Tuesday, December 17, 2019

परदे का दुष्कर्म इतना वीभत्स नहीं!

- हेमंत पाल

 न दिनों समाज में दुष्कर्म की घटनाएं बढ़ रही है। जिस वीभत्स तरीके से ये घटनाएं हो रही है, उसे देखकर लगता है मानो हर दुष्कर्मी ये साबित करने में तुला है कि इस दरिंदगी में वे सबसे आगे है। एक समय वो भी था जब दुष्कर्म के इक्का-दुक्का मामले होते थे, जिन्हें भाषा संस्कार के तहत 'शील भंग' कहा जाता था। इसके बाद इसे बलात्कार के रूप में परिभाषित किया जाने लगा! क्योंकि, जो कृत्य होता था, वो बलात होता है। लेकिन, अब जिस तरह से नाबालिग और दूध पीती बच्चियों के साथ दरिंदगी के मामले सामने आए हैं, उसने हैवानिययत की पराकाष्ठा लांघ ली। समाज में बरसों से यह चलन है कि हर सामाजिक बुराई के पीछे फिल्मों को दोष दिया जाता है। यह भी कहा जाता रहा है कि दुष्कर्म की घटनाओं में उन फिल्मों की ख़ास भूमिका होती है, जिनमें ऐसे दृश्यों का महिमा मंडन किया जाता है। लेकिन, आज जिस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं, उन्हें देख और सुनकर सिनेमाई दुष्कर्म बौना सा लगने लगा है। क्योेंकि, शायद ही कोई फिल्म ऐसी होगी जिसमें बलात्कार के इतने घिनौने चेहरे को दिखाया गया होगा! हकीकत तो यह है कि आज समाज में व्याप्त इस हिंसक तथा घिनौनी प्रवृत्ति के सामने सिनेमा के परदे पर दिखाए जाने वाले नकली दुष्कर्म वास्तविकता से कोसों दूर हैं।
  हिन्दी फिल्मों की कहानी मेें दुष्कर्म का सिलसिला काफी पुराना है। दिलीप कुमार से लेकर देव आनंद और राज बब्बर से लेकर रणजीत और प्रेम चोपड़ा तक इस घिनौनी सामाजिक बुराई के हिस्सेदार बन चुके हैं। लेकिन, किसी भी फिल्म में ऐसे दृश्यों को इतने विकृत रूप में नहीं बताया गया, जैसा कि आज वास्तविकता में देखा जा रहा है। फिल्म 'अमर' में दिलीप कुमार एक अनपढ़ नौकरानी निम्मी के साथ दुष्कर्म करते हैं। फिल्म की नायिका उनके खिलाफ न्यायालय में कड़ी होकर उसे इंसाफ दिलाती है। देव आनंद की फिल्म 'आंधियाॅं' में भी देव आनंद के कोप का शिकार निम्मी ही होती है। संयोग है या भेड़चाल है कि 50 के दशक की अधिकांश ऐसी फिल्मों में निम्मी को सबसे ज्यादा बार दुष्कर्मियों ने अपना शिकार बनाया। इंदौर मे फिल्माई गई फिल्म 'आन' में भी निम्मी ही प्रेमनाथ की हवस का शिकार बनती है।
  इसके बाद वह दौर भी आया जब नायक की बहन को खलनायक ने अपनी बदनीयत का शिकार बनाता है। इस तरह की पीड़ित बहनों में नाजिमा के हिस्से यह भूमिका सबसे ज्यादा बार आई। कई फिल्मों में नायक की अंधी बहन के साथ दुष्कर्म के दृश्य फिल्माए गए! नौकरानी के साथ नायक के भाई या किसी रिश्तेदार ने परदे पर ज्यादती की। दुष्कर्म के दृश्यों से भरपूर इस तरह की फिल्मों में अंजाना, झील के उस पार जैसी फिल्मों के नाम हैं। ऐसा नहीं है कि केवल सह-नायिकाएं ही पर्दे पर दुष्कर्म का शिकार बनी! कई फिल्मों में नायिकाओं को भी इस पीड़ा से गुजरना पडा है। ऐसी फिल्मों में सबसे सफल फिल्म थी बिमल राय की 'मधुमति' जिसमें नायिका वैजयंती माला को अय्याश जमींदार की भूमिका निभा रहे प्राण की हवस का शिकार बनना पडता है। श्वेत-श्याम दौर की इस फिल्म में बिमल राय ने लाइट एंड शेड के माध्यम से इस दृश्य को इतना वास्तविक बनाया था, कि दर्शकों को केवल प्राण की आंखे और दीवार पर टंगे शेर के मुखौटे को देखकर की दुष्कर्म का वीभत्स चेहरा दिखाई देने लगता है।
  जब रंगीन फिल्मों का दौर आया तो दुष्कर्म के दृश्यों में रंगीनियत जोड़कर इससे दर्शकों को गुदगुदाने का काम किया गया। 'अपराध' जैसी फिल्मों में दुष्कर्म के लम्बे सीन करने के बाद रणजीत को इसका एक्सपर्ट माना जाने लगा। मनमोहन भी इसी श्रेणी में आए थे, जब उन्होंने 'आराधना' में शर्मिला टैगौर के साथ दुष्कर्म का दृश्य जीवंत बनाया। मनोज कुमार ने 'रोटी कपडा मकान' में मौसमी चटर्जी के साथ दुष्कर्म का दृश्य आटे की बोरियों के बीच फिल्माकर एक नया अंदाज दिया था। 'इंसाफ का तराजू' में पदमिनी कोल्हापुरे के अधोवस्त्र पर की रिंग फेंककर राज बब्बर ने दुष्कर्म की वीभत्सता का नया अंदाज दिखाया था। 
  अजय देवगन की फिल्म 'जिगर' में हीरो बहन की इज्जत लूटने का बदला लेता है। फिल्म 'बहार आने तक' में रूपा गांगुली अपने बलात्कार का बदला लेने के लिए बलात्कारी के बड़े भाई से शादी कर लेती है। बाद में देवर को ख़ुदकुशी करना पड़ती है। 'सात खून माफ़' में प्रियंका चौपड़ा भी दुष्कर्म का बदला लेती है तो दुश्मन फिल्म में काजोल अपनी बहन से हुए बलात्कार का बदला लेती है! लेकिन, 'प्रेम ग्रंथ' में माधुरी के साथ हुए दुष्कर्म का पूरा गाँव आरोपी को जिंदा जलाकर बदला लेता है। एक ऐसी भी फिल्म 'जख्मी औरत' बनी थी, जिसमें डिंपल कपाड़िया दुष्कर्म पीड़ित महिलाओं की गैंग बनाकर बदला लेती है? लेकिन, इन सब फिल्मों का आधार दुष्कर्म और बदले की भावना थी। इस दौर में 'मधुमति' के बाद बलात्कार पर सबसे ज्यादा सटीक तथा प्रभावकारी फिल्म बनी थी रेखा अभिनीत 'घर' जिसमें सामूहिक दुष्कर्म से गुजरी महिला की भावनाओं तथा दर्द को रेखा ने वास्तविकता प्रदान की थी। 'दामिनी' में भी इस समस्या पर कैमरा सार्थक तरीके से चलता दिखाई दिया! वरना अधिकांश फिल्मों में सिनेमाई दुष्कर्म हमेशा ही असलियत से परे ही दिखाई दिए। 
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प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वो बनेगा, जिसे शिवराज सिंह नहीं चाहेंगे?

