Sunday, November 3, 2024

रुपहले परदे के पीछे से झांकता काला धंधा

   फिल्मों में अंडरवर्ल्ड के दखल की शुरुआत फ़िल्म निर्माण में पैसा लगाने से हुई, जब निर्माताओं को फिल्म निर्माण के लिए बैंकों और वित्तीय संस्थाओं से पैसा नहीं मिलता था। लेकिन, समय बदला और फिल्मों को उद्योग का दर्जा मिल गया। बैंक और निजी संस्थानों से उन्हें पैसा मिलने लगा। इसके बाद फिल्म निर्माताओं ने अंडरवर्ल्ड की काली कमाई से पल्ला झाड़ लिया। लेकिन, वे इस काली दुनिया से पूरी तरह पीछा नहीं छुड़ा सके। अंडरवर्ल्ड के सरगनाओं ने फिल्म इंडस्ट्री पर किसी न किसी रूप में अपना दबदबा बनाए रखा, जो आज भी कायम है। लेकिन, 90 के दशक में ऐसा दौर भी आया जब कई फिल्म अभिनेत्रियां इन काले कारोबारियों के चंगुल में आकर अपना करियर गंवा बैठी।
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- हेमंत पाल

    फिल्म इंडस्ट्री से अंडरवर्ल्ड का रिश्ता बहुत पुराना और गहरा रहा है। क्योंकि, जहां पैसा और ग्लैमर है वहां इस काले धंधे का दखल है। अपराध की इस दुनिया का दखल सिर्फ फिल्मों में काले पैसे लगाने और कमाने तक सीमित नहीं है। फिल्म की कास्टिंग से लेकर उसके गीत-संगीत और ओवरसीज राइट्स तक में इनका सीधा दखल रहता था। इसलिए कई कलाकार और संगीतकार भी इनसे नजदीकी बढ़ाते हैं। फिल्म की कहानियों को लेकर भी प्रोड्यूसर और डायरेक्टर इनसे सलाह मशवरा किया करते रहे हैं। क्योंकि, बात पैसे लगाने तक की नहीं, बल्कि एक भय भी व्याप्त रहता था, जो सीधे जान पर आता है। अब वहीं भय इतना बढ़ गया कि सलमान खान जैसे बड़े कलाकार भी कड़ी सुरक्षा के साये में रहने को मजबूर हो गए। 1993 में पहली बार मुंबई ने दाऊद और उसके गुर्गों के आतंक का चेहरा नजदीक से देखा था। 
       मुंबई ब्लास्ट से पहले दाऊद इब्राहिम दुबई में रहकर मुंबई में काले कारोबार पर नजर रखी। इसके बाद फिल्मी दुनिया में भी दाऊद का दबदबा हो गया। अगस्त 1997 में संगीत इंडस्ट्री के कैसेट किंग गुलशन कुमार की हत्या हुई और पहली बार एहसास हुआ कि अंडर वर्ल्ड क्या होता है! गुलशन कुमार को मंदिर में पूजा के बाद गोलियों से भून दिया गया। बाद में खुलासा हुआ कि उनसे फिरौती मांगी गई थी और नहीं देने पर उनकी हत्या कर दी गई। फिल्म इंडस्ट्री और अंडरवर्ल्ड की नजदीकी की शुरुआत हाजी मस्तान, करीम लाला और सटोरिए रतन खत्री जैसे सरगनाओं से हुई थी। इसमें बाद दाऊद इब्राहिम और छोटा राजन जैसे कई लोग इससे जुड़ते चले गए। लेकिन, तब ये जुड़ाव फिल्मों में अपना काला पैसा लगाने और फिल्म बनाने तक सीमित था। 90 के दशक की कई फिल्मों में अंडरवर्ल्ड का तो सीधा दखल रहा। जब पुलिस को सबूत मिले, तो कार्रवाई हुई! जिससे पूरी इंडस्ट्री में हलचल मच गई थी। 
      जब फिल्म इंडस्ट्री से दाऊद इब्राहिम का नाम जुड़ा तो उसके साथ काले धंधे में की बुराइयां भी आ गई। लेकिन, 1993 में हुए मुंबई बम कांड के बाद अंडरवर्ल्ड का खौफ कम हो गया। दाऊद दुबई भाग गया, पर उसकी पार्टियों में फ़िल्मी हस्तियों की मौजूदगी बनी रही। कई बड़े कलाकारों के फोटो दाऊद के साथ सुर्ख़ियों में रहे। अंडरवर्ल्ड के दबाव का एक असर अभिनेत्रियों पर कुछ अलग तरह से पड़ा। इस वजह से उनका करियर ही ख़त्म हो गया। क्योंकि, खौफ या आकर्षण के कारण कई अभिनेत्रियां गैंगस्टर्स के चंगुल में आ गई और उनका फ़िल्मी करियर तबाह हो गया।
     फिल्म इंडस्ट्री पर कुछ साल पहले भी अंडरवर्ल्ड का खौफ दिखाई दिया था। 90 के दशक में इंडस्ट्री अंडरवर्ल्ड की जकड़ में थी। धमकाने, गोली चलाने और हत्या करके दाऊद इब्राहिम और छोटा राजन फिल्म इंडस्ट्री पर अपना दबाव बनाने की कोशिश में थे। प्रोड्यूसर करीम मोरानी के घर पर गोली चलाई गई और शाहरुख खान के दफ्तर में फोन करके धमकाया गया। इन वारदातों के पीछे अंडरवर्ल्ड डॉन रवि पुजारी का नाम आया था। शाहरुख़ को धमकी देने के पीछे उनकी एक फिल्म के ओवरसीज राइट्स का मामला सामने आया था। इस वारदात से इंडस्ट्री पर फिर खतरे की घंटी बजने लगी। इससे पहले प्रोड्यूसर राकेश रोशन पर भी जानलेवा हमला हुआ।
     फरहान अख्तर, सोनू निगम, राम गोपाल वर्मा, प्रोड्यूसर फरहान आजमी और रितेश सिधवानी को भी अलग-अलग समय पर अंडरवर्ल्ड से धमकियां मिलती रही। मुंबई पुलिस कोई जोखिम नहीं लेना चाहती थी, लिहाजा शाहरुख समेत 14 फिल्मी हस्तियों को सुरक्षा देने का फैसला किया गया था। इनमें शामिल रहे सलमान खान, आमिर खान, रितिक रोशन, अक्षय कुमार, सैफ अली खान और करीना कपूर, इमरान हाशमी और विवेक ओबरॉय। फिल्म निर्माता करण जौहर, आदित्य चोपड़ा, बोनी कपूर, फरहान आजमी और रितेश सिधवानी। जबकि, फिल्म डायरेक्टर और एक्टर फरहान अख्तर, गायक सोनू निगम को भी सुरक्षा मिली थी।
    अब वही सब सलमान खान के साथ हो रहा है, जिसने 90 के दशक की याद दिला दी। एक नए अंडरवर्ल्ड डॉन लॉरेंस बिश्नोई ने पहले तो सलमान के घर के बाहर गोली चलवाई, फिर उनके जिगरी दोस्त बाबा सिद्दीकी की हत्या करवा दी। इसके बाद सीधे सलमान को धमकी देकर फिरौती मांगी गई। सलमान खान को दी गई धमकी ने सबके होश उड़ा दिए। आखिर सलमान एक्शन हीरो हैं और उनके प्रशंसक उन्हें इसी रूप में देखते हैं। लेकिन, फ़िल्मी बंदूक और असली बंदूक में फर्क होता है। किसी की जिंदगी लेने के लिए एक गोली ही काफी होती है। यही कारण है कि कई अभिनेता सुरक्षा गार्ड के घेरे में रहते हैं। 
 
