Monday, January 13, 2014

इन विधानसभा चुनाव नतीजों का हश्र?

- हेमंत पाल ------------------------------------------------------------- पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में से चार राज्यों के नतीजों ने कांग्रेस के नेतृत्व की जड़ों को हिलाकर रख दिया। नरेंद्र मोदी के राजनीतिक मंत्र और भाजपा के सभी राज्यों के क्षत्रपों के सामने पूरी कांग्रेस पार्टी धराशाई नजर आई। बाकी बची कसर दिल्ली में 'आप' ने पूरी कर दी! उत्तर भारत के चार राज्यों में मतदान के बाद जो संकेत मिले थे, उसके बाद ही कांग्रेस नेतृत्व ने हार की पेशबंदी शुरू कर दी थी। लेकिन, उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि चुनाव परिणाम उनके लिए इतने नकारात्मक और निराशाजनक होंगे। कांग्रेस का पूरा मैनेजमेंट ये पता लगाने में असफल है कि मध्यप्रदेश में पार्टी की बुरी हार का कारण क्या है? सकारात्मक संकेतों की गर्त में इतने ख़राब नतीजे छुपे थे, इसका अंदाजा कोई नहीं लगा पाया! सिर्फ राजस्थान ही ऐसा राज्य है, जहाँ कांग्रेस को अपनी हार का अंदेशा पहले से था। 000 मध्य प्रदेश सहित चार राज्यों के चुनावी परिणाम तमाम राजनीतिक दलों को सोचने-विचारने का ढेर सारा मसाला दे गए हैं। कांग्रेस समझ नहीं पा रही है कि उसकी इतनी करारी हार क्यों हो गई! भाजपा भी असमंजस में है कि उसे इतना बहुमत कैसे मिल गया? दिल्ली और छत्तीसगढ़ को छोड़ दिया जाए, तो खुद भाजपा ने भी नहीं सोचा था कि उसे इस कदर सफलता मिलेगी! ले देकर दिल्ली में 'आम आदमी पार्टी' ही यह कयास लगा रही थी कि वह कांग्रेस और भाजपा दोनों पर ही झाडू लगा देगी! लेकिन, यहां भी उसके सपने पूरे नहीं हुए! उसने कांग्रेस पर तो झाडू मार दी, लेकिन भाजपा को वह अपनी झाडू में समेट नहीं पाई। ऐसे में यह सोचना जरूरी है कि इन चुनावी नतीजों के परिणाम क्या होंगे? पहली बात तो यह है कि इन परिणामों का सही कारण क्या है, कोई सही तरह से आकलित नहीं कर पा रहा है। क्या इसका कारण राहुल गाँधी का पूरी तरह विफल हो जाना है या फिर यह नरेंद्र मोदी को मिलने वाली अभूतपूर्व सफलता का पहला चरण है? क्या यह आम आदमी पार्टी की जीत से विकल्प की राजनीति का उभार है या फिर क्षेत्रीय दलों के हाशिए पर चले जाने के संकेत हैं? अगर इस मुद्दे का सरलीकरण कर दिया जाए, तो कहा जा सकता है कि यह सभी बातें सही हैं। लेकिन, राजनीति इतनी सरल नहीं है, इसलिए इसके अर्थ भी इतने सरल नहीं हो सकते! तमाम राजनीतिक दल और राजनीतिक विश्लेषक विभिन्न चुनावी परिस्थितियों को अलग-अलग ढंग से परिभाषित करते रहे हैं। सभी इसे अपनी अपनी ढपली लेकर अपना-अपना राग अलाप रहे है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली राज्यों में भाजपा ने लभगग 66 फीसदी सीटें जीती हैं। लोकसभा में इन राज्यों से 72 सांसद आते हैं। विधानसभा का ट्रेंड भी बरकार रहा, तो इसमें से भाजपा 50 के ऊपर सीटें जीत सकती है। फिलहाल यहां से कांग्रेस के 40 सांसद हैं। अभियान में अपनी आक्रामक शैली की वजह से कई बार नरेंद्र मोदी भी विवाद का विषय भले बने हो। लेकिन, राहुल गांधी की ओढ़ी हुई आक्रामक शैली कुछ ज्यादा ही चर्चा का विषय रही। राहुल गांधी पूरे प्रचार अभियान में भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और आतंकवाद पर जो तर्क देकर संप्रग सरकार की नाकामियों पर पर्दा डाला, वो जनता भी नहीं पचा पाई। मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में उन्हें विकास के काम और जनप्रिय चेहरे उन्हें नजर नहीं आ रहे थे। इन नतीजों के बाद कांग्रेस को यह समझ लेना चाहिए कि प्रमुख मुद्दों पर उसका शतुरमुर्गी रवैया देश का युवा मतदाता बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। इससे पहले जब भी मतदान का प्रतिशत बढ़ता रहा है, ये विश्लेषण किया जाता रहा है कि यह सत्तारूढ़ दल के खिलाफ नाराजगी के संकेत हैं। लेकिन, इस बार मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अधिक मतदान के बाद भी सरकारों की वापसी ने इस सिद्धांत को गलत साबित कर दिया! यह कहा जा सकता है कि इन राज्यों में मुख्यमंत्रियों ने अपनी छवियों और अपने कामकाज के दम पर वापसी की है। साथ ही श्रेय भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को दिया जाना चाहिए, जिसने राज्य को गुटबाजी का अड्डा नहीं बनने दिया। वहीं दूसरी तरफ राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ तक हर प्रदेश में कांग्रेस की हार इस बात का गवाह है कि राहुल गाँधी की सीधी निगरानी भी इन प्रदेशों में गुटबाजी को नहीं रोक सकी! तो क्या यह माना जाए कि विधानसभा चुनावों का परिणाम अपने पक्ष में करने में राहुल पूरी तरह नाकामयाब रहे? एक हद तक सही भी है कि कहीं न कहीं राहुल गाँधी की रणनीति ही विफल हुई है! क्योंकि, इस बार टिकट वितरण से लेकर प्रभारी चुने जाने तक सारा फैसला उन्होंने ही लिया था। यहां तक कि संबंधित राज्यों के वरिष्ठ और अनुभवी राजनेताओं को उन्होंने हाशिये पर डालकर जिन उम्मीदवारों को टिकट दिया, वे जीत नहीं पाए! ऐसे में उनकी असफलता का अंजाम यह हो सकता है कि यदि भूले भटके लोकसभा चुनाव में भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित किया गया, तो पता नहीं क्या होगा ? राहुल गांधी की सबसे पहली जिम्मेदारी स्थानीय स्तर से