   मध्यप्रदेश भाजपा का नया अध्यक्ष कौन होगा, इसे लेकर पार्टी के अंदर घमासान जारी है। सतह पर शांति नजर आ रही है, पर नीचे जमकर राजनीति चल रही! एक तरफ वर्तमान अध्यक्ष राकेश सिंह को दोबारा अध्यक्ष बनाए जाने की कोशिश है, दूसरी तरफ शिवराजसिंह चौहान अपने गुट के किसी नेता को अध्यक्ष बनाए जाने की जुगत में लगे हैं! वे खुद इस दौड़ में नहीं हैं, पर राजनीति की शतरंज की बिसात पर मोहरे वे ही चल रहे हैं। ऐसी स्थिति में आम सहमति बनने में मुश्किल नजर आ रही है! इस चुनाव में संघ की भी भूमिका नजर आ रही है! संघ की कोशिश है कि किसी ऐसे नेता को प्रदेश की कमान सौंपी जाए, जो उनसे जुड़ा हो! भाजपा में इस बार का प्रदेश अध्यक्ष का चुनाव पिछले चुनाव से अलग है। क्योंकि, पार्टी सत्ता में नहीं है! लेकिन, हालात जो भी बनें, अंतिम फैसला पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की मर्जी के बिना संभव नहीं है! ऐसी स्थिति में शिवराज सिंह का पत्ता सबसे कमजोर है! इस बात के भी पूरे आसार हैं कि अध्यक्ष की कुर्सी उसे मिलेगी जिसे शिवराज अध्यक्ष बनने देना नहीं चाहेंगे! 
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- हेमंत पाल

     मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी को नए प्रदेश अध्यक्ष के चुनाव की हलचल पूरे शबाब पर है। सतह से ऊपर सन्नाटा है, पर सतह के नीचे एक-दूसरे की टांग खिंचाई चल रही है। ऐसे हालात में पार्टी को मुश्किल दौर से गुजरना पड़ सकता है! डेढ़ दशक बाद प्रदेश में ऐसा मौका आया, जब पार्टी सत्ता में नहीं है और गुटबाजी का नेतृत्व करने वाले नेता अपने चहेते को अध्यक्ष बनाने की जुगत लगा रहे हैं! भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष का चुनाव दिसंबर माह के अंत में प्रस्तावित है, इसलिए प्रदेश के अध्यक्ष का चुनाव इससे पहले होना जरूरी समझा जा रहा है। भाजपा में इस बार अध्यक्ष पद के लिए वर्तमान अध्यक्ष राकेश सिंह के अलावा, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा, पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्रा, भूपेंद्र सिंह, विश्वास सारंग और सांसद विष्णुदत्त शर्मा बड़े दावेदार हैं। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर और प्रहलाद पटेल की सक्रियता भी नजर आ रही है। पार्टी के मुताबिक प्रदेश भाजपा का अध्यक्ष वही होगा, जिसे पार्टी नेतृत्व के अलावा आरएसएस का समर्थन मिलेगा। भाजपा चाहती है कि प्रदेश में पार्टी का नेतृत्व किसी युवा और साफ-सुथरी छवि के व्यक्ति को सौंपा जाए, जिसके पास सशक्त जनाधार हो! 
  मध्यप्रदेश के अध्यक्ष के लिए रायशुमारी का फैसला और उसकी बागडोर राम माधव जैसे नेता को दी गई हैं। बतौर पर्यवेक्षक केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी और अश्विनी चौबे को नियुक्त किया है। इससे लगता है कि इस पद को लेकर पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व भी गंभीरता से मंथन कर रहा है। संघ भी नहीं चाहता कि वो इस बार अध्यक्ष पद को अपने हाथ से जाने दे! इसका सीधा आशय है कि किसी एक नाम पर आम सहमति न बन पाने की स्थिति में प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संघ समर्थित किसी नेता को सौंपी जाने के आसार हैं। अरविंद भदौरिया, विष्णुदत्त शर्मा और अजयप्रताप सिंह को संघ ने ही आगे बढ़ाया है! बताते हैं कि विष्णुदत्त शर्मा के नाम को लेकर काफी कुछ सहमति बन भी चुकी है, लेकिन अभी कुछ कहा नहीं जा सकता कि अंतिम स्थिति क्या होगी! 
  रायशुमारी के पीछे मुख्य मकसद मौजूदा अध्यक्ष राकेश सिंह को एक बार फिर मौका दिए जाने, संघ समर्थित किसी नेता को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपने, राकेश सिंह के विरोधियों को किनारे करने और ऐसे लोगों को चुनाव की दौड़ से अलग रखना हैं, जो इस काबिल नहीं हैं! लेकिन, सहमति के आसार बहुत कम नजर आ रहे हैं। चुनाव में शिवराज सिंह की भूमिका को लेकर दूसरे गुट के कई नेताओं को आपत्ति है। क्योंकि, वे खुद के तो चुनाव से अलग होने की घोषणा कर चुके हैं, पर अपने गुट के भूपेंद्र सिंह और रामपाल सिंह के लिए जमकर लॉबिंग कर रहे हैं। उनका एक ही मकसद है कि किसी भी स्थिति में राकेश सिंह को दोबारा मौका नहीं दिया जाना चाहिए! लेकिन, शिवराज सिंह की बात को पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व गंभीरता से लेगा, इसमें शक है! शिवराज सिंह ने शुरू से ही राकेश सिंह को आने निशाने पर रखा है, कि वे कहीं दोबारा अध्यक्ष न बन जाएं! इसलिए उन्होंने अपने तरकश के हर तीर का इस्तेमाल किया। जब उनकी चाल कमजोर पड़ने लगी, तो उन्होंने कृष्णमुरारी मोघे तक पर दांव खेलने की कोशिश की! उन्हें पता था कि ये बुझा हुआ तीर है, फिर भी उन्होंने पांसा फैंका! इसका नतीजा ये हुआ कि मोघे का नाम सामने आते ही सुमित्रा महाजन ने दिल्ली की तरफ कूच किया और पार्टी को अपना पक्ष बताया! इसके बाद स्थिति ये बनी कि खुद शिवराज सिंह भी राकेश सिंह के घर पहुँच गए! उधर, प्रभात झा ने भी ऐसा ही एक बुझे तीर उषा ठाकुर का नाम आगे बढ़ाकर किया था, पर इस नाम को किसी ने भी गंभीरता से नहीं लिया! 
  राकेश सिंह दूसरी पारी के लिए आश्वस्त हैं, लेकिन शिवराज सिंह के साथ भिड़ंत के कारण उनका दावा कमजोर लगता है। उनके विरोधी गुट का कहना है कि राकेश सिंह की अपने कार्यकाल में कोई खास उपलब्धि नहीं रही। उनके कार्यकाल में ही भारतीय जनता पार्टी को सत्ता गंवानी पड़ी है। जहाँ तक लोकसभा चुनाव में 29 में से 28 सीट जीतने की बात है, तो इसे मोदी लहर माना गया! पार्टी में सबसे बड़ी चुनौती नेताओं की आपसी गुटबाजी को माना गया था, जिसे दूर करने में राकेश सिंह सफल नहीं हुए! उन पर ये भी आरोप लगा है कि उन्होंने खुद का भी एक गुट खड़ा कर लिया। उनके और शिवराज सिंह के बीच चल रही गुटबाजी भी साफ दिखाई दे रही है। एक मुद्दा ये भी है कि क्या सामाजिक समीकरणों की इन चुनाव में अनदेखी की जाएगी? अभी अध्यक्ष पद पर राकेश सिंह हैं, जो ठाकुर हैं तो क्या फिर किसी उच्च जाति के नेता को मौका दिया जाएगा? यदि ब्राह्मण, ठाकुर या वणिक जाति के नेता को अध्यक्ष बनने का मौका दिया गया तो ओबीसी या आदिवासियों में अच्छा संदेश नहीं जाएगा! लेकिन, अभी जो नाम सामने आए हैं, उनमें न तो कोई आदिवासी है और किसी ओबीसी का नाम किसी गुट ने आगे बढ़ाया है!   
   खजुराहो लोकसभा सीट से सांसद और संघ के खाते से विष्णुदत्त शर्मा को प्रदेश अध्यक्ष पद की दौड़ में दमदार नाम बताया जा रहा है। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के नेता होने के नाते संघ में विष्णुदत्त शर्मा की अच्छी पकड़ है। वे संगठन के आदमी है और उन्होंने पूरे प्रदेश में काम किया है! उनके समर्थकों की संख्या भी अच्छी खासी है। लेकिन, भाजपा के कुछ नेता विष्णुदत्त शर्मा को अध्यक्ष पद तक पहुँचने देना नहीं चाहते! इसके कई कारण हैं! सबसे बड़ा तो ये कि वे प्रदेश में बड़े नेता बनकर उभरेंगे, जो अभी नहीं हैं! इसके अलावा वे स्वभाव से गुस्सैल हैं और कभी भी, कहीं भी वे अपना संयम खो देते हैं! ऐसी स्थिति में उनकी ये आदत पार्टी को नुकसान पहुंचा सकती है। इसके अलावा नरोत्तम मिश्रा का नाम भी शुरू में लिया जा रहा था, लेकिन वे अब पीछे हट गए! इसके पीछे उनकी अपनी रणनीति समझी जा रही है। शिवराज गुट से भूपेंद्र सिंह और रामपाल सिंह के नाम भी हैं। विश्वास सारंग को भी शिवराज समर्थकों में गिना जाता है। जबकि, राज्यसभा सांसद प्रभात झा और सांसद वीरेंद्र खटीक के नाम भी चर्चा में हैं। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को भी इस पद के लिए स्वाभाविक दावेदार समझा जाता रहा है। लेकिन, अभी उनके पास पश्चिम बंगाल की बड़ी जिम्मेदारी है, इसलिए पार्टी उनका लक्ष्य बदलना नहीं चाहेगी! 
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Wednesday, December 11, 2019

पुलिस और अपराधियों के बीच लाचार जनता की बेबसी!

   देश के 10 लाख से अधिक आबादी वाले 35 शहरों में से 18 ऐसे शहर हैं, जिनके आपराधिक आँकड़े दिल्ली को पीछे छोड़ चुके हैं। इनमें इंदौर का भी नाम है। जब रिपोर्ट दर्ज करने के कारण इतना बढ़ा हुआ आंकडा मिल रहा है, तो बिना शिकायत वाले अपराधों का आंकड़ा क्या होगा, ये सोचा जा सकता है। पर, सवाल है कि क्या मामले सिर्फ छोटे शहरों में ही दर्ज हो रहे हैं? बढ़ती जनसंख्या का दबाव छोटे शहरो के संसाधनों पर भारी पड़ रहा है। अपर्याप्त पुलिस बल और पुराने जमाने के बने कानून इस समस्या को ज्यादा गंभीर बना रहे हैं। बढ़ती राजनीतिक स्पर्धा के चलते लोगों का ध्यान सामाजिक समस्याओं पर न होकर राजनेताओं को अपने पक्ष में करने के लिए सिर्फ भीड़ जुटाने के लिए किए जाने वाले सम्मेलनों पर लगा हुआ है। प्रजातंत्र पर आज पूरी तरह भीड़तंत्र हावी हो चुका है।
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हेमंत पाल

