Tuesday, March 3, 2026

रंग, राग और परदे की मस्तीभरी होली

     भारतीय संस्कृति में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि रिश्तों, राग और रस का पर्व भी है। यही कारण है कि हिंदी सिनेमा ने भी इस पर्व को केवल एक दृश्य उत्सव की तरह नहीं, बल्कि भावनाओं के स्वरूप में प्रस्तुत किया। ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों के दौर में भी होली गीतों ने परदे पर रंगों का ऐसा भ्रम रचा था कि दर्शक सिनेमा हॉल में बैठे-बैठे भी अपने आपको रंगों में सराबोर महसूस करते थे। समय के साथ तकनीक बदली, रंगीन फिल्में आईं, संगीत की शैली बदली, लेकिन होली गीतों की मस्ती, छेड़छाड़, प्रेम और सामाजिक संकेतों की परंपरा कायम रही। 
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● हेमंत पाल

     हिंदी फिल्मों में होली गीत केवल उत्सव का दृश्य नहीं होते। वे अक्सर कहानी के महत्वपूर्ण मोड़ का संकेत देते हैं। कई बार नायक-नायिका का प्रेम होली के बहाने खुलकर सामने आता है, तो कभी दुश्मनी या षड्यंत्र की भूमिका तैयार होती है। होली का रंग सामाजिक बंधनों को तोड़ने का प्रतीक है, इसलिए फिल्मों में यह पर्व फिल्म के किरदारों को खुलकर अपनी भावनाएं व्यक्त करने का अवसर देता है। 'बुरा न मानो होली है' की आड़ में छुपे संवाद और इशारे कहानी को आगे बढ़ाते हैं और कई बार कहानी में नया मोड़ भी देते हैं। ब्लैक एंड व्हाइट से लेकर डिजिटल सिनेमा तक की यात्रा में तकनीक ने होली गीतों को ज्यादा भव्य बना दिया। स्लो मोशन शॉट्स, एरियल कैमरा, रंगों की डिजिटल प्रस्तुति और बड़े सेट्स ने इन्हें दृश्यात्मक रूप से आकर्षक बनाया है। 
    संगीत की दृष्टि से भी परिवर्तन आया। जहां पहले शास्त्रीय और लोकधुन प्रधान गीत थे, वहीं आज फ्यूजन और इलेक्ट्रॉनिक संगीत का बोलबाला है। फिर भी ढोल की थाप और लोक लय की ऊर्जा आज भी इन गीतों की आत्मा बनी हुई है। हिंदी फिल्मों में होली गीतों की यात्रा भारतीय समाज की बदलती संवेदनाओं का दर्पण है। 1950 के ग्रामीण और पारंपरिक उत्सव से लेकर आज के ग्लैमरस और वैश्विक मंच तक, होली गीतों ने हर दौर में खुद को ढाला है। वे केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रेम, विद्रोह, सामाजिक संवाद और उत्सव की सामूहिक चेतना का माध्यम रहे हैं। यही कारण है कि हर पीढ़ी के पास अपना एक पसंदीदा होली गीत है। चाहे वह रंग बरसे हो, बलम पिचकारी हो या फिर 'अंग से अंग लगाना' जैसा रोमांटिक गीत हो। 1950 और 60 के दशक में जब फिल्में ब्लैक एंड व्हाइट थीं, तब भी होली गीतों का विशेष स्थान था। उस समय होली के गीत लोकधुनों और शास्त्रीय संगीत पर आधारित होते थे। 'मदर इंडिया' का गीत 'होली आई रे कन्हाई' होली के पारंपरिक उत्सव और ग्रामीण भारत की झलक प्रस्तुत करता है। इसी तरह 'कोहिनूर' का लोकप्रिय गीत 'तन रंग लो जी आज मन रंग लो' शास्त्रीयता और उत्सवधर्मिता का सुंदर संगम था। इन गीतों में ढोलक, मंजीरा, हारमोनियम जैसे वाद्य प्रमुख रहते थे। कैमरा तकनीक सीमित थी, लेकिन समूह नृत्य, लोक वेशभूषा और भावनात्मक अभिनय से होली का माहौल सजीव कर दिया जाता था।
     जब सिनेमा रंगीन हुआ तो होली गीतों ने सचमुच रंगों की बौछार कर दी। 1975 में आई 'शोले' का गीत 'होली के दिन दिल खिल जाते हैं' आज भी होली का पर्याय माना जाता है। यह गीत केवल उत्सव नहीं, बल्कि कहानी के भीतर रिश्तों की गर्माहट और आगामी संघर्ष की भूमिका भी तैयार करता है। इसी तरह 'अमिताभ बच्चन यादगार फिल्म 'सिलसिला' का अमर गीत 'रंग बरसे भीगे चुनर वाली' जिसे अमिताभ ने खुद अपनी आवाज दी, प्रेम, छेड़छाड़ और सामाजिक बंधनों के बीच पनपती भावनाओं को दर्शाता है। यह गीत आज भी हर होली पार्टियों के मस्त माहौल की जान माना जाता है। इस दौर में होली गीत कहानी के निर्णायक मोड़ पर रखे जाते थे, जहां छिपे प्रेम का इजहार होता था या सामाजिक टकराव का संकेत मिलता था। इसी तरह कटी पतंग का 'आज न छोड़ेंगे बस हमजोली' प्रेम और चुलबुलेपन का प्रतीक बन गया। इस दौर के गीतों में रंगों के बहाने नायक-नायिका के बीच छेड़छाड़ और रोमांस को खुलकर दिखाया गया। संगीत में भी ऑर्केस्ट्रा और लोकधुनों का मिश्रण देखने को मिला।
    1990 के बाद हिंदी सिनेमा में व्यावसायिकता और भव्यता बढ़ी। होली गीत अधिक चटकीले, नृत्यप्रधान और बड़े सेट्स पर फिल्माए जाने लगे। शाहरुख़ खान की फिल्म 'डर' का गीत 'अंग से अंग लगाना' रोमांस और जुनून का मिश्रण था। वहीं 'बागबान' में 'होली खेले रघुवीरा' के जरिए पारिवारिक और पारंपरिक होली की झलक दिखाई दी थी। इस दौर में संगीत में सिंथेसाइज़र और आधुनिक वाद्यों का प्रयोग बढ़ा, लेकिन लोकधुन की छाप बनी रही। लेकिन, 2000 के बाद होली गीतों ने एक नया रूप लिया। इस दौर में पारंपरिकता के साथ पॉप और रॉक का मिश्रण दिखा। इस दौर के होली गीतों में डीजे मिक्स, रैप और इलेक्ट्रॉनिक बीट्स का प्रभाव है। सोशल मीडिया और रील्स के कारण ये गीत तेजी से लोकप्रिय होते हैं और त्योहार की पहचान बन जाते हैं। 2019 में आई 'बद्रीनाथ की दुल्हनिया' का टाइटल ट्रैक और होली आधारित धुन 'कुर्ती पे तेरी मलूं गुलाल' ने यह दिखाया कि अब होली गीत सिर्फ ग्रामीण या पारंपरिक नहीं, बल्कि शहरी और ग्लैमरस रूप में भी प्रस्तुत किए जा रहे हैं। हाल के वर्षों में 'गो पागल' (फिल्म जॉली एलएलबी 2) जैसे गीतों ने पार्टी कल्चर और होली के मेल को दर्शाया। यहां रंगों से ज्यादा बीट्स और डांस स्टेप्स पर ध्यान दिया गया।
    इसी तरह 'राम लीला' का गीत 'लहू मुंह लग गया' होली के रंगों को प्रेम और नाटकीयता के साथ प्रस्तुत करता है। जबकि, 'बलम पिचकारी जो तूने मुझे मारी' भी युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय हुआ। यह गीत दोस्ती, प्रेम और मस्ती का प्रतीक बन गया। फ़िल्मी होली में रंग बदलते रहे, तकनीक बदलती रही, लेकिन सिनेमा के होली गीतों की मस्ती और जीवंतता आज भी उतनी ही ताजा है, जितनी कभी ब्लैक एंड व्हाइट परदे पर थी। यही इन गीतों की सबसे बड़ी सफलता है। वे समय के साथ रंग बदलते हैं, पर अपनी आत्मा को सहेजे रखते हैं। आज भी जब होली आती है, तो सिनेमाई गीतों की धुनों के बिना रंग अधूरे लगते हैं। यही हिंदी सिनेमा के होली गीतों की सबसे बड़ी सफलता है, वे पर्दे से निकलकर लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं।
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फिर लौट आया सिनेमा का स्वर्णिम युग!

    भारतीय सिनेमा उद्योग लंबे उतार-चढ़ाव और तकनीकी बदलावों के दौर से गुजरते हुए आज एक ऐसे मुकाम पर खड़ा दिखाई देता है, जहां उसे फिर से 'स्वर्ण युग' जैसे विशेषणों से नवाजा जा रहा है। वर्ष 2025 के आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि महामारी के बाद जो आशंकाएं व्यक्त की जा रही थी कि क्या दर्शक सिनेमाघरों में लौटेंगे, क्या ओटीटी प्लेटफॉर्म थिएटरों को पीछे छोड़ देंगे, यह बात काफी हद तक गलत साबित हुई। दर्शकों की मजबूत वापसी, बॉक्स ऑफिस पर रिकॉर्ड कमाई और मल्टीप्लेक्स कंपनियों के मुनाफे में तेज उछाल यह संकेत देते हैं कि सिनेमा का सामूहिक अनुभव आज भी भारतीय दर्शकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। कुल मिलाकर 2025 में बॉक्स ऑफिस वृद्धि के पीछे तीन प्रमुख कारण रहे मजबूत फ्रेंचाइजी, बड़े सितारों की पैन-इंडिया अपील और बेहतर सिनेमा अनुभव। दर्शकों की थिएटर वापसी और सकारात्मक वर्ड-ऑफ-माउथ ने कमाई को नई रफ्तार दी।
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- हेमंत पाल

