-हेमंत पाल
लंबे असमंजस और उहा-पोह के बाद काँग्रेस हाईकमान ने मध्यप्रदेश में अपनी कमान थामने के लिए नए नेता का चुनाव कर लिया। आदिवासी नेता कांतिलाल भूरिया के नाम पर पार्टी ने एक बड़ा दाँव खेला है। बड़ा दाँव इसलिए कि भूरिया को मंत्री पद से हटाकर ढेर सारी उम्मीदों के साथ मध्यप्रदेश में पार्टी में संजीवनी फूँकने के लिए भेजा गया है। यह दाँव किस हद तक सफल होगा, अभी इसके कयास ही लगाए जा सकते हैं। क्योंकि, फिलहाल न तो भूरिया के सामने चुनाव की कोई चुनौती है, न सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी से दो-दो हाथ करने के लिए मैदान में उतरने जैसा कोई हालात! भूरिया के सामने विपक्ष से बड़ी चुनौती तो खुद की पार्टी ही होगी जो बुरी तरह बिखरी हुई है। गुटों में बँटी पार्टी को समेटकर एक करना और उसमें नया जोश भरना राजनीतिक रूप से आसान नहीं होता! खासकर ऐसी स्थिति में जब उपचुनाव में हार के बाद पार्टी का आत्मविश्वास डोल गया हो और उस पर मातमी साया हो!
कांतिलाल भूरिया की राजनीति की शुरूआत तो प्रदेश की राजनीति से ही हुई थी, लेकिन लंबे समय से वे केंद्र की राजनीति में हैं। लाल बत्ती वाली राजनीति की आदत वाले भूरिया के लिए नई चुनौती की राह काफी मुश्किलों भरी है। उनके सामने प्रदेश में दूसरे कार्यकाल में सरपट दौड़ रही भाजपा सरकार है, तो दूसरी तरफ उन्हें ऐसी पार्टी की लगाम दी गई है जिसमें जुता हर घोड़ा अपनी दिशा में भाग रहा है। इन सभी घोड़ों को एक राह पर आने और साथ दौड़ने के लिए राजी करना और प्रतिद्वंद्वी को मात देना बेहद कठिन काम है। ऐसे में लगाम कसने के लिए चाबुक भी चलाना पड़ेंगे और घोड़ो की मालिश भी करना होगी। प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की जो स्थिति है उसे देखकर यह बात साफ है कि कांतिलाल भूरिया को स्वयं की कांति से कांग्रेस में ओज भरना होगी और इसके लिए उन्हें ऑपरेशन भी करना पड़ेगें और मवाद लगे घावों को भी साफ करना होगा! हो सकता है कि पार्टी की सेहत को जल्द सुधारने के लिए बूस्टर इंजेक्शन भी लगाना पड़ें!
इस आदिवासी नेता के लिए एक चुनौती यह भी होगी कि वे खुद पर लगी दिग्विजय-मुहर को धोकर साफ कर दें! उनके नाम की घोषणा के साथ ही जिस तरह दिग्विजय-युग की वापसी का डंका पीटा जा रहा है, वह पार्टी की भविष्य की रणनीति के लिए घातक साबित हो सकता है। कारण यह है कि एक बड़ा वर्ग अभी भी दिग्विजय सिंह से खफा है। यदि उन्हें लगता है कि कांतिलाल भूरिया के बहाने उसी युग की वापसी हो रही है, तो वह बिदक सकता है! भूरिया के लिए अपनी पहचान वाले उस खोल से बाहर निकलना आसान तो नहीं है, पर उन्हें यह करना होगा, क्योंकि मुकाबला जीतने और लक्ष्य पाने के लिए कई बार कुछ मोह त्यागने भी पड़ते हैं।
नए मुखिया को संगठन वाली सड़क की राजनीति की आदत नहीं है। उनकी छवि भी आक्रामक और मुखर नहीं है। जबकि, आज पार्टी को मध्यप्रदेश में बतौर मुखिया ऐसे ही नेता की ज्यादा जरूरत है। यदि कांतिलाल भूरिया को अपने चयन को सही साबित करके भाजपा को मात देना है, तो उन्हें अपनी छवि के विपरीत आक्रामकता दिखाना होगी और प्रतिद्वंद्वी को उनके घर में घेरना होगा। यह इसलिए भी जरूरी है कि सुरेश पचौरी भी आक्रामकता और मुखरता दिखाने में चूक कर गए थे।
भूरिया को एक निर्धारित कार्य-योजना और रणनीतिक कुशलता के साथ काम की शुरूआत करना होगी! यह इसलिए भी जरूरी है कि दो साल बाद आने वाला समय चुनावी होंगा, जो भूरिया के चयन को सही या गलत साबित करेंगे! उन्हें सबसे बड़ा काम तो अपनी टीम को चुनने का करना होगा। इसलिए कि चुकी और थकी टीम के साथ वे ज्यादा लंबा रास्ता तय नहीं कर सकते! राजनीतिक रूप से बासी हो चुके चेहरे पार्टी में कोई जान फँूक सकेंगे, इस भरोसे को त्याग करके नई टीम चुनना होगी। ऐसे लोगों को चाँस देना होगा जिनकी छवि साफ हो और वे चुनौतियाँ झेलने के आदी हों! आज जमाना युवाओं का है और सबसे पहले कांतिलाल भूरिया को स्वयं की सोच और व्यक्तित्व में युवा जोश भरना होगा, उसके बाद ही वे विपक्ष को टक्कर देने के काबिल हो सकेंगें। इसके अलावा किसी भी राजनीतिक पार्टी का आधार संगठन होता है और भूरिया के सामने संगठन को फिर नए सिरे से खड़े करने की कवायद भी करना है। इसमें उन्हें मैेंद्र सिंह धोनी जैसा जोश और सचिन तेंडुलकर जैसा धैर्य बताना होगा।
अण्णा हजारे के आंदोलन के बाद देश की तासीर में जबरदस्त बदलाव के आसार देखे जा रहे हैं। भ्रष्टाचार के खिलाफ पूरे देश में चिंगारी सुलगने लगी है, ऐसे में कांतिलाल भूरिया के लिए राह और कांटो भरी है। उन्हें कांँग्रेस का ऐसा चेहरा समाज के सामने लाने की तैयारी करना होगी जो दागदार, चुका और थका हुआ न हो! अपने मुकाबले की पार्टी को वे तभी बचाव के लिए बाध्य कर सकते हैं, जब काँग्रेस के दाँव सही निशाने पर लगें! यदि ऐसा नहीं हुआ तो काँग्रेस को प्रदेश की राजनीति में फिर विपक्ष की कुर्सी खाली मिलेगी!
Thursday, April 14, 2011
Monday, February 7, 2011
ये है राजनीति की नई 'फैमली"
ये है राजनीति की नई 'फैमली"
(हेमंत पाल)
इंदौर। राजनीति में परिवारवाद का नया अध्याय लिखा जाना शुरू हो गया! प्रदेश के कुक्षी और सोनकच्छ विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव में भी कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों ने परिवारों को बढ़ावा दिया है। कहीं किसी नेता का बेटा मैदान में है, कहीं पति, कहीं भतीजी तो कहीं बचपन का भाई जैसा दोस्त! खास बात यह कि इनमें से कोई भी उम्मीदवार स्थानीय नहीं है।
कुक्षी से स्व. जमुनादेवी की भतीजी निशा सिंघार को कांग्रेस ने मैदान में उतारा है। वे राजनीति में नया चेहरा है, क्योंकि, 14 साल पहले उनकी शादी गुजरात में हो गई थी। जमुनादेवी के निधन के बाद उनकी राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार बनाया है। उनके सामने हैं प्रदेश सरकार की राज्यमंत्री रंजना बघेल के पति मुकामसिंह किराड़े। प्रदेश की राजनीति में उनकी पहचान मंत्री पति के रूप में है और इसी योग्यता के चलते पार्टी ने उन्हें उम्मीदवारी सौंपी है। यदि वे रंजना बघेल के पति नहीं होते, तो शायद भाजपा को उनकी राजनीतिक क्षमताओं को अहसास नहीं होता और शायद उन्हें बतौर उम्मीदवार यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी नहीं सौंपी जाती!