   इन दिनों प्रदेश में बढ़ते अपराधों के साथ इंदौर भी इस मुद्दे पर खासी चर्चा में है। यहाँ अपराधों की नई फसल लहलहा रही है। मिनी मुंबई कहा जाने वाला यह शांतिप्रिय शहर कुछ सालों से अपराधियों, संगठित अपराधों, जमीन से जुड़े विवादों और धार्मिक वैमनस्यता के चलते लगातार खबरों में हैं। आज इस शहर में रीयल एस्टेट कारोबार में बेतहाशा वृद्धि हुई! कुकुरमुत्तों की तरह उग आईं शराब की दुकानें, खुलेआम नशीली दवाईयों का मिलना, आसानी से उपलब्ध अवैध हथियार और वर्षों से चला आ रहा भ्रष्टाचार, रंगदारी, अवैध वसूली और लचर कानून व्यवस्था की वजह से बढ़ रहे अपराधों ने शहर को अपराधों के मामले में देश के शीर्ष 10 शहरों में लाकर खड़ा कर दिया है। शहर के जिम्मेदार नागरिकों के लिए यहाँ के अपराधी किसी आतंकवादियों और नक्सलियों से कम नहीं हैं। लूट-खसौट, कॉन्ट्रैक्ट किलिंग कैसे अपराध पनप रहे हैं। पकड़े जाने के बावजूद इन अपराधियों को सजा नहीं हो पा रही! ऐसे अपराधियों के हौंसले बुलंद होते जा रहे हैं। ऐसे में सरकार की भूमिका कहीं नजर नहीं आ रही! सरकार को और जनता को तय कर लेना चाहिए कि जघन्य अपराधियों को फास्ट ट्रायल के जरिए जितनी जल्दी हो सके सख्त सजा मिलना चाहिए। पुलिस की सख्ती मीडिया में तो दिखती है, परोक्ष में नजर नहीं आती! जब भी पुलिस की सख्ती पर उंगली उठाई जाती है, तो पुलिस प्रशासन ट्रैफिक की सख्ती दिखाने लगता है! कभी हेलमेट तो कभी रांग साइड  मुहिम छेड़ दी जाती है! जबकि, जरुरत रात्रि गश्त, आदतन अपराधियों पर नियंत्रण और सड़क पर जनता की सुरक्षा।   
   भाजपा लगातार कानून व्यवस्था के मामले में प्रदेश सरकार को घेर रही है। विधानसभा में भी नरोत्तम मिश्रा ने इस मसले को उठाया था। उन्होंने कहा था कि प्रदेश में अपहरण उद्योग पनप रहा है। ऐसा लग रहा है कि प्रदेश में अपहरण  का कारोबार शुरू हो गया। अनुपूरक बजट पर चर्चा करते समय प्रदेश में बढ़ते अपराध पर कई सदस्यों ने सवाल उठाए थे। नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव ने भी आंकड़ों के साथ कहा था कि 11 नवंबर से 22 जनवरी के बीच प्रदेश में 12325 अपराध हुए, इसमें 332 हत्या, 213 लूट, 6310 महिलाओं पर अत्याचार, 3 डकैती  और 5467 चोरी के मामले थे। महिला अत्याचार के सबसे ज्यादा 445 मामले भोपाल जिले में दर्ज हुए। आरिफ मसूद के एक सवाल के जवाब में यह सामने आया कि 1 जनवरी 2018 से 31 दिसंबर 2018 के बीच भोपाल जिले में महिलाओं के साथ 664 अपराध गंभीर अपराध हुए, इनमें 152 बलात्कार, 185 छेड़छाड़, 327 अपहरण के थे।
  आए दिन होने वाली सड़क लूट से व्यापारियों का इस शहर से मानो विश्वास ही उठ गया है। पिछले दिनों कई व्यापारियों को लुटेरों ने रास्ते में ही लूट लिया। सड़क पर सुरक्षित चलना भी मुश्किल हो रहा है। कौन कब हमला कर दे, मोबाइल या गले की चेन छीन ले या शराब के लिए पैसे मांग ले कहा नहीं जा सकता। जघन्य अपराधों के बढ़ते ग्राफ के कारण इंदौर शहर देश की आपराधिक राजधानी बनता जा रहा है। आंकड़ों के औसत के हिसाब से इंदौर में हुए अपराधों की संख्‍या दिल्ली की तुलना में तीन गुना बताई जा रही है। देखने में आ रहा है कि महानगरों की तुलना में टियर-2 शहरों में अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि अपराधियों में पुलिस का खौफ नहीं रहा! जमानत में छूटे अपराधी फिर अपने काम पर लग जाते हैं और पुलिस को पता भी नहीं चलता।
  शहर में आपराधिक घटनाओं में अचानक हो रही बढ़ोतरी की वजह से पुलिस के सिस्टम पर सवाल खड़े होने लगे हैं। एडीजी का मुख्यालय भी यहीं है। मॉनिटरिंग के लिए तीन एसपी के साथ एसएसपी सिस्टम लागू है। एएसपी और सीएसपी स्तर के अफसरों की भी पर्याप्त संख्या है। बावजूद इसके रात गहराते ही मैदान में नजर आने के बजाए पुलिस थानों में लौट जाती है। करीब 40 किलोमीटर लम्बा बायपास अपराध का नया अड्डा बनता जा रहा है। अँधेरा होते ही यहाँ अपराधी सक्रिय हो जाते हैं, पर पुलिस बेखबर! शहर की कानून व्यवस्था के लचर होने का जीवंत सबूत ये है कि यहाँ बाल सुधार गृह की भोजनशाला की खिड़की तोड़कर 8 विचाराधीन बाल अपचारी भाग गए। ये प्रदेश के अलग अलग हिस्सों के रहने वाले थे और गंभीर वारदातों में लिप्त रहे थे। इन तमाम लोगों के मामले न्यायालय में विचाराधीन हैं। पिछले कुछ ही महीनों में 13 बाल अपचारियों के फरार होने से हड़कंप मच गया है! कुछ महीनों में इस तरह की 2 बड़ी घटनाएं सुधार गृह की सुरक्षा और वहां के जिम्मेदारों की चौकसी पर सवाल खड़े करती है। बाल सुधार गृह के अधीक्षक के मुताबिक भवन जर्जर है इसलिए इस तरह की घटनाएं हो रही हैं। 
     प्रदेश में बढ़ते अपराधों का सबसे बड़ा कारण छोटे शहरों के संसाधनों पर बढ़ती जनसंख्या का दबाव है। राजनीतिक संरक्षण, पुलिसकर्मियों की अपराधियों से सांठगांठ, अपर्याप्त पुलिस बल और कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगवाने वाले पुराने कानून इस मसले को और गंभीर बना रहे हैं। इस बात से इंकार नहीं कि राजनीति संरक्षण प्रदेश में अपराधों के बढ़ने का एक बड़ा कारण है! नेताओं के आस-पास समर्पित कार्यकर्ताओं के बजाए अपराधिक गतिविधियों में संलग्न गुंडों की भीड़ बढ़ती जा रही है! राजनीति से भयभीत होकर पुलिस भी उनपर हाथ डालने से डरती है! यही कारण है कि अपराधों पर अंकुश नहीं लग पा रहा है! ऐसे में सरकार का ये दावा कहाँ गया कि मध्यप्रदेश 'शांति का टापू' है?
    अपराधों के मामले में प्रदेश का सबसे आधुनिक शहर इंदौर लगातार असुरक्षित होता जा रहा है! अमन पसंद और चैन की जिंदगी जीने वालों का ये शहर कुछ सालों से हत्या, लूटपाट,अवैध हथियारों और ड्रग्स के कारोबार, कॉन्ट्रैक्ट किलिंग और भू-माफिया के विवादों के कारण लगातार चर्चित है! जमीन की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि और रियल इस्टेट कारोबार बढ़ने के कारण अवैध वसूली करने वाले गुंडे राजनीतिक संरक्षण में पनप रहे हैं! इस कारण इंदौर को अपराधों के मामले में देश के शीर्ष 10 शहरों में लाकर खड़ा कर दिया है। अकसर होने वाली लूटपाट से कारोबारियों का इंदौर पर से भरोसा उठने भी लगा! अपराधों के बढ़ते आंकड़ों के कारण इंदौर एक तरह से आपराधिक राजधानी बनता जा रहा है। महिलाओं से होने वाली लूटपाट आम बात हो गई! एक काला सच ये भी है कि शरीफ लोग तो अपनी बात कहने थाने जाने से ही घबराते हैं! सरकार थानों का माहौल ऐसा नहीं बना सकी कि आम शहरी निश्चिंत होकर शिकायत लिखवाने थाने जा सके! जब तक थानों का खौफ नहीं घटेगा, अपराध कैसे कम होंगे?
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Friday, December 6, 2019

