Saturday, May 10, 2014

दिग्विजय ने अमृता से रिश्‍ते कबूले


   कांग्रेस में दिग्विजय सिंह की एक अलग पहचान है। मुँहफट और तार्किक तरीके से विपक्ष को निशब्द कर देने वाले 'दिग्गी राजा' कभी कोई ऐसा काम करेंगे, ऐसा किसी ने सोचा नहीं था! टीवी एंकर अमृता राय से अपने रिश्तोँ को स्वीकारने के बाद उसे सही करार देकर दिग्विजय सिंह ने चुनाव की गर्मी वाले मौसम में नई बहस को जन्म दे दिया! इस रिश्ते को लेकर राजनीति में ज्यादा विवाद नहीं हुआ! भाजपा के बड़े नेताओं ने इसे निजी मामला बताकर कन्नी काट ली, पर सोशल मीडिया पर ये प्रसंग चर्चित रहा! 
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  कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह ने टीवी एंकर अमृता राय से रिश्‍ते की बात कबूल की है। उन्होंने ये भी कहा कि दोनों जल्द ही शादी करने की तैयारी में हैं! ये मामला सामने आने के बाद दिग्विजय सिंह ने ट्वीट करके कहा कि 'मुझे यह स्‍वीकार करने में कोई संकोच नहीं है कि अमृता राय से मेरे रिश्‍ते हैं। अमृता ने अपने पति से तलाक के लिए केस फाइल कर दिया है। तलाक की प्रक्रिया पूरी हो जाए तो हम इस रिश्‍ते को औपचारिक रूप दे देंगे। लेकिन, अपनी निजी जिंदगी में किसी तरह की दखल की मैं निंदा करता हूं।' राज्‍यसभा टीवी में एंकर अमृता ने भी अपने पति से अलग होने की बात कबूल ली। उन्‍होंने ट्वीट किया कि 'मैं अपने पति से अलग हो गई हूं और हमने तलाक के लिए कागजात दाखिल कर दिए हैं। उसके बाद मैंने दिग्विजय सिंह से शादी करने का फैसला किया है।' इससे पहले दिग्विजय सिंह ने भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी द्वारा अपने वैवाहिक जीवन का शपथ पत्र में खुलासा होने के समय दस अप्रैल को ट्वीट किया था ‘मैं विधुर हूं और जब भी दोबारा शादी करुंगा तो आपके प्रिय फेंकू की तरह यह बात मैं छिपाऊंगा नहीं।’
  कांग्रेस के इस बड़े नेता का ट्वीट ऐसे समय आया, जब ट्विटर पर दिग्विजय सिंह और अमृता राय के रिश्‍ते को लेकर कई ट्वीट पोस्‍ट हो रहे हैं। ट्वीट के साथ दिग्विजय की अमृता के साथ कुछ निजी तस्‍वीरें भी शेयर की जा रही हैं। सोशल वेबसाइट फेसबुक पर भी इन दोनों की तस्‍वीरें मौजूद हैं। 
  अमृता ने आरोप लगाया है कि उनका ईमेल हैक कर लिया गया, जिसमेँ हमारी फोटों थी, जिन्हें सोशल मीड़िया पर पोस्ट कर दिया गय! उन्‍होंने ट्वीट किया कि 'मेरा ई-मेल हैक हो गया है और कंटेंट से छेड़छाड़ की गई! ऐसा करना गंभीर अपराध और यह मेरी प्राइवेसी में दखल देना है. मैं इसकी कड़े शब्‍दों में निंदा करती हूं।' 43 साल की अमृता राय के पति आनंद प्रधान आईआईएमसी में एसोसिएट प्रोफेसर हैं। जबकि,  67 साल के दिग्विजय सिंह की पत्‍नी आशा सिंह का पिछले साल कैंसर से निधन हो गया था। 
कांग्रेस ने झाड़ा पल्ला
  कांग्रेस महासचिव और एक टीवी पत्रकार अमृता राय के संबंध पर कांग्रेस ने कहा है कि ये उन दोनो का निजी मामला हो सकता है। कांग्रेस महासचिव शकील अहमद ने एक प्रेस कांफ्रेस में कहा है कि ये हो सकता है कि उनकी वेबसाइट हैक की गई हो! गौरतलब है कि सोशल साइट ट्विटर पर दिग्विजय के साथ अमृता की कुछ फोटो अपलोड की गई थी जिसके बाद मीडिया और राजनीतिक दलों में दिग्विजय के रिश्ते को लेकर चर्चाएं तेज हो गई थी। 
किसने अपलोड की तस्वीरें
  दिग्विजय सिंह और टीवी पत्रकार अमृता राय की निजी तस्वीरें सोशल मीडिया के जरिए कैसे सार्वजनिक हो गईं? इसका जवाब तलाशने के लिए दिल्ली पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। पहले बताया गया था कि तस्वीरें भाजपा नेता नितिन गडकरी ने जारी कीं, लेकिन गडकरी ने दिग्विजय सिंह की टीवी एंकर के साथ तस्वीरें अपने ट्विटर अकाऊंट से जारी होने का खंडन किया है। गडकरी ने कहा कि वे तस्वीरें फर्जी अकाऊंट से जारी की गई थीं। गडकरी ने साइबर अपराध शाखा से शिकायत की है कि उनके नाम से 3 फर्जी अकाऊंट चल रहे हैं। दिग्विजय सिंह और अमृता राय के संबंधों को उजागर करने वाले फोटोग्राफ्स को डिलीट करने के लिए पुलिस ने ट्विटर व फेसबुक को कहने के साथ ही इस मामले की तह तक जाने की कोशिश शुरू कर दी है। वे फर्जी अकाऊंट डिलीट कर दिए गए, जिसे अमृता राय के नाम से बनाकर आपत्तिजनक ट्वीट किए जा रहे थे।
क्या बोले आनंद प्रधान 
  सोशल साइट्स पर इस रिश्ते के सामने आने के बाद कई तरह की टिप्पणियां आई। अमृता के पति आनंद प्रधान ने फेसबुक पर पोस्ट लिखकर अपनी बात रखीं। उन्होंने अपनी फेसबुक पोस्ट में लिखा है -
 एक बड़ी मुश्किल और तकलीफ से गुजर रहा हूँ। यह मेरे लिए परीक्षा की घडी है। मैं और अमृता लम्बे समय से अलग रह रहे हैं और परस्पर सहमति से तलाक के लिए आवेदन किया हुआ है। एक कानूनी प्रक्रिया है, जो समय लेती है। लेकिन, हमारे बीच सम्बन्ध बहुत पहले से ही खत्म हो चुके हैं। अलग होने के बाद से अमृता अपने भविष्य के जीवन के बारे में कोई भी फैसला करने के लिए स्वतंत्र हैं और मैं उनका सम्मान करता हूँ, उन्हें भविष्य के जीवन के लिए मेरी शुभकामनाएं हैं। 
  मैं जानता हूँ कि मेरे बहुतेरे मित्र, शुभचिंतक, विद्यार्थी और सहकर्मी मेरे लिए उदास और दुखी हैं। लेकिन, मुझे यह भी मालूम है कि वे मेरे साथ खड़े हैं। मुझे विश्वास है कि मैं इस मुश्किल से निकल आऊंगा। मुझे उम्मीद है कि आप सभी मेरी निजता का सम्मान करेंगे। शायद ऐसे ही मौकों पर दोस्त की पहचान होती है, उन्हें आभार कहना ज्यादती होगी!
  लेकिन, जो लोग स्त्री-पुरुष के संबंधों की बारीकियों और स्त्री के स्वतंत्र अस्तित्व और व्यक्तित्व को सामंती और पित्रसत्तात्मक सोच से बाहर देखने के लिए तैयार नहीं हैं, उसे संपत्ति और बच्चा पैदा करने की मशीन से ज्यादा नहीं मानते हैं और उसकी गरिमा का सम्मान नहीं करते, उनके लिए यह चटखारे लेने, मजाक उड़ाने, कीचड़ उछालने और निजी हमले करने का मौका है। लेकिन, वे यही जानते हैं! उनकी सोच और राजनीति की यही सीमा है. उनसे इससे ज्यादा की अपेक्षा भी नहीं!