      इस पूरे खेल में अंडरवर्ल्ड का कुछ नहीं बिगड़ा। उनके सरगना आराम से किसी छोटे देश में बैठकर अपनी काली सत्ता चला रहे हैं। उनकी  बात नहीं मानी जाती तो उनके शूटर गुर्गे किसी को भी गोली मारने को तैयार होते हैं। वे फिल्मों की वीडियो पाइरेसी में शामिल होते हैं और अब ये काले कारोबारी फिल्म के व्यापार का हिस्सा बनना चाहता है। वे फिल्मों के ओवरसीज राइट चाहते थे और ऐसा न करने पर फिर धमकाने से बाज नहीं आते! आजकल चोरी-छुपे यही सब हो रहा।  इंडस्ट्री की कुछ अभिनेत्रियां जैसे ममता कुलकर्णी, मोनिका बेदी, मंदाकिनी, सोना और जैस्मिन धुन्ना अपने समय में चर्चित रहीं। पर, ऐशोआराम के लिए वे काले कारोबारियों के चंगुल में आकर हमेशा के लिए परदे से बेदखल हो गई। इस तरह की प्रेम कहानी सबसे पहले अंडरवर्ल्ड डॉन हाजी मस्तान और अभिनेत्री सोना से शुरू हुई, जो अपने समय काल में खासी चर्चा रही। सोना को उस समय मधुबाला की कॉपी भी माना जाता था। लेकिन, जितनी लोकप्रियता उन्हें फिल्मों से नहीं मिली, उससे ज्यादा वे हाजी मस्तान से जुड़कर चर्चा में आई। दोनों ने शादी कर ली थी। कहते हैं कि फिल्म 'वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई' में इनकी ही कहानी है। 80 और 90 के दशक की अभिनेत्रियां ममता कुलकर्णी, मंदाकिनी और मोनिका बेदी अपने करियर की ऊंचाइयां चढ़ रही थी, कि उनका नाम अंडरवर्ल्ड के सरगनाओं से जुड़ गया। बाद में इनमें से कुछ ने लौटने की कोशिश भी की, पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। ममता कुलकर्णी को 90 के दशक की लोकप्रिय अभिनेत्री माना जाता था। लेकिन, ममता को ड्रग तस्कर विक्रम गोस्वामी के मोहब्बत हुई। इसके बाद ममता कुलकर्णी ने विक्रम गोस्वामी से शादी कर ली और दोनों दुबई चले गए। ड्रग्स तस्करी में विक्रम के साथ ममता जेल भी जा चुकी हैं।
    राज कपूर की फिल्म में काम करना किसी भी अभिनेत्री सपना होता है। मंदाकिनी भी उनमें से एक थी, जो 'राम तेरी गंगा मैली' में काम करके रातों-रात स्टार बन गई थी। लेकिन, वे अपने स्टारडम का मजा ले पाती, इससे पहले वे अपने अंडरवर्ल्ड कनेक्शन की वजह से सुर्ख़ियों में आ गई। मंदाकिनी और दाऊद इब्राहिम की नजदीकी की ख़बरों से हर कोई हैरान था। यहां तक कहा जाता था कि मंदाकिनी को हीरोइन बनाने के लिए निर्माता, निर्देशकों को दाऊद से धमकी तक मिलती थी। इसी तरह मोनिका बेदी अपनी एक्टिंग से ज्यादा अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलेम के साथ अफेयर को लेकर चर्चित रहीं। 'बिग बॉस' और 'झलक दिखला जा' टीवी शो की प्रतियोगी रही मोनिका को अबू सलेम से अफेयर इतना भारी पड़ा, कि उनको भी जेल जाना पड़ा। इससे मोनिका को निजी जिंदगी लाइफ में भी परेशानी उठाना पड़ी। भुतहा फिल्म 'वीराना' (1988) की अभिनेत्री जैस्मिन धुन्ना और दाऊद इब्राहिम के प्रेम की खबरें भी सामने आई थी। लेकिन, उन्होंने परेशान होकर भारत ही छोड़ दिया। दाऊद इब्राहिम का नाम अभिनेत्री अनीता अयूब के साथ भी जुड़ा था। कहा तो यहां तक जाता है कि डायरेक्टर जावेद सिद्दीकी की हत्या में दाऊद इब्राहिम का ही हाथ था। क्योंकि, उन्होंने अनीता को फिल्म में लेने से इंकार कर दिया था, जिसकी कीमत उन्हें जान देकर चुकाना पड़ी।
अंडरवर्ल्ड पर बनी फ़िल्में
    2002 में राम गोपाल वर्मा की फिल्म 'कंपनी' का कथानक दाऊद इब्राहिम के खतरनाक इरादों पर केंद्रित था। फिल्म ने अंडरवर्ल्ड वॉर को जीवंत तरीके से फिल्माया था। अजय देवगन की भूमिका वाली इस फिल्म ने खासी कमाई की और फिल्मकारों को एक नया आइडिया दे दिया था। अनुराग कश्यप ने 'ब्लैक फ्राइडे' (2004) में दाऊद के किरदार को बेहद खूबसूरती से फिल्माया था। यह फिल्म मुंबई में हुए बम धमाकों और दाऊद इब्राहिम की उसमें भूमिका पर आधारित थी। फिल्म में विजय मौर्या ने दाऊद इब्राहिम की भूमिका की थी। हाजी मस्तान के जीवन पर आधारित मिलन लथूरिया की फिल्म 'वंस अपॉन अ टाइम इन मुंबई' (2010) में अंडरवर्ल्ड की दुनिया को बेहद करीब से दिखाया गया है। इसमें एक अभिनेत्री और हाजी मस्तान के बीच प्रेम संबंध फिल्माए थे। फिल्म में अजय देवगन और कंगना रनौत की मुख्य भूमिका थी। अंडरवर्ल्ड की काली दुनिया पर राज करने वाले डॉन की अच्छाई और उसूलों को भी दिखाया गया। 2013 की फिल्म 'डी डे' में ऋषि कपूर ने अंडरवर्ल्ड डॉन का किरदार निभाया था। निखिल आडवाणी की यह फिल्म काफी पसंद की गई थी। इसमें मुंबई बम धमाकों की खतरनाक झलक देखने को मिलती है। साल 2013 में आई फिल्म 'वन्स अपॉन ए टाइम इन मुंबई अगेन' फिल्म भी अंडरवर्ल्ड पर बनी फिल्मों में एक है। इसमें अक्षय कुमार ने दाऊद जैसा किरदार निभाया था। 2013 की फिल्म 'शूटआउट एट वडाला' भी अंडरवर्ल्ड की ही कहानी थी। फिल्म में जॉन अब्राहम, सोनू सूद और मनोज बाजपेयी थे।
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कथानक नहीं, दृश्यों में ही दिखती है दिवाली

    हिंदी सिनेमा का पर्दा दिवाली के उजास से अनछुआ नहीं रहा! कुछ फिल्मों के कथानक, गीतों व दृश्यों में दिवाली अहम जरूर रही! कभी कथानक के महत्वपूर्ण दृश्य दिवाली की पृष्ठभूमि पर फिल्माए गए, तो कभी गीतों में दिवाली का उजास, खुशियां और भव्यता स्पष्ट दिखाई दी। लेकिन, समय के साथ फिल्मों के कथानकों से दिवाली गायब होती गई। कुछ दृश्यों को छोड़ दिया जाए, तो होली और गणेश उत्सव की तरह दिवाली को महत्व नहीं मिला। 90 के दशक के बाद की फ़िल्मो में दिवाली को याद तो रखा गया, पर रोशनी के इस त्यौहार को केंद्र में रखकर फ़िल्में बनाना थम सा गया। 
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- हेमंत पाल

     दिवाली का त्यौहार रोशनी, उत्साह और भव्यता के सबसे जीवंत त्योहारों में से एक है। इस त्यौहार की चमक किसी न किसी रूप में हमेशा झलकती है। लेकिन, रोशनी के बिना दिवाली का कोई महत्व नहीं होता। यही वजह है कि दिवाली के बहाने फिल्मकार अपनी 'लाइट्स, कैमरा, एक्शन' के साथ इसे बहुत अच्छी तरह से समझाते हैं। तभी तो फिल्मों में भव्य दीयों, पीतल के लैंप, एलईडी लाइट्स और मोमबत्तियों के साथ ऐसे दृश्य रोशन होते हैं। ऐसे ही 'कभी ख़ुशी-कभी गम' में जया बच्चन का दिवाली गीत प्रस्तुत करने का ये सबसे बेहतर प्रसंग यादगार बना। इसमें वे देवी लक्ष्मी से समृद्धि और सफलता के लिए प्रार्थना करती हैं। लेकिन, यह खुशी वाला दिन भी सभी को आनंदित नहीं करता, जैसा कि 'तारे ज़मीन पर' दर्शील सफारी को दर्शाया गया। स्कूल की छुट्टियां खत्म होते ही उसे बोर्डिंग स्कूल भेज दिया जाता है, जहां उसकी उदासी दर्शकों को अंदर तक सालती है। 'राजू बन गया जेंटलमैन' में दिवाली के दिन पूरी बस्ती एक साथ सद्भाव का महत्व दिखाती है, जिसमें नायक शाहरुख़ और नायिका जूही चावला बस्ती वालों के साथ फुलझड़ी जलाते हुए अपने बंधन का अहसास कराते हैं। 