लेकर राज्य स्तर पर पार्टी की गुटबाजी को रोकना था। कहने को मध्य प्रदेश में केन्द्रीय नेता मंच पर तो साथ-साथ नजर आए, लेकिन मंच से उतरते ही वे प्याज के छिलकों की तरह एक दूसरे की परत उतारते रहे! अफसोस इस बात का रहा कि राहुल अपनी इस जिम्मेदारी को पूरा करने में नाकामयाब रहे, और नतीजा सामने है। वैसे भी सिर्फ प्रभारी बनाने और टिकट बांटने से चुनाव नहीं जीते जा सकते! यह बात इस चुनाव में बकायदा साबित भी हो गई। मध्य प्रदेश में दिग्विजिय सिंह का बड़बोलापन भारी रहा। ज्योतिरादित्य सिंधिया तो बोलचाल में संयत रहे, लेकिन उनका दूसरे बड़े नेताओं पूरे मन से साथ नहीं दिया! यह खामी मंच पर भी नजर आई, जब हर मंच पर दिग्विजय सिंह पीछे की कुर्सी पर बैठते थे, फिर उनसे सिंधिया इसरार करते तो वे उठते, और राहुल के कहने पर कक्षा के छात्र की तरह उनकी आज्ञा मानकर कुर्सी छोड़कर आगे आ जाते थे। ये भी कहना एक हद तक सही हो सकता है कि राज्यों के चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े जा सकते हैं। लेकिन, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यूपीए-2 सरकार की छवि और उसके खिलाफ पिछले कुछ महीनों से बन रहा माहौल भी कांग्रेस के खिलाफ गया। आने वाले दिनों में राहुल गाँधी को प्रदेशों में नेतृत्व तैयार करने में मेहनत करनी होगी। अगर लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी की दशा ठीक रखनी है तो केंद्र सरकार को भी अपनी छवि को सुधारना होगा! क्योंकि, इसके बिना नरेंद्र मोदी से मुकाबला करना आसान नहीं होगा। चुनावी परिणाम की शाम सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ने बकायदा माना कि जनता हमसे नाराज थी। राहुल ने तो कांग्रेस के रूपांतरण तक की बात तक कही! हो सकता है कि राहुल पार्टी का चेहरा बदलने के लिए बेकरार हों, लेकिन पुराने और घाघ कांग्रेसी उन्हें असफल करने में कसर नहीं छोड़ेंगे! भाजपा भले ही माने की चारों राज्यों में उसके लिए मोदी फेक्टर काम कर गया! लेकिन, पूरी तरह से यह मान लेना गलत होगा कि इन राज्यों में हुई जीत नरेंद्र मोदी की जीत है। यह याद रखना होगा कि इन चारों राज्यों में जीत का आकलन तब से लगाया जा रहा था, जब नरेंद्र मोदी गुजरात का चुनाव जीतकर केंद्र में नहीं आए थे। तब वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी नहीं बनाए गए थे! राजस्थान में गेहलोत की निष्क्रियता चरम पर थी। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ में भाजपा ने जो विकास के काम किए वे सड़कों पर दिखाई दे रहे थे। यदि यह सही होता कि भाजपा के इस प्रदर्शन का एकमात्र कारण मोदी ही है, तो यह भी गलत साबित हो जाता है। क्योंकि, दिल्ली में मोदी ने एक के बाद एक रैलियों की झडी लगा दी थी। आखिर क्यों भाजपा स्पष्ट बहुमत के नजदीक आकर रूक गई। क्यों एकदम नई 'आम आदमी पार्टी' ने उनके अश्वमेघ को रोक लिया! बस्तर में भाजपा की करारी हार भी ऐसा ही कुछ कहती है। छत्तीसगढ़ में चुनावी परिणाम के अंत तक यही खुटका लगा रहा कि कहीं, कांग्रेस उसे पीछे न छोड़ दे। इस बात को पूरी तरह से खारिज भी नहीं किया जा सकता कि मोदी का कोई असर ही नहीं पडा। यह सही है कि नरेंद्र मोदी को लेकर एक सकारात्मक माहौल बना हुआ है, लेकिन ये भ्रम भी नहीं पाला जाना चाहिए कि यह जीत उनका ही करिश्मा है। उन्हें अभी अपना करिश्मा दिखाना बचा है। जिसमें उन्हें देश के उस आधे हिस्से में सहयोगी तलाश करना है, जहां भाजपा का कोई नामलेवा नहीं है। उन्हें एनडीए तो पुनर्जीवित करने के लिए क्षेत्रीय दलों की जरूरत होगी। इस बात से तसल्ली की जा सकती है कि चारों राज्यों में क्षेत्रीय दल ज्यादा प्रभावी प्रदर्शन नहीं कर पाए! इन राज्यों के चुनावों में भले ही दिखता हो कि अकाली दल, बसपा और सपा जैसी पार्टियां अपने छोटा-मोटा जनाधार खो चुकी हैं, लेकिन यह राष्ट्रीय दलों के लिए घातक आकलन होगा कि वे उन्हें हाशिए पर पड़ा मान लें! क्योंकि, जिस तरह से तीसरे विकल्प के रूप में आम आदमी की पार्टी ने भाजपा की राह में रोड़े अटकाए हैं, वही काम यह क्षेत्रीय दल भी कर सकते हैं। इसलिए यदि इन्हें अनदेखा किया गया तो भाजपा 2014 में सत्ता पाने का सपना पूरा नहीं कर पाएगी। जिस तरह से दिल्ली में 'आप' का प्रभाव पड़ा है, वह इसे लोकसभा का लिटमस टेस्ट मानकर 2014 में पूरे देश में अपने प्रत्याशियों को खड़ा करने की योजना बना रहे हैं । यदि ऐसा हुआ तो कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही पसीने आ जाएंगे। ऐसे में तीसरे विकल्प को हाशिये पर मानना, न मोदी के हित में होगा न राहुल के! 'आप' ने एक संदेश साफ दे दिया है कि या तो सुधर जाओ या फिर घर जाओ। भाजपा को जो जनाधार मिला है, उस पर उसे आत्ममुग्ध होने के बजाए अपनी खामियों को दूरकर अपने आपको सुधारना होगा। उसे यह भी याद रखना होगा कि चाहे मध्य प्रदेश हो या राजस्थान या फिर छत्तीसगढ़, कहीं भी मंदिर की राजनीति की बात नहीं उठी। अधिकांश परिणाम विकास की स्थिति और भ्रष्टाचार से तंग मतदाताओं के गुस्से का नतीजा है। यदि अब इन चारों राज्यों में भाजपा ने अपनी छबि को मांजने का प्रयास नहीं किया, तो उसके लिए तो दिल्ली दूर ही होगी! यदि कांग्रेस ने भी अपनी चाल, चरित्र और चेहरा नहीं बदला तो उसे दिल्ली के बडे जंग में मैदान में शिकस्त खाना पड़ सकती है।