सोनकच्छ विधानसभा क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी ने फूलचंद वर्मा के बेटे राजेंद्र वर्मा को अपना उम्मीदवार बनाया है। फूलचंद वर्मा वरिष्ठ नेता हैं और पार्टी में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं। तय है कि उनकी राजनीति क्षमता का कुछ अंश उनके बेटे में भी होगा, यही सोचकर पार्टी ने राजेंद्र वर्मा पर दांव लगाया है। उनके सामने कांग्रेस ने अर्जुन वर्मा को उम्मीदवार बनाया है। अर्जुन वर्मा का सज्जन वर्मा से कोई सीधा रिश्ता तो नहीं है, पर ये दोनों बचपन के दोस्त हैं। लोग उन्हें सज्जन का भाई ही मानते हैं।
कुक्षी और सोनकच्छ दोनों विधानसभाओं में कांग्रेस और भाजपा ने जिन पर दांव लगाया है, उनमें अर्जुन वर्मा को छोड़कर तीनों उम्मीदवारों का न तो पहले कोई गहरा राजनीतिक अनुभव है और न समाजसेवा का कोई इतिहास उनके साथ जुड़ा है। अर्जुन वर्मा जरूर इंदौर के एमवाय अस्पताल में समाजसेवी के रूप में बरसों से सक्रिय और चर्चित है।
इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों की प्रमुख पार्टियों के चारों उम्मीदवार स्थानीय भी नहीं है। स्थानीय होने का तात्पर्य है, वहाँ का निवासी होना जहाँ चुनाव हो रहे हैं और जहाँ के मतदाता इन नेताओं को अपना प्रतिनिधि चुनेंगे! निशा सिंघार बरसों से कुक्षी से बाहर हैं, पर जमुनादेवी की भतीजी होने के नाते टिकट की दावेदार हो गईं। मुकामसिंह किराड़े झाबुआ जिले के सोंडवा के रहने वाले हैं। सोनकच्छ के दोनों उम्मीदवार राजेंद्र वर्मा और अर्जुन वर्मा इंदौर में रहते हैं।
(हेमंत पाल)
इंदौर। राजनीति में परिवारवाद का नया अध्याय लिखा जाना शुरू हो गया! प्रदेश के कुक्षी और सोनकच्छ विधानसभा क्षेत्रों के उपचुनाव में भी कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों ने परिवारों को बढ़ावा दिया है। कहीं किसी नेता का बेटा मैदान में है, कहीं पति, कहीं भतीजी तो कहीं बचपन का भाई जैसा दोस्त! खास बात यह कि इनमें से कोई भी उम्मीदवार स्थानीय नहीं है।
कुक्षी से स्व. जमुनादेवी की भतीजी निशा सिंघार को कांग्रेस ने मैदान में उतारा है। वे राजनीति में नया चेहरा है, क्योंकि, 14 साल पहले उनकी शादी गुजरात में हो गई थी। जमुनादेवी के निधन के बाद उनकी राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए पार्टी ने उन्हें उम्मीदवार बनाया है। उनके सामने हैं प्रदेश सरकार की राज्यमंत्री रंजना बघेल के पति मुकामसिंह किराड़े। प्रदेश की राजनीति में उनकी पहचान मंत्री पति के रूप में है और इसी योग्यता के चलते पार्टी ने उन्हें उम्मीदवारी सौंपी है। यदि वे रंजना बघेल के पति नहीं होते, तो शायद भाजपा को उनकी राजनीतिक क्षमताओं को अहसास नहीं होता और शायद उन्हें बतौर उम्मीदवार यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी भी नहीं सौंपी जाती!
सोनकच्छ विधानसभा क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी ने फूलचंद वर्मा के बेटे राजेंद्र वर्मा को अपना उम्मीदवार बनाया है। फूलचंद वर्मा वरिष्ठ नेता हैं और पार्टी में कई महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं। तय है कि उनकी राजनीति क्षमता का कुछ अंश उनके बेटे में भी होगा, यही सोचकर पार्टी ने राजेंद्र वर्मा पर दांव लगाया है। उनके सामने कांग्रेस ने अर्जुन वर्मा को उम्मीदवार बनाया है। अर्जुन वर्मा का सज्जन वर्मा से कोई सीधा रिश्ता तो नहीं है, पर ये दोनों बचपन के दोस्त हैं। लोग उन्हें सज्जन का भाई ही मानते हैं।
कुक्षी और सोनकच्छ दोनों विधानसभाओं में कांग्रेस और भाजपा ने जिन पर दांव लगाया है, उनमें अर्जुन वर्मा को छोड़कर तीनों उम्मीदवारों का न तो पहले कोई गहरा राजनीतिक अनुभव है और न समाजसेवा का कोई इतिहास उनके साथ जुड़ा है। अर्जुन वर्मा जरूर इंदौर के एमवाय अस्पताल में समाजसेवी के रूप में बरसों से सक्रिय और चर्चित है।
इन दोनों विधानसभा क्षेत्रों की प्रमुख पार्टियों के चारों उम्मीदवार स्थानीय भी नहीं है। स्थानीय होने का तात्पर्य है, वहाँ का निवासी होना जहाँ चुनाव हो रहे हैं और जहाँ के मतदाता इन नेताओं को अपना प्रतिनिधि चुनेंगे! निशा सिंघार बरसों से कुक्षी से बाहर हैं, पर जमुनादेवी की भतीजी होने के नाते टिकट की दावेदार हो गईं। मुकामसिंह किराड़े झाबुआ जिले के सोंडवा के रहने वाले हैं। सोनकच्छ के दोनों उम्मीदवार राजेंद्र वर्मा और अर्जुन वर्मा इंदौर में रहते हैं।
Monday, December 13, 2010
एक थी उमा भारती!
भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में उमा भारती होने के अलग मायने हैं। उन्हें सिर्फ एक हिंदुवादी नेता, अक्खड़ या मध्यप्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री कहकर बात पूरी नहीं की जा सकती! पाँच साल पहले जब वे अचानक मध्यप्रदेश के मुखिया की कुर्सी से बेदखल की गई (या हो गई) थी, तब यह मान लिया गया था कि इसके साथ ही उनकी राजनीति का अध्याय भी समाप्त हो गया! इसके बाद उन्होने मीडिया के सामने लालकृष्ण आडवानी को खरी-खरी सुनाकर अपने इरादों का अहसास करा दिया था। कुछ ने उनके इस अक्खड़ और फक्कड अंदाज पर पीठ थमथपाई थी, तो किसी ने इसे राजनीतिक उच्छृंखलता कहा था। इसके बाद वे पार्टी से निकल गई और असंंतुष्ट भाजपाईयों का एक अलग कुनबा खड़ा करने की कोशिश की। नई पार्टी बनाने के उमा भारती के फैसले की अलग-अलग तरीके से चीरफाड़ की गई। कोई उनका कितना भी विरोधी रहा हो, पर सभी का कहना था कि इस महिला में फिनिक्स होने का माद्दा है। फिनिक्स यानी कि वह पक्षी जिसके बारे में मान्यता है कि वह अपनी ही राख से फिर जीवित हो जाता है। लेकिन, उमा भारती के बारे में यह भ्रम ही निकला! क्योंकि, भगवा धारण करके भी उनके अंदर कहीं न कहीं राजनीतिक लोभ जीवित था। ये लोभ मुख्यमंत्री बनने के बाद आया या उससे पहले से था, यह कहना मुश्किल है। क्योंकि, उनकी राजनीतिक कार्यशैली को नजदीक से देखने और समझने वालों का निष्कर्ष था कि उनमें राजनीतिक महत्वाकांक्षा किसी पदलोभी नेता से कम नहीं है।
भाजपा को नेस्तनाबूद करने के उनके संकल्प ने कई को प्रभावित किया। बहुत से लोग उनके साथ यह सोचकर आ गए कि इस महिला में संघर्ष करने की जिजीविषा है, जो राजनीति के शिखर तक पहुँचेगी। चुनाव में उनकी पार्टी मुकाबले की खातिर मैदान में भी उतरी, पर भाजपा के सामने कहीं टिक नहीं सकी। उनके सारे वजीर राजनीति की शतरंज की बिसात पर प्यादे ही साबित हुए! उनके मोहरे हारकर भी भाजपा के लिए भस्मासुर नहीं बन सके। इस पर भी उमा भारती का राजनीति गुरूर कम नहीं हुआ। उनकी टीम भी किसी चमत्कार की उम्मीद में डटी रही, लेकिन राजनीति का उसूल है कि यहाँ झंडा थामने वाले तब तक ही साथ देते हैं, जब नेता में जोश मौजूद हो! धीरे-धीरे दहाड़ने वाली उमा भारती ठंडी पड़ने लगी। इतने पर भी वे यह कहने से नहीं चूकती थीं कि मैं पार्टी में वापस नहीं लौटूँगी! किंतु, जब किसी व्यक्ति में राजनीतिक महत्वाकांक्षा जाग जाती है तो उसके दावे और वादे भी झूठे पड़ने लगते हैं। वही सब उमा भारती ने भी किया। भाजपा और लालकृष्ण आडवाणी को कोसने वाली यह नेता अब फिर उसी भाजपा में लौटने को राजी हो गई, जिसे वे छोड़कर गईं थी!