नायिका की दूसरी पारी आसान नहीं!

हेमंत पाल

  अभी तक बॉलीवुड वो फार्मूला नहीं खोज पाया, जिसे अपनाकर फिल्म की सफलता का दावा किया जा सके! लेकिन, बॉलीवुड के जांबाज हीरो और हीरोइन भी उस मिट्टी के बने होते हैं, जो आसानी से हार नहीं मानते! उनकी एक पारी पूरी होते ही वे दूसरी पारी की तैयारी कर लेते हैं! ऐसे हीरो, हीरोइनें की लंबी लिस्ट है, जिन्होंने दूसरी पारी में भी किस्मत आजमाई और सफल हुए! कुछ का सिक्का दूसरी बार में भी अच्छा चला! पर, ज्यादातर दूसरी पारी में कोई करिश्मा नहीं कर सके! अपनी दूसरी पारी में सर्वकालीन सफल अभिनेताओं में अमिताभ बच्चन अकेले हैं! अमिताभ पहली पारी में जितने सफल रहे, उससे कहीं ज्यादा सफलता उन्होंने दूसरी पारी में पाई! लेकिन, कोई अभिनेत्री दूसरी पारी में बहुत ज्यादा सफल नहीं हुई! फिर वो धक् धक् गर्ल माधुरी दीक्षित ही क्यों न हो! 
  परदे पर हीरोइन की दोबारा वापसी आसान नहीं होती! उम्र की ढलान का असर दर्शक भांप लेते हैं! वे बूढ़े हीरो को तो स्वीकार लेते हैं, पर बूढ़ी हीरोइन को परदे पर इश्क़ फरमाते देखना नहीं चाहते! बॉलीवुड में 35 प्लस की हीरोइन के लिए वैसे भी कोई पटकथा नहीं लिखी जाती! अधिकांश हीरोइनों की दूसरी पारी माँ या बहन तक सीमित हो जाती हैं। 13 साल के लम्बे अंतराल के बाद अब शिल्पा शेट्टी भी अभिनय की अपनी दूसरी पारी शुरू कर रही है! वे सब्बीर खान की फिल्म 'निकम्मा' में नजर आएंगी। शिल्पा को आखिरी बार 2007 में 'लाइफ इन ए मेट्रो' और 'अपने' में देखा गया था। लेकिन, वे अपनी इस कोशिश में कितनी सफल रहती हैं, ये सामने आना अभी बाकी है।
  सौदागर, खामोशी, दिल से जैसी फिल्मों से पहचान बनाने वाली मनीषा कोइराला कैंसर से जंग लड़ने के बाद ‘डियर माया’ में दिखाई दी! पर, बात नहीं बनी! कपूर खानदान की करिश्मा की दूसरी पारी भी कमजोर साबित हुईं। छ: साल बाद करिश्मा ने विक्रम भट्ट की 'डेंजरस इश्क' जैसी फिल्म की! लेकिन, दर्शकों ने फिल्म को नकार दिया! सफलतम हीरोइन की इमेज वाली माधुरी दीक्षित की दूसरी पारी भी फीकी रही! 2007 में उन्होंने 'आजा नच ले' से वापसी की कोशिश की, लेकिन फिल्म नहीं चली! इसके बाद एक्शन फिल्म 'गुलाब गैंग' भी पानी नहीं माँगा! 'डेढ़ इश्किया' को दर्शक नहीं मिले! रेखा जैसी नामचीन एक्ट्रेस ने भी 'सुपर नानी' से वापसी की कोशिश की, लेकिन फिल्म असफल रही!  
   तब्बू भी काफी समय से इस इंतजार में थीं कि बॉलीवुड में उनकी दूसरी पारी शुरू हो! लेकिन, तब्बू का ये फैसला सही था कि उन्होंने हीरोइन के बजाय कैरेक्टर रोल को चुना! पहले 'हैदर' और उसके बाद तब्बू 'दृश्यम' में दिखाई दी और दोनों ही फिल्मों में उनके अभिनय को सराहा गया! श्रीदेवी को भी उस फेहरिस्त में रखा जा सकता है, जिनकी वापसी का दर्शकों ने स्वागत किया था! 2012 में आई 'इंग्लिश विंग्लिश' सफल रही थी! फिल्म की पटकथा मजबूत थी और श्रीदेवी ने भी उस अधेड़ महिला का किरदार निभाया था, जो बेटियों  पर इंग्लिश सीखती है। इस फिल्म की सफलता के बाद भी श्रीदेवी ने दूसरी फिल्म की जल्दबाजी नहीं की! डिम्पल कपाड़िया दूसरी पारी को भी सफल कहा जा सकता है। रुदाली, लेकिन, बनारस जैसी फिल्मों से डिम्पल ने अपनी ग्लैमरस पहचान को पूरी तरह बदल डाला था! लेकिन, राजेश खन्ना की मौत के बाद से ही वे परदे से दूर हैं! डिंपल ने होमी अदजानिया की ही फिल्म 'कॉकटेल' की थी। फिल्म में डिंपल सैफ अली की माँ के रोल में थी! 'कॉकटेल' से पहले डिंपल ने होमी की एक फिल्म 'बीइंग सायरस' में भी काम किया था।
  सलमान खान से साथ 'तेरे नाम' से अभिनय यात्रा शुरू करने वाली एक्ट्रेस भूमिका चावला कई सालों से बॉलीवुड से अलग रहीं! 2007 में उनकी आखिरी फिल्म 'गांधी माई फादर' रिलीज हुई थी। इसके बाद भूमिका ने 'एसएस धोनी' की बायोपिक फिल्म में धोनी की 'बहन' बनकर वापसी की। एक वेब सीरिज में भी भूमिका को दर्शकों ने देखा है। पीछे पलटकर देखा जाए तो पुराने दौर में हीरोइन का वापसी करना बेहद मुश्किल काम माना जाता था। वापसी होती थी तो मां के रोल में! वहीदा रहमान, नूतन, माला सिन्हा, शर्मीला टैगोर, सायरा बानू समेत कई हीरोइनों ने फिर परदे का रुख किया, पर हीरो या हीरोइन की माँ बनकर! हीरोईन बनने का साहस संभवतः 70 के दशक में अपने अभिनय से धूम मचाने वाली मुमताज ने किया था! 1990 में 'आंधियां' से वापसी की कोशिश की थी। लेकिन, इस फिल्म के पिटने के साथ ही उन हीरोइनों की वापसी के दरवाजे भी बंद हो गए। ऐसी स्थिति में शिल्पा की परदे पर क्या कमाल दिखाती है, अभी इस बारे में कयास नहीं लगाए जा सकते! क्योंकि, सारा दारोमदार शिल्पा के कैरेक्टर पर निर्भर है! 
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Monday, November 25, 2019