    बीते साल यानी 2025 में भारतीय फिल्मों का कुल ग्रॉस बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 13,395 करोड़ रुपए तक पहुंचना अपने आप में ऐतिहासिक उपलब्धि है। यह आंकड़ा महामारी से पहले के तीन वर्षों के औसत से 32% अधिक है, जो दर्शकों के व्यवहार में एक निर्णायक बदलाव को दर्शाता है। लंबे समय तक घरों में बंद रहने और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कंटेंट देखने के बाद जब दर्शकों को फिर से सिनेमाघरों में लौटने का अवसर मिला, तो उन्होंने इसे बड़े उत्साह के साथ अपनाया। तीसरी तिमाही में 4.05 करोड़ दर्शकों का सिनेमाघरों में पहुंचना और पिछले वर्ष की समान अवधि से 8.6% की वृद्धि यह स्पष्ट करती है कि थिएटर अब केवल मनोरंजन का विकल्प नहीं बल्कि सामाजिक अनुभव का केंद्र बन चुके हैं। इस सफलता के पीछे कई कारक काम कर रहे हैं। सबसे प्रमुख कारण मजबूत कंटेंट पाइपलाइन है। वर्ष 2025 में 100 करोड़ रुपए से अधिक कमाने वाली 37 फिल्मों का रिकॉर्ड बनना यह दर्शाता है कि निर्माताओं ने दर्शकों की पसंद को समझते हुए विविध विषयों पर फिल्में बनाई हैं। बड़े बजट की व्यावसायिक फिल्मों से लेकर छोटे बजट की कंटेंट-आधारित फिल्मों तक, दर्शकों को हर शैली और भाषा में विकल्प मिले। इससे सिनेमाघरों में लगातार भीड़ बनी रही और उद्योग को स्थिरता मिली।
     मल्टीप्लेक्स उद्योग, विशेषकर पीवीआर आइनॉक्स जैसी कंपनियों ने इस उछाल का भरपूर लाभ उठाया है। अक्टूबर-दिसंबर तिमाही में कंपनी का मुनाफा 166.5% बढ़कर 95.7 करोड़ रुपए तक पहुंचना केवल वित्तीय सफलता नहीं बल्कि पूरे प्रदर्शन तंत्र की मजबूती का संकेत है। कंपनी की कुल आय में 9% की वृद्धि और 1,919.6 करोड़ रुपए का आंकड़ा बताता है कि सिनेमाघर केवल टिकट बिक्री पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि फूड एंड बेवरेज, प्रीमियम अनुभव और ब्रांड साझेदारियों के जरिए भी राजस्व बढ़ा रहे हैं। औसत टिकट की कीमत का 293 रुपए तक पहुंचना और प्रति व्यक्ति खान-पान खर्च का 146 रुपए तक बढ़ना दर्शकों की खर्च करने की क्षमता और उनकी प्राथमिकताओं को दर्शाता है। आज का दर्शक केवल फिल्म देखने नहीं, बल्कि एक पूरे अनुभव के लिए सिनेमाघर जाता है। बेहतर स्क्रीन, उन्नत ध्वनि तकनीक, आरामदायक सीटें और विविध खान-पान विकल्प उसके लिए महत्वपूर्ण हो गए। यही कारण है कि टिकट की कीमत में वृद्धि के बावजूद दर्शकों की संख्या में गिरावट नहीं आई, बल्कि वृद्धि दर्ज की गई है।
    पीवीआर आईनॉक्स की रणनीति में छोटे शहरों और नए क्षेत्रों में विस्तार विशेष रूप से उल्लेखनीय है। 112 शहरों में 1,791 स्क्रीन का नेटवर्क यह दिखाता है कि सिनेमाघर अब केवल महानगरों तक सीमित नहीं रहे। टियर-2 और टियर-3 शहरों में स्क्रीन जोड़ने से नए दर्शक वर्ग तक पहुंच संभव हुई है। लेह और गंगटोक जैसे क्षेत्रों में विस्तार इस बात का संकेत है कि सिनेमा अब देश के हर कोने तक पहुंचने की क्षमता रखता है। दक्षिण भारत में 33% स्क्रीन का होना और उत्तर भारत में 27% स्क्रीन का वितरण क्षेत्रीय संतुलन को दर्शाता है। इस विस्तार का आर्थिक प्रभाव भी स्पष्ट है। मूवी एग्जीबिशन सेगमेंट से कमाई का चार गुना बढ़कर 159.3 करोड़ रुपए तक पहुंचना बताता है कि स्क्रीन बढ़ाने की रणनीति सफल रही है। साथ ही, वित्त लागत में 22.2 करोड़ रुपए की कमी और 27.1 करोड़ रुपए के टैक्स क्रेडिट ने कंपनी की लाभप्रदता को मजबूत किया है। यह संकेत देता है कि मल्टीप्लेक्स उद्योग अब केवल विस्तार नहीं बल्कि वित्तीय अनुशासन और दीर्घकालिक स्थिरता पर भी ध्यान दे रहा है। क्षेत्रीय सिनेमा की भूमिका इस स्वर्णिम दौर में अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। वर्ष 2025 में क्षेत्रीय फिल्मों का कुल बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 6,488 करोड़ रुपए तक पहुंचना बताता है कि भारतीय दर्शक अब केवल हिंदी फिल्मों तक सीमित नहीं हैं। मलयालम फिल्मों का लगातार दूसरे वर्ष 1,000 करोड़ रुपए से अधिक कमाई करना यह दिखाता है कि क्षेत्रीय उद्योग गुणवत्ता और कहानी कहने के स्तर पर नई ऊंचाइयों को छू रहा है। कन्नड़ सिनेमा की 74% और गुजराती सिनेमा की 188% वृद्धि यह साबित करती है कि स्थानीय कहानियां और सांस्कृतिक जुड़ाव दर्शकों को आकर्षित करने में अत्यंत प्रभावी हैं।
      भारतीय सिनेमा के लिए साल 2025 सही मायनों में यादगार रहा। इस साल महामारी के बाद गुम हुई सिनेमा संस्कृति पूरी तरह लौट आई और बड़े बजट, दमदार कंटेंट व पैन-इंडिया अपील ने बॉक्स ऑफिस को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। साल के शुरू में 'छावा' ने दर्शकों को आकर्षित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, तो साल के अंत में 'धुरंधर' की धमक ने दर्शकों को चमत्कृत कर दिया। इन एक्शन वाली फिल्मों से लगा कि दर्शक को ऐसी फ़िल्में ज्यादा पसंद आ रही है, तो यह भ्रम 'सैयारा' ने तोड़ दिया। इस प्रेम कहानी ने दर्शकों को मोहब्बत से सराबोर किया और आंखे भी गीली की। इस साल 'स्त्री-2' ऐसी फिल्म रही, जिसने कंटेंट की ताकत साबित की। हॉरर-कॉमेडी के सफल फॉर्मूले, मजबूत स्क्रिप्ट और राजकुमार राव-श्रद्धा कपूर की जोड़ी ने दर्शकों को आकर्षित किया। छोटे बजट में बड़े मुनाफे ने इसे ट्रेड की पसंदीदा फिल्म बनाया। 'पुष्पा-2' ने भी कमाई का सिलसिला जारी रखा। अल्लू अर्जुन के स्टारडम, सशक्त एक्शन और बड़े पैमाने पर रिलीज रणनीति ने इसे सर्वाधिक कमाई करने वाली फिल्मों में शामिल किया। एंटरटेनमेंट और यादगार डायलॉग इसकी ताकत बने। विजुअल ग्रैंड्योर और पौराणिक-साइंस फिक्शन मिश्रण से दर्शकों को 'कल्कि 2898 एड़ी' ने सिनेमाघरों तक खींचा। प्रभास, दीपिका पादुकोण और अमिताभ बच्चन की मौजूदगी तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर की तकनीक इसकी सफलता का आधार रही। इसके अलावा 'भूल भुलैया-3' जैसी कुछ मध्यम बजट की सामाजिक विषयों पर आधारित फिल्मों ने भी अच्छा प्रदर्शन किया। क्योंकि, दर्शक अब कंटेंट-ड्रिवन सिनेमा को प्राथमिकता दे रहे हैं।
     डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते प्रभाव के बावजूद सिनेमाघरों की लोकप्रियता का कारण यह भी है कि बड़े पर्दे का अनुभव अब भी अद्वितीय है। बड़े बजट की फिल्मों के दृश्य प्रभाव, ध्वनि और सामूहिक दर्शक प्रतिक्रिया को घर पर दोहराना कठिन है। इसके अलावा, मल्टीप्लेक्स कंपनियों ने प्रीमियम फॉर्मेट्स, विशेष स्क्रीनिंग और तकनीकी नवाचारों के जरिए सिनेमाघरों को आधुनिक बना दिया है। इससे युवा दर्शकों को आकर्षित करने में मदद मिली है। हालांकि, इस चमकदार तस्वीर के बीच कुछ चुनौतियां भी मौजूद हैं। टिकट कीमतों में लगातार वृद्धि भविष्य में मध्यम वर्ग और छोटे शहरों के दर्शकों पर प्रभाव डाल सकती है। यदि कीमत बहुत अधिक बढ़ती हैं तो दर्शक फिर से डिजिटल विकल्पों की ओर झुक सकते हैं। इसके अलावा, कंटेंट की गुणवत्ता बनाए रखना भी उद्योग के लिए बड़ी चुनौती है, क्योंकि दर्शक अब पहले से अधिक जागरूक और चयनात्मक हो चुके हैं। फिर भी, वर्तमान आंकड़े यह दर्शाते हैं कि भारतीय सिनेमा उद्योग ने महामारी के बाद न केवल खुद को पुनर्जीवित किया है बल्कि नए विकास मॉडल भी विकसित किए हैं। क्षेत्रीय भाषाओं का उदय, मल्टीप्लेक्स का विस्तार, प्रीमियम अनुभवों की मांग और विविध कंटेंट की उपलब्धता मिलकर एक मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र बना रहे हैं। निर्माता, वितरक और प्रदर्शक सभी अब डेटा-आधारित निर्णयों और दर्शक-केंद्रित रणनीतियों पर ध्यान दे रहे हैं।
     भविष्य की दृष्टि से देखें तो उद्योग के सामने अपार संभावनाएं हैं। भारत की युवा आबादी, बढ़ती आय और शहरीकरण की प्रक्रिया सिनेमा के लिए दीर्घकालिक बाजार तैयार कर रही है। यदि कंपनियां छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों में किफायती और सुलभ सिनेमाघर मॉडल विकसित करती हैं, तो दर्शकों का आधार और भी व्यापक हो सकता है। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय फिल्मों की बढ़ती लोकप्रियता विदेशी राजस्व के नए अवसर खोल रही है। अंततः, वर्ष 2025 भारतीय सिनेमा के लिए केवल आर्थिक सफलता का वर्ष नहीं बल्कि आत्मविश्वास की वापसी का प्रतीक है। दर्शकों ने यह साबित कर दिया है कि सिनेमा उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा है। मजबूत कंटेंट, तकनीकी नवाचार और व्यापक विस्तार की रणनीतियों ने उद्योग को एक नए युग में प्रवेश कराया है। यदि यह गति बरकरार रहती है और गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, तो आने वाले वर्षों में भारतीय सिनेमा न केवल घरेलू बाजार में बल्कि वैश्विक मंच पर भी और अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है। यही कारण है कि वर्तमान दौर को सिनेमा का स्वर्ण युग कहा जा रहा है, एक ऐसा समय जब परंपरा और आधुनिकता मिलकर मनोरंजन की दुनिया को नई दिशा दे रहे हैं।
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युद्ध फिल्मों की सीमा रेखा तोड़ती 'बॉर्डर'

