया, उन्होंने विश्व सिनेमा पर अपनी अमिट छाप छोड़ी। 'द ग्रेटेस्ट शोमैन' के नाम से मशहूर इस स्वप्नीली नीली आंखों वाले बहुमुखी कलाकार ने फिल्म मेकिंग, एक्टिंग और डायरेक्शन में ऐसा जबरदस्त कमाल किया, जो आज भी प्रेरणा देता है। उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर आरके फिल्म्स, फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन और एनएफडीसी ने एक साथ मिलकर एक खास उत्सव मना रहे हैं। इसमें उनकी 10 चुनिंदा फ़िल्में प्रदर्शित की जाएगी। राज कपूर का जन्म 14 दिसंबर 1924 को हुआ और 1988 में उनका निधन हो गया था। आज वे होते तो 100 साल के होते।  

- हेमंत पाल
  
     सिनेमा के ग्रेटेस्ट शोमैन राज कपूर के बारे में जिन्हें लगता था कि उनके बाद हिंदी फिल्मों का शो थम जाएगा, वे कहीं न कहीं गलत थे। लेकिन, यदि वे आज जीवित होते, तो देखते कि फिल्म प्रशंसक उनकी सौंवी जयंती मना रहे हैं। 'मेरा नाम जोकर' में उन्होंने सच कहा था 'कल खेल में हम हो न हो गर्दिश में सितारे रहेंगे सदा' और जाइएगा नहीं शो अभी खत्म नहीं हुआ। अब लगने लगा कि राज कपूर ने खेल खेल ही में ही, लेकिन सच ही कहा था कि शो अभी खत्म नहीं हुआ! उनकी जन्म शताब्दी के अवसर पर आरके फिल्म्स, फिल्म हेरिटेज फाउंडेशन और एनएफडीसी ने एक साथ मिलकर एक खास उत्सव मना रहे हैं। इसमें 40 शहरों के 135 सिनेमाघरों में राज कपूर की 10 फिल्में प्रदर्शित की जाएंगी। 'राज कपूर 100 : सेलिब्रेटिंग द सेंटेनरी ऑफ द ग्रेटेस्ट शोमैन' नाम का यह उत्सव 13 दिसंबर 15 दिसंबर तक चलेगा। इस दौरान राज कपूर की फिल्मों की स्क्रीनिंग पीवीआर-आईनॉक्स और सिनेपोलिस सिनेमाघरों में आग, बरसात, आवारा, श्री 420, जागते रहो, जिस देश में गंगा बहती है, संगम, मेरा नाम जोकर, बॉबी और 'राम तेरी गंगा मैली' का प्रदर्शन किया जाएगा। 
     राज कपूर के बेटे रणधीर कपूर ने कहा भी है कि राज कपूर सिर्फ फिल्ममेकर नहीं दूरदर्शी थे। उन्होंने भारतीय सिनेमा की भावनात्मक परंपरा को आकार दिया। उनकी कहानियां केवल फिल्में नहीं, बल्कि भावनात्मक यात्राएं हैं, जो पीढ़ियों को जोड़ती हैं। यह उत्सव उनके नजरिए को हमारी छोटी सी श्रृद्धांजलि है। उनके पोते रणबीर कपूर ने कहा कि हमें गर्व है, कि हम राज कपूर परिवार के सदस्य हैं। हमारी पीढ़ी एक ऐसे दिग्गज के कंधों पर खड़ी है, जिनकी फिल्मों ने अपने समय की भावनाओं को दर्शाया और दशकों तक आम आदमी को आवाज दी। उनकी टाइमलेस कहानियां प्रेरणा देती रहती हैं, और यह फेस्टिवल उस जादू का सम्मान करने और सभी को बड़े पर्दे पर उनकी विरासत का अनुभव करने के लिए आमंत्रित करने का हमारा एक तरीका है।