सफलता का पैमाना नहीं होती सुंदरता!

- हेमंत पाल

  हिन्दी फिल्मों के बारे में एक आमधारणा है कि यहां नायिकाओं की अदाकारी उनके अभिनय प्रतिभा से ज्यादा उनकी खूबसूरती से चलती है। जीनत अमान और कैटरीना कैफ जैसी अभिनेत्रियों के मामले में यह बात कुछ हद तक सही लगती है। लेकिन, यह जरूरी नहीं कि केवल सुंदरता ही किसी नायिका की सफलता का पैमाना माना जाए। देश में जब से फिल्म निर्माण शुरू हुआ, तब से अभी तक कई ऐसी नायिकाएं हुई हैं, जिनके चेहरे से खूबसूरती तो खूब टपकती थी, किंतु इनकी फिल्मों से बाॅक्स ऑफिस पर धनवर्षा नहीं हुई! नतीजा ये हुआ कि कुछ समय बाद ये अपनी खूबसूरती समेटकर घर लौट गई।
    गुजरे जमाने में शकीला के नयन नख्श इतने तीखे थे कि दर्शक उनकी अदाओं पर फिदा थे। लेकिन, दो-चार फिल्मों को छोड़ दिया जाए, तो वे अपने पूरे करियर में दूसरे या तीसरे दर्जे की फिल्मों तक ही सीमित रही। निम्मी की एंट्री भी धमाके से हुई हुई, पर वे भी फिल्मों में साइड हीरोइन बनकर रह गई। सबसे दर्दनाक हादसा तो 'हमराज' की नायिका विम्मी के साथ हुआ। जिस समय उनकी फिल्म 'हमराज' प्रदर्शित हुई, फिल्मी पंडितों ने उसे फिल्म इंडस्ट्री की सबसे सुंदर हीरोइन घोषित कर उसकी सफलता की भविष्यवाणी कर दी। लेकिन, उसके बाद उनकी एक भी फिल्म ऐसी नहीं आई, जिसे याद किया जाए। विम्मी का अंत भी बहुत दर्दनाक रहा। अंतिम समय उनके मृत शरीर को हाथ ठेले पर डालकर अंतिम संस्कार के लिए ले जाया गया था।
  लड़कियाँ हीरोइन बनने का सपना लेकर फिल्म इंड्रस्ट्री में कदम रखती हैं, पर एक-दो फ़िल्में करने के बाद सफल न होने पर वापस लौट जाती हैं या शादी करके अपना घर बसा लेती हैं। इस इंडस्ट्री में वैसे भी नायिका का करियर बहुत छोटा माना जाता है। ऐसी अभिनेत्रियां बहुत कम है, जो बहुत लंबे समय तक काम कर पाईं! कुछ अभिनेत्रियां ऐसी भी हैं, जो एक या दो फिल्मों में काम करने के बाद सफल न होने पर अभिनय से संन्यास लेकर घर बैठ गईं! खूबसूरती के मामले में टिस्का चोपड़ा बड़ी-बड़ी अभिनेत्रियों को टक्कर देती है। लेकिन, इनका फिल्मी करियर बहुत ही साधारण रहा। टिस्का बॉलीवुड में बहुत लंबे समय से काम कर रही हैं, पर आमिर खान की फिल्म 'तारे जमीं पर' में काम करने के बाद इन्हें एक नई पहचान मिली। इस फिल्म में टिस्का ने बाल कलाकार ईशान अवस्थी की मां का किरदार निभाया था। टिस्का ने 'प्लेटफार्म' से अपने फिल्म करियर की शुरुआत की थी। इसके बाद वे अनिल कपूर के साथ एक टीवी सीरियल में भी नजर आई। फिर भी फिल्मों में उनकी बात नहीं बनी।
    हुमा कुरैशी भी कद काठी और खूबसूरती में कम नहीं है। कई लोग इस अभिनेत्री की सुंदरता के दीवाने हैं। लेकिन, हुमा कुरैशी को पहचान अनुराग कश्यप की हिट फिल्म 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' के बाद मिली! इसके बाद हुमा ने बहुत सारी फिल्मों और प्राइवेट एल्बम में भी काम किया! पर, हुमा को आज भी स्टारडम वाला मुकाम नहीं मिल सका! 'बदलापुर' में अच्छे अभिनय और फिल्म की सफलता के बाद भी हुमा सच्ची सफलता पाने के लिए अभी संघर्ष कर रही हैं। 'एयर लिफ्ट' में मुख्य भूमिका निभाने वाली निमृत कौर की खूबसूरती आज भी कायम है। लेकिन, फिल्म की सफलता भी निमृत के फिल्म करियर को लिफ्ट कराने में कामयाब नहीं रहीं। निमृत को बहुत ही कम फिल्मों में काम किया है। इसलिए वे फ्लॉप अभिनेत्री की लिस्ट में शामिल हो कर अपनी पहचान खोने लगीं! बॉलीवुड की भोली पंजाबन ऋचा फिल्म इंडस्ट्री में नायिका बनने आई थी! पर, उनकी अप्रभावी अदाकारी की वजह से उन्हें हमेशा ही फिल्मों में साइड रोल मिले। वैसे फिल्म 'फुकरे' के हिट होने के बाद ऋचा कुछ दिनों तक सुर्खियों में रही थी. पर बतौर अभिनेत्री उनका करियर कुछ खास नहीं रहा।
   माही गिल भी बहुत ही खूबसूरत है! पर, खूबसूरत होने के बावजूद माही का करियर कुछ खास नहीं रहा। फिल्मों में सफलता न मिलने के कारण माही ने बहुत जल्द ही बॉलीवुड से संन्यास ले लिया। मंदाकिनी जैसी कुछ अभिनेत्रियों को पहली फिल्म से ही स्टार का दर्जा मिल गया! लेकिन, वे इसे आगे कामयाब नहीं रख पाई। ऐसी ही कुछ कहानी सुभाष घई की फिल्म 'परदेस' की नायिका महिमा चौधरी और उन्हीं कि फिल्म 'सौदागर' की नायिका मनीषा कोइराला की भी है। इनकी सफलता कुछ ही फिल्मों तक सीमित रहीं और उनकी खूबसूरती उन्हें इंडस्ट्री में स्थायी ठिकाना नहीं दिला पाई।
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Sunday, November 17, 2019