     ऐसे ही याद कीजिए तुषार कपूर की वो पहली फिल्म 'मुझे कुछ कहना है' जिसमें वे करीना कपूर को सड़क पर बच्चों के साथ मस्ती करते हुए अनार जलाते देखते हैं। तब उन्हें पहली नजर के प्यार का अनुभव होता है। इसके अलावा फिल्मों का दायित्व जागरूकता पैदा करना भी होता है। आशा पारेख को फिल्म 'चिराग' में यह समझाने के लिए अपनी आंखों की रोशनी खोनी पड़ती है कि कैसे पटाखे से भयानक दुर्घटना संभव हैं। इसी तरह 'जो जीता वही सिकंदर' में आमिर खान के शरारती तरीके तब काम आते हैं, जब वे दिवाली के दिन अपने भाई और उसके स्कूल की पहली मोहब्बत को एक-दूसरे की भावनाएं महसूस कराते हैं। बात यही ख़त्म नहीं होती दिवाली के दिन अपराधी हो या पुलिसवाला सभी अपनी खुशियां बांटने का मौका नहीं छोड़ते। फिल्मों की किताब में यह सब अपने परिवार से प्यार करने के बारे में है और इसलिए 'वास्तव' में संजय दत्त दिवाली उपहार और मिठाई बांटने अपनी पुरानी चॉल में जाते हैं।
     सिनेमा में जिन त्यौहारों को 'कभी खुशी कभी गम' व्यक्त करने का माध्यम बनाया जाता है, उनमें होली, राखी और करवा चौथ के अलावा दिवाली ही सबसे उल्लेखनीय है। त्यौहारों और फिल्मों के कथानकों का लम्बा साथ रहा है। ब्लैक एंड व्हाइट के ज़माने से परदे पर दिवाली का उजियारा रहा। लेकिन, पिछले दो दशकों से दिवाली की रौनक परदे से गायब होने लगी। इस त्यौहार का स्वरूप और दर्शकों का नजरिया बदलने से दिवाली के प्रसंगों को अब कम कर दिया गया। साल, दो साल में कभी कोई फिल्म आ ही जाती है, जिसमें दिवाली का प्रसंग गीत या सीन में दिखाई या सुनाई पड़ जाता हैं। जबकि, 60 और 70 के दशक में कई फिल्में दिवाली के आसपास ही घूमती रही। जयंत देसाई के निर्देशन में 1940 में आई 'दिवाली' इस परम्परा की फिल्म थी! इसके बाद 1955 में गजानन जागीरदार की 'घर घर में दिवाली' और इसके सालभर बाद 1956 आई में दीपक आशा की 'दिवाली की रात' में भी दिवाली को विषय वस्तु बनाकर फिल्म बनाई गई थी। 
     कुछ समय से परदे से यह रोशनी का त्यौहार जैसे गायब ही हो गया। अब कथानक की विषय वस्तु में बदलाव आने लगा। परदे पर त्यौहारों का मनाया जाना, बिकाऊ पटकथा की मांग पर निर्भर हो गया! फिल्मकार नई शैली के साथ प्रयोग करके कुछ नए प्रयोग करना चाहते हैं। वे वैश्विक पटल पर पहुंचने के साथ देश के साथ दुनियाभर के प्रशंसकों को लुभाने वाले विषयों पर फिल्म बनाने की कोशिश में रहते हैं। हर त्यौहार का बॉलीवुड कनेक्शन होता है। हमारी परंपराओं, व्रत-त्यौहारों को गीतों या फिल्मों के कथानक में पिरोकर दिखाया जाता रहा है। होली तो बॉलीवुड का सदाबहार त्यौहार है, लेकिन दीवाली कभी परदे का पसंदीदा त्योहार नहीं बन पाया। दिवाली पर प्रदर्शित फिल्मों की सफलता लगभग सुनिश्चित मानी जाती है! किंतु, हाल के सालों में फिल्मों में ये त्यौहार लगभग भुला दिया गया। अभी तो बड़े परदे पर कोरोना का कहर जारी है! इसे देखते हुए इस साल तो बॉलीवुड की दीवाली पर सिनेमाघर के अंदर का अंधियारा ही हावी रहेगा! जो फिल्में इस साल दीपावली को प्रदर्शित करने के लिए तैयार की गई थी, उन्हें आगे बढ़ाया जा रहा है। इस लिहाज से बॉलीवुड के लिए यह दीपावली सूनी और काली ही रहेगी।
    दिवाली ने सिर्फ रंगीन फिल्मों के ज़माने में ही रंगीनियत नहीं दिखाई ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों में भी इस त्यौहार की महत्ता बरक़रार रही। जिन फिल्मों में दिवाली के दृश्यों को प्रमुखता दी गई, उनमें 1961 में आई राज कपूर, वैजयंती माला की 'नजराना' थी! इस फिल्म में 'मेले है चिरागों के रंगीन दिवाली है' गीत लता मंगेशकर ने गाया था। यह ब्लैक एंड व्हाइट दौर की खुशनुमा दीवाली का गीत है। इसकी खासियत है कि शुरू से अंत तक इसमें दिवाली की आतिशबाजी और भरपूर रोशनी नजर आती है। 1962 में आई 'हरियाली और रास्ता' में भी दिवाली के दृश्यों में नायक, नायिका का विरह दर्शाया गया था। वैजयंती माला दिलीप कुमार की 'पैगाम' और 'लीडर' में दिवाली के जरिए फिल्म के किरदारों को जोड़ने का प्रयास किया था। 1972 में 'अनुराग' में भी आपसी भरोसे और विश्वास को दिवाली से जोड़कर दर्शाया था। इसमें कैंसर से जूझ रहे बच्चे की अंतिम इच्छा पूरी करने के लिए पूरा मोहल्ला दिवाली मनाने में जुट जाता है। फिल्मों में दीवाली सिर्फ रोशनी और पटाखों तक सीमित नहीं रही। कथानक में ट्विस्ट लाने के लिए भी दिवाली के दृश्यों का इस्तेमाल किया गया। 
     धमाकों के बीच गोलियों की आवाज दबाकर पूरे परिवार के खत्म करने का दृश्य अमिताभ को सितारा बनाने वाली फिल्म 'जंजीर' में काफी प्रभावी ढंग से फिल्माया गया था। फिल्म का ये दृश्य नायक अमिताभ को सपने में हमेशा दिखाई देता है। इसके बाद धर्मेंद्र की फिल्म 'यादों की बारात' में भी तीन बेटों के सामने पिता की हत्या का दृश्य था। कमल हासन की 1998 में आयी फिल्म 'चाची 420' में बेटी के दिवाली के दिन पटाखों से घायल होने का प्रभावशाली दृश्य था। आदित्य चोपड़ा की 'मोहब्बतें' (2000) में दिवाली काफी अहम् थी। करण जौहर की 2001 में आई मल्टी स्टारर सुपरहिट फिल्म 'कभी खुशी कभी गम' का टाइटल सांग असल में एक दीवाली गीत ही है। इसमें जया बच्चन दीवाली की पूजा करते हुए यह गाती है! 
    दिवाली को पृष्ठभूमि में रखते हुए तैयार किए कुछ गानों को भी अपार लोकप्रियता हासिल हुई। इन गीतों में 'नजराना' का गीत 'एक वो भी दीवाली थी' 'शिर्डी के साईं बाबा' का गीत 'दीपावली मनाई सुहानी' के अलावा 'खजांची' का आई दीवाली आई, कैसी खुशहाली लाई, 'पैगाम' का दीवाली गीत 'कैसे मनाएं हम लाला दिवाली' और कुछ साल पहले गोविंदा अभिनीत फिल्म 'आमदनी अठन्नी खर्चा रुपैया' का गाना 'आई है दिवाली, सुनो जी घरवाली' दिवाली को केंद्र में ही रखकर रचे गए गीतों में थे। एसडी बर्मन के संगीत से सजी फिल्म 'जुगनू' फिल्म का  गीत 'छोटे नन्हे मुन्ने प्यारे प्यारे रे' अपने समय में बेहद लोकप्रिय हुआ था। इसके अलावा 'नमक हराम' का राजेश खन्ना और अमिताभ पर फिल्माया गीत 'दिये जलते हैं फूल खिलते हैं' अपने बेहतरीन फिल्मांकन के लिए दर्शकों को आज भी याद है। 
    फिल्म 'रतन’(1944) के गीत 'आई दीवाली दीपक संग नाचे पतंगा' में दीवाली के लाक्षणिक भाव की पृष्ठभूमि में नौशाद ने विरह-भाव की रचना की थी। मास्टर गुलाम हैदर ने फिल्म 'खजांची’(1941) के गीत 'दीवाली फिर आ गई सजनी’ में पंजाबी उल्लसित टप्पे का पृष्ठभूमि में आकर्षक प्रयोग किया था। फिल्म महाराणा प्रताप (1946) में 'आई दीवाली दीपों वाली’ की पारंपरिक धुन सुनने को मिली थी। 'आई दीवाली दीप जला जा' (पगड़ी) गीत में आग्रह का पुट था। वहीं 'शीश महल’(1950) के गीत 'आई है दीवाली सखी आई रे’को वसंत देसाई ने पारंपरिक ढंग से स्वरबद्ध किया था।
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सुनाई नहीं देते भक्ति गीत, आरती और भजन