    निर्देशक, निर्माता और कलाकार के रूप में, राज कपूर आजादी के बाद के पहले दो दशकों में भारतीय सिनेमा के 'स्वर्ण युग' के दौरान भारत के अग्रणी फिल्म निर्माताओं में से एक बने। राज कपूर यथार्थ में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं। उनकी फिल्मों में सिक्के के दो पहलू दिखाए गए। जिसका एक पहलू आजादी के युग की आकांक्षाओं के दर्शन कराता है। दूसरा, हिंदी सिनेमा की वर्तमान स्थिति के सामने आईना रखने का काम करता है। सीधा सा सिद्धांत यही है 'दिल का हाल कहे दिलवाला सीधी सी बात न मिर्च मसाला।' उनका सिनेमा मांसल यौवन से लथपथ होने के बावजूद कथानक और घटनाक्रम के रूप में पूर्ण रूप से सात्विक था। यही था उनका बिना मिर्च मसाले वाला सिनेमा।
    राज कपूर की शुरुआती फिल्में लोकप्रिय संगीत और मेलोड्रामा के मिश्रण में गरीबी और जाति के बारे में जनजागरण लाने का प्रयास करती रही। श्री 420, जागते रहो,  बूट पालिश से लेकर 'आवारा' और 'जिस देश में गंगा बहती है' इसके बेहतरीन उदाहरण है। जिनमें राज कपूर ने चार्ली चैपलिन का भारतीयकरण कर फिर भी दिल भी दिल है हिन्दुस्तानी की तर्ज में सफलतापूर्वक पेश किया। इन सबके चलते राज कपूर एक करिश्माई कलाकार और निर्माता-निर्देशक  बन गए, जिन्होंने दुनियाभर में भारतीय फिल्मों का झंडा फहराने में कामयाबी पायी। उनके बाद की फिल्मों की चकाचौंध ने उन्हें हिन्दी फिल्मों के ग्रेटेस्ट शोमेन का दर्जा दिया, जो आज भी उनके नाम पर अखंडित ओहदा है। मदभरे गीत संगीत और दिल को छूने वाली कहानियों के साथ अल्हड़ प्रेम प्रसंगों के चलते राज कपूर बेहद लोकप्रिय हो गए। 
     इस दौरान भारतीय फिल्म इतिहास की सबसे बड़ी स्टार और सबसे प्रशंसित अभिनेत्रियों में से एक नरगिस के साथ उनकी अक्सर ऑन-स्क्रीन जोड़ी भी बनी। 1950 के दशक के मध्य में अपनी प्रसिद्धि के चरम पर आवारा और 'श्री 420' की रिलीज़ के बाद राज कपूर न केवल भारत में बल्कि पूरे दक्षिण एशिया, अरब दुनिया, ईरान, तुर्की, अफ्रीका और सोवियत संघ में भी एक मशहूर हस्ती थे। साथ ही, उन्होंने अभिव्यक्तिवादी छाया और गहरे फ़ोकस के अपने उपयोग से हिंदी सिनेमा की शैलीगत शब्दावली का विस्तार करने में मदद की। बाद के सालों में रंग में काम करते हुए वे उन लोगों में से थे, जिन्होंने हिंदी फ़िल्मों में तेज़ी से लंबे, विस्तृत और शानदार गीत अनुक्रमों को शामिल करना शुरू किया।
     उनकी सबसे बड़ी सफलता और खासियत थी उनके काम करने की स्टाइल। वह ऐसे काम करते थे, जिसकी कोई कल्पना नहीं कर सकता। मसलन 'जिस देश में गंगा बहती है' की कहानी सुनने के बाद शंकर जयकिशन ने यह कहा था कि बेहतर होगा वह इसका संगीत किसी दूसरे संगीतकार को दें, क्योंकि इसमें गानों की सिचुएशन ही नहीं है। इसी कथानक में राज कपूर ने सात दिन में ग्यारह गानों की सिचुएशन निकालकर सभी को अचंभित कर दिया। कहा जाता है कि वह अपनी फिल्मों के संगीत को दर्शकों से पास करवाकर कथानक का हिस्सा बनाते थे। इसी तारतम्य में एक बात यह भी चर्चित है कि वे अपनी फिल्मों के गानों को पहले किन्नरों को बुलाकर सुनाते थे और उनकी सहमति के बाद उसे फिल्म में जोड़ते थे। उनकी फिल्मों में आजादी के बाद के भारत के आम आदमी के सपने, गांव और शहर के बीच का संघर्ष और भावनात्मक कहानियां जीवंत हो उठती थीं। आवारा, श्री 420, संगम, और 'मेरा नाम जोकर' जैसी फिल्में आज भी सिनेमा प्रेमियों के दिलों में बसी हुई हैं।