     'बॉर्डर' सीरीज की दो फिल्मों ने युद्ध कथानक वाली फिल्मों को लेकर दर्शकों का सोच बदल दिया। पहली फिल्म जहां अपने समय की अनुभव पूर्ण और मानवीय गहराई के लिए जानी जाती है, वहीं 'बॉर्डर-2' नए कलाकारों की ऊर्जा, आधुनिक निर्देशन और विस्तृत कथानक के कारण इसे नई पीढ़ी के दर्शकों के लिए एक यादगार अनुभव दर्शाती है। यह फिल्म अन्य युद्ध-कथानक वाली फिल्मों से अलग और बेहतर है। क्योंकि, यह युद्ध को एक विशाल मानवीय कैनवास पर उतारती है, जहां हर किरदार का दिल धड़कता है, हर आंख में सपना है और हर कदम देशभक्ति की बुलंदी तक जाता है। सीरीज की दोनों की फिल्मों में युद्ध सिर्फ गोलियों और टैंकों की लड़ाई तक सीमित नहीं था, बल्कि हर सैनिक के भीतर चल रही भावनात्मक लड़ाई भी कथानक का ही हिस्सा थी। वास्तव में बॉर्डर-सीरीज़ की असली ताकत भी यही है।
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- हेमंत पाल

    ‘बॉर्डर’ फिल्म हिंदी की उन युद्ध कथानक वाली फिल्मों में है, जिसने सिर्फ सीमा पर एक युद्ध ही नहीं दिखाया, बल्कि सैनिकों के दिल की भावनाएं, उनका डर, उनकी उम्मीदें और उनके परिवारों के दर्द को भी बड़े पर्दे पर उतार दिया। 1997 में आई जेपी दत्ता की फिल्म 'बॉर्डर' ने देशभक्ति की भावनाओं को जिस सादगी और गहराई के साथ प्रस्तुत किया, वह आज भी दर्शकों के दिल में बसी है। वहीं 2026 में आई ‘बॉर्डर-2’ उसी विरासत को आगे बढ़ाने की कोशिश करती है। लेकिन, नए दौर की तकनीक, नए कलाकारों की ऊर्जा और एक बड़े युद्ध-कैनवास के साथ। जब दोनों फिल्मों के कथानक, कलाकारों के अभिनय और निर्देशन को तुलनात्मक रूप से देखा जाए, तो स्पष्ट होता है, कि भारतीय सिनेमा ने युद्ध की कहानियों को कैसे समय के साथ बदला और दर्शकों की अपेक्षाओं भी किस तरह विकसित हुई। पहली फिल्म ‘बॉर्डर’ की ताकत उसकी सादगी और मानवीय दृष्टिकोण में थी। फिल्म में युद्ध सिर्फ गोलियों और टैंकों की लड़ाई नहीं था, बल्कि हर सैनिक के भीतर चल रही भावनात्मक लड़ाई भी थी। हर किरदार की अपनी कहानी थी। किसी की प्रेम कहानी, किसी की पारिवारिक जिम्मेदारी, किसी का व्यक्तिगत डर और इन सबके बीच देश के लिए खड़े होने का जुनून। यही वजह थी कि दर्शक हर किरदार से भावनात्मक रूप से जुड़ गए थे। तकनीकी सीमाओं के बावजूद फिल्म के युद्ध दृश्य इतने प्रभावी थे, कि वे वास्तविकता का अनुभव का अहसास कराते थे। उस दौर की अभिनय शैली में जो सच्चाई और गंभीरता थी, उसने फिल्म को एक क्लासिक बना दिया।
      इसी सीरीज की नई फिल्म ‘बॉर्डर-2’ की बात करें, तो यह एक अलग समय काल की फिल्म है। इतने लंबे अंतराल में दर्शकों के सोच और उनकी पसंद में काफी अंतर आया। आज के दर्शक बड़ा कैनवास, तेज गति और भव्य दृश्यों की अपेक्षा करते हैं। यही वजह है कि फिल्म उसी तरह से दिशा में आगे बढ़ती है। कथानक को सिर्फ एक मोर्चे तक सीमित रखने के बजाय इसे तीन अलग-अलग सैन्य क्षेत्रों थल सेना, नेवी और वायु सेना तक बढ़ाया गया है। इससे युद्ध का दायरा व्यापक और अधिक प्रभावशाली महसूस होता है। फिल्म कई किरदारों के दृष्टिकोण से आगे बढ़ती है, जो दर्शकों को युद्ध की बहुआयामी तस्वीर दिखाती है। फिल्म का यह विस्तार उसे आधुनिक युद्ध-फिल्मों की श्रेणी में लाता है, लेकिन साथ ही कहानी को भारी और लंबा भी बनाता है। दोनों फिल्मों को निर्देशन के नजरिए से देखें, तो पहली वाली ‘बॉर्डर’ में भावनाओं का संतुलन सबसे बड़ी ताकत था। निर्देशक ने युद्ध के दृश्यों को भी मानवीय संवेदनाओं से जोड़कर पेश किया था। वहीं ‘बॉर्डर-2’ का निर्देशन अधिक दृश्यात्मक और बड़े पैमाने पर केंद्रित है। फिल्म धीरे-धीरे किरदारों की पृष्ठभूमि बनाती है और फिर युद्ध की ओर बढ़ती है, जिससे दर्शकों को किरदारों के साथ ज्यादा वक़्त बिताने का मौका मिलता है। हालांकि, कुछ जगहों पर यह धीमापन दर्शकों को लंबा भी लगता है। खासकर तब जब वे तेज रफ्तार वाले एक्शन की उम्मीद लेकर आए हों। तकनीकी रूप से फिल्म आधुनिक है, लेकिन कुछ आलोचनाएं भी सामने आईं कि सभी विजुअल इफेक्ट्स उतने प्रभावशाली नहीं लगे जितनी की उम्मीद की गई थी।
      90 के दशक में जब भारतीय सिनेमा में युद्ध-शैली की फिल्मों की संख्या सीमित थी, तब जेपी दत्ता की 'बॉर्डर' ने युद्ध दृश्यों से कहीं आगे जाकर सैनिकों के मानवीय संघर्ष, दोस्ती, साहस और परिवार के दर्द को बड़े कैनवास पर उतारा। फिल्म 1971 के भारत-पाक युद्ध के लोंगेवाला युद्ध और उससे जुड़ी घटनाओं पर केंद्रित थी। असली लोकेशनों, वास्तविक हथियारों और सेना के सहयोग से फिल्म को हर फ्रेम में यथार्थवादी बनाकर पेश किया था। उस समय सीमित तकनीक के बावजूद 'बॉर्डर' के युद्ध दृश्य आज भी उतने ही प्रभावशाली लगते हैं। 'संदेसे आते हैं' जैसे गीत और वीर-देश भक्ति के भाव ने दर्शकों के दिल में इसे अनमोल स्थान दिया। फिल्म ने युद्ध को केवल गोली-बारूद की लड़ाई नहीं माना, बल्कि भावनात्मक संघर्ष का चित्रण किया, जो इसे सिनेमा में विशिष्ट बनाता है। 1997 की 'बॉर्डर' ने भारतीय सिनेमा में यह स्थापित किया कि युद्ध फिल्म केवल युद्ध नहीं होती, यह भावनाओं का युद्ध भी है। इसने सैनिकों की पृष्ठभूमि, उनके पारिवारिक संबंध और भाईचारा को सामने लाया। प्रत्येक किरदार की व्यक्तिगत चुनौतियां और उनके मन की लड़ाइयां भी उतनी ही महत्वपूर्ण दिखी जितनी युद्धभूमि की लड़ाइयां।
      युद्ध कथानक वाली ज्यादातर फिल्में सिर्फ एक्शन और दृश्य प्रभावों पर ज़ोर देती हैं। 'बॉर्डर-2' में युद्ध के बीच व्यक्तिगत रिश्तों, आंतरिक संघर्षों और मानवीय पहलुओं को गहराई से दिखाया गया, जो इसे साधारण युद्ध दृश्यों से ऊपर उठाता है। यह फिल्म जमीन, हवा और समुद्र तीनों मोर्चों पर संघर्ष दिखाकर युद्ध को एक बड़ी तस्वीर में बदल देती है। यह अलग और व्यापक दृष्टिकोण देती है, जो साधारण दो-पक्षीय संघर्ष से कहीं आगे है। ‘बॉर्डर-2’ सिर्फ सैनिकों की वीरता को दिखाने तक सीमित नहीं है; बल्कि उनके परिवारों, सपनों और आशाओं को भी सामने रखता है। इससे दर्शक न केवल एक्शन बल्कि इंसानी रिश्तों को भी महसूस करते हैं। यह फिल्म सिर्फ पुराने सितारों पर निर्भर नहीं है। वरुण धवन, दिलजीत दोसांझ, अहान शेट्टी जैसे नई पीढ़ी के कलाकारों ने अपने किरदारों में आध्यात्मिक और भावनात्मक गहराई लाकर फिल्म को संतुलित किया है। 'बॉर्डर-2' अपनी विरासत को सम्मान देते हुए भारतीय युद्ध-सिनेमा की एक नई दास्तान पेश करती है। यह फिल्म दर्शकों को सिर्फ युद्ध की कहानी नहीं सुनाती, बल्कि पृथ्वी के तीनों आयामों पर देशभक्ति, भाईचारे, आत्म-बलिदान और व्यक्तिगत मानवीय भावनाओं का मिश्रण प्रस्तुत करती है।
     अभिनय की बात करें तो ‘बॉर्डर-2’ की सबसे बड़ी खासियत अनुभवी और नए कलाकारों का मिश्रण है। सनी देओल की उपस्थिति फिल्म में भावनात्मक मजबूती और एक परिचित वीरता का एहसास देती है। उनकी स्क्रीन प्रेजेंस आज भी दर्शकों को वही पुरानी ऊर्जा महसूस कराती है, जो उन्होंने पहले भाग में दिखाई थी। नई पीढ़ी के कलाकारों में वरुण धवन का प्रदर्शन काफी परिपक्व और संतुलित माना गया। उन्होंने अपने किरदार में एक सैनिक की जिम्मेदारी और एक इंसान की संवेदनाओं दोनों को अच्छी तरह निभाया है। दिलजीत दोसांझ ने अपने किरदार में आत्मविश्वास और भावनात्मक गहराई का अनूठा मिश्रण दिया, जिससे उनके दृश्य यादगार बनते हैं। अहान शेट्टी जैसे युवा कलाकारों ने भी अपने अभिनय से यह दिखाने की कोशिश की, कि नई पीढ़ी युद्ध-फिल्मों में अपनी अलग पहचान बना सकती है, हालांकि कुछ दर्शकों को उनके एक्शन दृश्यों में थोड़ी कमी महसूस हुई। जहां तक दर्शकों की प्रतिक्रिया की बात है तो यह मिश्रित लेकिन समीक्षात्मक रही। एक तरफ फिल्म की भव्यता, देशभक्ति का भाव और बड़े स्तर का प्रस्तुतीकरण लोगों को आकर्षित करता है, वहीं कुछ पुराने दर्शकों को लगता है कि मूल ‘बॉर्डर’ की भावनात्मक सादगी और गहराई को पूरी तरह दोहराना आसान नहीं था। यही किसी भी क्लासिक फिल्म के सीक्वल की सबसे बड़ी चुनौती होती है। यानी विरासत को संभालते हुए नई पीढ़ी के लिए कुछ नया पेश करना। ‘बॉर्डर-2’ इस संतुलन को बनाने की कोशिश करती है और कई जगह सफल भी रही। खासकर तब जब फिल्म व्यक्तिगत कहानियों और सैनिकों के मानवीय पक्ष पर ध्यान देती है।
    अगर इसे अन्य युद्ध फिल्मों से अलग देखने की कोशिश करें तो ‘बॉर्डर-सीरीज़’ की खासियत यही है, कि यह युद्ध को सिर्फ एक्शन या राष्ट्रवादी भाषणों तक सीमित नहीं करती। यहां सैनिकों के परिवार, उनकी यादें, उनके सपने और उनके डर भी कहानी का हिस्सा बनते हैं। ‘बॉर्डर-2’ इस परंपरा को बनाए रखने की कोशिश करती है, भले ही उसका पैमाना ज्यादा बड़ा और शैली ज्यादा आधुनिक हो गई। तीन अलग-अलग सैन्य क्षेत्रों को दिखाने से युद्ध की व्यापकता पूरी भव्यता से सामने आती है और दर्शकों को यह एहसास होता है कि युद्ध सिर्फ सीमाओं पर नहीं, बल्कि हर दिशा में चलने वाला एक समग्र संघर्ष होता है। 
      दोनों फ़िल्में देखने वाले दर्शकों को हिंदी युद्ध-सिनेमा का विकास दिखाई देता है। पहली फिल्म भावनात्मक गहराई और यथार्थवादी अभिनय की वजह से अमर बन गई, जबकि दूसरी फिल्म आधुनिक तकनीक, नए कलाकारों और बड़े कैनवास के जरिए उसी विरासत को नए समय में जीवित रखने की कोशिश करती है। हो सकता है कि हर दर्शक को दोनों फिल्मों में समान भावनात्मक जुड़ाव महसूस न हो, लेकिन यह भी सच है कि ‘बॉर्डर-2’ ने नई पीढ़ी के दर्शकों को युद्ध-कथाओं से जोड़ने का एक नया रास्ता खोला है। यह फिल्म उन लोगों के लिए एक भव्य अनुभव है, जो बड़े पैमाने की युद्ध कहानियाँ पसंद करते हैं। उन लोगों के लिए भी एक दिलचस्प तुलना का अवसर है, जो मूल ‘बॉर्डर’ की सादगी और भावनात्मक गहराई को याद करते हैं। दोनों फ़िल्में मिलकर साबित करती हैं कि जब युद्ध की कहानियों में इंसानी दिल की धड़कन शामिल होती है, तभी वे लंबे समय तक दर्शकों के मन में ज्यादा समय तक जीवित भी रहती हैं।
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Sunday, February 8, 2026