दिग्विजय अकेले दिलफेंक नहीं! 
  दिग्विजय सिंह अकेले कांग्रेस नेता नहीं हैं, जिनके किसी महिला के साथ संबंध जगजाहिर हुए हैं। एनडी तिवारी से लेकर महिपाल सिंह मदेरणा तक के सेक्‍स स्‍कैंडल लोगों के सामने आ चुके हैं। हालांकि, पॉलिटिक्‍स और सेक्‍स का कॉकटेल हमेशा बेहद खतरनाक रहा है। कांग्रेस के कई नेता इससे मदहोश हो चुके हैं। 
  हाल ही में कांग्रेस के दिग्‍गज नेता एनडी तिवारी ने माना कि रोहित शेखर उनके बेटे हैं। रोहित ने कोर्ट में मुकदमा दायर किया कि एनडी तिवारी उनके पिता हैं। तिवारी जी पहले तो नहीं माने, लेकिन डीएनए जांच के बाद उन्‍हें मानना पड़ा कि रोहित उनके ही बेटे हैं। इससे पहले एनडी तिवारी का एक सेक्‍स स्‍कैंडल भी सामने आ चुका है। इस सेक्‍स स्‍कैंडल में तिवारी एक बेड पर तीन जवान लड़कियों के साथ पकड़े गए थे। कांग्रेस के दबंग नेता गोपाल कांडा इन दिनों जमानत पर जेल से बाहर आए हुए हैं।
  हरियाणा के नेता गोपाल कांडा पर अपनी एयरलाइंस कंपनी में काम करने वाली एयरहोस्‍टेस गीतिका के साथ सेक्‍स संबंध बनाने का आरोप लगा है। डिस्ट्रिक्ट जज एस.के. सरवरिया की अदालत ने कांडा पर रेप, अप्राकृतिक यौनाचार और खुदकुशी के लिए मजबूर करने सहित अन्य धाराओं के तहत आरोप तय किए। 
  राजस्‍थान की सियासत में तब हड़कंप मच गया जब कांग्रेस के मंत्री महिपाल सिंह मदेरणा के साथ नर्स भंवरी देवी की सेक्‍स सीडी सामने आई। इस सेक्‍स सीडी में मदेरणा को भंवरी देवी के साथ बेहद आपत्तिजनक स्थिति में पाए गए थे। हालांकि, भंवरी देवी के कत्‍ल के बाद मदेरणा का मामला थोड़ा ठंडा जरूर पड़ गया है, लेकिन सीबीआई इसकी जांच में जुटी हुई है।
आरटीआई एक्टिविस्ट शेहला मसूद हत्‍याकांड में मध्यप्रदेश के भाजपा के एक नेता ध्रुवनारायण सिंह का नाम आने से पार्टी को शर्मिंदगी उठानी पड़ी। जांच में सामने आया कि धु्वनारायण सिंह से शेहला मसूद की नजदीकी, हत्‍या की साज़िश रचने वाली ज़ाहिदा परवेज़ को नागवार गुजरी और इंतकाम के लिए उसने शेहला की सुपारी भाड़े के हत्‍यारों को दे दी। ज़ाहिदा की डायरी के पन्‍नों के राज सामने आने के बाद ध्रुवनारायण सिंह को पॉलीग्राफिक टेस्‍ट तक से गुजरना पड़ा था। 
  कांग्रेस के दिग्‍गज नेता मनु सिंघवी की सेक्‍स क्लिप भी सामने आ चुका है। सिंघवी पर आरोप लगे थे कि उन्‍होंने एक महिला वकील को प्रमोशन दिलाने के एवज में सेक्‍स संबंध बनाए। सिंघवी के महिला के साथ बिताए अंतरंग पलों को किसी ने कैमरे में कैद कर उसे इंटरनेट पर अपलोड कर दिया।

तीसरा मोर्चा भी 'उम्मीद' से!

इस लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के फ़िर सत्ता में आने की संभावनाएं बेहद क्षीण हैं। क्योंकि, अपने दस साल के कार्यकाल मे कांग्रेस की यूपीए सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया, जो वोटर उन्हें एक और मौक़ा दे! ऐसे में भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के देश की सत्ता मे आने के आसार प्रकट किए जा रहे हैं। लेकिन, यदि एनडीए 272 का जादुई आंकड़ा जुटा पाने मे सफल नहीं हुई, तो दूसरा विकल्प तीसरे मोर्चे को माना जा सकता है! लेकिन, अभी इस मोर्चे का क़ोई आकार सामने नहीं आया है। यदि एनडीए पिछड़ा और तीसरे मोर्चे के भाग्य से छींका टूटा तो देश को अगले 5 साल से पहले एक और चुनाव का सामना पड़ सकता है। ये भी तय है कि कांग्रेस के बगैर तीसरे मोर्चे की सरकार बन पाना संभव नहीं है! लेकिन, राहुल गाँधी ने तीसरे मोर्चे को समर्थन देने की संभावना और जोड़-तोड़ से सरकार बनाने से इंकार किया है।  
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 समाजवादी पार्टी मुखिया और तीसरे मोर्चे के पैरोकार मुलायम सिंह यादव ने हमेशा ही लोकसभा चुनाव से पहले तीसरे मोर्चे के गठन की संभावना को खारिज किया है। उनका तर्क था कि यदि अभी ऐसा हुआ होता तो विभिन्न दलों के बीच टिकट बंटवारे को लेकर मतभेद उत्पन्न हो जाते। यादव ने हर बार दोहराया कि तीसरे मार्चे का गठन चुनाव के बाद होगा। उन्होंने साथ ही यह भी दावा किया कि देश का अगला प्रधानमंत्री गठबंधन के सहयोगी दलों से होगा। यादव ने कहा कि तीसरे मोर्चे का गठन चुनाव से पहले संभव नहीं था, क्योंकि टिकट बंटवारे और सीट साझा करने को लेकर पार्टियों के बीच मतभेद हो सकते थे। 
  उन्होंने कहा कि यही कारण है कि प्रस्तावित मोर्चे की सभी राजनीतिक पार्टियां अपने बल पर चुनाव लड़ा, और चुनाव के बाद एकसाथ आ जाएंगी। यादव ने कहा कि उनकी पार्टी सपा माकपा नेता प्रकाश करात और भाकपा नेता एबी बर्धन के सम्पर्क में है और इसको लेकर एक समझ है। उन्होंने कहा कि हमारा मानना है कि तीसरे मार्चे को केंद्र की सत्ता में आना चाहिए। देश का अगला प्रधानमंत्री तीसरे मोर्चे का उम्मीदवार होगा। उन्होंने दावा किया कि तीसरे मोर्चे का उम्मीदवार ही देश का अगला प्रधानमंत्री होगा।
समर्थन से इंकार 
  लोकसभा चुनाव के बाद कांग्रेस द्वारा तीसरे मोर्चे को समर्थन देने की सम्भावनाओं को लेकर अटकलें लगाए जाने के बीच पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि उनकी पार्टी किसी भी मोर्चे को समर्थन नहीं देगी। विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद ने हाल में कांग्रेस द्वारा तीसरे मोर्चे को समर्थन देने की सम्भावना व्यक्त की थी। उसके बाद इसकी अटकलें तेज हो गयी थीं। हालांकि बाद में खुर्शीद अपने बयान से पलट गए थे। चुनाव के अंतिम दौर में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने तीसरे मोर्चे की सरकार को समर्थन देने की बात को नकार दिया। अलबत्ता कुछ दिन पूर्व कांग्रेस के कुछ नेताओं की ओर से तीसरे मोर्चे को समर्थन देने संबंधी जो बयान आ रहे थे, उससे मुलायम सिंह यादव और जे. जयललिता को जरूर खुशी मिली होगी, क्योंकि ये दोनों अब भी खुलकर तीसरे मोर्चे की सरकार बनने की उम्मीद जाहिर कर रहे हैं।
  अब तक इन दोनों नेताओं ने ही प्रधानमंत्री बनने की मंशाजाहिर की है। कुछ ऐसी ही उम्मीद ममता बनर्जी और मायावती ने भी लगा रखी है, लेकिन उन्होंने अपनी आकांक्षाओं को जाहिर नहीं किया है। जाहिर है, कांग्रेस की ओर से तीसरे मोर्चे को समर्थन देने की बात निकलते ही इन नेताओं को अपनी उम्मीद परवान चढ़ती नजर आने लगी होगी। यह बात और है कि नरेंद्र मोदी के गुजरात मॉडल का गुब्बारा फोड़ने का दावा करते रहे राहुल ने जल्द ही तीसरे मोर्चे की सरकार को समर्थन का गुब्बारा भी फोड़ दिया।
 कांग्रेस ने सबसे पहले 1979 में जनता पार्टी को तोड़कर चौधरी चरणसिंह की सरकार बनवाई थी। तब कांग्रेस और उसकी नेता इंदिरा गांधी सत्ता में वापसी से ज्यादा राजनीति में खुद की प्रासंगिकता को लेकर फिक्रमंद थीं। उन्हें उसी जनता पार्टी की आपसी कलह से मौका मिल गया, जिसने प्रचंड बहुमत से उन्हें हराकर पहली बार देश में गैरकांग्रेसी सरकार बनाई थी। इंदिरा के सहयोग से चरण सिंह प्रधानमंत्री तोबने, लेकिन वह सरकार उस संसद का भी मुंह नहीं देख पाई, जिसके प्रति वह जवाबदेह होती है। यह सरकार कुछ दिन ही चल पाई थी। तब चौधरी चरण सिंह की अगुआई वाले धड़े को तीसरा मोर्चा नहीं कहा गया था, लेकिन अपनी सियासी तासीर में वह तीसरे मोर्चे से ही जुड़ा था। उसका फायदा भी कांग्रेस को मिला और 1980 में इंदिरा गांधी की वापसी हो गई।
 दूसरा मौका कांग्रेस को 11 साल बाद दिसंबर 1990 में मिला। तब जनता दल में वीपी सिंह और चंद्रशेखर में मनमुटाव चल रहा था। इसका फायदा कांग्रेस ने उठाया। वीपी सिंह की सरकार राममंदिर आंदोलन के रथी आडवाणी की गिरफ्तारी और समर्थन वापसी के बाद अल्पमत में आ गई थी। तब कांग्रेस ने उकसाकर जनता दल को तुड़वाया था।
 कांग्रेस को एक बार फिर तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने का मौका मिला 1996 में। तब लोकसभा में 162 सदस्यों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई में सिर्फ 13 दिन सरकार चल पाई। तब कांग्रेस ने एचडी देवेगौड़ा की अगुआई वाली संयुक्त मोर्चे की सरकार को समर्थन दिया और 11 महीने में वापस भी ले लिया। आईके गुजराल की भी सरकार बनी। लेकिन कांग्रेस ने यह सरकार भी चंद माह ही चलने दी। यह बात और है कि जिस मकसद से उसने सरकार गिराई, वह पूरा नहीं हो पाया। उसे 1998 के चुनावों मेंबहुमत नहीं मिल पाया। अलबत्ता इसके पहले हर बार फायदा उसे ही हुआ था। कांग्रेस इस बार भी अपना फायदा देख रही है। लेकिन, वह भूल रही है कि आज का मतदाता 1980 या 1991 जैसा नहीं है। 
लेफ्ट की कोशिश 
  सीपीआई (एम) के महासचिव प्रकाश करात क कहना है कि चुनाव के बाद यदि गैर कांग्रेस-गैर भाजपा सरकार बनाने की संभावना बनती है तो 'आम आदमी पार्टी' को भी इसका हिस्सा बनाने की पेशकश की जाएगी। प्रकाश करात ने कहा कि इस बारे में फैसला 'आप' पर निर्भर रहेगा, लेकिन हम उन्हें गैर कांग्रेस-गैर बीजेपी दल के रूप में मानते हैं। करात ने कहा कि हम 11 पार्टियां मैदान में हैं जिन्होंने कांग्रेस या भाजपा के साथ कोई गठबंधन नहीं किया है। लोकसभा चुनाव के परिणाम सामने आने के बाद हम इन दलों को एकजुट करने में सक्षम होंगे। 
  उन्होंने यह भी कहा कि तीसरे मोर्चे की सरकार के सत्ता में आने की पूरी संभावना दिखती है जिस पर हम चुनाव के बाद काम करेंगे। 25 फरवरी को सीपीआई (एम) ने 11 क्षेत्रीय दलों के प्रतिनिधियों की दिल्ली में बैठक की थी। इस बैठक में समाजवादी पार्टी, जनता दल (युनाइटेड) भी शामिल हुई थी। इस बात को स्वीकार करते हुए कि देश में कांग्रेस विरोधी भावना काम कर रही है, करात ने कहा कि इसे नरेंद्र मोदी के पक्ष में लहर कहकर गलत व्याख्या की जा रही है। उन्होंने कहा कि इस कथित लहर का केवल उन्हीं जगहों पर भाजपा को लाभ मिलेगा जहां मुकाबला दोनों राष्ट्रीय दलों के ही बीच में हो रहा है। लेकिन इसका लाभ उन राज्यों में जहां क्षेत्रीय दलों की स्थिति मजबूत है, नहीं मिल पाएगा।