इसके लिए शायद उमा भारती को दोष देना ठीक नहीं होगा। क्योंकि, राजनीति में इस तरह के स्वांग करना और मौकापरस्त होना स्वाभाविक है। बार-बार बयान बदलना पहले भी इस नेता की आदत रही है, और अब भी है। जो उमा भारती कभी भाजपा में लौटना नहीं चाहती थीं, वे आने को राजी हो गई! जो सालभर का अवकाश लेकर चिंतन करना चाहती थी, वह मायावती को चुनौती देने के लिए कमर कसकर खड़ी है! लेकिन, उन लोगों का क्या दोष जो कभी भरोसा करके उनके साथ चल पड़े थे, वे अब कहाँ है? पार्टी ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए उमा भारती के लिए तो दरवाजे खोल दिए, पर वे बचे-खुचे कार्यकर्ता कहाँ जाएंगे जो 'किसी अच्छे" की उम्मीद में उनके पीछे चल रहे थे? दरअसल, यही राजनीति है! कोई सवाल करे कि राजनीति कैसी होती है, तो जवाब दिया जा सकता है कि उमा भारती जैसी होती है!
भाजपा को नेस्तनाबूद करने के उनके संकल्प ने कई को प्रभावित किया। बहुत से लोग उनके साथ यह सोचकर आ गए कि इस महिला में संघर्ष करने की जिजीविषा है, जो राजनीति के शिखर तक पहुँचेगी। चुनाव में उनकी पार्टी मुकाबले की खातिर मैदान में भी उतरी, पर भाजपा के सामने कहीं टिक नहीं सकी। उनके सारे वजीर राजनीति की शतरंज की बिसात पर प्यादे ही साबित हुए! उनके मोहरे हारकर भी भाजपा के लिए भस्मासुर नहीं बन सके। इस पर भी उमा भारती का राजनीति गुरूर कम नहीं हुआ। उनकी टीम भी किसी चमत्कार की उम्मीद में डटी रही, लेकिन राजनीति का उसूल है कि यहाँ झंडा थामने वाले तब तक ही साथ देते हैं, जब नेता में जोश मौजूद हो! धीरे-धीरे दहाड़ने वाली उमा भारती ठंडी पड़ने लगी। इतने पर भी वे यह कहने से नहीं चूकती थीं कि मैं पार्टी में वापस नहीं लौटूँगी! किंतु, जब किसी व्यक्ति में राजनीतिक महत्वाकांक्षा जाग जाती है तो उसके दावे और वादे भी झूठे पड़ने लगते हैं। वही सब उमा भारती ने भी किया। भाजपा और लालकृष्ण आडवाणी को कोसने वाली यह नेता अब फिर उसी भाजपा में लौटने को राजी हो गई, जिसे वे छोड़कर गईं थी!
इसके लिए शायद उमा भारती को दोष देना ठीक नहीं होगा। क्योंकि, राजनीति में इस तरह के स्वांग करना और मौकापरस्त होना स्वाभाविक है। बार-बार बयान बदलना पहले भी इस नेता की आदत रही है, और अब भी है। जो उमा भारती कभी भाजपा में लौटना नहीं चाहती थीं, वे आने को राजी हो गई! जो सालभर का अवकाश लेकर चिंतन करना चाहती थी, वह मायावती को चुनौती देने के लिए कमर कसकर खड़ी है! लेकिन, उन लोगों का क्या दोष जो कभी भरोसा करके उनके साथ चल पड़े थे, वे अब कहाँ है? पार्टी ने अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए उमा भारती के लिए तो दरवाजे खोल दिए, पर वे बचे-खुचे कार्यकर्ता कहाँ जाएंगे जो 'किसी अच्छे" की उम्मीद में उनके पीछे चल रहे थे? दरअसल, यही राजनीति है! कोई सवाल करे कि राजनीति कैसी होती है, तो जवाब दिया जा सकता है कि उमा भारती जैसी होती है!
Friday, October 8, 2010
जमुना देवी के बाद राजनीति की 'धार"
आदिवासी के पास ही रहेगी, राजनीतिक विरासत
मध्यप्रदेश में जो जिले राजनीतिक रूप से जागरूक माने जाते हैं, उनमें एक धार जिला भी है। जिले की राजनीति को बेहद मुखर माना जाता रहा है। काँग्रेस की नेता जमुना देवी धार की इसी मुखरता की प्रतीक थी। आदिवासी महिला होते हुए भी उनकी आवाज में खनक थी और स्वभाव में दबंगता! यह इस बात का भी प्रतीक था कि इस आदिवासी बहुलता वाले इस इलाके में राजनीतिक जागरूकता कितनी प्रभावशाली है। इस महिला नेत्री की इतनी धाक थी कि कई बार न चाहते हुए भी पार्टी को उनकी बात का सम्मान करना पड़ता था। अब, जबकि वे सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर धार और यहाँ की धारदार राजनीति को छोड़कर जा चुकी हैं, अपने पीछे कई ऐसे सवाल छोड़ गईं, जो जवाब की कोशिश में नए सवालों को जन्म देंगे!
जमुनादेवी ने लंबे समय से धार जिले की राजनीति पर अपना प्रभाव बनाए रखा था। वे अपनी पहुँच और प्रभाव के दम पर सरकार और प्रशासन से वह सब करवा लेने में सक्षम थीं, जो वे चाहती थी। उनके कई फैसलों पर अंगुलियां भी उठी, पर पार्टी हाईकमान को उनकी वरिष्ठता के आगे झुकना पड़ा। लेकिन, उनके निधन के बाद धार जिले की राजनीति में बड़ा बदलाव आने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। कारण यह भी है कि जमुना देवी ने अपनी छत्र छाया में किसी को उभरने का मौका नहीं दिया। ऐसी स्थिति में जमुना देवी के अलावा जो नेता धार की राजनीति में उभरे वे कहीं न कहीं विरोध की राजनीति करके ही ऊपर तक पहुँँचे। ऐसे में एक नया गुट सामने आया जिसने अपना रास्ता जमुना देवी से अलग बनाया। ऐसे मौके भी आए जब जमुना देवी से अलग हटकर राजनीति की धारा बहाने वाले काँग्रेस नेता उनके विरोध के बावजूद आगे निकले और पार्टी का झंडा गाड़ा।
1985 के बाद जब भी प्रदेश में चुनाव हुए, धार जिले की काँग्रेस राजनीति में जमकर उठापटक का दौर चला! इसी का नतीजा था कि जिले के काँग्रेस उम्मीदवारों का फैसला नामांकन पत्र भरने के अंतिम समय में ही होता रहा! जमुना देवी की हमेशा ही यह मंशा रही कि धार जिले की राजनीति की लगाम उनके हाथ में हो! वे कुछ हद तक अपनी इन कोशिशों में सफल भी रही, पर वे जिले की राजनीति को जिस तरह काबू में करना चाहती थी वैसा हो नहीं सका! कुक्षी में उनका दबदबा तब ही बन पाया, जब काँग्रेस के नेता और पूर्व मंत्री प्रतापसिंह बघेल अपनी गलतियों के कारण काँग्रेस की राजनीति में हाशिए पर आ गए। इसके बाद कुक्षी विधानसभा का नेतृत्व उनके पास जरूर आया, पर वे पार्टी के अंदर और बाहर अपने विरोधियों की संख्या कम नहीं कर सकीं। इस बीच भाजपा की नेता रंजना बघेल के हाथों हुई उनकी हार काफी भारी पड़ी।