    राज कपूर का जन्म पठानी हिन्दू परिवार में हुआ था। पांच भाइयों और एक बहन में सबसे बड़े राज कपूर ने अपनी शिक्षा सेंट जेवियर्स कॉलेजिएट स्कूल, कोलकाता और कर्नल ब्राउन कैंब्रिज स्कूल देहरादून से ली। बाद में 1930 के दशक में उन्होनें बॉम्बे टॉकीज़ में क्लैपर-बॉय और पृथ्वी थिएटर में एक अभिनेता के रूप में काम किया, ये दोनों कंपनियाँ उनके पिता पृथ्वीराज कपूर की थीं। राज कपूर बाल कलाकार के रूप में इंकलाब (1935) और हमारी बात (1943), गौरी (1943) में छोटी भूमिकाओं में कैमरे के सामने आ चुके थे। राज कपूर ने फ़िल्म वाल्मीकि (1946), नारद और अमरप्रेम (1948) में कृष्ण की भूमिका निभाई थी। इन तमाम गतिविधियों के बावज़ूद उनके दिल में एक आग सुलग रही थी कि वे स्वयं निर्माता-निर्देशक बनकर अपनी स्वतंत्र फ़िल्म का निर्माण करें। उनका सपना 24 साल की उम्र में फ़िल्म आग (1948) के साथ पूरा हुआ। उन्होंने प्रमुख भूमिका भी 'आग' में ही निभाई, जिसका निर्माण और निर्देशन भी उन्होंने स्वयं किया था। 
    इसके बाद राज कपूर के मन में अपना स्टूडियो बनाने का विचार आया और चेम्बूर में चार एकड़ ज़मीन लेकर 1950 में उन्होंने अपने आरके स्टूडियो की स्थापना की और 1951 में ‘आवारा’ में रूमानी नायक के रूप में ख्याति पाई। राज कपूर ने ‘बरसात’ (1949), ‘श्री 420’ (1955), ‘जागते रहो’ (1956) व ‘मेरा नाम जोकर’ (1970) जैसी सफल फ़िल्मों का निर्देशन व लेखन किया और उनमें अभिनय भी किया। उन्होंने ऐसी कई फ़िल्मों का निर्देशन किया, जिनमें उनके दो भाई शम्मी कपूर व शशि कपूर और तीन बेटे रणधीर, ऋषि व राजीव अभिनय कर रहे थे। यद्यपि उन्होंने अपनी आरंभिक फ़िल्मों में रूमानी भूमिकाएँ निभाईं, लेकिन उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध चरित्र ‘चार्ली चैपलिन’ का ग़रीब, लेकिन ईमानदार ‘आवारा’ का प्रतिरूप है। उनका यौन बिंबों का प्रयोग अक्सर परंपरागत रूप से सख्त भारतीय फ़िल्म मानकों को चुनौती देता था। 
      राज कपूर ने बरसात (1949), श्री 420 (1955), जागते रहो (1956) व मेरा नाम जोकर (1970) जैसी सफल फ़िल्मों का निर्देशन व लेखन किया और उनमें अभिनय भी किया। उन्होंने ऐसी कई फ़िल्मों का निर्देशन किया, जिनमें उनके दो भाई शम्मी कपूर व शशि कपूर और तीन बेटे रणधीर, ऋषि व राजीव अभिनय कर रहे थे। उन्होंने अपनी आरंभिक फ़िल्मों में रूमानी भूमिकाएँ निभाईं, लेकिन उनका सर्वाधिक प्रसिद्ध चरित्र ‘चार्ली चैपलिन‘ का ग़रीब, लेकिन ईमानदार ‘आवारा’ का प्रतिरूप है। उनका यौन बिंबों का प्रयोग अक्सर परंपरागत रूप से सख्त भारतीय फ़िल्म मानकों को चुनौती देता था। मेरा नाम जोकर, संगम, अनाड़ी, जिस देश में गंगा बहती है, उनकी कुछ बेहतरीन फिल्में रही। बॉबी, राम तेरी गंगा मैली, प्रेम रोग जैसी हिट फिल्मों का निर्देशन भी किया।