दंभ, दावे और चुनौतियाँ


  इस बार देश का आम चुनाव कई बातोँ को लेकर अनोखा है। संभवतः ये पहला चुनाव है, जिसमें पार्टियां नही व्यक्ति चुनाव लड रहे हैं। कांग्रेस की तरफ से राहुल गाँधी को केन्द्र में रखकर चुनाव लड़ा जा रहा है, तो भाजपा ने अपने चुनाव का दारोमदार पूरी तरह नरेन्द्र मोदी को सौंप रखा है! चुनाव के व्यक्ति केन्द्रित होने के कारण दंभी बातें की जा रही है और मनमर्जी के दावे किए जा रहे हैं। ऐसे में किसी को इस बात का अहसास नहीं है कि उनके सामने भविष्य मे किस तरह की चुनौतियाँ खडी होँगी और उनका सामना किस तरह हो सकेगा!
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 * हेमंत पाल 
 भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी का कहना है कि देश को संकट से उबारने के लिए जनता उनको केवल साठ महीने दें, तो वे चौकीदार बनकर देश की सेवा करेंगे! लेकिन, राहुल गांधी कहते हैं कि देश को एक चौकीदार नहीं चाहिए, वे तो सारे 125 करोड़ लोगों को ही चौकीदार की नौकरी देंगे! पर, इन 125 करोड़ लोगों को कोई वेतन भी मिलेगा या नहीँ इसका वे कोई जिक्र नहीं करते! फिर राहुल गांधी किस अधिकार से 125 करोड़ नियुक्ति पत्र जारी करेंगे और इन 125 करोड़ों में राहुल गांधी खुद शामिल क्यों न हों? इन नेताओं ने राजनीति को एक व्यापार बनाकर रख दिया है। कहीं बाप-बेटे तो कहीं माँ-बेटे तो कहीं पति-पत्नी एक साथ मिलकर सत्ता सुख भोगते हैं और हिन्दुओं को चौकीदार की भूमिका और मुसलमानों को अधिकारी की भूमिका में रखना चाहते हैं! ऐसे में पूछा जा सकता है कि आने वाले दिन किसके अच्छे और किसके बुरे साबित होंगे?
  लोकसभा चुनाव के धुँवाधार प्रचार अभियान मे उभरे दंभ और दावोँ को देखकर सवाल उठता 
है कि भाजपा ने जद(यू) की नाराज़गी की चिन्ता न करते हुए भी आख़िर नरेंद्र मोदी पर दाँव क्यों खेला? इस सवाल को इस तरह भी रेखांकित किया जा सकता है कि एनडीए के अस्तित्व को दाँव पर लगाकर भाजपा ने नरेंद्र मोदी को कमान क्यों सौंपी? इस सवाल का जवाब तलाशते समय एक बात सामने आती है कि एनडीए का असली अस्तित्व इस बात पर निर्भर करता है कि भाजपा लोकसभा चुनावों में अपने बलबूते पर 200 से ज्यादा सीटें जीतकर दिखाए! पूरे चुनाव अभियान को देखते हुए भाजपा इतना तो समझ ही चुकी है कि यदि ऐसा नहीं हो सका तो एनडीए भाजपा के लिए  बोझ बन जाएगा। आज भाजपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती 200 सीटों का आंकड़ा पार  एनडीए के लिये 272 जुटाना है! 
  देश में कांग्रेस के खिलाफ आम जनता के मन में ग़ुस्सा है, इस बात  इंकार नहीं! इसमें लगातार बढ़ रही महँगाई सबसे बड़ा कारण है। सरकार ईमानदारी और महंगाई, दोनों मोर्चों पर बुरी तरह असफल हुई है। इसके बाद भी कांग्रेस ने प्रचार मे दावे करने में कोइ कसर नहि छोड़ीं! ऐसे समय में भाजपा के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि कांग्रेस के प्रति जनता के ग़ुस्से को कैसे अपने पक्ष में भुनाया जाए? क्योंकि, एक बात निश्चित है यदि इस बार भी भाजपा पिछड़ जाती है और सत्ता पूरी तरह सोनिया गाँधी के हाथों में सिमट जाएगी, जिसके नतीजे भाजपा के लिए ख़तरनाक होंगे। 
  भाजपा ने नरेन्द्र मोदी को इसलिए भी दांव पर लगाया है कि वे देश की आम युवा पीढ़ी में आशा का संचार करते हैं! जबकि, देश का वर्तमान राजनैतिक नेतृत्व युवा पीढ़ी को निराशा की ओर ही नहीं धकेलता बल्कि उसे पूरी व्यवस्था के प्रति ही अनास्थावान बनाता है। गुजरात में मोदी ने अपने राजनैतिक और प्रशासकीय कौशल दिखाया है और विकास के प्रतिमान स्थापित किए! उससे मोदी के नेतृत्व के प्रति देश के आम मतदाता के मन में उनकी विश्वसनीयता बढ़ी है। मोदी की सबसे बड़ी पूँजी उनकी बेदाग़ छवि है। उन पर कोई भी आजतक भ्रष्टाचार का आरोप लगाने का साहस नहीं कर पाया! जबकि, वर्तमान राजनीति में किसी नेता को ईमानदार कहने के लिए काफ़ी हिम्मत जुटाना पड़ती है! लेकिन, सौ टके का एक ही सवाल है कि क्या मोदी भाजपा के लिए 200 से ज्यादा सीट और एनडीए के लिये 272 का जादुई आँकड़ा जुटा पाएंगे?
सीटों के समीकरण 