ब्लैक से निकली अंधेरे में उजाले की किरण

- हेमंत पाल

     ब भी हिंदी सिनेमा की बात होती है, तो कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो वक्त के साथ नहीं, बल्कि वक्त के ऊपर चढ़ जाती हैं। संजय लीला भंसाली की ‘ब्लैक’ (2005) उन्हीं में से एक है, जो आज भी न सिर्फ आलोचकों की पसंद, बल्कि दर्शकों की भावनात्मक यादों में जिंदा है। 4 फरवरी 2005 को रिलीज हुई यह फिल्म अब अपने 21 साल पूरे कर चुकी है, लेकिन उसकी गहराई, अभिनय और संदेश आज भी उतना ही ताजा लगता है। यह एक ऐसी फिल्म है जिसने दिव्यांग किरदार को मुख्यधारा में लाया। ‘ब्लैक’ हेलन केलर की जीवनी ‘द स्टोरी ऑफ माय लाइफ’ और उनकी शिक्षिका ऐनी सुलिवन से सीधे प्रभावित है, लेकिन भंसाली ने इसे पूरी तरह भारतीय संदर्भ में ढाल दिया। फिल्म की केंद्रीय किरदार मिशेल मैकनॉली (रानी मुखर्जी) एक दृष्टिहीन और बहरी लड़की है, जो अपने जीवन के शुरूआती दिनों में सिर्फ अंधेरे और खामोशी में जीती है। उसके जीवन में जब डॉ देबराज साहनी (अमिताभ बच्चन) आते हैं, तो वह पहली बार ज्ञान, भाषा और आत्मविश्वास की रोशनी देखती है। इस फिल्म ने भारतीय सिनेमा में दिव्यांग किरदारों को मुख्यधारा में लाने की पहली बड़ी कोशिशों में से एक बनकर इतिहास रचा। इससे पहले ऐसे किरदार या तो छोटे रोल में दिखते थे या फिर पूरी तरह से भावनात्मक ड्रामा के ज़रिए दिखाए जाते थे, लेकिन ‘ब्लैक’ ने दिव्यांग किरदार को स्वतंत्र व्यक्ति, संघर्षशील और सफल बनाकर दिखाया। 
     ‘ब्लैक’ की सबसे बड़ी कहानियों में से एक है अमिताभ बच्चन का फ्री में काम करना। भंसाली की पिछली फिल्में ‘हम दिल दे चुके सनम’ (1999) और ‘देवदास’ (2002) ने बच्चन साहब को उनके विज़ुअल स्टाइल से प्रभावित किया था। जब भंसाली उनके पास ‘ब्लैक’ की कहानी लेकर आए, तो बच्चन साहब ने तुरंत हामी भर दी और कहा कि फिल्म का हिस्सा बनना ही मेरी फीस है। यह निर्णय न सिर्फ फिल्म के बजट पर असर डाला, बल्कि टीम के मनोबल को भी ऊंचा किया। बच्चन साहब ने डॉ देबराज के किरदार में अपने जीवन के सबसे गहरे अभिनय में से एक दिया। उन्हें 53वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड में बेस्ट एक्टर और 51वें फिल्मफेयर अवॉर्ड में बेस्ट एक्टर के साथ बेस्ट एक्टर (क्रिटिक्स) भी मिला। 
    जब रियलिटी ने अभिनय को बदल दियारानी मुखर्जी के लिए ‘ब्लैक’ एक मोड़ वाली फिल्म थी। शुरू में उन्होंने इस रोल को बहुत चुनौतीपूर्ण मानकर इंकार कर दिया था, लेकिन भंसाली ने उन्हें 6 महीने की वर्कशॉप और ट्रेनिंग दी। रानी ने साइन लैंग्वेज एक्सपर्ट्स से काम किया, ताकि वह बहरापन और दृष्टिहीनता की भावनाओं को वास्तविकता के साथ उतार सकें। फिल्म में छोटी मिशेल का रोल चाइल्ड आर्टिस्ट आयशा कपूर ने निभाया, जिन्हें असल जिंदगी में भी सुनने से जुड़ी समस्या थी। भंसाली ने इसी रियलिटी को फिल्म में इस्तेमाल किया, जिससे किरदार की भावनाएं और भी ज्यादा वास्तविक लगीं। 
    ‘ब्लैक’ से रनवीर कपूर का भी खास कनेक्शन है। उस समय वह असिस्टेंट डायरेक्टर थे और छोटी मिशेल को ट्रेनिंग देते थे। रनवीर ने बाद में बताया कि फिल्म के ओपनिंग सीन में टेबल पर बैठा शख्स बच्चन साहब नहीं, बल्कि वह खुद था। चेहरा न दिखना था, सिर्फ परछाई चाहिए थी, और बच्चन साहब उपलब्ध न होने पर रनवीर ने शॉट कवर किया। यह किस्सा रनवीर की पहली बड़ी जिम्मेदारी को दर्शाता है, जहां उन्होंने भंसाली के स्टाइल से सीखा, जो बाद में उनकी ‘राजनीति’ जैसी फिल्मों में झलका। ‘ब्लैक’ ने तकनीकी रूप से भी मिसाल कायम की। भंसाली ने पहली बार डिजिटल साउंड मिक्सिंग का इस्तेमाल किया, जिससे फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर और डायलॉग दर्शकों के दिमाग में गहराई से उतर गए। मोंटी शर्मा के संगीत में ‘बन्नो रानी’ गाना आज भी हिट है, जो फिल्म की भावनात्मक गहराई को और बढ़ाता है। सिनेमेटोग्राफर विक्रांत भोंडालेकर ने लो-लाइट शॉट्स का इस्तेमाल करके अंधेपन को रियल बनाया। फिल्म में काले, ग्रे और नीले रंगों का इस्तेमाल इतना बखूबी किया गया कि जब भी लाल रंग दिखता है, वह दर्शकों को झकझोर देता है। 
      कमर्शियल नजरिए से ‘ब्लैक’ ने 23 करोड़ के बजट के मुकाबले 23.18 करोड़ की कमाई की, जिसे ट्रेड एनालिस्ट्स ने 'एवरेज' बताया। 2005 की टॉप फिल्मों में यह 14वें स्थान पर रही, जहां नंबर 1 पर ‘नो एंट्री’, नंबर 2 पर ‘बंटी और बबली’ और नंबर 3 पर ‘गरम मसाला’ थी।  टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे 4/5 स्टार दिए और लिखा कि यह एक ऐसी फिल्म है जो सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि सोचने पर मजबूर करती है। रेडिफ ने इसे 'भंसाली का सबसे परिपक्व काम' कहा। आज भी आईएमडीबी पर 8.0/10 रेटिंग के साथ यह भंसाली की सबसे ऊंची रैंकिंग वाली फिल्म है। जब फिल्म ने इतिहास रचा‘ब्लैक’ ने 51वें फिल्मफेयर अवॉर्ड में 11 नॉमिनेशन में से सभी जीत लिए, जिसमें बेस्ट फिल्म, बेस्ट डायरेक्टर (भंसाली), बेस्ट एक्टर (बच्चन), बेस्ट एक्ट्रेस (रानी) और बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस (ऐश्वर्या राय) शामिल थे। यह फिल्म फिल्मफेयर के इतिहास में सबसे ज्यादा अवॉर्ड जीतने वाली फिल्मों में से एक बनी। नेशनल फिल्म अवॉर्ड में फिल्म ने बेस्ट फीचर फिल्म इन हिंदी, बेस्ट एक्टर (बच्चन) और बेस्ट कॉस्ट्यूम डिजाइन (सब्यसाची मुखर्जी) जैसे अवॉर्ड जीते। 
      ‘ब्लैक’ ने दुनिया भर में अपना असर छोड़ा। आमतौर पर बॉलीवुड रीमेक बनाता है, लेकिन 2013 में तुर्की के डायरेक्टर उगर युसल ने इसे ‘बेनिम दुनयाम’ (मेरी दुनिया) के नाम से रीमेक किया। यह तुर्की में सुपरहिट रही, लेकिन कॉपीराइट विवाद हुआ, जिसके बाद भंसाली ने सहमति दी। कोरिया और स्पेन में भी अनौपचारिक रूप से इसका प्रभाव दिखा। भारत में 2021 में फिल्म को री-रिलीज किया गया, जहां फिर से कमाई हुई। ‘ब्लैक’ साबित करती है कि सिनेमा सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि बदलाव का हथियार है। बच्चन साहब का फ्री में काम करना, भंसाली का जुनून, और टीम का समर्पण, सबने इसे अमर बना दिया। यह फिल्म हमें सिखाती है कि अंधेरा कितना भी गहरा हो, ‘लाइट’ हमेशा मिल जाती है।
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अरिजीत सिंह : विदाई नहीं, यह नए सुरों का विस्तार