    राज कपूर फिल्मों में जितने गैर-रोमांटिक नजर आते थे, वास्तविक जीवन में उतने ही रोमांटिक थे। उनकी रूमानी तबीयत के कारण उनकी पत्नी कृष्णा राज कपूर के साथ नर्गिस, पद्मिनी और वैजयंती माला जैसी भारतीय नायिकाओं के संबंधों से काफी परेशान रहती थीं। इसके चलते वह कई बार उनका घर भी छोड़ देती थीं। विवादों से भी उनका नाता कम नहीं रहा है। 1978 में, उन्होंने लता मंगेशकर से वादा किया कि वह उनके भाई हृदयनाथ मंगेशकर को फिल्म ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ में संगीत निर्देशक के रूप में नियुक्त करेंगे। लेकिन, जब लता मंगेशकर एक संगीत दौरे पर संयुक्त राज्य अमेरिका गई थी, तब उन्होंने इस फिल्म के लिए हृदयनाथ मंगेशकर की जगह लक्ष्मीकांत प्यारेलाल को संगीत निर्देशक बना दिया। इसके बाद लता मंगेशकर उनसे नाराज हो गईं। लेकिन, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के निवेदन के बाद उन्होंने इस फिल्म के लिए भी गीत गाए।  
      राज कपूर को फिल्मों में जो सफलता मिली वह टीम वर्क का ही परिणाम था। उनके पास ख्वाजा अहमद अब्बास, जैनेन्द्र जैन और इंदर राज आनंद जैसे लेखक थे, जिन्होंने समय के साथ उनके लिए एक से बढ़कर एक फिल्म लिखी। उनकी फिल्मों से ज्यादा उसका संगीत लोकप्रिय हुआ, जिसमें शंकर जयकिशन के साथ हसरत और शैलेन्द्र की जोड़ी और मुकेश की आवाज के योगदान को खुद राजकपूर भी नहीं नकार सके। इसके अलावा उनके साथ नर्गिस दत्त की जोड़ी परदे पर जादू सा कमाल करती थी। यही कारण था कि एक बार जब फिल्मों के रिमेक का दौर चला, राज कपूर से 'आवारा' के रीमेक की बात की गई तो उन्होंने कहा आप मुझे नरगिस, शंकर जयकिशन, शैलेन्द्र हसरत और मुकेश ला दीजिए मैं आपको इससे भी बेहतर आवारा दे दूंगा। 
    नई दिल्ली के रीगल सिनेमा से राजकपूर को खासा लगाव था। उनकी हर फिल्म का प्रीमियर यहीं होता था। वे पहले शो में मौजूद रहकर हवन करवाते थे। राजकपूर और नर्गिस ने रीगल के फैमिली बॉक्स में बैठकर कई फिल्में देखी थी। 1978 में जब बोल्ड दृश्यों के कारण कई सिनेमाघरों ने 'सत्यम शिवम सुंदरम' को प्रदर्शित करने से इंकार कर दिया, तब रीगल ने इसे बिना किसी झिझक के प्रदर्शित किया। ऋषि कपूर की बतौर नायक पहली फिल्म 'बॉबी' का प्रीमियर भी यहीं हुआ था। 30 मार्च 2017 को जब रीगल सिनेमा बंद हुआ, तब भी उसके अंतिम शो में 'मेरा नाम जोकर' का ही प्रदर्शन किया गया था।