 देश के दक्षिणी राज्यों में पुदुच्चेरी समेत पांचों राज्यों में लोकसभा की 130 सीटें हैं! सीटों के हिसाब से भाजपा यहां कर्नाटक को छोडकर लगभग शून्य है। असम सहित उत्तर-पूर्व के सिक्किम समेत सभी आठों राज्यों में लोकसभा की 25 सीट हैं। लेकिन, भाजपा की उपस्थिति यहां सांकेतिक ही है। पश्चिम बंगाल और ओडीशा में फिर लोकसभा क़ी दृष्टि से भाजपा लगभग नदारद है। इन दोनों राज्यों में लोकसभा की 63 सीटें हैं। इन सारे इलाकों में भाजपा कभी सशक्त नहीं रही। भाजपा को असली लड़ाई उत्तरी भारत के मैदानों में लड़नी है, जिसमें पंजाब, हरियाणा,  हिमाचल, जम्मू-कश्मीर, दिल्ली, उत्तर प्रदेश समेत भाजपा की शक्ति के हिसाब से मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार और झारखंड भी शामिल किया जा सकता है। भाजपा के लिए इस पूरे इलाके में लोकसभा की कुल 326 सीटें हैं। इन सभी में भाजपा का अपना मज़बूत संगठनात्मक ढाँचा है और भाजपा ने सबसे ज्यादा मेहनत भी यहीं की है। मोदी की असली परीक्षा इसी कुरुक्षेत्र में होने वाली है। 
उत्तर भारत की चुनौती 
  कल्याण सिंह के भाजपा से निकलने के बाद उत्तर प्रदेश मे भाजपा का जनाधार सिमट गया था! यहाँ की राजनीति धीरे-धीरे जातीय आधार पर सपा और बसपा के बीच सिमटकर रह गई! इस प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं। भाजपा को इसी क्षेत्र से सबसे ज्यादा सीट जीतने की उम्मीद है। मोदी अच्छी तरह जानते हैं कि गंगा यमुना के इन मैदानों में जब तक वे दलदल में फँसी भाजपा का रथ खींचकर यमुना एक्सप्रेस हाईवे पर खड़ा नहीं कर देते, तब तक वे अपनी जीत क आधार तय नहीं कर पाएंगे। बनारस से चुनाव लड़ना मोदी की इसी रणनीति क हिस्सा है। रणनीति बनाकर मोदी ने अमित शाह को उत्तर प्रदेश भी इसीलिए भेजा है। 
  नए परिप्रेक्ष्य में भाजपा के लिए चुनौती जदयू का साथ न रहना भी है। क्योंकि, बिहार में जितनी ज़रुरत भाजपा को जदयू की है, उससे कहीं ज़्यादा ज़रुरत जदयू को भाजपा की! व्यावहारिक रुप से अब जदयू बिहार का क्षेत्रीय दल है, जिसे राज्य में सत्ता में आने के लिए भाजपा की ज़रुरत रहेगी! इसी बिहार और उत्तर प्रदेश में मोदी का जादू सबसे ज़्यादा चल सकता है। कहा जाता है कि बिहार और उत्तर प्रदेश की राजनीति ही सबसे ज़्यादा जाति के आधार पर संचालित होती है। मोदी के पास इन दोनों प्रदेशों के लिए कारगार कार्ड है और यहाँ पार्टी ने सब्से ज्यादा मेहनत भी की है। 
  भाजपा के पास हिन्दुत्व का कार्ड तो है ही, उसने उत्तर भारत के प्रदेशों में ओबीसी होने का तुरुप का पत्ता भी चला है। भाजपा के पास नरेन्द्र मोदी के बहाने विकास का सबसे ज्यादा सशक्त सूत्र भी है। इन तीनों कार्डों के मिश्रण का जादू इन प्रदेशों में चल गया, जिसकी संभावना बहुत ज़्यादा है तो मोदी वहाँ अपने सभी विरोधियों पर क़हर ढा सकते हैं। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश में मोदी के दूत अमित शाह के पहुंचने से सबसे ज्यादा घबराहट सपा और बसपा में ही देखी गई! भाजपा के लिए चुनौती किसी भी हालत में एनडीए को बचाए रखना नहीं, बल्कि अपनी सीटों की संख्या 200 से ऊपर निकालने की है। यदि भाजपा ने यह शर्त पूरी कर ली तो एनडीए भी करीब 100 सीटों का जोड़ लगा सकता है, जो भाजपा की चाहत भी है। लेकिन, यदि भाजपा 200 सीटों से ऊपर नहीं निकल सकी तो नरेन्द्र मोदी की सात महीने की मेहनत पर पानी फ़िर जायेगा! मोदी और भाजपा के लिए असली चुनौती इसी शर्त को पूरी करने की है। क्योंकि, सारे दावे और दंभ इसी चुनौती के इर्द-गिर्द हैं। 
कांग्रेस के दावे 
  एक चुनावी सभा में कांग्रेस की सबसे ताक़तवर नेता सोनिया गांधी ने नरेंद्र मोदी पर जमकर निशाना साधा। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि मोदी देश की जनता को स्वर्ग बनाने का झूठा सपना दिखा रहे हैं, जबकि भाजपा का खुद का रास्ता ही तबाही वाला है। सोनिया गांधी ने मोदी पर हमला करते हुए कहा कि भाजपा के मुख्य प्रचारक नरेंद्र मोदी की बातों से लगता है कि चुनाव का नतीजा आ चुका है और वे सिंहासन पर बैठ गए! सोनिया ने कहा कि मोदी एक अहम बात भूल गए हैं कि चुनाव का नतीजा वे नहीं, बल्कि जनता तय करेगी। मुझे विश्वास है कि जनता कांग्रेस का रास्ता चुनेगी।
  सोनिया गांधी ने सैनिकों की शहादत का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा कुर्सी के लिए शहीदों के नाम का इस्तेमाल करती है। हमारे जवान अपनी जिंदगी की परवाह न करके हमारी और देश की सुरक्षा करते हैं। उनकी सेवाओं का सम्मान करते हुए ही 'वन रैंक वन पेँशन' लागू की गई। सोनिया ने अपने चुनावी भाषणों में अपने यूपीए शासन की उपलब्धियां भी गिनवाईं। कहा कि भाजपा सरकार गले तक भ्रष्टाचार में डूबी हुई थी। यूपीए ने मनमोहन सिंह के नेतृत्व में गांव-शहरों के बुनियादी ढांचों को मजबूत करने के लिए योजनाएं लागू कीं। बच्चों को शिक्षा, स्कूल में भोजन, आरटीआई जैसा मजबूत अधिकार दिया। किसानों के कर्ज माफ किए। कांग्रेस के राज में गरीब, दलित, पिछड़ों, आदिवासियों और महिलाओं को ध्यान में रखकर तमाम योजनाएं बनाई गईं। 
'आप' बिगाड़ेगी समीकरण 
 आम आदमी पार्टी के संयोजक और उत्तर प्रदेश के बनारस से उम्मीदवार अरविंद केजरीवाल ने अपने प्रचार का आधार नरेन्द्र मोदी और राहुल गाँधी को बनाया। उनका कहना है कि नरेंद्र मोदी और राहुल गांधी दोनों बड़े उद्योगपतियों के हाथों बिके हुए हैं। केजरीवाल ने बनारस के रोहनिया विधानसभा क्षेत्र के टिकरी गांव मे कहा कि मोदी और राहुल अंबानी के हाथों बिके हुए हैं और जीतने के बाद ये उनका ही काम करेंगे। आम आदमी की समस्याओं से उन्हें कोई लेना-देना नहीं है। केजरीवाल कुछ मोदी समर्थकों से भी मिले और उनसे सवाल किया कि क्या आप मोदी से कभी मिले हैं? वे तो सिर्फ हेलीकॉप्टर में उड़ने वाले नेता हैं। जनता की समस्याओं को समझने लिए जनता के बीच रहना पड़ता है। जनता से रूबरू हुए बिना वह जनता की समस्याओं को क्या समझेंगे?
तीसरे मोर्चे के तर्क 
  संभावित तीसरे मोर्चे के प्रमुख नेता और समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने नरेंद्र मोदी को झूठा व्यक्ति बताया। उन्होंने कहा कि मोदी ने गुजरात को चौपट कर दिया है। गुजरात के विकास के बारे में उनके सारे दावे झूठे हैं। उनकी पोल खुल रही है। मुलायम सिंह ने कहा कि गुजरात में लाखों नौजवान बेरोजगार हैं। सरकार 10 लाख युवाओं का पंजीकरण ही नहीं होने दे रही है। 85 प्रतिशत महिलाएं कुपोषण की शिकार हैं। वहां के 21 जिलो में पेयजल संकट है। वहां 8 घंटे भी बिजली नहीं आती है। गुजरात के विकास की बातें झूठी हैं। 
  यादव ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार पर भी आरोप लगाया कि कांग्रेस सरकार ने किसानों की समस्याओं की अनदेखी की, जिससे किसानों को भारी कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि सपा किसानों की समस्याओं को अच्छी तरह से समझती है। इसीलिए उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार ने किसानों के हितों को ध्यान में रखते हुए कई बड़े कदम उठाए हैं। उन्होंने दावा किया कि चुनाव के बाद अगली सरकार तीसरे मोर्चे की बनेगी और सपा तीसरे मोर्चे का सबसे बड़ा दल होगी।
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Friday, January 31, 2014

राजनीतिक शुद्धिकरण का सिलसिला है, बगावत नहीं!