परदे पर डाॅक्टर और मरीज के रिश्ते!

- हेमंत पाल

   सिनेमा ने परदे पर कहानियों में चरित्रों को गढ़ा जाता है! ऐसे चरित्रों में डॉक्टर्स के चरित्र भी हैं, जिन्हें लेकर कई फिल्मों की कहानियां रची गईं! कई फिल्मों के तो केंद्रीय पात्र ही डॉक्टर्स रहे, जिसे दर्शको ने काफी पसंद भी किया। सिनेमा में डॅाक्टरों से संबंधित फिल्में ही नहीं बनी, कुछ डॉक्टर्स ने फिल्मों में अभिनय भी किया है। इनमें एसडी नारंग सफल निर्देशक बने। डाॅ श्रीराम लागू ने डॉक्टर होते हुए चरित्र अभिनेता की भूमिकाएं निभाई। मनोज कुमार, अशोक कुमार और ओपी नैयर भी होम्योपैथी से लोगों का उपचार करते थे। 
   डॉक्टर्स की जिंदगी पर बनने वाली पहली फिल्म थी वी.शांताराम की 'डाॅक्टर कोटनिस की अमर कहानी।' इसमें डाॅक्टर की पेशे के प्रति लगन और देशभक्ति को दिखाया गया था। खुद वी. शांताराम ने इस फिल्म में डाॅ कोटनिस की भूमिका निभाई थी। ये ऐसे डॉक्टर की कहानी थी, जो प्लेग जैसी महामारी से लोगों को बचाने के लिए चीन जाता है वहीं सेवा करते-करते अपना जीवन समर्पित कर देता है। तपन सिन्हा की फिल्म 'एक डाॅक्टर की मौत' में भी बताया था कि आखिर क्यों प्रतिभाशाली डॉक्टर देश से पलायन करते हैं। यह ऐसे डाॅक्टर की है, जो गंभीर रोगों की दवाइयां खोजता है! अपने काम के लिए उसे कुछ सुविधाओं की जरूरत होती है। लेकिन, उसे गांव भेज दिया जाता है जहाँ उसकी प्रतिभा कुंठित हो जाती है। जब उसकी खोज सामने आती है, तो इसका श्रेय अमेरिकी डाॅक्टरों को दिया जाता है।   
    राजकपूर और प्राण की फिल्म 'आह' भी डॉक्टर और मरीज के रिश्तों पर बनी फिल्म थी। इसमें डॉक्टर की भूमिका प्राण ने निभाई, थी। उनके लिए ये भूमिका इसलिए चुनौती भरी थी, कि तब तक वे खलनायक के रूप में स्थापित हो चुके थे। इसमें राजकपूर की भूमिका टीबी के मरीज की थी। इसी फिल्म से प्रेरित होकर ही बाद में ऋषिकेष मुखर्जी ने राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन को लेकर 'आनंद' बनाई थी। इस कालजयी फिल्म में अमिताभ ने डॉक्टर का किरदार निभाया था और राजेश खन्ना बीमार थे, जिनकी अंत में मौत हो जाती है। यह फिल्म जितनी संवेदनशील थी, उतनी ही सफल भी रही। 
     'दिल अपना और प्रीत पराई' में राजकुमार मरीज बने थे और डाॅक्टर थे राजेन्द्र कुमार, जो राजकुमार की पत्नी मीना कुमार के पूर्व प्रेमी होते हैं। मरीज डाॅक्टर और प्रेमिका के त्रिकोण पर निर्मित इस फिल्म की मजेदार बात यह थी कि इसमें कैंसर का रोगी तो बच जाता है, लेकिन डाॅक्टर मरकर पति पत्नी के बीच से हट जाता है। देव आनंद और विजय आनंद अभिनीत 'तेरे मेरे सपने' एक ऐसी फिल्म है जिसमें गांव की सेवा करने आए डाॅक्टर को दूसरे कमाऊ डाॅक्टर के लालच के कारण अपना बच्चा खोना पड़ता है और इसके बाद वह भी पैसा कमाने शहर चला जाता है। शहर का सफल डाॅक्टर विजय आनंद गांव चला आता है। चिकित्सक धर्म की दुहाई देकर विजय आनंद एक बार फिर देव आनंद को गांव वापस लाता है।
  नर्स के बिना डॉक्टर की भूमिका कभी पूरी नहीं होती! नर्स और रोगी के बीच संबंध की बात आती है, तो वहीदा रहमान और राजेश खन्ना की फिल्म 'खामोशी' को याद किया जाता है। इस में वहीदा रहमान ने पेशे के मानवीय पक्ष को खूबसूरती से निभाया था। फिल्म ने नर्सो की भावनाओं को भी अभिव्यक्त किया और बताया कि उन्हें भी प्यार करने का हक़ है। 'दिल अपना प्रीत पराई' में राजकुमार बने डाॅक्टर और मीना कुमारी उनकी प्रेमिका नर्स थी। फिल्म में डाॅक्टर की पत्नी उसे रात में मरीज की जान बचाने नहीं जाने देती! बहाना बनाकर उसे सूचना तक नहीं देती। इसके बात आए तनाव को इस फिल्म में बखूबी से प्रस्तुत किया गया था। डाॅक्टर से संबंधित चर्चित फिल्मों में 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' भी है। राजकुमार हिरानी ने इसे मजेदार अंदाज में प्रस्तुत कर दर्शकों का भरपूर मनोरंजन किया। लेकिन, अभी लम्बे समय से डॉक्टर से जुड़ी कोई संवेदनशील फिल्म नजर नहीं आई! -------------------------------------------------------

Sunday, November 3, 2019

परदे पर गंदी बातों का गंदा चलन!