    राज कपूर की फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर पैसा कमाया, बल्कि उनकी झोली में पुरस्कार भी बेशुमार गिरे। 1960 में फिल्म 'अनाड़ी' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार से सम्मानित किया। 1962 में फिल्म 'जिस देश में गंगा बहती है' के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता पुरस्कार से नवाजा गया। 1965 में उन्हे 'संगम' के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार दिया गया। राज कपूर को कला के क्षेत्र में भारत सरकार द्वारा सन् 1971 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था।1972 में फिल्म 'मेरा नाम जोकर' सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार से सम्मानित किया।1983 में उन्हे फिल्म 'प्रेम रोग' के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक पुरस्कार दिया गया। उन्हे जीवन का सबसे बडा और आखिरी दादा साहब फाल्के पुरस्कार 1987 में मिला। इस पुरस्कार को लेने वह दिल्ली गए। 2 जून को जब राष्ट्रपति भवन में यह पुरस्कार दिया जा रहा था। भावावेश में उन्हें दमे का इतना जोरदार अटैक आया कि वह मंच तक नहीं पहुंच सके। राष्ट्रपति ने शिष्टाचार तोड़कर उनके पास जाकर उन्हें पुरस्कार सौंपा। इसके बाद वह दिल्ली के अस्पताल में ही भर्ती रहे, यहीं फिल्मी दुनिया का 'एक तारा न जाने कहां खो गया!'
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Wednesday, December 11, 2024

इन फिल्मों ने रूढ़ियों की बेड़ियां तोड़ी!

     हिंदी फिल्मों के इतिहास को उलट-पलट कर देखा जाए, तो हर दौर में चंद ऐसी फिल्में जरूर बनी, जिन्हें लीक से हटकर कहा जा सकता है। इन फिल्मों में तयशुदा ढर्रे से हटकर कुछ कहने और करने की कोशिश की गई। इनमें मनोरंजन नहीं था, बल्कि एक वैचारिक संदेश था, जो देखने वालों को झकझोरता था कि उनके आसपास जो चल रहा है, वो उससे वाकिफ हैं या नहीं! ऐसी फ़िल्में हर दौर में बनी, जिन्होंने कभी सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ आवाज उठाई, कभी ऐसी बेड़ियों को तोड़ा जो बंधन की तरह पैरों में पड़ी हैं। लेकिन, इनकी संख्या बहुत कम है। अछूत कन्या, बूट पॉलिश, जूली, गाइड, दो आंखे बारह हाथ और 'प्रेम रोग' वे फ़िल्में थी, जिनके कथानक में नई सोच थी। पर, अब कोई ऐसी फ़िल्में बनाने का साहस नहीं करता!
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- हेमंत पाल

     फिल्मों के कथानक किस प्रेरणा से गढ़े जाते हैं, यदि इस सवाल का जवाब खोजा जाए तो हर जवाब में जीवन के अनुभव, प्रेम कथाएं, सामाजिक परम्पराएं, अनोखी घटनाएं, सामाजिक रूढ़ियां और पारिवारिक रिश्ते ही शामिल होंगी। अभी तक बनी फिल्मों के कथानकों पर सरसरी नजर दौड़ाई जाए, यही पांच-छह विषय ही सामने आएंगे। लेकिन, जिस विषय पर सबसे कम कथानक रचे गए, वो है सामाजिक रूढ़ियां या यूं कहिए कि मान्यताओं को खंडित करने वाली फ़िल्में। 