- हेमंत पाल
 इन दिनों राजनीतिक परिदृश्य में बहुत कुछ अनदेखा और अप्रत्याशित सा दृश्य दिखाई देने लगा है। इस परिदृश्य को अलग-अलग चश्मे से देखने की कोशिश की जा रही है, जो सही नहीं है। मध्यप्रदेश के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता तथा अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के सचिव सज्जनसिंह वर्मा ने राज्यसभा में ऐसे सांसदों को भेजने का विरोध नहीं, बल्कि उनके चयन पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि समय की मांग है जब संसद में युवाओं को प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए। बात सीधी थी, लेकिन उसे कुछ इस अंदाज में पेश किया गया जैसे सज्जनसिंह वर्मा बुजुर्ग नेताओं के खिलाफ हैं! यह भी किसी विडम्बना से कम नहीं है कि कुछ लोगों की बात का हमेशा उलटा ही अर्थ निकाला जाता रहा है। यह पहला मौका नहीं है, जब सज्जन वर्मा को उनकी साफगोई के कारण विवादों का सामना करना पड़ा! इससे पहले जब एक बार उन्होंने अपना काम न हो पाने की व्यथा लेकर आए कार्यकर्ताओं और मतदाताओं को बोलचाल में प्रयुक्त जनभाषा में पार्टी हाईकमान पर दबाव बनाने की बात कही थी, तब भी उसे इस तरह से प्रचारित किया गया था कि वे हाईकमान की अवमानना कर रहे हैं। आज जब उन्होंने समय की आवश्यकता और राजनीतिक माहौल में बदलाव की स्थिति को देखते हुए युवाओं का प्रतिनिधित्व बढाने के लिए थके-हारे राजनीतिकों को पिछले दरवाजे से संसद का सुख भोगने के लिए की जा रही कवायद पर अपने विचार प्रस्तुत किए तो उसे बगावत के सुर मानकर उनकी आलोचना की जाने लगी। सतही तौर पर सज्जन का विरोध करने वालों में अधिकांश लोग उनकी बातों से सहमत हैं, लेकिन हाईकमान के हंटर के डर से वह सच्चाई का साथ देने से बच रहे हैं। यदि स्मृति पर थोड़ा जोर डाला जाए तो याद आता है कि पिछले साल जब गोआ में भाजपा का सम्मेलन हुआ था, तब वहां के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर ने भी भाजपा संगठन में बुजुर्गों को आराम करने की सलाह देते हुए युवा खून को मौका देने की बात की थी। इस पर वहां उपस्थित कार्यकर्ताओं ने किसी तरह का विरोध करने के बजाए तालियों की गडग़ड़ाहट से उनका स्वागत किया था। कहा तो यह जाता है कि अनुशासन के मामले में भाजपा संगठन कांग्रेस से ज्यादा सख्त है। तब यदि मनोहर पर्रिकर के नजरिए पर कोई विवाद खड़ा नहीं हुआ, तो हार की मार झेल चुकी कांग्रेस में सज्जन वर्मा की इस प्रतिक्रिया को तिरछी नजरों से क्यों देखा जा रहा है! आज जिस तरह का राजनीतिक माहौल हमारे आसपास दिखाई दे रहा है, उसमें एक बदलाव साफ दिखाई दे रहा है, वो यह कि अगली लोकसभा में युवाओं के वोट निर्णायक होंगे। ऐसे में यदि समय की धारा के साथ चलते हुए राजनीतिक दलों ने युवाओं की अपेक्षानुरूप बदलाव नहीं किए, तो इसका खामियाजा उन्हें चुनावी परिणाम में भुगतना पड़ सकता है। आज की राजनीति में युवाओं की भूमिका और महत्व को इस बात से आकलित किया जा सकता है कि दिल्ली मे केजरीवाल-सरकार बनते ही फटाफट निर्णय लेने का एक दौर आरंभ हुआ है। यह अलग विषय है कि उनके द्वारा लिए गए निर्णय कितने सही और कितने गलत हैं? आज का युवा जो फटाफट क्रिकेट और फास्टफ़ूड संस्कृति का समर्थक है, उसे राजनीति में भी फटाफट फैसले लेने वाले प्रत्याशियों और पार्टी की दरकार है। ऐसे में पिटे-पिटाए मोहरों पर दाँव लगाकर कांग्रेस ने भले ही उनकी राजनीतिक उम्र बढा दी हो, लेकिन इससे देश या पार्टी का शायद ही कोई भला हो पाए! गत दिनों जिन कोंग्रेसियों ने राज्यसभा के पर्चे दाखिल किए, उनमें केवल दिग्विजय सिंह ही ऐसे हैं जिनका चेहरा अक्सर टीवी पर दिखाई दे जाता है। वर्ना पता नहीं मोतीलाल वोरा सहित अन्य दावेदार किस कंदरा से उठकर नामांकन भरने चले आए! वैसे तो सज्जनसिंह वर्मा ने सीधे-सीधे दिग्विजय सिंह पर निशाना नहीं लगाया, लेकिन जब बात आगे बढ़ी तो उन्होने दिग्विजय सिंह के बारे में जो बातें बताई, वह गलत भी नहीं हैं। इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि उनके कांग्रेस में रहने से मध्यप्रदेश या देश में पार्टी का कोई फायदा हुआ हो? न तो वे कोई आर्थिक योजनाकार हैं, न राजनीति के चाणक्य हैं जिन पर भरोसा कर पार्टी अपना राजनीतिक प्रभाव बढ़ा सकती है! दो माह पहले हुए विधानसभा चुनाव में उनके दोहरे मापदंड से खुद कांग्रेसी कार्यकर्ता नाखुश हैं। राहुल गांधी के इरादों को धता दिखाते हुए जिस तरह से उन्होंने प्रत्याशियों की सूची जारी होने से पहले अपने पुत्र से पर्चा दाखिल करवाया और दूसरे कांग्रेसी नेताओं के परिवार के लोगों को प्रत्याशियों की सूची से बाहर रखा, तब से ही दिग्विजय सिंह कांग्रेसियों की आँख की किरकिरी बन गए हैं। कल्पना परूलेकर ने भी उन्हे सरे आम कोसा था। यदि दिग्विजय सिंह का ट्रैक रिकार्ड टटोला जाए, तो पता चलता है कि इस चुनाव से पहले जहां-जहां उन्हें कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया पार्टी हारी है। खुद उनके गृहनगर में कांग्रेस की हालत पतली है। जिन दिनों वे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री थे, प्रदेश के किसानों और शहरवासियों ने सड़क और सरकारी कर्मचारियां ने उनकी मांगों को अनदेखा किए जाने को लेकर दिग्विजय सिंह को प्रदेश की राजनीति से बाहर कर दिया था। ऐसे में बिना किसी राजनीतिक योगदान के उन्हें राज्यसभा की सीट सौंपना सेफ-पैसेज देने जैसा ही लगता है। बेहतर होता यदि उन युवाओं को राज्यसभा में भेजा जाता जिनके नाम बार बार टीवी पर दिखाए जा रहे थे। उन्हें हाशिए पर रखकर दिग्विजय सिंह को राज्यसभा भेजे जाने से निश्चित ही उस वर्ग को कोई अच्छा संदेश नहीं गया होगा! लेकिन, उनकी चुप्पी कब लावा बनकर बह निकले, कहा नहीं जा सकता। यह अच्छी बात है कि उनकी खामोशी को जुबान देते हुए सज्जन वर्मा ने पार्टी को आईना दिखाने का काम किया है। यदि इसका अनुसरण कर सभी दलों के साहसी नेता अपने-अपने दलों को आईना दिखाने साहस जुटाएं तो राजनीतिक शुद्धिकरण का एक नया सिलसिला आरंभ हो सकता है! ----------------------------------------------------------

Monday, January 13, 2014

इन विधानसभा चुनाव नतीजों का हश्र?