धार जिले में विधानसभा की 7 सीटें हैं। इनमें पाँच सीटों पर काँग्रेस काबिज है, कुक्षी सीट जमुना देवी के निधन से रिक्त हो गई। जबकि, धरमपुरी से पांचीलाल मेडा, सरदारपुर से प्रताप ग्रेवाल, बदनावर से राजवर्धनसिंह दत्तीगाँव और गंधवानी से उमंग सिंघार काँग्रेस के विधायक हैं। इनमें पांचीलाल मेडा और प्रताप ग्रेवाल को सासंद गजेंद्रसिंह राजूखेड़ी के साथ माना जाता है और दत्तीगाँव हमेशा से ही सिंधिया गुट में रहे हैं। सिर्फ जुमना देवी के भतीजे उमंग सिंघार ही अकेले विधायक हैं जो उनके साथ रहे। धार जिले की राजनीति के पन्नो पलटे जाएं तो पुराने काँग्रेसी नेता और पूर्व सांसद सुरेंद्रसिंह नीमखेड़ा और मुजीब कुरैशी से जमुना देवी की कभी नहीं पटी। यही कारण था नीमखेड़ा-मुजीब गुट का हमेशा ही जमुना देवी से राजनीतिक मतभेद बना रहा। सांसद गजेंद्रसिंह राजूखेड़ी और धार विधानसभा से एक वोट से हारकर प्रभावशाली नेता बनकर उभरे बालमुकुंद गौतम भी इन्ही दोनों नेताओं के साथ हैं। राजनीति की शह-मात के खेल में जमुना देवी और उनके प्रतिद्वंदी गुट में हमेशा ही ठनती रही है। एक खास बात यह भी है कि काँग्रेस के जो नेता नीमखेड़ा-मुजीब गुट के विरोधी हैं, वे मौका पड़ने पर जमुना देवी के साथ खड़े जरूर हो जाते थे, लेकिन कभी उनके हितैषी नहीं रहे। अब, जबकि जमुना देवी परिदृश्य में नहीं है धार जिले में काँग्रेस का एक धड़ा पूरी तरह बिखर जाएगा। इसलिए कि वे अकेली ऐसी दबंग नेता थी जिसकी वरिष्ठता के सामने पार्टी के कई बड़े नेताओं और यहाँ तक कि हाईकमान तक को झुकना पड़ता था।
लंबे राजनीतिक अनुभव के बावजूद उनका पूरे इलाके में एक छत्र प्रभाव रहा हो, यह नहीं कहा जा सकता। इसका सबसे बड़ा कारण यह माना जाता है कि अपने भतीजे उमंग सिंघार को अपनी राजनीतिक विरासत सौंपने की उनकी कोशिश इस हद तक गईं कि उनसे कई नेता नाराज हो गए थे। 2004 के लोकसभा चुनाव में सांसद गजेंद्रसिंह राजूखेड़ी का टिकट काटकर उमंग को काँग्रेस का उम्मीदवार बनवाने में उन्होंने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। अपने प्रभाव से वे टिकट दिलाने में तो कामयाब रहीं, पर काँग्रेस को चुनाव नहीं जिता सकीं! पिछले विधानसभा चुनाव में टिकटों के बँटवारे में भी वे उमंग के टिकट को लेकर अड़ी रहीं और अंतत: गंधवानी से टिकट दिलाकर जिता भी लाईं। लेकिन, इसे दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि इतनी कोशिशों के बाद भी उमंग सिंघार उनका राजनीतिक वारिस बनने में सफल नहीं हुए। जमुना देवी का अंतिम संस्कार कुक्षी के बजाए इंदौर में किया जाना और मुखाग्नि भी उनकी बेटी द्वारा दिए जाने को इस बात का संकेत माना जाना चाहिए कि उमंग उनकी राजनीतिक विरासत का हकदार नहीं है।
जमुना देवी के बाद अब धार जिले की राजनीति में नई धारा का बहना तय है। उस कद-काठी का अब कोई और नेता धार में नहीं है जिसका फायदा निश्चित रूप से सांसद गजेंद्रसिंह राजूखेड़ी को मिलेगा। लोकसभा में तीसरी बार धार क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे राजूखेड़ी का दायित्व बढ़ने का आशय है कि जिले में काँग्रेस की राजनीति की कमान पहले भी आदिवासी नेता के हाथ में थी, अब भी आदिवासी नेता के ही हाथ में है।
मध्यप्रदेश में जो जिले राजनीतिक रूप से जागरूक माने जाते हैं, उनमें एक धार जिला भी है। जिले की राजनीति को बेहद मुखर माना जाता रहा है। काँग्रेस की नेता जमुना देवी धार की इसी मुखरता की प्रतीक थी। आदिवासी महिला होते हुए भी उनकी आवाज में खनक थी और स्वभाव में दबंगता! यह इस बात का भी प्रतीक था कि इस आदिवासी बहुलता वाले इस इलाके में राजनीतिक जागरूकता कितनी प्रभावशाली है। इस महिला नेत्री की इतनी धाक थी कि कई बार न चाहते हुए भी पार्टी को उनकी बात का सम्मान करना पड़ता था। अब, जबकि वे सांसारिक बंधनों से मुक्त होकर धार और यहाँ की धारदार राजनीति को छोड़कर जा चुकी हैं, अपने पीछे कई ऐसे सवाल छोड़ गईं, जो जवाब की कोशिश में नए सवालों को जन्म देंगे!
जमुनादेवी ने लंबे समय से धार जिले की राजनीति पर अपना प्रभाव बनाए रखा था। वे अपनी पहुँच और प्रभाव के दम पर सरकार और प्रशासन से वह सब करवा लेने में सक्षम थीं, जो वे चाहती थी। उनके कई फैसलों पर अंगुलियां भी उठी, पर पार्टी हाईकमान को उनकी वरिष्ठता के आगे झुकना पड़ा। लेकिन, उनके निधन के बाद धार जिले की राजनीति में बड़ा बदलाव आने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। कारण यह भी है कि जमुना देवी ने अपनी छत्र छाया में किसी को उभरने का मौका नहीं दिया। ऐसी स्थिति में जमुना देवी के अलावा जो नेता धार की राजनीति में उभरे वे कहीं न कहीं विरोध की राजनीति करके ही ऊपर तक पहुँँचे। ऐसे में एक नया गुट सामने आया जिसने अपना रास्ता जमुना देवी से अलग बनाया। ऐसे मौके भी आए जब जमुना देवी से अलग हटकर राजनीति की धारा बहाने वाले काँग्रेस नेता उनके विरोध के बावजूद आगे निकले और पार्टी का झंडा गाड़ा।
1985 के बाद जब भी प्रदेश में चुनाव हुए, धार जिले की काँग्रेस राजनीति में जमकर उठापटक का दौर चला! इसी का नतीजा था कि जिले के काँग्रेस उम्मीदवारों का फैसला नामांकन पत्र भरने के अंतिम समय में ही होता रहा! जमुना देवी की हमेशा ही यह मंशा रही कि धार जिले की राजनीति की लगाम उनके हाथ में हो! वे कुछ हद तक अपनी इन कोशिशों में सफल भी रही, पर वे जिले की राजनीति को जिस तरह काबू में करना चाहती थी वैसा हो नहीं सका! कुक्षी में उनका दबदबा तब ही बन पाया, जब काँग्रेस के नेता और पूर्व मंत्री प्रतापसिंह बघेल अपनी गलतियों के कारण काँग्रेस की राजनीति में हाशिए पर आ गए। इसके बाद कुक्षी विधानसभा का नेतृत्व उनके पास जरूर आया, पर वे पार्टी के अंदर और बाहर अपने विरोधियों की संख्या कम नहीं कर सकीं। इस बीच भाजपा की नेता रंजना बघेल के हाथों हुई उनकी हार काफी भारी पड़ी।
धार जिले में विधानसभा की 7 सीटें हैं। इनमें पाँच सीटों पर काँग्रेस काबिज है, कुक्षी सीट जमुना देवी के निधन से रिक्त हो गई। जबकि, धरमपुरी से पांचीलाल मेडा, सरदारपुर से प्रताप ग्रेवाल, बदनावर से राजवर्धनसिंह दत्तीगाँव और गंधवानी से उमंग सिंघार काँग्रेस के विधायक हैं। इनमें पांचीलाल मेडा और प्रताप ग्रेवाल को सासंद गजेंद्रसिंह राजूखेड़ी के साथ माना जाता है और दत्तीगाँव हमेशा से ही सिंधिया गुट में रहे हैं। सिर्फ जुमना देवी के भतीजे उमंग सिंघार ही अकेले विधायक हैं जो उनके साथ रहे। धार जिले की राजनीति के पन्नो पलटे जाएं तो पुराने काँग्रेसी नेता और पूर्व सांसद सुरेंद्रसिंह नीमखेड़ा और मुजीब कुरैशी से जमुना देवी की कभी नहीं पटी। यही कारण था नीमखेड़ा-मुजीब गुट का हमेशा ही जमुना देवी से राजनीतिक मतभेद बना रहा। सांसद गजेंद्रसिंह राजूखेड़ी और धार विधानसभा से एक वोट से हारकर प्रभावशाली नेता बनकर उभरे बालमुकुंद गौतम भी इन्ही दोनों नेताओं के साथ हैं। राजनीति की शह-मात के खेल में जमुना देवी और उनके प्रतिद्वंदी गुट में हमेशा ही ठनती रही है। एक खास बात यह भी है कि काँग्रेस के जो नेता नीमखेड़ा-मुजीब गुट के विरोधी हैं, वे मौका पड़ने पर जमुना देवी के साथ खड़े जरूर हो जाते थे, लेकिन कभी उनके हितैषी नहीं रहे। अब, जबकि जमुना देवी परिदृश्य में नहीं है धार जिले में काँग्रेस का एक धड़ा पूरी तरह बिखर जाएगा। इसलिए कि वे अकेली ऐसी दबंग नेता थी जिसकी वरिष्ठता के सामने पार्टी के कई बड़े नेताओं और यहाँ तक कि हाईकमान तक को झुकना पड़ता था।