   यानी ऐसे रीति-रिवाज जो बरसों से समाज में हैं और उन्हें न चाहते हुए भी ढोया जा रहा है। कुछ लोग उन्हें तोड़ना भी चाहते हैं, पर आगे बढ़कर कोई साहस नहीं करता! जब भी इन विषयों पर फिल्मों के कथानक बने, उनकी संख्या उंगलियों पर गिनने लायक है। इसके पीछे कारण यह भी कहा जा सकता है, कि फिल्मकार ऐसे मामलों में उलझना नहीं चाहते! उन्हें पता है कि यदि सामाजिक स्तर पर फिल्म का विरोध हुआ, तो इसका खामियाजा सिर्फ निर्माता-निर्देशक को ही भुगतना पड़ता है। लेकिन, फिर भी कुछ फिल्मकारों ने ऐसी फ़िल्में बनाई, जो दर्शकों ने पसंद की। 
    गुलामी के दौर में बनी फ्रांज़ ऑस्टेन की फिल्म 'अछूत कन्या' (1936) का निष्कर्ष था कि फिल्मों के जरिए सुधारवाद की बात कैसे की जाए! ज्वलंत मुद्दों पर आधारित कहानियों को तब सामने लाना आसान नहीं था। वह भी ऐसे समय में, जब फ़िल्मों के विषय समाज और राजनीति के हिसाब से तय होते हों। फिल्म में एक ब्राह्मण लड़के अशोक कुमार और एक अछूत कन्या देविका रानी के बीच प्रेम कहानी को दिखाकर, ऐसे समाज में जीने की बात की गई थी, जो वर्गों में बंटा हो। इस प्रकार के विचारशील मुद्दे पर बनी इस फिल्म को महात्मा गांधी द्वारा भी सराहा था। लेकिन, बाद में किसी ने ऐसा साहस नहीं किया। आजादी के बाद 1954 में पहली ऐसी फिल्म 'बूट पॉलिश' बनी, जिसमें मानवीय मूल्यों को उजागर करने की कोशिश की गई थी। क्योंकि, देश तो आजाद था, पर दिलों से गुलामी के बंधन नहीं टूटे थे।
    ऐसे समय में 'बूट पॉलिश' जैसी फिल्म एक अलग तरह का अहसास थी। यह फिल्म दो बच्चों भोला और बेलू की कहानी थी। 'बूट पॉलिश' को अन्य फिल्मों के मुकाबले अलग दर्जा मिला। क्योंकि, इस फ़िल्म में सहजता से बताया गया था कि कोई भी काम छोटा या बड़ा हो, वह आत्मनिर्भर जरूर बनाता है। भोला और बेलू भी मेहनत करके कमाई का रास्ता नहीं छोड़ते। एक दिन अपनी कमाई से वे बूट पॉलिश और ब्रश खरीदते हैं और चिल्ला कर कहते हैं 'आज से हमारा हिंदुस्तान आजाद होता है!' राज कपूर ने अपने दम से इस फ़िल्म को अलग बनाया। राज कपूर हमेशा प्रेम पर आधारित फिल्में बनाते रहे थे। 'बूट पॉलिश' उनकी इस फिल्म से उलट थी।
     इसके कुछ साल बाद 1957 में वी शांताराम की फिल्म 'दो आंखें बारह हाथ' आई, जो कुछ अलग थी। अपने अनोखे विषय और सभ्य समाज में रहन-सहन के कथित आदर्शों के उलट इस कहानी की वजह से यह फिल्म कसौटी पर खरी उतरी। तब कैदियों को जेल में पीड़ितों की तरह रखा जाता था। ज़िंदगी में किए अपराधों की वजह से उनकी जवानी खो जाती थी। इस फिल्म ने इस धारणा को बदला। फ़िल्म का मुख्य विषय था खूंखार अपराधियों को सुधारने के लिए अहिंसक तरीके अपनाना। यह कहानी जेल वार्डन के इर्द-गिर्द घूमती है, जो छह कैदियों को अच्छा इंसान बनने की राह पर लाता है। 