- हेमंत पाल ------------------------------------------------------------- पाँच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव में से चार राज्यों के नतीजों ने कांग्रेस के नेतृत्व की जड़ों को हिलाकर रख दिया। नरेंद्र मोदी के राजनीतिक मंत्र और भाजपा के सभी राज्यों के क्षत्रपों के सामने पूरी कांग्रेस पार्टी धराशाई नजर आई। बाकी बची कसर दिल्ली में 'आप' ने पूरी कर दी! उत्तर भारत के चार राज्यों में मतदान के बाद जो संकेत मिले थे, उसके बाद ही कांग्रेस नेतृत्व ने हार की पेशबंदी शुरू कर दी थी। लेकिन, उन्हें यह अंदाजा नहीं था कि चुनाव परिणाम उनके लिए इतने नकारात्मक और निराशाजनक होंगे। कांग्रेस का पूरा मैनेजमेंट ये पता लगाने में असफल है कि मध्यप्रदेश में पार्टी की बुरी हार का कारण क्या है? सकारात्मक संकेतों की गर्त में इतने ख़राब नतीजे छुपे थे, इसका अंदाजा कोई नहीं लगा पाया! सिर्फ राजस्थान ही ऐसा राज्य है, जहाँ कांग्रेस को अपनी हार का अंदेशा पहले से था। 000 मध्य प्रदेश सहित चार राज्यों के चुनावी परिणाम तमाम राजनीतिक दलों को सोचने-विचारने का ढेर सारा मसाला दे गए हैं। कांग्रेस समझ नहीं पा रही है कि उसकी इतनी करारी हार क्यों हो गई! भाजपा भी असमंजस में है कि उसे इतना बहुमत कैसे मिल गया? दिल्ली और छत्तीसगढ़ को छोड़ दिया जाए, तो खुद भाजपा ने भी नहीं सोचा था कि उसे इस कदर सफलता मिलेगी! ले देकर दिल्ली में 'आम आदमी पार्टी' ही यह कयास लगा रही थी कि वह कांग्रेस और भाजपा दोनों पर ही झाडू लगा देगी! लेकिन, यहां भी उसके सपने पूरे नहीं हुए! उसने कांग्रेस पर तो झाडू मार दी, लेकिन भाजपा को वह अपनी झाडू में समेट नहीं पाई। ऐसे में यह सोचना जरूरी है कि इन चुनावी नतीजों के परिणाम क्या होंगे? पहली बात तो यह है कि इन परिणामों का सही कारण क्या है, कोई सही तरह से आकलित नहीं कर पा रहा है। क्या इसका कारण राहुल गाँधी का पूरी तरह विफल हो जाना है या फिर यह नरेंद्र मोदी को मिलने वाली अभूतपूर्व सफलता का पहला चरण है? क्या यह आम आदमी पार्टी की जीत से विकल्प की राजनीति का उभार है या फिर क्षेत्रीय दलों के हाशिए पर चले जाने के संकेत हैं? अगर इस मुद्दे का सरलीकरण कर दिया जाए, तो कहा जा सकता है कि यह सभी बातें सही हैं। लेकिन, राजनीति इतनी सरल नहीं है, इसलिए इसके अर्थ भी इतने सरल नहीं हो सकते! तमाम राजनीतिक दल और राजनीतिक विश्लेषक विभिन्न चुनावी परिस्थितियों को अलग-अलग ढंग से परिभाषित करते रहे हैं। सभी इसे अपनी अपनी ढपली लेकर अपना-अपना राग अलाप रहे है। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और दिल्ली राज्यों में भाजपा ने लभगग 66 फीसदी सीटें जीती हैं। लोकसभा में इन राज्यों से 72 सांसद आते हैं। विधानसभा का ट्रेंड भी बरकार रहा, तो इसमें से भाजपा 50 के ऊपर सीटें जीत सकती है। फिलहाल यहां से कांग्रेस के 40 सांसद हैं। अभियान में अपनी आक्रामक शैली की वजह से कई बार नरेंद्र मोदी भी विवाद का विषय भले बने हो। लेकिन, राहुल गांधी की ओढ़ी हुई आक्रामक शैली कुछ ज्यादा ही चर्चा का विषय रही। राहुल गांधी पूरे प्रचार अभियान में भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी और आतंकवाद पर जो तर्क देकर संप्रग सरकार की नाकामियों पर पर्दा डाला, वो जनता भी नहीं पचा पाई। मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ में उन्हें विकास के काम और जनप्रिय चेहरे उन्हें नजर नहीं आ रहे थे। इन नतीजों के बाद कांग्रेस को यह समझ लेना चाहिए कि प्रमुख मुद्दों पर उसका शतुरमुर्गी रवैया देश का युवा मतदाता बर्दाश्त करने को तैयार नहीं है। इससे पहले जब भी मतदान का प्रतिशत बढ़ता रहा है, ये विश्लेषण किया जाता रहा है कि यह सत्तारूढ़ दल के खिलाफ नाराजगी के संकेत हैं। लेकिन, इस बार मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में अधिक मतदान के बाद भी सरकारों की वापसी ने इस सिद्धांत को गलत साबित कर दिया! यह कहा जा सकता है कि इन राज्यों में मुख्यमंत्रियों ने अपनी छवियों और अपने कामकाज के दम पर वापसी की है। साथ ही श्रेय भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को दिया जाना चाहिए, जिसने राज्य को गुटबाजी का अड्डा नहीं बनने दिया। वहीं दूसरी तरफ राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ तक हर प्रदेश में कांग्रेस की हार इस बात का गवाह है कि राहुल गाँधी की सीधी निगरानी भी इन प्रदेशों में गुटबाजी को नहीं रोक सकी! तो क्या यह माना जाए कि विधानसभा चुनावों का परिणाम अपने पक्ष में करने में राहुल पूरी तरह नाकामयाब रहे? एक हद तक सही भी है कि कहीं न कहीं राहुल गाँधी की रणनीति ही विफल हुई है! क्योंकि, इस बार टिकट वितरण से लेकर प्रभारी चुने जाने तक सारा फैसला उन्होंने ही लिया था। यहां तक कि संबंधित राज्यों के वरिष्ठ और अनुभवी राजनेताओं को उन्होंने हाशिये पर डालकर जिन उम्मीदवारों को टिकट दिया, वे जीत नहीं पाए! ऐसे में उनकी असफलता का अंजाम यह हो सकता है कि यदि भूले भटके लोकसभा चुनाव में भावी प्रधानमंत्री के रूप में प्रचारित किया गया, तो पता नहीं क्या होगा ? राहुल गांधी की सबसे पहली जिम्मेदारी स्थानीय स्तर से लेकर राज्य स्तर पर पार्टी की गुटबाजी को रोकना था। कहने को मध्य प्रदेश में केन्द्रीय नेता मंच पर तो साथ-साथ नजर आए, लेकिन मंच से उतरते ही वे प्याज के छिलकों की तरह एक दूसरे की परत उतारते रहे! अफसोस इस बात का रहा कि राहुल अपनी इस जिम्मेदारी को पूरा करने में नाकामयाब रहे, और नतीजा सामने है। वैसे भी सिर्फ प्रभारी बनाने और टिकट बांटने से चुनाव नहीं जीते जा सकते! यह बात इस चुनाव में बकायदा साबित भी हो गई। मध्य प्रदेश में दिग्विजिय सिंह का बड़बोलापन भारी रहा। ज्योतिरादित्य सिंधिया तो बोलचाल में संयत रहे, लेकिन उनका दूसरे बड़े नेताओं पूरे मन से साथ नहीं दिया! यह खामी मंच पर भी नजर आई, जब हर मंच पर दिग्विजय सिंह पीछे की कुर्सी पर बैठते थे, फिर उनसे सिंधिया इसरार करते तो वे उठते, और राहुल के कहने पर कक्षा के छात्र की तरह उनकी आज्ञा मानकर कुर्सी छोड़कर आगे आ जाते थे। ये भी कहना एक हद तक सही हो सकता है कि राज्यों के चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़े जा सकते हैं। लेकिन, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यूपीए-2 सरकार की छवि और उसके खिलाफ पिछले कुछ महीनों से बन रहा माहौल भी कांग्रेस के खिलाफ गया। आने वाले दिनों में राहुल गाँधी को प्रदेशों में नेतृत्व तैयार करने में मेहनत करनी होगी। अगर लोकसभा चुनाव में अपनी पार्टी की दशा ठीक रखनी है तो केंद्र सरकार को भी अपनी छवि को सुधारना होगा! क्योंकि, इसके बिना नरेंद्र मोदी से मुकाबला करना आसान नहीं होगा। चुनावी परिणाम की शाम सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी ने बकायदा माना कि जनता हमसे नाराज थी। राहुल ने तो कांग्रेस के रूपांतरण तक की बात तक कही! हो सकता है कि राहुल पार्टी का चेहरा बदलने के लिए बेकरार हों, लेकिन पुराने और घाघ कांग्रेसी उन्हें असफल करने में कसर नहीं छोड़ेंगे! भाजपा भले ही माने की चारों राज्यों में उसके लिए मोदी फेक्टर काम कर गया! लेकिन, पूरी तरह से यह मान लेना गलत होगा कि इन राज्यों में हुई जीत नरेंद्र मोदी की जीत है। यह याद रखना होगा कि इन चारों राज्यों में जीत का आकलन तब से लगाया जा रहा था, जब नरेंद्र मोदी गुजरात का चुनाव जीतकर केंद्र में नहीं आए थे। तब वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार भी नहीं बनाए गए थे! राजस्थान में गेहलोत की निष्क्रियता चरम पर थी। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ में भाजपा ने जो विकास के काम किए वे सड़कों पर दिखाई दे रहे थे। यदि यह सही होता कि भाजपा के इस प्रदर्शन का एकमात्र कारण मोदी ही है, तो यह भी गलत साबित हो जाता है। क्योंकि, दिल्ली में मोदी ने एक के बाद एक रैलियों की झडी लगा दी थी। आखिर क्यों भाजपा स्पष्ट बहुमत के नजदीक आकर रूक गई। क्यों एकदम नई 'आम आदमी पार्टी' ने उनके अश्वमेघ को रोक लिया! बस्तर में भाजपा की करारी हार भी ऐसा ही कुछ कहती है। छत्तीसगढ़ में चुनावी परिणाम के अंत तक यही खुटका लगा रहा कि कहीं, कांग्रेस उसे पीछे न छोड़ दे। इस बात को पूरी तरह से खारिज भी नहीं किया जा सकता कि मोदी का कोई असर ही नहीं पडा। यह सही है कि नरेंद्र मोदी को लेकर एक सकारात्मक माहौल बना हुआ है, लेकिन ये भ्रम भी नहीं पाला जाना चाहिए कि यह जीत उनका ही करिश्मा है। उन्हें अभी अपना करिश्मा दिखाना बचा है। जिसमें उन्हें देश के उस आधे हिस्से में सहयोगी तलाश करना है, जहां भाजपा का कोई नामलेवा नहीं है। उन्हें एनडीए तो पुनर्जीवित करने के लिए क्षेत्रीय दलों की जरूरत होगी। इस बात से तसल्ली की जा सकती है कि चारों राज्यों में क्षेत्रीय दल ज्यादा प्रभावी प्रदर्शन नहीं कर पाए! इन राज्यों के चुनावों में भले ही दिखता हो कि अकाली दल, बसपा और सपा जैसी पार्टियां अपने छोटा-मोटा जनाधार खो चुकी हैं, लेकिन यह राष्ट्रीय दलों के लिए घातक आकलन होगा कि वे उन्हें हाशिए पर पड़ा मान लें! क्योंकि, जिस तरह से तीसरे विकल्प के रूप में आम आदमी की पार्टी ने भाजपा की राह में रोड़े अटकाए हैं, वही काम यह क्षेत्रीय दल भी कर सकते हैं। इसलिए यदि इन्हें अनदेखा किया गया तो भाजपा 2014 में सत्ता पाने का सपना पूरा नहीं कर पाएगी। जिस तरह से दिल्ली में 'आप' का प्रभाव पड़ा है, वह इसे लोकसभा का लिटमस टेस्ट मानकर 2014 में पूरे देश में अपने प्रत्याशियों को खड़ा करने की योजना बना रहे हैं । यदि ऐसा हुआ तो कांग्रेस और भाजपा दोनों को ही पसीने आ जाएंगे। ऐसे में तीसरे विकल्प को हाशिये पर मानना, न मोदी के हित में होगा न राहुल के! 'आप' ने एक संदेश साफ दे दिया है कि या तो सुधर जाओ या फिर घर जाओ। भाजपा को जो जनाधार मिला है, उस पर उसे आत्ममुग्ध होने के बजाए अपनी खामियों को दूरकर अपने आपको सुधारना होगा। उसे यह भी याद रखना होगा कि चाहे मध्य प्रदेश हो या राजस्थान या फिर छत्तीसगढ़, कहीं भी मंदिर की राजनीति की बात नहीं उठी। अधिकांश परिणाम विकास की स्थिति और भ्रष्टाचार से तंग मतदाताओं के गुस्से का नतीजा है। यदि अब इन चारों राज्यों में भाजपा ने अपनी छबि को मांजने का प्रयास नहीं किया, तो उसके लिए तो दिल्ली दूर ही होगी! यदि कांग्रेस ने भी अपनी चाल, चरित्र और चेहरा नहीं बदला तो उसे दिल्ली के बडे जंग में मैदान में शिकस्त खाना पड़ सकती है।