     ईश्वर के प्रति सभी की अगाध श्रद्धा होती हैं। उन्हें विश्वास होता है कि भगवान हर उस व्यक्ति की सुनते हैं, जो उन्हें दिल से याद करता है। इसलिए मंदिर में प्रसाद चढ़ाने के अलावा भक्ति का सबसे आसान उपाय है भगवान की भक्ति में गीत, आरती या भजन गाना। फिल्मों में भी हमेशा यही दिखाया जाता रहा है कि किस तरह एक भजन सारे हालात बदल देता है। ख़ास बात यह भी कि धार्मिक फिल्मों में ही भक्ति हों, ये जरुरी नहीं! मल्टीस्टार फिल्मों में भी ऐसे कई भक्ति गीत फिल्माए गए, जो लोकप्रिय हुए और आज भी इन्हें सुना जाता है। लेकिन, नई फिल्मों में अब भक्ति गीत और भजन सुनाई देना बंद हो गए!
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- हेमंत पाल

    समय ने अपना असर जीवन के हर पक्ष पर दिखाया है। फिल्मों को जीवन का प्रतिबिंब कहा जाता है, इसलिए वहां भी बदलाव दिखाई दिया। धार्मिक आस्था भी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है और ब्लैक एंड व्हाइट के ज़माने से आज तक कई फिल्मों में दिखाई दिया। फिल्मों का शुरूआती समय तो पूरी तरह धार्मिक रहा। फ़िल्मी कथानक और गीत भी देवी-देवताओं पर केंद्रित रहे। लेकिन, धीरे-धीरे फिल्मों से भजन और भक्ति गीत कम होते-होते लगभग गायब हो गए। अब यदि कोई धार्मिक गीत फिल्माया भी जाता है, तो उसका आशय श्रद्धा नहीं होता, बल्कि वो फिल्म की कहानी में मोड़ लाने के लिए जरुरी समझा जाता है। 'अग्निपथ' का गीत 'देवा श्री गणेशा देवा श्री गणेशा' को याद कीजिए। 'बजरंगी भाईजान' में सलमान का डांस तो भगवान के सामने था, पर गीत 'सेल्फी तू सेल्फी ले ले रे' है। जबकि, 1979 में अमिताभ बच्चन और शशि कपूर की फिल्म 'सुहाग' आई जिसमें मां दुर्गा की भक्ति पर गया गया भजन 'नाम रे सबसे बड़ा तेरा नाम रे' काफी लोकप्रिय है। आज भी नवरात्रि के दिनों में यह सुनाई देता है। अमिताभ और रेखा पर मंदिर में फिल्माए इस भजन पर दोनों ने गरबा भी किया था। जब भी कोई व्यक्ति या फिल्मों के नायक (या नायिका) परेशानी में होते हैं, उन्हें सबसे पहले भगवान ही याद आते हैं। वह भगवान से मुसीबत से मुक्ति की गुहार लगाता है। यह स्थिति फिल्मों में आती है, तो वह किरदार भगवान की मूर्ति के सामने धार्मिक गीत या भजन गाता है। ऐसी कई फ़िल्में हैं, जिनमें भजन गाते ही भगवान ने उसकी बात सुन ली! 
      फिल्म इतिहास के पन्ने पलटे जाएं तो ब्लैक एंड व्हाइट के ज़माने यही होता आ रहा है, आज भी कुछ नहीं बदला। कुछ फिल्मों के गीत और भजन इतने लोकप्रिय हैं कि तीज-त्यौहार पर यही सुनाई देते हैं। ये गीत मानसिक शांति भी देते हैं। फिल्मों ने ऐसे कई भजन और भक्ति गीत दिए हैं, जिन्हें सुनकर कुछ पलों के लिए हम अपने दुःख भूल जाते हैं। ऐसी स्थिति में मन में विश्वास की एक ज्योति जल उठती है। भक्ति को शक्ति देने वाले कई भक्ति गीत और भजन है। लेकिन, मंदिरों में भक्ति गीत सुनाने वाली इन फिल्मों में मंदिर का एक दृश्य ऐसा भी था, जो आज भी दर्शक भूले नहीं होंगे! फिल्म 'दीवार' में अमिताभ बच्चन का मां की बीमारी पर बोला गया डायलॉग भक्ति से इतर था। 
       सफल धार्मिक फिल्मों के लोकप्रिय गीतों की बात की जाए तो 1975 में आई फिल्म 'जय संतोषी माँ' कम बजट की फिल्म थी। पर, कमाई के मामले ये आज तक की शीर्ष ब्लॉकबस्टर फिल्मों में गिनी जाती है। इस फिल्म के सभी गीतों को खूब सुना गया। उषा मंगेशकर, महेंद्र कपूर और मन्ना डे ने कवि प्रदीप के लिखे भक्ति गीत गाए थे। करती हूँ तुम्हारा व्रत मैं स्वीकार करो माँ, यहां वहां मत पूछो कहां कहां, मैं तो आरती उतारू रे, मदद करो संतोषी माता, जय संतोषी माँ, मत रो मत रो आज राधिके और यहां वहां जहां तहां मत पूछो कहां कहां ऐसे गीत हैं जिन्हें देवी आराधना वाले मंदिरों में अक्सर सुना जाता है। ऐसे कई गायक हैं जिन्होंने कालजयी धार्मिक गाने, भजन और आरतियां गाई। 
      ये गीत इसलिए लोकप्रिय हुए, क्योंकि इन्हें गायकों ने पूरी तन्मयता के साथ गाकर दर्शकों को भाव विभोर किया। इनमें सबसे ज्यादा लोकप्रियता मिली अनुराधा पौडवाल, नरेंद्र चंचल और अनूप जलोटा को, जो धार्मिक गीतों के गायक हैं। फिल्मों में धार्मिक गीत और भजन गाने वालों की भी अपनी अलग पहचान होती है। ऐसे गीत और भजन गाने वाले गायक भी लंबे समय तक तय रहे। चंचल, अनूप जलोटा का इसमें काफी योगदान रहा। ऐसी फिल्मों में काम करने वाले कलाकारों का भी सकारात्मक पक्ष यह रहा कि दर्शकों में इनके प्रति भक्ति भाव कुछ ज्यादा ही होता है। 'जय संतोषी मां' में माता संतोषी का किरदार निभाने वाली अनीता गुहा को लोग पूजने लगे थे।
      'रामायण' सीरियल में राम और सीता बने अरुण गोविल और दीपिका चिखलिया को आज भी लोग भक्ति भाव से देखते हैं। उसी का प्रताप था कि 'रामायण' के प्रसारण के इतने साल बाद अरुण गोविल लोकसभा की मेरठ सीट से चुनाव जीत गए। हिंदी फिल्मों में सबसे ज्यादा भगवान के रोल करने वाले कलाकार महिपाल को तो लोग भगवान ही मानने लगे थे। उन्होंने 35 से ज्यादा फिल्मों में भगवान या ऐसे किरदार निभाए। वे तुलसीदास भी बने और अभिमन्यु भी। महिपाल ने अपने जीवन काल में संपूर्ण रामायण, वीर भीमसेन, वीर हनुमान, हनुमान पाताल विजय, जय संतोषी माँ जैसी सफल धार्मिक फिल्मों में काम किया। उन्होंने अपने करियर में भगवान राम, कृष्ण, गणेश और विष्णु का किरदार इतनी बार निभाए कि असल जिंदगी में भी लोग इन्हें भगवान का प्रतिरूप समझने लगे थे। वे जहां जाते लोग इनके पैर छूते और आशीर्वाद की कामना करते थे।
     ऐसे कालजयी भक्ति गीतों में 1965 में आई फिल्म 'खानदान' के गीत 'बड़ी देर भई नंदलाला तेरी राह तके बृजबाला' को लोकप्रियता की श्रेणी में रखा जा सकता है। इस भजन को सुनील दत्त पर फिल्माया गया था। राजेंद्र कृष्ण के लिखे इस भजन को मोहम्मद रफी ने गाया। जन्माष्टमी के अवसर पर अभी भी ये गीत गूंजता है। यह गीत फिल्म की कहानी को देखते हुए भी सटीक था। उससे पहले 1952 में आई फिल्म 'बैजू बावरा' का गीत मोहम्मद रफी की हिंदू भजनों के प्रति लगाव का सबसे बेहतर प्रमाण कहा जा सकता है। 'ओ दुनिया के रखवाले, सुन दर्द भरे मेरे नाले' के बोल आज भी किसी दुखी व्यक्ति का चेहरा सामने ले आते हैं। शकील बदायूंनी के लिखे इस गीत में नौशाद ने संगीत दिया था। ख़ास बात ये कि इस भक्ति गीत के गायक, गीतकार और संगीतकार तीनों ही मुस्लिम थे। 1954 में आई फिल्म 'तुलसीदास' के गीत 'मुझे अपनी शरण में ले लो राम' को भी मोहम्मद रफी ने अपनी आवाज दी है और बीते जमाने के विख्यात संगीतकार चित्रगुप्त ने इसे संगीत से सजाया था। गीत में राम को आराध्य मानकर अपना सब कुछ अर्पण करने की बात कही गई है।
     1958 की फिल्म 'दो आंखें बारह हाथ' का गीत 'ऐ मालिक तेरे बंदे हम, ऐसे हो हमारे करम' बुराई पर अच्छाई की जीत का सबसे बेहतरीन प्रमाण कहा जा सकता है। इस गीत में नुकसान पहुंचाने वाले डाकुओं को इंसानियत के नाम पर मदद पहुंचाई जाती है। भरत व्यास ने इस गीत को लिखा और वसंत देसाई ने इसे संगीत दिया था। लता मंगेशकर ने अपनी मधुर आवाज ने मानो इस गीत को अमर कर दिया। 1965 की फिल्म 'सीमा' में बलराज साहनी पर फिल्माया भजन 'तू प्यार का सागर है, तेरी एक बूंद के प्यासे हम' में आतुर मन की व्यथा सुनाई देती है। शैलेंद्र के लिए इस गीत को मन्ना डे ने अपनी आवाज दी और संगीत शंकर जयकिशन ने दिया था। दिलीप कुमार की 1970 में आई फिल्म 'गोपी' का महेंद्र कपूर की आवाज में गाया गीत 'रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा' ऐसा भजन है जिसमें भविष्य का संकेत था। आशय यह कि सच्चा आदमी भटकेगा और झूठे के पास सबकुछ होगा। राजेंद्र कृष्‍ण के गीत को कल्याणजी-आनंदजी ने संगीत दिया था। भक्ति गीतों में सांई बाबा पर रचे गए गीत भी बड़ी संख्या में हैं। 1977 की फिल्म 'अमर अकबर एंथोनी' का गीत 'तारीफ तेरी निकली है दिल से, आई है लब पे बनके कव्वाली' साईं के भक्तों के लिए एक तरह से संजीवनी है। मोहम्मद रफी की आवाज का इस गीत में रफी की लंबी तान सुनने वाले को झंकृत कर देती है।
      'सरगम' (1979) एक संगीत पर केंद्रित फिल्म थी। पर, इसका एक गीत 'रामजी की निकली सवारी, रामजी की लीला है न्यारी' में भगवान राम की महिमा का बखूबी वर्णन है। दशहरे में जब रामजी की सवारी निकलती है, तो इस गीत के बिना माहौल नहीं बनता। इस गीत को सुनकर मनोभावों में राम का नाम समा जाता है। आनंद बक्षी के लिखे इस गीत को मोहम्मद रफी ने गाया था और इसका संगीत लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने दिया था। 'अंकुश' (1986) एक अलग तरह की फिल्म थी, लेकिन, इसका एक भक्ति गीत 'इतनी शक्ति हमें देना दाता, मन का विश्वास कमजोर हो ना' टूटे मन को दिलासा देता हुआ सा लगता है। गीतकार अभिलाष ने इसे लिखा और पुष्पा पागधरे और सुषमा श्रेष्ठ ने इसे गाया है। कुलदीप सिंह ने इसमें संगीत दिया।
      'भर दो झोली मेरी या मुहम्मद, लौटकर मैं ना जाऊंगा खाली' वास्तव में तो एक गैर फ़िल्मी गीत था, पर इसे 2015 में आई फिल्म 'बजरंगी भाईजान' में शामिल किया गया था। फिल्म का हीरो सलमान खान एक भटकी हुई बच्ची को उसके देश पाकिस्तान छोड़ने जाता है। इस दौरान उसे होने वाली परेशानियों को दूर करने के लिए इस अदनान सामी के गाए इस गीत को प्रार्थना के रूप में फ़िल्माया गया। कौसर मुनीर के लिखे इस गीत की धुन संगीतकार प्रीतम ने बनाई थी। लेकिन, लगता है फ़िल्मी कथानक में किरदारों को अब भगवान की कृपा की जरुरत नहीं है। शायद इसीलिए अब भगवान को फिल्मों से किनारे किया जा रहा है। लंबे समय से ऐसी कोई फिल्म नहीं आई, जिसमें धार्मिक गीत, भजन या आरती सुनाई दी हो।
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'पानी' पर फिल्म बनाने से परहेज क्यों!

    फिल्मकारों को जनता से जुड़े मुद्दों पर फिल्म बनाने में महारथ हासिल है। लेकिन, 'पानी' ऐसा मसला है, जिस पर बने कथानक को फिल्माने से हमेशा परहेज किया जाता है। जबकि, सभी ने अपनी आँखों से इस समस्या को देखा और महसूस किया है! देव आनंद की बहुचर्चित फिल्म 'गाइड' और आमिर खान की 'लगान' में जब परदे पर पानी की बूंदे आसमान से बरसती है, तो खुशी से सिर्फ पात्र ही खुश नहीं होते, दर्शकों के मन में भी पानी की अहमियत का अहसास होता है। किंतु, जब परदे से गांव ही गायब हो गए, तो खेत और पानी की बूंदों की अहमियत ही कहां बची! लेकिन, यह सवाल फिर भी जिंदा है कि क्या हिंदी सिनेमा कभी 'पानी' की वास्तविक समस्या को दिखाएगा! 
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- हेमंत पाल