    इसी साल आई 'शारदा' (1957) एलवी प्रसाद की फिल्म थी। इसकी कहानी भी अन्य फिल्मों से अलग थी। इसका घटनाक्रम कहीं ज़्यादा जटिल था। जब एक प्रेमी युगल एक-दूसरे से जुदा हो जाता है, तो कई अजीब चीजें होती हैं। नायक को एक युवती से प्यार हो जाता है, लेकिन वह उससे शादी नहीं कर पाता। कुछ अनोखी घटनाओं की वजह से, उसके पिता की उसी महिला से शादी हो जाती है! इसके बाद, एक सौतेली मां और बेटे के बीच का रिश्ता देखने को मिलता है, जिसके मायने ही कुछ और होते हैं। ये अपनी तरह की बिल्कुल अलग फिल्म थी। इसके अलावा 1963 में आई बिमल रॉय की फिल्म 'बंदिनी' में पहली बार मुख्य कलाकारों को बिल्कुल अलग तरीके से दिखाया गया। मुख्य किरदार कल्याणी के व्यक्तित्व के कई पहलू थे। प्रेमी को पाने और अधूरे प्यार के बीच फंसने से उपजी जलन की वजह से वह खून तक कर देती है। उसे जेल हो जाती है। सजा काटने के बाद, वह उसी आदमी के पास लौटकर उसी की हो जाती है।
    अलग तरह की फिल्मों के दौर में 1972 में आई कमाल अमरोही की 'पाकीजा' को भी गिना जाता है। यह मुगल दौर की नर्तकियों की जिंदगी की कहानी थी। फिल्म का कथानक तवायफ़ों को समाज में स्वीकार करने की राह में आने वाली अड़चनों को उजागर करना था। मीना कुमारी की इस यादगार फिल्म ने यह सवाल भी खड़े किए थे कि समाज के झूठ और ढोंग को मध्यम वर्ग कितनी सहजता से सह लेता है। आज भी फिल्म को दमदार और तीखे संवादों के लिए जाना जाता है। वैश्या विवाह पर बनी फिल्मों में देव आनंद और वहीदा रहमान की फिल्म कालजयी फिल्म 'गाइड' (1965) को भी गिना जाता है। इसकी कहानी अपने समय काल से काफी आगे की बोल्ड थी। ये फिल्म न सिर्फ वैश्या विवाह का समर्थन करती थी, बल्कि इसमें आज की तरह का लिवइन रिलेशन भी दिखाया था। 1966 में आई धर्मेंद्र, अशोक कुमार और सुचित्रा सेन की फिल्म 'ममता' भी वैश्या विवाह के समर्थन का संदेश देने वाली फिल्म थी।     
    रूढ़ियों को खंडित करने वाली एक फिल्म थी 1975 में आई 'जूली।' फिल्म में नए ज़माने की संवेदनशील लड़की बिना शादी के गर्भवती हो जाती है। इसके बाद उसे कई परेशानियों का सामना करना पड़ता है। धर्म और शादी के बीच की सदियों पुरानी रुकावटों के आधार पर होने वाले घटनाक्रम को इसमें अच्छी तरह से दिखाया था। एक बिन ब्याही मां का संघर्ष क्या होता है, यही इसका कथानक था। 'जूली' उन फिल्मों में थी, जिसमें एंग्लो इंडियन परिवार और उनके ईसाई मूल्यों का खास चित्रण था। लंबे विवाद के बाद 'जूली' की मां हिंदू से अपनी बेटी की शादी के लिए तब तक स्वीकृति नहीं देती, जब तक प्रेमी के पिता अपने पोते और एक खुशहाल परिवार को साथ बनाए रखने की हामी नहीं भरते। घिसी-पिटी रूढ़िवादी सोच के बजाए मानवीय मूल्यों को तरजीह देने की सीख इसी फिल्म ने दी थी। 