Wednesday, January 1, 2014

… इसलिए भी याद रहेगा बीता बरस (2013)

- हेमंत पाल ---------------------------------------------------------------------- हर साल कि तरह इस साल भी बॉलीवुड ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। कुछ पुराने सितारे दुनिया से बिदा हुए तो किसी के रिश्ते बने और टूटे! कुछ कम बजट की फिल्मों ने सफलता का शिखर लांघा तो कुछ ऐसी भी फ़िल्में रहे, जो करोड़ों के बजट से बने जरुर पर दर्शकों को पसंद नहीं आई! चंद ऐसी घटनाएं भी घटी, जिसने परदे की दुनिया का बड़ा झटका दिया। फ़िल्मी दुनिया की कुछ ऐसी ही घटनाओं पर सरसरी नजर : सरपट दौड़ी 'चैन्नई एक्सप्रेस' इस साल रिलीज हुई शाहरुख खान और दीपिका पादुकोण की फिल्म 'चैन्नई एक्सप्रेस' ने कमाई के अब तक के सभी रेकॉर्ड्स तोड़ते हुए 395 करोड़ की कमाई की! वहीं 20 दिसंबर को रिलीज हुई आमिर खान, कैटरीना कैफ की फिल्म 'धूम 3' भी इसी तरह दौड़ती नजर आई। 'धूम 3' ने अपने पहले हफ्ते में कुल 107.61 करोड़ की कमाई की। फिल्म के पहले दिन की कमाई ने भी बॉलिवुड में अब तक की सभी फिल्मों के रेकॉर्ड तोड़े। 'धूम 3' ने अपनी रिलीज के पहले दिन 36.22 करोड़ रुपए का कलेक्शन किया। अब तक रिलीज हुई कोई भी हिंदी फिल्म एक दिन में इतनी कमाई नहीं कर सकी। शाहरुख का तीसरा बच्चा इस साल शाहरुख और गौरी खान के तीसरे बच्चे का जन्म सरोगेसी से हुआ! मुंबई महानगर पालिका ने इस बच्चे के जन्म की पुष्टि की। गौरी और शाहरुख के इस तीसरे बच्चे का जन्म 27 मई, 2013 को अंधेरी के मसरानी हॉस्पिटल में हुआ! इस अभिनेता के तीसरे बच्चे के सेरोगेसी के जरिए जन्म लेने की खबरों ने इस साल खासी चर्चा बटोरी! गौरी और शाहरुख पर इसके लिंग परीक्षण कराने के आरोप भी लगे! कुल मिलकर ये मामला खासा चर्चित रहा। संजय दत्त को जेल मुंबई में हुए सीरियल बम विस्फोटों के दौरान गैरकानूनी हथियार रखने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनाई संजय दत्त को पांच साल की सजा सुनाई। संजय पहले ही 18 महीने जेल में गुजार चुके हैं, इसलिए अब वह अपनी 42 महीनों की बची सजा पुणे के येरवडा जेल में गुजार रहे हैं। उन्हें दो बार मिली पैरोल को लेकर भी मीडिया में खासा बवाल हुआ। जिया खान की मौत अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म 'नि:शब्द' से बॉलीवुड में अपने करियर की शुरुआत करने वाली अभिनेत्री जिया खान की 3 जून को रहस्यमय तरीके से मौत हुई। उनकी मौत से अमिताभ बच्चन समेत पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री को झटका लगा! जिया की मौत आज भी रहस्य से बाहर नहीं आ सकी है। पहले जहां इसे ख़ुदकुशी माना जा रहा था, वहीं उनकी माँ द्वारा संदेह व्यक्त किये जाने पर इस मामले की फिर से जांच हो रही है। पुलिस ने जिया के 6 पेज के सुसाइड लेटर को आधार बनाकर आदित्य पंचोली के बेटे और जिया के बॉयफ्रेंड रहे सूरज पंचोली को गिरफ्तार किया था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने उस लेटर को सुसाइड नोट मानने से इनकार कर दिया, और सूरज को जमानत पर छोड़ने का आदेश दे दिया था। इस मामले में सूरज 21 दिन तक जेल में बंद रहे। अभी भी ये मामला अदालत में है। रितिक-सुजैन की जोड़ी टूटी रितिक रोशन और सुजैन की जोड़ी शादी के 13 साल बाद टूट गई। हालांकि, अपने अलगाव का कारण दोनों ने ही साफ नहीं किया है। 4 सालों के अफेयर के बाद 13 साल की शादीशुदा जिंदगी का साथ भी इस जोड़ी को टूटने से रोक नहीं सका। मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक दोनों का ही एक-दूसरे पर से भरोसा उठ गया था। सबसे चर्चित रोमांस रणबीर कपूर और कैटरीना कैफ का रोमांस इस साल फ़िल्म इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा चर्चित रहा! इन दोनों की पैरंट्स के साथ लंदन में निकाली एक तस्वीर लीक हुई। इसके बाद स्पेन के एक बीच की निजी पलों की तस्वीर के लीक होने से इनके चाहने वालों के साथ पूरे बॉलीवुड में ही हंगामा हो गया! कैट ने इससे नाराज होकर मीडिया को लेटर तक लिख डाला। बाद में कैटरीना अपने बर्थडे पर रणबीर के साथ जश्न मनाती पाई गईं! रणबीर-कैट अपने संबंधों को छुपाते रहे, लेकिन करण जौहर के टीवी शो 'कॉफी विद करण' में रणबीर की कजिन करीना कपूर ने सबके सामने इनके रिश्तों की पोल खोल दी! करीना ने न सिर्फ रणबीर की शादी में कैटरीना के गानों पर नाचने की बात कही, बल्कि कैटरीना को 'भाभी' कहकर भी संबोधित किया। दो चर्चित पैच-अप बीता साल दो पैच-अप के लिए भी याद किया जाएगा! ईद के खास मौके पर कांग्रेस विधायक बाबा सिद्दीकी द्वारा दी गई इफ्तार पार्टी में सलमान खान और शाहरुख खान गले मिले! बॉलीवुड के अब तक के इस अहम् पैच-अप के साथ सालों से चली आ रही इन दोनों सुपरस्टार्स की आपसी रंजिश कुछ हद तक ख़त्म हुई! इन दोनों ने राकेश रोशन की फ़िल्म 'करण-अर्जुन' में काम किया था, उसके बाद दोनों कभी साथ नजर नहीं आए! सलमान-शाहरुख़ के अलावा दूसरा पैच-अप रहा सलीम खान और जावेद अख्तर का! बॉलीवुड को शोले, दीवार, डॉन और त्रिशूल जैसी सुपरहिट फिल्में देने वाली इस राइटर जोड़ी के बीच 26 साल लम्बा अबोला इस साल टूटा! ये दोनों अपनी सुपरहिट फ़िल्म 'जंजीर' के रीमेक बनने से खफा थे। इसी मुद्दे पर इनके आपसी मतभेद सुलझे और ये साथ आकर खड़े हुए। इन दोनों के बीच 'मिस्टर इंडिया' बनने के दौरान मतभेद हुए थे। जावेद चाहते थे कि अमिताभ बच्चन इस फिल्म में लीड रोल करें, लेकिन उन्होंने काम करने से मना कर दिया था। ऐसे में खफा जावेद ने सलीम से कहा कि वह अमिताभ के साथ दोबारा काम नहीं करेंगे! लेकिन, दूसरों से उन्होंने कहा कि सलीम अमिताभ के साथ काम नहीं करना चाहते। इन्हीं बातों को लेकर दोनों के बीच मतभेद हो गए थे। अब ये बर्फ पिघल गई है। अलविदा हो गए दो सितारे मशहूर गायक रहे मन्ना डे का 94 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने 24 अक्टूबर, 2013 तड़के करीब 3 बजकर 50 मिनट पर अंतिम सांस ली। अपने गानों से बरसों तक फ़िल्म संगीत प्रेमियों के दिलों में बसने वाले मन्ना डे का निधन एक युग के अंत हो जाने जैसा था। बीते साल ने हरदिल अजीज खलनायक प्राण को भी हमसे चीन लिया। 93 साल की उम्र में बॉलीवुड के पहले 'सुपरस्टार विलन' प्राण ने 12 जुलाई, 2013 की रात 8.30 बजे मुंबई के लीलावती हॉस्पिटल में अंतिम सांस ली। प्राण लंबे समय से बीमार चल रह थे। कुछ समय पहले प्राण को 'दादासाहेब फाल्के पुरस्कार' से उनके घर में ही सम्मानित किया गया था। --------------------------------------------------------------

सिलसिला सिनेमाई सिक्वेल का (2013)