लंबे राजनीतिक अनुभव के बावजूद उनका पूरे इलाके में एक छत्र प्रभाव रहा हो, यह नहीं कहा जा सकता। इसका सबसे बड़ा कारण यह माना जाता है कि अपने भतीजे उमंग सिंघार को अपनी राजनीतिक विरासत सौंपने की उनकी कोशिश इस हद तक गईं कि उनसे कई नेता नाराज हो गए थे। 2004 के लोकसभा चुनाव में सांसद गजेंद्रसिंह राजूखेड़ी का टिकट काटकर उमंग को काँग्रेस का उम्मीदवार बनवाने में उन्होंने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था। अपने प्रभाव से वे टिकट दिलाने में तो कामयाब रहीं, पर काँग्रेस को चुनाव नहीं जिता सकीं! पिछले विधानसभा चुनाव में टिकटों के बँटवारे में भी वे उमंग के टिकट को लेकर अड़ी रहीं और अंतत: गंधवानी से टिकट दिलाकर जिता भी लाईं। लेकिन, इसे दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि इतनी कोशिशों के बाद भी उमंग सिंघार उनका राजनीतिक वारिस बनने में सफल नहीं हुए। जमुना देवी का अंतिम संस्कार कुक्षी के बजाए इंदौर में किया जाना और मुखाग्नि भी उनकी बेटी द्वारा दिए जाने को इस बात का संकेत माना जाना चाहिए कि उमंग उनकी राजनीतिक विरासत का हकदार नहीं है।
जमुना देवी के बाद अब धार जिले की राजनीति में नई धारा का बहना तय है। उस कद-काठी का अब कोई और नेता धार में नहीं है जिसका फायदा निश्चित रूप से सांसद गजेंद्रसिंह राजूखेड़ी को मिलेगा। लोकसभा में तीसरी बार धार क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे राजूखेड़ी का दायित्व बढ़ने का आशय है कि जिले में काँग्रेस की राजनीति की कमान पहले भी आदिवासी नेता के हाथ में थी, अब भी आदिवासी नेता के ही हाथ में है।
Monday, August 9, 2010
ये 'दोस्ती" और लांछन के छींटे!
राजनीति में दोस्ती के मायने कुछ अलग होते हैं। यह 'शोले" के वीरू और जय की तरह नहीं होती कि छोडेंगे दम मगर तेरा साथ ना छोड़ेंगे। राजनीति की दोस्ती स्वार्थ के पेंच के साथ कसी रहती है। जब भी स्वार्थ की डोर ढीली पड़ती है तो दोस्ती के पेंच ढीले हो जाते हैं और एक दिन गांठ भी खुल जाती है। याद कीजिए मुलायम सिंह और अमर सिंह की दोस्ती! इनकी कसमें खाई जाती थी। दोनों की तरफ से यह दावा किया जाता था कि हमारी दोस्ती किसी स्वार्थ की मोहताज नहीं है। अमर सिंह कहते थे कि मैं लक्ष्मण हूँ और मुलायम सिंह राम हैं। कई बार ऐसे प्रसंग आए जब लोगों ने दोस्ती की राह में काली बिल्ली को दौड़ाकर रास्ता काटने की कोशिश की, पर बात नहीं बनी। लेकिन, यह दांत काटी दोस्ती पल भर में दरक गई और ऐसी दरकी कि दोनों दो किनारों की तरह अलग हो गए। धीरे-धीरे हालात यह बन गए कि दोनों एक-दूसरे का मरना मनाने लगे। अब हालात यह है कि अमर सिंह खम ठोंककर मुलायम सिंह के सामने खड़े हो गए।
ऐसी ही दोस्ती मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी में कद्दावर नेता और मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और विधायक रमेश मैंदौला के बीच भी मानी जाती है। इंदौर के विधानसभा क्षेत्र नंबर 2 के एकछत्र नेता रहे कैलाश के राजनीतिक कद के पीछे रमेश की मेहनत मानी जाती है। नजदीक से जानने वाले इस बात को सही भी मानते हैं कि कैलाश की सफलता के पीछे रमेश ही है, और कोई नहीं! बात सही भी होगी और इस पर शक भी नहीं किया जा सकता। लेकिन, दोस्ती का पैमाना सिर्फ सफलता को माना जाए, ऐसा नहीं है। असफलता और रास्ते में आई अड़चनों का कारण भी कई बार यही दोस्ती बनती है। आज कैलाश विजयवर्गीय पर आए नए संकट का कारण भी रमेश मैंदोला को माना जा रहा है। लोग मानते हैं कि एक कॉलेज की लीज की जमीन को किसी कंपनी को उसके व्यावसायिक हित के लिए लीज पर देने के फैसले के पीछे यदि कैलाश पर संदेह की सुई घूमी है तो इसका कारण उनका दोस्त रमेश के अलावा और कोई नहीं है!
यह फैसला उस दौर का है जब कैलाश विजयवर्गीय मंत्री होने के साथ-साथ इंदौर के मैयर भी हुआ करते थे और रमेश महज पार्षद थे। पार्षद होने के नाते 'मैयर इन काउंसिल" में शामिल किए गए थे। रमेश के फैसले को कैलाश ने शह दी और बात सरकार के पाले तक पहुँची और फिर राजनीतिक विरोधियों ने इसका भंडाफोड़ करके उसे हवा दे दी! इसके बाद अखबारों के पन्नो रंगे गए और कई तरह के लांछन लगे। सबका सुर ही था कि कैलाश को भ्रमित करके रमेश ने यह व्यावसायिक लेनदेन किया है। लेकिन, कैलाश ने हमेशा ही इस बात को गलत बताया और दोस्ती निभाई। यही दोस्ती वे आज भी निभा रहें। यह शक जताने वाले भी कम नहीं है कि आखिर इस दोस्ती का आधार क्या है? क्या महज राजनीतिक फायदे-नुकसान की खातिर ही यह साथ पनपा है या कहानी कुछ और है! कारण चाहे जो भी हो अब इस दोस्ती की परते उघड़ने लगी है।
कभी विद्युत मंडल की नौकरी करने वाले रमेश मैंदोला ने 80 के दशक में नौकरी छोड़कर राजनीति की राह पर उतरने का फैसला किया था। पहले पार्षद और पहली बार विधायक बने रमेश को उम्मीद नहीं थी कि राजनीति की पहली सीढ़ी पर ही उनका पैर फिसल जाएगा। अगले विधानसभा चुनाव में यदि उन्होंने पार्टी के सामने टिकट का दावा किया तो तय है कि उन्हें शक के दायरे में देखा जाएगा!
अभी तक देखा गया है कि जब भी कैलाश विजयवर्गीय पर उनके किसी राजनीतिक विरोधी ने हमला किया है तो पहला निशाना रमेश मैंदोला को बनाया गया। क्योंकि, माना जाता है कि कैलाश के हर फैसले में रमेश का हाथ होता है, रमेश वही करते हैं जो कैलाश चाहते हैं। दरअसल, यह दोस्ती का मामला कम राजनीतिक फायदे और नुकसान का ज्यादा समझा जाता है। कैलाश विजयवर्गीय पर जब गरीबों की पेंशन में घोटाला करने का लांछन लगा तो तो उसमें रमेश को सहयोगी माना गया। अब कॉलेज की जमीन की कथित अफरातफरी का विवाद सामने आया तो कहा जा रहा है कि बगैर मंत्री की मर्जी के उनका प्यादा इतना बड़ा खेल कर दे, यह कैसे संभव है? बात सही भी है और इसमें दम भी है। आखिर दोस्ती जब इतनी पक्की है तो कैसे मान लें, कि बाँय हाथ की कारगुजारी की खबर दाँय हाथ को नहीं थी। यदि वास्तव में ऐसा हुआ है तो इसे दोस्ती नहीं माना जा सकता, यह एक समझौता है जिसमें राजनीति के हंसिये से चांदी काटकर माल का बंटवारा करने का धंधा चलाया जा रहा है। कम से कम लोग जिन्हे राजनीतिक नजरिए से वोटर कहा जाता है, वे तो यही मान रहे हैं!