   अरिजीत सिंह का फ़िल्मी गायन से मोहभंग होने का फैसला संगीत जगत के लिए किसी भूकंप से कम नहीं। जिनकी आवाज ने तुम ही हो, चन्ना मेरेया और 'रोंगटी' जैसे गीतों से लाखों दिलों को छू लिया, ने अचानक फिल्मी गायन को अलविदा कह दिया। उनका यह पलायन फिल्म उद्योग पर गहरा असर डालने वाला है। इस पार्श्व गायक ने एक दशक में दर्जनों हिट एल्बम दिए, राष्ट्रीय पुरस्कार जीते और प्लेबैक सिंगिंग को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। उनकी अनोखी सादगी, भावपूर्ण गायकी और युवा पीढ़ी से गहरे जुड़ाव ने उन्हें 'सुपर स्टार सिंगर' बना दिया। लेकिन, अब यह विदाई क्यों! क्या निजी कारण, इंडस्ट्री की कमियां या नई राह की तलाश! अरिजीत के बिना फिल्मी संगीत में सूनापन आना तय है। इससे नए गीतकारों के लिए चुनौती बढ़ेगी और प्रशंसक हताश होंगे। उनका यह फैसला हिंदी सिनेमा के संगीत को क्या नई दिशा देगा, क्या यह किसी पुनर्रचना का समय है!
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- हेमंत पाल

     फिल्मों के पार्श्व गायन के इतिहास में कुछ आवाजें कान तक पहुंचती हैं, लेकिन कुछ सीधे रूह में उतरती हैं। मोहम्मद रफी, किशोर कुमार और सोनू निगम के बाद अगर किसी एक नाम ने पूरे देश की धड़कन को नियंत्रित किया, तो वह हैं अरिजीत सिंह। हाल के दिनों में उनके फिल्मी गायकी से दूरी बनाने की चर्चाओं ने प्रशंसकों को उदास कर दिया। लेकिन, गहराई से देखें तो यह 'अंत' नहीं एक 'रूपांतरण' है। एक कलाकार जब अपनी कला के चरम पर होता है, तो वह अक्सर व्यावसायिकता की बेड़ियों को तोड़कर संगीत की शुद्धता की ओर लौटना चाहता है। अरिजीत का फिल्मों से मोहभंग होना दरअसल उनके संगीत के प्रति उस गहरे प्रेम का हिस्सा है, जो चार्टबस्टर्स से ऊपर उठकर वास्तविक 'कला' की तलाश में है। अरिजीत ने पहले भी कई बार संकेत दिया कि फिल्म इंडस्ट्री का काम करने का तरीका थका देने वाला है। उनका मानना है कि फिल्मों में संगीत 'कहानी' के अधीन होता है, जिससे कलाकार की रचनात्मक आजादी में बेड़ियां पड़ जाती है। उन्होंने अपना खुद का लेबल 'ओरियन म्यूजिक' शुरू किया, जिसके जरिए वे गैर-फिल्मी, शुद्ध संगीत को बढ़ावा दे रहे हैं। इसके अलावा वे बंगाली संगीत से भी अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं। वे बंगाली लोक संगीत व स्वतंत्र गीतों पर अधिक ध्यान दे रहे।
      अरिजीत सिंह के संन्यास या फिल्मों में कम सक्रिय होने की खबर ने संगीतकारों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया कि अरिजीत के बाद कौन! पिछले एक दशक में लगभग हर फिल्म में दूसरा हिट गाना उनकी आवाज में रहा। उनकी गैरमौजूदगी में फिल्म संगीत में जो खालीपन आएगा, उसे भरना फिलहाल मुश्किल नजर आता है। अरिजीत सिंह का फिल्मों से मोहभंग होना, उनके 'संगीत' के खत्म होने का संकेत नहीं, बल्कि यह उनके 'संगीतज्ञ' के रूप में पुनर्जन्म जैसा है। वे एक ऐसे कलाकार हैं जो जब स्टेज पर उतरते हैं, तो लाखों की भीड़ को मंत्रमुग्ध कर देते हैं। उनका संन्यास दरअसल व्यावसायिक शोर से 'मौन' की तरफ की एक यात्रा है। वे आगे भी संगीत से जुड़े रहेंगे और शायद अब वे हमें वह संगीत देंगे, जो फ़िल्मी कथानक की मांग से नहीं, बल्कि उनके दिल की गहराई से निकलेगा। अरिजीत सिंह स्वभाव से बेहद अंतर्मुखी हैं, लेकिन उनका करियर विवादों से अछूता नहीं रहा। उनके छोटे से संगीत करियर में कई बड़े विवाद हुए। सलमान खान की फ़िल्म 'सुल्तान' के गाने 'जग घूमेया' का विवाद जगजाहिर है। एक अवॉर्ड फंक्शन के दौरान अरिजीत और सलमान के बीच हुई हल्की नोकझोंक ने बड़ा रूप ले लिया था। इसका परिणाम यह हुआ कि सलमान की फिल्म 'सुल्तान' से अरिजीत का गाना हटा दिया। अरिजीत ने सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी, लेकिन सलमान के साथ उनके रिश्ते लंबे समय तक ठंडे रहे।
    अरिजीत की सफलता का सबसे बड़ा राज उनकी गायकी की विविधता को माना जा सकता है। उनके पास एक ऐसी आवाज है, जो अकेलेपन का दर्द बयां करती है। 'जुदा होके भी' जैसे गानों में उनकी आवाज का कंपन रूह कंपा देता है। उनकी गायकी की जड़ें हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में भी गहरी हैं, जो 'लाल इश्क' जैसे कठिन गीतों में स्पष्ट दिखती है। जहां तक मॉडर्न टेक्सचर की बात है, तो वे जैज़, रॉक और सूफी को भी उतनी ही सहजता से गाते हैं। वे अक्सर मीडिया और रियलिटी शो के बनावटीपन की आलोचना करते रहे हैं। एक बार रिकॉर्डिंग स्टूडियो में फोटोग्राफर्स के साथ उनकी झड़प भी चर्चा का विषय बनी थी। उन्होंने बेबाकी से स्वीकार किया कि आज के दौर में गानों में 'पिच करेक्शन' का इस्तेमाल होता है, जिसे लेकर संगीत उद्योग के पुराने दिग्गजों के बीच बहस छिड़ गई थी। उनकी सहजता इस बात से आंकी जा सकती है कि उनके लिए सफलता का मतलब दिखावा नहीं है। यही वजह है कि करोड़ों कमाने वाले इस सिंगर ने गांव की शांति चुनी, जो आज के दौर में दुर्लभ है। उनका फिल्म संगीत से संन्यास का फैसला नई पीढ़ी के युवाओं को प्रेरित करेगा कि शोहरत के बाद भी अपनी जड़ों को कभी न भूलें। लेकिन, अरिजीत की आवाज के बाद फिल्म इंडस्ट्री पर ये असर पड़ेगा कि रोमांटिक ट्रैक्स सूने पड़े रहेंगे। 
    पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के एक छोटे से कस्बे जीगंज से निकलकर मुंबई की चकाचौंध में अपनी जगह बनाना उनके लिए आसान नहीं था। 2005 में 'फेम गुरुकुल' जैसे रियलिटी शो से बाहर होने के बाद, उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने संगीतकार प्रीतम के साथ बतौर असिस्टेंट काम किया और प्रोग्रामिंग सीखी। यह तकनीकी समझ ही आज उनके संगीत को दूसरों से अलग बनाती है। 2013 में आई फिल्म 'आशिकी 2' के गाने 'तुम ही हो' ने उन्हें रातों-रात ग्लोबल आइकन बनाया। इसके बाद चन्ना मेरेया, फिर ले आया दिल और 'हवाएं' जैसे गानों ने उन्हें वह मुकाम दिया जहां उनकी तुलना दिग्गज गायकों से होने लगी। अरिजीत सिंह की कहानी सिर्फ गानों की नहीं, बल्कि एक साधारण इंसान की है जो ग्लैमर की दुनिया में रहने के बावजूद जमीन से जुड़ा रहा। वे मुंबई के अपने अपार्टमेंट में सिर्फ काम के लिए जाते हैं, उनकी असल जिंदगी तो जीगंज में ही बीतती है। वे सड़कों पर घूमते हैं, बच्चों को लोकल स्कूल में पढ़ाते हैं। अरिजीत ने कभी अमीरी का दिखावा नहीं किया। सादगी उनके फैसले की जड़ में है। प्लेबैक सिंगिंग में फिल्मों की डिमांड, डेडलाइन और कंपोज आते हैं। अरिजीत हमेशा कहते रहे कि वो मूल रूप से आजाद संगीतकार बनाना चाहते थे। 'फेम' से पहले की वो दुनिया उन्हें ज्यादा पसंद है, जहां प्रयोग और व्यक्तिगत एक्सप्रेशन मायने रखते थे। 
    