- हेमंत पाल साल के बीतने पर उसका हर मोर्चे पर मूल्यांकन किया जाता रहा है। ये परंपरा कहें, या हमारी पीछे मुड़कर देखने कि आदत, कोई फर्क नहीं है। गुजरे साल 2013 को यदि फिल्मों के मोर्चे पर परखा जाए तो ये साल कुछ ख़ास कारणों के लिए याद किया जाएगा! ऐसा ही एक कारण है, फिल्मों के सीक्वल का! इस साल कई फिल्मों के सीक्वल बने और रिलीस हुए! ऐसा नहीं है कि सिक्वल हमेशा सफलता का सौदा ही साबित हुए हैं। इस साल जहां 'कृष' के सिक्वल ने धूम मचाई, वहीं 'यमला पगला दीवाना-2, वंस अपान ए टाइम मुंबई दोबारा, और जंजीर के सिक्वल बॉक्स ऑफिस पर औंधे मूंह गिरे! पूरे साल सिक्वेंस के बाद साल का अंत भी 'धूम' के सिक्वल 'धूम-3' से हुआ, जिसने कमाई के नए रिकॉर्ड बनाए! जिसका एक गाना ही पांच करोड रूपए में फिल्माया गया है। 'कृष-3' और 'धूम-3' की बॉक्स ऑफिस सफलता ने सिनेमाई सिक्वल के सिलसिले को सरपट दौड़ने का बहाना भी दे दिया है। बॉलीवुड में भेडचाल की परम्परा हमेशा से रही है। 'दबंग' के बाद 'दबंग-2' 'अग्निपथ' के बाद 'अग्निपथ-2' और 'कृष-3' की जबरदस्त सफलता के बाद अब बॉलीवुड पर सिक्वल फिल्मों को भूत चढा हुआ है। इस साल शुरुआत से लेकर अब तक बॉक्स ऑफिस पर कमाई में अधिकतर यही फिल्में आगे रही हैं और यह दौर आगे भी कम होने वाला नहीं। कमाल 'कृष' और 'धूम' का बिजनेस के मामले में इस साल 'कृष-3' और 'धूम-3' ने इस साल प्रदर्शित सभी हिंदी फिल्मों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया! यह हॉलीवुड की कुछ समय पहले ही रिलीज हुई 'सुपरमैन' फिल्म से भी ज्यादा कमाई करने वाली साबित हुई है। साल 2013 सीक्वल फिल्मों के नाम ही रहा है। पूरे साल सिक्वल 2013 में इनकी शुरुआत जनवरी से हुई। 2008 में रेस’ फिल्म का सीक्वल रेस-2’ आया। सैफअली खान, दीपिका पादुकोण और जैकलीन फर्नांडीस अभिनीत यह फिल्म एक्शन थ्रिलर फिल्म थी। अपनी लागत से दुगनी कमाई करने वाली साल की यह पहली फिल्म बनी। रेस-2’ को दर्शकों ने सराहा और कमाई के मामले में भी यह हिट रही। जनवरी के बाद फरवरी में मर्डर-3’ ने दस्तक दी। अपने बोल्ड सीन की वजह से बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने दमदार एंट्री दर्ज कराई। 7 करोड़ की लागत से बनी मर्डर-3’ ने 18.31 करोड़ का बिजनेस किया। मार्च में 'साहिब बीबी और गैंगस्टर रिटर्न’ ने बॉक्स ऑफिस पर दस्तक दी। 7 करोड़ की लागत से बनी इस फिल्म ने फिल्मी पंडितों के गणित को गड़बड़ा दिया। यह साल की तीसरी हिट फिल्म बनी और 21.95 करोड़ की कमाई की। अप्रैल में आशिकी-2’ ने दर्शकों को खूब लुभाया। फिल्म के गीतों से लेकर स्टोरी तक को खूब वाहवाही और अप्रत्याशित सफलता मिली। बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट फिल्म का तमगा पाकर 'आशिकी-2' ने लागत के मुकाबले 78.42 करोड़ की कमाई की। जून में 'यमला पगला दीवाना-2’ आई, लेकिन दर्शकों ने इस फिल्म को ज्यादा नहीं सराहा। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिर गई। अगस्त 2013 में आई वंस ऑपन टाइम इन मुंबई दोबारा’ भी ज्यादा सफल नहीं रही। सितंबर में अमिताभ बच्चन की सुपरहिट फ़िल्म 'जंजीर’ का रीमेक आया, लेकिन फिल्म सुपरफ्लाप रही। नवंबर में 'कृष-3’ ने इस सूखे को खत्म किया और उसकी सफलता का ग्राफ बढ़ता गया। इसी माह यानी नवंबर में ही 'सत्या’ की सीक्वल 'सत्या-2’ भी रिलीज हुई। हालांकि, दर्शकों को खींचने में वह असफल ही रही है। दिसंबर में 'धूम' सीरीज की फ़िल्म 'धूम-3’ आई, जिसने कमाई का नया रिकॉर्ड बना डाला। एक सप्ताह में 200 करोड़ का बिज़नेस करने वाली इस फ़िल्म ने सीक्वल बनाने की चाह रखने वाले फिल्मकारों को ऑक्सीजन दे दी! सीक्वल फिल्मों का सिलसिला इस साल के अंत में ही ख़त्म नहीं हुआ है। नए साल की शुरुआत यानी 2014 में भी ऐसी फिल्मों की लिस्ट तैयार है। 'इश्किया’ का सीक्वल 'डेढ़ इश्किया, रागीनी-एमएमएस 2’, सिंघम-2, हेट स्टोरी-2’ जैसे सीक्वल्स दर्शकों के सामने होंगे। ----------------------

Tuesday, September 24, 2013

संजय निरुपम : 'मध्यप्रदेश में मुकाबला बराबरी का'

सांसद और अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सचिव संजय निरुपम ने अगस्त के पहले सप्ताह में इंदौर और उज्जैन संभाग की जिलेवार बैठक ली और पार्टी कार्यकर्ताओं से पूछा कि मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव के बारे में उनके पास क्या सुझाव है! इंदौर और उज्जैन में दो दिनों तक हुई इस बैठक में 16 जिलों के सैकड़ों कार्यकर्ताओं ने निरुपम से आमने-सामने सीधे बातचीत की और विचार रखे। पार्टी कार्यकर्ताओं से सीधे सुझाव लेने और उन्हें चुनाव के लिए उत्साहित करने के राहुल गाँधी के इस प्रयोग को काफी सराहना भी मिली। इस यात्रा के दौरान विभिन्न मुद्दों पर बातचीत करते हुए संजय निरुपम ने कहा कि कांग्रेस नरेंद्र मोदी से नहीं डरती! 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की ही सरकार बनेगी। भाजपा सपना देख रही है कि केंद्र में उसकी सरकार बनेगी। प्रधानमंत्री पद पर मोदी को लेकर उठे घमासान को लेकर निरुपम की राय यह थी कि भाजपा ने बच्चा पैदा होने से पहले ही झुनझुना खरीद लिया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का सवा सौ साल का इतिहास है और वह किसी भी तरह से मोदी से नहीं डरती! मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव के बारे में निरुपम ने कहा कि 200 सीटों पर तो कांग्रेस और भाजपा में बराबरी का मुकाबला रहेगा! जबकि, शेष 30 सीटों पर जोरदार घमासान होगा। यहाँ भी कर्नाटक की तर्ज पर ‍टिकट वितरण किया जाएगा। ऐसे उम्मीदवारों को ही टिकट दिया जाएगा, जो चुनाव जीत सकते हैं। सिफारिशी टिकटों पर अंकुश लगाया जाएगा। संजय निरुपम ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के मुद्दे पर कहा कि इस देश में व्यक्ति चुनाव नहीं लड़ता, पार्टियाँ चुनाव लड़ती है। भाजपा में जिस तरह की बैचेनी है, वही इस तरह की बात करता है। कांग्रेस सरकार ने गरीबों के लिए काफी काम किया है। जब हमारी सरकार बनेंगी, तब तय करेंगे कि कौन प्रधानमंत्री बनेगा! बेहतर हो कि भाजपा नेता अपने चरित्र, विचार और आइडोलॉजी में बदलाव करे। तेलंगाना मुद्दे पर उन्होंने कहा कि 2000 में एनडीए सरकार ने तीन राज्य बनाए थे। ये सभी राज्य वहां की विधानसभा ने सिफारिशों के आधार पर बनाए गए थे। तेलंगाना के मामले में कांग्रेस ही नहीं भाजपा नेता भी उसका समर्थन करते थे। भाजपा कल कुछ बोल रही थी, आज कुछ बोल रही है और कल कुछ और बोलेगी! जब तेलंगाना राज्य बन जाएगा, सारी समस्या हल हो जाएगी। सोशल मीडिया के बारे में निरुपम ने कहा कि देश में केवल 3 फीसदी लोगों का ही ट्‍विटर एकाउंट है। उनमें भी वे 47 प्रतिशत को ट्‍विट करतें हैं। मैं भी मुंबई से सांसद हूं और अपनी गतिविधियां ट्‍विटर पर डालता हूं। मैं हर सप्ताह अलग-अलग क्षेत्रों में जाता हूं और उसकी जानकारी ट्‍विटर पर देता हूं। देश महानगर नहीं है, पूरा देश मुंबई भी नहीं है, देश इंदौर भी नहीं है! सोशल मीडिया का इम्पैक्ट कुछ ही शहरों में पड़ता है, पूरे देश में नहीं! लोकसभा के 2014 के चुनाव में महंगाई सबसे बड़ा मुद्दा रहेगा? इस पर उन्होंने कहा कि 2008 में विश्वव्यापी मंदी शुरू हुई थी, जिसने अमेरिका की भी हालत खराब कर दी। 2010 के बाद भारत की स्थिति खराब हुई! ब्रिक्स देशों में भारत चीन के बाद दूसरे नंबर पर है, फिर भी बहुत अच्छी स्थिति नहीं है। उन्होंने आयात कम करने पर जोर दिया। निरुपम ने कहा कि लोगों की कमाई भी बढ़ी है। कई क्षेत्रों में 10 साल पहले जो वेतन मिलता था, वह अब तीन गुना हो गया है। लोगों की क्रय शक्ति भी बढ़ी है। दालों का उत्पादन देश में 12 प्रतिशत से बढ़कर साढ़े 18 प्रतिशत हो गया है। इसके लिए सरकार ने 'राष्ट्रीय दाल मिशन' तैयार किया है। पूरे देश में 25 हजार गांवों में किसानों को दाल उत्पादन के लिए प्रोग्राम बनाकर दिया, लेकिन अभी भी हम 4 हजार टन दाल आयात कर रहे हैं। निरुपम के मुताबिक देश में गरीबी रेखा के नीचे पहले 37 प्रतिशत लोग थे, जो अब 22 प्रतिशत रह गए हैं। इसका श्रेय केंद्र सरकार की 'मनरेगा' जैसी योजनाओं को जाता है। आरटीआई मालले पर उनका कहना था कि राजनीतिक दल प्रायवेट पार्टी हैं। जो भी पैसा खर्च होता है, उसका हिसाब बैलेंसशीट में दर्शाया जाता है। इसके बाद आरटीआई क्यों चाहिए, राजनीतिक पार्टियाँ बीसीसीआई नहीं है, देश का प्रतिनिधित्व नहीं करती। कौन मंत्री कितनी बार विदेश गया, मैंने अपने क्षेत्र में क्या काम किया, यह सब आरटीआई के दायरे में पहले से ही शामिल है! भ्रष्टाचार के मुद्दे पर निरुपम का कहना था कि भाजपा चाहती है नो करप्शन नो कांग्रेस। तो फिर येदियुरप्पा कहां से पैदा हुए? मप्र भाजपा में भी काफी भ्रष्टाचार है। 14 मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले चल रहे हैं। लेकिन, जांच का अभी तक कोई अता पता नहीं! मप्र में व्यापमं और अन्य घोटालों में राज्य सरकार नकेल कसने में नाकाम रही है।