     सामाजिक मुद्दों को प्रभावी ढंग से लोगों तक पहुंचाने का सबसे सशक्त माध्यम सिनेमा ही है। परदे पर समस्या को देखकर लोग उससे सीधे जुड़ते हैं। फिल्म इंडस्ट्री भी बरसों से सामाजिक मुद्दों को लेकर सजग रही। फिल्मों के शुरुआती काल से 80 के दशक तक ज्वलंत मुद्दों पर कई गंभीर फिल्में बनी। राज कपूर, ख्वाजा अहमद अब्बास, रित्विक घटक और उसके बाद श्याम बेनेगल जैसे फिल्मकारों ने कई फिल्मों का ताना-बाना सामाजिक मुद्दों से ही खोजा! मगर 80 के दशक के बाद ऐसे कई सामाजिक मुद्दे हाशिए पर चले गए। ऐसी फिल्में बनना कम होते-होते बंद हो गई। यही कारण है कि पानी की समस्या पर कभी गंभीर फ़िल्म नहीं बनी, जो बनी भी तो उसका मूल कथानक किसी और विषय पर केंद्रित रहा। आज जब देश और दुनिया के सामने पानी की समस्या विकराल रूप लेती जा रही है, कोई भी फिल्मकार इस विषय पर फिल्म बनाने का जोखिम उठाने को तैयार नहीं!
     'रोटी, कपड़ा और मकान' पर तो मनोज कुमार ने फिल्म बनाई, पर 'पानी' को कभी विषय नहीं बनाया गया। शायद इसलिए कि इसे फ्लॉप आइडिया माना जाता है। किंतु, अब प्रियंका चोपड़ा और आमिर खान ने इस दिशा में कोशिश की है। प्रियंका ने मराठी में 'पाणी' बनाई, जिसका निर्देशन आदिनाथ एम कोठारे ने किया और हनुमंत केंद्रे ने मुख्य भूमिका निभाई है। फिल्म की बुनियाद मराठवाड़ा के जल संकट पर आधारित है। इस संकट के कारण युवाओं की शादी भी प्रभावित होती हैं। प्रियंका चोपड़ा की मां डॉ मधु चोपड़ा और कुछ अन्य लोग फिल्म के निर्माता हैं। उनके अलावा आमिर खान भी अब हिंदी में उस 'पानी' विषय पर फिल्म बनाने वाले हैं। इस प्रोजेक्ट को कई बार घोषणाओं के बाद रोक दिया गया। लेकिन, अब आमिर खान ने 'पानी' के लिए लगता है कमर कस ली।    
      इस विषय की अहमियत को सबसे पहले ख्वाजा अहमद अब्बास ने समझा और 1946 में 'धरती के लाल' फिल्म बनाई। यह बंगाल के अकाल की विभीषिका और उससे उभरे लालच और क्रूरता की कहानी थी। यह उनकी पहली फिल्म थी। इसके बाद 1963 में राजस्थान में एक महत्वाकांक्षी जल परियोजना की शुरुआत की गई थी, जो उस समय दुनिया की सबसे बड़ी सिंचाई परियोजना थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने ख्वाजा अहमद अब्बास से एक दिन ज़िक्र किया कि वे राजस्थान के रेगिस्तानी इलाके में पानी की अहमियत और नहर के बनने पर फिल्म क्यों नहीं बनाते? अब्बास को इस मुद्दे में बहुत से आयाम नज़र आए। 
     उन्होंने ‘दो बूंद पानी' (1971) फिल्म बनाई। इस फिल्म की कहानी गंगा नाम के युवा किसान और उसकी नई नवेली और पढ़ी-लिखी दुल्हन गौरी पर केंद्रित थी। गंगा के पिता पानी की कमी से अपनी ज़मीन के सूखने से परेशान होते है। गंगा भी इस बांध बनने में योगदान देना चाहता है, उसकी पत्नी भी यही सलाह देती है। गंगा के उस काम पर जाने के बाद परिवार को कई दिक्कतों का सामना करना पड़ता हैं। गौरी बहादुरी से उनका सामना करती है। लेकिन, बांध के निर्माण के दौरान एक हादसे को बचाते हुए गंगा मारा जाता है। फिल्म का अंत उम्मीद जगाता है। क्योंकि, गौरी अपने नवजात बच्चे को 'जमुना' नाम देती है। .
     इसके बाद पानी की समस्या पर कभी कोई गंभीर फिल्म नहीं बनी! आमिर खान ने 2001 में 'लगान' जरूर बनाई! लेकिन, ये बारिश की कमी से किसानों को होने वाली परेशानी और अंग्रेज सरकार द्वारा वसूले जाने वाले लगान पर आधारित थी। सशक्त कथानक के कारण फिल्म हिट रही, पर इसमें जल संकट जैसा मुद्दा दब गया। 2013 में पानी के मुद्दे पर 'कौन कितने पानी में' और 'जल' (2014) जरूर आई थी। ‘जल’ को तो कच्छ के रण में फिल्माया था। ये बक्का नाम के एक ऐसे युवक की कहानी थी, जिसके पास दैवीय शक्ति है। इसके दम पर वो रेगिस्तान में भी पानी खोज सकता है। इस फिल्म को विदेशी भाषा की ऑस्कर अवॉर्ड फिल्मों में भारत की तरफ से भेजा भी गया था। इससे पहले 2005 में दीपा मेहता ने 'वाटर' जरूर बनाई, पर इसका पानी वास्ता नहीं था। 'वेन डन अब्बा' (2010) हैदराबाद के एक गांव की पृष्ठभूमि में बनी फिल्म है। यह ऐसे आदमी की कहानी है, जो दुनिया में बढ़ती पानी की समस्या के चलते अपने खेत में एक कुआं खुदवाना चाहता है। इसके लिए उसे कई मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। फिल्म का निर्देशन श्याम बेनेगल ने किया। 
      शेखर कपूर ने 2010 के कांस फिल्म समारोह में 'पानी' बनाने का ऐलान किया था। इस फिल्म की थीम काफी हटकर थी। इसमें भविष्य के ऐसे दौर की कल्पना की गई, जब पानी पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का कब्जा होगा और आम लोग एक-एक बूंद के लिए संघर्ष करेंगे। लेकिन, ये फिल्म नहीं बनी। फिर 2013 में 'यशराज फिल्म्स' के बैनर तले इस फिल्म की चर्चा हुई। सुशांत सिंह का इसमें अहम किरदार बताया गया। बाद में फिल्म का ये आइडिया आता-जाता रहा। इसके बाद फिर शेखर कपूर ने इस प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया और सुशांत सिंह को ली लीड रोल में लिया। लेकिन, फिल्म घोषणा से आगे नहीं बढ़ी। फिल्म का कथानक 2040 के कालखंड जोड़कर बुनी गई। जब मुंबई के एक क्षेत्र में पानी नहीं होता और दूसरे में पानी होता है। दोनों क्षेत्रों में जंग छिड़ती है और इसी जंग में प्रेम पनपता है। फिल्म में सुशांत सिंह राजपूत, आयशा कपूर और अनुष्का शर्मा को लिया गया था। फिल्म का पोस्टर भी जारी हुआ, जिसमें एक आदमी मुंह में घड़ा लगाए दिखाया गया, लेकिन घड़े में एक बूंद भी पानी नहीं होता! 
    पानी की समस्या पर बनी एक फिल्म है ‘कड़वी हवा’ जिसकी कहानी दो ज्वलंत मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती है। एक है जलवायु में बदलाव के कारण बढ़ता जलस्तर और सूखे की समस्या! फिल्म में सूखाग्रस्त बुंदेलखंड दिखाया गया है। सूखे की समस्या के कारण यहां के किसान कर्ज में डूबे हैं। यह फिल्म किसानों की बेबसी और सूखी जमीन की हकीकत दिखाती है। ऐसी ही एक फिल्म 'कौन कितने पानी में' दो गांवों 'ऊपरी' और 'बैरी' की कहानी है। ऊपरी गाँव ऊंची जाति वालों का है और बैरी गाँव में पिछड़ी जाति के लोग रहते हैं। लेकिन, वे जागरूक हैं और पानी को सहेजते हैं। एक समय आता है, जब ऊंची जाति वालों के गाँव में पानी की किल्लत आती है। जबकि, पिछड़ी जाति वालों के गाँव में पानी बहुलता से रहता है। इस पानी के लिए ऊंची जाति वाले बैरी गाँव से छल करके पानी जुगाड़ लेते हैं। फिल्म का निष्कर्ष है कि यदि पानी को सहेजा नहीं गया तो इस किल्लत से हमें निपटना पड़ेगा।
     देखा गया है कि पानी की सबसे ज्यादा किल्लत गरीबों को ही चुकानी पड़ती है। अमीर तो पानी खरीदकर पी लेते हैं, लेकिन गरीब पानी खरीदकर किसे पिएं!  पानी की किल्लत पर कई डॉक्यूमेंट्री भी बन चुकी है। इनमें से एक है 'थर्स्टी सिटी।' 2013 में बनी इस फिल्म में दिल्ली में पानी की किल्लत और पानी के लिए श्रमिकों के संघर्ष को कैमरे में कैद किया गया है। 'पानी' विषय पर फ़िल्में भले ही गिनती बनी हो, गाने भी कम बने पर पसंद किए गए। फिल्म 'अनोखी रात' का गीत 'ओह रे ताल मिले नदी के जल में' हमारे जीवन दर्शन को अभिव्यक्त करता लगता है। इसके अलावा भी पानी पर कुछ गाने लोकप्रिय हुए। पानी को तरसते, पानी को सिसकते, आंखों में नींद नहीं है (वेल डन अब्बा), पानी रे पानी तेरा रंग कैसा, जिसमें मिलाओ (शोर), मानो तो मैं गंगा मां हूं ना मानो तो बहता पानी (गंगा की सौगंध) और काले मेघा काले मेघा पानी तो बरसा जा (लगान) जब भी सुनाई देते हैं, दिल के अंदर तक उतर जाते हैं। 
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धमकी सलमान खान को, संकट में आई इंडस्ट्री!