     अरिजीत का फिल्म संगीत सफर काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा। 2016 में 'सुल्तान' का विवाद चरम था। 'जग घूमेया' उनका गाया रोमांटिक ट्रैक था, जो सलमान खान और अनुष्का शर्मा पर फिल्माया गया। लेकिन, रिलीज में राहत फतेह अली खान का वर्जन रखा गया। अरिजीत ने सोशल मीडिया पर सलमान से सार्वजनिक माफी मांगी: 'प्लीज मेरा गाना न हटाएं, उसी के साथ रिटायर होने दें।' पोस्ट डिलीट कर दी, लेकिन हंगामा मच गया। अफवाहें उड़ीं कि सलमान ने उन्हें ब्लैकलिस्ट करने की कोशिश की। फिर भी, अरिजीत रुके नहीं। हर फिल्म में उनका गाना मिलता रहा। 2023 में 'टाइगर 3' ने सुलह कराई। उन्होंने 'रुआन' और 'लेके प्रभु का नाम' गाए। सलमान ने प्रमोशन में इसे पहली कोलेबरेशन कहा। बाद में सलमान यह भी बोले कि अरिजीत मेरे अच्छे दोस्त हैं, मिसअंडरस्टैंडिंग मेरी थी। आगे 'गलवान' में भी गाएंगे। ऐसे विवादों के फैसले को रोचक जरूर बनाया। सोनू निगम विरुद्ध अरिजीत की फैन-वॉर भी हमेशा चलती रही। लेकिन, सोनू ने हमेशा उन्हें टॉप पर रखा और अरिजीत ने भी कभी होड़ नहीं लगाई। साफ है कि प्लेबैक ने उन्हें स्टार बनाया, लेकिन बेड़ियां भी डाली। अब आजाद संगीत में पूरा आसमान खुला है। न डायरेक्टर की मर्जी, न स्टार्स का दबाव। फैंस का दिल टूटा, पर ये नया रूप उनकी सादगी से मेल खाता है।
    उनका ये बदलाव स्वाभाविक भी लगता है। फिल्मों में हर बड़ी फिल्म में उनका एक गाना होना उनके लिए थकाऊ फॉर्मूला बन गया था। अरिजीत ने कभी खुद को स्टार नहीं माना। फैंस के लिए ये शॉक है, पर उनके लिए एक बंधन से मुक्ति है। दरअसल, मॉडर्न फिल्म इंडस्ट्री में अरिजीत की आवाज अनिवार्य सी हो गई थी। उनके बिना 'पैरलल सिनेमा' से लेकर मेनस्ट्रीम तक गाने फीके लगेंगे। लेकिन, अरिजीत के लिए यह फैसला करियर रिव्यू की तरह है। उनके इंडिपेंडेंट ट्रैक्स पहले से हिट हैं। शायद नया एल्बम धमाल मचाए। फैंस को उम्मीद कि ये विदाई स्थायी न हो। अंत में, अरिजीत सिंह सिर्फ सिंगर नहीं, एक प्रेरणा हैं। प्लेबैक छोड़ना उनका साहसिक कदम है। जो शोहरत से ऊपर खुद को चुनते हैं। क्या ये सपना टूटा या नया सपना शुरू होगा, ये तो आने वाला वक्त बताएगा। सिनेमा के इस 'सुपर सिंगर' का यह फैसला न सिर्फ म्यूजिक इंडस्ट्री के लिए सदमा जैसा है, बल्कि एक सांस्कृतिक बदलाव का संकेत भी। क्या ये शोहरत की चरम पर थकान है या व्यक्तिगत स्वतंत्रता की तलाश! अभी इस सवाल का जवाब बाहर आना बाकी है। 
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Sunday, January 18, 2026

सात दशकों का सवेरा : लोकतांत्रिक अधिकारों को कुरेदता हिंदी सिनेमा

       भारतीय गणतंत्र के 75 सालों के दौर में हिंदी फिल्मों ने दर्शकों के मनोरंजन के साथ लोकतांत्रिक अधिकारों के संरक्षण को भी कथानक का केंद्र बनाया। ब्लैक एंड व्हाइट से डिजिटल दौर तक ये फिल्में न्याय, मताधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी पर जोर देती रहीं। 'रंग दे बसंती' (2006) जैसी फिल्म ने युवाओं को लोकतंत्र के प्रति उदासीनता से झकझोरा। यह फिल्म बैलेट की जगह बुलेट का विकल्प दिखाती है। लेकिन, अंततः जागरूकता पर समाप्त होती है। 'सत्याग्रह' (2013) ने अन्ना आंदोलन से प्रेरित होकर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन दिखाया। 'राजनीति' (2010) ने राजनीति का कच्चा चिट्ठा खोला, जहां सत्ता की भूख लोकतंत्र को निगल जाती है। 'वेलकम टू सज्जनपुर' (2008) ने ग्रामीण पंचायतों के व्यंग्य से महिलाओं के अधिकार उठाए। यही सिलसिला आज भी जारी है। 
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- हेमंत पाल