Friday, August 23, 2013

छोटे राज्यों की मांग से उठे बड़े सवाल!

- हेमंत पाल --------------------------------------------------------------- आंध्र प्रदेश को विभाजित कर पृथक तेलंगाना राज्य के निर्माण का फैसला आते ही देश के अन्य भागों में छोटे राज्यों के लिए दशकों से चलते आ रहे आंदोलनों में नई जान आ गई। गोरखालैंड, विदर्भ, कार्बी आंगलांग, बोडोलैंड, पूर्वांचल, पश्चिम प्रदेश, अवध प्रदेश, हरित प्रदेश और बुंदेलखंड आदि अनेक राज्यों की मांग के समर्थन में आंदोलनों का दौर शुरू हो गया है। इस घटनाक्रम को देखते हुए यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अब केंद्र सरकार को दूसरे राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन करना चाहिए? जो कि नए राज्यों के पुनर्गठन की समस्या का राजनीतिक, भाषाई, सांस्कृतिक और भौगोलिक सभी पहलुओं का गहराई से अध्ययन करे , ताकि, इस आधार पर सरकार भविष्य में नए और छोटे राज्यों के निर्माण के बारे में सुविचारित मानक नीति तैयार करके उस पर अमल हो सके । तेलंगाना के गठन के केंद्र सरकार के फैसले ने देश के दूसरे हिस्सों में अलग राज्यों की मांग में चल रहे आंदोलनों को भड़का दिया है। इस्तीफों का दौर भी चला और सड़क पर विरोध भी हुआ! कोई खुश हुआ तो कोई दुखी! इस बात की आशंका भी थी, क्योंकि, ऐसे राजनीतिक फैसले सभी को खुश नहीं कर सकते! ऐसे में सवाल उठता है कि देश की आजादी के बाद से हमेशा ही अलग राज्यों की मांगें क्यों उठती रही है? इस तरह की मांगों के पीछे वोट की राजनीति है या फिर कोई और कारण? इन आंदोलनों के लिए क्या सिर्फ राज्यों की सांस्कृतिक और भौगोलिक भिन्नता ही जिम्मेदार है या फिर इसके पीछे कोई और कारण भी है? समाजशास्त्रियों के तर्क हैं कि समाज के अगड़े-पिछड़े के बीच तनाव, शोषण, भाषा और संस्कृति पर मंडराते खतरे, मुख्यधारा से कट जाने का खतरा और आजादी में खलल जैसे कारण ही अलग राज्य की मांगों को हवा दे रही है। लेकिन, इस तरह की मांगों के साथ जब भी राजनीति जुड़ती है तो आंदोलन की यह चिंगारी आग की शक्ल में सबकुछ जला डालती है। लंबे समय से देश के विभिन्न अंचलों से भाषाई, भौगोलिक और जातिगत आधार पर अलग राज्यों की मांग उठती रही है। कुछ मांगें तो आजादी से पहले की हैं और कुछ आजादी के बाद की! पश्चिम बंगाल के पर्वतीय क्षेत्र दार्जिलिंग में सबसे पहले 1907 में गोरखा समुदाय के लिए अलग राज्य की मांग उठी थी! अलग गोरखालैंड की मांग कर रहे 'गोरखा जनमुक्ति मोर्चा' के प्रमुख विमल गुरुंग कहते हैं, कि दार्जिलिंग तो कभी बंगाल का हिस्सा रहा ही नहीं! इतिहास भी इस बात का गवाह है। गोरखाओं की खत्म होती पहचान बनाए रखने के लिए गोरखालैंड जरूरी है। लेकिन, केंद्र सरकार ने कभी भी इन आंदोलनों को गंभीरता से नहीं लिया! कभी आंदोलनों को बल प्रयोग से दबाया गया तो कभी समझौतों के जरिए। किसी भी राजनीतिक दल की सरकार ने समस्या की तह तक जाने की कोशिश नहीं की! असम के 'बोडोलैंड टेरिटोरियल काउंसिल' के सदस्य हाग्रामा मोहिलारी का कहना है कि असम में रहकर बोडो जनजाति की पहचान ख़त्म होने वाली है। सरकार ने अलग काउंसिल का लालच भले दिया हो, पर अलग राज्य के बिना बोडो जनजाति की पहचान को बनाए रखना संभव नहीं! देश की आजादी के बाद राज्यों के पुनर्गठन की सबसे बड़ी कवायद 1953 में 'राज्य पुनर्गठन आयोग' बनाकर की गई थी! इसके तहत राज्यों की सीमाएं भाषाई आधार पर तय की जानी थी। भाषाई आधार का नतीजा ये हुआ कि भौगोलिक बसावट, क्षेत्रफल, आबादी और भाषा के अलावा दूसरी सामाजिक और सांस्कृतिक स्थिति जैसे मसलों को आयोग ने महत्व नहीं दिया! यही कारण था कि कुछ सालों बाद ही असंतोष पनपने लगा! चार साल बाद ही बंबई से अलग करके गुजरात को अलग राज्य का दर्जा दिया गया। इसके छह साल बाद पंजाब को तीन हिस्सों में बांटकर हरियाणा और हिमाचल प्रदेश बनाना पड़ा। देश में छोटे राज्यों के लिए नए सिरे से उठने वाली मांगों के लिए तीन बातें ख़ास तौर पर जिम्मेदार हैं। पहली वजह जाति और धर्म के आधार पर देश के सामाजिक ताने-बाने का राजनीतिकरण होना है। पिछले कुछ सालों में क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व बढ़ा है, जो लोगों की भावनाओं को भड़काकर मांग को आंदोलन का स्वरूप देने लगे हैं। चुनावी राजनीति में बड़े दल भी अपने क्षेत्रीय एजेंडे के तहत अलगाववाद की भावना को बढ़ावा देने में पीछे नहीं हैं! दूसरा कारण है देश में एकसमान विकास का अभाव! ऐसी स्थिति में यह भावना प्रबल हो जाती है कि अलग राज्य होने की स्थिति में क्षेत्र और वहां के लोगों के विकास की गति तेज होगी! क्योंकि, ये आम धारणा है कि विकसित इलाकों में निजी निवेश होता है, जिससे इलाके का विकास होता है। पिछड़े इलाके विकास की दौड़ में इसीलिए और पिछड़ते रहते हैं! अपने लिए अलग राज्य की मांग का समर्थन करने वालों के पास अपनी दलीलें हैं। मांग का समर्थन करने वाले कहते हैं कि छोटे राज्यों से सुशासन सुनिश्चित करने के अलावा विकास की गति भी तेज हो सकती है। गोरखा आंदोलन से जुड़े नेताओं का कहना है कि राजधानी से दूर होने की वजह से सरकार और प्रशासन का ध्यान इलाके की समस्याओं और विकास की ओर नहीं जाता। इन आंदोलनकारियों का ये भी कहना है कि छोटे राज्यों की विकास दर दूसरे राज्यों से बेहतर है। अपनी बात के समर्थन में वे छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड का हवाला देते हैं जिनकी औसतन सालाना वृद्धि दर दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान अपने मूल राज्यों (जिनसे अलग होकर उनका गठन हुआ था) के मुकाबले बेहतर रही। ऐसी मांगों का विरोध करने वाले इसे देश की एकता व अखंडता पर खतरा मानते हैं। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का कहना है कि दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र बंगाल का अभिन्न हिस्सा रहा है। कुछ इलाके को मिलाकर यदि गोरखालैंड बना भी दिया गया, तो संसाधान कहां से आएंगे? छोटे राज्यों के गठन से राजनीतिक व सामाजिक अस्थिरता भी बढ़ेगी! झारखंड इसका ताजा उदाहरण है जहां हर साल सरकार गिर या बदल जाती है। लेकिन, सिर्फ राजनीतिक अस्थिरता को आधार बनाकर छोटे राज्यों के पक्ष को नाकारा नहीं जा सकता!