    1982 में आई राज कपूर की फिल्म 'प्रेम रोग' में देश के ग्रामीण इलाकों में रहने वाली विधवाओं की जिंदगी में आने वाली मुश्किलों को बहुत करीब से दिखाया था। फिल्म में राज कपूर ने प्रेमियों के माता-पिता को अपनी 'शान' के लिए अपनी बेटियों और बेटों की जान को दांव पर लगाने के खिलाफ चेतावनी दी थी। नायक देवधर (ऋषि कपूर) शहर से गांव आता है। उसकी बचपन की दोस्त मनोरमा (पद्मिनी कोल्हापुरी) अमीर और रसूख रखने वाले परिवार की लड़की होती है। उसकी शादी एक अमीर खानदान में कर दी जाती है। लेकिन, शादी के बाद मनोरमा के पति की मौत हो जाती है। विधवा मनोरमा ससुराल में बलात्कार का शिकार भी होती है। जब देवधर उसे बचाने के लिए आगे आता है, तब मनोरमा का परिवार विधवा के पुनर्विवाह के नामुमकिन होने का हवाला देकर, उसके साथ मारपीट करता है। भले ही, 'प्रेम रोग' काफ़ी हद तक एक ऐसी कहानी है, जिसमें मौजूद अंतर्निहित मायने फ़िल्म के दौरान महसूस होते हैं, लेकिन राज कपूर के निर्देशन ने इसे एक सुधारवादी क्लासिक फ़िल्म के तौर पर स्थापित कर दिया था।  
    यश चोपड़ा की फिल्म 'लम्हे' (1991) भी ऐसी ही फिल्म थी, जिसके कथानक में प्रेमी-प्रेमिका, लड़का-लड़की और प्यार-मोहब्बत इन सबकी परिभाषा बदल दी थी। यह फिल्म दूसरी प्रेम कहानियों से बिल्कुल अलग थी। कथानक के मुताबिक, वीरेन एक लड़की पल्लवी से प्यार करता था। पल्लवी की शादी किसी और से शादी हो जाती है। लेकिन, कुछ समय बाद पति-पत्नी की मौत हो जाती है। पल्लवी और उसका पति अपने पीछे एक बेटी को छोड़ जाते हैं। जब यह बेटी बड़ी हुई, तो वो हूबहू अपनी मां पल्लवी (श्रीदेवी) की कॉपी होती है। उसे अपने पिता की उम्र के विरेन (अनिल कपूर) से प्यार हो जाता है। फिल्म का यह विषय देखने वालों के लिए असहनीय जरूर था, यह बहस का विषय भी बना। लेकिन, फिल्म में इस बेमेल प्यार को खूबसूरत अंदाज में दिखाया गया था।
      लीक से हटकर बनी फिल्मों में मेघना गुलजार की 'फ़िलहाल' को भी गिना जा रखा सकता है। आज बच्चे को जन्म देने के लिए सरोगेसी आम तरीका है। लेकिन, साल 2002 में जब यह फिल्म रिलीज हुई थी, तब यह बड़ी बात हुआ करती थी। ये कहानी एक ऐसी औरत की है, जो प्राकृतिक रूप से मां नहीं बन सकती। इसलिए वह अपने दोस्त को अपने लिए सरोगेट करने के लिए मनाती है। तब्बू, सुष्मिता सेन, पलाश सेन और संजय सूरी की यह फिल्म बेहद इमोशनल अनुभव रहा। इसके साल भर बाद 2003 में आई 'मातृभूमि' ऐसी फिल्म थी, जिसे देखने लायक फिल्म थी। 
    यह ऐसे समाज की कल्पना थी, जहां औरतों की संख्या कम होकर ना के बराबर बची थी। ऐसे दौर में शादी और परिवार के लिए पुरुषों को लड़कियां नहीं मिलती। इस कारण होने वाले व्यसन फिल्म में दिखाए गए। लड़कियों को भ्रूण में ही मार देने की वजह से पैदा हुई ये स्थिति बहुत भयावह और रोंगटे खड़े करने वाली है। मनीष झा के निर्देशन में बनी इस फिल्म को देखना आसान नहीं है। क्योंकि, इसका ट्रीटमेंट मनोरंजक नहीं है। अब ऐसी फ़िल्में बनने का दौर करीब-करीब ख़त्म हो गया। इसका कारण यह भी है कि अब फिल्म महज मनोरंजन का साधन बनकर रह गईं, अब कोई फिल्मों से ऐसी उम्मीद नहीं करता कि रूढ़ियां खंडित हों!  
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