ऐसी ही दोस्ती मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी में कद्दावर नेता और मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और विधायक रमेश मैंदौला के बीच भी मानी जाती है। इंदौर के विधानसभा क्षेत्र नंबर 2 के एकछत्र नेता रहे कैलाश के राजनीतिक कद के पीछे रमेश की मेहनत मानी जाती है। नजदीक से जानने वाले इस बात को सही भी मानते हैं कि कैलाश की सफलता के पीछे रमेश ही है, और कोई नहीं! बात सही भी होगी और इस पर शक भी नहीं किया जा सकता। लेकिन, दोस्ती का पैमाना सिर्फ सफलता को माना जाए, ऐसा नहीं है। असफलता और रास्ते में आई अड़चनों का कारण भी कई बार यही दोस्ती बनती है। आज कैलाश विजयवर्गीय पर आए नए संकट का कारण भी रमेश मैंदोला को माना जा रहा है। लोग मानते हैं कि एक कॉलेज की लीज की जमीन को किसी कंपनी को उसके व्यावसायिक हित के लिए लीज पर देने के फैसले के पीछे यदि कैलाश पर संदेह की सुई घूमी है तो इसका कारण उनका दोस्त रमेश के अलावा और कोई नहीं है!
यह फैसला उस दौर का है जब कैलाश विजयवर्गीय मंत्री होने के साथ-साथ इंदौर के मैयर भी हुआ करते थे और रमेश महज पार्षद थे। पार्षद होने के नाते 'मैयर इन काउंसिल" में शामिल किए गए थे। रमेश के फैसले को कैलाश ने शह दी और बात सरकार के पाले तक पहुँची और फिर राजनीतिक विरोधियों ने इसका भंडाफोड़ करके उसे हवा दे दी! इसके बाद अखबारों के पन्नो रंगे गए और कई तरह के लांछन लगे। सबका सुर ही था कि कैलाश को भ्रमित करके रमेश ने यह व्यावसायिक लेनदेन किया है। लेकिन, कैलाश ने हमेशा ही इस बात को गलत बताया और दोस्ती निभाई। यही दोस्ती वे आज भी निभा रहें। यह शक जताने वाले भी कम नहीं है कि आखिर इस दोस्ती का आधार क्या है? क्या महज राजनीतिक फायदे-नुकसान की खातिर ही यह साथ पनपा है या कहानी कुछ और है! कारण चाहे जो भी हो अब इस दोस्ती की परते उघड़ने लगी है।
कभी विद्युत मंडल की नौकरी करने वाले रमेश मैंदोला ने 80 के दशक में नौकरी छोड़कर राजनीति की राह पर उतरने का फैसला किया था। पहले पार्षद और पहली बार विधायक बने रमेश को उम्मीद नहीं थी कि राजनीति की पहली सीढ़ी पर ही उनका पैर फिसल जाएगा। अगले विधानसभा चुनाव में यदि उन्होंने पार्टी के सामने टिकट का दावा किया तो तय है कि उन्हें शक के दायरे में देखा जाएगा!
अभी तक देखा गया है कि जब भी कैलाश विजयवर्गीय पर उनके किसी राजनीतिक विरोधी ने हमला किया है तो पहला निशाना रमेश मैंदोला को बनाया गया। क्योंकि, माना जाता है कि कैलाश के हर फैसले में रमेश का हाथ होता है, रमेश वही करते हैं जो कैलाश चाहते हैं। दरअसल, यह दोस्ती का मामला कम राजनीतिक फायदे और नुकसान का ज्यादा समझा जाता है। कैलाश विजयवर्गीय पर जब गरीबों की पेंशन में घोटाला करने का लांछन लगा तो तो उसमें रमेश को सहयोगी माना गया। अब कॉलेज की जमीन की कथित अफरातफरी का विवाद सामने आया तो कहा जा रहा है कि बगैर मंत्री की मर्जी के उनका प्यादा इतना बड़ा खेल कर दे, यह कैसे संभव है? बात सही भी है और इसमें दम भी है। आखिर दोस्ती जब इतनी पक्की है तो कैसे मान लें, कि बाँय हाथ की कारगुजारी की खबर दाँय हाथ को नहीं थी। यदि वास्तव में ऐसा हुआ है तो इसे दोस्ती नहीं माना जा सकता, यह एक समझौता है जिसमें राजनीति के हंसिये से चांदी काटकर माल का बंटवारा करने का धंधा चलाया जा रहा है। कम से कम लोग जिन्हे राजनीतिक नजरिए से वोटर कहा जाता है, वे तो यही मान रहे हैं!
Monday, July 26, 2010
कौन खौफ खा रहा है उमा भारती से?
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के रूप में शिवराजसिंह चौहान चैन की जितनी बंसी बजा रहे हैं, इतनी निश्चिंतता का माहौल शायद किसी मुख्यमंत्री को नहीं मिला। उन्हें न तो कहीं से शह मिल रही है, न किसी से मात खोने का ही खतरा है। शतरंज की बिसात पर जितने भी मोहरे दिख रहे हैं, सब के सब शिवराज के पाले के हैं। आसपास भी कोई ऐसा मठाधीश नजर नहीं आ रहा जो उनकी कुर्सी की तरफ तिरछी नजर रखता हो! गाहे-बगाहे जो इस कुर्सी तक पहुंचने की मंशा रखते थे, वे अभी अपने अस्तित्व बचाने की कोशिश में लगे हैं। राजनीति में इतना चैन अमूमन कम ही दिखाई देता है। लेकिन, शिवराज को कहीं न कहीं जो एक मात्र खतरा दूर नजर आता है तो वह है उमा भारती। पार्टी हाईकमान के उमा भारती को फिर भाजपा में लाने के फैसले से शिवराज बेचैन हैं। इसलिए कि वे जानते हैं कि उमा का भाजपा में आना महज एक नेता की घर वापसी नहीं, बल्कि प्रदेश में राजनीतिक अस्थिरता का नया संकेत होगी।
राजनीति पर पैनी नजर रखने वालों को पता है कि उमा भारती की राजनीतिक शैली क्या है? वे कैसे अपने समर्थकों की टोली खड़ी करती हैं और प्रदेश की राजनीति में उनका दखल किस हद तक जा सकता है। अभी शिवराजसिंह का कोई विरोधी नहीं है, बात यह नहीं! परदे के पीछे उनकी मुखालिफत करने वाले कई हैं पर, विरोध करने वाले मुखर नहीं हो पाते। क्योंकि, उनके पास कोई राजनीतिक शरणस्थल नहीं है। यदि उमा भारती की भाजपा में वापसी हो जाती है, तो तय है कि शिवराज के खिलाफ नई खेमेबंदी शुरू हाते देर नहीं लगेगी, जो शिवराज सरकार को अस्थिर कर सकती है। यही वह कारण है जो शिवराज को बार-बार उमा विरोध के लिए उकसाता रहता है। नितिन गडकरी ने पार्टी का अध्यक्ष बनने के बाद जिन दो नेताओं की घर वापसी का जिक्र किया था, उनमें एक थे यशवंत सिंह और दूसरी थी उमा भारती! एक किताब में पाकिस्तान के नेता मोहम्मदअली जिन्ना का गुणगान करने के लिए पार्टी से निकाले गए यशवंत सिंह को तो पार्टी में शामिल कर लिया गया, पर उमा भारती के लिए अभी पार्टी ने दरवाजा नहीं खोला।
मध्यप्रदेश के भाजपा नेताओं में कैलाश जोशी अकेले ऐसे नेता हैं जिसने उमा के पक्ष में बयान दिया था, लेकिन उनके जैसे थके और चुके हुए नेताओं की सलाह का शायद अब कोई मतलब नहीं रह गया। खुद पार्टी भी असमंजस में है कि वह अपने फैसले पर अमल करे या पीछे लौट जाए! इस फायर ब्रांड नेता को भाजपा उत्तर प्रदेश में इस्तेमाल करना चाहती है और साथ ही हिंदुत्व् का माहौल भी बनाना चाहती है, जो पार्टी की सबसे बड़ी ताकत है। किंतु, इस बात की क्या गारंटी कि उमा भारती उत्तर प्रदेश की सीमा लांघकर मध्यप्रदेश नहीं आएंगी! यदि उमा यह सीमा लांघती है तो तय है कि भाजपा की राजनीति में उथल-पुथल मच जाएगी। उधर, उमा भारती अभी खमोश है, शायद इसलिए कि उन्हें पार्टी में ससम्मान वापसी का भरोसा दिलाया गया है। यदि इसमें देरी होती है, तो हो सकता है वे एक बार फिर से वाचाल हो उठें!