Sunday, October 21, 2012

रिटेल का खेल : राजनीति पास ... जनता फेल

- भारत के मध्यमवर्ग पर दुनिया की नज़र - रिटेल के महारथियों का लोकल बाजार पर गहरा असर (हेमंत पाल) केंद्र सरकार के रिटेल में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के फैसले ने देश के विपक्षी दलों को नया मुद्दा थमा दिया है! इस मुद्दे पर ममता बेनर्जी ने सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया! जबकि, सरकार भी ऐसे अड़कर बैठी है की उसने भी ममता के फैसले की परवाह नहीं की! बीजेपी भी कमर कसकर सरकार को कटघरे में खड़ा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी! दरअसल, सरकार का यह फैसला उसका खुद का कम अमेरिकी दबाव में लिया गया ज्यादा लगता है! किसानों, लोगों और छोटे दुकानदारों को सब्जबाग़ दिखाकर सरकार भले ही उन्हें भ्रमित करने का प्रयास करे पर पिछले अनुभव बताते हैं की दुनिया के जिस भी देश ने इस तरह के फैसले लिए हैं, उन्हें अपने जनता के कोप का भजन बनना पड़ा है! 00000 यह आम जनता के माँगों की अनदेखी कर अपनी दादागिरी बताने जैसा ही है! ... केंद्र सरकार ने रिटेल के क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का दरवाजा पूरी तरह से खोल दिया है। देशभर में विरोध और बंद का खेल हुआ, लेकिन अंत में वही हुआ जो सरकार चाहती थी! सरकार ने इसे आर्थिक सुधार तेज करने का प्रयास बताया और तेज गति से निर्णय लेकर तमाम विरोधों के बावजुद रिटेल के क्षेत्र में एफडीआई को मंजूरी दे दी। रिटेल में विदेशी निवेश के पक्षधर इस फैसले को साल 1991 में आर्थिक उदारीकरण लागू होने के बाद से सबसे अहम् फ़ैसला बता रहे हैं! उनका मानना है कि इस फैसले से देश में कोई भी बड़ा निर्णय लेने की रुकी हुई प्रक्रिया फिर से आरंभ होगी। भारत के वाणिज्य मंत्री आनंद शर्मा के हिसाब से भारत 475 अरब अमेरिकी डॉलरों के बराबर के रिटेल के क्षेत्र में विदेशी निवेश चहुँमुखी विकास लाएगा। किसानों को लाभ? कई विशेषज्ञ कहते हैं कि भारत में एक तिहाई फल, सब्जियां और खाने-पीने की चीज़ें हर साल नष्ट हो जाती हैं, क्यों कि उन्हें सुरक्षित ढंग भंडारों में नहीं रखा जा सकता! अगर 'वॉलमार्ट' और 'टेस्को' जैसी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां भारत आती हैं तो वो अगले तीन से पांच साल तक हर साल तीन से पांच अरब डॉलर तक भण्डारण क्षमता को विकसित करने और ट्रांसपोर्ट व्यवस्था को मज़बूत करने में लगाएंगी। इस वजह से किसानों का माल कम सड़ेगा और और वो ज़्यादा बेच पाएगें। विदेशी व्यापारी किसानों का शोषण करने वाले दलालों से किसानों को मुक्ति दिलाएंगे और उनसे सीधे माल खरीदेंगे। इस प्रस्ताव का विरोध करने वालों का कहना है कि यह हसीन सपने कभी पूरे नहीं होंगे। इस फैसले के विरोधी कहते हैं कि रिटेल के क्षेत्र में काम करने वाली बड़ी-बड़ी भारतीय कंपनियों ने ऐसा कुछ नहीं किया! आम तौर पर बड़े-बड़े भारतीय रिटेलरों ने कोल्ड स्टोरेज में कोई खास निवेश नहीं किया और ज़्यादातर मौजूदा दलालों या थोक बाज़ार से खरीदते हैं। क्या उपभोक्ता का लाभ होगा ? इस पक्ष पर फैसले के समर्थकों का कहना है कि किसानों को ज़्यादा दाम देने के बावजूद बड़ी रिटेल कंपनियां उपभोक्ताओं को कम दामों में सामान बेच पाती हैं, क्योंकि वो दलालों को चलता कर देती हैं। वॉलमार्ट सालभर में अपनी १० हज़ार दुकानों के ज़रिये 450 अरब डॉलर का कारोबार करती है। वॉलमार्ट इन सभी दुकानों पर तुलनात्मक रूप से बेहद सस्ता सामान बेचती है। लेकिन, भारत में सर्वाधिक लाभ मध्य और उच्च मध्यवर्ग के उपभोक्ताओं को ही होगा। इस फैसले के विरोधियों का दावा है कि इसकी वजह से छोटे दुकानदार तबाह हो जायेगें। भारत में अभी रिटेल में संगठित क्षेत्र की हिस्सेदारी महज़ 4.2 फीसदी है। उद्योग व्यापार के संगठन 'फिक्की' के महासचिव राजीव कुमार का मानना है कि अगर अगले बीस सालों में ये हिस्सेदारी चार गुना बढ़कर 17 फ़ीसदी भी हो जाती है, तब भी साल 2032 में 900 अरब डॉलर के बाज़ार में इसका हिस्सा केवल 150 अरब डॉलर का होगा। तार्किक रूप से विदेशी रिटेल कंपनियां आरंभ में केवल बड़े शहरों में अपनी दुकानें खोलेंगी, क्योंकि इन शहरों के उपभोक्ताओं के पास ज़्यादा पैसा है। अभी प्रस्तावित सरकारी नीति में बहुराष्ट्रीय कंपनियां केवल उन्ही शहरों में दुकान खोल सकेगीं, जहाँ की आबादी दस लाख से ज़्यादा है। रिटेल की राजनीति नवंबर 2011 में यह फ़ैसला इसलिए नहीं लागू हो सका था, क्योंकि सरकार के कई साथी और विपक्षी दल इसके पक्ष में नहीं थे। जब सरकार को लगा की मामला उलझ सकता है तो वो पीछे हट गई! राज्यों के निर्णय : समर्थन में * हरियाणा : मुख्यमंत्री भुपिंदरसिंह हुड्डा ने ख़ुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के निर्णय का फ़ैसला किया और कहा है कि इससे किसानों को उनके माल की बेहतर क़ीमत मिलेगी और ये उपभोगताओं को फ़ायदेमंद होगा। * दिल्ली : मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने मंत्रीमंडल के फ़ैसले को बहुत बड़ा क़दम बताया और कहा कि इससे लोगों को बेहतर गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थ मुहैया हो पाएंगे और नौकरियां पैदा होंगी। * राजस्थान : कांग्रेस शासित एक दूसरे प्रदेश के मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत ने कहा कि इससे प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और कृषि क्षेत्र को फ़ायदा पहुंचेगा। * महाराष्ट्र : मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चौहान के मुताबिक़ इससे पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी और माल की सप्लाई में पैदा होनेवाली बाधाएं ख़त्म होंगी। * असम : असम के मुख्यमंत्री के इस फ़ैसले से ख़ुश होने की बात कही गई है। इसके अलावा आंध्र प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्रियों द्वारा भी इस फैसले के समर्थन की बात कही गई है। फैसले का विरोध रिटेल क्षेत्र को खोले जाने के विरोध के चलते इसे लंबे समय से टाला जाता रहा है। जहां कांग्रेस शासित इन प्रदेशों ने मंत्रीमंडल के फ़ैसले का स्वागत किया है, वहीं दक्षिणी राज्य केरल ख़ुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के ख़िलाफ़ है। * गुजरात : मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि वो नहीं जानते कि प्रधानमंत्री कर क्या रहे हैं! उनके मुताबिक़ छोटे दुकानदारों का धंधा इससे चौपट हो जाएगा। हालांकि, नरेंद्र मोदी पहले इस खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश के पक्ष में बोलते रहे हैं। * उड़ीसा : मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने इसे मुल्क को पीछे ले जानेवाला और ग़लत सलाह पर लिया गया फ़ैसला बताया। * पश्चिम बंगाल : तृणमुल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी ने इस मुद्दे पर सरकार से समर्थन ही वापस ले लिया है और वे आर-पार की लड़ाई लड़ने को तैयार है। * उत्तर प्रदेश : केंद्र की कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार को बाहर से समर्थन दे रही समाजवादी पार्टी के राज्य के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने लखनऊ में किए गए एक प्रेस कांफ्रेस में साफ़ किया है कि वो इस फ़ैसले को राज्य में लागू नहीं करेंगे। * बिहार : मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि इससे लाखों लोगों को कामकाज का नुक़सान होगा। * मध्य प्रदेश : मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के