- हेमंत पाल 

    मुंबई की छवि सपनों के शहर के रूप में रही है। इस महानगर का समुद्र का किनारा, ऊंची इमारतें और आलीशान जिंदगी। इसके अलावा सबसे बड़ा आकर्षण है फिल्म इंडस्ट्री। इस पर कालिख पोतने का काम किया है अंडरवर्ल्ड ने। यहां 70 के दशक से हाजी मस्तान, वरदराजन मुदलियार, दाऊद इब्राहिम का आतंक रहा। लेकिन, ये दहशत कभी खुलकर इतनी बाहर नहीं आई, जिससे आम लोग प्रभावित हों। धीरे-धीरे फिल्म इंडस्ट्री अंडर वर्ल्ड के चंगुल में आ गई। इसलिए कि कई फिल्मों के निर्माण में इसी अंडर वर्ल्ड का पैसा लगने लगा था। फ़िल्मी दुनिया ने भी अंडरवर्ल्ड का खौफनाक चेहरा देखा। लेकिन, लॉरेंस बिश्नोई ने जिस तरह के हालात निर्मित किए, वो इंडस्ट्री के लिए नई चिंता की बात है।
    मुंबई ने 1993 में पहली बार दाऊद और उसके गुर्गों के आतंक का सबसे चेहरा देखा था। मुंबई ब्लास्ट से पहले दाऊद इब्राहिम दुबई में रहकर मुंबई में काले कारोबार पर नजर रखी। फिल्मी दुनिया में भी दाऊद का दबदबा हो गया। इसके बाद अगस्त 1997 में संगीत इंडस्ट्री के गुलशन कुमार की हत्या हुई और पहली बार फ़िल्मी दुनिया को अहसास हुआ कि अंडर वर्ल्ड क्या होता है। कैसेट किंग कहे जाने वाले गुलशन कुमार को मंदिर में पूजा के बाद गोलियों से भून दिया गया। बाद में खुलासा हुआ कि उनसे फिरौती मांगी गई थी और नहीं देने पर उनकी हत्या कर दी गई। इसी तरह फिरौती मांगे जाने की बातें सलमान खान से भी की जा रही है। जबकि, बहाना काले हिरण को बनाया जा रहा है।  
    इन दिनों फिल्म इंडस्ट्री संकट में है और इसका कारण है सलमान खान को मिल रही धमकियां। उनके घर के बाहर खुलेआम गोलियां चलने की घटना से उन्हें इस संकट का अंदाजा तो हो गया था, पर उनके जिगरी दोस्त बाबा सिद्दीकी की हत्या से ये खतरा ज्यादा बढ़ गया है। हाल ही में उन्हें फिर खुली धमकी के साथ फिरौती भी मांगी गई। जिस भाषा में ये धमकी दी गई, उससे लगता है कि मामला संगीन है। धमकी में लिखा गया कि इसे हल्के में न लें। अगर सलमान खान जिंदा रहना चाहते हैं और लॉरेंस बिश्नोई से दुश्मनी खत्म करना चाहते हैं तो उन्हें 5 करोड़ देने होंगे। अगर ये पैसे नहीं दिए तो सलमान खान का भी वही हाल होगा, जो बाबा सिद्दीकी का हुआ। इससे पहले अप्रैल में सलमान खान के घर पर गोलीबारी हुई थी। इसमें कोई घायल तो नहीं हुआ, पर उनकी बालकनी को निशाना बनाकर चलाई गई गोलियां से इरादा स्पष्ट होता है। उस समय भी लॉरेंस बिश्नोई गैंग ने इस हमले की जिम्मेदारी ली और बताया था कि उनका निशाना सलमान खान थे, पर वे बच गए। इसके बाद उनके पिता पर भी हमला करने की कोशिश की गई थी। अब उनके दोस्त की हत्या से स्थिति को समझा जा सकता है।
     मुंबई पुलिस की अपराध शाखा ने भी इस बात की पुष्टि की है, कि बाबा सिद्दीकी की हत्या का कारण सलमान खान के साथ उनकी नजदीकी है, जो काले हिरण के शिकार मामले के बाद से लॉरेंस बिश्नोई गैंग की हिट लिस्ट में हैं। सिद्दीकी की हत्या को सलमान खान के करीबियों को बिश्नोई गैंग की ओर से संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जिनका अभिनेता के साथ भावनात्मक एवं वित्तीय रिश्ता है। सितंबर में कनाडा में पंजाबी गायक एपी ढिल्लन के घर के बाहर फायरिंग भी इसी तरह की एक चेतावनी थी। इस फायरिंग की जिम्मेदारी भी बिश्नोई गैंग ने ली थी। इसलिए कि ढिल्लन ने एक म्यूजिक वीडियो के लिए मुफ्त में सलमान खान के साथ सहयोग किया था। सलमान के घर के बाहर फायरिंग मामला, बाबा सिद्दीकी की हत्या और एपी ढिल्लन के यहाँ गोली चलाया जाना इस बात का इशारा है कि विश्नोई गैंग हर उस व्यक्ति को निशाना बना रहा है, जो सलमान के नजदीक है।
    ऐसे में सबसे बड़ा सवाल उठता है कि सलमान खान की सुरक्षा के कारण फिल्मों, शो और इवेंट्स से दूर होते गए तो उन पर लगे करोड़ों रूपए का क्या होगा! सलमान की कई फिल्मों की शूटिंग चल रही है। कई की डबिंग बाकी है तो 'बिग बॉस' जैसा टीवी रियलिटी शो सलमान के कंधों पर टिका है। इसके पीछे निर्माताओं और कंपनियों के करोड़ों रूपए फंसे हैं, उसकी भरपाई कहां से होगी! सवाल बड़ा है, पर इसका जवाब आसान नहीं। क्योंकि, शो-बिजनेस में सारे दांव एक चेहरे पर लगे होते हैं और इसका कोई विकल्प नहीं होता। जब फ़िल्मी दुनिया किसी एक सितारे पर केंद्रित हो जाती है, तो सारे नफा-नुकसान भी उसी सितारे से तय होने लगते हैं।
   उस कलाकार की सेहत और निजी जिंदगी की उलझनें भी फिल्मों के कारोबार को प्रभावित करती है। यही स्थिति इन दिनों सलमान को लेकर है। ये चिंता तब भी जाहिर की गई थी, जब सलमान खान को काले हिरण के कथित शिकार का दोषी माने जाने और अदालत से 5 साल की सजा मिली थी। उस समय भी कयास लगाए जाने लगे थे कि यदि उन्हें ये सजा भुगतना पड़ी, तो फिल्म निर्माताओं के उस दांव का क्या होगा, जो उन्होंने सलमान की लोकप्रियता पर लगा रखा है! इसलिए कि, संजय दत्त को भी जब हथियार रखने के मामले में 5 साल की सजा हुई थी, तब भी निर्माताओं को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा था। कई फिल्मों की शूटिंग जल्दबाजी में पूरी करना पड़ी थी और कई फिल्मों में उनका रोल काटना पड़ा था।
   दो दशक पहले सलमान खान ने शौक-शौक में जोधपुर नजदीक काले हिरण का शिकार तो कर लिया! लेकिन, वे नहीं जानते थे कि उनकी ये छोटी सी गलती उनके लिए इतनी बड़ी मुसीबत बन जाएगी। वे इस आरोप में जेल तक हो आए और अब लॉरेंस गैंग के निशाने पर हैं। जब जोधपुर सेशन कोर्ट ने सलमान को सजा सुनाई, तब भी कई निर्माता-निर्देशकों की नींद हराम हो गई थी! उनके करोड़ो रुपए ऐसे प्रोजेक्ट्स में लगे हैं, जिसमें सलमान खान मुख्य भूमिका में। वही स्थिति आज भी है। यदि सलमान को भी संजय दत्त की तरह लंबे समय तक जेल में रहना पड़ता तो उनके करोड़ों रुपए डूब सकते थे।
   करीब एक दशक से बॉलीवुड में सफलता की गारंटी समझे जाने वाले सलमान पर आया संकट कई निर्माताओं की परेशानी का कारण बन गया है। 1988 में 'बीवी हो तो ऐसी' से परदे पर कदम रखने वाले सलमान खान को सबसे ज्यादा कमाई करने वाले कलाकारों में गिना जाता है। उनकी जय हो, ट्यूबलाइट और भारत जैसी कुछ फिल्मों को छोड़ दिया जाए तो पिछले दस सालों में बजरंगी भाईजान, दबंग और 'टाइगर' सिरीज की फिल्मों ने करोड़ों का कारोबार किया है। कलर्स टीवी का रियलिटी शो पूरी तरह सलमान पर केंद्रित है। बतौर एंकर वे भले ही सप्ताह में दो दिन आते हो, पर दर्शकों का सबसे बड़ा आकर्षण वही होता है।
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भीड़ में खो जाने वाला सांवला सा मिथुन

    फिल्म इंडस्ट्री में मिथुन चक्रवर्ती की पहचान पांच दशक से बनी है। उन्होंने अपने करियर में कई बेहतरीन फिल्मों में अभिनय किया। लेकिन, वे कभी उस पायदान तक नहीं पहुंचे, जो किसी कलाकार को स्टार बनाती है। लेकिन, उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्हें 'डिस्को डांसर' से एक ऐसे डांसर का टैग मिला, जो अनोखा था। वे इंडस्ट्री के पहले एक्टर हैं, जिन्होंने डिस्को डांस किया। मिथुन को अपने करियर में तीन बार नेशनल अवॉर्ड मिला। उन्हें पद्म भूषण से भी सम्मानित किया जा चुका है। अब उन्हें 'दादा साहब फाल्के अवॉर्ड' से सम्मानित किए जाने की घोषणा की गई।  
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- हेमंत पाल