Wednesday, January 1, 2014

… इसलिए भी याद रहेगा बीता बरस (2013)

- हेमंत पाल ---------------------------------------------------------------------- हर साल कि तरह इस साल भी बॉलीवुड ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। कुछ पुराने सितारे दुनिया से बिदा हुए तो किसी के रिश्ते बने और टूटे! कुछ कम बजट की फिल्मों ने सफलता का शिखर लांघा तो कुछ ऐसी भी फ़िल्में रहे, जो करोड़ों के बजट से बने जरुर पर दर्शकों को पसंद नहीं आई! चंद ऐसी घटनाएं भी घटी, जिसने परदे की दुनिया का बड़ा झटका दिया। फ़िल्मी दुनिया की कुछ ऐसी ही घटनाओं पर सरसरी नजर : सरपट दौड़ी 'चैन्नई एक्सप्रेस' इस साल रिलीज हुई शाहरुख खान और दीपिका पादुकोण की फिल्म 'चैन्नई एक्सप्रेस' ने कमाई के अब तक के सभी रेकॉर्ड्स तोड़ते हुए 395 करोड़ की कमाई की! वहीं 20 दिसंबर को रिलीज हुई आमिर खान, कैटरीना कैफ की फिल्म 'धूम 3' भी इसी तरह दौड़ती नजर आई। 'धूम 3' ने अपने पहले हफ्ते में कुल 107.61 करोड़ की कमाई की। फिल्म के पहले दिन की कमाई ने भी बॉलिवुड में अब तक की सभी फिल्मों के रेकॉर्ड तोड़े। 'धूम 3' ने अपनी रिलीज के पहले दिन 36.22 करोड़ रुपए का कलेक्शन किया। अब तक रिलीज हुई कोई भी हिंदी फिल्म एक दिन में इतनी कमाई नहीं कर सकी। शाहरुख का तीसरा बच्चा इस साल शाहरुख और गौरी खान के तीसरे बच्चे का जन्म सरोगेसी से हुआ! मुंबई महानगर पालिका ने इस बच्चे के जन्म की पुष्टि की। गौरी और शाहरुख के इस तीसरे बच्चे का जन्म 27 मई, 2013 को अंधेरी के मसरानी हॉस्पिटल में हुआ! इस अभिनेता के तीसरे बच्चे के सेरोगेसी के जरिए जन्म लेने की खबरों ने इस साल खासी चर्चा बटोरी! गौरी और शाहरुख पर इसके लिंग परीक्षण कराने के आरोप भी लगे! कुल मिलकर ये मामला खासा चर्चित रहा। संजय दत्त को जेल मुंबई में हुए सीरियल बम विस्फोटों के दौरान गैरकानूनी हथियार रखने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनाई संजय दत्त को पांच साल की सजा सुनाई। संजय पहले ही 18 महीने जेल में गुजार चुके हैं, इसलिए अब वह अपनी 42 महीनों की बची सजा पुणे के येरवडा जेल में गुजार रहे हैं। उन्हें दो बार मिली पैरोल को लेकर भी मीडिया में खासा बवाल हुआ। जिया खान की मौत अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म 'नि:शब्द' से बॉलीवुड में अपने करियर की शुरुआत करने वाली अभिनेत्री जिया खान की 3 जून को रहस्यमय तरीके से मौत हुई। उनकी मौत से अमिताभ बच्चन समेत पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री को झटका लगा! जिया की मौत आज भी रहस्य से बाहर नहीं आ सकी है। पहले जहां इसे ख़ुदकुशी माना जा रहा था, वहीं उनकी माँ द्वारा संदेह व्यक्त किये जाने पर इस मामले की फिर से जांच हो रही है। पुलिस ने जिया के 6 पेज के सुसाइड लेटर को आधार बनाकर आदित्य पंचोली के बेटे और जिया के बॉयफ्रेंड रहे सूरज पंचोली को गिरफ्तार किया था। बॉम्बे हाईकोर्ट ने उस लेटर को सुसाइड नोट मानने से इनकार कर दिया, और सूरज को जमानत पर छोड़ने का आदेश दे दिया था। इस मामले में सूरज 21 दिन तक जेल में बंद रहे। अभी भी ये मामला अदालत में है। रितिक-सुजैन की जोड़ी टूटी रितिक रोशन और सुजैन की जोड़ी शादी के 13 साल बाद टूट गई। हालांकि, अपने अलगाव का कारण दोनों ने ही साफ नहीं किया है। 4 सालों के अफेयर के बाद 13 साल की शादीशुदा जिंदगी का साथ भी इस जोड़ी को टूटने से रोक नहीं सका। मीडिया में आई ख़बरों के मुताबिक दोनों का ही एक-दूसरे पर से भरोसा उठ गया था। सबसे चर्चित रोमांस रणबीर कपूर और कैटरीना कैफ का रोमांस इस साल फ़िल्म इंडस्ट्री में सबसे ज्यादा चर्चित रहा! इन दोनों की पैरंट्स के साथ लंदन में निकाली एक तस्वीर लीक हुई। इसके बाद स्पेन के एक बीच की निजी पलों की तस्वीर के लीक होने से इनके चाहने वालों के साथ पूरे बॉलीवुड में ही हंगामा हो गया! कैट ने इससे नाराज होकर मीडिया को लेटर तक लिख डाला। बाद में कैटरीना अपने बर्थडे पर रणबीर के साथ जश्न मनाती पाई गईं! रणबीर-कैट अपने संबंधों को छुपाते रहे, लेकिन करण जौहर के टीवी शो 'कॉफी विद करण' में रणबीर की कजिन करीना कपूर ने सबके सामने इनके रिश्तों की पोल खोल दी! करीना ने न सिर्फ रणबीर की शादी में कैटरीना के गानों पर नाचने की बात कही, बल्कि कैटरीना को 'भाभी' कहकर भी संबोधित किया। दो चर्चित पैच-अप बीता साल दो पैच-अप के लिए भी याद किया जाएगा! ईद के खास मौके पर कांग्रेस विधायक बाबा सिद्दीकी द्वारा दी गई इफ्तार पार्टी में सलमान खान और शाहरुख खान गले मिले! बॉलीवुड के अब तक के इस अहम् पैच-अप के साथ सालों से चली आ रही इन दोनों सुपरस्टार्स की आपसी रंजिश कुछ हद तक ख़त्म हुई! इन दोनों ने राकेश रोशन की फ़िल्म 'करण-अर्जुन' में काम किया था, उसके बाद दोनों कभी साथ नजर नहीं आए! सलमान-शाहरुख़ के अलावा दूसरा पैच-अप रहा सलीम खान और जावेद अख्तर का! बॉलीवुड को शोले, दीवार, डॉन और त्रिशूल जैसी सुपरहिट फिल्में देने वाली इस राइटर जोड़ी के बीच 26 साल लम्बा अबोला इस साल टूटा! ये दोनों अपनी सुपरहिट फ़िल्म 'जंजीर' के रीमेक बनने से खफा थे। इसी मुद्दे पर इनके आपसी मतभेद सुलझे और ये साथ आकर खड़े हुए। इन दोनों के बीच 'मिस्टर इंडिया' बनने के दौरान मतभेद हुए थे। जावेद चाहते थे कि अमिताभ बच्चन इस फिल्म में लीड रोल करें, लेकिन उन्होंने काम करने से मना कर दिया था। ऐसे में खफा जावेद ने सलीम से कहा कि वह अमिताभ के साथ दोबारा काम नहीं करेंगे! लेकिन, दूसरों से उन्होंने कहा कि सलीम अमिताभ के साथ काम नहीं करना चाहते। इन्हीं बातों को लेकर दोनों के बीच मतभेद हो गए थे। अब ये बर्फ पिघल गई है। अलविदा हो गए दो सितारे मशहूर गायक रहे मन्ना डे का 94 साल की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने 24 अक्टूबर, 2013 तड़के करीब 3 बजकर 50 मिनट पर अंतिम सांस ली। अपने गानों से बरसों तक फ़िल्म संगीत प्रेमियों के दिलों में बसने वाले मन्ना डे का निधन एक युग के अंत हो जाने जैसा था। बीते साल ने हरदिल अजीज खलनायक प्राण को भी हमसे चीन लिया। 93 साल की उम्र में बॉलीवुड के पहले 'सुपरस्टार विलन' प्राण ने 12 जुलाई, 2013 की रात 8.30 बजे मुंबई के लीलावती हॉस्पिटल में अंतिम सांस ली। प्राण लंबे समय से बीमार चल रह थे। कुछ समय पहले प्राण को 'दादासाहेब फाल्के पुरस्कार' से उनके घर में ही सम्मानित किया गया था। --------------------------------------------------------------