अनुसार इस फ़ैसले से छोटे व्यापारियों और किराना दुकानदारों को नुक़सान उठाना होगा। अनिश्चित स्थिति * पंजाब : मुख्यमंत्री प्रकाशसिंह बादल ने भी कहा है कि वो इस पर बाद में निर्णय देंगे। प्रकाश सिंह बादल राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल हैं, जिसका मुख्य दल भारतीय जनता पार्टी इस फैसले का विरोध कर रहा है। * झारखंड : मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने कहा है कि वो नागरिकों और स्थानीय व्यापारियों से सलाह मशविरा करने के बाद किसी नतीजे पर पहुंचेंगे। * कर्नाटक : उद्योग मंत्री मुरुगेश निरानी ने कहा है कि राज्य सरकार नीति का गहन अध्ययन करने के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचेगी। इस राज्य में बीजेपी की सरकार है। जोरदार तरीके से लाबिंग रिटेल के महारथी जैसे टेस्को व वॉलमार्ट ने भारत में प्रवेश पाने के लिए अपनी ओर से काफी मेहनत की है, ऐसा कहा जा सकता है। राजनीतिक पार्टियों से लेकर नीतियां बनाने वाली संस्थाओं के लिए कंपनी ने जबर्रदस्त लाबिंग की। इसी का परिणाम है कि सरकार ने इस क्षेत्र में एफडीआई की छूट दे दी। हमें यह समझना होगा कि इन रिटेल के दिग्गजों का भारत में आने का रास्ता यू हीं नहीं खुला, बल्कि अमेरिका के दबाव में खोला गया है! वॉलमार्ट कंपनी इस बात को स्वीकार करती है कि उसने भारत में इस एफडीआई के लिए लाबिंग की है। अमेरिका में लाबिंग करना कानून सम्मत है, पर भारत में अभी ऐसा कुछ नहीं है। अगर कोई अमेरिकी कंपनी विदेश में लाबिंग कर रही है, तब उसे अमेरिकन सीनेट को इस बारे में जानकारी देनी होती है। अमेरिका की कई कंपनियां भारत में विभिन्न आयोजनों व अन्य तरीकों से अपने पक्ष में माहौल बनाने में जुटी हैं। यह बात तय है कि रिटेल में एफडीआई के लिए भारत में जोरदार तरीके से लाबिंग हुई और सरकार ने इसी के कारण मंजूरी दी है। अब देश को यह जानकारी मांगने का हक है कि अमेरिकी कंपनियों ने किस तरह से लाबिंग की और इसका असर और फायदा किसे हुआ? इस लाबिंग का प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुप से फायदा कौन से नेताओं और राजनीतिक पार्टियों को हुआ? इनके नुकसान पर कई शोध रिटेल के महारथियों का किसी देश में जाना और वहां उसका असर, इस विषय पर अब तक कई शोध हो चुके हैं। लोवा स्टेट यूनिवर्सिटी के केनेथ स्टोन ने अपने शोध में बताया था कि छोटे शहरों में अगर वॉलमार्ट स्टोर खुलते हैं तो उस शहर का रिटेल व्यापार दस वर्ष में आधा हो जाता है। एक अन्य शोध में यह तथ्य सामने आया कि जब भी वॉलमार्ट किसी शहर में अपना मेगा स्टोर आरंभ करता है, तो वहां के बड़े स्टोर्स की सेल्स ४० प्रतिशत, सुपरमार्केट की १७ प्रतिशत तथा ड्रग स्टोर का ६ प्रतिशत सेल्स कम हो जाता है। यह शोध टक स्कूल ऑफ बिजनेस डार्टमाउथ कॉलेज ने किया था। वही लोयलो यूनिवर्सिटी शिकागो ने भी शोध किया था! उसमें यह तथ्य सामने आया कि वॉलमार्ट की किसी शहर में अन्य रिटेल स्टोर्स से दूरी पर ही सबकुछ निर्भर करता है। वहीँ जून २००६ में प्रकाशित एक लेख के अनुसार वॉलमार्ट के कारण कुछ रिटेल बिजनेस बंद जरुर हुए हैं, पर छोटे बिजनेस के लिए नई उम्मीदे भी जगी हैं। वहीँ वॉलमार्ट और कंसल्टिंग फर्म ग्लोबल इनसाईट द्वारा किए गए शोध में यह तथ्य सामने आया कि जहां भी वॉलमार्ट स्टोर खुले, वहां के कार्यकारी परिवारों को प्रतिवर्ष ढाई हजार डॉलर की बचत होती है। इकोनामिक पॉलिसी इंस्टि्‌टयूट के अनुसार वर्ष २००१ से २००६ के बीच वॉलमार्ट के चीन से व्यापारिक संबंधों के कारण दो लाख अमेरिकियों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। आज विश्व में वॉलमार्ट ८९७० जगहों पर हैं, वहीँ टेस्को के ५३८० स्टोर्स हैं। बढेंगे रोजगार या बेरोजगारी इस वक्त सबसे अहम सवाल है कि एफडीआई के आने के बाद नौकरियों के अवसर बढेंगे या फिर बेरोजगारी बढेगी? अर्थशास्त्री और मार्केट विशेषज्ञ डॉ अश्विनी महाजन का कहना है कि एफडीआई आने के बाद रिटेल भी आईटी सेक्टर की तरह बन जाएगा। विदेशी कंपनियों का कारोबार करने का तरीका ही अलग है, उन्हें कुशल पेशेवर चाहिए। जो कुशल नहीं हैं या ज्यादा पढे-लिखे नहीं हैं, उन्हें इन विदेशी रिटेल स्टोर्स में नौकरी नहीं मिलेगी। वे यहां पर उन्नत तकनीक लेकर आएंगे। इसे ऐसे भी समझ सकते हैं की अमेरिका में रिटेल मार्केट का साइज ५२ लाख करोड़ रुपये का है, मगर वहां रिटेल सेक्टर में महज १५ लाख लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिला है। इसके उलट भारत का रिटेल सेक्टर ५ लाख करोड़ रुपये का है, मगर यहां पर प्रत्यक्ष रोजगार ५ करोड़ हैं। अगर यहां भी रिटेल कारोबार की शक्ल अमेरिका की तरह हो जाए तो रोजगार कितना कम हो जाएगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। कृषि सेक्टर को कितना फायदा? सरकार की चाहत कृषि सेक्टर के ग्रोथ रेट को ४ फीसदी पर पहुंचाने की है। सरकार का भी मानना है कि रिटेल सेक्टर में एफडीआई के आने से कृषि सेक्टर में पैसो की आवक बढ़ेगी, यह कहना सही नहीं होगा। क्योंकि, हमारे यहां नीति और नियम तो बनते हैं, मगर सही तरीके से लागू नहीं होते! बेशक एफडीआई के आने से कंपनियां कृषि उत्पाद सीधे किसानों से खरीदेंगी। कंपनियां परोक्ष रूप से कॉरपोरेट खेती भी शुरू कर सकती हैं। वे किसानों को पैसा देकर खेती करवा सकती हैं और कृषि उत्पाद खरीद सकती हैं। मगर इसकी क्या गारंटी है कि सब कुछ तय नीति-नियमों के आधार पर होगा या बिचौलिया इसका फायदा नहीं उठाएंगे? नियम कड़ाई से लागू करना होंगे रिटेल के क्षेत्र में ध्यान देनेवाली पहली बात यह है कि विदेशी कंपनियां शुरू में अपने बाजार की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए अपना मुनाफा कम कर सकती हैं। इससे चीजों की कीमतें कम हो जाएंगी, मगर दूसरी कंपनियों के लिए उस कीमत पर कारोबार करना मुश्किल हो जाएगा। ऐसा ही थाईलैंड में भी हुआ था। मल्टी-नेशनल कंपनियों ने शुरू में अपना मुनाफा ३ से ५ प्रतिशत रखा। इसकी वजह से घरेलू कंपनियों के लिए काम करना मुश्किल हो गया। सरकार को हस्तक्षेप कर कम से कम कीमत को लेकर एक नीति बनानी पड़ी। दूसरे, विदेशी कंपनियों के कारोबार पर नजर रखने के लिए उनकी समीक्षा करनी होगी। ब्रिटेन और अमेरिका में तिमाही में एक बार मल्टी-नेशनल कंपनियों के कारोबार, उनकी चीजों की दूसरे देशों में कीमतें, विस्तार योजना, रोजगार और दूसरे संबंधित पहलुओं पर एक्सपर्ट कमेटी एक रिपोर्ट तैयार करती है। इससे मल्टी-नेशनल कंपनियां बेकाबू नहीं हो पातीं और मार्केट भी काबू में रहता है। वॉलमार्ट अमेरिकी कंपनी है, मगर अमेरिका में कारोबार के अपने तय नियम हैं। वॉलमार्ट ने जब इन नियमों का उल्लंघन किया तो कैलिफॉर्निया और शिकागो की नगर पालिका ने वॉलमार्ट के स्टोर खोलने पर रोक लगा दी! वॉलमार्ट पर वस्तुओं के भाव बाजार से ज्यादा रखने और अपने कर्मचारियों से तय समय से ज्यादा काम कराने के आरोप लगे थे। क्या है ब्रांडेड रिटेल में एफडीआई आजकल किसी भी मॉल या रिटेल स्टोर में ज्यादातर विदेशी ब्रांड की चीजें एक साथ मिल जाती हैं। मगर किसी विदेशी ब्रांड की दुकानों में सिर्फ उसी ब्रांड की चीजें मिलती हैं। इसे 'सिंगल ब्रांडेड रिटेल' कहते हैं। अब यह स्थिति बदलेगी। विदेशी कंपनियां अपनी भारतीय सहयोगी कंपनियों के साथ मिलकर मॉल या रिटेल स्टोर खोल सकेंगी, जिसमें सभी ब्रांड की चीजें बेची जा सकेंगी। दूसरे शब्दों में कहें तो अब विदेशी कंपनियां भारत में रिटेल स्टोर खोल सकेंगी और वे रिटेल स्टोर की मालिक होंगी।