- हेमंत पाल 

  वैसे तो सिनेमा को समाज का आइना कहा जाता है, लेकिन अपने घरों में भी हम आइने को इस नजरिए से रखते हैं कि वह सबको दिखाई न दे, जो हम परिवार को दिखाना नहीं चाहते! बेडरूम में आइना न रखने की हिदायत का सरासर उल्लंघन करके अब फिल्मकारों ने वहां आइना ही नहीं रखा, बल्कि खिड़की के बाहर दूरबीन भी रख दी ताकि सब कुछ साफ साफ दिखाई दे। जब वर्जित दृश्यों को दिखाने से भी पेट नहीं भरा, तो अब परदे पर गंदी बातों यानी अश्लील संवादों की मिसाइलें दागी जा रहीं है। तथाकथित प्रयोगवादी फिल्मों के नाम पर यह प्रयोग कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं, जिससे घर में परिवार के साथ बैठे दर्शक भौचक्के हैं! उन्हें पता नहीं कि कब कौनसा ऐसा संवाद उछलकर आ जाए कि परिवार के सदस्य एक दूसरे से मुंह छिपाने की कोशिशों में जुट जाएं।
  इन दिनों 'मेड इन चाइना' और 'बाला' के ट्रेलर की चर्चा है, जिसके संवाद सुनकर एक पल के लिए चेहरे पर हंसी आती है! लेकिन, दूसरे ही क्षण यह सोचकर वह हंसी गायब हो जाती है कि घर के दूसरे सदस्य पर इसकी क्या प्रतिक्रिया होगी! 'बाला' का गंजा नायक जब मैथुन और हस्तमैथुन में अंतर बताता है। सिर पर गुप्तांग के बालों के प्रत्यारोपण की बात करता है। नीम हकीम बैल के वीर्य को सिर में लगाने की बात करते हैं! ये सुनकर लगता कि हम सिनेमा  हॉल में नहीं, बल्कि गालियों से भरे किसी दलदल में फंसे हैं। फिल्मों में वर्जित संवादों का यह सिलसिला बहुत ज्यादा पुराना नहीं है। पहले जब किसी को गाली देनी होती थी तो संबंधित पात्र केवल ओंठ हिला देता था! उसके बाद जब वर्जित संवाद आता तो बीप बीप की आवाज सारी बात बयां कर देती थी। उसके बाद फिल्मों में  गालियों की जगह सांकेतिक भाषा का इस्तेमाल आरंभ हुआ! लेकिन, आज का सिनेमा इससे भी आगे निकल गया है। 
   लोकभाषा के नाम पर दर्शकों को गालियां यह कहकर परोसी जा रही है कि क्या करें, वहां की बोलचाल ही ऐसी है ! 'गैंग ऑफ़ वासेपुर' में मनोज बाजपेई बेझिझक अपनी क्षैत्रीय भाषा बोलते हैं 'घर जाकर जब अपने पिता जी का ... खुजला रहे होंगे, तब उनसे पूंछियेगा हम कौन हैं?' तिग्मांसु धूलिया जैसे निर्देशक और एक्टर भी डॉयलॉग बोलने में जरा नहीं झिझके “भो... के अब तो सच बोल दे!' इसके अलावा 'डेली बैली' के डॉयलाग और फिल्म 'पीपली लाईव' का संवाद 'साले यहां ... फटी पड़ी है, तुझे अपनी पड़ी है! 
  सिनेमा के पर्दे पर अब सुदूर के उन गांवों की कहानियां और उनके किरदारों की भाषा सुनाई दे रही है, जहां सौ साल से सिनेमा नहीं पहुंचा था। गैंग ऑफ़ वासेपुर, पानसिंह तोमर, बैंडेट क्वीन, हांसिल, डेली बैली, ओय लकी लकी ओय, सोनचिडिया और अब 'मेड इन चाइना और 'बाला!' कितनी ही ऐसी फिल्में हैं, जो उनके गंदे संवाद के लिए भी जानी जाती हैं। इन फिल्मों के संवाद उस बोलचाल में लिखे गए हैं, जिसे स्थानीय लोग आपस में बोलते हैं। इसलिए इन फिल्मों के संवाद लोगों की जबान पर आसानी चढ़ जाते हैं। कुछ सालों में ऐसी फिल्में आई हैं, जिन्हें उनकी भाषा के लिए बहुत दिनों तक याद किया जाएगा। 
   पहले तो फिल्मों में नायक ही गाली या अश्लील शब्दों का प्रयोग करता था। ज्यादा से ज्यादा वैम्प या तवाइफ का किरदार निभाने वाली नायिकाओं से ऐसी बातें सुनने में आती थी। लेकिन, आज की प्रगतिशील महिलाओं का सच दिखाने के प्रयास में निर्माताओं ने करिश्मा, स्वरा भास्कर और राधिका आप्टे जैसी नायिकाओं से वर्जित संवाद बुलवाने मे कोताही नहीं बरती! पर्दे के बाहर वाकयुद्ध के लिए मशहूर कंगना रनौत भी इस दौड में पीछे नहीं है। भूमि पेडणेकर की फिल्म 'सोन चिड़िया' ने एक बार फिर बेंडिट क्वीन के अश्लील संवादों की याद दिला दी! वैसे तो 'शुभ मंगल सावधान' पवित्र नाम लगता है! लेकिन, उसके दृश्य और संवाद सारी पाकीजगी को हवा में उड़ा देते हैं। 
   कुछ दर्शक मानते हैं कि दृश्यों में वर्जित बातें होने के बावजूद लेखक-निर्देशक ने इसे इतने गुदगुदाने वाले अंदाज में रचते हैं कि सिनेमाहाल में दर्शक असहज महसूस करने की बजाए हंसते हैं। सिनेमा हाॅल में तो पास बैठे दर्शक का चेहरा साफ दिखाई नहीं देता! लेकिन, क्या यही बात उस सूरत में भी कही जा सकती है जब सारा घर में यह फिल्में देख रहा हो! सच बात तो यह है कि फिल्मकार अपनी जवाबदारी से मुंह नहीं फेर सकते और उन्हें ऐसा करना भी नहीं चाहिए! वरना रील लाइफ और रीयल लाइफ में फर्क की क्या रह जाएगा?
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