    सिनेमा ने जनता को जागरूक करने के कई काम किए। जनता के अधिकारों को खतरे से बचाने वाली कहानियों से भी सिनेमा ने हमेशा जागरूक किया। भ्रष्टाचार, जातिवाद और दमन के खिलाफ ये फ़िल्में संवैधानिक मूल्यों को मजबूत बनाती रही। इस कालखंड में सिनेमा ने लोकतांत्रिक अधिकारों जैसे वोट का अधिकार, अभिव्यक्ति की आजादी, समानता और न्याय को न केवल चित्रित किया, बल्कि दर्शकों को जागृत भी किया। ब्लैक एंड व्हाइट दौर की देशभक्ति फिल्मों से लेकर आधुनिक कोर्टरूम ड्रामे तक की ये कृतियां संविधान की मूल भावना को जीवंत बनाती रही। सिनेमा ही वो माध्यम है जिसने मनोरंजन के बहाने साढ़े सात दशकों के लोकतंत्र में बार-बार अधिकारों को चुनौती दी। भ्रष्टाचार, न्याय और नागरिक जागरूकता जैसे मुद्दों पर कथानक रचकर दर्शकों को सोचने पर मजबूर किया। आजादी के बाद ऐसी फिल्में न केवल बनीं, बल्कि पसंद भी की गई। ऐसे कथानक समाज का आईना बनकर लोकतंत्र की कमजोरियों को उजागर करती रहे। ऐसी कई फ़िल्में हैं, जिनके कथानक आजादी के बाद से अब तक लोकतांत्रिक मूल्यों को कुरेदते नजर आए हैं। 
    आजादी के ठीक बाद फिल्मों ने लोकतांत्रिक अधिकारों को स्वतंत्रता संग्राम की विरासत से जोड़ा। 1950-60 के दशक में चेतन आनंद की 'हल्दीघाटी' (1968) ने राजपूत शौर्य के माध्यम से राष्ट्रीय एकता पर जोर दिया। लेकिन, असल में यह  लोकतंत्र की एकता में विविधता को दर्शाती फिल्म थी। 'शहीद' (1965) जैसी पुरानी फिल्मों का प्रभाव भी यहां दिखा, जहां लोकतंत्र को बलिदान से जोड़ा गया। इसी काल की 'आम्रपाली' (1966) ने व्यक्तिगत अधिकारों और राज्य की नैतिकता पर सवाल उठाए। मनोज कुमार की 'उपकार' (1967)  का कथानक ग्रामीण लोकतंत्र को किसान के अधिकारों से जोड़ता नजर आया, जहां हीरो गांव की पंचायत प्रणाली को मजबूत बनाता है। 'पूरब और पश्चिम' (1970) ने लोकतांत्रिक भारत की वैश्विक छवि बनाई, वह भी पश्चिमी भौतिकवाद के विरुद्ध भारतीय मूल्यों को स्थापित करते हुए। ये फिल्में नेहरू युग के समाजवादी लोकतंत्र को मजबूत करने वाली थी और दर्शकों में मताधिकार के महत्व को जगाती थी। आजादी के बाद की फिल्मों ने नेहरू युग के आशावादी लोकतंत्र को दर्शाया। 'जागृति' (1954) बच्चों के माध्यम से नागरिक कर्तव्यों और अधिकारों को सिखाती है, जहां युवा पात्र संवैधानिक मूल्यों को आत्मसात करते दिखते हैं। 'अब दिल्ली दूर नहीं' (1957) में एक बच्चा प्रधानमंत्री के पास न्याय मांगने जाता है, जो राज्य की जवाबदेही और आम नागरिक के अधिकार को रेखांकित करता है। 'श्री 420' (1955) भ्रष्टाचार के खिलाफ संघर्ष दिखाकर आर्थिक समानता के लोकतांत्रिक आदर्श को उजागर करती है। जबकि 'दो बीघा ज़मीन' (1953) ग्रामीण भारत की उपेक्षा पर राज्य की उदासीनता पर प्रहार करती है।
     सिनेमा के 1960-70 के दौर को संक्रमण का काल कहा जाता है। इस दौर में सिनेमा अधिक यथार्थवादी हो गया था। 'लीडर' (1964) में दिलीप कुमार ने ऐसे राजनेता की भूमिका निभाई, जो भ्रष्ट राजनीति के बीच ईमानदारी की लड़ाई लड़ते हैं। 'आज़ादी की ओर' जैसी फिल्में वोटिंग और चुनाव प्रक्रिया पर केंद्रित रही, वह भी दर्शकों को मताधिकार के महत्व का बोध कराती हुईं। मंथन (1976) सहकारी आंदोलन के ज़रिए सामूहिक अधिकारों और ग्रामीण सशक्तिकरण को चित्रित करती है, जो दुग्ध किसानों को दलालों से मुक्ति दिलाने पर आधारित है। इसके बाद 1980 से 90 का दौर सामाजिक न्याय की लहर रहा। रंगीन सिनेमा के आगमन के साथ मुद्दे गहराए। 'परिणीता' और 'सौतेला भाई' जैसी फ़िल्में सामाजिक असमानता पर आधारित थी। लेकिन, फूलन देवी की 'बैंडिट क्वीन' (1994) की कहानी ने जातिगत उत्पीड़न और दलित अधिकारों को बेबाकी से उजागर किया। यह फिल्म पुलिस अत्याचार और महिलाओं के न्यायिक अधिकारों पर भी केंद्रित रही, जो संविधान के अनुच्छेद 14-21 को प्रतिबिंबित करती है।
     फिल्मों में भ्रष्टाचार और आरक्षण पर बहस का समयकाल 2000 के दशक में आया। आर्थिक उदारीकरण के बाद सिनेमा ने संस्थागत विफलताओं पर निशाना साधा। प्रकाश झा की फिल्म 'आरक्षण' (2011) अनुच्छेद 16 पर आधारित बहस छेड़ती है, जहां अमिताभ बच्चन शिक्षकों के आरक्षण अधिकारों की पैरवी करते नजर आए। 'सत्याग्रह' (2013) अन्ना हजारे आंदोलन से प्रेरित होकर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन दर्शाती है, जो शांतिपूर्ण तरीके से असेंबली के अधिकार (अनुच्छेद 19) को रेखांकित करती है। लेकिन, इसके बाद अधिकारों की बात को दर्शकों को ज्ञान देने वाले कथानकों से अलग किया गया। ऐसे में आई समकालीन युग की कोर्टरूम और चुनावी व्यंग्य वाली फ़िल्में। 'जॉली एलएलबी' (2013) जैसी फिल्मों की सीरीज न्यायपालिका की खामियों पर कटाक्ष करती है। जबकि, 'पिंक' (2016) ने महिलाओं के 'नो मीन्स नो' अधिकार को मजबूती दी। 2019 में आई फिल्म 'आर्टिकल 15' दलित अत्याचार पर अनुच्छेद 15 का उल्लंघन दिखाती है। 2021 की फिल्म 'जय भीम' आदिवासी न्याय पर केंद्रित कथानक रहा। इसके बीच 'अलीगढ़' (2015) निजता और यौनिकता के अधिकारों को रेखांकित करती फिल्म है। कहा जा सकता है कि हाल की फिल्में अधिक साहसी हैं। 'न्यूटन' (2017) छत्तीसगढ़ के नक्सल इलाके में वोटिंग के संघर्ष को चित्रित करती है, जहां राजकुमार राव का पात्र लोकतंत्र की नाजुकता उजागर करता है।
     ब्लैक एंड व्हाइट से डिजिटल तक, सिनेमा ने संविधान को जीवंत किया, भ्रष्टाचार से लेकर जातिवाद तक चुनौतियों पर बहस छेड़ी। आज ध्रुवीकरण के दौर में सिनेमा को सतर्क रहना होगा। ये कृतियाँ साबित करती हैं कि लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं, अधिकारों का संरक्षण है। सिनेमा ने 75 वर्षों में जागृति का उजाला बनकर लोकतंत्र को मजबूत किया। फिल्मों ने अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए दर्शकों को निष्क्रिय उपभोक्ता से सक्रिय नागरिक बनाया। 'स्वदेश' (2004) ग्रामीण विकास और नागरिक कर्तव्य पर जोर देती है। 'मुल्क' (2018) अल्पसंख्यक अधिकारों की पैरवी करती है। 'अलीगढ़' (2015) धारा 377 हटाने से निजता अधिकार बचाती है। 'न्यूटन' (2017) नक्सल क्षेत्र में मताधिकार (अनुच्छेद 326) की रक्षा पर आधारित है। 'आर्टिकल 15' (2019) जातिगत भेदभाव के विरुद्ध अनुच्छेद-15 लागू कराती है। 'मुल्क' (2018) अनुच्छेद 20(3) के तहत निर्दोषता का अधिकार उजागर करता है। 'सेक्शन 375' (2019) महिलाओं के यौन अपराध अधिकारों पर केंद्रित है। 'जय भीम' (2021) आदिवासी अधिकारों की पुलिस हिंसा से रक्षा करती है। 'जॉली एलएलबी 2' (2017) न्यायिक भ्रष्टाचार से आम जनता बचाती है। 2026 तक 'बस्तर' जैसी फिल्में नक्सलवाद में लोकतंत्र बचाने पर आती हैं।
    देश की आजादी के बाद की फिल्मों ने राष्ट्र निर्माण के साथ ही अधिकारों के संरक्षण पर भी फोकस किया। 1951 में आई राज कपूर की फिल्म 'आवारा' में राज (राज कपूर) का मुकदमा सामाजिक न्याय की मांग करता है, जहां अदालत गरीबी के खिलाफ खड़ी होती है। 'दो आंखें बारह हाथ' (1957) सुधारगृह के माध्यम से पुनर्वास का अधिकार दिखाता है। 'कागज के फूल' (1959) कलाकार के अभिव्यक्ति अधिकार पर चिंतन करता है। 'साहिब बीवी और गुलाम' (1962) महिलाओं के अधिकारों की उपेक्षा पर प्रहार करता है। जबकि, 1970 में आई फिल्म 'मंथन' में सहकारिता ग्रामीण आर्थिक अधिकार बचाती है। इसके बाद के दशक में न्याय व्यवस्था की पड़ताल की गई। 'क्रांति' (1981) ब्रिटेन के लोकतंत्र की कमियों को उजागर करती है। 'अधिकार' (1986) में राजेश खन्ना अपनी भूमिका में संपत्ति व पारिवारिक अधिकारों का संरक्षण दर्शाते हैं। 'लाल बादशाह' (1990) में अमिताभ बच्चन भ्रष्टाचार से आम आदमी के अधिकार बचाते हैं। ये फिल्में न्यायपालिका को लोकतंत्र का रक्षक बताती हैं। इसके बाद में दशक में आई 'गंगाजल' (2003) पुलिस दमन से न्याय की लड़ाई दिखाती है। जबकि, 'आरक्षण' (2011) (अनुच्छेद 16) के बहाने वंचितों के अधिकार संरक्षण पर बहस छेड़ती है। 'सत्याग्रह' (2013) अनुच्छेद 19 के तहत आंदोलन से भ्रष्टाचार रोकने का संदेश देती है।
    इंदिरा गांधी के आपातकाल (1975-77) को भी सिनेमा ने नहीं छोड़ा और लोकतंत्र के संकट से रूबरू कराया। 'जंजीर' (1973) ने गुस्सैल हीरो के जरिए प्रशासनिक विफलता दिखाई, जो न्यायिक अधिकारों की मांग करता है। 'दीवार' (1975) ने दो भाइयों के माध्यम से वर्ग असमानता उजागर की, जहां गरीब का लोकतांत्रिक अधिकार कुचला जाता है। मनोज कुमार की 'क्रांति' (1974) ने आजादी की जंग को वर्तमान भ्रष्टाचार से जोड़ा। जबकि 'रोटी कपड़ा और मकान' (1974) ने आर्थिक अधिकारों पर ज्यादा जोर दिया। 1980 के दशक में 'अंदाज अपना अपना' जैसी फिल्मों ने व्यंग्य के जरिए राजनीतिक भ्रष्टाचार पर व्यंग्य कसा। उदारीकरण के दौर में भी सिनेमा ने आर्थिक लोकतंत्र पर फोकस किया। 'दामिनी' (1997) ने महिलाओं के न्यायिक अधिकारों को केंद्र में रखा, जहां एक साधारण महिला पूरे सिस्टम से टकराती है। 'सरफरोश' (1999) ने लोकतंत्र की सुरक्षा को रेखांकित करते हुए आतंकवाद के खिलाफ खुफिया तंत्र की भूमिका दिखाई। 'गुलाम' (1998) ने गुंडा राज के विरुद्ध व्यक्तिगत विद्रोह दिखाया, जो लोकतांत्रिक संस्थाओं की कमजोरी पर चोट करता है। 'मिशन कश्मीर' (2000) ने क्षेत्रीय अधिकारों और एकता पर बहस छेड़ी। ये कथानक दर्शकों को वोट की ताकत याद दिलाते रहे। 
2010 के बाद समकालीन चुनौतियां
    प्रकाश झा की फ़िल्में जैसे 'राजनीति' और 'चक्रव्यूह' (2012) ने नक्सलवाद और कॉर्पोरेट लॉबी को लोकतंत्र से जोड़ा। 'उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक' (2019) और 'आर्टिकल 370' (2024) ने राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर लोकतांत्रिक निर्णयों को सकारात्मक चित्रित किया। 'बस्तर: द नक्सल स्टोरी' (2024) ने नक्सली हिंसा के पीछे राजनीतिक संरक्षण दिखाया, जहां पुलिस अधिकारी सिस्टम से टकराती है। 'शूल' (1999) और 'इंकलाब' (1984) का प्रभाव यहां दिखता है, जहां हीरो पूरे कैबिनेट को चुनौती देता है। ये फिल्में दर्शकों को जागरूक करने में सफल रहीं, लेकिन कई बार हिंसा को वैगलोराइज कर लोकतंत्र पर अविश्वास पैदा किया। 'रंग दे बसंती' ने युवा वोटिंग बढ़ाया, जबकि 'न्यूटन' ने चुनावी प्रक्रिया की गरिमा दिखाई। फिर भी, भ्रष्ट नेता का स्टीरियोटाइप लोकतंत्र के प्रति निराशा फैलाता है। सिनेमा ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग कर अधिकारों को कुरेदा, लेकिन समाधान हमेशा संस्थागत रहा। हिंदी सिनेमा ने लोकतंत्र को आईना दिखाया, कथानकों से दर्शकों को मताधिकार, न्याय और समानता की याद दिलाई। भविष्य में ऐसी फिल्में और गहन होनी चाहिए।
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हीरो चिर युवा, हीरोइन की उम्र हाशिये पर

     फिल्मों के हीरो कभी बूढ़े नहीं होते और हीरोइनों को शादी के बाद के बाद हाशिए पर धकेल दिया जाता है। ये समझा जाता है कि अब उनमें दर्शकों को आकर्षित करने का माद्दा नहीं रहा। जबकि, हीरो साठ की उम्र के नजदीक पहुंचकर भी अपने से आधी से भी कम उम्र की हीरोइनों के साथ रोमांस करते नजर आते हैं। जैसे सलमान खान-साई मंजनरेकर (दबंग-3), अक्षय-मानुषी (सम्राट पृथ्वीराज), अमिताभ-सौंदर्या (सूर्यवंशम), शाहरुख-अनुष्का (रब ने बना दी जोड़ी) और शाहरुख-तापसी (डोंकी) आदि। इन सभी फिल्मों में हीरो की उम्र को लगभग अदृश्य कर दिया जाता है। फिल्म में रोमांस को मैजिकल या टाइमलेस लव कहकर पैकेज किया जाता है। यानी उम्र का ये अंतर अगर पुरुष के पक्ष में हो, तो नॉर्मल और महिला के पक्ष में हो तो बोल्ड। यही दोहरा मापदंड इस लैंगिक भेदभाव को संस्थागत रूप देता है। 
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- हेमंत पाल