Tuesday, September 6, 2011

'प्रत्यक्ष" से राजनीति को अप्रत्यक्ष लाभ

(हेमंत पाल)
प्रदेश में अब राजनीति की नई पौध फिर से पनप सकेगी। पिछले दो दशकों से राजनीति की जो नर्सरी मुरझाने लगी थी, अब उसके फिर पनपने का संकेत मिल गया है। दो दशक बाद अब कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में वह माहौल फिर दिखाई देगा, जिससे एक पूरी पीढ़ी अनजान रही है। छात्रसंघ चुनाव को रोकने की जरूरत क्यों पड़ी? इसके क्या दुष्परिणाम आँके गए और और फिर प्रत्यक्ष तरीके से छात्रसंघ चुनाव कराने की जरूरत क्यों महसूस हुई? इन सवालों पर चिंतन न भी किया जाए, तो यह सुखद संकेत है, कि प्रदेश सरकार ने इन चुनावों के लिए अपनी रजामंदी दे दी है।
अभी तक कॉलेजों में कक्षा के किसी पढ़ने वाले छात्र को मुखिया बना दिया जाता था। इसका नतीजा यह होता कि वह या तो वह अपनी पढ़ाई से पिछड़ जाता था, या अपने दायित्व का ठीक से निर्वाह नहीं कर पाता! सरकार और शिक्षक भी इस बात को समझ रहे थे, लेकिन इस दिशा में कुछ हो नहीं पा रहा था। जबकि, राजनीतिक नजरिए से देखा जाए तो राजनीति की जो नर्सरी कॉलेजों में पनप कर आगे जाकर प्रदेश में अपनी पहचान बनाती थी, वह पूरी तरह मुरझाकर सूख चुकी थी। लाख खामियों के बावजूद इस सच को नकारा नहीं जा सकता कि छात्र संघ चुनाव राजनीति समझने की पहली सीढ़ी हैं। आज लोकसभा और प्रदेश की विधानसभा में ऐसे नेताओं की संख्या ज्यादा है, जो कभी न कभी छात्र राजनीति से जुड़े रहे थे।
छात्रसंघ चुनाव की प्रत्यक्ष प्रणाली राजनीति की वह पाठशाला है, जहाँ छात्रों को वे सारी प्रक्रियाएं जानने और समझने का मौका मिलता है, जो राजनीति के रीयल मंच पर घटित होती हैं। इसका राजनीतिक दलों को यह लाभ होता है, कि उन्हें कुछ ऐसे तपे तपाए छात्र नेता मिल जाते हैं, जो उनके लिए आधार का काम करते हैं। उनकी राजनीतिक योग्यता और नेतृत्व क्षमता का आकलन भी यहीं हो जाता है और आगे बढ़ने का मौका मिलता है। जब से छात्रसंघ चुनाव की प्रत्यक्ष प्रणाली पर रोक लगी थी, तब से राजनीति में प्रवेश का यह रास्ता पूरी तरह बंद ही हो गया था। क्योंकि, अब तक चल रही प्रणाली में जो छात्र अपनी कक्षा, कॉलेज या विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करते थे, उनका मकसद राजनीति में जाना कतई नहीं होता था। ... ओर जो छात्र प्रत्यक्ष प्रणाली के जरिए इस मैदान में उतरते हैं, उनके जहन में कहीं न कहीं राजनीतिक उत्कंठा रहती है। अब, जबकि सरकार ने प्रत्यक्ष प्रणाली से छात्रसंघ चुनाव का रास्ता खोल दिया है, यह उम्मीद की जाना चाहिए कि प्रदेश की राजनीति की उस सूख चुकी नर्सरी में फिर बहार आएगी और कुछ नए चेहरे अपनी आमद दर्ज कराएंगे।
(मप्र सरकार ने कॉलेजों में प्रत्यक्ष छात्रसंघ चुनाव को मंजूरी दी)