भाजपा में इस बात को स्वीकार करने वालों की कमी नहीं है कि दिग्विजय सिंह को फिर से सत्ता में आने से रोकने में 2003 में उमा भारती ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। राजनीति की एक खास शैली में उमा का प्रचार अभियान आज भी याद किया जाता है। इसी राजनीतिक अंदाज के कारण वे प्रदेश की सत्ता पर काबिज भी हुईं, लेकिन कायम नहीं रह सकी। परिवारवाद और कमजोर प्रशासनिक समझ के कारण वे फिसली और फिर फिसलती ही चली गईं। अपनी गलतियों की पहचान करने के बजाए वे चंद स्वार्थी लोगों के हाथ में कैद होकर रह गई और ऐसे में उनकी 'भारतीय जनशक्ति पार्टी" का भी वजूद कायम नहीं रह सका। अब वे फिर पार्टी के दरवाजें पर खड़ी हैं, लेकिन उनकी पुरानी गलतियां ही उनकी राह का रोड़ा बन गईं। पार्टी हाईकमान को उनके विरोधी यह समझाने में लगे हैं कि उमा भारती की वापसी भाजपा के लिए वरदान तो शायद साबित न हो, अलबत्ता अभिशाप जरूर साबित होगी!
उमा भारती को पार्टी में लाने के पीछे हाईकमान का मकसद भले ही मध्यप्रदेश में विकल्प खड़ा करना न हो, पर ऐसा नहीं होगा इसकी गारंटी भी कोई नहीं ले रहा। प्रदेश के नेता चाहते हैं कि हाईकमान को उमा भारती की जरूरत उत्तर प्रदेश में है तो पार्टी में उनकी वापसी का रास्ता भी उसी राज्य से तैयार किया जाए। भाजपा यदि उत्तर प्रदेश फतह करना चाहती है तो मध्यप्रदेश को दांव पर लगाना कौनसी राजनीतिक समझदारी है? जबकि, उमा भी अपनी जेबी पार्टी की दुर्दशा से यह समझ चुकी है कि राजनीति आसान खेल नहीं है! भाषण सुनने के लिए आई भीड़ वोटर नहीं होती, भाषण देना एक कला तो हो सकती है, पर राजनीतिक सफलता का रास्ता वहां से होकर नहीं जाता! हाशिए पर आ चुकी उमा का आने वाला कल क्या होगा, इस बात का दावा कोई नहीं कर रहा। फिर भी उनसे खौफ खाने वालों के नाम तलाशें जाएं तो उनमें सबसे पहला नाम शिवरासिंह चौहान का होगा जिन्हें उमा भारती अपनी कुर्सी के लिए खतरा जरूर नजर आ रही है।
राजनीति पर पैनी नजर रखने वालों को पता है कि उमा भारती की राजनीतिक शैली क्या है? वे कैसे अपने समर्थकों की टोली खड़ी करती हैं और प्रदेश की राजनीति में उनका दखल किस हद तक जा सकता है। अभी शिवराजसिंह का कोई विरोधी नहीं है, बात यह नहीं! परदे के पीछे उनकी मुखालिफत करने वाले कई हैं पर, विरोध करने वाले मुखर नहीं हो पाते। क्योंकि, उनके पास कोई राजनीतिक शरणस्थल नहीं है। यदि उमा भारती की भाजपा में वापसी हो जाती है, तो तय है कि शिवराज के खिलाफ नई खेमेबंदी शुरू हाते देर नहीं लगेगी, जो शिवराज सरकार को अस्थिर कर सकती है। यही वह कारण है जो शिवराज को बार-बार उमा विरोध के लिए उकसाता रहता है। नितिन गडकरी ने पार्टी का अध्यक्ष बनने के बाद जिन दो नेताओं की घर वापसी का जिक्र किया था, उनमें एक थे यशवंत सिंह और दूसरी थी उमा भारती! एक किताब में पाकिस्तान के नेता मोहम्मदअली जिन्ना का गुणगान करने के लिए पार्टी से निकाले गए यशवंत सिंह को तो पार्टी में शामिल कर लिया गया, पर उमा भारती के लिए अभी पार्टी ने दरवाजा नहीं खोला।
मध्यप्रदेश के भाजपा नेताओं में कैलाश जोशी अकेले ऐसे नेता हैं जिसने उमा के पक्ष में बयान दिया था, लेकिन उनके जैसे थके और चुके हुए नेताओं की सलाह का शायद अब कोई मतलब नहीं रह गया। खुद पार्टी भी असमंजस में है कि वह अपने फैसले पर अमल करे या पीछे लौट जाए! इस फायर ब्रांड नेता को भाजपा उत्तर प्रदेश में इस्तेमाल करना चाहती है और साथ ही हिंदुत्व् का माहौल भी बनाना चाहती है, जो पार्टी की सबसे बड़ी ताकत है। किंतु, इस बात की क्या गारंटी कि उमा भारती उत्तर प्रदेश की सीमा लांघकर मध्यप्रदेश नहीं आएंगी! यदि उमा यह सीमा लांघती है तो तय है कि भाजपा की राजनीति में उथल-पुथल मच जाएगी। उधर, उमा भारती अभी खमोश है, शायद इसलिए कि उन्हें पार्टी में ससम्मान वापसी का भरोसा दिलाया गया है। यदि इसमें देरी होती है, तो हो सकता है वे एक बार फिर से वाचाल हो उठें!
भाजपा में इस बात को स्वीकार करने वालों की कमी नहीं है कि दिग्विजय सिंह को फिर से सत्ता में आने से रोकने में 2003 में उमा भारती ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। राजनीति की एक खास शैली में उमा का प्रचार अभियान आज भी याद किया जाता है। इसी राजनीतिक अंदाज के कारण वे प्रदेश की सत्ता पर काबिज भी हुईं, लेकिन कायम नहीं रह सकी। परिवारवाद और कमजोर प्रशासनिक समझ के कारण वे फिसली और फिर फिसलती ही चली गईं। अपनी गलतियों की पहचान करने के बजाए वे चंद स्वार्थी लोगों के हाथ में कैद होकर रह गई और ऐसे में उनकी 'भारतीय जनशक्ति पार्टी" का भी वजूद कायम नहीं रह सका। अब वे फिर पार्टी के दरवाजें पर खड़ी हैं, लेकिन उनकी पुरानी गलतियां ही उनकी राह का रोड़ा बन गईं। पार्टी हाईकमान को उनके विरोधी यह समझाने में लगे हैं कि उमा भारती की वापसी भाजपा के लिए वरदान तो शायद साबित न हो, अलबत्ता अभिशाप जरूर साबित होगी!