     फिल्मी नायकों और नायिकाओं के बीच उम्र और भूमिका का फर्क बहुत पुरानी बात है। बूढ़ाते हीरो आज भी 'रोमांटिक लीड' कहलाते हैं। जबकि, उनकी समकालीन हीरोइन मां, बुआ, जज या कैमियो तक सीमित कर दी जाती हैं। हिंदी सिनेमा के इतिहास से लेकर आज तक की फिल्में दिखाती हैं कि उम्र के साथ पुरुषों का स्टारडम परिपक्वता के रूप में महिमामंडित होता रहा है। जबकि, स्त्री की उम्र को आकर्षण के क्षय के रूप में देखा जाता है। हिंदी फिल्मों में सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर खान, अक्षय कुमार या ऋतिक रोशन जैसे सितारे 55-60 की उम्र में भी कॉलेज बॉय, एक्शन हीरो और रोमांटिक हीरो बनकर घूम रहे हैं। जबकि, उनकी समकालीन माधुरी दीक्षित या करीना कपूर जैसी अभिनेत्रियां चरित्र भूमिकाओं, कैमियो या ‘स्पेशल अपीयरेंस’ में दिखती हैं। यह फर्क केवल कास्टिंग का नहीं, बल्कि उस गहरे लैंगिक पूर्वाग्रह का प्रमाण है, जो हीरो की झुर्रियों को परिपक्व आकर्षण और हीरोइन की उम्र को करियर समाप्ति घोषित कर देता है। सामाजिक, सांस्कृतिक नजरिया और दर्शक मानसिकता ही इस भेदभाव की जड़ है। यह भारतीय समाज की उस सोच में है, जहाँ पुरुष की परिपक्वता से उसका सामाजिक मूल्य बढ़ता है। जबकि, स्त्री की युवा देह को ही उसका मुख्य पूंजी मान लिया जाता है। फिल्मों ने इस सोच को चुनौती देने के बजाय अक्सर मजबूत किया। क्योंकि, बॉक्स ऑफिस पर जांच की कसौटी भी वही दर्शक मानसिकता है जिसे फिल्मों ने दशकों से गढ़ा है एक तरह का दुष्चक्र। 
    जब कोई अभिनेत्री शादी या मातृत्व के बाद भी रोमांटिक भूमिकाएँ करना चाहती है तो उसे अक्सर गॉसिप, एज शेमिंग और सोशल मीडिया ट्रोलिंग का सामना करना पड़ता है। इसके उलट, शादीशुदा, बच्चों के पिता और 60 के करीब नायक को फिट, चार्मिंग और एवरग्रीन बैचलर जैसे विशेषणों से नवाज़ा जाता है। दर्शक भी ट्रेलर या गानों में उम्रदराज़ हीरो के लिए वाह, यंग दिख रहे हैं जैसी टिप्पणियाँ करते हैं। लेकिन, उसी उम्र की अभिनेत्री को देख कर अब ये क्यों हीरोइन बन रही है जैसा अविश्वास ज़ाहिर करते हैं। यह विरोधाभास चौंकाता है कि जहां 50-60 साल के हीरो से अपेक्षा की जाती है, कि वह 20-25 साल की हीरोइन के साथ रोमांस करता दिखे, वहीं 40-45 की नायिका को उसी परदे पर अचानक माँ, मामी या वकील की भूमिका में धकेल दिया जाता है। बाद के दौर में वही माधुरी, श्रीदेवी या करिश्मा, जिन पर एक समय पूरी फिल्में टिकी रहती थी, उम्र बढ़ते ही सपोर्टिंग एक्ट्रेस बना दो गईं। जबकि, उनके साथ काम करने वाले नायक आज भी 'मास रोमांटिक हीरो' के पोस्टरों पर छाए हैं। देव आनंद से अमिताभ बच्चन तक के क्लासिक दौर में भी बढ़ती उम्र के हीरो के लिए रोमांटिक स्पेस खुला रहता था। जबकि, उनकी समकालीन नायिकाएँ जल्दी रिप्लेस हो जाती। देव आनंद ने 40-50 की उम्र के बाद भी लगातार युवा नायिकाओं के साथ रोमांटिक लीड की, जबकि वही दौर की मीना कुमारी, नरगिस या मधुबाला जैसी अभिनेत्रियाँ अपेक्षाकृत जल्दी पार्श्व में चली गई या फ़िल्मी मुख्यधारा से बाहर हो गईं।
     अमिताभ बच्चन ने अपनी 50 और 60 के दशक की उम्र में भी कई फिल्मों में अपेक्षाकृत कम उम्र की नायिकाओं के साथ जोड़ी बनाई। जैसे 'सूर्यवंशम' में सौंदर्या के साथ लगभग 30 साल का उम्र अंतर दिखता है, जिसे कहानी ने सहज मान लिया। वहीं वही पीढ़ी की नायिकाएँ रेखा, जया भादुड़ी, हेमा मालिनी बहुत जल्दी माँ या विशेष भूमिकाओं तक सीमित कर दी गईं। जबकि, दर्शक उन्हें अब भी रोमांटिक भूमिकाओं में स्वीकार कर सकते थे। खान युग को एवरग्रीन मर्दानगी वाला दौर कहा जा सकता है। 1990 के दशक में शाहरुख, सलमान, आमिर और अक्षय कुमार के उभार के साथ 'एवरग्रीन हीरो' की धारणा और मजबूत हुई। 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' जैसी फिल्मों ने शाहरुख को ऐसी रोमांटिक इमेज दी, जो 30 साल बाद भी 'युवा प्रेमी' के रूप में बेचने लायक मानी जाती है। समय के साथ उनकी उम्र बढ़ती रही, लेकिन उनकी हीरोइनों की पीढ़ियाँ बदलती रहीं काजोल, रानी मुखर्जी और प्रीति जिंटा से होते हुए अनुष्का शर्मा, दीपिका और तापसी पन्नू तक।
    'रब ने बना दी जोड़ी' में 40 पार शाहरुख को 20-21 की डेब्यूअंट अनुष्का शर्मा के साथ जोड़ा गया और इसे कहानी का हिस्सा मानकर स्वीकार किया गया। जबकि, इसी उम्र की नायिकाओं के लिए ऐसे अवसर लगभग बंद थे। यही ट्रेंड 'गजनी' में 40 प्लस आमिर के साथ 20 के दशक की आसिन और बाद में कई फिल्मों में दोहराया गया, जहां कहानी पुरुष की उम्र को अनुभव और महिला की उम्र को सौंदर्य के रूप में रेखांकित करती है। आज की स्थिति और भी स्पष्ट है; 55-60 की उम्र में सलमान खान, शाहरुख खान, आमिर खान और ऋतिक रोशन अब भी मुख्यतः रोमांटिक या मसीहा-प्रकार के नायक के रूप में कास्ट किए जा रहे हैं, जिनकी जोड़ी 20–30 वर्ष छोटी अभिनेत्रियों के साथ सहज मानी जाती है। हाल के सालों में दबंग-3, रब ने बना दी जोड़ी, गजनी, डोंकी और विभिन्न प्रोजेक्ट्स में इस उम्र-अंतर को न केवल सामान्य, बल्कि 'स्टार वैल्यू' का हिस्सा बताया गया है। 
  
    माधुरी दीक्षित, जो 90 के दशक की सबसे लोकप्रिय नायिकाओं में रही, अब वे प्रायः मल्टीस्टारर फिल्मों में साइड रोल, कैरेक्टर पार्ट या विशेष गानों में दिखती हैं। जबकि, उनकी उम्र उनके समकालीन नायकों से बहुत ज्यादा नहीं है। करीना कपूर खान भी मुख्यधारा की हीरोइन होते हुए अब अधिकतर कंटेंट-ड्रिवेन या मल्टीस्टारर फिल्मों में माँ, पुलिस ऑफिसर या ग्रे-शेड कैरेक्टर में कास्ट हो रही हैं। भले ही वे शारीरिक रूप से उतनी ही फिट और ग्लैमरस हों जितने उनके साथ काम करने वाले पुरुष सितारे। एक दौर में तेजाब, राम लक्ष्मण, दिल, साजन, हम आपके हैं कौन और 'दिल तो पागल है' जैसी फिल्मों की केन्द्रीय नायिका वही थीं। आज उन्हें परिवार की बड़ी बहन, माँ, विलेन की पत्नी, या मल्टीस्टारर कॉमेडी या ड्रामा में सामूहिक किरदारों में अधिक देखा जाता है। यह परिवर्तन उनकी प्रतिभा के क्षय से नहीं, बल्कि इंडस्ट्री के इस पूर्वाग्रह से संचालित है कि रोमांटिक केंद्र में युवा स्त्री का चेहरा होना चाहिए, चाहे कहानी की ज़रूरत कुछ भी कहे। करीना कपूर भी 'जब वी मेट' और 'ओंकारा' जैसी फिल्मों की नायिका से अब ऐसी फिल्मों की तरफ़ शिफ्ट हुई दिखती हैं जहां उनका किरदार या तो परिवार का हिस्सा होता है या कंटेंट-ड्रिवेन सीरियस नैरेटिव का अंग, जबकि उनके समान या अधिक उम्र के नायक अभी भी 20–25 वर्ष की नई नायिकाओं के साथ लव स्टोरी में दिखाए जा रहे हैं। यह अंतर बताता है कि नायकों की उम्र को एसेट और नायिकाओं की उम्र को लायबिलिटी माना जा रहा है।
    बीते कुछ वर्षों में पिकू, इंग्लिश विंग्लिश, नीरजा, क्वीन, थप्पड़, दंगल और ओटीटी प्लेटफॉर्म की कई सीरीज़ ने उम्रदराज़ या शादीशुदा नायिकाओं को कहानी के केंद्र में रखकर यह साबित किया कि दर्शक मजबूत लेखन और सच्चे पात्रों को स्वीकार करते हैं। साथ ही, करीना या अन्य अभिनेत्रियों के संभावित प्रोजेक्ट्स में उम्र से छोटे पुरुष सितारों के साथ उनकी जोड़ी की चर्चा, भले ही बोल्ड टैग के साथ हो। लेकिन, यह संकेत भी है कि मुख्यधारा धीरे-धीरे इस असमानता पर बहस के लिए मजबूर हुई है। कुछ स्टार इंटरव्यू और डिबेट शो में खुद अभिनेताओं से यह प्रश्न पूछा जाने लगा है कि वे क्यों अपने से आधी उम्र की नायिकाओं के साथ काम करना सिनेमैटिक मैजिक मानते हैं, जबकि वही विकल्प अभिनेत्रियों को नहीं मिलता।
     यह चर्चा अगर आगे बढ़ती है और दर्शक भी उम्र और जेंडर के प्रति अधिक संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाते हैं, तो कास्टिंग के स्तर पर धीरे-धीरे संतुलन बन सकता है। जहां हीरो और हीरोइन दोनों की उम्र, अनुभव और व्यक्तित्व, कहानी की ज़रूरत से तय हों, न कि केवल पितृसत्तात्मक बाजार के गणित से।  सिनेमा समाज का दर्पण भी है और ढालने वाला माध्यम भी। जब परदे पर बार-बार यह संदेश जाता है कि 60 साल का पुरुष 20 साल की लड़की का स्वाभाविक प्रेमी है। लेकिन, 40-45 की स्त्री के लिए प्रेम, इच्छा और रोमांस अनुचित या बोल्ड हैं, तो यह समाज के जेंडर फ्रेम को और विकृत करता है। जरूरत इस बात की है कि निर्माता, निर्देशक और दर्शक मिलकर इस भेदभाव को पहचानें और स्वीकारें कि स्त्रियों की उम्र भी पुरुषों की तरह अनुभव, आकर्षण और व्यक्तित्व की परिपक्वता का प्रतीक हो सकती है, न कि उनके सिनेमाई अस्तित्व के अंत का संकेत। लेकिन, ये फार्मूला हिंदी फिल्मों के कथानक में शायद फिट नहीं बैठता। यही वजह है कि शादीशुदा अभिनेत्रियां फिल्म की मूल भूमिका से नकार दी जाती है।   
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