      मिथुन चक्रवर्ती को इस साल का दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड' दिए जाने की घोषणा से किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। बल्कि, याद आया कि अभी तक इस कलाकार को भुलाया क्यों गया! वे कभी राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन और शाहरुख़ खान की तरह दर्शकों के चहेते नहीं रहे! पर, जब भी वे परदे पर आए सिनेमा हॉल में सीटियां जरूर गुंजी। 80 के दशक में उनकी डिस्को डांस वाली स्टाइल इतनी लोकप्रिय हुई कि वे मंच के डांसर कलाकारों में लोकप्रिय हो गए। सिर्फ यही नहीं उनकी एक्शन फिल्मों का भी अलग ही क्रेज रहा। वे सामाजिक फिल्मों के भी चहेते कलाकार रहे। इसलिए कहा जा सकता है कि मिथुन कभी किसी ट्रेंड में नहीं बंधे। उन्हें जब भी और जैसा भी किरदार मिला उन्होंने उसे पूरी क्षमता से निभाया। अपने 50 साल के करियर में मिथुन ने कई भाषा की फिल्मों में काम किया, पर उन्हें कभी स्टारडम नहीं मिला। 
       मिथुन ने हिंदी के अलावा बांग्ला, तमिल, तेलुगु, कन्नड़,ओडिया और भोजपुरी की साढ़े 3 सौ साल से ज्यादा फिल्मों में काम किया। लेकिन, उन्हें पहचान मिली हिंदी सिनेमा के परदे से। अब उसी बहुमुखी प्रतिभा वाले कलाकार को सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान के लिए चुना गया। जब उन्हें यह सम्मान दिए जाने की घोषणा हुई तो मिथुन अभिभूत हो गए। सामने आई पहली प्रतिक्रिया में उन्होंने कहा 'सच कहूं तो, मेरे पास कोई भाषा ही नहीं है। न मैं हंस सकता हूं, न मैं खुशी से रो सकता हूं। इतनी बड़ी चीज है। जहां से मैं आया हूं, उस लड़के को इतना बड़ा सम्मान मिला है, मैं सोच भी नहीं सकता। मैं ये अपने परिवार और दुनियाभर के फैंस को डेडिकेट करता हूं।' एक आम आदमी का चेहरा लिए मिथुन ने अपने अभिनय करियर में वो जगह पाई, जिसका मिलना आसान नहीं था। धीरे-धीरे वे इतने लोकप्रिय हो गए, कि फिल्मों की रिलीज का भी रिकॉर्ड बना लिया। मिथुन चक्रवर्ती की साल 1989 में 19 फिल्में रिलीज हुई, जिनमें वे लीड एक्टर थे। उनका यह कारनामा 'लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स' में दर्ज किया गया। साढ़े 3 दशक बाद भी कोई उनका रिकॉर्ड नहीं तोड़ पाया।
      मिथुन चक्रवर्ती का जन्म 16 जून 1950 को कोलकाता में हुआ और उनका असल नाम गौरांग चक्रवर्ती है। उन्होंने केमिस्ट्री में स्नातक किया फिर नक्सली विचारधारा होने की वजह से इस आंदोलन में शामिल होकर घर छोड़ दिया। कुख्यात नक्सली रवि रंजन से उनकी निकटता रही। लेकिन, वे ज्यादा दिन इस आंदोलन से जुड़े नहीं रह सके। कुछ साल बाद मिथुन के इकलौते भाई का एक हादसे में निधन हो गया। घर की मुश्किल परिस्थितियों को देखते हुए उन्होंने नक्सल आंदोलन छोड़कर घर का रुख किया। क्योंकि, परिवार भी परेशानी में आ गया था। नक्सलवाद से नाता तोड़ने पर मिथुन की जान को खतरा भी था, लेकिन वो नहीं डरे। नक्सल आंदोलन छोड़कर घर लौटना आसान नहीं था। 
      इसी समय उनकी रूचि एक्टिंग में जागी। परिवार भी चाहता था कि वे घर से बाहर रहें। उन्होंने पुणे फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट में एडमिशन लिया। जब कोर्स पूरा हुआ तो वे काम की तलाश में बंबई (अब मुंबई) आ गए। ऐसे में मिथुन ने कई दिन भूखे पेट रात गुजारीं। कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें अदाकारी का मौका तो नहीं मिला, अलबत्ता हेलन के असिस्टेंट जरूर बन गए। इसका फ़ायदा ये मिला कि उन्हें हेलन के साथ स्टूडियो में आना-जाना आसान हो गया। ऐसे में उन्हें छोटे-मोटे रोल भी मिलने लगे। अमिताभ बच्चन की फिल्म 'दो अनजाने' में भी छोटा सा रोल मिला। कई बार उन्हें बॉडी डबल बनाकर भी काम मिला। मिथुन ने फिल्मों में एक्टिंग से पहले गरीबी का लंबा दौर देखा। यह दौर फिल्मों में आने के बाद भी कई महीनों तक चला। एक्टिंग की शुरुआत के बाद भी उनकी कई रातें फुटपाथ पर बीती। कई बार भूखे पेट ही सोना पड़ा था। लेकिन, समय बदला और उन्हें 'सुरक्षा' फिल्म मिली जिसे कामयाबी मिली। इस एक्शन फिल्म के बाद उन्हें कई फ़िल्में मिली। हमसे बढ़कर कौन, शानदार, त्रिनेत्र, अग्निपथ, हमसे है जमाना, स्वामी विवेकानंद, वो जो हसीना, ऐलान, डिस्को डांसर से लगाकर 'द कश्मीर फाइल' तक उन्होंने कई फिल्मों में काम किया। एक से बढ़कर एक सुपरहिट फिल्में दी। 
     शुरूआती दौर में दो अनजाने, फूल खिले हैं गुलशन गुलशन जैसी फिल्मों भी उनकी लिस्ट में हैं जिसमें छोटे-छोटे रोल किए। पहली बार मिथुन को बड़ी भूमिका 'मृगया' (1976) में मिली। उन पर मृणाल सेन की नजर पड़ी और उन्हें लगा कि इस कलाकार को मौका दिया जा सकता है। इसलिए कि फिल्म का कथानक एक आदिवासी युवक घिनुआ पर केंद्रित था। चेहरे-मोहरे से मिथुन उस रोल में बिल्कुल फिट दिखाई दिए। बताते हैं कि मृणाल सेन ने उन्हें जब देखा वे लड़कियों से रोमांटिक अंदाज में बात कर रहे थे। उन्होंने मिथुन को अपनी फिल्म 'मृगया' ऑफर कर दी। मिथुन ने इस आर्ट फिल्म से अपना करियर शुरू किया। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर तो सफल नहीं रही, पर मिथुन की एक्टिंग ने उन्हें बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड जरूर दिला दिया। लेकिन, वो उनके संघर्ष का समय था। दिल्ली जाकर अवॉर्ड लेने जाने के लिए भी उनके पास पैसे नहीं थे। तब रेखा उन्हें अपना स्पॉटबॉय बनाकर ले गई थीं। इस फिल्म से पहचान तो मिली पर उनका संघर्ष ख़त्म नहीं हुआ। 
       हिंदी फिल्मों में मिथुन को जल्दी स्वीकार्यता नहीं मिली। क्योंकि, वे उस दौर के रोमांटिक रोल में फिट नहीं बैठते थे। उनकी कई फ़िल्में जरूर आई, पर व्यावसायिक सफलता नहीं मिली। 1979 में आई फिल्म 'सुरक्षा' ने मिथुन को पहचान दी। फिल्म की सफलता के बाद उन्हें कई फ़िल्में ऑफर हुई, पर कोई भी बड़ी अभिनेत्री उनकी नायिका नहीं बनी, इसकी वजह थी उनका सांवला रंग। फिर 1982 में आई 'डिस्को डांसर' ने उन्हें डांसिंग स्टार बना दिया और दर्शकों में उनकी अलग पहचान बनी। उनके डांस का अंदाज युवाओं को इतना भाया कि वो एक स्टाइल बन गया। सफलता का पैमाना यह था कि 'डिस्को डांसर' 100 करोड़ कमाने वाली पहली हिंदी फिल्म बन गई, जिसने मिथुन के करियर को नई दिशा दी। हालांकि, फिल्म ने ज्यादा कमाई सोवियत यूनियन से की थी। इस फिल्म से पहले मिथुन पूरी तरह नॉन डांसर थे। पर, जब इन्होंने जिस तरह फिल्म में डांस किया, तो उनके स्टेप्स फेमस हो गए। वे अभी तक साढ़े 3 सौ से ज्यादा फिल्मों में काम कर चुके हैं और उन्हें 3 बार नेशनल अवॉर्ड भी मिला। उन्हें जनवरी 2024 में पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया। मिथुन के अभिनय का दौर अभी पूरा नहीं हुआ। उनकी रिलीज होने वाली आखिरी फिल्म 'कश्मीर फाइल्स' (2022) है। इसके अलावा वे बंगाली फिल्म 'प्रजापति' और 'काबुलीवाला' में भी दिखाई दिए।
    मिथुन चक्रवर्ती ने 2014 में भारतीय तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) पार्टी से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया। वे राज्यसभा सदस्य बनाए गए। लेकिन, 2016 में उन्होंने सांसद पद से इस्तीफा दे दिया। फिर टीएमसी से नाता तोड़ते हुए मिथुन 2021 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। भाजपा ने मिथुन को विधानसभा चुनाव में पार्टी का स्टार प्रचारक बनाया। मिथुन ने भी जमकर प्रचार किया। यह माना जा रहा था कि भाजपा सरकार बना सकती है। पर, जैसी उम्मीद थी वे पार्टी को वैसी जीत नहीं दिला सके। विधानसभा चुनाव के बाद पश्चिम बंगाल में जिला परिषद और पंचायत के चुनाव में भी टीएमसी का पलड़ा भारी रहा। इसके बाद मिथुन की राजनीतिक सक्रियता में कमी आ गई। 
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Thursday, October 3, 2024

ऑस्कर की भीड़ में कहीं खो न जाए भारतीय एंट्री 'लापता लेडीस!'