उमा भारती को पार्टी में लाने के पीछे हाईकमान का मकसद भले ही मध्यप्रदेश में विकल्प खड़ा करना न हो, पर ऐसा नहीं होगा इसकी गारंटी भी कोई नहीं ले रहा। प्रदेश के नेता चाहते हैं कि हाईकमान को उमा भारती की जरूरत उत्तर प्रदेश में है तो पार्टी में उनकी वापसी का रास्ता भी उसी राज्य से तैयार किया जाए। भाजपा यदि उत्तर प्रदेश फतह करना चाहती है तो मध्यप्रदेश को दांव पर लगाना कौनसी राजनीतिक समझदारी है? जबकि, उमा भी अपनी जेबी पार्टी की दुर्दशा से यह समझ चुकी है कि राजनीति आसान खेल नहीं है! भाषण सुनने के लिए आई भीड़ वोटर नहीं होती, भाषण देना एक कला तो हो सकती है, पर राजनीतिक सफलता का रास्ता वहां से होकर नहीं जाता! हाशिए पर आ चुकी उमा का आने वाला कल क्या होगा, इस बात का दावा कोई नहीं कर रहा। फिर भी उनसे खौफ खाने वालों के नाम तलाशें जाएं तो उनमें सबसे पहला नाम शिवरासिंह चौहान का होगा जिन्हें उमा भारती अपनी कुर्सी के लिए खतरा जरूर नजर आ रही है।
Saturday, July 24, 2010
उत्साह की रैली में उत्पात का जोर
जीवन में खुशियों की खास महत्ता है। जब यही खुशी राजनीतिक जीवन में आती है, तो खुशियां कुंचाले मारने लगती है। यह खुशी निजी नहीं होती, सार्वजनिक होती है और तय है कि निजी के गुणक में जब कोई खुशी सार्वजनिक होती है तो उसका आकार भी कई गुना बड़ा हो जाता है। मामला राजनीतिक होता है इसलिए आकार इतना विशाल हो जाता है कि उसे दोनों हाथ फैलाकर भी दर्शाया नहीं जा सकता। राजनीति में कोई भी खुशी सबके लिए खुशी नहीं होती, उसका पाया किसी को दर्द देता है और यही दर्द राजनीतिक खुन्नास का कारण भी बनता है।
अभी कुछ दिनों पहले की बात है,प्रदेश भाजपा ने इंदौर के एक युवा विधायक जीतू जिराती को भारतीय जनता युवा मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की घोषणा की। यह संगठन वैसा ही है, जैसा कांग्रेस में युवक कांग्रेस होता है। संगठन युवाओं का है तो तय है कि इसके सदस्य भी युवा ही होंगे,जिनके खून में जोश उबाले मारता रहता है और जिनका उत्साह हमेशा आसमान में छेद करने को तैयार दिखाई देता है। जीतू जिराती को अध्यक्ष बनाए जाने की खुशी को पार्टी के युवा अपने दिलों में समेटकर नहीं रख पाए और क रैलीनुमा रेला निकालने का एलान कर दिया। सत्ताधारी पार्टी होने का एक सबसे बड़ा सुख यह होता है कि अफसर देखकर भी अनदेखी करने का ढ़ोग करते हैं। इंदौर एक बड़ा शहर है तो रैली की अनुमति लेना भी जरूरी है, उत्साही युवाओं ने औपचारिक रूप से रैली की सूचना अफसरों को दे दी और रैली की तैयारियों में जुट गए। उन्होंने जरूरी नहीं समझा कि रैली का रास्ता भी बताया जाता है और इसकी इजाजत भी ली जाती है।
रैली निकली, पर बड़े रेले की शक्ल में। शहर के बीच से प्रतिबंधित रास्ते से निकली इस रैली में उत्साह से ज्यादा उत्पात नजर आ रहा था। जिसमें हजारों उत्साही युवा अपने अध्यक्ष के मनोनयन को अपने तरीके से 'सेलीब्रेट" कर रहे थे। सैकडों गाड़ियां भी इस रैले में शामिल थी और खुली जीप में अपने राजनीतिक आकाओं और गुर्गो के साथ वह नए नवेले अध्यक्ष भी हाथ जोड़े, नकली हंसी हंसते हुए गुलाल से रंगे पुते खड़े थे। उनके स्वागत में रास्तेभर में सैकडों मंच बने थे जिनपर फूलों की पखुड़ियों का अंबार लगा था और देश प्रेम के गीत बज रहे थे। ये एक अजीब विडंबना है कि जब भी कोई राजनीतिक रैली (यानी रेला) निकलता है तो मंचों से देश प्रेम के गीत इस तरह बजाए जाते हैं मानों देश को ये लोग ही अंगरेजों के चंगुल से छुड़ाकर लाए थे। देश मी आजादी में इन्हीं का योगदान सबसे ज्यादा रहा था।
करीब 8 से 10 घंटे तक पूरे शहर की ट्राफिक व्यवस्था को झकझोरने के बाद रैली गतंव्य तक तो पहुंच गई, पर बाद में शुरू हुई असल राजनीति! जब कुछ लोगों को लगा कि उत्साह दर्शाने के नाम पर उत्पात मचाने वाली यह रैलियां यदि इसी तरह निकलती रही, तो लोगों का सड़क पर चलना दूबर हो जाएगा। मामला कोर्ट तक पहुंच गया और अफसरों स सवाल-जवाब होने लगे! उनसे पूछा गया कि बगैर इजाजत रैली कैसे निकली? किसने निकाली? रोकी क्यों नहीं गई ... वगैरा ... वगैरा! इसके बाद सब मुंह छुपाने और दूसरे की तरफ अंगुली उठाने का मौका ढंूढ़ने लगे। यह हालात पहली और आखिरी बार नहीं बने! इंदौर में ही ऐसा हुआ, किसी और शहर में नहीं होगा, ऐसा भी नहीं है! जब तक राजनीति में नकलीपन और दिखावा छाया रहेगा, ऐसे कई जीतू जिरातियों के अध्यक्ष बनने पर उत्साह के पैमाने छलकते रहेंगे। क्योंकि, देश का आने वाला कल इसी तरह के युवा नेताओं का है। इसलिए झेलना तो पड़ेगा ही ... !
अभी कुछ दिनों पहले की बात है,प्रदेश भाजपा ने इंदौर के एक युवा विधायक जीतू जिराती को भारतीय जनता युवा मोर्चा का प्रदेश अध्यक्ष बनाए जाने की घोषणा की। यह संगठन वैसा ही है, जैसा कांग्रेस में युवक कांग्रेस होता है। संगठन युवाओं का है तो तय है कि इसके सदस्य भी युवा ही होंगे,जिनके खून में जोश उबाले मारता रहता है और जिनका उत्साह हमेशा आसमान में छेद करने को तैयार दिखाई देता है। जीतू जिराती को अध्यक्ष बनाए जाने की खुशी को पार्टी के युवा अपने दिलों में समेटकर नहीं रख पाए और क रैलीनुमा रेला निकालने का एलान कर दिया। सत्ताधारी पार्टी होने का एक सबसे बड़ा सुख यह होता है कि अफसर देखकर भी अनदेखी करने का ढ़ोग करते हैं। इंदौर एक बड़ा शहर है तो रैली की अनुमति लेना भी जरूरी है, उत्साही युवाओं ने औपचारिक रूप से रैली की सूचना अफसरों को दे दी और रैली की तैयारियों में जुट गए। उन्होंने जरूरी नहीं समझा कि रैली का रास्ता भी बताया जाता है और इसकी इजाजत भी ली जाती है।
रैली निकली, पर बड़े रेले की शक्ल में। शहर के बीच से प्रतिबंधित रास्ते से निकली इस रैली में उत्साह से ज्यादा उत्पात नजर आ रहा था। जिसमें हजारों उत्साही युवा अपने अध्यक्ष के मनोनयन को अपने तरीके से 'सेलीब्रेट" कर रहे थे। सैकडों गाड़ियां भी इस रैले में शामिल थी और खुली जीप में अपने राजनीतिक आकाओं और गुर्गो के साथ वह नए नवेले अध्यक्ष भी हाथ जोड़े, नकली हंसी हंसते हुए गुलाल से रंगे पुते खड़े थे। उनके स्वागत में रास्तेभर में सैकडों मंच बने थे जिनपर फूलों की पखुड़ियों का अंबार लगा था और देश प्रेम के गीत बज रहे थे। ये एक अजीब विडंबना है कि जब भी कोई राजनीतिक रैली (यानी रेला) निकलता है तो मंचों से देश प्रेम के गीत इस तरह बजाए जाते हैं मानों देश को ये लोग ही अंगरेजों के चंगुल से छुड़ाकर लाए थे। देश मी आजादी में इन्हीं का योगदान सबसे ज्यादा रहा था।
करीब 8 से 10 घंटे तक पूरे शहर की ट्राफिक व्यवस्था को झकझोरने के बाद रैली गतंव्य तक तो पहुंच गई, पर बाद में शुरू हुई असल राजनीति! जब कुछ लोगों को लगा कि उत्साह दर्शाने के नाम पर उत्पात मचाने वाली यह रैलियां यदि इसी तरह निकलती रही, तो लोगों का सड़क पर चलना दूबर हो जाएगा। मामला कोर्ट तक पहुंच गया और अफसरों स सवाल-जवाब होने लगे! उनसे पूछा गया कि बगैर इजाजत रैली कैसे निकली? किसने निकाली? रोकी क्यों नहीं गई ... वगैरा ... वगैरा! इसके बाद सब मुंह छुपाने और दूसरे की तरफ अंगुली उठाने का मौका ढंूढ़ने लगे। यह हालात पहली और आखिरी बार नहीं बने! इंदौर में ही ऐसा हुआ, किसी और शहर में नहीं होगा, ऐसा भी नहीं है! जब तक राजनीति में नकलीपन और दिखावा छाया रहेगा, ऐसे कई जीतू जिरातियों के अध्यक्ष बनने पर उत्साह के पैमाने छलकते रहेंगे। क्योंकि, देश का आने वाला कल इसी तरह के युवा नेताओं का है। इसलिए झेलना तो पड़ेगा ही ... !
Subscribe to:
Posts (Atom)