सिलसिला सिनेमाई सिक्वेल का (2013)

- हेमंत पाल साल के बीतने पर उसका हर मोर्चे पर मूल्यांकन किया जाता रहा है। ये परंपरा कहें, या हमारी पीछे मुड़कर देखने कि आदत, कोई फर्क नहीं है। गुजरे साल 2013 को यदि फिल्मों के मोर्चे पर परखा जाए तो ये साल कुछ ख़ास कारणों के लिए याद किया जाएगा! ऐसा ही एक कारण है, फिल्मों के सीक्वल का! इस साल कई फिल्मों के सीक्वल बने और रिलीस हुए! ऐसा नहीं है कि सिक्वल हमेशा सफलता का सौदा ही साबित हुए हैं। इस साल जहां 'कृष' के सिक्वल ने धूम मचाई, वहीं 'यमला पगला दीवाना-2, वंस अपान ए टाइम मुंबई दोबारा, और जंजीर के सिक्वल बॉक्स ऑफिस पर औंधे मूंह गिरे! पूरे साल सिक्वेंस के बाद साल का अंत भी 'धूम' के सिक्वल 'धूम-3' से हुआ, जिसने कमाई के नए रिकॉर्ड बनाए! जिसका एक गाना ही पांच करोड रूपए में फिल्माया गया है। 'कृष-3' और 'धूम-3' की बॉक्स ऑफिस सफलता ने सिनेमाई सिक्वल के सिलसिले को सरपट दौड़ने का बहाना भी दे दिया है। बॉलीवुड में भेडचाल की परम्परा हमेशा से रही है। 'दबंग' के बाद 'दबंग-2' 'अग्निपथ' के बाद 'अग्निपथ-2' और 'कृष-3' की जबरदस्त सफलता के बाद अब बॉलीवुड पर सिक्वल फिल्मों को भूत चढा हुआ है। इस साल शुरुआत से लेकर अब तक बॉक्स ऑफिस पर कमाई में अधिकतर यही फिल्में आगे रही हैं और यह दौर आगे भी कम होने वाला नहीं। कमाल 'कृष' और 'धूम' का बिजनेस के मामले में इस साल 'कृष-3' और 'धूम-3' ने इस साल प्रदर्शित सभी हिंदी फिल्मों के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया! यह हॉलीवुड की कुछ समय पहले ही रिलीज हुई 'सुपरमैन' फिल्म से भी ज्यादा कमाई करने वाली साबित हुई है। साल 2013 सीक्वल फिल्मों के नाम ही रहा है। पूरे साल सिक्वल 2013 में इनकी शुरुआत जनवरी से हुई। 2008 में रेस’ फिल्म का सीक्वल रेस-2’ आया। सैफअली खान, दीपिका पादुकोण और जैकलीन फर्नांडीस अभिनीत यह फिल्म एक्शन थ्रिलर फिल्म थी। अपनी लागत से दुगनी कमाई करने वाली साल की यह पहली फिल्म बनी। रेस-2’ को दर्शकों ने सराहा और कमाई के मामले में भी यह हिट रही। जनवरी के बाद फरवरी में मर्डर-3’ ने दस्तक दी। अपने बोल्ड सीन की वजह से बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने दमदार एंट्री दर्ज कराई। 7 करोड़ की लागत से बनी मर्डर-3’ ने 18.31 करोड़ का बिजनेस किया। मार्च में 'साहिब बीबी और गैंगस्टर रिटर्न’ ने बॉक्स ऑफिस पर दस्तक दी। 7 करोड़ की लागत से बनी इस फिल्म ने फिल्मी पंडितों के गणित को गड़बड़ा दिया। यह साल की तीसरी हिट फिल्म बनी और 21.95 करोड़ की कमाई की। अप्रैल में आशिकी-2’ ने दर्शकों को खूब लुभाया। फिल्म के गीतों से लेकर स्टोरी तक को खूब वाहवाही और अप्रत्याशित सफलता मिली। बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट फिल्म का तमगा पाकर 'आशिकी-2' ने लागत के मुकाबले 78.42 करोड़ की कमाई की। जून में 'यमला पगला दीवाना-2’ आई, लेकिन दर्शकों ने इस फिल्म को ज्यादा नहीं सराहा। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर औंधे मुंह गिर गई। अगस्त 2013 में आई वंस ऑपन टाइम इन मुंबई दोबारा’ भी ज्यादा सफल नहीं रही। सितंबर में अमिताभ बच्चन की सुपरहिट फ़िल्म 'जंजीर’ का रीमेक आया, लेकिन फिल्म सुपरफ्लाप रही। नवंबर में 'कृष-3’ ने इस सूखे को खत्म किया और उसकी सफलता का ग्राफ बढ़ता गया। इसी माह यानी नवंबर में ही 'सत्या’ की सीक्वल 'सत्या-2’ भी रिलीज हुई। हालांकि, दर्शकों को खींचने में वह असफल ही रही है। दिसंबर में 'धूम' सीरीज की फ़िल्म 'धूम-3’ आई, जिसने कमाई का नया रिकॉर्ड बना डाला। एक सप्ताह में 200 करोड़ का बिज़नेस करने वाली इस फ़िल्म ने सीक्वल बनाने की चाह रखने वाले फिल्मकारों को ऑक्सीजन दे दी! सीक्वल फिल्मों का सिलसिला इस साल के अंत में ही ख़त्म नहीं हुआ है। नए साल की शुरुआत यानी 2014 में भी ऐसी फिल्मों की लिस्ट तैयार है। 'इश्किया’ का सीक्वल 'डेढ़ इश्किया, रागीनी-एमएमएस 2’, सिंघम-2, हेट स्टोरी-2’ जैसे सीक्वल्स दर्शकों के सामने होंगे। ----------------------