- हेमंत पाल

     भारतीय फिल्मों का इतिहास बहुत लंबा है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय फिल्मों की पहचान उस लम्बाई के अनुरूप नहीं है। हर साल जब किसी भारतीय फिल्म को 'ऑस्कर' पुरस्कार में भेजे जाने की बात होती है, तो उस स्तर की एक फिल्म को खोज पाना मुश्किल होता है। यही कारण है कि किसी फिल्म को भेजा तो बहुत उत्साह और उम्मीद से है, पर अंत में हाथ कुछ नहीं लगता। अभी तक कुछ फ़िल्में अंतिम तीन में चयन तो हुई, पर उनके हाथ ऑस्कर की ट्राफी नहीं लगी। इस बार फिर इसी सकारात्मक उम्मीद से किरण राव की फिल्म ‘लापता लेडीज’ को ऑस्कर पुरस्कार (2025) के लिए भारत से भेजा जा रहा है। इस हल्की-फुल्की फिल्म को आधिकारिक प्रविष्टि के तौर पर चुना गया। लेकिन, 'लापता लेडीज' को ऑस्कर में भेजने की घोषणा के साथ ही विवाद भी हुआ। कहा जा रहा है कि पायल कपाड़िया की फ़िल्म 'ऑल वी इमेजिन एज लाइट' इससे ज्यादा बेहतर फिल्म है।
     'लापता लेडीज' को 29 फिल्मों में से चुना गया है। 2002 में आई आमिर खान की एक्टिंग वाली फिल्म 'लगान' के बाद से अभी तक किसी भारतीय फिल्म ऑस्कर में सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फीचर फिल्म के लिए नामांकित नहीं हुई। इससे पहले दो फिल्मों ने अंतिम पांच में जगह बनायी थी, ये थी 'मदर इंडिया' और 'सलाम बॉम्बे।' अपनी अनोखी पटकथा की वजह से 'लापता लेडीज' को जिन फिल्मों में से चुना गया वे हैं हिंदी की हिट फिल्म 'एनिमल' और मलयालम की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म 'अट्टम' और कान फिल्म महोत्सव की विजेता 'ऑल वी इमेजिन एज लाइट' शामिल हैं।
    जाहनु बरुआ की अध्यक्षता वाली 13 सदस्यीय चयन समिति ने आमिर खान और किरण राव निर्मित 'लापता लेडीज' को एकेडमी अवॉर्ड्स में सर्वश्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय फिल्म श्रेणी के लिए ‘सर्वसम्मति’ से चुना। 'लापता लेडीज़' के निर्माता आमिर ख़ान हैं और उनकी प्रोडक्शन की फिल्में ‘लगान’ और ‘तारे ज़मीन पर’ पहले इस श्रेणी के लिए भेजी जा चुकी है। इसलिए उम्मीद की जा रही है कि अपने पिछले अनुभवों का उपयोग करते हुए आमिर ख़ान ‘लापता लेडीज़’ की ऑस्कर एंट्री को ख़ास मुकाम तक पहुंचा सकेंगे।
     यह फिल्म इसी साल (2024) रिलीज हुई और इसने दर्शकों का अच्छा मनोरंजन किया। लेकिन, सवाल उठता है कि 'लापता लेडीज' की एंट्री का क्या कारण है, तो इसका जवाब जूरी के अध्यक्ष और असमी फिल्मों के डायरेक्टर जाह्नू बरूआ ने दिया। उन्होंने बताया कि जूरी इन 29 फिल्मों में ऐसी फिल्म की तलाश कर रही थी, जो हर नजरिए से भारत को ऑस्कर के जरिए दुनिया में प्रस्तुत कर सके। ऐसे में 'लापता लेडीज' इन मानकों पर पूरी तरह खरी उतरती है। भारतीयता बहुत अहम है और इसलिए 'लापता लेडीज' ही सही चयन है।
     उन्होंने यह भी कहा कि यह जरूरी है कि ऐसी फिल्म को ऑस्कर भेजा जाए जो विश्व पटल पर भारत को दिखाए। यही कारण है कि 29 फिल्मों में से जूरी के मेंबर्स ने सिर्फ 'लापता लेडीज' पर ही मुहर लगाई। उन्होंने यह भी बताया कि चेन्नई में इन सभी फिल्मों को एक हफ्ते में देखा गया। इस पूरे हफ्ते हमने फिल्मों पर चर्चा की। इसके बाद इनका हर तरह से विश्लेषण कर शॉर्टलिस्ट किया। कौन सी फिल्म ऑस्कर में भेजी जाए इस चर्चा के लिए आधा दिन और लगा, फिर 'लापता लेडीज' को अंतिम रूप से चुन लिया गया। यह भी कहा कि उन पर और उनकी टीम पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं था।
    यह फिल्म दो दुल्हनों फूल और जया पर केंद्रित सोशल ड्रामा है। इसके कथानक में दिखाया गया कि कैसे कम उम्र में लड़कियों की शादी करके उन्हें घर की चारदीवारी में जिम्मेदारियों के साथ बंद कर दिया जाता है। फिल्म में एक लड़की जो पढ़ना चाहती है वो शादी के खिलाफ होती है। फिर भी उसकी जबरन शादी कर दी जाती है। जब वह विदा होकर ट्रेन से ससुराल जाती है, तो उसे ट्रेन के डिब्बे में एक और दुल्हन मिलती हैं। दोनों ने नाक तक घूंघट डाला होता है। उनका यह घूंघट दुल्हनों की वास्तविकता के साथ एक भारतीय सामाजिक संस्कार भी है। घूंघट और ट्रेन से उतरने की हड़बड़ी में ये दोनों दुल्हनें अपने दूल्हों से बदल जाती हैं। इस नाटकीयता पर हंसी तो आती है, लेकिन कहानी के आगे बढ़ने पर स्थिति की जटिलता भी समझ आती है।
    कहानी के साथ एकाकार होकर दर्शक भी किरदारों के साथ चिंतित होते हैं कि फूल और जया कैसे सही ठिकानों तक पहुंचेगी। उनके साथ कुछ अप्रिय होने का खतरा भी होता है। फूल और जया की परिस्थितियां अलग होने के बावजूद एक जैसी हैं। क्योंकि, दोनों का वर्तमान अनिश्चित होता है। फूल अपनी सादगी और जया अपनी होशियारी के बावजूद पुरुष प्रधान समाज के बुने जाल में फंस जाती है। दोनों के पति स्वभाव में अलग है। दीपक सोच में प्रगतिशील है, लेकिन प्रदीप रूढ़िवादी और पुरुषवादी सोच रखता है। फूल, जया, दीपक और प्रदीप इन सभी किरदारों के ताने-बाने में महिलाओं की अस्मिता, पहचान और प्रतिष्ठा के सवाल सामने आते हैं। निर्देशक किरण राव ने इसे बेहद सरल तरीके से सुलझाया है।
     इसी साल 1 मार्च को रिलीज हुई इस फिल्म की शुरुआत काफी धीमी रही। लेकिन सकारात्मक समीक्षाओं और माउथ पब्लिसिटी ने फिल्म को आगे बढ़ाया और यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कुछ गति पकड़ने में सफल रही। फिल्म ने शुरुआती सप्ताह में लगभग 4 करोड़ रुपए कमाए। रिलीज के 50 दिनों के बाद 'लापता लेडीज' का बॉक्स ऑफिस कलेक्शन 17.31 करोड़ रुपए रहा। 8 हफ्ते बाद यह फिल्म ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आ गई। किरण राव द्वारा निर्देशित इस फिल्म को आमिर खान और ज्योति देशपांडे ने बनाया है। यह फिल्म आमिर खान प्रोडक्शंस और किंडलिंग प्रोडक्शंस के बैनर तले बनाई गई। इसकी पटकथा बिप्लब गोस्वामी की एक पुरस्कृत कहानी पर आधारित है। पटकथा और संवाद स्नेहा देसाई ने लिखे हैं, जबकि अतिरिक्त संवाद दिव्य निधि शर्मा ने लिखे हैं।
ऑस्कर में भारत का ख़राब रिकॉर्ड
    1956 में जब से ‘बेस्ट फॉरेन लेंग्वेज कैटेगरी' वाली फिल्मों को अवार्ड देने की शुरुआत की गई, तभी से भारत का रिकॉर्ड ख़राब रहा। भारत से भेजी जाने वाली फ़िल्में हमेशा विवादों से घिरी रही। सीधे शब्दों में कहा जाए तो हम अभी तक समझ ही नहीं सके कि ऑस्कर पाने वाली फ़िल्में कैसी होती है! हमारे यहां कभी राजनीतिक कारणों से तो कभी किसी को खुश करने के लिए फिल्मों का चयन किया जाता रहा है। इसका सटीक उदाहरण है 1996 में इंडियन, 1998 में 'जींस' और 2019 फिल्म 'गली बॉय' को इस कैटेगरी में भारत से भेजा जाना है। क्या इन फिल्मों का स्तर इस लायक था कि इन्हें ऑस्कर में भेजा गया ये आज भी रहस्य है कि इन फिल्मों को क्यों चुना गया था!
    2007 में भी 'एकलव्य : द रॉयल गार्ड' फिल्म को लेकर भारी बवाल मचा था। जब 'बर्फी' फिल्म का चुनाव ऑस्कर के लिए किया गया, तब भी बहुत हल्ला मचा। 'बर्फी' के बारे में कहा गया था कि इस फिल्म के कई सीन विदेशी फिल्मों की साफ-साफ़ नक़ल है। 'न्यूटन' फिल्म पर आरोप लगे थे कि कि ये एक ईरानी फिल्म 'सीक्रेट बैलट' की नक़ल है। लेकिन, जब भी हमने अच्छी फिल्में भेजीं, ऑस्कर ने उन्हें ठुकराया भी है। न्यूटन, विसरनई, कोर्ट, विलेज रॉकस्टार्स के अलावा ‘रंग दे बसंती’ (2006), ‘बैंडिट क्वीन’ (1994) से लेकर 'गाइड' (1965) और अपू ट्राईलॉजी की तीसरी फिल्म द वर्ल्ड ऑफ अपू' (1959) तक ऐसा कई-कई बार होता रहा! फिर आखिर चूक कहां होती है, ये ऐसा सवाल है जिसका जवाब खोजा जाना है!
अंतिम पांच दावेदारों में तीन बार जगह मिली
   अभी तक भेजी जाने वाली भारतीय फिल्मों में केवल तीन बार हमारी फिल्में ऑस्कर के अंतिम पांच दावेदारों में जगह बना सकी! मदर इंडिया (1957), सलाम बॉम्बे (1988) और लगान (2001) ही वे भाग्यशाली फ़िल्में रही, जो अंतिम पांच तक पहुंची पर जीत नहीं सकी। आजतक किसी भारतीय फिल्म ने ऑस्कर नहीं जीता! केवल 'गांधी' (1982) और ‘स्लमडॉग मिलिनेयर’ (2008) जैसी दो विदेशी फिल्मों के लिए भानु अथैया, गुलजार, एआर रहमान और रसूल पुकुट्टी जैसे लोगों को अलग-अलग विधाओं में ऑस्कर से नवाजा जरूर गया। इसके अलावा सत्यजीत रे को 1992 में ऑस्कर का 'लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड' दिया गया। लेकिन, जो सम्मान किसी भारतीय फिल्म को मिलना चाहिए, उससे अभी भारतीय फिल्मकार अछूते हैं।
    ऑस्कर में भारत की सबसे सशक्त दावेदारी आशुतोष गोवारिकर की 'लगान' की रही। उस साल ये फिल्म ऑस्कर जीतते-जीतते रह गई। कोई भारतीय फिल्म इस कैटेगरी में अवार्ड नहीं जीत पाया! इसके पीछे क्या हमारी चयन प्रक्रिया में खोट है! क्या किसी खास मूड की फिल्म का ही चयन किया जाता रहा है! यदि ऐसा नहीं है, तो क्या फिर फिल्म के चयन में कोई पक्षपात किया जाता है! इन सवालों का जवाब शायद किसी के पास नहीं मिलेगा! 'लगान' से पहले 'मदर इंडिया' और 'सलाम बॉम्बे' का चयन भी इसी कैटेगरी के लिए हुआ था। लेकिन, एनवक्त पर ये फ़िल्में बाहर हो गई! भारत की तरफ से भेजी गई पहली फिल्म 'मदर इंडिया' को नामांकन मिला। यह फिल्म विधवा औरत की मुसीबत, गरीबी में अपने दो बच्चों का पालन करने वाली पीड़ित भारतीय नारी की परिभाषा तय करती हैं। अपनी बेहतरीन अदाकारी से नरगिस ने राधा की इस भूमिका में जान डाल दी थी। अपनी अदाकारी के लिए नरगिस को तब 'कार्लोवी वेरी इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल' में भी 'बेस्ट एक्ट्रेस' का अवॉर्ड मिला था। लेकिन, यह फ़िल्म 'ऑस्कर' से वंचित रही।  
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